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	<title>pravachan श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>सुबह के साथ शाम को भी मंदिर जाने से बढ़ता है मंदिरों का अतिशय : तुम्हारी जिंदगी में संकट दोबारा लौट कर नहीं आएगा </title>
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		<pubDate>Tue, 31 Dec 2024 16:16:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि जिसको संतोष धन आ गया, वो एक क्षण में भी आनंद ले लेता है और असंतुष्ट को सागरों पर्यंत देवो की आयु मिलती है तो भी संतुष्ट नहीं होता। पढ़िए राजीव सिंघई की एक रिपोर्ट&#8230; आपकी दृष्टि से घड़ी चलती है सीधा घंटा क्यों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि जिसको संतोष धन आ गया, वो एक क्षण में भी आनंद ले लेता है और असंतुष्ट को सागरों पर्यंत देवो की आयु मिलती है तो भी संतुष्ट नहीं होता। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की एक रिपोर्ट&#8230;</span></p>
<hr />
<p>आपकी दृष्टि से घड़ी चलती है सीधा घंटा क्यों नहीं बजता, मिनट का कांटा क्यों बनाया और मिनिट का कांटा बनाया था तो सेकंड का क्यों बनाया, क्यों ये भेद किये? इनका बहुत बड़ा दर्शन, मनोविज्ञान है। क्यों बनाया सेकंड? यह बताने के लिए कि सेकंड की भी कोई कीमत होती है, यदि सेकेंड की कोई कीमत नहीं होती तो सेकंड बनाने की जरूरत ही नहीं थी। एक समय में काल बदल जाता है, एक समय पहले जन्मने वाले को मोक्ष के दरवाजे खुल जाते है और हर एक समय के बाद जन्मने वाले को मोक्ष के दरवाजे बंद हो जाते हैं, एक समय की कीमत देखो।</p>
<p>समय की कीमत कितनी है तुम्हारे पास, एक सेकंड का मूल्य आंको, यदि तुम एक सेकंड नहीं आंक पाये तो एक मौका फिर दिया, एक मिनिट और देता हूँ। एक मिनट देने के बाद यदि फिर भी कार्य नहीं कर पाए तो फिर कहते हैं कि एक घंटा देता हूँ, घंटे में नहीं कर पाए तो कहते हैं एक पहर देता हूँ, एक पहर में नहीं कर पाए तो दो पहर देता हूँ, विराम लगाकर फिर दिन दे दिया। दिनभर में नही कर पाये तो एक रात और दी, 24 घण्टे दे दिए। मेरा काम लंबा चौड़ा है तो एक हफ्ता दे दिया। इसके बाद तो पुनरावृत्ति होती है वही संडे, मंडे आदि। अब तुम क्या नया कर पाओगे क्योंकि सात दिन बाद फिर पुनरावृत्ति है।</p>
<p>ज्ञानी व्यक्ति अपनी जिंदगी को एक समय की मानता है। तिथियों ने 15 दिन के बाद पुनरावृत्ति कर दी लेकिन फिर भी हम संतुष्ट नहीं हुए। जिसको संतोष धन आ गया, वो एक क्षण में भी आनंद ले लेता है और असंतुष्ट को सागरों पर्यंत देवो की आयु मिलती है तो भी संतुष्ट नहीं होता। असंख्यात वर्ष आयु दे दी, उसके बाद भी जीवन का अंत आया तो कहता है बस, तब कर्म कहता है कि अरे दुष्ट! तेरे पर मैंने मेहरबानी करके गलती की, एकेन्द्रीयों में चला जाता है, इसलिए बंधुओं विराम लगाना सीखो और विराम का अर्थ है संतुष्ट होना, पूर्णता का अनुभव करना, जितना समय मिला है, उतने में ही करूँगा। जो भी मुझे समय मिलेगा, मैं उसमे स्वयं को समेट लूँगा।</p>
<p>कितना ही धन मिल जाए, कितना भी भोजन मिल जाए, कितनी बड़ी जिंदगी मिल जाए मैं संतुष्ट नहीं होऊँगा, समझ लेना तुम्हारा सब कुछ खत्म होने वाला है। जिंदगी इतनी छोटी मिलेगी कि एक श्वास में 18वे भाग जिंदगी निगोद में। देवताओं ने यदि जिंदगी भर कुछ भी नहीं किया, 6 महीने में यदि वो अपनी जिंदगी सुधार ले तो छह महीने में ऐसा पुण्य कमा सकता है कि यहाँ मनुष्य बनकर के, मुनि बनकर के अनन्त सुख को प्राप्त करके सिद्धालय जा सकता है, इसलिए अपना नेचर बनाओ जो कुछ भी मिला है हमें, हम उसमें एडजस्ट करेंगे। जितनी जिंदगी मिली है उसमें ही हम संपूर्ण कार्य करके और 5 मिनट बचा लेंगे शेष। आयु कर्म के संबंध में शास्त्रों में वर्णन है कि एक समय की आयु बढ़ नहीं सकती, घट तो सकती है।</p>
<p>ये साल जा रहा है बस इसको थैंक्स करना है, जिसने साल भर की जिंदगी दी है, जो तुमने साल भर में जिंदगी पा करके जीने का आनंद लिया है, उसको एक बार तो थैंक्स कहना बनता है। क्या पता अगले साल पूरी मिलेगी या नही? सुख के बाद दुख का दिन कैसे आ जाता है, मात्र एक कारण है तुम आभार नहीं मानते हो। दुःख में तो बहुत लोग शांतिधारा कराते हैं लेकिन कितने लोग हैं जो संकट दूर होने के बाद आभार में शान्तिधारा कराते है, आभार की शांतिधारा ही तुम्हें वो संकट दोबारा नहीं लाने देगी, इससे बढ़ता है शांतिधारा का अतिशय।</p>
<p>संकटों में तुम कितनी भी शांतिधारा करना हम नहीं कह सकते कि मंदिर में अतिशय है और जब मंदिर में लोग उपकृत होने के बाद आभार मानने आते हैं, समझ लेना उस प्रतिमा का दिन दूना रात चौगुना अतिशय बढ़ेगा और तुम्हारी जिंदगी में वो संकट दोबारा लौट कर नहीं आएगा। सुबह मंदिर जाना तुम्हारा स्वार्थ है, तुम्हारी मजबूरी है, तुम्हारा लोभ है कि मेरा दिन अच्छा निकले, इसमे चमत्कार नहीं है, जब तुम शाम को लौट के आओ और फिर तुम्हें मंदिर याद आ जाए कि भगवान शाम का मंदिर आभार में, एक दिन की जिंदगी मिली थी, मैं सकुशल लौट आया हूँ, आभार मानने आया हूँ, जाओ कल की जिंदगी सुरक्षित हो गई।</p>
<p>सुबह मंदिर जाने से हमें एनर्जी मिलती है और शाम को मंदिर जाने से भगवान की मूर्ति में एनर्जी बढ़ती है। यदि तुम चाहते हो कि यह मंदिर सदा अतिशयकारी बना रहे तो मंदिर में जितने लोग सुबह जाकर के एनर्जी लेते हैं, वे शाम को नौ बार णमोकार मंत्र पढ़कर के आये, कल से पुनः मंदिर की एनर्जी ताजा मिलेगी, मंदिर का अतिशय शाम से, आभार से बढ़ता है।</p>
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		<title>संस्कृति, संस्कार और आपसी स्नेह से परिवार में सुख, शांति, खुशहाली रहती है : आर्यिका श्री सृष्टिभूषण माताजी  </title>
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		<pubDate>Tue, 24 Dec 2024 12:25:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री सुमति सागर जी की शिष्या आर्यिका श्री सृष्टि भूषण माताजी ससंघ विगत दिनों से नगर में शीतकालीन वाचना कर रही हैं। 24 दिसंबर को आर्यिका श्री सृष्टि भूषण, श्री विश्वयश मति, श्री आप्तमति संघ का मंगल विहार बहादुरपुर सिद्धक्षेत्र थोबन जी की ओर हुआ। पढ़िए राजेश पंचोलिया की एक रिपोर्ट&#8230; मुंगावली अशोक नगर। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री सुमति सागर जी की शिष्या आर्यिका श्री सृष्टि भूषण माताजी ससंघ विगत दिनों से नगर में शीतकालीन वाचना कर रही हैं। 24 दिसंबर को आर्यिका श्री सृष्टि भूषण, श्री विश्वयश मति, श्री आप्तमति संघ का मंगल विहार बहादुरपुर सिद्धक्षेत्र थोबन जी की ओर हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया की एक रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुंगावली अशोक नगर।</strong> आचार्य श्री सुमति सागर जी की शिष्या आर्यिका श्री सृष्टि भूषण माताजी ससंघ विगत दिनों से नगर में शीतकालीन वाचना कर रही हैं। 24 दिसंबर को आर्यिका श्री सृष्टि भूषण, श्री विश्वयश मति, श्री आप्तमति संघ का मंगल विहार बहादुरपुर सिद्धक्षेत्र थोबन जी की ओर हुआ। मंगल विहार के समय जगह-जगह आर्यिका माता जी के चरण प्रक्षालन कर अश्रुपूरित नेत्रों से विदाई दी गई।</p>
<p><strong>जीवन में अटेंशन रहोगे तो टेंशन दूर होगा जिससे रोग, कर्ज और मर्ज दूर होगा </strong></p>
<p>वात्सल्य मूर्ति आर्यिका श्री सृष्टि भूषण माताजी ने परिवार की खुशहाली आपसी प्रेम संस्कार के लिए प्रवचन में महत्वपूर्ण सूत्र दिए। माताजी ने प्रवचन में बताया कि धर्म प्यार सिखाता है संस्कृति को सफल बनाना चाहिए। सुख भौतिकता से नहीं आत्मा की अनुभूति से प्राप्त होता है। स्वयं के अंतरंग भाव परिणाम से आत्मा सुख आनंद मिलता है। इसलिए अर्थ पुरुषार्थ से जोड़े गए धन को त्याग दान के माध्यम से छोड़ना भी चाहिए। आदिनाथ भगवान ने असि, मसि, कृषि, शिल्प कला, वाणिज्य का उपदेश दिया। इसलिए श्रावक को अर्थ पुरुषार्थ के साथ कृषि से ऋषि बनने का भी पुरुषार्थ करना चाहिए। साधु के हाथ 23 घंटे ऊपर आशीर्वाद देने के लिए रहते हैं। 1 घंटे आहार के समय हाथ नीचे रहता है, श्रावक का हाथ 24 घंटे में मात्र 1 घंटे आहार दान देने के लिए ऊपर होता है। आहार दान सहित सभी दान करने से मोक्ष की राह प्रशस्त होती है। प्रवचन में माताजी ने परिवार को संस्कारित रखना सास बहू सहित सभी रिश्तों में आपसी समन्वय प्रेम सौहार्द रखने की प्रेरणा दी। हिंदू जैन धर्म में एकम से लेकर पूर्णिमा तक अनेक त्यौहार मनाए जाते हैं।</p>
<p>उन्होंने अंग्रेजी कैलेंडर के बजाय भारतीय तिथि त्यौहार मनाने पर उपदेश दिया। बच्चों को गुड मॉर्निंग नहीं सुप्रभात सीखना चाहिए। जीवन में इच्छाओं की अपेक्षा की पूर्ति नहीं होने से उपेक्षा से टेंशन होता है। जीवन में अटेंशन रहोगे तो टेंशन दूर होगा। इससे रोग, कर्ज और मर्ज दूर होगा। परिवार का संचालन न्याय नीति धर्म पूर्वक करना चाहिए। ब्रह्मचारिणी शिखा दीदी ने बताया कि इसके पूर्व आर्यिका श्री विश्वयश मति माताजी ने अपने प्रवचन में गुरु मां सृष्टि भूषण माताजी की जन्म नगरी मुंगावली को ननिहाल दर्शाते हुए बताया कि आना और जाना चलता रहता है। जीवन का लक्ष्य निर्धारित होना चाहिए अंतरंग के भाव और परिणाम अच्छे होना चाहिए। चिड़िया कविता के माध्यम से बताया कि पुरानी हो गई बस्ती, पुराना हो गया आशियाना, पुराना आंगन, खिड़की, दरवाजा हो गया है। इस कविता को सुनकर सभी के नेत्र अश्रुपुरित हो गए। माताजी ने बताया कि श्रावक की मृत्यु होती है जबकि साधु की सल्लेखना होने पर उसकी मृत्यु महोत्सव मनाया जाता है। आपको भी मृत्यु महोत्सव मनाने का पुरुषार्थ करना चाहिए। क्योंकि समय बहुत कम है संयम धारण करना चाहिए।</p>
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		<title>धर्म से बड़ी हमारी जिंदगी भर की धारणा नहीं हो सकती : निर्यापक मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/shree_sudha_sagarji_maharaj_pravachan_20_december_pravachan/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Dec 2024 12:13:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति पूरी जिंदगी संसार की व्यवस्था में, संसार की जोड़ तोड़ में निकालकर के अपनी जिंदगी का अवसान कर लेता है। हमें कीचड़ में रहना है लेकिन पंक नहीं बनना, हमें बनना है पंकज बनना है। पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट… व्यक्ति पूरी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निर्यापक मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति पूरी जिंदगी संसार की व्यवस्था में, संसार की जोड़ तोड़ में निकालकर के अपनी जिंदगी का अवसान कर लेता है। हमें कीचड़ में रहना है लेकिन पंक नहीं बनना, हमें बनना है पंकज बनना है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>व्यक्ति पूरी जिंदगी संसार की व्यवस्था में, संसार की जोड़ तोड़ में निकालकर के अपनी जिंदगी का अवसान कर लेता है। हमें कीचड़ में रहना है लेकिन पंक नहीं बनना, हमें बनना है पंकज, पापियों के बीच में रहकर हम पापी नहीं बनेंगे। संसार ने अपने रास्ते सर्किल रूप बनाए हैं, सर्किल का अर्थ है वही-वही घूमते जाओ, कोल्हू के बैल के समान सबकुछ वही है।</p>
<p>स्पष्ट है कि मेरा बेटा खुरापाती है फिर भी जब पक्ष की बात आएगी तो किस तरफ झुकोगे? कौन झुका रहा है, अनजाने की नहीं कह रहा हूँ, अनजाने की तो अपने असत्य भी सत्य है। यदि अनजाने में हम असत्य को सत्य मानते रहे तो तुम्हे असत्य का दोष नहीं लगेगा। इमली का पेड़ है और किसी कारणवश मानते रहे कि यह नीम का पेड़ है तो कोई दोष नहीं, लेकिन जिस दिन किसी विज्ञ व्यक्ति के द्वारा पता चल जाए यह तो इमली का पेड़ है लेकिन मन में भाव आ जाए कि आज तक माना है तो अब कैसे, अब तो नीम है तो है बस उसी समय तुम मिथ्यादृष्टि हो गए।</p>
<p>अपन इतने मूर्ख नहीं है कि अपन सत्य को नहीं जानते, दिन को दिन, रात को रात और पाप को पाप नहीं जानते, दसो धर्म हम जानते है, सब जानते है। विभीषण बचपन से ही रावण का प्रिय भाई था और सारे युद्ध रावण ने विभीषण की अगवानी में लड़े, हर युद्ध में विभीषण सेनापति होता था लेकिन जब विभीषण को पता चला कि मेरा भाई असत्य के पक्ष में है, क्या किया, रावण को समझाया, लात भी खाई लेकिन कहा नहीं, धर्म से बड़ा भाई नहीं हो सकता, धर्म से बड़ा मोह, परिवार नही हो सकता। धर्म से बड़ी हमारी जिंदगी भर की धारणा नही हो सकती। हमने कहा इसको जिंदगी भर नीम का पेड़ लेकिन आज सही पता चला तो अब नही। इस संसार के स्वरूप को तुम समझों, समझ रहे हो, जान रहे हो लेकिन एक साहस करो असत्य को ठुकराने का, कम से कम इतनी घोषणा तो कर ही दो कि मैं आज तक जिंदगी में जो किया, वह झूठा है और आज जो गुरु ने सुनाया वही सत्य है। इतनी भी अपने घोषणा कर दी तो भले आप चाहे चारित्री बन पाओ या न बन पाओ लेकिन सम्यकदृष्टि तो बन ही जाओगे।</p>
<p>जिनसे तुम दिन रात मोह कर रहे हो, 60 साल के बाद वे तुम्हारे नहीं है। एक माँ बनने के बाद भारतीय नारी का पक्ष पति से ज्यादा बेटे की ओर जाता है, मनुष्य में ही नही तिर्यंचों में भी। आज तक कोई नारी, पुरुष तिर्यंच के लिए नही मरी लेकिन आज एक मृगी अपने बेटे के लिए शेर के सामने कूंद जाती है, मातृत्वपना नारी का स्वभाव नही है, पत्नीत्व नही। 80 साल के बाद तुम धर्म करना भी चाहोगे तो नही होगा, बुद्धि, विवेक काम नही करेगा, जिन्होंने जिंदगी भर रात में नही खाया लेकिन 80 साल के बाद रात में भी मांगने लग जाते है। अपन को लग रहा है कि हम बड़े होते जा रहे है, असल मे छोटे होते जा रहे है, इसलिए जो करना है, 40 के पहले जल्दी कर लो, बाद का हाल तो सब देख ही रहे है।</p>
<p>तुम इस संसार में सत्य को पहचानो और समझ में आ जाए तो 40 साल तक भले न समझ बने रहना, 40 साल तक मोह मायाजाल में फंसे रहना, 40 साल तक तुम मौज मस्ती करते रहना लेकिन 41 में प्रवेश के पहले पहले सत्य का निर्णय कर लेना और 60 साल में तो आयु बन्ध का समय है कोई साथ नहीं देगा, 60 साल के बाद भी जिनके लिए तो मर रहे हो, जिनके लिए तुम धर्म छोड़ रहे हो, पाप कर रहे, तुम जान रहे हो कि सत्य कैसा है, ये गलत है फिर भी कषायों के पक्ष में तुम्हारा मन जा रहा है, मत करो अब आयु बंध का समय आ गया है, अंत में तुम्हारे साथ रहेंगे वही कर्म, जो तुमने किया था।</p>
<p>कायदे से 40 साल की तुम्हे जिंदगी मिली है, 40 साल तक की कमाई तुम्हें जहां उड़ाना है उड़ाओ क्योंकि वो तुम्हारी ओरिजिनल जिंदगी है बस 40 साल के बाद की कमाई पाप के लिए नही, धर्म के लिए नहीं, संसार के लिए नहीं। 40 साल के बाद जो कुछ भी कमाओगे अपने लिए कमाओगे, अपने धर्म के लिए कमाओगे। गलत कार्य मे नही, अच्छे कार्य मे जायेगे, हम परिवार के विकास में लगाएंगे, परिवार को अच्छा रास्ता, अच्छी जिंदगी, सत्मार्ग में लगायेंगे। फिर हम पुण्यहीनों के लिए कुछ देगे, मानव सेवा, गौसेवा करेंगे। तीन में ही धन जाना चाहिए 40 के बाद- पहला परिवार व अपने धर्म के लिए, दूसरा पुण्यहीनों के लिए, पशु पक्षियों के लिए, तीसरा मानव जाति के लिए। 40 साल के बाद ऐसा कोई काम नहीं करना जो जाति विरुद्ध, कुल विरुद्ध, माँ बाप के विरुद्ध, गुरुओं के विरुद्ध हो, धर्म के विरुद्ध हो।</p>
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		<title>जो धन भोगों में लगता है, वह विनष्ट हो जाता है और जो धन परमार्थ में लगता है वह अमर हो जाता है : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 Nov 2024 14:16:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि धर्म, धर्मायतन, धर्मात्मा हमारी संस्कृति का मूल आधार है, आपके बनाये अपने घर भले ही विनष्ट हो गये हों लेकिन 200 वर्ष पुराने मंदिर आज भी अपनी पताका को फहरा रहे हैं। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230; इंदौर। धर्म, धर्मायतन, धर्मात्मा हमारी संस्कृति का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि धर्म, धर्मायतन, धर्मात्मा हमारी संस्कृति का मूल आधार है, आपके बनाये अपने घर भले ही विनष्ट हो गये हों लेकिन 200 वर्ष पुराने मंदिर आज भी अपनी पताका को फहरा रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> धर्म, धर्मायतन, धर्मात्मा हमारी संस्कृति का मूल आधार है, आपके बनाये अपने घर भले ही विनष्ट हो गये हों लेकिन 200 वर्ष पुराने मंदिर आज भी अपनी पताका को फहरा रहे हैं, ये उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने नरसिंगपुरा दिगंबर जैन लाल मंदिर के पास संतभवन की आधारशिला रखते हुये व्यक्त किये। मुनि श्री ने कहा कि तालाब में कमल जब तक अपनी नाल से जुड़ा रहता है तभी तक खिला रहता है जैसे ही नाल से निकला कि वह मुर्झा जाता है। उसी प्रकार धर्म की नाल से जुड़ा रहने वाला व्यक्ति हमेशा खिला-खिला रहता है। मुनि श्री ने कहा कि हमारी संस्कृति में धर्म और धर्मायतनों को प्रमुखता दी है इसीलिये आप जंहा भी जाते हो घर बनाने से पहले मंदिर का निर्माण करते हो, यह परंपरा आज की नहीं है बल्कि जब से कर्म युग की शुरुआत हुई तभी से धर्म और धर्मायतनों तथा साधु वसतिका का निर्माण शुरु हो गया था। उन्होंने चार प्रकार के दान की चर्चा करते हुये कहा कि आहार, औषधि तथा उपकरण यह तीन दान का पुण्य तो उनकी समय सीमा तक है लेकिन चौथा वसतिकाआवास दान का बहुत महत्व है साधु वसतिका रहेगी तो साधू संतों का आवागमन रहेगा और उनका आशीर्वाद आपको तथा आपके परिवार को सैकड़ों वर्षों तक प्राप्त होता रहेगा।</p>
<p><strong>सभी पुण्यार्जकों को अपना आशीर्वाद प्रदान किया</strong></p>
<p>उन्होंने नरसिंगपुरा जैन समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष हर्ष जैन महामंत्री अनिल जैन विशाखा, प्रदेश अध्यक्ष विदर्भ जैन सनत जैन, आशीष जैन एवं स्थानीय अध्यक्ष मुकेश जैन सहित वसतिका गृह निर्माण में योगदान देने वाले सभी पुण्यार्जकों को अपना आशीर्वाद प्रदान किया। इस अवसर पर दिगंबर जैन समाज छत्रपति नगर के अध्यक्ष भूपेंद्र जैन, डॉ. जैनेंद्र जैन, विपुल बांझल, कमल जैन चैलेंजर, अखिलेश अरविंद सोधिया, नरेंद्र राजेंद्र नायक, वीरेंद्र जैन, आलोक जैन, अजय रेनबो आदि समाज जनों ने मुनी संघ को श्रीफल समर्पित कर छत्रपति नगर पधारने हेतु निवेदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। प्रवचन उपरांत संत सदन का शिलान्यास का कार्यक्रम संपन्न हुआ। यहां से मुनी संघ कांच मंदिर पहुंचा एवं यहां आहार चर्या संपन्न होने के उपरांत सामायिक लश्करी दिगंबर जैन मंदिर में संपन्न हुई। दोपहर में आसपास के जिनालयों की वंदना करते हुये। मुनिसंघ नेमीनगर पहुंचा जहां सांयकालीन शंका समाधान का कार्यक्रम संपन्न हुआ।</p>
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		<title>हर सौ साल में कोई न कोई तीर्थक्षेत्र बनना ही चाहिए : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज  </title>
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		<pubDate>Mon, 11 Nov 2024 16:23:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वास्तविक रूप से देखा जाए तो सनातन धर्म, जैन धर्म ही है, हम सनातनी हैं हमारे धर्म के कोई संस्थापक नहीं है, न ऋषभदेव है न महावीर है, हमारे धर्म का कोई कर्ता धर्ता नहीं है। सनातन धर्म का प्रचार हम लोगों को करना चाहिए। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230; जब हम संगोष्ठी के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वास्तविक रूप से देखा जाए तो सनातन धर्म, जैन धर्म ही है, हम सनातनी हैं हमारे धर्म के कोई संस्थापक नहीं है, न ऋषभदेव है न महावीर है, हमारे धर्म का कोई कर्ता धर्ता नहीं है। सनातन धर्म का प्रचार हम लोगों को करना चाहिए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जब हम संगोष्ठी के विभिन्न विषयों को देखते हैं तो जैनदर्शन एक ऐसा बहुआयामी सर्वोदय के रूप में प्रस्तुत होता है कि लोग संदेह में पड़ जाते हैं कि सत्य क्या है, जैनदर्शन सत्य किसे मानता है, जैन दर्शन में न राग का निषेध है, न वीतराग का निषेध है। जितना वीतराग को स्वीकार किया गया, उतना ही राग को। वीतराग का स्वरूप क्या होना चाहिए, यह तो जैनदर्शन में मुख्य पद पर अधिष्ठित है लेकिन विशेषता ये है कि वीतराग धर्म से जाना जाने वाला धर्म राग की विशेषता बताता है कि राग कैसा होना चाहिए।</p>
<p>नाच गान आदि ललित कालाओं का वर्णन ऋषभदेव ने किया, वो तो वीतराग मार्ग के संस्थापक थे, वह तो संसार को तारने के लिए तीर्थंकर बने थे, जैन दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह किसी भी चीज का निषेध नहीं करता, पाप का भी निषेध नहीं करता यदि तुम्हें पापी बनना है, नरक में जाना है तो नरक जाने की भी विधि बताई। बस शर्त एक ही है तुम कौन हो, 72 कलाओं में चोर कला बता दी, धुत को कला में ले लिया। उनके जन्मदिन पर नीलांजना का नृत्य होना और उसमे मगन होना, ललित कथा की रुचि का प्रतीक है।</p>
<p><strong>राग भी संस्कारित होता है </strong></p>
<p>जैनदर्शन हर भूमिका का कथन करता है, तुम कौन हो, तुम्हारा प्रयोजन क्या है? तुम्हारी अर्थ क्रिया क्या है? इन पर विचार करते हैं तो जैनदर्शन में राग की क्रियाओं को भी व्यवस्थित किया गया। राग का समर्थन नहीं किया गया, राग को उत्श्रृंखल होने से बचाया। ललित कलाओं का अर्थ यह नहीं है कि राग में रंगायमान करना, उद्दंड, उत्श्रृंखल न हो, वो रावण जैसा न हो। राग की भी एक संस्कृति होती है, राग भी संस्कारित होता है। राग ऐसा करो जिसमें संस्कृति बने, संस्कार बनें। विवाह को संस्कृति में ले लिया जो राग है, संसार का बढ़ावा देने वाला है। नाचगान होना चाहिए, उन्होंने निषेध नहीं किया लेकिन नाचगान अश्लील नहीं होना चाहिए, ललित कला का इतना सुंदर वर्णन किया कि नीलांजना का कोई भी अंग प्रदर्शित नहीं होता, अर्धनग्न होकर नाच नहीं किया जाता। नीलांजना जितनी देर नाचती रही पूरे समय उसकी दृष्टि ऋषभदेव पर रही। उसकी दृष्टि में फुहड़ता, अश्लीलता नहीं थी, उसकी दृष्टि में एक संस्कार, एक कला थी।</p>
<p><strong>मंदिर निर्माण जैनियों का असाधारण प्रतीक है</strong></p>
<p>ऋषभदेव के शिल्प कला में मंदिर मानस्तंभ आदि आये, ये जैनदर्शन की ही देन है। दुनिया में किसी भी संप्रदाय में मंदिर का, प्रतिमाओं का उल्लेख नहीं है क्योंकि सब अद्वेतवादी है। मंदिर निर्माण जैनियों का असाधारण प्रतीक है, अकृत्रिम चैत्यालय उसका प्रतीक है और जब कर्मभूमि की रचना हुई तब सौधर्मेन्द्र ने पाँच चैत्यालयों की रचना की, एक मध्य में व चार दिशाओं में। ये अनादि अनन्त कलाएं है जो भोगभूमि के समय तिरोहित हो गयी, उनको उद्घाटित ऋषभदेव ने किया।</p>
<p>देवगढ़ में राजा ने कहा कि मैं तुम्हारी एक भी मूर्ति सुरक्षित नहीं रहने दूंगा, मेरा संकल्प है, इसलिए जैनियों आप लोग मूर्ति बनाना बन्द करो, मूर्ति की स्थापना बन्द करो। एक जैनी श्रावक ने कहा राजन आप राजा है, खण्डित करने का आपका संकल्प है, मैं आपको रोकने वाला नहीं हूँ लेकिन आप भी मुझे बनाने से नहीं रोक सकते। कहते हैं कि राजा खंडित करते-करते थक गया लेकिन बनाने वाला जीत गया, देवगढ़ इसका प्रतीक है। देवगढ़ के 50 किलोमीटर के अंदर आज भी मूर्तियाँ मिलती है, इसलिए जैनदर्शन का आसाधारण गुण है तीर्थक्षेत्र, मूर्ति विद्या।</p>
<p><strong>समवशरण में पहले मानस्तंभ में मूर्ति का दर्शन करना पड़ता है</strong></p>
<p>जब भगवान साक्षात पृथ्वी पर जीवित होते हैं, उनके सामने मूर्ति की कीमत होती है। समवशरण में पहले मानस्तंभ में मूर्ति का दर्शन करना पड़ता है, चैत्यवृक्ष में चैत्यों के ऊपर मूर्तियां होती है उनको नमस्कार करो। यानी जिनेन्द्र भगवान के सामने मूर्ति उतनी ही महत्वपूर्ण थी, जितनी आज अपने लिए है। इसका अर्थ है कि जिनेंद्र भगवान ने मूर्ति को स्वीकार किया। ऋषभदेव के पहले भी मूर्ति थी, इसका प्रतीक है समवशरण।</p>
<p>मात्र पुराने तीर्थ क्षेत्र को ही सुरक्षित नहीं करना है, नए तीर्थक्षेत्रों की परंपरा हर युग में हर शताब्दी में, सौ साल में कोई न कोई तीर्थ बनना ही चाहिए, जिससे यह पता चले कि तीर्थक्षेत्रों की परंपरा अक्षुण्ण बनी रही। पुरानी मंदिरों की पूजा हो या न हो, हर शताब्दी में नई शिल्प की स्थापना होना चाहिए, जिससे सन्तति आगे बढ़ती है। तीर्थक्षेत्रों में मंदिरों की सबसे बड़े ह्रास का कारण है वास्तु दोष। आज तक भारत में ऐसा कोई मंदिर नहीं मिला, जिसमें वास्तु दोष हो और वो उजड़ गया हो और ऐसा भी मंदिर नहीं मिला जिसमें वास्तु दोष है और वो सुरक्षित बना रहा हो। यदि वास्तु से निर्दोष मंदिर है तो वह कभी समाप्त नहीं होगा, मंदिर से एक दिन वह तीर्थ बन जाएगा और अपना अतिशय दिखायेगा।</p>
<p>वास्तविक रूप से देखा जाए तो सनातन धर्म, जैन धर्म ही है, हम सनातनी हैं हमारे धर्म के कोई संस्थापक नहीं है, न ऋषभदेव है न महावीर है, हमारे धर्म का कोई कर्ता धर्ता नहीं है। सनातन धर्म का प्रचार हम लोगों को करना चाहिए।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन :          सारी दुनिया कैसी हो जाए, तुम कोयले की खदान में हीरे जैसे बनो &#8211; मुनि सुधासागर महाराज </title>
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		<pubDate>Thu, 02 Nov 2023 10:36:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हरि पर्वत स्थित महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर में धर्मसभा का प्रारम्भ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलन कर हुआ। इस अवसर पर निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि कोयले की खदान में हीरा सफेद कैसे रह गया। इसी प्रकार सारी दुनिया गंदी बनी रहने दो, बस [&#8230;]]]></description>
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<p>हरि पर्वत स्थित महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर में धर्मसभा का प्रारम्भ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलन कर हुआ। इस अवसर पर निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि कोयले की खदान में हीरा सफेद कैसे रह गया। इसी प्रकार सारी दुनिया गंदी बनी रहने दो, बस तुम अपने मन को पवित्र कर लो, कोई तुम्हें काला नही कर सकता। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राहुल जैन की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></p>
<hr />
<p>आगरा। हरि पर्वत स्थित महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर में धर्मसभा का प्रारम्भ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलन कर हुआ, जिसमें श्रावक परिवार ने मुनिश्री का पाद प्रक्षालन कर मुनिश्री को शास्त्र समर्पित किए। मंच का संचालन मनोज जैन ने किया। इस अवसर पर निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि कोयले की खदान में हीरा सफेद कैसे रह गया। इसी प्रकार सारी दुनिया गंदी बनी रहने दो, बस तुम अपने मन को पवित्र कर लो, कोई तुम्हें काला नही कर सकता।</p>
<p><strong>अपने को कोसना बंद करो</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि कभी न कभी व्यक्ति को अपने आप में अच्छेपने की अनुभूति होती है, चौबीस घंटे में कभी न कभी ऐसा लगता है कि मैं अपने आप को भाग्यशाली मानता हूं। जब-जब हमें अपने जीवन मे ऐसा महसूस हो, उन क्षणों को सुरक्षित कर लेना क्योंकि हीन भाव की अनुभूति ज्यादा होती है, अहोभाग्य की अनुभूति हमें कम होती है। कई बार तो हम दुर्भाग्य को ही अहोभाग्य समझ लेते है, लेकिन सच्ची अनुभूति कभी धर्म करते समय, कभी अच्छे लोग जब तुम्हारी प्रशंसा कर रहे हों, तब होती है। तुम अपने आप को धन्य मान रहे हो एक बात, तुम्हें पाकर कोई दूसरा धन्य मान रहा है दूसरी बात है, ये दो चीजें हमारी जिंदगी की अनमोल निधि हैं। समयसार पढने के बाद अपने आपको कोसना बंद करो, अपने आप को शाबाशी देना शुरू करो, अपने आप को सौभाग्यशाली मानना शुरू करो।</p>
<p><strong>दुर्भागियों से घटता है मंदिर का अतिशय</strong></p>
<p>कार्य करना अलग चीज है, कार्य तो मजदूर भी करता है, पैर तो मजदूर भी दबा सकता है लेकिन एक बेटा पैर दबाता है अपने पिता के तो वह मजबूर होकर नहीं अहोभाग्य होकर दबाता है। मंदिर तो सभी आते हैं। कई दुर्भाग्य लेके आते हैं, जितने दुर्भागी मंदिर आएंगे, मंदिर का अतिशय घटेगा और मंदिर का अतिशय जितना घटेगा, उतना ही तुम्हारे लिए नुकसानदायक है। हम हमेशा बड़ों को दुर्भाग्य के समय स्वीकार करते हैं, अपने आप में हमें फीलिंग होती है कि मैं दुर्भाग्यशाली हूं, भगवान को, गुरु को देखकर लगता है कि मैं असंयमी हूँ, अच्छी आंखों वाले को देखकर लगता है कि मैं अंधा हूं। ये जो हमारी फीलिंग है ये नकारात्मक फीलिंग कहलाती है, ये दीन, हीन व्यक्ति के लिए होती है जब किसी से सहारा लेना हो। क्योंकि हम जितने दीन &#8211; हीन होंगे, सामने वाला उतना ही द्रवीभूत होगा।</p>
<p><strong>नारियल जैसा बनें</strong></p>
<p>कोई भी पर वस्तु पर नजर हमारी जाती है, हमारा कर्ज और खर्च बढ़ जाता है। हम कर्जों में इतने डूबते जा रहे है क्योंकि पग पग पर हम दूसरों के बिना नहीं जी पा रहे हैं। हमारे ऊपर कर्मों का कर्जा लगता जा रहा है क्योंकि हम बिना पुण्य के नहीं जी पा रहे हैं, हम बिना पुण्य के नहीं हंस पा रहे हैं। नारियल को श्रीफल क्यों कहते हैं, फल तो सभी है, सभी फल मीठा खाते हैं, मीठा बनते हैं और खारा पानी हो तो सब फल सूख जाते हैं। संसार मे एक फल ऐसा है जो खारा पानी पीता है और मीठा पानी बना देता है इसलिए इसको श्रीफल बोलते हैं। मीठा खाकर मीठा हुए तो क्या माना, समुद्र के किनारे जितने नारियल होते हैं, सबसे अच्छे मीठे नारियल होते हैं। इससे शिक्षा लेना है कि हमें वो चीज चाहिए जो सबसे ज्यादा निकृष्ट हो, सबसे ज्यादा कष्टदायी हो, उन कष्टों में हम हंसके दिखाएं तो हमारा नाम भी श्रीचन्द्र हो जाये। हम चाहते हैं कि अच्छे सुख के दिनों में हम हंस जाएं, नहीं, हमें वो कला सीखनी है जो कला दुनिया का आज भी वैज्ञानिक नहीं कर पायेगा। कोयले की खदान में हीरा सफेद कैसे रह गया ये समझ में नहीं आया। इसी प्रकार हम संसार के कोयले में रह रहे हैं, संसार की गन्दगी में रह रहे हैं। सारी दुनिया गंदी बनी रहने दो, बस तुम अपने मन को पवित्र कर लो, कोई तुम्हें काला नहीं कर सकता।</p>
<p><strong>ये रहे मौजूद</strong></p>
<p>धर्म सभा में प्रदीप जैन पीएनसी, निर्मल मोठ्या, मनोज जैन बाकलीवाल, नीरज जैन जिनवाणी, पन्नालाल बैनाड़ा, हीरालाल बैनाड़ा, जगदीश प्रसाद जैन, राजेश सेठी, अमित जैन बॉबी, राजेश जैन गया वाले, विवेक बैनाड़ा, शैलेंद्र जैन, अनिल जैन, समकित जैन, मीडिया प्रभारी राहुल जैन, शुभम जैन सहित जैन सकल समाज के लोग मौजूद थे l</p>
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