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	<title>penance &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>पुणे विश्वविद्यालय में दिगंबर संत को प्रवेश से रोका : जैन विरासत संगोष्ठी का था आयोजन, जैन समाज में रोष </title>
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		<pubDate>Sun, 31 May 2026 07:51:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में &#8216;भारत की प्राचीन जैन विरासत&#8217; विषय पर आयोजित संगोष्ठी के दौरान आमंत्रित दिगम्बर मुनि श्री अक्षय सागर जी को कथित रूप से उनके पारंपरिक दिगम्बर स्वरूप के कारण प्रवेश से रोक दिया गया। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में &#8216;भारत की प्राचीन जैन विरासत&#8217; विषय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में &#8216;भारत की प्राचीन जैन विरासत&#8217; विषय पर आयोजित संगोष्ठी के दौरान आमंत्रित दिगम्बर मुनि श्री अक्षय सागर जी को कथित रूप से उनके पारंपरिक दिगम्बर स्वरूप के कारण प्रवेश से रोक दिया गया। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में &#8216;भारत की प्राचीन जैन विरासत&#8217; विषय पर आयोजित संगोष्ठी के दौरान आमंत्रित दिगम्बर मुनि श्री अक्षय सागर जी को कथित रूप से उनके पारंपरिक दिगम्बर स्वरूप के कारण प्रवेश से रोक दिया गया। यह मामला सामने आने के बाद देशभर के जैन समाज में आक्रोश व्याप्त हो गया है। विभिन्न जैन संगठनों ने इसे भारतीय श्रमण संस्कृति, तप, त्याग और अहिंसा की परंपरा का अपमान बताया है। राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ एवं विश्व जैन संगठन के प्रचारक राजेश जैन “दद्दू” और मयंक जैन ने कहा कि यह घटना केवल एक संत का अपमान नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी जैन श्रमण परंपरा और भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति का अपमान है।</p>
<p><strong>क्या है पूरा मामला</strong></p>
<p>जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय के इतिहास एवं पुरातत्व विभाग द्वारा प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत जैन विरासत पर विशेष संगोष्ठी आयोजित की गई थी। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में मुनि श्री अक्षय सागर जी को आधिकारिक निमंत्रण पत्र देकर आमंत्रित किया गया था। बताया गया कि जब मुनि श्री कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे, तब विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा उनके पारंपरिक दिगम्बर स्वरूप को आधार बनाकर प्रवेश देने से इनकार कर दिया। इस घटना के बाद जैन समाज में भारी नाराजगी फैल गई। समाजसेवी डॉ. जैनेन्द्र जैन ने कहा कि दिगम्बरत्व जैन साधुओं की पहचान है। यह केवल वस्त्र त्याग नहीं, बल्कि समस्त परिग्रहों के त्याग और तपस्या का प्रतीक है। इसे रोकना भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की अवमानना है।</p>
<p><strong>आयोजकों और प्रशासन से सवाल</strong></p>
<p>जैन समाज के प्रतिनिधियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से सवाल उठाया कि जब कार्यक्रम जैन विरासत पर आधारित था और संत को आधिकारिक रूप से आमंत्रित किया गया था, तब उनके स्वरूप की जानकारी पहले से होने के बावजूद अंतिम समय में प्रवेश से क्यों रोका गया? राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ, विश्व जैन संगठन एवं अन्य जैन संस्थाओं ने विश्वविद्यालय के कुलपति से लिखित स्पष्टीकरण और सार्वजनिक माफी की मांग की है।</p>
<p><strong>संवैधानिक और कानूनी पक्ष</strong></p>
<p>जैन समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म के पालन और प्रचार की स्वतंत्रता प्राप्त है। उनका कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय भी पूर्व में दिगम्बर जैन साधुओं के सार्वजनिक विचरण को धार्मिक स्वतंत्रता के अंतर्गत मान्यता दे चुका है।</p>
<p><strong>देशव्यापी विरोध की तैयारी</strong></p>
<p>मयंक जैन ने बताया कि इस घटना के विरोध में देशभर में जैन समाज द्वारा मौन प्रदर्शन और ज्ञापन देने की तैयारी की जा रही है। अखिल भारतीय जैन महासंघ ने भी इसे शैक्षणिक संस्थान में धार्मिक असहिष्णुता का उदाहरण बताया है। इंदौर दिगम्बर जैन समाज सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद नवीन गोधा, महावीर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, हर्ष जैन, सुशील पांड्या, टीके वेद, हंसमुख गांधी, डीके जैन, डीएसपी मनोहर झांझरी, फेडरेशन की राष्ट्रीय शिरोमणि संरक्षिका पुष्पा कासलीवाल, महिला परिषद की संभागीय अध्यक्ष मुक्ता जैन, साधना दगड़े, रेखा जैन श्रीफल सहित अनेक समाजजनों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से जैन समाज एवं पूज्य संत से खेद प्रकट करते हुए सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की है।</p>
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		<title>भक्ति और ज्ञान का अनूठा संगम: डडूका में बच्चों ने मनाया भगवान शांतिनाथ का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर्व </title>
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		<pubDate>Sun, 17 May 2026 05:47:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अध्यात्म और संस्कारों की पावन भूमि बांसवाड़ा के डडूका क्षेत्र में जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर देव, देवाधिदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर्व अपूर्व श्रद्धा, उल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। बांसवाड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा (राजस्थान)। अध्यात्म और संस्कारों की पावन भूमि बांसवाड़ा के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अध्यात्म और संस्कारों की पावन भूमि बांसवाड़ा के डडूका क्षेत्र में जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर देव, देवाधिदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर्व अपूर्व श्रद्धा, उल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। <span style="color: #ff0000">बांसवाड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा (राजस्थान)।</strong> अध्यात्म और संस्कारों की पावन भूमि बांसवाड़ा के डडूका क्षेत्र में जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर देव, देवाधिदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर्व अपूर्व श्रद्धा, उल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। दिगंबर जैन पाठशाला डडूका के तत्वावधान में आयोजित इस पावन प्रसंग पर संपूर्ण वातावरण जिनेंद्र प्रभु की भक्ति के रंग में सराबोर नजर आया। उत्सव का शुभारंभ प्रातः काल की पावन बेला में हुआ। पाठशाला के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने परम विशुद्धि के साथ जिनालय (जैन मंदिर) में प्रवेश किया। बालकों ने पूरी विधि-विधान और पावन मंत्रोच्चार के बीच श्री जी (भगवान शांतिनाथ) का मंगल जलाभिषेक किया। छोटे-छोटे हाथों से भगवान का अभिषेक होते देख उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं का हृदय भी अहोभाव और भक्ति से भर उठा। बच्चों की इस क्रिया ने सभी को संस्कारों की महत्ता का अहसास कराया।</p>
<p><strong>सायं काल ज्ञानवर्धन और रोचक प्रश्नमंच</strong></p>
<p>दिनभर के भक्तिमय माहौल के बाद, शाम को पाठशाला परिसर में एक विशेष ज्ञानवर्धक सत्र का आयोजन किया गया। पाठशाला के प्रेरकों के मार्गदर्शन में भगवान शांतिनाथ के तीनों कल्याणकों (जन्म, तप और मोक्ष) पर आधारित एक अत्यंत रोचक प्रश्नमंच (क्विज) प्रतियोगिता हुई। इस प्रतियोगिता में बच्चों ने बड़े ही उत्साह के साथ भाग लिया और अपनी धार्मिक बुद्धिमत्ता का परिचय दिया।</p>
<p><strong>पांच कल्याणकों की मंगलमय देशना</strong></p>
<p>कार्यक्रम के दौरान पाठशाला प्रेरकों ने बच्चों को जैन दर्शन के अनुसार तीर्थंकर भगवंतों के जीवन से जुड़े सभी पांचों कल्याणकों गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष के बारे में विस्तार से मंगलमय जानकारियां साझा कीं। बच्चों को बताया गया कि किस तरह तीर्थंकर प्रभु का जीवन हमें त्याग, संयम और आत्म-कल्याण का मार्ग दिखाता है। इस पूरे आयोजन में 22 नौनिहालों ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लेकर धर्म लाभ लिया।</p>
<p><strong>वार्षिक परीक्षा की घोषणा</strong></p>
<p>कार्यक्रम के समापन पर बच्चों के ज्ञान के मूल्यांकन के लिए आगामी धार्मिक गतिविधियों की घोषणा भी की गई। प्रेरकों ने सभी विद्यार्थियों को सूचित किया कि पाठशाला की ग्रीष्मकालीन वार्षिक परीक्षाओं का आयोजन आगामी 1 से 5 जून के मध्य किया जाएगा। सभी बच्चों को इसके लिए अभी से लगन पूर्वक तैयारी करने की प्रेरणा दी गई।</p>
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		<title>108 किलो का निर्वाण लाडू चढ़ाकर किया भक्ति भाव प्रकट: शांतिनाथ भगवान का जन्म,तप एवं मोक्ष कल्याणक दिवस पर हुए अभिषेक और शांतिधारा के कार्यक्रम </title>
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		<pubDate>Sat, 16 May 2026 08:12:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर सेक्टर 7 आवास विकास कॉलोनी सिकंदरा में श्री शांतिनाथ भगवान के जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक पर अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। शांतिनाथ भगवान का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव मनाया गया। आगरा से पढ़िए, रोहित जैन की यह रिपोर्ट&#8230; आगरा। श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर सेक्टर 7 आवास [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर सेक्टर 7 आवास विकास कॉलोनी सिकंदरा में श्री शांतिनाथ भगवान के जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक पर अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। शांतिनाथ भगवान का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव मनाया गया। <span style="color: #ff0000">आगरा से पढ़िए, रोहित जैन की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>आगरा।</strong> श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर सेक्टर 7 आवास विकास कॉलोनी सिकंदरा में श्री शांतिनाथ भगवान के जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक पर अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। शांतिनाथ भगवान का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव मनाया गया। इसके बाद नित्य नियम पूजा एवं शांतिनाथ भगवान की पूजा की गई। बोली के माध्यम से मनोज जैन, अनमोल जैन, अमित जैन तहसील, सतेंद्रकुमार जैन, सतेंद्रकुमार जैन एसबीआई परिवार, विवेक जैन, माया जैन, शिखा जैन, प्रीति जैन, प्रेमलता जैन, अशोक जैन परिवार ने 21 किलो का लाडू चढ़ाया गया। मोक्ष कल्याणक महोत्सव के तहत भगवान शांतिनाथ को 108 किलो का निर्वाण लाडू भक्ति भाव से श्रद्धालुओं में चढ़ाया। श्री शांतिनाथ भगवान का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महामहोत्सव अत्यंत भक्तिपूर्ण, शांतिपूर्ण एवं हर्षाेल्लास के साथ श्रद्धा और भक्ति भावपूर्वक मनाया गया।</p>
<p><strong>महोत्सव में यह समाजजन मौजूद रहे </strong></p>
<p>इस मौके पर मंदिर कमेटी के अध्यक्ष अतुल जैन, मंत्री राकेश जैन टीचर, कोषाध्यक्ष मगन कुमार जैन, प्रवीण जैन, महेशचंद जैन, राजेश बैनाड़ा, विजय जैन निमोरब, अरुण जैन, सुशील जैन, संजीव जैन, हेमा जैन ,दिलीप जैन, अनिल जैन बुरे वाले, मनोज जैन, विपुल जैन, आलोक जैन, सिद्धार्थ जैन, मोहित जैन, अमित जैन तहसील, प्रशांत जैन, वैभव जैन, दीपक जैन, आदिश जैन, प्रशांत जैन, विकास जैन, गौरव जैन, आदर्श जैन, दिपेश जैन, संजय जैन, शुभम जैन, घनश्याम जैन, आशीष जैन, विशाल जैन, अभिषेक जैन मीडिया प्रभारी राहुल जैन सकल जैन समाज मौजूद थे।</p>
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		<title>शांतिनाथ भगवान के निर्वाण लाडू के साथ त्रय कल्याणक महोत्सव पूर्ण : शहर धार्मिक आभा से सराबोर रहा </title>
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		<pubDate>Sat, 16 May 2026 04:59:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बड़ा तख्ता टोंक में बुधवार से शुरू हुआ त्रय कल्याणक महोत्सव अब अपने धार्मिक शिखर की ओर अग्रसर है। 15 मई को मूलनायक श्री शांतिनाथ भगवान के जन्म, तप और मोक्ष इन तीनों कल्याणक के अवसर पर अनेक धार्मिक आयोजन किए गए। टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230; टोंक। श्री शांतिनाथ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बड़ा तख्ता टोंक में बुधवार से शुरू हुआ त्रय कल्याणक महोत्सव अब अपने धार्मिक शिखर की ओर अग्रसर है। 15 मई को मूलनायक श्री शांतिनाथ भगवान के जन्म, तप और मोक्ष इन तीनों कल्याणक के अवसर पर अनेक धार्मिक आयोजन किए गए। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>टोंक।</strong> श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बड़ा तख्ता टोंक में बुधवार से शुरू हुआ त्रय कल्याणक महोत्सव अब अपने धार्मिक शिखर की ओर अग्रसर है। 15 मई को मूलनायक श्री शांतिनाथ भगवान के जन्म, तप और मोक्ष इन तीनों कल्याणक के अवसर पर अनेक धार्मिक आयोजन किए गए। इस आयोजन ने पूरे शहर को धार्मिक आभा से सराबोर कर दिया। इस अवसर पर प्रातः काल में श्रीजी को पाण्डुक शिला पर विराजमान कर इंद्रो द्वारा कलशों से अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। इसके बाद शांतिनाथ विधान मंडल का आयोजन किया गया। जिसमे नगर के सभी मंदिरों के लोगों ने विधान में बढ़ चढ़कर भाग लिया एवं विधान मंडल की पूजन की।</p>
<p><strong>भगवान का पालना झुलाया</strong></p>
<p>शाम को आरती और शास्त्रसभा के बाद भगवान को पालना झुलाया गया। इस पावन अवसर पर महिला मंडल, बालिका मंडल, धर्मसागर पाठशाला और शांतिधारा परिवार के सदस्यों की सहभागिता उल्लेखनीय रही। कार्यक्रम की सफलता में समाज के हर वर्ग का योगदान रहा। समाज प्रवक्ता पवन कंटान एवं विकास जागीरदार ने जानकारी देते हुए बताया कि शुक्रवार को श्री शांतिनाथ विधान मंडल का आयोजन पंडित मनोज शास्त्री बागरोही के सानिध्य में भोपाल से पधारे केशव एंड पार्टी के मधुर वाणी से बड़ा तख्ता मंदिर में किया गया। इसमें बड़ी संख्या में समाज के लोगों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया एवं अत्यंत भक्ति भाव ओर श्रद्धा के साथ झूमते नाचते हुए भगवान की भक्ति की इसके पश्चात निर्वाण कांड बोलकर भगवान के सम्मुख 16 किलो का निर्वाण लाडू चढ़ाया गया । इस अवसर पर पारस सर्राफ, कमल आंडरा, एंजे दाखिया, कमल सर्राफ, अनिल सर्राफ, अम्मू छामुनिया, विनोद सर्राफ, प्रकाश सेठी, संजय संघी, कन्हैया लाल बरवास, धर्मचंद पतल दोना, ज्ञान संघी सहित समाज के अनेक लोग उपस्थित रहे।</p>
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		<title>पीठ जैन मंदिर में मना प्रभु शांतिनाथ का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक : भक्ति रस में डूबे रहे श्रद्धालु </title>
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		<pubDate>Fri, 15 May 2026 15:56:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[स्थानीय पीठ स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन जिनालय में मूलनायक भगवान शांतिनाथ का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव परम उल्लास और धूमधाम के साथ मनाया गया।पीठ से पढ़िए, यह खबर&#8230; पीठ। स्थानीय पीठ स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन जिनालय में मूलनायक भगवान शांतिनाथ का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव परम उल्लास और धूमधाम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>स्थानीय पीठ स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन जिनालय में मूलनायक भगवान शांतिनाथ का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव परम उल्लास और धूमधाम के साथ मनाया गया।<span style="color: #ff0000">पीठ से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>पीठ।</strong> स्थानीय पीठ स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन जिनालय में मूलनायक भगवान शांतिनाथ का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव परम उल्लास और धूमधाम के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर समूचा जैन समाज भक्ति के रंग में सराबोर नजर आया। धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत तड़के मंगलाचरण के साथ हुई, जिसके बाद मंदिर परिसर भगवान के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।</p>
<p><strong>पंचामृत अभिषेक और निर्वाण लाडू अर्पण</strong></p>
<p>प्रातः कालीन बेला में मूलनायक भगवान शांतिनाथ का मंत्रोचार के साथ भव्य पंचामृत अभिषेक एवं विशेष शांतिधारा की गई। इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने देव-शास्त्र-गुरु की विधि-विधान से संगीतमय पूजन-अर्चना की। भगवान के मोक्ष कल्याणक के प्रतीक स्वरूप वेदी पर भक्तिभाव से निर्वाण लाडू अर्पित किया गया। मांगलिक क्रियाओं के अंतर्गत भगवान के अभिषेक और मुख्य पूजन करने का परम सौभाग्य डेचिया महेंद्र कुमार एवं प्रसन्न डेचिया परिवार को प्राप्त हुआ। परिवार के सदस्यों ने शुद्ध वस्त्र धारण कर पूर्ण श्रद्धा के साथ सभी धार्मिक रीतियाँ संपन्न कीं।</p>
<p><strong>भव्य नगर भ्रमण और गरबा नृत्य</strong></p>
<p>साँय काल में मंदिर जी में विशेष आरती का आयोजन हुआ। इसके बाद श्री जी की पावन प्रतिमा को अत्यंत आकर्षक ढंग से सजी गंधकुटी में विराजमान किया गया। भगवान की इस भव्य पालकी यात्रा को गाजे-बाजे के साथ नगर भ्रमण पर निकाला गया। नगर भ्रमण के दौरान श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था। जगह-जगह प्रभु की अगवानी की गई और श्रद्धालुओं ने भक्ति गीतों पर जमकर गरबा नृत्य किया।</p>
<p><strong>रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम</strong></p>
<p>दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष राजकुमार डेचिया ने जानकारी दी कि इस पावन दिवस के उपलक्ष्य में रात्रि को मंदिर परिसर में विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों में समाज के बच्चों और महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस संपूर्ण महोत्सव के दौरान समाज के वरिष्ठ एवं प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे, जिनमें मुख्य रूप से अशोक भूता, गोवर्धन डेचिया, चंद्रकांत शाह, गजेंद्र कोठारी, हसमुख कोठारी तथा प्रवीण शाह सहित बड़ी संख्या में जैन धर्मावलंबी शामिल थे।</p>
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		<title>गिरनार पर्वत जैनों का था है और रहेगा : जैन धर्म की तपस्या, त्याग और मोक्ष साधना का जीवंत प्रतीक है गिरनारजी  </title>
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		<pubDate>Thu, 14 May 2026 13:58:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आस्था की उन शिलाओं पर आज भी नेमिनाथ प्रभु के चरणों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। धरती पर कुछ स्थान ऐसे होते हैं जिन्हें केवल भूगोल से नहीं समझा जा सकता। वे इतिहास की पुस्तकों से भी बड़े होते हैं, क्योंकि वहाँ मनुष्य की आस्था सदियों तक साँस लेती रहती है। आज पढ़िए, ’डॉ. जयेन्द्र [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आस्था की उन शिलाओं पर आज भी नेमिनाथ प्रभु के चरणों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। धरती पर कुछ स्थान ऐसे होते हैं जिन्हें केवल भूगोल से नहीं समझा जा सकता। वे इतिहास की पुस्तकों से भी बड़े होते हैं, क्योंकि वहाँ मनुष्य की आस्था सदियों तक साँस लेती रहती है। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, ’डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’ चंदेरी का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चंदेरी।</strong> आस्था की उन शिलाओं पर आज भी नेमिनाथ प्रभु के चरणों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। धरती पर कुछ स्थान ऐसे होते हैं जिन्हें केवल भूगोल से नहीं समझा जा सकता। वे इतिहास की पुस्तकों से भी बड़े होते हैं, क्योंकि वहाँ मनुष्य की आस्था सदियों तक साँस लेती रहती है। गिरनार पर्वत ऐसा ही एक पवित्र तीर्थ है। यह केवल पत्थरों का पहाड़ नहीं, बल्कि जैन धर्म की तपस्या, त्याग और मोक्ष साधना का जीवंत प्रतीक है।</p>
<p>जब प्रातःकाल की पहली किरण गिरनार की चोटियों को स्पर्श करती है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं इतिहास जाग उठता हो। हजारों सीढ़ियाँ चढ़ते हुए श्रद्धालुओं की थकी हुई साँसों में भी एक अद्भुत शांति दिखाई देती है। कोई वृद्ध अपने काँपते पैरों से ऊपर बढ़ रहा है, कोई माँ अपने बच्चों का हाथ थामे प्रभु के दर्शन की अभिलाषा लिए चल रही है, कोई साधु मौन तप में लीन है। इन सबके बीच गिरनार केवल पर्वत नहीं रह जाता, वह आस्था का धड़कता हुआ हृदय बन जाता है।</p>
<p>भगवान नेमिनाथ की निर्वाण भूमि होने के कारण गिरनार जैन समाज के लिए अनंत श्रद्धा का केंद्र है। कहते हैं कि जब नेमिनाथ प्रभु ने जीवों की करुण पुकार सुनी थी, तब राजवैभव का त्याग कर उन्होंने वैराग्य का मार्ग चुना। उसी त्याग की स्मृति आज भी गिरनार की हवाओं में जीवित है। वहाँ की हर शिला मानो संयम का संदेश देती है।</p>
<p>इतिहास बदलते रहे, राजसत्ताएँ आती-जाती रहीं, किन्तु तीर्थों का महत्व कभी समाप्त नहीं हुआ। जिस स्थान पर पीढ़ियों ने माथा टेका हो, जहाँ अनगिनत साधुओं ने तप किया हो, जहाँ समाज ने अपने आँसू, विश्वास और भक्ति अर्पित की हो कृ उस स्थान का संबंध केवल भूमि से नहीं, आत्मा से हो जाता है। इसलिए जब जैन समाज यह कहता है कि “गिरनार पर्वत जैनों का था, है और रहेगा”, तब यह केवल अधिकार की घोषणा नहीं होती, यह अपनी सांस्कृतिक स्मृति और आध्यात्मिक विरासत की रक्षा का भाव होता है।</p>
<p>आज का समय दुर्भाग्य से ऐसा हो चला है, जहाँ धर्म और आस्था को भी विवादों के तराजू में तौला जाने लगा है। किन्तु समाज को यह समझना होगा कि तीर्थ केवल ईंट और पत्थर नहीं होते। वे मनुष्य की नैतिक चेतना के केंद्र होते हैं। गिरनार की यात्रा मनुष्य को विनम्र बनाती है। हजारों सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद जब कोई श्रद्धालु मंदिर के सामने पहुँचता है, तब उसका अहंकार स्वतः ही झुक जाता है। यही तीर्थ की शक्ति है।</p>
<p>मुंशी प्रेमचंद यदि आज होते, तो शायद वे गिरनार को किसी धार्मिक विवाद के रूप में नहीं देखते। वे उस गरीब यात्री की आँखों में झाँकते, जिसने जीवनभर की कमाई से एक बार इस तीर्थ की यात्रा की। वे उस वृद्ध माँ की थकान को महसूस करते, जिसने अपने पुत्र का हाथ पकड़कर प्रभु के दर्शन किए। वे उस साधारण मनुष्य की श्रद्धा को समझते, जिसके लिए गिरनार मोक्ष का मार्ग है।</p>
<p>समाज की सभ्यता केवल ऊँची इमारतों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपनी विरासत और भावनाओं का कितना सम्मान करता है। गिरनार जैन संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। उसकी रक्षा केवल जैन समाज का नहीं, बल्कि पूरे भारतीय सांस्कृतिक चेतना का दायित्व है।</p>
<p>आज भी गिरनार की वादियों में एक मौन संदेश गूँजता है-</p>
<p>“राज्य बदल सकते हैं, समय बदल सकता है,</p>
<p>किन्तु तप, त्याग और श्रद्धा की ज्योति कभी नहीं बुझती।</p>
<p>गिरनार उसी अमर ज्योति का नाम है।</p>
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		<title>शांतिनाथ भगवान के त्रय कल्याणक महोत्सव में श्रद्धा का सैलाब : पंचामृत अभिषेक और भजन संध्या में भावविभोर हुआ टोंक </title>
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		<pubDate>Thu, 14 May 2026 13:56:22 +0000</pubDate>
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<p><strong>श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बड़ा तख्ता टोंक में बुधवार से शुरू हुआ त्रय कल्याणक महोत्सव अब अपने धार्मिक शिखर की ओर अग्रसर है। गुरुवार को हुए पंचामृत अभिषेक और भव्य भजन संध्या में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बड़ा तख्ता टोंक में बुधवार से शुरू हुआ त्रय कल्याणक महोत्सव अब अपने धार्मिक शिखर की ओर अग्रसर है। गुरुवार को हुए पंचामृत अभिषेक और भव्य भजन संध्या में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। मूलनायक श्री शांतिनाथ भगवान के जन्म, तप और मोक्ष इन तीनों कल्याणकों की स्मृति में आयोजित इस आयोजन ने पूरे शहर को धार्मिक आभा से सराबोर कर दिया।</p>
<p><strong>पंचामृत से हुआ विशेष अभिषेक</strong></p>
<p>14 मई को सुबह भगवान शांतिनाथ का विशेष पंचामृत अभिषेक हुआ, जिसमें 25 प्रकार के पवित्र रसों से अभिषेक कर पूजा अर्चना की गई। यह दृश्य अत्यंत दिव्य और अलौकिक रहा, जब भक्ति रस में भीगे श्रद्धालु शांतिनाथ भगवान की आराधना में लीन दिखे। अभिषेक के दौरान जयकारों से मंदिर परिसर गूँज उठा।</p>
<p><strong>संध्या बनी संगीतमय</strong></p>
<p>शाम को आरती और शास्त्रसभा के बाद हुई भजन संध्या में भोपाल से पधारे केशव एंड पार्टी के कलाकारों ने अपनी सुमधुर प्रस्तुतियों से श्रद्धालुओं को भक्ति भाव में डुबो दिया। भजन संध्या के दौरान वातावरण पूर्णतः आध्यात्मिक हो गया और श्रद्धालु देर रात तक भावविभोर होकर झूमते रहे।</p>
<p><strong>समाजजनों की सराहनीय भागीदारी</strong></p>
<p>इस पावन अवसर पर महिला मंडल, बालिका मंडल, धर्मसागर पाठशाला और शांतिधारा परिवार के सदस्यों की सहभागिता उल्लेखनीय रही। कार्यक्रम की सफलता में समाज के हर वर्ग का योगदान रहा। समाज प्रवक्ता पवन कंटान एवं विकास जागीरदार ने बताया कि 15 मई को श्री शांतिनाथ विधान मंडल का आयोजन बड़े मंदिर में किया जाएगा। इसमें बड़ी संख्या में समाजजनों के आने की उम्मीद है।</p>
<p><strong>प्रमुख समाजसेवियों की उपस्थिति</strong></p>
<p>महोत्सव में भागचंद फुलेता, धर्मचंद दाखिया, कमल सर्राफ, विकास अत्तार, सुनील सर्राफ, कमल आंडरा, सुरेश मलारना, पुनीत जागीरदार, सोनू पासरोटिया, जिवेंद्र आंडरा, प्रदीप आंडरा, अंकित आंडरा, मनीष अत्तार, आकाश बोरदा और नरेंद्र अत्तार सहित समाज के अनेक लोग उपस्थित रहे।</p>
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		<title>भगवान शांतिनाथ के तीन कल्याणक का महासंगम : इंदौर सहित देशभर के जिनालयों में 15 मई मनेगा भगवान का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक महोत्सव </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_grand_confluence_of_the_three_kalyanaks_of_lord_shantinath/</link>
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		<pubDate>Thu, 14 May 2026 12:55:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर, पंचम चक्रवर्ती और द्वादश कामदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का त्रिविध कल्याणक (जन्म, तप और मोक्ष) महोत्सव शुक्रवार, 15 मई को देश भर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित रिपोर्ट&#8230; इंदौर। जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर, पंचम चक्रवर्ती और द्वादश कामदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का त्रिविध कल्याणक (जन्म, तप और मोक्ष) महोत्सव शुक्रवार, 15 मई को देश भर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर, पंचम चक्रवर्ती और द्वादश कामदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का त्रिविध कल्याणक (जन्म, तप और मोक्ष) महोत्सव शुक्रवार, 15 मई को देश भर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। मालवा की पावन धरा इंदौर सहित देशभर के समस्त दिगंबर जैन मंदिरों, जिनालयों और चैत्यालयों में इस पावन अवसर पर विशेष अनुष्ठान, महामस्तकाभिषेक, शांतिधारा और विश्वशांति महायज्ञ विधान आयोजित किए जाएंगे। सकल जैन समाज ने इस त्रिकल्याणक महोत्सव की सभी तैयारियां पूर्ण कर ली हैं।</p>
<p><strong>एक ही पावन तिथि पर तीन कल्याणक का संयोग</strong></p>
<p>जैन पुराणों के अनुसार जेठ कृष्ण चतुर्दशी की पावन तिथि भगवान शांतिनाथ के जीवन में अद्भुत महत्व रखती है। इसी तिथि को उनका दीक्षा (तप) कल्याणक और मोक्ष कल्याणक हुआ था। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस वर्ष उनका जन्म कल्याणक पर्व भी इसी समय के साथ जुड़कर त्रिकल्याणक महामहोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है।</p>
<p><strong>भगवान शांतिनाथ का जीवन वृत्त और तीनों कल्याणक </strong></p>
<p>गर्भ एवं जन्म कल्याणक- हस्तिनापुर के इक्ष्वाकु वंशीय राजा विश्वसेन और माता ऐरादेवी (अचिरा) के आंगन में प्रभु का जन्म हुआ था। उनके गर्भ में आते ही पूरे राज्य में शांति की लहर दौड़ गई थी, इसलिए उनका नाम ‘शांतिनाथ’ रखा गया। वे 16वें तीर्थंकर होने के साथ-साथ तीन खंड के अधिपति पंचम चक्रवर्ती और कामदेव भी थे।</p>
<p>दीक्षा (तप) कल्याणक- राजसी वैभव, अटूट संपदा और चक्रवर्ती के सुखों का भोग करने के बाद एक दिन दर्पण में अपना रूप देखते समय भगवान को वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने संसार की असारता को समझा और जेठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन हस्तिनापुर के सहस्राम्र वन में दीक्षा धारण कर ली। वे आत्म-साधना और कठिन तपस्या में लीन हो गए।</p>
<p>मोक्ष कल्याणक- कठिन तप और ध्यान के बल पर प्रभु ने केवलज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ हिल) की पावन टोंक से जेठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन ही भगवान शांतिनाथ ने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष (निर्वाण) पद प्राप्त किया।</p>
<p><strong>इंदौर सहित देश भर में धार्मिक अनुष्ठानों की धूम</strong></p>
<p>इस महापर्व के अवसर पर इंदौर के कांच मंदिर, गोमटगिरी, दिगंबर जैन उदासीन आश्रम सहित सभी उपनगरीय जिनालयों में सुबह की वेला में देव-शास्त्र-गुरु पूजन होगा।</p>
<p>महामस्तकाभिषेक व शांतिधारा- स्वर्ण और रजत कलशों से भगवान का अभिषेक किया जाएगा। विश्वशांति महायज्ञ-विश्व में सुख, समृद्धि और शांति की कामना के लिए विशेष आहुतियां दी जाएंगी। लाडू समर्पणरू निर्वाण लाडू चढ़ाकर भक्त प्रभु के मोक्ष कल्याणक की खुशियां मनाएंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रमरू संध्याकाल में महाआरती, भक्तांबर पाठ और जिनेंद्र भक्ति के सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। संत समाज और विद्वानों के अनुसार भगवान शांतिनाथ की आराधना करने से जीवन के सभी कष्ट, रोग, शोक और मानसिक अशांति दूर होती है। समस्त जैन समाज इस पावन दिवस पर उपवास, एकासन और सामायिक कर आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा।</p>
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		<title>सिहोनिया में 15 मई को महामस्तकाभिषेक होगा: संगीतमय श्री 1008 शांतिनाथ विधान का पुण्य लाभ लेने की अपील  </title>
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		<pubDate>Tue, 12 May 2026 03:33:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चंबल संभाग के सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ सिहोनियाजी में तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव विभिन्न धार्मिक सामाजिक कार्यक्रमों के साथ 15 मई को मनाया जाएगा। मुरैना/सिहोनिया से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना/सिहोनिया। चंबल संभाग के सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ सिहोनियाजी में तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चंबल संभाग के सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ सिहोनियाजी में तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव विभिन्न धार्मिक सामाजिक कार्यक्रमों के साथ 15 मई को मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">मुरैना/सिहोनिया से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना/सिहोनिया।</strong> चंबल संभाग के सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ सिहोनियाजी में तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव विभिन्न धार्मिक सामाजिक कार्यक्रमों के साथ 15 मई को मनाया जाएगा। श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र कमेटी सिहोनियाजी ने बताया कि जैन समाज के उपासना स्थल अतिशय क्षेत्र सिहोनिया में विराजमान मूलनायक भगवान शांतिनाथ स्वामी के जन्म, तप एवं मोक्ष कल्याणक के पावन अवसर पर जेठ बदी चौदस शुक्रवार 15 मई को प्रातः 7 बजे से मूलनायक भगवान शांतिनाथ स्वामी के सामूहिक अभिषेक, शांतिधारा, नित्यमह पूजन एवं प्रातः 8 बजे से संगीतमय श्री 1008 शांतिनाथ विधान का आयोजन एवं प्रातः 10 बजे से निर्वाण कांड का वाचन करते हुए सामूहिक रूप से निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा। भगवान शांतिनाथ स्वामी का महामस्तकाभिषेक होगा। इस पावन अवसर पर आसपास के सभी नगरों से सैकड़ों की संख्या में साधर्मी बंधु सिहोनियाजी पहुंचकर तीर्थंकरों की आराधना, उपासना, पूजन, भक्ति करते हुए पुण्यर्जन करेंगे।</p>
<p><strong>अम्बाह एवं मुरैना से निःशुल्क बसों की व्यवस्था </strong></p>
<p>आयोजन समिति द्वारा साधर्मी बंधुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए सिहोनिया पहुंचने के लिए अम्बाह एवं मुरैना से निःशुल्क बसों की व्यवस्था की गई है। कार्यक्रम में सम्मिलित होने वाले सभी समाजजनों के लिए आवास, स्वल्पाहार, भोजनादि की सभी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी कमेटी ने सभी साधर्मी बंधुओं से शुक्रवार 15 मई को अधिकाधिक संख्या में सिहोनियाजी पहुंचने की अपील की है। जिला मुख्यालय मुरैना से लगभग 33 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी में भूगर्भ से प्राप्त 11 वीं शताब्दी की खड्गासन भगवान शांतिनाथजी (16 फीट) की पाषाण की प्रतिमा मूलनायक के रूप में स्थापित हैं। उसके आजू बाजू में भगवान अरहनाथजी (10 फीट), भगवान कुंथुनाथजी (10 फीट) की पत्थर से तराशी गई मूर्तियाँ स्थापित हैं। वर्तमान में भी गाँव में खुदाई के दौरान जैन तीर्थंकरों की ऐसी मूर्तियाँ मिलती रहती हैं। क्षेत्र पर एक संग्रहालय है, जिसमें प्राप्त सभी मूर्तियों को सहेजकर रखा गया है।</p>
<p><strong> जैन साधु संतों के निरंतर आगमन </strong></p>
<p>जैन तीर्थ एवं उपासना स्थल पर यू तो वर्षभर विभिन्न धार्मिक आयोजन होते रहते हैं एवं प्रतिदिन दूरदराज से साधर्मी बंधुओं का आवागमन होता रहता है। जैन साधु संतों के निरंतर आगमन से क्षेत्र की महत्ता को बल मिलता रहता है। अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी में प्रति वर्ष क्वार वदी दोज को वार्षिक मेले का आयोजन होता है और जेठ बदी चौदस को भगवान शांतिनाथ जी का निर्वाण महोत्सव मनाया जाता है।</p>
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		<title>तप और सरल चर्या से संयम सीखा गए आचार्य श्री अजित सागर जी : एक मई को समाधि दिवस पर पुण्य स्मरण का पावन अवसर </title>
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		<pubDate>Thu, 30 Apr 2026 08:34:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ जैन धर्म में समाज को त्याग, सादा जीवन, सहृदयता के साथ धर्म पालन की शिक्षा देने वाले साधु वंदनीय हैं। आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज के जीवन वृत्त से संस्कारों की अकूत संपदा के दर्शन होते हैं, जो सहजता, सरलता और धैर्य की शिक्षा देते हैं। ऐसे ही महामुनिराज आचार्य श्री अजित सागर जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> जैन धर्म में समाज को त्याग, सादा जीवन, सहृदयता के साथ धर्म पालन की शिक्षा देने वाले साधु वंदनीय हैं। आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज के जीवन वृत्त से संस्कारों की अकूत संपदा के दर्शन होते हैं, जो सहजता, सरलता और धैर्य की शिक्षा देते हैं। <span style="color: #ff0000">ऐसे ही महामुनिराज आचार्य श्री अजित सागर जी के एक मई को समाधि दिवस पर यह विशेष आलेख श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए&#8230;संकलन उप संपादक प्रीतम लखवाल का। </span></strong></p>
<hr />
<p>आचार्य श्री 108 अजित सागर जी महाराज जैन धर्म के उन महान संतों में से हैं, जिन्होंने अपनी तपस्या और सरल चर्या से समाज को नई राह दिखाई। उनके समाधि दिवस पर हम उनके जीवन दर्शन और संयम के मार्ग का स्मरण करते हैं। आचार्य श्री अजित सागर जी का जन्म 1926 में मप्र के आष्टा नगर के समीप भौरा ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम जवरचंद्र और माता का नाम रूपाबाई था। बचपन से ही धार्मिक संस्कारों में पले-बढ़े आचार्य श्री ने 1961 में राजस्थान के सीकर में आचार्य श्री108 शिवसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण की।</p>
<p><strong>आचार्य पद और योगदान</strong></p>
<p>वे त्याग और वैराग्य की प्रतिमूर्ति थे। उन्हें 1987 में उदयपुर में चतुर्विध संघ द्वारा &#8216;आचार्य पद&#8217; से विभूषित किया गया। उनके मार्गदर्शन में अनेकों शिष्यों ने संयम का मार्ग अपनाया। उन्होंने जैन दर्शन के प्रचार-प्रसार और मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए सतत कार्य किया, जिससे समाज में आध्यात्मिक जागृति आई।</p>
<p><strong>समाधि और सल्लेखना की साधना</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों को बहुत ही गरिमामय और तपस्वी रूप में व्यतीत किया। उन्होंने 1990 में राजस्थान के सबला ग्राम (डूंगरपुर) में उत्तम सल्लेखना धारण की और शांत भाव से अपनी नश्वर देह का त्याग किया। उनकी समाधि को आज भी एक महान आध्यात्मिक उपलब्धि के रूप में याद किया जाता है, जो यह सिखाती है कि मृत्यु को भी उत्सव कैसे बनाया जा सकता है।</p>
<p><strong>शिक्षाएं और आदर्श</strong></p>
<p>आचार्य श्री का जीवन &#8220;ज्ञान, ध्यान और तप&#8221; का त्रिवेणी संगम था। वे कहते थे कि सच्चा शिष्य वही है जो गुरु की आज्ञा का पालन करे और परिग्रह से मुक्त होकर आत्म-कल्याण के मार्ग पर चले। उनके समाधि दिवस पर विशेष अनुष्ठान और पूजन का आयोजन किया जाता है, जिसमें श्रद्धालु उन्हें अपनी भावांजलि अर्पित करते हैं। उनका जीवन हमें संयम, क्षमा और परोपकार की राह पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा। आचार्य श्री 108 अजितसागर जी महाराज का जीवन साहित्य सृजन और भव्य धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से धर्म की प्रभावना में समर्पित रहा। उनके द्वारा रचित ग्रंथ और संपन्न कराए गए अनुष्ठान जैन दर्शन की गहराई को दर्शाते हैं।</p>
<p><strong>प्रमुख ग्रंथ एवं साहित्य सृजन</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने अपनी लेखनी के माध्यम से दर्शन और अध्यात्म को जन-जन तक पहुँचाया।</p>
<p>भीतर कहीं: यह उनकी एक महत्वपूर्ण कृति है, जो इनसाइक्लोपीडिया ऑफ जैनिज्म के अनुसार भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुई है।</p>
<p>विद्यावाणी और वीरदेशना: इनके माध्यम से उन्होंने भगवान महावीर के सिद्धांतों और अपने गुरुओं की शिक्षाओं को संकलित किया।</p>
<p>मानस मोती (भाग 1-2): यह कृति साधकों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का कार्य करती है।</p>
<p>अन्य रचनाएँ: उन्होंने &#8216;साधनापक्ष का पाक्षेय&#8217;, &#8216;अहिंसासूत्र&#8217;, &#8216;महाश्रमण&#8217;, और &#8216;विद्याशांति&#8217; जैसी अनेक कृतियों की रचना की, जो दिगंबर जैन आगम के सार को सरल भाषा में प्रस्तुत करती हैं।</p>
<p><strong>विशेष अनुष्ठान एवं धर्म प्रभावना</strong></p>
<p>आचार्य श्री के सानिध्य में जैन धर्म की प्रभावना हेतु कई ऐतिहासिक अनुष्ठान संपन्न हुए, जिन्होंने समाज में नई चेतना जाग्रत की:</p>
<p>पंचकल्याणक प्रतिष्ठा: उनके मार्गदर्शन में 12 से अधिक पंचकल्याणक और गज रथ महोत्सव संपन्न हुए, जो तीर्थंकरों के जीवन की घटनाओं को जीवंत करते हैं</p>
<p>विधान आयोजन: समाज में शांति और भक्ति के संचार के लिए उन्होंने 6 नगरों में कल्पद्रुम मंडल विधान, 7 सिद्धचक्र विधान और नंदीश्वर विधान जैसे अनुष्ठान कराए।</p>
<p>जीर्णोद्धार और शिक्षा: उन्होंने लगभग 25 नगरों के मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और 30-35 नगरों में जैन पाठशालाओं का संचालन शुरू कराया ताकि आने वाली पीढ़ी संस्कारों से जुड़ सके।</p>
<p>वेदी प्रतिष्ठा: उन्होंने 26 नगरों में वेदी प्रतिष्ठाएँ संपन्न कराकर जिनेंद्र देव की आराधना हेतु पवित्र स्थानों का सृजन किया।</p>
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