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	<title>Panch Kalyanak Pratishtha &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Panch Kalyanak Pratishtha &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>कैलाश पर्वत से मोक्ष पधारे आदिनाथ भगवान : गजरथ परिकमा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, लगे जयकारे </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 Mar 2026 09:47:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सतोदय तीर्थ सेरोन पंच कल्याणक प्रतिष्ठा एवं विश्व शांति महायज्ञ सोमवार को मुनि श्री सुधासागर महाराज के ससंध सानिध्य में पूर्ण हुआ। ललितपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; ललितपुर। सतोदय तीर्थ सेरोन पंच कल्याणक प्रतिष्ठा एवं विश्व शांति महायज्ञ सोमवार को मुनि श्री सुधासागर महाराज के ससंध सानिध्य में पूर्ण हुआ। जिसमें भगवान आदिनाथ को कैलाश [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सतोदय तीर्थ सेरोन पंच कल्याणक प्रतिष्ठा एवं विश्व शांति महायज्ञ सोमवार को मुनि श्री सुधासागर महाराज के ससंध सानिध्य में पूर्ण हुआ। <span style="color: #ff0000">ललितपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर</strong>। सतोदय तीर्थ सेरोन पंच कल्याणक प्रतिष्ठा एवं विश्व शांति महायज्ञ सोमवार को मुनि श्री सुधासागर महाराज के ससंध सानिध्य में पूर्ण हुआ। जिसमें भगवान आदिनाथ को कैलाश पर्वत से मोक्ष गमन का दृश्य हजारों लोगों ने अयोध्यापुरी में देखा और गजरथ में विराजित श्रीजी के साथ श्रद्धालुजन भक्ति पूर्वक सम्मलित हुए। प्रातःकाल श्री जी का अभिषेक शांतिधारा के बाद नित्यगह पूजन हुई। वेदी पर ही कैलाश पर्वत की सुन्दर रचना की गई। जिस पर्वत पर आदिनाथ जी ने बैठ कर ध्यानरूढ़ होकर सिद्धत्व प्राप्त किया। मुनि श्री सुधासागरजी महाराज ने उपस्थित जन समुदाय को ध्यान साधना कराई और क्षणभर में ही भगवान आदिनाथ को मोक्ष की प्राप्ति हो गई। इस दृश्य को देखने अपार जनसमूह आतुर था।</p>
<p><strong>अग्निकुमार इन्द्रों ने हवन किया</strong></p>
<p>इस मौके पर मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि पुण्य के अभाव में कोई काम नहीं आता। जिनके आगे पीछे इन्द्र थे। जन्म पर रत्नवृष्टि हुई। सारा वैभव था, जब पुण्य में हीनता आई वैराग्य हुआ और कैलाश पर्वत से मोक्ष गए और कपूर की भांति शरीर विलीन हो गया। प्रतिष्ठाचार्य बालब्रहमचारी प्रदीप भैया ने भगवान आदिनाथ के मोक्ष के पश्चात कैलाश पर्वत पर अग्निकुमार इन्द्रों ने हवन किया। इसके उपरान्त विश्व शांति महायज्ञ में इन्द्र इन्द्राणियों ने पूर्ण आहुति दी।</p>
<p><strong>हमें परमात्मा बनने का मार्ग दिखाया</strong></p>
<p>इस मौके पर मुनि श्री सुधासागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि पंच कल्याणक महोत्सव में पाषाण से परमात्मा बनाने की प्रक्रिया होती है। तीर्थंकर आदिनाथ ने कर्मों को नाश कर मोक्ष पद को प्राप्त किया और हमें परमात्मा बनने का मार्ग दिखाया। पंचकल्याण को अपने आचरण में लाने में ही कल्याण है। जिस तरह नशा करने से अघाते नहीं है, पाप करने से तृप्ति नहीं होती उसी तरह धर्म जितना करोगे बढ़ेगा।</p>
<p><strong>प्रभु जी की प्रतिमाएं आकर्षण का केन्द्र रहीं</strong></p>
<p>मध्यान्ह में गजरथ परिकमा का शुभारम्भ अयोध्यापुरी से हुई। जिसमें आगे बज पताका लिए हुए दिव्यघोष अनुशासित ढंग से चल रहे थे। रजत रथ एवं गजरथों में सवार प्रभु जी की प्रतिमाएं आकर्षण का केन्द्र रहीं। जिसमें प्रतिष्ठा महोत्सव के प्रमुख पात्र श्री जी को लिए थे। भव्य शोभायात्रा में स्याद्वाद वर्धमान सेवा संघ, आदिनाथ सेवा संघ के स्वयं सेवक प्रदर्शन कर रहे थे। गजरथ के आगे मुनि सुधासागर महाराज, मुनि श्री निरापद सागर महाराज, क्षुल्लक गम्भीर सागर एवं एलक जी महाराज और उनके पीछे-पीछे ब्रहमचारी ब्रहमचारिणी बहन मंगल भजन कर रही थी।</p>
<p><strong>शोभायात्रा में यह रहे शामिल</strong></p>
<p>शोभायात्रा में इंद्र इन्द्राणि भक्ति करते हुए अनुशासित ढंग से चल रहे थे। प्रतिष्ठा महोत्सव के प्रमुख पात्र महाराजा नाभिराय मरूदेवी मालती महेन्द्र सर्राफ, सौधर्म इन्द्र अनुपमा सतीश जैन बजाज, कुबेर सीमा सिंघई मनोज जैन, महायज्ञनायक सुमन विमल जैन, ममता अमित जैन वल्ली डोंगरा भरत चकवर्ती, विजय जैन लागौन वाहुवलि, नीतेश जैन विलौआ जखौरा राजा सोम, देवेन्द्र कुमार मंजू जैन राजा श्रयांस, पवन जैन बाबा मार्बल ईशान इन्द्र, समता जैन आनंद जैन साइकिल सनत इन्द्र, बाहमेन्द्र रूबी संजय मोदी, विधि यज्ञनायक राजू जैन मढावरा, महामण्डलेश्वर राजीव जैन पीहर साड़ी रथों में विराजित रहे।</p>
<p><strong>इन्होंने अभिषेक में लिया भाग</strong></p>
<p>परिकमा के बाद श्री जी को स्वयंसेवको के दिव्यघोषों के साथ प्रतिष्ठा मंच पर विराजित किया। जहां श्री जी का अभिषेक मुनिश्री सुधासागर महाराज के सानिध्य में हुआ। जिसमें उन्होने सभी को आर्शीवाद प्रदान किया। इस मौके पर प्रमुख रूप से नगरपालिका अध्यक्ष सोनाली जैन अभिलाषा, श्रेष्ठी शीलचंद अनौरा, अखिलेश गदयाना, अनिल जैन अंचल, महेन्द्र महरैया, संजय रसिया, प्रफुल्ल जैन, सत्येन्द्र गदयाना, सनत जैन खजुरिया धन्यकुमार जैन एड, अरविन्द जैन आप्टीशियन आदि प्रमुख रूप से मौजूद रहे।</p>
<p><strong>इन्होंने किया संयोजन</strong></p>
<p>गजरथ महोत्सव की व्यवस्थाओं को आचार्य विद्यासागर व्यायामशाला, वीर सेवा संघ, जैन मिलन मुख्य शाखा के अतिरिक्त जैन पंचायत अध्यक्ष डॉ. अक्षय, महामंत्री आकाश जैन, सतोदय तीर्थ अध्यक्ष सतीश जैन बजाज, महामंत्री सिंघई मनोज जैन बबीना, विजय जैन लागौन, मीडिया प्रभारी अक्षय अलया,अजय जैन जखौरा, आनंद जैन साइकिल, संजय रसिया, नीतेश विलौआ, अमितेश जैन, अभय जैन ग्राफिक्स, अनंत सराफ, श्रयांस जैन गदयाना, राजेन्द्र जैन मिठ्या, पं जयकुमार जैन, अभय जैन, प्रदीपजैन बरौदा, अवध किशोर जैन, प्रदीप जैन बरोदा, सौरम जैन पीलू, संयोजित कर रहे थे।</p>
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		<title>मुनिश्री सुधासागर महाराज ससंघ की जैन समाज करेगा अगुवाई : राजघाट में मुनि संघ का होगा 24 फरवरी को होगा प्रवेश  </title>
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		<pubDate>Mon, 23 Feb 2026 15:02:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि सुधासागरजी महाराज ससंघ की ललितपुर जिले के राजघाट में अगुवाई होगी। जिसकी तैयारियों में जैन समाज की स्वयंसेवी संस्थाए जुटी हुई हैं। मुनिसंघ के सानिध्य में ग्राम लागौन में विमानोत्सव का आयोजन है। ललितपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; ललितपुर। मुनि सुधासागरजी महाराज ससंघ की ललितपुर जिले के राजघाट में अगुवाई होगी। जिसकी तैयारियों में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि सुधासागरजी महाराज ससंघ की ललितपुर जिले के राजघाट में अगुवाई होगी। जिसकी तैयारियों में जैन समाज की स्वयंसेवी संस्थाए जुटी हुई हैं। मुनिसंघ के सानिध्य में ग्राम लागौन में विमानोत्सव का आयोजन है। <span style="color: #ff0000">ललितपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर।</strong> मुनि सुधासागरजी महाराज ससंघ की ललितपुर जिले के राजघाट में अगुवाई होगी। जिसकी तैयारियों में जैन समाज की स्वयंसेवी संस्थाए जुटी हुई हैं। मुनिसंघ के सानिध्य में ग्राम लागौन में विमानोत्सव का आयोजन है। जैन पंचायत अध्यक्ष डॉ. अक्षय टडैया महामंत्री डॉ. आकाश जैन ने बताया कि मुनिश्री सुधासागर महाराज का उप्र की सीमा राजघाट पर 24 फरवरी को प्रातः 7 बजे पदविहार करते हुए प्रवेश होगा। जिनकी अगुवाई ललितपुर जैन समाज के श्रेष्ठीजन करेंगे। मुनिसंघ पदविहार करते हुए ग्राम लागौन पहुंचेंगे। जहां निकटवर्ती जैन समाज द्वारा अगुवाई एवं मुनि संघ की आहारचर्या होगी। मुनिसंघ की सामायिक के उपरांत विमानोत्सव की शोभायात्रा नगर में प्रभावना पूर्वक निकाली जाएगी। जिसकी तैयारियों को लेकर स्वयंसेवी संस्थाए जुटी हुई हैं।</p>
<p><strong>आगामी 4 मार्च से सतोदय तीर्थ पर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा</strong></p>
<p>मीडिया प्रभारी अक्षय अलया ने बताया कि तीर्थचक्रवर्ती मुनि सुंधासागर महाराज को प्रदेश के मुख्यमंत्री योगीआदित्यनाथ द्वारा उत्तरप्रदेश में राजकीय अतिथि के रूप में सम्मान दिया है। यह पहला अवसर है जब ललितपुर में जैन संत को प्रदेश सरकार द्वारा राजकीय अतिथि का दर्जा दिया है। तीर्थचकवर्ती मुनि श्री ससंघ 25 फरवरी को पदविहार करते हुए सतोदय तीर्थ सेरोन के लिए विहार करेंगे। सतोदय तीर्थ के अध्यक्ष सतीश जैन बजाज एवं महामंत्री सिंघई मनोज जैन के अनुसार मुनि संघ के सानिध्य में आगामी 4 मार्च से सतोदय तीर्थ पर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महामहोत्सव का आयोजन है।</p>
<p><strong>यह समाजजन जुटे हैं तैयारियों में</strong></p>
<p>मुनि संघ के पदविहार को लेकर ललितुपर जैन समाज के श्रेष्ठी जन सिंघई शीलचंद अनौरा, अनिल जैन अंचल, राजेन्द्र जैन थनवारा, अखिलेश गदयाना, सनत खजुरिया, सीए सौरभ जैन, आनन्द जैन बबीना, विजय जैन लागौन, संजीव जैन सीए जितेन्द्र जैन, जयंत जैन, अजय जैन जखौरा, मुकेश जैन, संजीव जैन ममता स्पोर्ट, जिनेन्द्र जैन डिस्को, ब्रजकिशोर जैन एडवोकेट आनंद जैन साइकिल, मनोज जैन रंगमहल, संजय जैन रसिया, रवि जैन चुनगी, अमित जैन सरार्फ, वीणा जैन, अनीता मोदी, सिलोचना जैन समेत अनेक प्रमुखजन सक्रिय है और व्यवस्थाओं में जुटे हुए हैं।</p>
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		<title>जिस मंदिर क्षेत्र में चमत्कार होता है वह मंदिर अतिशय क्षेत्र होता है : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्राचीन मंदिर के रहस्यों से पर्दा उठाया  </title>
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		<pubDate>Tue, 02 Dec 2025 13:55:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री शांति सागर जी सहित पूर्वाचार्यों के आशीर्वाद से हमने पहली बार किसी मंदिर का जीणोद्धार कर नूतन जिनालय बनाने की प्रेरणा दी। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के मोक्ष कल्याणक अवसर पर धर्मसभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि अब पीपल्दा गांव नगर हो गया। पीपल्दा से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री शांति सागर जी सहित पूर्वाचार्यों के आशीर्वाद से हमने पहली बार किसी मंदिर का जीणोद्धार कर नूतन जिनालय बनाने की प्रेरणा दी। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के मोक्ष कल्याणक अवसर पर धर्मसभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि अब पीपल्दा गांव नगर हो गया। <span style="color: #ff0000">पीपल्दा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पीपल्दा।</strong> पीपल्दा ग्राम अब श्री चंद्र प्रभु अतिशय मंदिर के नाम से भारत में विख्यात होगा। 972 वर्ष प्राचीन जिनालय में विगत 3 वर्षों पूर्व आए थे तब से अभी तक हमने भी अनेक अतिशय देखे और प्रभु की सकारात्मक उर्जा महसूस की। आचार्य श्री शांति सागर जी सहित पूर्वाचार्यों के आशीर्वाद से हमने पहली बार किसी मंदिर का जीणोद्धार कर नूतन जिनालय बनाने की प्रेरणा दी। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के मोक्ष कल्याणक अवसर पर धर्मसभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि अब पीपल्दा गांव नगर हो गया। प्राचीन जिनालय पहले रोड से 4 फीट नीचे था। वर्षा का पानी मंदिर में आता था। प्रभु के चमत्कार से बिना निकासी के जल निकल जाता था। श्री चंद्रप्रभु भगवान का पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इस दौरान इंदौर जैसे महानगर से भक्त यहां आकर सौधर्म इंद्र बने। कोलकाता, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश सहित अनेक राज्यों के श्रावकों ने तन-मन-धन से भक्ति की।</p>
<p><strong>आचार्यश्री ने कहा-अब यह अतिशय क्षेत्र है</strong></p>
<p>जन्म कल्याणक पर हेलिकाप्टर से पुष्प वर्षा, तप कल्याणक पर प्रसिद्ध भामाशाह का हेलिकाप्टर से आना, मंदिर बहुमंजिला शिखर वाला बनना, संत भवन बनाना,उसके लिए भूमिदान, निर्माण सामग्री का दान ऐसे अनेक चमत्कार अतिशय प्राचीन श्री चंद्रप्रभु द्वारा ही हुए हैं। इसलिए श्री चंद्रप्रभु जिनालय को हम अतिशय क्षेत्र घोषित करते हैं। आपकी ही तरह श्री चन्द्रप्रभु भगवान भी संसारी प्राणी थे। जिन्होंने मनुष्य भव में युवराज बनकर राज संचालन किया। विवाह भी किया। आकाश में बिजली की चमक देखकर वैराग्य का निमित्त मिला।</p>
<p><strong>रोज देवदर्शन और पूजन का संकल्प लें</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि दीक्षा का प्रसंग आपने देखा। तप साधना से चार धातिया कर्मों को नष्ट कर केवल ज्ञान प्राप्त कर विहार कर धर्म देशना समवशरण में देते हैं। सम्मेद शिखर में नियोग धारण कर ध्यान से शेष 4 अधातिया कर्मों को नष्ट कर सिद्ध अवस्था प्राप्त करते हैं। सभी को चमत्कारी अतिशयकारी चंद्रप्रभु श्री का प्रतिदिन देव दर्शन, अभिषेक, पूजन का संकल्प लेना चाहिए। देव गुरु हमारे आराध्य हैं। मंगलवार को सुबह श्रीजी के अभिषेक पूजन के बाद आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनिश्री हितेंद्र सागर जी ने बताया कि अरिहंत भगवान 4 कर्मों के बाद शेष 4 कर्म किस प्रकार श्रेणी बार क्षय कर सिद्धालय विराजित होते हैं। भगवान के मोक्ष जाने के बाद अग्निकुमार देव नख और केश के अग्नि संस्कार करते हैं।</p>
<p><strong>दानदाताओं और सहयोगियों का किया सम्मान </strong></p>
<p>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ के सानिध्य में पंडाल से नूतन श्रीजी को प्रतिष्ठाचार्य मनोज शास्त्री के निर्देशन में रथ में विराजित कर नूतन मंदिर में नूतन वेदी पर मंत्रोच्चार पूर्वक पुण्यशाली परिवारों द्वारा विराजित किया गया। नूतन शिखर पर स्वर्ण कलशारोहण मनोज, संजीव गौरव सोगानी परिवार ने किया। ध्वजदंड आरती सनत निखिल विशाल जैन इंदौर पुण्यार्जक परिवार ने लगाए। मंदिर निर्माण समिति के प्रभारी लल्लूप्रसाद सिंघल, ओमप्रकाश, राजेंद्र, ओमप्रकाश बजाज ने बताया कि कार्यक्रम के दौरान नूतन जिनालय नूतन प्रतिमा वेदी, शासन रक्षक देवी-देवताओं, मंदिर और संत भवन निर्माण में तन, मन और धन से सहयोग करने वाले सभी दान दाताओं और सहयोगियों का तिलक, माला, दुप्पटा, स्मृति चिन्ह से सम्मान कर कृतज्ञता ज्ञापित की गई।</p>
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		<title>पंचकल्याणक प्रतिष्ठा से जीवन में संस्कारों का आरोपण करें : 29 को होगा जन्म कल्याणक हेलीकॉप्टर से होगी पुष्पवृष्टि </title>
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		<pubDate>Fri, 28 Nov 2025 12:19:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रीमद 1008 श्री चंद्रप्रभु भगवान का 5 दिवसीय पंच कल्याणक श्रीजी की रथ यात्रा से आरंभ हुआ। आचार्य संघ के सानिध्य में घटयात्रा निकाली गई। ध्वजारोहण, मंडप उदघाटन के साथ कलश स्थापना की गई। याग़ मंडल विधान से कार्यक्रम आरंभ हुआ। इस दौरान आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने केशलोचन किए। पीपल्दा से पढ़िए, राजेश [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>श्रीमद 1008 श्री चंद्रप्रभु भगवान का 5 दिवसीय पंच कल्याणक श्रीजी की रथ यात्रा से आरंभ हुआ। आचार्य संघ के सानिध्य में घटयात्रा निकाली गई। ध्वजारोहण, मंडप उदघाटन के साथ कलश स्थापना की गई। याग़ मंडल विधान से कार्यक्रम आरंभ हुआ। इस दौरान आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने केशलोचन किए। <span style="color: #ff0000">पीपल्दा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पीपल्दा।</strong> श्री मज्जिनेंद्र पंचकल्याणक के प्रथम दिन श्री वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में शुक्रवार से 2 दिसंबर तक चलने वाले 5 दिवसीय श्री चंद्रप्रभु भगवान का पंचकल्याणक का शुभारंभ श्रीजी की रथयात्रा के साथ हुआ। इसमें सौधर्मइंद्र समर पूर्वा कंठाली और ध्वजारोहण परिवार हाथी पर सवार रहे। शताधिक महिलाओं की विशाल घटयात्रा नवीन जिनालय से प्रारंभ होकर नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुई चंद्रपुरी के वर्धमान सभागृह पहुंची। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में बताया कि चंद्रपुरी में चंद्रनाथ तीर्थंकर बालक ने जन्म लेकर, वैराग्य दीक्षा तप साधना से परमात्म पद को जानने का आदर्श कार्य कर परमात्मा बनने का पुरुषार्थ किया। नगर में मंदिर जिनालय बनने से नगर उन्नतिशील होता है।</p>
<p>भगवान के दर्शन, अभिषेक पूजन आदि क्रियाओं से जीवन मंगलमय होकर जीवन में उन्नति होती है। 15 माह तक देवता रत्नों की वृष्टि करते हैं। तीर्थंकर धर्म की वृष्टि उपदेश देशना से करते हैं। 3 वर्षों में नूतन मंदिर निर्मित हो गया। आचार्य श्री ने कहा कि देव शास्त्र गुरुओं के सेवा भावियों का सम्मान करना भारतीय संस्कृति है। पंच कल्याणक के संस्कार क्रिया से जीवन का निर्वाण का पुरुषार्थ कर जीवन का निर्माण करे।</p>
<p><strong>पंचकल्याणक प्रतिष्ठा देखने के साथ सीखने का महोत्सव </strong></p>
<p>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के प्रवचन के पूर्व शिष्य मुनि श्री हितेंद्रसागर जी ने बताया कि पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में पाषाण, रत्न ,धातु की प्रतिमा में प्रतिष्ठाचार्य के सहयोग से आचार्य मुनिराज मंत्रोच्चार से सूरीमंत्र से प्रतिमाओं में भगवान के गुणों का आरोपण कर प्रतिमाओं को पूजनीय, वंदनीय बनाया जाता है। मुनि श्री ने आगे प्रवचन में बताया कि पंचकल्याणक प्रतिष्ठा देखने के साथ सीखने का महोत्सव है। किस प्रकार पाषाण को पूजनीय बनाया जाता है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा से भगवान जैसा बनने का पुरुषार्थ करें। यह भाव जागृत करें कि हम भी किसी भव में तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध करें। आज प्रातः आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने केश लोचन किए। आचार्य श्री का उपवास रहा। समाज अध्यक्ष बजरंगलाल एवं मनोज जैन सोगानी ने बताया कि आचार्य श्री प्रवचन के पूर्व ध्वजारोहण श्रेष्ठी सन्मति, कमलेश देवी, सुकुमाल, महिपाल, मोहित चवरिया परिवार ने, मंडप उद्घाटन राजेंद्र दिलीप अंकित अमित निवाई ने, मुख्य मंगल कलश स्थापना मनोज जैन सोगानी परिवार ने की।</p>
<p><strong>इन समाजजनों का किया गया सम्मान </strong></p>
<p>आचार्य श्री संघ के मंचासीन होने के बाद मंगलाचरण द्वारा श्रीजी और प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी सहित परंपरा के सभी आचार्यों के चित्र का अनावरण महावीर, शिखरचंद, सुरेश,अशोक परिवार निवाई तथा दीप प्रवज्जलन कैलाश चंद चोरू परिवार ने किया। श्री जी के अभिषेक के बाद आचार्य श्री सानिध्य में संघ के सेवाभावी बाल ब्रह्मचारी गज्जूभैया, पदम भैया, सोनू भैया, परमीत, पारस पाटनी, बाबूलाल शाह, लोकेश गजराज, फूलसिंह, सनत जैन का तिलक ,श्रीफल, माला पगड़ी से सम्मान किया गया। मंदिर के शिल्पकार, वास्तुविद प्रतिमाधारी इंजीनियर पारसमल उदयपुर का सम्मान किया गया। वात्सल्य वारिधी सोशल मीडिया के राष्ट्रीय प्रभारी राजेश पंचोलिया इंदौर का सभी प्लेटफॉर्म इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया पर त्वरित प्रसारण प्रचार-प्रसार के लिए सम्मान किया गया। आचार्य ओर प्रतिष्ठाचार्य निमंत्रण द्वारा प्रतिष्ठाचार्य पंडित मनोज शास्त्री सहित सभी विद्वानों का बहुमान किया। आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी पुण्यार्जक परिवारों द्वारा भेंट की गई।</p>
<p><strong>16 सपनों के नाटक का मंचन किया गया</strong></p>
<p>पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कार्यक्रम के अध्यक्ष मनोज सोगानी ने बताया कि दोपहर को सौधर्म इंद्र ,शचि इंद्राणी, माता पिता प्रमुख इंद्र, प्रति इंद्र सहित सभी का मंत्रोच्चार से सकलीकरण किया गया। याग़मंडल की पूजन प्रतिष्ठाचार्य मनोज शास्त्री के निर्देशन में हुई। शाम को श्री जी और आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की भव्य मंगल आरती पश्चात रात्रि में भगवान की माता को रात्रि में आए 16 सपनों का नाटकीय मंचन किया गया। 29 नवंबर को तीर्थंकर बालक का जन्म होगा। तीर्थंकर बालक का 1008 कलशों से अभिषेक होगा। सवाई माधोपुर सहित राजस्थान के अनेक नगरों से हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी। सौधर्म इंद्र समर कंठाली द्वारा हेलीकाप्टर से पुष्पवृष्टि होगी।</p>
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		<title>पुरानी टोंक के श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में पंचकल्याणक 7 नवंबर से: आर्यिका श्री महायशमति माताजी पंच कल्याण को विस्तार से समझाया  </title>
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		<pubDate>Thu, 06 Nov 2025 10:35:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पुरानी टोंक में चतुर्भुज तालाब के पास 1008 श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में 7 से 12 नवंबर तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हो रही है। आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने बताया कि पंच कल्याणक क्या है? क्यों मनाया जाता है? इसका उद्देश्य क्या है? इससे क्या [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पुरानी टोंक में चतुर्भुज तालाब के पास 1008 श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में 7 से 12 नवंबर तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हो रही है। आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने बताया कि पंच कल्याणक क्या है? क्यों मनाया जाता है? इसका उद्देश्य क्या है? इससे क्या धार्मिक लाभ होते हैं। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> पुरानी टोंक में चतुर्भुज तालाब के पास 1008 श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में 7 से 12 नवंबर तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हो रही है। पंच कल्याणक क्या है? क्यों मनाया जाता है? इसका उद्देश्य क्या है? इससे क्या धार्मिक लाभ होते हैं? इस बारे आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ की आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने बताया कि पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कंकर को शंकर बनाने की प्रक्रिया है। इसमें पाषाण की प्रतिमा, रत्न की प्रतिमा, धातु की प्रतिमा में भगवान के गुणों का आरोपण कर उन्हें पूजनीय बनाया जाता है। पंच कल्याणक में प्रतिष्ठाचार्य के माध्यम से आचार्य भगवन प्रतिमाओं में सूरी मंत्र देकर उन्हें पूजनीय बनाते हैैं। भगवान के गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, तप-दीक्षा कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक पांच कल्याणक होते हैं। वस्तुतः पंचकल्याणक में सभी क्रियाएं सौधर्म इंद्र तथा अन्य इंद्र द्वारा की जाती है। वर्तमान के पंचमकाल में प्रतिमाओं को भगवान बनाने के लिए नाटकीय रूप मानव में इंद्र और अन्य इंद्र बनाकर यह धार्मिक क्रियाएं करते हैं। भगवान श्री पार्श्वनाथ पर विगत 10 भवों जन्मों में अनेक उपसर्ग कमठ ने किए। अविचल साधना तप से केवल ज्ञान प्राप्त कर सभी 8 कर्मों का नाश कर मोक्ष जाते है।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-93801" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025.jpg" alt="" width="1600" height="1200" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025-1536x1152.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025-990x743.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251106-WA0025-1320x990.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />गर्भ में आने पर 14 करोड़ रत्नों की वृष्टि</strong></p>
<p>आर्यिका श्री ने बताया कि गर्भ कल्याणक के अंतर्गत जो तीर्थंकर माता के गर्भ में आने वाले होते हैं। उनके गर्भ में आने के 6 माह पूर्व से ही जन्म नगरी</p>
<p>में दिन में 4 बार 3ः 30 करोड़ कुल 14 करोड़ प्रतिदिन रत्नों की वर्षा देवों द्वारा की जाती है। तीर्थंकर माता 16 सपने देखते हैं। इन 16 सपने में एरावत हाथी, महा वृषभ सिंह, अभिषेक होती लक्ष्मी, दो मालाएं, चंद्रमा सूर्य, युगल मछली, सुगंधित जल भरे हुए कलश, जल से भरा सरोवर, लहरों वाला महासागर, सिंहासन, देव विमान, नागेंद्र भवन रत्न रश्मि, तथा निर्भूम अग्नि इस प्रकार सोलह सपने तीर्थंकर की माता को सपने में दिखाई देते हैं और जब अपने राजा पति से इसका अर्थ समझती है तब वह बताते हैं कि आप के गर्भ में तीर्थंकर भगवान का जन्म होना है, जो 8 कर्मों का नाश कर मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त कर सिद्धालय पर विराजित होंगे।</p>
<p><strong>अष्ट और 56 कुमारियों द्वारा माता की सेवा</strong></p>
<p>तीर्थंकर बालक के गर्भ में आने के पहले दिन से 56 कुमारी और अष्ट कुमारी माता की सेवा में 9 माह तक संलग्न रहती है। यह माता को स्नान कराना, श्रंगार कराना, रक्षा के साधन जुटाना वैय्यावृत्ति सेवा करना, धर्म चर्चा करना आदि कार्य करती है। जिससे माता को को कोई कष्ट नहीं हो और विचारों परिणाम में विशुद्धि बनी रहे।</p>
<p><strong>तीर्थकर प्रभु का जन्म, 12 करोड़ वाद्य का वादन</strong></p>
<p>9 माह पूर्ण होने पर तीर्थकर बालक का जन्म होता है। जन्म होते ही तीन लोक के प्राणियों को पल भर के लिए शांति का अनुभव होता है। देवताओं द्वारा 12ः30 करोड़ प्रकार के बाजे बजाए जाते हैं। सौधर्म इंद्र का आसन कंपायमान होता है और ध्यान लगाकर सौधर्म इंद्र यह जानते हैं कि अमुक नगरी में तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ है, वह अपने सिंहासन से खड़े होकर सात कदम आगे चलकर स्वर्ग से तीर्थकर बालक को नमस्कार करता है। सौधर्म इंद्र सभी देव परिवार के साथ ऐरावत हाथी पर शचि इंद्राणी के साथ तीर्थकर बालक की जन्म नगरी की ओर प्रस्थान करता है।</p>
<p><strong>तीन परिक्रमा शचि इंद्राणी प्रभु के दर्शन बाद दो भव अवतारी </strong></p>
<p>सौधर्म इंद्र ऐरावत हाथी पर शचि इंद्राणी के साथ सवार होकर तीर्थंकर बालक का जन्म जिस नगरी में हुआ है उस नगर के तीन परिक्रमा लगाते हैं और शचि इंद्राणी प्रसुति गृह में जाती है। जहां तीर्थकर माता के पास मायावी बालक को सुलाकर तीर्थंकर बालक को अपनी गोद में लेकर बाहर आती है। तीर्थकर बालक के दिव्य मनोहर अलौकिक रूप को देखकर शचि इंद्राणी अत्यंत भाव विभोर होकर परिणाम में विशुद्धि बढ़ जाती है और संसार को केवल दो भव प्रमाण कर लेती है। वर्तमान भव सहित अर्थात तीर्थंकर बालक का दर्शन कितना पुण्यशाली होता है कि शचि इंद्राणी रानी एक भव अवतारी हो जाती है।</p>
<p><strong>भगवान का जन्म अभिषेक </strong></p>
<p>तीर्थकर बालक को सौधर्म इंद्र जब गोद में लेता है तो दो नेत्रों से उन्हें संतुष्टि नहीं मिलती तो वह अपने 1 हजार नेत्र लगाकर भगवान को निहारते हैं। तीर्थकर बालक को देखते हैं इसके बाद सौधर्म इंद्र शचि इंद्राणी के साथ ऐरावत हाथी पर तीर्थंकर बालक को लेकर जाते हैं रत्न सिहासन पर विराजमान कर क्षीरसागर से 1008 जल के घडो कलशों से भगवान का जन्म अभिषेक वैभव के साथ करते हैं। बालक के दाहिने पैर पर जो चिन्ह होता है वही तीर्थकर का लांछन होता है। तीर्थंकर बालक के जन्म अभिषेक के बाद सौधर्म इंद्र तीर्थकर बालक का नामकरण करते हैं।</p>
<p><strong> 8 वर्ष की उम्र में अणुवर्ती</strong></p>
<p>8 वर्ष की आयु में तीर्थकर बालक अणुव्रत का पालन करने लग जाते हैं। क्रम से युवावस्था प्राप्त कर कुछ तीर्थकरों का विवाह भी होता है। तीर्थकर कुमार माता-पिता के इकलौते हैं। उनका राज्याभिषेक किया जाता है। संयोग पाकर वैराग्य का निमित्त मिलता है और वह वन की ओर प्रस्थान करते हैं। तीर्थकर स्वयं-भू होते हैं। अन्य किसी के संबोधन की आवश्यकता नहीं होती है। केवल सामान्य निमित्त पाकर वह वैराग्य को प्राप्त करते हैं तीर्थंकर सम्मेद दृष्टि होते हैं तत्वों का यथार्थ चिंतन करते हैं।</p>
<p><strong>तीर्थकर बालक माता-पिता की इकलौती संतान</strong></p>
<p>तीर्थकर बालक अपने माता पिता की इकलौती संतान होते हैं। तीर्थकर बालक के जन्म होने के बाद माता पिता को अन्य कोई संतान नहीं होती है। तीर्थकर बालक के भोजन भोग उपयोग की सामग्री स्वर्ग से सौधर्म इंद्र भेजते हैं। तीर्थकर बालक के साथ बाल क्रीड़ा जो होती है वह स्वर्ग के देव आकर करते हैं।</p>
<p>पंचाश्चर्य- देवकृत रत्नवर्षा, पुष्पवर्षा, गंधोदकवृष्टि, शीतल मंद सुगंधित वायु प्रवाह, दुंदुभि बाजे और अहोदनं अहोदनं की ध्वनी यह पंचाश्चर्य वृष्टि तीर्थकर भगवंत एवं विशेष महामुनियों के आहार में देवों द्वारा की जाती है।</p>
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