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	<title>Non-possession &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>रत्न्त्रय धर्म 13 प्रकार का चारित्र, 14 वें गुण स्थान पहुंचने का माध्यम : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने सरल शैली में जैन सिद्धांतों का ज्ञान कराया  </title>
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		<pubDate>Wed, 20 May 2026 16:28:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री चंद्र प्रभ जिनालय बड़ के बालाजी में संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा दिया गया संवाद, गीत और धर्म-ज्ञान अत्यंत प्रेरणादायक रहा। पाठशाला में आए बड़े बच्चों को गीत, संवाद और अंक-ज्ञान के माध्यम से जैन सिद्धांतों का सरल एवं सुंदर ज्ञान कराया गया। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री चंद्र प्रभ जिनालय बड़ के बालाजी में संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा दिया गया संवाद, गीत और धर्म-ज्ञान अत्यंत प्रेरणादायक रहा। पाठशाला में आए बड़े बच्चों को गीत, संवाद और अंक-ज्ञान के माध्यम से जैन सिद्धांतों का सरल एवं सुंदर ज्ञान कराया गया। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> श्री चंद्र प्रभ जिनालय बड़ के बालाजी में संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा दिया गया संवाद, गीत और धर्म-ज्ञान अत्यंत प्रेरणादायक रहा। पाठशाला में आए बड़े बच्चों को गीत, संवाद और अंक-ज्ञान के माध्यम से जैन सिद्धांतों का सरल एवं सुंदर ज्ञान कराया गया। मंदिर में प्रभु दर्शन की विधि गीत के माध्यम से बताई। मंदिर धर्मसभा में नंगे पैर जाना चाहिए।</p>
<p>भगवान के सामने प्रेमभाव से पंचांग साष्टांग शीश झुकाकर, गंधोदक-क्षीर और माथे तिलक लगाएं। अभिषेक, पूजन, नमोकार का जाप कर जीवन सफल बनाना चाहिए। आचार्य श्री अंक-ज्ञान में एक का अंक आत्मा एक है, शुद्ध है। जीव दो प्रकार के मुक्त जीव ,संसारी जीव तीन का अंक रत्नत्रय सम्यक दर्शन, सम्यकज्ञान, सम्यक चरित्र चार का अंक चार गतियां मनुष्य, तिर्यंच, देव, नरक गति पांच का अंक पांच परमेष्ठी अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय साधु छह का अंक छह द्रव्य जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल सात का अंक सात तत्त्व जीव, अजीव ,आस्रव, बंध,संवर, निर्जरा,मोक्ष का ज्ञान कराता है। सुरेश सबलावत, भागचंद चूड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि आठ का अंक आठ कर्म ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र, अंतराय नौ का अंक सात तत्त्वों में पुण्य और पाप जोड़कर नौ पदार्थ होते हैं। दस का अंक दस धर्म क्षमा, मार्दव, आर्जव,शौच सत्य, संयम, तप त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य है। ग्यारह का अंक श्रावक की ग्यारह प्रतिमाएं आत्मशुद्धि और संयम की सीढ़ियां हैं। बारह का अंक बारह भावनाएं अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक ,बोधि दुर्लभ और धर्म है। 14 वें गुण स्थान पर जाने के लिए रत्नत्रय संयम 13 प्रकार का चारित्र अनिवार्य है। इस प्रकार सभी को सरल शैली में जैन सिद्धांतों का ज्ञान कराया गया। गीत, संवाद और अंक-ज्ञान के माध्यम से धर्म शिक्षा का यह सुंदर आयोजन अत्यंत प्रेरणादायक रहा। सुनीता चूड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री संघ के सानिध्य में 21 मई से 10 दिवसीय धर्म संस्कार शिविर प्रारंभ होगा।</p>
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		<title>स्व विवेक से किया कार्य ही सार्थक परिणाम देता है : मुनिश्री विहसंत सागर ने स्वविवेक के प्रयोग का बहुमूल्य अर्थ बताया  </title>
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		<pubDate>Wed, 14 Jan 2026 09:08:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विवेकपूर्ण व्यक्ति संसार में यश प्राप्त करते हैं और अविवेकी व्यक्ति उपहास के पात्र बनते हैं। किसी भी कार्य को करने से पूर्व व्यक्ति को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। यह उद्गार उपाध्याय श्री विहसंतसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिरजी में धर्मसभा में व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>विवेकपूर्ण व्यक्ति संसार में यश प्राप्त करते हैं और अविवेकी व्यक्ति उपहास के पात्र बनते हैं। किसी भी कार्य को करने से पूर्व व्यक्ति को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। यह उद्गार उपाध्याय श्री विहसंतसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिरजी में धर्मसभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> विवेकपूर्ण व्यक्ति संसार में यश प्राप्त करते हैं और अविवेकी व्यक्ति उपहास के पात्र बनते हैं। किसी भी कार्य को करने से पूर्व व्यक्ति को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। यह उद्गार उपाध्याय श्री विहसंतसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिरजी में धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सांसारिक क्रियाओं में विवेक का उपयोग तो आवश्यक है ही, साथ ही जब भी हम पूजा पाठ जाप तप या कोई धार्मिक अनुष्ठान करें, तब भी हमें स्व विवेक का उपयोग करना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम अच्छे के लिए कर रहे हैं और बुरा हो जाए। जब भी हम मंदिर या घर में कोई अनुष्ठान करें तब आसन को यथास्थान रखें। दृव्य सामग्री को यथास्थान ही चढ़ाएं। आरती के बाद दीपक को इस तरह रखें कि जीव हिंसा न हो।</p>
<p><strong>स्वविवेक के माध्यम से आत्मा बंधनों से मुक्त होती है</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि जैन दर्शन में स्वविवेक को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, जो सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) और सम्यक् चारित्र (सही आचरण) के साथ मिलकर मोक्ष मार्ग का आधार बनता है। यह सिर्फ बाहरी नियमों का पालन नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य जैसे पंच महाव्रतों के पालन में निर्णायक भूमिका निभाता है। जहां व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार सही-गलत का भेद कर आत्मा के कल्याण के लिए उचित-अनुचित का चुनाव करता है। स्वविवेक के माध्यम से आत्मा बंधनों से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है, जिससे मोक्ष संभव होता है। सम्यक् ज्ञान का आधार केवल जानकारी (ज्ञान) नहीं, बल्कि सही निर्णय लेने की शक्ति है, जिससे आत्मा को ‘सम्यक् ज्ञान’ प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>पानी को वस्त्र से छानना सबसे श्रेष्ठ </strong></p>
<p>पानी छानना सिर्फ विधि नहीं, बल्कि स्वविवेक से जीवों की रक्षा का तरीका है, जहां वस्त्र से छानना सबसे श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि प्लास्टिक या अन्य तरीकों में मृत जीव भी रह सकते हैं। जैन दर्शन में स्वविवेक एक आंतरिक ज्योति है जो व्यक्ति को अपने और आत्मा के हित में सही-गलत का चुनाव करने और परम सुख (मोक्ष) तक पहुंचने में मार्गदर्शन करती है।</p>
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		<title>प्रतिभाशाली बच्चे परिवार, समाज के उज्जवल भविष्य: सेवा न्यास के प्रतिभा सम्मान समारोह के संबंध में रखे विचार  </title>
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		<pubDate>Wed, 17 Dec 2025 12:06:04 +0000</pubDate>
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<p><strong>अपनों द्वारा, अपनों के सम्मान अथवा उत्साहवर्धन के लिए किए जाने वाले आयोजन किसी पर कोई अहसान नहीं होते, बल्कि ऐसे आयोजनों से समाज की प्रतिभाओं का उत्साहवर्धन होता है। साथ ही समाज के अंदर एक नई ऊर्जा का संचार होता है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> अपनों द्वारा, अपनों के सम्मान अथवा उत्साहवर्धन के लिए किए जाने वाले आयोजन किसी पर कोई अहसान नहीं होते, बल्कि ऐसे आयोजनों से समाज की प्रतिभाओं का उत्साहवर्धन होता है। साथ ही समाज के अंदर एक नई ऊर्जा का संचार होता है। अखिल भारतीय श्री दिगंबर जैसवाल जैन (उपरोंचिया) सेवा न्यास द्वारा प्रति वर्ष आयोजित किया जाने वाला प्रतिभा सम्मान समारोह मात्र एक औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह दिगंबर जैसवाल जैन उपरोंचिया समाज के भविष्य की नींव रखने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह समारोह उन होनहार बच्चों के उत्साह और समर्पण को पहचानता है, जिन्होंने शैक्षणिक, सांस्कृतिक या अन्य क्षेत्रों में शानदार और उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। श्री सिद्ध क्षेत्र सोनागिर में 28 दिसंबर को सम्मानित होने वाले बच्चे केवल अपने परिवार के लिए गर्व का स्रोत ही नहीं हैं, बल्कि वे संपूर्ण समाज के भविष्य की आशा हैं। यह उद्गार अखिल भारतीय श्री दिगंबर जैसवाल जैन उपरोचियां सेवा न्यास के वर्तमान महामंत्री एवं नव निर्वाचित कार्याध्यक्ष सीए कमलेश जैन गुरुग्राम ने सजातीय बंधुओं के मध्य प्रतिभाशाली बच्चों के संदर्भ में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि एक बच्चे की सफलता के पीछे उसके परिवार का अटूट समर्थन और संस्कार होते हैं। ये बच्चे अपने परिवार के उज्जवल नाम को आगे बढ़ाते हैं और समाज को यह संदेश देते हैं कि उचित प्रोत्साहन और मार्गदर्शन से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। ये बच्चे राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। समाज की सच्ची पूंजी हैं।</p>
<p><strong>सामाजिक समरसता और द्वेष का उन्मूलन </strong></p>
<p>प्रतिभाशाली युवाओं से केवल शैक्षिक उत्कृष्टता की ही नहीं, बल्कि उच्च मानवीय मूल्यों की भी अपेक्षा की जाती है। सबसे महत्वपूर्ण है कि वे जीवन में द्वेष और हीन भावना को पूरी तरह से समाप्त करें। जैन दर्शन का मूल सिद्धांत अहिंसा और अनेकांतवाद है। इन मूल्यों को जीवन में उतारकर, ये युवा न केवल व्यक्तिगत रूप से शांत रहेंगे, बल्कि समाज में भी समरसता का वातावरण स्थापित करने में मदद करेंगे। सफलता प्राप्त करने के बाद, किसी भी प्रकार की हीन भावना से दूर रहना आवश्यक है। सभी सामाजिक व्यक्तियों को समान सम्मान देना और उन्हें अपनाना एक सफल और सुसंस्कृत व्यक्ति का परम कर्तव्य है। आप युवाओं से यह अपेक्षा है कि आप अपनी उपलब्धियों और क्षमता, पद और प्रभाव का उपयोग सदा समाज के साथ खड़े रहने के लिए करते रहेंगे।</p>
<p><strong>जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में भूमिका </strong></p>
<p>आप प्रतिभाशाली युवाओं पर एक विशेष जिम्मेदारी भी है। आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप अपने उत्कृष्ट कार्यों और सदाचारी जीवन शैली से जैन धर्म के सिद्धांतों को न केवल आत्मसात करें, बल्कि उनका प्रचार-प्रसार भी करें। अपने जीवन में अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह और सत्य के मार्ग पर चलकर आप दुनिया के सामने जैन जीवन पद्धति की महत्ता सिद्ध कर सकते हैं। आपका उच्च चरित्र और सफलता स्वयं ही धर्म का सबसे बड़ा विज्ञापन होगा। सफलता की ऊंचाइयों पर पहुँचने के बाद भी, अपने मूल संस्कारों और धर्म के प्रति श्रद्धा बनाए रखना नई पीढ़ी को धार्मिक जड़ों से जोड़े रखने का मार्ग प्रशस्त करेगा। आप अपनी सफलता को केवल व्यक्तिगत न रखकर श्री दिगंबर जैसवाल जैन उपरोंचिया समाज के विकास और कल्याण के लिए किसी न किसी रूप में योगदान देते रहें। अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में आप समाज के छोटे बच्चों का मार्गदर्शन कर सकते हैं।</p>
<p><strong>आर्थिक और सामाजिक सहयोग</strong></p>
<p>अपनी क्षमतानुसार समाज के जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा में, स्वास्थ्य सेवाओं में या सामूहिक कार्यक्रमों में आर्थिक या श्रमदान के माध्यम से सहयोग करना आपकी नैतिक जिम्मेदारी है। न्यास परिवार द्वारा आयोजित प्रतिभा सम्मान समारोह एक सेतु का काम करता है, जो वर्तमान की सफलता को भविष्य के सामाजिक दायित्व से जोड़ता है। यह आशा है कि आप सभी सम्मानित सितारे अपने ज्ञान, कौशल, और संस्कारों से अपने परिवार, समाज, और जैन धर्म को निरंतर प्रकाशित करते रहेंगे। मानवीय करुणा और सामाजिक समरसता के साथ श्री दिगंबर जैसवाल जैन उपरोंचिया समाज को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में आपका अमूल्य योगदान ही इस सम्मान की सार्थकता सिद्ध करेगा।</p>
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		<title>परिवर्तनशील संसार में अडिग: दिगंबर साधु-साध्वियों का अनुशासन </title>
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		<pubDate>Sun, 05 Oct 2025 08:38:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धरती पर शायद ही कोई जीवन दिगंबर जैन साधु-साध्वियों के विहार जितना कठोर, अनुशासित और आध्यात्मिक हो। जहाँ साधारण मनुष्य घर, संपत्ति और भौतिक सुखों के पीछे भागता है, वहीं दिगंबर साधु इनका पूर्ण त्याग कर निरंतर विहार में रहते हैं। साधु चर्या पर आज पढ़िए, प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी का यह विशेष आलेख। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>धरती पर शायद ही कोई जीवन दिगंबर जैन साधु-साध्वियों के विहार जितना कठोर, अनुशासित और आध्यात्मिक हो। जहाँ साधारण मनुष्य घर, संपत्ति और भौतिक सुखों के पीछे भागता है, वहीं दिगंबर साधु इनका पूर्ण त्याग कर निरंतर विहार में रहते हैं। <span style="color: #ff0000">साधु चर्या पर आज पढ़िए, प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी का यह विशेष आलेख।</span></strong></p>
<hr />
<p>धरती पर शायद ही कोई जीवन दिगंबर जैन साधु-साध्वियों के विहार जितना कठोर, अनुशासित और आध्यात्मिक हो। जहाँ साधारण मनुष्य घर, संपत्ति और भौतिक सुखों के पीछे भागता है, वहीं दिगंबर साधु इनका पूर्ण त्याग कर निरंतर विहार में रहते हैं। नग्न, बिना किसी संग्रह के, प्रकृति के कठोर ताप सहते हुए वे आंतरिक शांति और स्थिरता के प्रतीक बनते हैं। यह जीवन अहिंसा और अपरिग्रह का जीवंत उदाहरण है, जो सिद्ध करता है कि सच्ची स्थिरता बाहरी सुखों में नहीं, बल्कि आत्मिक संयम और अनासक्ति में है। दिगंबर परंपरा में वस्त्रों का त्याग मोक्ष का प्रथम द्वार माना जाता है, जो साधु को संसार की माया से मुक्त करता है।</p>
<p><strong>दिगंबर जैन विहार का सार है</strong></p>
<p>निरंतर यात्रा, सजगता और जीव-करुणा। साधु-साध्वियाँ नंगे पाँव पैदल चलते हैं, चाहे धरती सूरज की तपिश से जल रही हो या बारिश की बूंदें चुभती हों। जैन आगमों के अनुसार, उनकी नग्नता—जिसमें दिशाएँ ही वस्त्र हैं—अपरिग्रह का प्रतीक है। वे लंबे समय तक कहीं नहीं रुकते, सिवाय चातुर्मास के, जब चार माह साधना और प्रवचन में बिताते हैं। यह विहार उन्हें संसार की नश्वरता की याद दिलाता है, क्योंकि दिगंबर दर्शन में आत्मा ही शाश्वत है, शरीर और बाह्य वस्तुएँ क्षणिक। परिषह (कष्ट सहन) उनके जीवन का हिस्सा है—भूख, प्यास, ठंड, गर्मी को सहते हुए वे परिषह जय प्राप्त करते हैं। &#8216;सर्वार्थसिद्धि&#8217; ग्रंथ कहता है कि परिषह स्वाभाविक हैं, जबकि बाह्य तप इच्छा से किए जाते हैं, और दिगंबर साधु इन्हें सहजता से अपनाते हैं।</p>
<p>इस विहार की स्थिरता का रहस्य आत्मबल और संयम है। बिना घर-द्वार के भी वे अडिग रहते हैं, क्योंकि उनकी स्थिरता आंतरिक है। आचार्य विद्यासागर जी महाराज, जिन्होंने 22 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन त्यागा और कठोर नियमों का पालन किया, ने कहा था: &#8220;सच्ची स्थिरता संग्रह में नहीं, त्याग में है। अपरिग्रह अपनाने पर संसार की हलचल मन को छू नहीं पाती।&#8221; उनका जीवन इसका प्रमाण है—नमक, चीनी, हरी सब्जियाँ, दूध-दही का त्याग; दिन में एक बार जल ग्रहण; अनियत विहार। वे न एयर कंडीशंड कमरों में रुके, न मौसमी वस्त्र अपनाए। ठंड में बिना कंबल, गर्मी में बिना छत्र, वे विहार करते रहे। मुनि प्रणम्यसागर जी ने &#8216;अनासक्त महायोगी&#8217; में लिखा कि आचार्य विद्यासागर जी का प्रत्येक कदम आत्म-जागृति का संदेश था: &#8220;मनुष्य स्थायित्व की खोज में भटकता है, पर स्थिरता अनासक्ति से जन्म लेती है।&#8221; 2024 में चंद्रगिरि तीर्थ पर सल्लेखना द्वारा समाधि तक, उनका जीवन दिगंबर विहार का आदर्श रहा।</p>
<p>दिगंबर जैन विहार अनुशासन और संयम की जीवंत मिसाल है। साधु का संग्रह केवल पिच्छी (सूक्ष्म जीवों की रक्षा हेतु), कमंडल और शास्त्र तक सीमित है। नींद बिना बिस्तर के, जमीन पर। 18 परिषह—भय, रोग, शीत—सहते हुए वे चारित्र की रक्षा करते हैं। तत्त्वार्थ सूत्र में वर्णित छह बाह्य तप—अनशन, रसायन, प्रभुधे—उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। यह कठोरता उन्हें असाधारण बनाती है। दिगंबर दर्शन में साध्वियाँ भी समान नियमों का पालन करती हैं, हालाँकि कुछ परंपराएँ उन्हें नग्नता से अलग रखती हैं, फिर भी वे पूर्ण मोक्ष की पात्र हैं।</p>
<p>यह विहार केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, समाज के लिए प्रेरणा है। जब दिगंबर साधु बिना संपत्ति के संतुष्ट रह सकता है, तो गृहस्थ अपनी आवश्यकताओं को क्यों नहीं सीमित कर सकता? आचार्य विद्यासागर जी ने कहा: “अहिंसा केवल भोजन का त्याग नहीं, हर कदम पर जीव-रक्षा है। विहार सिखाता है कि करुणा से स्थिरता मिलती है।” मुनि प्रमाणसागर जी ने बल दिया: “परिवर्तनशील संसार में स्थिरता का रहस्य अनासक्ति है।” उनका जीवन बताता है कि बाहरी स्थायित्व क्षणिक है, पर आंतरिक स्थिरता शाश्वत। आज के उपभोक्तावादी युग में, जहाँ भौतिकता हावी है, दिगंबर विहार का संदेश प्रासंगिक है: सुख त्याग में है, संग्रह में नहीं।</p>
<p>दिगंबर साधु-साध्वियों का विहार जीवन की नश्वरता का बोध कराता है। आज का स्थान कल बदल जाएगा, आज का संबंध कल टूट सकता है। फिर मोह के बंधन क्यों? यह साधना मोह-माया से मुक्ति दिलाकर परम शांति की ओर ले जाती है। नग्न वेष में, पिच्छी हाथ में, नंगे पाँव धूल भरे रास्तों पर चलते साधु चलते-फिरते तीर्थ हैं। उनका मौन, संयम और सजगता मानवता को पुकारती है: स्थिरता के लिए स्थायित्व जरूरी नहीं। आचार्य विद्यासागर जी के शब्द हैं: “आत्मा का बोध ही सच्चा आश्रय है।” प्रमाणसागर जी ने स्पष्ट किया: “विहार में स्थिरता का रहस्य है—सब त्यागकर स्वयं को पाना।”</p>
<p>दिगंबर विहार का संदेश है कि शांति बाहरी खोज में नहीं, आंतरिक यात्रा में है। बाहरी स्थायित्व क्षणभंगुर, पर आंतरिक स्थिरता अनंत। साधु-साध्वियों का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि सुख धन में नहीं, संयम और त्याग में है। उनका हर कदम चीखता है—बिना स्थायित्व के भी स्थिरता संभव है। यह परंपरा हमें आत्म-निरीक्षण का अवसर देती है: क्या हम इच्छाओं को सीमित कर सकते हैं? क्या अहिंसा को जीवन का आधार बना सकते हैं? क्या मोह त्यागकर स्थिरता पा सकते हैं? यह विहार केवल साधना नहीं, एक दर्शन और क्रांति है, जो मानवता को मुक्ति का मार्ग दिखाती है। इस संदेश को अपनाकर हम संसार की अस्थिरता से अडिग रह सकते हैं।</p>
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		<title>परिग्रह मुक्ति का मंगलकारी मुहूर्त है आकिंचन्य धर्म-मुनि विश्वसूर्य सागर जी : संपूर्ण परिग्रह का त्याग ही आकिंचन्य धर्म : मुनि साध्य सागर जी </title>
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		<pubDate>Sat, 06 Sep 2025 05:13:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सनावद में चल रहे चातुर्मास के दौरान पर्यूषण पर्व के 9वें दिन संत निलय में मुनि साध्य सागर जी महाराज और मुनि विश्वसूर्य सागर जी महाराज ने ‘उत्तम आकिंचन्य धर्म’ पर प्रवचन देते हुए परिग्रह त्याग और आत्मा की शुद्धि का संदेश दिया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… सनावद। पर्यूषण पर्व के 9वें दिन नगर के संत [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सनावद में चल रहे चातुर्मास के दौरान पर्यूषण पर्व के 9वें दिन संत निलय में मुनि साध्य सागर जी महाराज और मुनि विश्वसूर्य सागर जी महाराज ने ‘उत्तम आकिंचन्य धर्म’ पर प्रवचन देते हुए परिग्रह त्याग और आत्मा की शुद्धि का संदेश दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> पर्यूषण पर्व के 9वें दिन नगर के संत निलय में चातुर्मासरत मुनि साध्य सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को आकिंचन्य धर्म की महिमा समझाते हुए कहा कि आत्मा के अतिरिक्त इस लोक में कुछ भी मेरा नहीं है, यही आकिंचन्य की परिभाषा है। जब यह भाव सच्ची श्रद्धा के साथ जागृत होता है, तब यह ‘उत्तम आकिंचन्य धर्म’ कहलाता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि आकिंचन्य वह अवस्था है, जहां बाहरी परिग्रह ही नहीं, बल्कि आंतरिक संकल्प-विकल्प भी समाप्त हो जाते हैं। इसी क्रम में मुनि विश्वसूर्य सागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि आकिंचन्य धर्म साधना का पवित्र दिवस है, यह परिग्रह मुक्ति का मंगलकारी मुहूर्त है। जब जीव ममता, लोभ और अहंकार का त्याग करता है, तभी वह संसार सागर से पार हो सकता है।</p>
<p>इस अवसर पर संत भवन में सुगंधी कलश और शांति धारा का आयोजन हुआ, जिसमें आशीष कुमार मोतीचंद जैन रेवाड़ा परिवार को सौभाग्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।</p>
<p><strong>अनंत चतुर्दशी पर्व का आयोजन</strong></p>
<p>आज नगर के आदिनाथ जिनालय, सुपार्श्वनाथ जिनालय और पार्श्वनाथ जिनालय में युगल मुनि राज के सानिध्य में श्रीजी का अभिषेक कर अनंत चतुर्दशी पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा।</p>
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		<title>संस्कार शिविर में मूल सिंद्धांतों को बताया प्रासंगिक: शिविर अवलोकन करने पहुंच रहे समाज श्रेष्ठीजन   </title>
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		<pubDate>Sat, 10 May 2025 09:13:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[यंग जैन स्टडी ग्रुप की ओर से आयोजित 10 वें शिविर में बच्चों के साथ-साथ समाज जनों का भी उत्साह बना हुआ है। प्रातः पूजन और अभिषेक विधि विमल छाबड़ा एवं जयश्री टोंग्या करवा रही हैं। शिविर का अवलोकन करने विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारी प्रतिदिन पहुंच रहे हैं। इंदौर से पढ़िए, मनीष अजमेरा की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>यंग जैन स्टडी ग्रुप की ओर से आयोजित 10 वें शिविर में बच्चों के साथ-साथ समाज जनों का भी उत्साह बना हुआ है। प्रातः पूजन और अभिषेक विधि विमल छाबड़ा एवं जयश्री टोंग्या करवा रही हैं। शिविर का अवलोकन करने विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारी प्रतिदिन पहुंच रहे हैं। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, मनीष अजमेरा की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के मूल सिद्धांत अहिंसा, सत्य, अचौर्य, शील और अपरिग्रह के आधार पर जीवन शैली अपनाने का संदेश पूरे विश्व को देना है। आज सर्वत्र हिंसा, झूठ कुशील और परिग्रह के कारण पूरा विश्व दुःखी हैं। मानव त्रस्त है। ऐसे में जैन धर्म के 5 सिद्धांत पाप से बचाते हैं। ये सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं, जो मानव संस्कृति को बचा सकते हैं।</p>
<p>यह बात विद्वानों ने जैन संस्कार शिविर में 2 हजार 100 से अधिक बच्चों को शिक्षित करते हुए कही। शिविर प्रमुख प्रकाश छाबड़ा ने बताया कि यंग जैन स्टडी ग्रुप की ओर से आयोजित 10 वें शिविर में बच्चों के साथ-साथ समाज जनों का भी उत्साह बना हुआ है। प्रातः पूजन और अभिषेक विधि विमल छाबड़ा एवं जयश्री टोंग्या करवा रही हैं। शिविर का अवलोकन करने विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारी प्रतिदिन पहुंच रहे हैं।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-80622" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003.jpg" alt="" width="1600" height="900" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003-1024x576.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003-1536x864.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003-990x557.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003-1320x743.jpg 1320w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/05/IMG-20250510-WA0003-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />अजय जैन मिंटा एवं कैलाश वेद ने बताया कि दिगंबर जैन समाज सामाजिक संसद के पदाधिकारी शुक्रवार को अवलोकन करने पहुंचे और शिविर को सराहा। डीके जैन, नेम लुहाड़िया, दिलीप डोसी, जेनेश झांझरी, पिंकेश टोंग्या आदि ने अवलोकन किया। प्रीतेश जैन और निलेश पाटोदी ने अतिथियों का स्वागत किया।</p>
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		<title>महावीर जन्म कल्याणक दिवस पर घरों पर लगाएं पांच-पांच दीपक: रंगोली बनाएं अपने अपने घर-द्वार सजाएं </title>
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		<pubDate>Wed, 09 Apr 2025 06:22:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान वर्धमान जो लोक में भगवान महावीर के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म कल्याणक महोत्सव इस वर्ष 10 अप्रैल गुरुवार को है। इस दिन सभी समाजजन अपने घर को सजाएं और दीपक जलाएं। इंदौर से पढ़िए यह खबर&#8230; इंदौर। वर्तमान शासन नायक भगवान वर्धमान जो लोक में भगवान महावीर के नाम से प्रसिद्ध हुए। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान वर्धमान जो लोक में भगवान महावीर के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म कल्याणक महोत्सव इस वर्ष 10 अप्रैल गुरुवार को है। इस दिन सभी समाजजन अपने घर को सजाएं और दीपक जलाएं। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> वर्तमान शासन नायक भगवान वर्धमान जो लोक में भगवान महावीर के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म कल्याणक महोत्सव इस वर्ष 10 अप्रैल गुरुवार को है। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया। उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए, जो हैदृ अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) ,ब्रह्मचर्य। उन्होंने अनेकांतवाद, स्यादवाद और अपरिग्रह जैसे अद्भुत महाव्रती सिद्धांत बताए। इस अवसर पर राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू अपील करता है कि सभी समाज जन शाम के समय अपने-अपने घरों पर 5 दीपक पंचशील सिद्धांतों और पंच परमेष्टि के प्रतीक स्वरूप लगाएं , रंगोली बनाएं अपने अपने घर-द्वार सजाएं और आकर्षक साज-सज्जा करें।</p>
<p>विश्व जैन संगठन के अध्यक्ष मयंक जैन भारत वर्षीय समग्र जैन समाज से अपील करते हैं कि भगवान महावीर के सिद्धांतों को मंदिर से बाहर लाकर चौराहे पर लाएं। जिससे समाज में शांति आएं और सभी के बीच आपसी सामंजस्य के साथ जियो और जीने दो का संदेश प्रसारित हो। भगवान महावीर के उपदेश आज भी इंसान को आत्मानुशासन, संयम और नैतिकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।</p>
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		<title>हिंसा मानसिक, वचन, और शारीरिक रूप से होती है: स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक ने धर्मसभा में विस्तार से की धर्म की चर्चा </title>
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		<pubDate>Sat, 15 Mar 2025 14:55:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री आदि चुंचनगिरी जात्रा महोत्सव-2025 के सर्वधर्म सम्मेलन में स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक महास्वामी जी ने जैन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए भगवान महावीर के संदेश, अहिंसा और अनेकांतवाद के बारे में बात की। स्वामी जी ने भक्तों को विभिन्न उदाहरणों से समझाया। वे सर्वधर्म सम्मेलन में संबोधित रहे थे। पढ़िए श्रवणवेलगोला से यह खबर&#8230; श्रवणवेलगोला। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री आदि चुंचनगिरी जात्रा महोत्सव-2025 के सर्वधर्म सम्मेलन में स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक महास्वामी जी ने जैन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए भगवान महावीर के संदेश, अहिंसा और अनेकांतवाद के बारे में बात की। स्वामी जी ने भक्तों को विभिन्न उदाहरणों से समझाया। वे सर्वधर्म सम्मेलन में संबोधित रहे थे। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रवणवेलगोला से यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>श्रवणवेलगोला।</strong> श्री आदि चुंचनगिरी जात्रा महोत्सव-2025 के सर्वधर्म सम्मेलन में स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक महास्वामी जी ने जैन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए भगवान महावीर के संदेश, अहिंसा और अनेकांतवाद के बारे में बात की। भगवान बाहुबली के संदेश ‘मैत्री से प्रगति’ के बारे में उन्होंने सभा में हितवचन दिए। धर्म क्या है? इस पर स्वामीजी ने अपनी बात शुरू की। धर्म का मतलब है, सामान्य लोगों के लिए उपयुक्त नियम और व्यवस्थाएं जो उनकी कठिनाइयों, दर्द और समस्याओं को हल करने के लिए बनाए जाते हैं, ताकि वे अच्छे जीवन जी सकें और आत्मकल्याण कर सकें। इसी तरह जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों ने आत्मा को मोक्ष की ओर कैसे ले जाया जाए।</p>
<p>इसके बारे में सिद्धांत दिए। 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के दिव्य उपदेश में पांच सिद्धांत दिए गए हैं, जो सामान्य लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं-अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और सत्य। इन विषयों पर स्वामीजी ने विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि हिंसा मानसिक, वचन, और शारीरिक रूप से होती है। हम खुद हिंसा करें या दूसरों को हिंसा करने के लिए प्रेरित करें, या दूसरों द्वारा की गई हिंसा को अनुमोदित करें, यह सब गलत है। यही कारण है कि हमें अहिंसा का पालन करना चाहिए। इसी तरह, चोरी नहीं करनी चाहिए, सत्य बोलना चाहिए, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और जितना जरूरी हो, उतना ही भोग लेना चाहिए। यह अपरिग्रह कहलाता है।</p>
<p><strong>सभी धर्म और अनुयायी अनुभवों के आधार पर धर्म की व्याख्या करते हैं</strong></p>
<p>स्वामीजी ने बताया कि इन पांच सिद्धांतों का पालन सभी सामान्य लोगों को करना चाहिए। अनेकांतवाद के उदाहरण को स्पष्ट करते हुए उन्होंने पांच अंधे शिष्यों की कहानी सुनाई। ये पांच शिष्य एक हाथी को महसूस करते हुए उसका अलग-अलग विवरण दे रहे थे। एक शिष्य ने हाथी की सूंड को सर्प जैसा दूसरे ने पैर को खंभा जैसा तीसरे ने कान को बड़ा पत्ते जैसा चौथे ने पूंछ को रस्सी जैसा और पांचवे ने शरीर को दीवार जैसा बताया। प्रत्येक शिष्य अपने भौतिक अनुभव के आधार पर सही था, लेकिन किसी के पास पूरा और सही चित्रण नहीं था। इसी तरह, अनेकांतवाद यह कहता है कि सभी धर्म और उनके अनुयायी अपने अनुभवों के आधार पर धर्म की व्याख्या करते हैं। सभी धर्म सही हैं, क्योंकि उनके मूल उद्देश्य अनंत सुख और मोक्ष की प्राप्ति है।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-76700" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250315-WA0044.jpg" alt="" width="1599" height="722" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250315-WA0044.jpg 1599w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250315-WA0044-300x135.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250315-WA0044-1024x462.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250315-WA0044-768x347.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250315-WA0044-1536x694.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250315-WA0044-990x447.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250315-WA0044-1320x596.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1599px) 100vw, 1599px" />मैत्री से प्रगति’ के मंत्र का पालन करना चाहिए</strong></p>
<p>स्वामीजी ने बताया कि बाल गंगाधरनाथ स्वामीजी और कर्मयोगी चारूकीर्ति स्वामीजी ने मिलकर श्रवणबेलगोला और चुंचनगिरी मठों को फैलाया। पहले नंददीप केवल गर्भगृह में ही जलता था, लेकिन स्वामीजी ने इस नंददीप के प्रकाश को हर व्यक्ति के मन में फैलाया। उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा और परंपराओं के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास किया और धर्म के प्रभाव को फैलाया। आदिचुंचनगिरी और श्रवणबेलगोला मठों के बीच प्रगाढ़ संबंध होने के बारे में बताते हुए उन्होंने भगवान बाहुबली के संदेश ‘अहिंसा से सुख, त्याग से शांति, मैत्री से प्रगति, ध्यान से सिद्धि’ का पालन करने का आह्वान किया। स्वामीजी ने कहा कि आज के समाज में सभी धर्मों को प्रगति हासिल करने के लिए ‘मैत्री से प्रगति’ के मंत्र का पालन करना चाहिए।</p>
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