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	<title>Niryapak &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>करने का मन होता है तो अधर्म हैः मोबाइल के अंदर लगे चित्र से तुम्हारे अंदर के चरित्र पता चल रहा है-निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 28 Mar 2025 17:02:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन दर्शन ने सूत्र दिया-तुम कौन हो? हर व्यक्ति ये जानने का प्रयास कर रहा है कि मुझे क्या करना चाहिए, क्या जानना चाहिए? मुझे क्या बोलना, पढ़ना चाहिए? मैं क्या देखूँ, सुनूँ ये समझ नही आ रहा। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। पढ़िए बहोरीबंद से राजीव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन दर्शन ने सूत्र दिया-तुम कौन हो? हर व्यक्ति ये जानने का प्रयास कर रहा है कि मुझे क्या करना चाहिए, क्या जानना चाहिए? मुझे क्या बोलना, पढ़ना चाहिए? मैं क्या देखूँ, सुनूँ ये समझ नही आ रहा। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बहोरीबंद से राजीव सिंघई मोनू व पृथ्वीपुर से शुभम की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद (कटनी)</strong>। जब किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाओ तो एक सूत्र दे रहा हूँ-तुम कौन हो? क्या अनुभूति हो रही है, मनुष्य की, मैं भारतीय हूँ, मैं जैन हूँ, मैं पिता हूँ, मैं पति हूँ, मैं भक्त हूँ। जो वस्तु तुम्हे दिखी, उसको देखते ही अनुभूति में क्या आ रहा है? माँ को देखते ही मैं बेटा, गुरु को देखते ही मैं शिष्य हूँ, बस तुम जो हो, अब वह करना है। खाते समय तुम्हें यह नहीं देखना है कि मैं क्या खाऊं, डिप्रेशन में चले जाओगे मैं मनुष्य हूँ और मनुष्य मैं भी जैन हूँ, बस, जैन व्यक्ति को क्या खाना चाहिए अब लिस्ट जल्दी बन जाएगी। जैन में भी व्रती हूँ, व्रती में भी मुनि हूँ तो जो तुम्हारे रत्नत्रय के लिए, धर्म साधना के लिए जो तुम्हारी आचार संहिता में लिखा है, वह तुम्हे खाना है बस।</p>
<p><strong>कार्य दो प्रकार से होते है</strong></p>
<p>करने योग्य कार्य दो प्रकार से होते हैं, धर्म या करने योग्य कहो, एक ही बात है। जो-जो करने योग्य है वे-वे सब धर्म है और जो जो करने योग्य नहीं है और करने का मन होता है तो अधर्म है। अब इस दुनिया मे क्या करने योग्य है, क्या नहीं, इसकी दृष्टि कैसे बनाये तो जैन दर्शन ने सूत्र दिया-तुम कौन हो? हर व्यक्ति ये जानने का प्रयास कर रहा है कि मुझे क्या करना चाहिए, क्या जानना चाहिए? मुझे क्या बोलना, पढ़ना चाहिए? मैं क्या देखूँ, सुनूँ ये समझ नही आ रहा।</p>
<p><strong>अच्छे कुल की परिभाषा जिसमें अनैतिक कार्य नहीं होते </strong></p>
<p>साधु के लिए कहा कि पहले यह मत देखना कि विधि है या नहीं, पहले ये देखना कि इसके हाथ से आहार लेने लायक है या नहीं, कौन से कुल का है। साधु तुम्हारे सामने क्या मानकर खड़ा हुआ है कि तुम बहुत अच्छे कुल के हो, पात्र हो, जैन हो। अच्छे कुल की परिभाषा क्या है जिसमें मांसाहार, शराब, अभक्ष्य सेवन, अनैतिक कार्य नहीं होते। पर इससे बड़ी शर्म क्या होगी कि साधुओ को पूछना पड़ता है कि तुम रात में तो नहीं खाते, शराब तो नहीं पीते। कई बार निकल भी आते है। आज के समय में अनजाने चौके में हम साधु नहीं जा सकते। वही साधु आहार को उठ सकता है कि जिस साधु को इतना निमित्त ज्ञान हो, जो देखते ही पता कर ले कि ये कौन है।</p>
<p><strong>मोबाइल के अंदर चित्र से तुम्हारे अंदर का चरित्र पता चल रहा </strong></p>
<p>इस घर का क्या चरित्र है, ये उस घर मे टँगे हुए चित्रों से पता चल जाता है। कोई कहे कि मैं अपने मोबाइल में माँ का फोटो लगाता हूँ नेचुरल रूप से, बस मैं आंख बंद करके कह दूँगा ये व्यक्ति कभी माँ को दुख नहीं दे सकता, चाहे कितनी भी उद्दंड पत्नी आ जाए क्योंकि ये बार-बार माँ को देखना चाह रहा है। यदि पति नेचुरल रूप से मोबाइल में अपनी पत्नी का चित्र लगाता है तो वह निश्चिंत रहे तुम्हारा पति कंही नही जाएगा क्योंकि वह दिन में दो हजार बार तुम्हारा चेहरा देख रहा है, फिर भी बोर नहीं हो रहा। यदि पिता, बेटे बिटिया का चित्र लगाए है तो वह बेटे बिटिया निश्ंिचत रहे, तुम्हारा पिता तुम्हे अनाथ नहीं होने देगा। यदि भक्त सालों से गुरु का फोटो लगाए है तो यह निश्चित है कि यह सब कुछ छोड़ सकता है लेकिन गुरु को नहीं छोड़ पायेगा। मोबाइल के अंदर चित्र से तुम्हारे अंदर का चरित्र पता चल रहा है कि तुम किसको चाहते हो।</p>
<p><strong>भगवान की छाया तुम्हारे सिर पर मिलेगी </strong></p>
<p>भगवन से कहना है कि तू सर्वज्ञ है देख ले मेरे घर में, मेरे मोबाइल में, मेरे सीने में, मेरे मन मे, मेरे वचन में, मेरी काया में, कभी भी स्वप्न में मैंने किसी का चित्र नहीं चाहा, सब जगह आपका चित्र है, 6 महीने करके देख लीजिए, शांतिनाथ भगवन आपके हो जायेगे। आप घनघोर जंगल मे भी रहेंगे और जैसे ही आप शांतिनाथ भगवान का नाम लेकर उनकी मूर्ति याद करेंगे, वही शांतिनाथ भगवान की छाया तुम्हारे सिर पर मिलेगी।</p>
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		<title>व्यक्ति अपनी जिंदगी में कुछ नहीं कर पाताः जो तुम्हारे पास नहीं है उसको कभी याद नहीं रखना और जो है उसको कभी भूलना मत-निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी  </title>
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					<description><![CDATA[सारे भक्तों से कहना है-माँ बाप का कहना मानना या नही मानना। लेकिन माँ बाप से झूठ मत बोलना। वो पाप मत करना जिसको छुपाने के लिए माँ-बाप से, गुरु से झूठ बोलना पड़े और हो जाये तो गुरु को अवश्य बताना। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>सारे भक्तों से कहना है-माँ बाप का कहना मानना या नही मानना। लेकिन माँ बाप से झूठ मत बोलना। वो पाप मत करना जिसको छुपाने के लिए माँ-बाप से, गुरु से झूठ बोलना पड़े और हो जाये तो गुरु को अवश्य बताना। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। धर्मसभा में प्रवचनों के दौरान जैन धर्म अनुयायी बड़ी संख्या में पुण्यार्जन कर रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बहोरीबंद से राजीव सिंघई मोनू व पृथ्वीपुर से शुभम की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद (कटनी)।</strong> व्यक्ति के पास जब कुछ नहीं होता है तो वह कहता है कि मैं क्या कर सकता हूँ, मेरे पास तो कुछ है ही नही और जब सब कुछ होता है तो कहता है अब क्या करना है। मेरे पास धन नहीं है तो कहता है मैं दान कैसे दूँ, पैर नहीं है तो मंदिर कैसे जाऊँँ, तीर्थ यात्रा कैसे करूँ। लेकिन जब सब कुछ हो जाता है, किस्मत भी साथ देती है तो कहता है, सबकुछ तो मेरे पास है, अब जरूरत क्या है धर्म करने की, इस स्थिति का परिणाम यह निकलता है कि व्यक्ति अपनी जिंदगी में कुछ नहीं कर पाता है।</p>
<p><strong>नकारात्मक सोच हमारा पतन करती है </strong></p>
<p>कर वह व्यक्ति सकता है जिसके पास कुछ नहीं है और बुलंदी आ जाए कि मैं सब कुछ कर सकता हूँ। मेरा क्षेत्र, मेंरी जाति, मेरा कुल, मेरा परिवार गंदा है, अब मैं क्या कर सकता हूँ, वह व्यक्ति जिंदगी में कुछ नहीं कर सकता। तुम्हारे मन में अभाव की अनुभूति हो और अभाव की अनुभूति तुम्हारी आत्मा का विषय बन जाए, समझ लेना तुम्हारा और डाउनफॉल होने वाला है और नीचे जाओगे, ये इतना खतरनाक शब्द है कि मैं कुछ नहीं कर सकता क्योंकि मैं असमर्थ हूँ, मेरे पास कुछ है नहीं। अंधा यह कहे कि मैं देख ही नहीं सकता हूँ, मैं क्या करूँ, समझना अगला भव भी अंधे का आएगा, ये नकारात्मक सोच हमारा पतन करती है।</p>
<p><strong>तुम्हारे पास क्या-क्या नहीं है उसकी लिस्ट फाड़कर फेंक दो</strong></p>
<p>हर व्यक्ति के दो रूप है एक वह चाहता है कि मैं जहाँ हूँ उससे आगे बढ़ जाऊँ, दूसरा व्यक्ति कहता है कि मेरी किस्मत आगे बढ़ने लायक तो नहीं है, मैंने बहुत प्रयास कर लिए तो ऐसे व्यक्ति चाहते है कि जो हूँ, इससे कम न हो जाये तो इसके लिए एक मंत्र दे रहा हूँ तुम्हें-कभी अपने जीवन में अभाव का ध्यान मत रखना कि मेरे पास यह नहीं है, इसलिए मैं कुछ नहीं कर सकता। मेरे पास वज्र वृषभ नाराच संहनन नहीं है। इसलिए मैं अरहंत नहीं बन सकता। मूर्ति के सामने खड़े होकर हम कह रहे हैं जिनेन्द्र देव नहीं है, मूर्ति में काम चल रहा हूँ, क्या करूँ, बस अब वह मूर्ति भी छूटने वाली है, किस्मत बहुत डाउनफॉल हो जाएगी। तुम्हारे पास क्या-क्या नहीं है उसकी लिस्ट फाड़कर फेंक दो, आपके पास मकान नहीं है तो यह मत कहो कि मेरे पास मकान नहीं है, अन्यथा जो झोपड़ी है, वह भी गायब होगी फुटपाथ पर आओगे। पहले तो जो है, जहाँ है, जैसे है, उसके प्रति मन में खुशी लाकर दिखा दो। फूटी हुई किस्मत को भी रखो, वो भी और कुछ नहीं लाएगी तो दिवाली के दिन सूखे बाजरे की रोटी ला देगी, जैसे वह टूटी चप्पल भी काँच की बर्नी ला सकती है। अभाव की अनुभूति नहीं, सद्भाव की अनुभूति करो।</p>
<p><strong>फल नहीं मिलेगा तो छाया तो मिलेगी </strong></p>
<p>फल वाला बीज तुम्हें मिला नहीं और मिलेगा भी नहीं, अब एक बीज मिला है जिसमे पेड़ तो लगेगा लेकिन फल नहीं लगेगा तो अब समझदारी है कि फल नहीं मिलेगा तो छाया तो मिलेगी। फल वाले पेड़ लगाने से बरसात नहीं होती, बरसात उन जंगली पेड़ो से होती है जिन पर फल नहीं आते और वे पेड़ किसी काम में नहीं आते। बहुत काम की है तुम्हारी फुटी हुई जिंदगी, मरने का भाव नहीं करना, हताश नहीं होना। यह कहने कभी मंदिर में मत जाना कि मेरे पास मकान नहीं है, मेरे पास गाड़ी नहीं है, मैं पास नहीं हो रहा हूँ। नहीं शब्द का त्याग करो और यह कहो कि मेरे पास है। तुम्हारे पास क्या है इसका ध्यान करो- झोपड़ी का, टूटी चप्पल का ध्यान करो। जो तुम्हारे पास नहीं है उसको कभी याद नहीं रखना और जो है उसको कभी भूलना मत।</p>
<p><strong>मेरा देने का भाव नहीं है या मेरे पास इतना नहीं है कि मैं दे सकूँ</strong></p>
<p>ये जैनदर्शन की खोज है कि जीव कभी जीव से झूठ नहीं बोलना, आपका सहयोग नहीं करना है तो मत करना, मेरे पास समय नहीं है। बचा सकते हो लेकिन मैं बचाऊँगा नहीं क्योंकि मेरा बचाने का भाव है, मेरे पास समय नहीं है, बस झूठ मत बोलना। देना हो तो देना, नहीं देना हो तो उसकी किस्मत पर छोड़ देना। तुम मानव हो तो कभी मानव से झूठ मत बोलना, उससे छलकपट मत करना। आप भली मत देना, सीधा कह देना कि मेरे पास है लेकिन मुझे नहीं देना, मेरा देने का भाव नहीं है या मेरे पास इतना नहीं है कि मैं दे सकूँ लेकिन झूठ मत बोलना कि मेरे पास नहीं है। रिश्तेदारों का सहयोग नहीं करना हो तो मना कर देना लेकिन झूठ मत बोलना कि मैं तुम्हारा सहयोग करने लायक नहीं, मेरे पास कुछ है ही नहीं, अन्यथा उसी समय तुम्हारा डाउनफॉल चालू हो जाएगा। इसी तरह पड़ोसी से, भाई से छलकपट मत करना, आज की कमाई नही दूँगा तुझे, लाख रुपया कमाया है, जो तुम्हे करना हो करना, बस झूठ मत बोलना कि आज धंधा चला ही नहीं है, बस यही दरिद्रता का कारण है।</p>
<p><strong>डॉक्टर से रोग और गुरु से दोष मत छिपाना </strong></p>
<p>सारे भक्तों से कहना है-माँ बाप का कहना मानना या नही मानना। लेकिन माँ बाप से झूठ मत बोलना। वो पाप मत करना जिसको छुपाने के लिए माँ-बाप से, गुरु से झूठ बोलना पड़े और हो जाये तो गुरु को अवश्य बताना। डॉक्टर से रोग और गुरु से दोष मत छिपाना, गुरु की नजरों में गिर जाऊँ तो गिर जाऊँ, बस उन्हें कभी अपने दोष मत छिपाना। सबको मालूम है कि मैं तेरा मित्र हूँ और तू मेरे से ही झूठ बोल रहा था, ये कहानी है दरिद्रता की। इसी प्रकार दान देते समय कभी यह मत बोलना कि मैं समर्थ नहीं हूँ, कहना अभी मेरा भाव नहीं है अन्यथा यही तुम्हारी गरीबी का कारण बनेगा।</p>
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		<title>मेरे पास है उससे ज्यादा दुनिया के पास नहीं हैः उसका साथ दो, जिसका कोई साथ नही देता-निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी  </title>
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		<pubDate>Fri, 21 Mar 2025 05:48:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्मसभा में प्रवचनों के दौरान जैन धर्म अनुयायी बड़ी संख्या में पुण्यार्जन कर रहे हैं। जो मेरे में है उससे ज्यादा दुनिया में नहीं है और जो मेरे में नहीं है बाकी दुनिया में नहीं है, एक ऐसी स्व चतुष्टय की दृष्टि तात्विक दृष्टि कहलाती है और तात्विक दृष्टि जब प्रकट हो जाती है तब [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्मसभा में प्रवचनों के दौरान जैन धर्म अनुयायी बड़ी संख्या में पुण्यार्जन कर रहे हैं। जो मेरे में है उससे ज्यादा दुनिया में नहीं है और जो मेरे में नहीं है बाकी दुनिया में नहीं है, एक ऐसी स्व चतुष्टय की दृष्टि तात्विक दृष्टि कहलाती है और तात्विक दृष्टि जब प्रकट हो जाती है तब व्यक्ति के मन में पर पदार्थ के प्रति ममत्व भाव टूट जाता है। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बहोरीबंद से राजीव सिंघई मोनू की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद (कटनी)।</strong> अपने आपको जब व्यक्ति स्व चतुष्टय के रूप में देखता है तो हमारे लिए एक ऐसी शक्ति की अनुभूति होती है कि सब कुछ मैं हूँ और सार्वभौम हूँ मैं। जो मेरे में है उससे ज्यादा दुनिया में नहीं है और जो मेरे में नहीं है बाकी दुनिया में नहीं है, एक ऐसी स्व चतुष्टय की दृष्टि तात्विक दृष्टि कहलाती है और तात्विक दृष्टि जब प्रकट हो जाती है तब व्यक्ति के मन में पर पदार्थ के प्रति ममत्व भाव टूट जाता है।</p>
<p><strong>मेरे पास है उससे ज्यादा दुनिया के पास नहीं है </strong></p>
<p>डाकू तब बनता है जब वह अपने आपको फकीर या असमर्थ समझता है। नियम से जब-जब स्वयं पर पदार्थ की तरफ जा रहे हैं, नियम से हमने अपने आपकी कुछ शक्ति खो दी है, अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा अपशगुन कि हम पर पर दृष्टि टिकाये हुए हैं। हमें यह मिल जाये तो मैं सुखी हो जाऊँगा, यही दुख का कारण है और जिस दिन ये आ जाये कि मुझे कुछ नही चाहिए, जो मेरे पास है, उससे ज्यादा दुनिया के पास नहीं है, समझ लेना चाहिए दुख के दिनों में भी आपका सुख का दिन आने वाला है, मुझे कुछ नही चाहिए क्योंकि जो मेरे पास है उससे ज्यादा दुनिया के पास नहीं है।</p>
<p><strong>चार प्रकार के लोग होते हैं</strong></p>
<p>पहले लोग वो हैं, जिनको अपने सम्बन्ध में कुछ भी मालूम नहीं है, मैं कौन हूँ, मैं क्या हूँ, बस वह तो यह जानते हैं कि जो मेरे अनुभव में आ रहा है, वही मैं हूँ, जैसे भिखारी अपने आप को भिखारी, जैन अपने आपको जैन मान लेता है। जो वह है इससे ज्यादा उसकी सोच नहीं बन पाती। वही हूँ और जब वही है उसमे कमी देखने लग जाए तो फिर व्यक्ति दुखी हो जाता है। मैं जैन हूँ, बस इतना ही काफी है, यदि इतनी अनुभूति तुम्हें हो रही है, तुम एक दिन जैनत्व खो दोगे। थोड़ा आगे पीछे सोचो तुम जैन क्यों हो, तुम दुःखी क्यों हो। मैं दुःखी हूँ, ये बात तुम्हारे अनुभव में आती है लेकिन तुम दुखी क्यों हो ये बात विचार में नही आती और ऐसा लगता है कि अब सुखी हो ही नहीं पायेंगे कि दुःख इतना भारी पड़ रहा है कि उसका छोर नहीं मिलता।</p>
<p><strong>दुख ज्यों के त्यों बने रहे और व्यक्ति को सुखी करें </strong></p>
<p>कितनी चीजों से तुम सुख मानते हो, जितने प्रकार के तुम सुख को मान रहे हो उतने प्रकार के दुःख है और जितने प्रकार के दुख है उतने प्रकार के सुख है। ऐसी स्थिति में जैनदर्शन कहता है कि तुम्हारे दुख तो मैं मैट नहीं पाऊंगा लेकिन दुःख में भी मैं तुम्हें सुखी करने की कला बताता हूँ। यह कोई धर्म का अतिशय नहीं है, जो दुख हटा दे, धर्म का अतिशय है दुख ज्यों के त्यों बने रहे और व्यक्ति को सुखी कर दे।</p>
<p><strong>कैसा भी बाप या बेटा हो, हत्या करने की अनुमति नहीं है </strong></p>
<p>जब अपने लोग ही अपनी जिंदगी में संकट बन जाए तो उन्हें हटाने या मिटाने का प्रयास मत करना। यदि तुमने बाप को मार दिया तो तुम बाप के हत्यारे कहलाओगे, निंदा के पात्र बनोगे। कैसा भी बाप या बेटा हो, हत्या करने की अनुमति नहीं है, भले ही वो मेरा नाश कर दे लेकिन मिटाना नहीं है क्योंकि जो अपना व्यक्ति बन गया तो उसे मिटाया नहीं जाता। जैनदर्शन ने भक्त को बचाया तो सही लेकिन किसी को मिटाया नही गया। संसार में किसी को नही मिटाओ, अपने आपको बचाओ तो यही चित्चमत्कार कहलाता है। तुम्हे एक नियम लेना है-मैं किसी का विनाश नहीं करूंगा, मेरे नाश करने वाले का भी मैं विनाश नहीं करूँगा। मेरा दुश्मन भी है तो मैं नाश नही करूँगा, इसलिए इसको महाव्रत बोलते है। अब ये भाव तुम्हारे मन में आ गया और सामने वाला तुम्हारा नाश करने के लिए तैयार है, बस अब चमत्कार होगा, अब बनेगा नाग का हार।</p>
<p><strong>जो असहाय हो उसके पक्ष में खड़े हो जाना </strong></p>
<p>लड़के की सबसे बड़ी कमी होती है कि माँ का पक्ष तो लेना चाहिए लेकिन जब पत्नी का विनाश होने लग जाए तो पत्नी का पक्ष लेना चाहिए क्योंकि वो पराये घर से आई है, वह तुम्हारे विश्वास पर आई है। तुम्हारे अलावा उसका इस घर मे कोई नहीं है क्योंकि माँ का तो सब कुछ है, पिता है, तू खुद बेटा है। सही व्यक्ति वो कहलाता है जिसका कोई नही होता। जो असहाय हो उसके पक्ष में खड़े हो जाना चाहे माँ भी क्यों न हो, पिता भी क्यों न हो। फिर आपका चमत्कार देखना कितना अतिशय आता है। दुश्मन भी कमजोर पड़ रहा है तो मैं उसका साथ दूंगा। पत्नी का साथ देने को नही कहा, नही तो तुम जोरू के गुलाम बन जाओ। नही कमजोर, असहाय का साथ देना।</p>
<p><strong>यदि दुश्मन भी असहाय हो तो उसका साथ दो</strong></p>
<p>यदि दुश्मन भी असहाय हो तो मैं उसका साथ दूँगा, उस समय तुम्हारे परिणाम कि कुछ नही, मात्र मुझे बचाना है, इस समय मेरी इसको जरूरत है, दुश्मनी भूल जाओ और जैसे ही तुमने यह किया नहीं, उसी समय तुम्हारे जीवन में ऐसा चमत्कार होगा कि भूकंप आ जाएगा, सारा नगर दबकर मर जाएगा और तुम्हें खरोच भी नहीं आएगी, ये चमत्कार णमोकार मंत्र, शांतिधारा, मेरे आशीर्वाद में नही है और ये यदि तुम्हारा भाव न बन पाए तो जिनसे हमारा संबंध है, जिनसे हमने कभी राग किया है, अपना माना है, ये भली मेरा कुछ भी बिगाड़ लें, मैं कभी अपनों को मारने का भाव नहीं करूंगा, चाहे भली आज वह मेरा दुश्मन बन गया हो, कल तो मेरा ही था। ये सेकेंड नम्बर की शक्ति जागेगी कि तुम्हारे अपने भी सारे विरोध में हो जाए तो भी तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा। ये नियम था पारसनाथ का, तभी वे आज जगतपूज्य बन गए।</p>
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		<title>दृष्टि बदल दो, सृष्टि बदल जायेगी-निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजीः व्यक्ति को लगे कि इसका सुख मेरे अधीन, वही से शोषण चालू </title>
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		<pubDate>Sat, 15 Mar 2025 10:30:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्मसभा में प्रवचनों के दौरान जैन धर्म अनुयायी बड़ी संख्या में पुण्यार्जन कर रहे हैं। धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि प्रकृति को एक माँ की संज्ञा दी जाती है, माँ की संज्ञा क्यों? क्योंकि माँ जन्म दे सकती है जीवन नहीं, प्रकृति भी हमें जन्म दे सकती है, जीवन नहीं। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्मसभा में प्रवचनों के दौरान जैन धर्म अनुयायी बड़ी संख्या में पुण्यार्जन कर रहे हैं। धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि प्रकृति को एक माँ की संज्ञा दी जाती है, माँ की संज्ञा क्यों? क्योंकि माँ जन्म दे सकती है जीवन नहीं, प्रकृति भी हमें जन्म दे सकती है, जीवन नहीं। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बहोरीबंद से राजीव सिंघई मोनू की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद (कटनी)।</strong> जब चल रहा था तब अकेला था, जब सांसे टूट गई तब सब साथ चलने लगे। जब नहीं चल पाता था तो उंगली पकड़कर चलाते थे, जब चलने लगा तो लोग गिरने लगे, ये दुनिया है ही ऐसी। प्रकृति को एक माँ की संज्ञा दी जाती है, माँ की संज्ञा क्यों? क्योंकि माँ जन्म दे सकती है जीवन नहीं, प्रकृति भी हमें जन्म दे सकती है, जीवन नहीं। जन्म का अर्थ है रॉ मेटीरियल, तुम्हे योग्य बना दिया। प्रकृति के भरोसे यदि तुमने पूरी जिंदगी गुजारी दी तो तुम जन्म तो ले लोगें। लेकिन जीवन का मजा नहीं ले पाओगे क्योंकि प्रकृति जीवन नहीं दे सकती। जितनी ये महान आत्मायें है, ये निमित्त है ये प्रकृति के अंदर आते है। गुरु हमें व्रत दे सकते है, गुणस्थान नहीं। निमित्त हमारे लिए सावधान करता है लेकिन चला नहीं सकता।</p>
<p><strong>सब कुछ होकर भी हमारे पास अधिकार नहीं </strong></p>
<p>किस्मत हमें सर्वस्व दे सकती है लेकिन सार्वभौम हमें प्राप्त करना है। हमारे पास सब कुछ होकर भी हमारे पास अधिकार नहीं। अधिकार मिलते नहीं है, अधिकतर पाए जाते हैं, अधिकार योग्यता से आते है और सर्वस्व तुम्हारी किस्मत से, प्रकृति से, भगवान से भी आ सकता है। सरकार तुम्हे नोट दे सकती है लेकिन उस नोट का क्या उपयोग करना है ये उसके अधिकार से बाहर है। समझदार व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं हो तो भी कहता है कि मेरे पास सब कुछ है और मूर्ख व्यक्ति के पास सब कुछ हो तो भी कहता है मेरे पास तो कुछ है ही नहीं। जो व्यक्ति कहता है कि मेरे पास कुछ है ही नहीं, समझना तुम्हारे दरिद्रता के लक्षण आने वाले हैं।</p>
<p><strong>केवलज्ञानी को देख श्रुत केवली को भी लगा मैं तो अज्ञानी हूँ</strong></p>
<p>तुम खुश हो ये सर्वस्व है और तुमसे दुनिया खुश है ये सार्वभौम है। हमारे पास ज्ञान बहुत अच्छा है, मेरी दृष्टि, मेरे कान बहुत अच्छे है, मैं खुश हूँ, ऐसा व्यक्ति भी निंदनीय है, दुर्गति जा सकता है। नीति कहती है ये एक पहलू है, जैन धर्म को पाकर मैं खुश हूँ, शांतिनाथ को पाकर मैं खुश हूँ, जिनवाणी को पाकर मैं खुश हूँ। ये अहंकार नहीं, गर्व है लेकिन इसके बाद भी मैं तुम्हे धर्मात्मा नहीं, फैल का सर्टिफिकेट दे रहा हूँ, ये सारी खुशियां हमें खजूर के पेड़ के समान ऊंचाई देती है क्योंकि ये सब हम अनंतों बार प्राप्त कर चुके है। मैं ज्ञानी हूँ, ऐसा भाव आना भी परिषह है, इसको जीतना है कि मैं ज्ञानी नहीं हूँ। जिनवाणी कहती है कि तू अज्ञानी है मूर्खों के बीच स्वयं को ज्ञानी मान रहा है, थोड़ा ऊपर देख। केवलज्ञानी को देखते ही श्रुत केवली को भी लगता है कि मैं तो अज्ञानी हूँ।</p>
<p><strong>व्यक्ति को लगे कि इसका सुख मेरे अधीन, वही से शोषण प्रारंभ</strong></p>
<p>तुम दुनिया के पीछे भागोगे तो दुनिया तुम्हे छोड़कर भागेगी, तुम दुनिया को छोड़ दो, दुनिया तुम्हारे पीछे भागेगी। पराधीन जब भी हो जाओगे तुम बुद्धू बनते जाओगे, संसार की अपेक्षा कह रहा हूँ। ये संसार का नियम है कि जिस व्यक्ति को पता चल जाये कि इस व्यक्ति का सुख मेरे अधीन है, बस वही से तुम्हारा शोषण चालू हो जाएगा, अब तुम्हारी ब्लैकमेलिंग चालू। बंधुओ गुलाम व्यक्ति का कोई सगा नहीं होता, सगी माँ तक ने तुम्हे बुद्धू कह दिया, इसलिए जिनवाणी माँ ने कहा कि तुम इतना साहस दिखा दो कि मैं माँ के बिना भी जी सकूँगा, फिर माँ तुम्हें बुद्धू नहीं, नमोस्तु कहेगी क्योंकि माँ जान गई कि बेटा मेरा बिना भी सुखी रह सकता है। हम साधुओं को कहा कि जिन जिन चीजों के बिना गृहस्थ दुःखी रहता है, उन उन चीजों के बिना तुम खुश रहकर दिखाओ तो जैन साधुओ कहलाओ।</p>
<p><strong>दृष्टि बदल दो, सृष्टि बदल जायेगी </strong></p>
<p>जूता चमत्कारी होता है पर शर्त है वो बाप का होना चाहिए, सिर बेटे का होना चाहिए और लगने पर ये भाव आना चाहिए कि पिताजी ने जूता नहीं मारा है, आशीर्वाद दिया है, जाओ चमत्कार हो गया। पिताजी ने भले गुस्से में मारा है लेकिन तुमने उसे आशीर्वाद माना है तो वह जूता भी तुम्हे आशीर्वाद का काम करेगा। साँप रखा होगा तो रखा होगा घड़े में लेकिन मैंने मान लिया कि हार है तो हार है। दृष्टि बदल दो, सृष्टि बदल जायेगी। हमारा नजरिया बदल जाएगा तो सारी दुनिया वैसी ही होगी, जैसी हमारा नजरिया होगा। उसी वस्तु को हम अच्छी दृष्टि से देखेंगे तो वो अच्छी होवे या न होवे, हमारा जरूर अच्छा होगा।</p>
<p><strong>माँ-बाप के पास वो कला है जो खुशी में भी दुख देखती है</strong></p>
<p>गुरु कौन है? शिष्य हंस रहा है और खुशियाँ मना रहा है और गुरु को उसमें दुख दिख रहा है। तुम्हें गुटखा खाने में आनंद आ रहा है और तुम्हारा गुरु उस खुशी में आँसू देख रहा है, उस आनंद में कैंसर देख रहा है, तेरी पत्नी के विधवा होने का, बच्चों के अनाथ होने का दुख देख रहा है। जब स्वयं की अकल काम न करें तो गुरु की, माँ बाप की अकल से चलो क्योंकि माँ बाप के पास वो कला है जो तुम्हारी खुशी में भी दुख देख लेती है।</p>
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		<title>गार्जियन के थप्पड़ को भी जो आशीर्वाद मान लेता है, उसे आशीर्वाद सदा सदा फलते रहते है : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज: बड़े लोग गाली भी दे तो उसे मंत्र मानकर स्वीकार करना </title>
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		<pubDate>Fri, 14 Mar 2025 16:47:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दुनिया का जो सिस्टम है उसे हमें समझना होगा क्योंकि सृष्टि मूक होती है और मूक व्यक्ति के भाव को समझना बहुत कठिन होता है। बेटी की इच्छा है तो माँ-बाप को समझ में आ जाती हैं। लेकिन माँ-बाप की इच्छाएं बेटे को समझ में आ जाए ये है महानता। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दुनिया का जो सिस्टम है उसे हमें समझना होगा क्योंकि सृष्टि मूक होती है और मूक व्यक्ति के भाव को समझना बहुत कठिन होता है। बेटी की इच्छा है तो माँ-बाप को समझ में आ जाती हैं। लेकिन माँ-बाप की इच्छाएं बेटे को समझ में आ जाए ये है महानता। ये बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बहोरीबंद की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद (कटनी)।</strong> बेटे की क्या इच्छाएं हैं वह तो खुद ही बखान कर देता है, वो तो बेशर्म है न। बेशर्म आदमी की पहचान होती है कि अपनी इच्छाओं को अपने मुँह से बखान कर देता है इसको बोलते है , उद्दंडता, बेशर्मपना। यहाँ तक कि मनवा भी लेता है लेकिन जो गार्जियन, माता पिता, भगवान होते है, इनकी इच्छाये बहुत कठिन है, माँ बाप अपनी इच्छाएं कभी बेटों पर नही थोपते। वे चुपचाप रह जाएंगे, इच्छाये तो है कोई छोटी मोटी नहीं, बहुत लंबी इच्छाये है क्योंकि जब से तुम्हारा जन्म भी नही हुआ था, उसके पहले से ही इच्छाये है कि मेरा बेटा ऐसा होगा, लेकिन वे तुझे परेशान देखकर अपनी इच्छाये दबा लेते है, ये आत्मीयता, प्यार कहलाता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>बेटा जन्म-जन्म का था और जन्म-जन्म तक रहेगा</p>
<p>बेटा जब छोटा था तो उसे कुछ कहो की देखो वो तोता बैठा है तो कहता है- ऐं, वह सुनता, समझता नहीं है फिर भी माँ में झुंझलाहट नहीं आती बल्कि उसको प्यार आता है। लेकिन माता पिता आज थोड़े से बोल जाए तो उसको चिड़चिड़ापन आ जाता है, इन लक्षणों को देखकर माँ बाप सोच लेते है कि ये क्या मेरी इच्छा पूरी करेगा। माँ बाप के बाहर जाने पर बेटे को बुरा लगे, वह दोस्तों से कहे कि मेरा मूड ऑफ है, मुझे कही नहीं जाना, समझ लेना यह बेटा तुम्हारा जन्म-जन्म का था और जन्म-जन्म तक रहेगा।</p>
<p><strong>गार्जियन के अभाव में अच्छा लगना सबसे बड़ा अमंगल</strong></p>
<p>यदि माँ बाप नहीं भी है, मात्र उनकी स्मृति भी तुम्हारे लिए मंगल बन जाएगी। यदि वह कहे कि मजा आ गया, मम्मी पापा घर पर नहीं है तो बेटों से कहना है कि माँ बाप की अनुपस्थिति तुम्हें अच्छी लगने लगे तो जाओ तुम्हारी जिन्दगी का पतन हो गया, अपशगुन हो गया। तुम्हारे बुरें कर्मों का उदय आने वाला है, तुम्हारी दशा ऐसी बिगड़ेगी कि संभल भी नहीं पाओगे और आपको भी समझना है कि अब तुम बेटे को बचा नहीं सकते, अब तुम कितना ही प्रयास करना, तुम्हारे बेटे को तुम्हारी दुआ नहीं फलेगी। गार्जियन के अभाव में बुरा लगना ये सबसे बड़ा मंगल है और गार्जियन के अभाव में अच्छा लगना ये सबसे बड़ा अमंगल है।</p>
<p><strong>कौन पूछने वाला है, ऐसा भाव आ रहा है तो अपशगुन होने वाला हैं</strong></p>
<p>अपने से बड़ों को यदि तुमने कमजोर मान लिया, अपने आश्रित अपनी शरण में मान लिया, मेरे अलावा इनको कौन पूछने वाला है, ऐसा भाव आ रहा है तो महानुभाव बहुत बड़ा अपशगुन होने वाला है तुम्हारी जिंदगी में और माता पिता भी सोच ले कि अब तुम बेटे के सम्बंध में कुछ भी नहीं कर सकते, तुम्हारी सारी मेहनत व्यर्थ जाएगी और बेटा जिंदगी में धोखा खाएगा। इसका भविष्य अच्छा नहीं है क्योंकि तुम उसे भार लगने लगे हो। अब इसका उल्टा कह दो कि माँ बाप के अलावा मेरी कोई शरण नहीं है, ये अंक है, इनके बिना मैं शून्य हूँ, इनके अलावा मेरा कुछ भी नहीं, मैं तो ये भावना करता हूँ कि मेरे माँ बाप की उम्र मेरे से भी बड़ी हो।</p>
<p><strong>वह तुम्हारी हर बुराई को अपने हित में मानता है</strong></p>
<p>बेटे को एकाध दिन बिना काम के गाली देना या थप्पड़ मारना, ये और कह देना- मेरी मर्जी, मुझे मारना है तो मार दिया। बस तुम इतना ही देखना तुम्हारे इस व्यवहार से बेटे को कैसा लगा, यदि उसे फीलिंग हो गई, वो तुम्हें जबाब देने को तैयार है, समझ लेना तुम्हारी दुआ का उस पर कोई असर नही पड़ेगा। पत्नी को भी यही लगाना, फिर भी खुशी खुशी तुम्हे रोटी परोस रही है, समझ लेना इसके लिए तुम थोड़ी सी भी दुआ करोगे, उसका मंगल होगा क्योंकि वो तुम्हारे दुर्व्यवहार से नाराज नहीं हुआ, उलाहना नहीं दिया, इसका अर्थ है कि वह तुम्हारी हर बुराई को अपने हित में मानता है।</p>
<p><strong>बड़े लोग गाली भी दे तो उसे मंत्र मानकर स्वीकार करना</strong></p>
<p>वह कितने भी संकट में पड़ जाए, उसके लिए तुम मात्र एक बार नारियल लेकर भगवान के पास आ जाना, तुम्हारा बेटा पाकिस्तान में भी पड़ गया होगा तो सकुशल लौटकर आएगा, गांरटी मेरी है। बड़े लोगों की दुआएं दी चाहिए है तो बड़े लोग यदि गाली भी दे तो उसे मंत्र मानकर स्वीकार करना, जाओ तुम्हारे ऊपर बड़ों की छाया सदा रहेगी। गार्जियन के थप्पड़ को भी जो आशीर्वाद मान लेता है, उसे आशीर्वाद सदा फलते रहते है।</p>
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		<title>एक नियम ले लो किसी अच्छे व्यक्ति की बुराई मत सुनना-निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजीः साधु की आलोचना इतनी न हो कंही साधु बेकाबू हो  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/if_you_enjoy_listening_to_bad_things_then_it_is_okay_but_make_it_a_rule_not_to_listen_to_bad_things_about_a_good_person_niryapak_munipugav_shri_sudha_sagarji_maharaj/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Mar 2025 12:15:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[न जाने कितने लोगों के पास ज्ञान होता है लेकिन अनुभव नहीं होने से वह कोई कार्यकारी नहीं और अनुभव आता है क्रिया में। रावण के पास ज्ञान था लेकिन अनुभव, चारित्र नहीं था और श्रीराम के पास ज्ञान भले कम हो लेकिन अनुभव और चारित्र सर्वाेपरि था। सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान के बाद चारित्र आए तो [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>न जाने कितने लोगों के पास ज्ञान होता है लेकिन अनुभव नहीं होने से वह कोई कार्यकारी नहीं और अनुभव आता है क्रिया में। रावण के पास ज्ञान था लेकिन अनुभव, चारित्र नहीं था और श्रीराम के पास ज्ञान भले कम हो लेकिन अनुभव और चारित्र सर्वाेपरि था। सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान के बाद चारित्र आए तो आनंद है। यह बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बहोरीबंद-कटनी की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद (कटनी)</strong> जो कुछ मिला है संसारी प्राणी को वह कम महसूस होता है तो वह क्या करें क्योंकि संसार में रहने वाले जीव को संतोष कभी हो नहीं सकता। जितना भी मिलने जाता है उसकी कांक्षाये और बढ़ती जाती है। ऐसा नहीं है कि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं, तुम्हारे पास बहुत कुछ है लेकिन तुम कहते हो, सबकुछ नहीं है तो समझ लेना चाहिए उसके अब बुरे दिन आने वाले है, उसको अशुभ कर्म का बंध होने वाला है क्योंकि वह पाप में असंतुष्ट हो रहा है कि इतना काफी नहीं है। शराबी इसलिए नहीं मारता कि वह शराब पीता है शराबी इसलिए मरता है क्योंकि वह शराब पीने में तृप्त नहीं होता है।</p>
<p><strong>तुम्हारे व अज्ञानी में कोई अंतर नही रहा</strong></p>
<p>पूज्य नेमिचन्द्र महाराज ने लिखा कि तुमने सम्यकदर्शन प्राप्त कर लिया, फिर भी तुम्हें संसार के विषय अच्छे लग रहे है, फिर भी तुम्हारी परिणति ठीक नहीं हो रही। क्या कारण है, जिंदगी में कितने कार्य हैं जो गलत है, हम जानते है फिर भी हो रहे है कि नहीं, जानते हुए क्यों हो रहा है? कर्म सिद्धांत कहता है कि जो अज्ञानी है उनको पाप का बंध कम है, तुम तो ज्ञानी हो, तुम भी वही कर रहे जो अज्ञानी कर रहा है तो तुम्हारे व अज्ञानी में कोई अंतर नही रहा।</p>
<p><strong>वैराग्य हो तो तुरंत निकल पड़ो </strong></p>
<p>महाराज ने आगे कहा कि जैसे ही तुम्हे सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान हो तुरन्त नियम ले लेना, स्वयं आत्मा में भय पैदा कर देना, स्वयं अपने आप को ऐसी कस्टडी में भेज देना जहाँ कल के दिन तुम्हारा मन आना भी चाहे तो आ नहीं पाए। तुम्हें मालूम हो गया कि गलत है तो तुरन्त नियम ले लो और जहाँ गलत की संभावना है उस स्थान, द्रव्य, क्षेत्र, काल को छोड़ दो अन्यथा बाद में निकलना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए वैराग्य हो तो तुरंत निकल पड़ो। क्षमा मांगने को, घर की व्यवस्था करने के लिए भी कोई समय मत लो, घर की कोई अनुमति मत लो, यह सब चीजों में बहुत खतरा है, इतना खतरा है कि जिंदगी का लक्ष्य बदल सकता है, इसलिए जब भी अपन को ज्ञान हो जाए तो तुरंत ही प्रयास करो कि इस ज्ञान को लॉक कैसे करूँ।</p>
<p><strong>अच्छे लोगों को उछालने में ही मजा आता है </strong></p>
<p>लॉक करने का अर्थ है अब इसमें सुधार नहीं कर सकते। ऐसी दशा में डाल दो कि कल के दिन मन लौटना चाहे तो नहीं लौट सकता। तुम ऐसे साधन को अलग कर दो जिसे तुम्हें भागने, हटने का भाव आएगा। पाप से चाहे डर कर, चाहे मजबूरी में भागों, घाटा तो है नहीं, फायदा ही है। दिगंबर जैन साधु मर सकता है लेकिन दूसरे को मारने के लिए विद्या सिद्ध नहीं कर सकता। जब किसी व्यक्ति को उछाला जा रहा हो, जब किसी व्यक्ति को अपवादित किया जा रहा हो तो एकदम से धारणा नहीं बनाना, थोड़ा सोचना जरूर ये महान पवित्र आत्मा है क्योंकि अच्छे लोगों को उछालने में ही मजा आता है।</p>
<p><strong>किसी को रंग लगाने का मजा अलग है </strong></p>
<p>जिसको किसी ने रंग न लगाया हो, उसको रंग लगाने का मजा अलग है, होली है। ज्ञानी व्यक्ति को कहो इसको होली मानों, वे कहते हैं हमें उसी को दाग लगाना है, जिसमें आज तक कोई दाग नहीं है। हमें उसी को गाली देना है जिसको दुनिया आज तक पूजती है, हमें उसी की निंदा करना है जिसकी सारी दुनिया प्रशंसा करती है।</p>
<p><strong>साधु की आलोचना इतनी न हो कंही साधु बेकाबू हो </strong></p>
<p>पापियों से, कषाय, आलोचना करने वालों से मेरा कहना है कि आलोचना देखकर करना, कहीं साधु की आलोचना इतनी न हो जाए कि कंही साधु बेकाबू हो जाये। साधु यदि बेकाबू हो गया तो देवताओं ने स्पष्ट कह दिया कोई नहीं बचा सकता। जो चींटी को भी बचाने का भाव करता है, तुमने उसको दुख देने का भाव किया, इसलिए मेरे भक्तों से कहना है कि कोई भी पाप करना तो देख लेना सामने वाला कौन है। मान लो हिंसा का भी भाव आये तो देख लेना सामने वाला कौन है? कंही सज्जन की हिंसा न हो जाये।</p>
<p><strong>पवित्र आदमी को बुरी नजर से मत देखना </strong></p>
<p>स्त्री पर दृष्टि डालने से यदि पुतला जलता है तो बताओ संसार में कितने लोग है जिनकी नजर स्त्रियों पर बुरी है, पर उनके पुतले तो नहीं जल रहे, उनकी निंदा तो नहीं हो रही लेकिन रावण का पुतला क्यों? क्योंकि उसने उस पर दृष्टि डाली है जिसकी दृष्टि इतनी पवित्र है कि जिसे अग्नि भी नहीं जला पाई, इतनी पवित्र है। ओ बुरी नजर वालों तुम्हारी नजर भी बुरी है तो किसी बुरे आदमी पर डालना, पवित्र आदमी को बुरी नजर से मत देखना। ये नारी धर्मात्मा है, सती, ब्रह्मचारिणी, पतिव्रता है, सुशील है, हम इसके ऊपर बुरी नजर नही डालेंगे।</p>
<p><strong>मैं किसी साधु की बुराई नहीं सुनूंगा</strong></p>
<p>यदि तुम आदत से लाचार हो कि तुम्हें बुराई सुनने में मजा आता है तो कोई बात नहीं एक नियम ले लो किसी अच्छे व्यक्ति की बुराई मत सुनना। जो पवित्र हो, जो निर्दाेष हो, जो निर्मल हो, जो जगतपूज्य हो, जो तुम्हारा परमेष्ठी हो, उसकी बुराई मत सुनना। डाकू की बुराई सुनना है तो सुना लो लेकिन मैं किसी साधु की बुराई नहीं सुनूंगा। बेटे को बाप में दोष नहीं देखने है क्योकि वो बाप है। तुम्हे धोखा देने की आदत है, बस जो मेरे पूज्य पुरुष है, उनको धोखा नहीं दूँगा, मैं माँ-बाप, पूज्य पुरुषों को धोखा नहीं दूँगा।</p>
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		<title>व्यक्ति को समझ में नहीं आता कि सही क्या है और गलत क्याः अपने को समझना कठिन नहीं है, दूसरे को समझाना ज्यादा कठिन है-निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी </title>
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		<pubDate>Tue, 11 Mar 2025 15:54:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अच्छे लोगों का स्वभाव पेचीदा नहीं होता लेकिन गंदे लोगों का स्वभाव पेचीदा होता है। कभी-कभी गलत भी जरूरी है, संसार के संबंध में जब तार्किक दृष्टि से सोचते है तो सही नजर नहीं आता कि क्या करना चाहिए। परमार्थ की दृष्टि से सोचते हैं तो सीधा सरल रास्ता मिल जाता है। दूसरों के लिए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अच्छे लोगों का स्वभाव पेचीदा नहीं होता लेकिन गंदे लोगों का स्वभाव पेचीदा होता है। कभी-कभी गलत भी जरूरी है, संसार के संबंध में जब तार्किक दृष्टि से सोचते है तो सही नजर नहीं आता कि क्या करना चाहिए। परमार्थ की दृष्टि से सोचते हैं तो सीधा सरल रास्ता मिल जाता है। दूसरों के लिए उपदेश नहीं देना है, अपने लिए उपदेश देना है। यह बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहीं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बहोरीबंद-कटनी की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> अच्छे लोगों का स्वभाव पेचीदा नहीं होता लेकिन गंदे लोगों का स्वभाव पेचीदा होता है। स्वभाव दोनों हैं लेकिन कई बार इतना पेचीदा बना जाता है कि व्यक्ति को समझ में नहीं आता कि सही क्या है और गलत क्या है? कभी-कभी गलत भी जरूरी है, संसार के संबंध में जब तार्किक दृष्टि से सोचते है तो सही नजर नहीं आता कि क्या करना चाहिए। परमार्थ की दृष्टि से सोचते हैं तो सीधा सरल रास्ता मिल जाता है। लोगों ने धर्म के रास्ते को बहुत कठिन बना दिया, परमार्थ का रास्ता बहुत सरल है, पर से हमें अपनी दृष्टि हटाना है और स्व में आना है। अपने को समझना ज्यादा कठिन नहीं है, दूसरे को समझाना ज्यादा कठिन है। हम अपने आप में स्थिर हो जाए, हम जगत की भी चिंता न करें, हमें उपदेश देना नही है, उपदेश हो जाए। दूसरों के लिए उपदेश नहीं देना है, अपने लिए उपदेश देना है।</p>
<p><strong>गुरु पढ़ाते समय विद्यार्थी बन जाये</strong></p>
<p>अनुभव पढ़ते समय होना चाहिए कि मुझे कुछ उपलब्धि हो रही है, मुझे कुछ मिल रहा है, मुझे तत्व दृष्टि आ रही है। पढ़ते समय तो आत्मा की पर्याय बन जाती है लेकिन पढ़ाते समय आत्मा की पर्याय बनाना बहुत कठिन है। गुरु पढ़ाते समय विद्यार्थी बन जाये तो स्वाध्याय चालू हो जाएगा। प्रवचन करते समय बोलने की नहीं, सुनने की अनुभूति होना चाहिए। कोई भी क्रिया पर के लिए नहीं करना, आप किसी को देख रहे है तो कहना मैं स्व को देख रहा हूँ, कंही पर की अनुभूति भी न हो। भगवान के दर्शन करते समय भी हमें भगवान की नहीं, खुद की अनुभूति हो जाये।</p>
<p><strong>जो लिखा है, सो सही लिखा है</strong></p>
<p>एकलव्य इसलिए पास हुआ क्योंकि उसने गुरु पर संदेह नहीं किया और अर्जुन ने गुरु पर संदेह किया। हमारे जीवन में सबसे बडी बात कि थोड़ा सा तर्क वितर्क हुआ, हम शास्त्रों पर संदेह कर लेते है, क्या पता ये सही लिखा है या नहीं, अरे जो लिखा है, सो सही लिखा है। मुझे शास्त्र पर विश्वास नहीं है, मुझे शास्त्र लिखने वाले पर विश्वास है। मुझे जिनेन्द्र देव पर विश्वास है वो कभी झूठ नही बोल सकते। जैसे आप दवाई पर विश्वास करते है या डॉक्टर पर।</p>
<p><strong>मेरा धर्म खोटा नहीं हो सकता </strong></p>
<p>सतयुग में कितना भी दुश्मन हो, शरणागत है तो वह उसको नही मारेगा, चाहे वो मेरा सर्वनाश करने वाला क्यों न हो। आज सिद्धियां खत्म क्यों हो गई, वही गंधोदक है, वही भगवान है लेकिन हमारे मन मे कीड़ा है हम दो मिनिट में अपने धर्म से डिग सकते है। ऐसा श्रद्धान हो कि तुम सामने कुछ भी दिखाओ, क्या फर्क पड़ता है। किसी ने कहा कि इसने जैनधर्म माना ये नरक जा रहा है। ठीक है, जाने दो लेकिन मेरा धर्म खोटा नहीं हो सकता। नरक जावे तो जावे लेकिन जैनधर्म झूठा नहीं हो सकता, ये नरक का कारण नहीं हो सकता, ऐसी श्रद्धा जब आती है तो उसमें निःशंकित अंग आता है, उसमें होता है चमत्कार।</p>
<p><strong>कलयुग में भगवान को भी भक्तों पर संदेह हो रहा</strong></p>
<p>एक विनाश करने आया और एक कहता है कि विनाश होगा ही नहीं, मेरा पति मेरा नाश नहीं कर सकता, उसी विश्वास ने नाग का हार बना दिया। आज तो हम भाई-भाई पर संदेह कर रहे है, पत्नी-पति पर संदेह कर रही है और तो और माँ-बेटे पर व बेटा-माँ पर संदेह कर रहा है। आज कलयुग में भगवान को भी भक्तों पर संदेह हो रहा है कि ये भगत सही है या नहीं।</p>
<p><strong>भगवान मुझे भूखा भी रखेगा तो मैं भूखा रहूँगा</strong></p>
<p>एक बार किसी कसाई से कहा क्यों काटते हो तुम जानवरों को, उसने कहा कि आपके जैनी तो पैसे वाले होते है, हम गरीब है मैंने उससे कहा कि यदि जैनधर्म तुम्हे अच्छा लगता है, जैनी पैसे वाले होते है तो तुम जैनी क्यों नहीं बन जाते? वो कहता है कि महाराज वो तो नहीं बनूँगा, मैं भगवान को इतना मानता हूँ कि यदि भगवान मुझे भूखा भी रखेगा तो मैं भूखा रहूँगा और मुझे खुशी है कि भगवान मुझे भूखा रखनें में खुश है, भगवान मुझे रोते देखने में, मुझे गरीब देखने मे खुश है तो उनकी मर्जी में खिलाफ नहीं जाऊँगा, ऐसी होती है श्रद्धा और हम तो दो मिनिट में उलाहना देते मिल जाते है।</p>
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		<title>माता पिता बेटों से कॉम्प्रोमाईज़ कर लेते हैः हम जो चाहेंगे वह होगा, ये है स्वयंभू बनने का लक्षण-निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/what_we_want_will_happen_this_is_the_sign_of_becoming_swayambhu_niryapak_munipungav_shri_sudhasagarji_maharaj/</link>
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		<pubDate>Fri, 07 Mar 2025 07:40:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान ने जो देखा है वही होगा, समय से जो होना होगा वही होगा। दूर हो जाने से रिश्ते टूट जाते हैं ऐसा कोई नियम नहीं है और पास रहने से रिश्ते बने रहते हैं ये भी कोई नियम नहीं। यह बात अपने प्रवचन में निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने बहोरीबंद में कहीं। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान ने जो देखा है वही होगा, समय से जो होना होगा वही होगा। दूर हो जाने से रिश्ते टूट जाते हैं ऐसा कोई नियम नहीं है और पास रहने से रिश्ते बने रहते हैं ये भी कोई नियम नहीं। यह बात अपने प्रवचन में निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने बहोरीबंद में कहीं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कटनी से राजीव सिंघई की यह पूरी खबर&#8230;  </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> दो चीज कभी अपनी जिंदगी में मत लाना-मेरी किस्मत में जो लिखा है वही होगा, भगवान ने जो देखा है वही होगा, समय से जो होना होगा वही होगा ये तीनों चीजे जिसके दिमाग में शुरुआत में नहीं आती है वह जिस रास्ते पर चल देगा उसी रास्ते पर मंजिल पहुंच जाएगा। क्योंकि उसने अपनी जिंदगी में कुछ ऐसा करने का मन बनाया है जहाँ लकीरों को भी बदलना पड़ेगा। दूर हो जाने से रिश्ते टूट जाते हैं ऐसा कोई नियम नहीं है और पास रहने से रिश्ते बने रहते हैं ये भी कोई नियम नहीं। यह बात अपने प्रवचन में निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने बहोरीबंद में कहीं।</p>
<p><strong>स्व को तंत्र बनाना है, उसी को बोलते है स्वयम्भू </strong></p>
<p>हम जो चाहेंगे वह होगा, ये है स्वयंभू बनने का लक्षण है लेकिन ये स्वछंद नहीं, ये स्वतंत्र होना है। अपने आप को ही जो साधन बना लेता है वह कहलाता है। स्वतंत्र और स्वच्छंद कहलाता है। जो अपने आपको एक ऐसी धारा में बहा लेता है। जो रास्ते ही नहीं बनते, जो स्व व पर अहितकारी है, मनमाना है, हमे स्वतंत्र होना है, स्व को तंत्र बनाना है, उसी को बोलते है स्वयम्भू। हे भगवन! आप सारे जगत के सहारे थे लेकिन आपने किसी का सहारा नहीं लिया, अपने सारे जगत पर करुणा की पर आपकों किसी की करुणा की जरूरत नहीं पड़ी, कैसे ये शक्ति आ जाती है, कैसे बन जाते है ये स्वयंभू आत्मा-हमें सबसे पहली बात याद रखना है कि हमारी जिंदगी कितनी मूल्यवान है?</p>
<p><strong>तुम क्या हो यह अनुभव से बताओ </strong></p>
<p>सुधा सागरजी महाराज आगे कहते हैं-तुम क्या हो यह अनुभव करके बताओ, तुम मनुष्य हो तो मनुष्य का कोर्स पढ़ो, मनुष्य क्या-क्या कर सकता है? मैं संकल्प करता हूँ कि जो मेरे अनुभव में आया है, उसके जो अधिकार कर्तव्य होंगे मैं मरने के पहले वो सारे करूँगा जो मनुष्य कर सकता है क्योकि मैं मनुष्य हूँ। ये बात मैं शास्त्रों से नहीं, अनुभव से बोल रहा हूँ। ऐसे कितने बेटे हैं जिन्होंने अपनी माँ-बाप से अपनी इच्छाएं कभी पूरी नहीं कराई, रो-धोकर, धमकी देकर तक पूरी कराई।</p>
<p><strong>माता पिता बेटों से कॉम्प्रोमाईज़ कर लेते है </strong></p>
<p>99 प्रतिशत माता-पिता बेटों से कॉम्प्रोमाईज़ कर लेते है, यदि ये बात नहीं मानी तो मैं मर जाऊँगा। बस उन बेटों से इतना कहना चाहूंगा कि बड़े होने के बाद ये अधिकार अपने माँ-बाप को भी दे दो। आज भी ऐसे बच्चे हैं जो कहते हैं कि मैं शादी करने को तैयार हूँ लेकिन मेरा धर्म, मेरे महाराज नहीं छूटना चाहिए, मैं माँ बाप की अनुमति के बिना शादी नहीं कर सकता, उनको दुःखी नहीं कर सकता, ऐसा भाव तुम्हें आ गया तो समझ लेना चाहिए तुम्हारी होनहार बहुत अच्छी है लेकिन ऐसे लोग बहुत कम है जो माँ-बाप की इच्छा के लिए जीते हो, माँ बाप के लिए कमाते हो।</p>
<p><strong>जो तुम्हारा अहित कर रहा उसका हित चाहना महानता है </strong></p>
<p>क्या कभी यह भाव नहीं आता कि मम्मी-पापा की आदत दान देने की है, उन्होंने दान देना बंद कर दिया है तो मैं मम्मी -पापा के लिए कमा रहा हूँ क्योंकि वह जिस तरीके से अपने समय में जिंदगी जिए हैं, हमारे समय में भी वही ठाठ से जिंदगी जिएंगे, जैसे वह अपने समय में दान देने के लिए किसी से पूछते नहीं थे, आज भी उन्हें किसी से पूछने की जरूरत नहीं है। जो तुम्हारी पूजा कर रहा है, तुम्हारा हित कर रहा है, तुम्हारा सहयोग कर रहा है, उसके प्रति तुम्हारी वफादारी है ये कोई महानता नहीं है लेकिन जो तुम्हारा अहित कर रहा है, तुम्हे दुख दे रहा है उसके बावजूद भी आप उसका हित चाह रहे हो, ये है महानता। दुख के दिनों में हंसना और सुख के दिनों में सीरियस रहना, जाओ यही साधु की पहचान है, यही सबसे बड़ी साधना है।</p>
<p><strong>पुराण पढो, बेटे के क्या-क्या कर्तव्य है</strong></p>
<p>तुम्हें अनुभव में है कि मैं किसी का बेटा हूँ तो बेटा पुराण पढो, बेटे के क्या-क्या कर्तव्य होते है, उन कर्तव्यों को मैं करूँगा, जाओ तुम स्वयम्भू बनना शुरू हो जाओगे। यदि तुम्हे ये अनुभूति आये कि मैं बाप हूँ तो एक अच्छे पिता के क्या क्या कर्तव्य है उन्हे मैं पूरा करूँगा। ऐसी तरह ये अनुभूति अपने हर सम्बन्ध में लगा लेना।</p>
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		<title>आपका परिवार या गुरु निर्णय नहीं कर पा रहे है तो इंतजार करो, प्रकृति निर्णय करेगी- निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराजः वचन ही नहीं, मन भी सत्य होता है  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/when_you_your_family_or_your_guru_are_unable_to_decide_on_any_task_then_wait_nature_will_decide_niryapak_munipugav_shri_sudhasagarji_maharaj/</link>
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		<pubDate>Fri, 21 Feb 2025 14:22:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मेरे जीवन मे यह कार्य हो पायेगा या नहीं? जो निर्णय कर चुके है कि हो ही नही पायेगा, मैं पास हो ही नहीं सकता, उनके लिए तो कोई उपदेश होता नहीं क्योंकि वो तो निर्णय कर चुके है कि ये तो मेरे से होना ही नहीं, वे तो जिंदा होकर भी मरे हुए के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मेरे जीवन मे यह कार्य हो पायेगा या नहीं? जो निर्णय कर चुके है कि हो ही नही पायेगा, मैं पास हो ही नहीं सकता, उनके लिए तो कोई उपदेश होता नहीं क्योंकि वो तो निर्णय कर चुके है कि ये तो मेरे से होना ही नहीं, वे तो जिंदा होकर भी मरे हुए के समान है। आज यह बात अपने प्रवचन में निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधा सागरजी महाराज ने कहीं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए से राजीव सिंघई की कटनी की यह पूरी खबर&#8230;  </span></strong></p>
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<p><strong>कटनी।</strong> जब व्यक्ति किसी चीज को जानना चाहता है और जान नही पाता, चलना चाहता है और चल नहीं पाता, देखना चाहता है देख नही पाता। पहुँचना चाहता है, पहुँच नहीं पाता, आकाश को छूना चाहता है लेकिन छू नहीं पाता, उस समय प्रयास करने वाले जीव को, वह प्रयास जो उसकों अपनी जिंदगी में संभव नही दिख रहा है, डर या संदेह लग रहा है कि मैं यह कार्य कर पाऊँगा या नहीं, मेरे जीवन मे यह कार्य हो पायेगा या नहीं? जो निर्णय कर चुके है कि हो ही नही पायेगा, मैं पास हो ही नहीं सकता, उनके लिए तो कोई उपदेश होता नहीं क्योंकि वो तो निर्णय कर चुके है कि ये तो मेरे से होना ही नहीं, वे तो जिंदा होकर भी मरे हुए के समान है।</p>
<p><strong>आवाज उठे तो तुम्हारे लिए किसी की जरूरत नहीं </strong></p>
<p>उपदेश दो व्यक्तियों के लिए है- एक जिनका हौसला बुलंद है कि मैं यह कार्य कर लूँगा, मैं निर्णय देता हूँ यह कार्य मैं कर लूँगा, ये मंजिल पा लूँगा, ऐसी कभी अंदर आवाज उठे तो तुम्हारे लिए किसी की जरूरत नहीं है। चल पड़ो, तुम्हारी आत्मा ने निर्णय ले लिया है, मैं इस कार्य को करने में समर्थ हूँ, चल पड़ो, किसी का इंतजार मत करो। तुम्हारी आत्मा ने गवाह दे दी कि तुम इस कार्य को करोगें। बीच का दूसरा व्यक्ति बचता है जिसके मन मे विकल्प आ रहा है कि चल पाऊँगा या नहीं, यदि किसी ने टोक दिया कि तुम्हारे तो बाए हाथ का खेल है, समझना अब तुम्हारे लिए सपोर्ट मिल गया। तुम कितने समर्थवान व्यक्ति हो, जिस पर तुम्हे ही विश्वास नहीं, तुम्हारे ऊपर परिवार को, समाज को और जबरजस्त पुण्य है तो गुरु को भी विश्वास है।</p>
<p><strong>निर्णय नहीं कर पा रहे है तो कुदरत निर्णय करेगी</strong></p>
<p>यदि मन मे संदेह आ रहा हो थोड़ा तो गुरु महाराज से पूछो कि क्या मैं इस कार्य को कर लूँगा, गुरु कहे डाउट दिख रहा है, परिवार कहे डाउट दिख रहा है, आत्मा से पूछो तो आत्मा कहे कि डर तो लग रहा है, बस अब आप रुक जाइये क्योंकि आप, परिवार, गुरु निर्णय नहीं कर पा रहे है तो कुदरत निर्णय करेगी। थोड़ा इंतजार करो, प्रकृति तुम्हारे लिए कोई न कोई संकेत जरूर देगी, जिसकों बोलते है शगुन, अपशगुन। कोई न कोई शरीर मे स्फुरण करेगी, कही न कंही से संकेत मिलेगा, जब संदेह होगा बस उस संदेह को देखकर तुम निश्चिंत हो जाना कि यह काम होगा या नहीं।</p>
<p><strong>वचन ही नहीं, मन भी सत्य होता है </strong></p>
<p>वचन ही नहीं, मन भी सत्य होता है, बोलते समय यह भाव आ गया कि मेरी आत्मा बोल रही है कि मैं जो बोल रहा हूँ यह पूर्णतः सही है, यदि तुम्हारी अंदर चेतना से आवाज है तो आपके मुख से झूठ भी निकला है तो वह सही होगा ही होगा। सत्य है या असत्य यह नहीं पूछा जा रहा है, तुमने क्या बोला है? वास्तु का सूत्र है कि किसी भी वस्तु को देखकर, किसी का वचन सुनकर, किसी भूमि पर खड़े होकर, फर्स्ट एंड फर्स्ट कैसा लग रहा है, सामने वाले को देखते ही तुम्हारे मन मे क्या भाव आया, अच्छा-बुरा जो भाव आया उसकों पकड़ लेना वही निकलेगा।</p>
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		<title>जिसको धोख दी जाती है उसे कभी धोखा मत देना,यह बर्बादी का कारण बनता है-मुनिपुंगव श्री सुधासागरजीः अज्ञानी बनकर स्वाध्याय करो  </title>
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		<pubDate>Thu, 13 Feb 2025 12:00:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हमारी अच्छी जिंदगी में जो कुछ भी बुरा है जो कुछ भी बुराइयां है, बुरा क्षेत्र है, बुरा काल है, बुरी संगति ये सब मेरे सीमित ही नहीं, नष्ट हो जाये, ये भावनाएं जो व्यक्ति भाता है, उसकी होनहार नियम से भली होगी, किसी ज्योतिषाचार्य से पूछने की जरूरत नही, तुम्हारा भविष्य बहुत अच्छा होने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हमारी अच्छी जिंदगी में जो कुछ भी बुरा है जो कुछ भी बुराइयां है, बुरा क्षेत्र है, बुरा काल है, बुरी संगति ये सब मेरे सीमित ही नहीं, नष्ट हो जाये, ये भावनाएं जो व्यक्ति भाता है, उसकी होनहार नियम से भली होगी, किसी ज्योतिषाचार्य से पूछने की जरूरत नही, तुम्हारा भविष्य बहुत अच्छा होने वाला है। कभी जो तुम्हारे पूज्य हो, आदर्श हो, जिनके कभी चरण छुए हो उनके सामने कभी झूठ मत बोलना और असत्य को कभी सत्य मत कहना। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने यहां धर्मसभा में प्रवचनों के माध्यम से जीवन के रहस्यों को समझाया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कटनी से राजीव सिंघई की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कटनी</strong>। हमारे अच्छे कार्य, हमारी अच्छी जिंदगी, हमारा अच्छा क्षेत्र, हमारा अच्छा काल, अच्छी संगति, अच्छे भगवान, अच्छे गुरु जो कुछ भी अच्छा है, वह हमारी जिंदगी में असीम हो जाए। जो कुछ भी बुरा है जो कुछ भी बुराइयां है, बुरा क्षेत्र है, बुरा काल है, बुरी संगति ये सब मेरे सीमित ही नहीं, नष्ट हो जाये, ये दो भावनाएं जो व्यक्ति भाता है, उसकी होनहार नियम से भली होगी, किसी ज्योतिषाचार्य से पूछने की जरूरत नही, तुम्हारा भविष्य बहुत अच्छा होने वाला है नियम से। आप कभी गुरु या माँ बाप से चलाकर के झूठ बोले हो, गलत को सही सिद्ध करने का प्रयास किया हो अपने पूज्य, आदर्श, अपने उपकारी के सामने, जो तुम्हारे लिए जीता हो, सब कुछ तुम्हारे लिए करता हो, यदि कभी तुमने झूठ को सत्य सिद्ध करने का प्रयास किया तो अपने आप को अपराधी घोषित कर दीजिए। कभी जो तुम्हारे पूज्य हो, आदर्श हो, जिनके कभी चरण छुए हो उनके सामने कभी झूठ मत बोलना और असत्य को कभी सत्य मत कहना। इतना भी कर लिया तो तुम कितनी ही बड़ी गलती कर लोगे, वो गलती तुम्हारी माफ हो जाएगी और सजा से तुम बच जाओगे।</p>
<p><strong>जहाँ रास्ता सीधा, वहां गुरु की जरूरत नहीं </strong></p>
<p>जिसको धोख दी जाती है उसको कभी धोखा मत देना, यह बर्बादी का कारण बनता है। जहाँ रास्ता सीधा हो, वहां गुरु की जरूरत नहीं है, गुरु की जरूरत उस चौराहे पर पड़ती है, यहां चारों तरफ रास्ते जा रहे हैं और हमें सही रास्ते का ज्ञान नहीं है, वहीं तो गुरु चाहिए। सहज भाव से देखो, देखना बुरा नहीं है, ताकना बुरा है। ताकने में गृद्धता है, ताकने में पाप है, ताकने में वासना है, देखना तो आत्मा का स्वभाव है। सहज दृष्टि आ जाये- सहज कानों में शब्द आ रहे हैं, सहज बोलना, प्री प्लानिंग नहीं। दिन भी प्री प्लानिंग में नही, सहजता में निकल जाए। किसी ने प्रशंसा या निंदा कर दी सहज भाव। सहजता पूर्वक तुम अपनी आत्मा को देखना, आत्मा कभी झूठ नहीं बोलती, वह तो इतनी सहज-सरल है, जिस दिन आत्मा इतनी सहज, सरल बन जाएगी, उसी दिन तुम संसार के सबसे बड़े धर्मात्मा बन जाओगे और तुम्हारी आत्मा को सत्स्वरूप का दर्शन होगा।</p>
<p><strong>हमारे दोष हमारे दर्पण में झलके </strong></p>
<p>सहज भाव एक ऐसा दर्पण है जिसमें अपने सारे दोष भगवान को दिखे या न दिखे, स्वयं को जरूर दिखने लगे जायेंगे। भगवान को हमारे दोष नहीं दिखते, वो तो देखते ही नहीं है, उनको मतलब भी नहीं है, हमारे दोष हमारे दर्पण में झलके। भगवान के ज्ञान में हमारे गुण-दोष नहीं झलकना है, हमारी आत्मा हमारा दर्पण बन जाये और हम खुद देखें कि मेरे में दोष क्या है और वो आएगा सहज भाव में।</p>
<p><strong>भगवान को केवल ज्ञान होता है </strong></p>
<p>भगवान को केवल ज्ञान होता है तो सारी दुनिया झलकती है और आत्मा को ज्ञान होता है तो स्वयं के दोष झलकते है, गुण नहीं। सम्यकदृष्टि को कभी ज्ञान में गुण देखने में नहीं आते और जो-जो आत्मा के गुण देखने में आ रहे हैं, उनको सम्यकदर्शन हुआ ही नहीं। अपनी खुद की बुराई खुद में दिखने लग जाए तो समझना तुम सम्यकदृष्टि हो, भव्य हो और सहज वैराग्य तुममें जाग गया है।</p>
<p><strong>गुरु का काम दोषों से बचाना </strong></p>
<p>जिस दिन तुम्हें अपने दोष दिखने लग जाए, उस दिन तुम गुरु के पास जाना, गुरु महाराज मुझे अपने दोष नजर आने लगे हैं, अब इन दोषों से बचाओ। गुरु का काम दोष निकालना नहीं है, दोषों से बचाना है। मैं पापी हूँ, ऐसी अनुभूति हो तो गुरु को खोज लेना, गुरु वो स्नान ग्रह है जब तक गंदगी की अनुभूति न हो, स्नान ग्रह में जाने से क्या फायदा है?</p>
<p><strong>अज्ञानी बनकर स्वाध्याय करो </strong></p>
<p>गुरु तो स्नान करायेंगे, गुरु तो पाप धुलायेंगे। ज्ञानियों के लिए शास्त्र नहीं लिखे गए है, तुम ज्ञानी बनाकर स्वाध्याय करोगे तो कभी स्वाध्याय का आनंद नहीं आएगा, अज्ञानी बनकर स्वाध्याय करो। गुरु के पास कभी ज्ञानी बनकर मत जाना, आपको प्रवचन समझ नही आएगा, अपने को दोषी मानकर गुरु के पास जाना तो तुम फ्रेश होकर लौटोगे।</p>
<p><strong>छोटों के दोष को सही मत कह देना </strong></p>
<p>माँ बाप, गार्जियन से मेरा कहना है-अपनी गलती छुपाने के लिए कभी अपने से छोटों के दोष को सही मत कह देना, यह तुम्हारी बर्बादी का कारण बनेगा। यदि आप हो गार्जियन हो, सौ बार मेरी निंदा हो तो हो, गलत को गलत कहूंगा वह कहेगा तुम भी तो करते हो, कहना-मैं पापी हूँ तो हूँ, तू क्यों पापी बन रहा है, ये है अच्छे बाप का लक्षण।</p>
<p><strong>मेरा संबंध जिनेंद्र देव से </strong></p>
<p>तुम असफल हुये हो, तुम असमर्थ हो, तुम किसी कार्य को करने के लायक नहीं, हर कार्य में तुम फेल हुए हो तो ऐसे व्यक्ति को खोजो जो सफल हो गया हो, जिसका ज्ञान, जिसका विचार, जिसकी दृष्टि शुद्ध हो, जिसकी वाणी निर्दाेष हो और जो कभी हमसे संबंध नहीं बनाएगा और हम उससे सम्बंध बनाकर गर्व से कहेंगे कि मेरा संबंध जिनेंद्र देव से है।</p>
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