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	<title>Niryapak Munipugav Shri Sudhasagar Ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>Niryapak Munipugav Shri Sudhasagar Ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मंदिर में मोबाइल लेकर जाने से बचे तो ही फायदा: मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने सृष्टि, दृष्टि और भक्ति की महत्ता बताई </title>
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		<pubDate>Wed, 30 Apr 2025 06:33:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने मंगलवार को धर्मसभा में समाजजनों को सृष्टि, दृष्टि और भक्ति का महत्व बताया। धर्म के विभिन्न स्वरूपों का ज्ञान भी कराया। मानसिक शक्ति को संयमित रखने का भान भी कराया। मुनिश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में समाजजन पहुंच रहे हैं। गोसलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने मंगलवार को धर्मसभा में समाजजनों को सृष्टि, दृष्टि और भक्ति का महत्व बताया। धर्म के विभिन्न स्वरूपों का ज्ञान भी कराया। मानसिक शक्ति को संयमित रखने का भान भी कराया। मुनिश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में समाजजन पहुंच रहे हैं। <span style="color: #ff0000">गोसलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>गोसलपुर मप्र</strong>। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सृष्टि अनेकांतमयी है और अनेकांत में प्रत्येक धर्म का भिन्न-भिन्न स्वरूप है, परस्पर में विरोध है। एक गुण दूसरे गुण का किंचित मात्र भी कार्य नहीं करता। भिन्न-भिन्न स्वभाव वाले हैं और जब भिन्न-भिन्न स्वभाव हो तो फिर दोनों में एकरूपता लाना बहुत कठिन हो जाता है और एकरूपता लाने से सृष्टि की व्यवस्था बिगड़ जाएगी क्योंकि, सृष्टि में नाना प्रकार के मोह हैं और एक द्रव्य का भी एक कार्य नहीं है, जितने कार्य है, उतने कारण हैं। कार्य जो हैं परस्पर विरोधी कार्य हैं। अपनी जिंदगी में भी हमें सुबह से शाम तक कितने विरोधी कार्य करने पड़ते हैं। हमें सोना भी है और जागना भी है, जब हम खुद अपनी इच्छाओं में एकरूपता नहीं दे पा रहे हैं तो दुनिया को एकरूप करने का प्रयास कैसे कर सकते हैं, ये है तत्वचिंतन और इसी तत्वचिंतन से हम जैन धर्म के अनेकांत धर्म को समझेंगे।</p>
<p><strong>भगवान कहते हैं कि कषायों को छोड़</strong></p>
<p>समंतभद्र स्वामी कहते हैं कि दुनिया के विरोध की अपेक्षा तू स्वयं को देख, तेरी इच्छाएं परस्पर में कितनी विरुद्ध है। तेरी चाहत देख, एक क्षण में कुछ चाहता है, एक क्षण में बिल्कुल उल्टा चाहता है। जब तेरी इच्छाएं विरोध में हैं तो दुनिया के विरोध को क्यों विरोध मान रहा है। दुनिया को क्यों कह रहा है कि ये मित्र है और ये दुश्मन है। हमारी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए ही सारी दुनिया में विरोध हुआ, यदि हमारी इच्छाये एक समान हो जाए। भाई-भाई की इच्छाएं नहीं मिल रही है, यहां तक की भगवान व भक्त की एकता नही हो रही। भगवान कहते हैं कि कषायों को छोड़ और संसारी प्राणी कहता है कि मैं जब क्रोध करूं तो उसमें सफल हो जाऊं।</p>
<p><strong>दूसरों को मारने का भाव करना भी पाप है</strong></p>
<p>जैनदर्शन का जितना निकटवर्ती फॉलोअर होगा। उसको उतना ही कहा कि तुम्हें किसी जीव को मारने का भाव नहीं करना तो वह मुझे मार देगा तो मर जाओ। जितना बड़ा साधु, जैनी होता जाता है उतने ही उसके बचने के उपाय खत्म कर दिए, यहां तक कि मंत्र तंत्र का निषेध कर दिया। विश्व का एक दर्शन है जो कहता है कि मरने में कोई पाप नहीं है, लेकिन दूसरों को मारने का भाव करना भी पाप है। एक में मारना पड़ेगा, एक में मरना पड़ेगा तो साधु से कह दिया मर जाओ लेकिन मारने का भाव नहीं करना। तुम्हें कोई कितना ही कष्ट देवे, तुम उसे कष्ट देने का भाव नहीं करना, अपन भगवान के अनुसार ही नहीं चल पा रहे हैं, कहो मैं किसी के अनुसार नहीं चलूंगा आप जो कहोगे नहीं करूंगा, बस जिस दिन अपनी संकल्प कर लेंगे उसे दिन भगवान की जरूरत नहीं पड़ेगी, हम खुद भगवान बन जाएंगे।</p>
<p><strong>तुम आंख बंद करके उस भगवान को याद कर लेना</strong></p>
<p>भक्ति का अर्थ मात्र जय-जयकार बोलना या पूजा पाठ नहीं है, है तो मात्र साधन है। वास्तविक भक्ति का अर्थ होता है कि जिसकी जय बोल रहे हो उसके अनुसार चलना, जिसको मैं चाहता हूँ, जिसकी मैं भक्ति करता हूं, उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई भी कार्य नहीं करूंगा, चाहे मुझे मिटना पड़े तो मिट जाऊंगा, बस भगवान की सिद्धि हो जाएगी। भगवान के मंदिर में मात्र तुम्हे इतना कहना है निःसहि-3, कर लीजिए संकल्प कि भगवान जब तक मैं मंदिर के अंदर आ गया हूँ, जब तक मेरी पूजा नहीं होगी, जब तक मैं मंदिर की पूरी विधि नहीं कर लूंगा, मैं कोई भी राग द्वेष मोह कषाय आदि भाव नहीं रखूंगा, तेरे और मेरे अलावा इस मंदिर में जब तक हूं, कोई नहीं रहेगा। कोई रिश्तेदार, परिवार, माँ बाप नहीं, कुछ नहीं, तू और मैं बस और किसी को नही पहचानता। 6 महीने ये प्रयोग करके लीजिए देख, गारंटी से कह रहा हूं कि तुम्हें भगवान इतना सिद्ध हो जाएगा कि तुम जंगल में भी हो, जहां तुम्हें कोई बचाने वाला नहीं है, तुम आंख बंद करके उस भगवान को याद कर लेना, भगवान आकाश से विमान भेज करके तुझे बचा लेगा। जब आप भगवान के दर्शन, वंदना या पूजा करने के उद्देश्य से गए है, चाहे आप 5 मिनिट के लिए या घण्टे भर के लिए उस समय में मंदिर के अंदर राग द्वेष नहीं करूँगा, चाहे मेरा परम दुश्मन आ जाये या मेरा परम हितेषी आ जाये।</p>
<p><strong>मंदिर के अंदर, हम कानों से बुरा नहीं सुनेंगे</strong></p>
<p>यदि आपने मंदिर में मोबाइल स्विच ऑफ नहीं किया तो आपके मंदिर जाने से कोई फायदा नहीं, ये है तुम्हारे सिद्धि में, भक्ति में, चमत्कार में बाधक। साइलेंट कर दो बाद में जाकर सुन लेना। मंदिर के अंदर आपके मोबाइल की घंटी नहीं बजाना चाहिए। वाइब्रेशन पर भी नहीं रखना, आपको मालूम ही नहीं चलना चाहिए, मात्र मंदिर के अंदर, हम कानों से बुरा नहीं सुनेंगे। कोई भी आये मैं नहीं बोलूंगा क्योंकि इस समय मैं मंदिर में गया हूँ, मन वचन काया से। इतना बलिदान करो तो तुम्हे पूजा सिद्ध हो जाएगी। मंदिर के अंदर तो कम से कम भगवान के, मंदिर के अनुसार चलो।</p>
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		<title>दुनिया जले तो जले, स्व विकास न छोड़ें : मुनिश्री सुधासागर जी के धर्मोपदेश का पुण्य अर्जन कर रहे श्रद्धालु  </title>
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		<pubDate>Mon, 28 Apr 2025 07:15:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों मप्र के गोसलपुर में प्रवचन कर रहे हैं। यहां पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने मुनि भक्तों, श्रद्धालुओं को जीवन की अनेकों रहस्यपूर्ण बातों से अवगत करवाया। गोसलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; गोसलपुर (मप्र)। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि दुनिया [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों मप्र के गोसलपुर में प्रवचन कर रहे हैं। यहां पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने मुनि भक्तों, श्रद्धालुओं को जीवन की अनेकों रहस्यपूर्ण बातों से अवगत करवाया। <span style="color: #ff0000">गोसलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>गोसलपुर (मप्र)।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि दुनिया में किसी भी चीज को नकारो मत, उसे सापेक्ष करके स्वीकार करो। कोई चीज तुम्हारे लिए बुरी लग रही है थोड़ा सोचो, वही चीज किसी को अच्छी भी लग रही है। विरोधी को समाप्त करने की चेष्टा मत करो, उसके विरोधी गुण को नष्ट मत करो। गाली दी है दुश्मन ने, उसका मुँह बंद मत कराओ, हो सके तो उसको गाली देने की ताकत और बढ़ाओ, थोड़ा और चढ़ाओ। ये विरोध खत्म हो जाये, नहीं सोचना क्योंकि, सृष्टि का स्वरूप है परस्पर विरोधी तत्वों से एक वस्तु बनती है, यही अनेकांत है। जल व अग्नि परस्पर विरोधी है, हमें इन दोनों का आनंद लेना है क्योंकि, हमारे लिए दोनों काम के है। अग्नि व जल कभी दोनों को एक मत करना अन्यथा तुम्हारी खुद की बर्बादी हो जाएगी। अनेकांत दृष्टि तुम्हारे लिए बहुत कल्याणकारी है, भावना भाओ कि संसार मे हर व्यक्ति, हर गुण परस्पर में विरोधी बने रहें। यदि आम नीम सब एक हो जाये तो? फिर तुम्हारे भोजन में मजा क्या आएगा। ये सृष्टि जो अच्छी लग रही है सब विरोधी तत्वों से अच्छी लग रही है।</p>
<p><strong>मुनि, अरिहंत, सिद्ध बनने में सुख है</strong></p>
<p>परस्पर विरोधी इस संसार का चिंतन करो, जितना भेद कर सको, असाधारण लक्षण बनाओ हर चीज का, सामान्य नहीं। इतने समताभावी मत बनो, सामान्य लक्षण से सृष्टि नहीं चलेगी, सामान्य लक्षण से सुख नहीं मिलेगा। जीव बनने में सुख नहीं है, मुनि, अरिहंत, सिद्ध बनने में सुख है। जो दूसरे से मैच न करे, उसे बोलते है असाधारण लक्षण। दूध में घी आज तक कोई दिखा नहीं पाया लेकिन जब भी घी निकला तो दूध से निकला। इसी तरह विज्ञान कहता है कि शरीर में आत्मा है ही नहीं और योगीजन अपनी साधना करके इसी आत्मा का आनंद ले रहे है। आँखांे से मत देखो सूक्ष्म पदार्थाें को, आँखों से देखोगे तो तुम कहोगे, शरीर आत्मा एक है, दूध में घी नाम की कोई चीज नहीं और सामने घी आया तो कहां से आया। महावीर स्वामी समझाते हैं कि तुम असाधारण बनो, कुछ नया प्रोडक्शन करो, नहीं तो तुम भेड़ के बच्चे बनकर रह जाओगे।</p>
<p><strong>&#8230;तेरे में ज्ञान दर्शन पाया जाएगा</strong></p>
<p>छह द्रव्यों में तुम स्वयं को जीव द्रव्य कहोगे तो बाकी पाँच द्रव्य तुम्हारे विरोधी हो जाएंगे। अरे 5 विरोधी जो जायंे तो हो जाने दो, हमारी कुछ नई पहचान होनी चाहिए कि मैं अलग हूँ। दुनिया में अपनी पहचान बनाना है तो विरोधी तैयार करो, जितने विरोधी होंगे, तुम उतने ही ज्यादा चमकोगे। जब 6 द्रव्यों में लक्षण खोजा जाएगा तो तेरे में ज्ञान दर्शन पाया जाएगा तो तू चैतन्य नाम से जाना जाएगा, ये जड़ नाम से जाने जायेंगे, तेरी कीमत बढ़ जाएगी। ईष्या करने वालों को तो हम मिटा नहीं पायेंगे, बस तुमसे कह सकते है कि तुम ऐसा काम मत करना जिससे दूसरों को ईष्या हो, यदि ये सूत्र लेकर चलोगे तो तुम कभी विकास नही कर पाओगे। सौ बार दुनिया जले तो जले, मुझे तो पढ़ाई करना है। दुनिया जले तो जले अपने विकास को मत छोड़ना। तुम मकान बनाओगे तो झोपडी वाले जलेंगे, तुम धन कमाओगे तो गरीब जलेंगे, नीति कहती है कि दुनिया जले तो जले यदि हम अपना विकास कर सकते हैं तो हमें विकास करना चाहिए।</p>
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		<title>घर से बाहर जाते, भोजन और सोते समय कभी कलह न करें : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी के प्रवचनों में धर्म और कर्म की शिक्षा </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/teachings_of_religion_and_karma_in_the_discourses_of_niryapak_munipugav_shri_sudhasagar_ji/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Apr 2025 09:54:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागरजी के शुक्रवार को धर्मसभा में प्रवचन हुए। इसमें उन्होंने धर्म, कर्म और कर्तव्यों की सीख दी। मुनिश्री के प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु, मुनि भक्त और समाजजन जुट रहे हैं। बहोरीबंद से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; बहोरीबंद। मुनिश्री सुधासागरजी महाराज ने शुक्रवार को अपने प्रवचन में धर्म [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनिश्री सुधासागरजी के शुक्रवार को धर्मसभा में प्रवचन हुए। इसमें उन्होंने धर्म, कर्म और कर्तव्यों की सीख दी। मुनिश्री के प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु, मुनि भक्त और समाजजन जुट रहे हैं। <span style="color: #ff0000">बहोरीबंद से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद।</strong> मुनिश्री सुधासागरजी महाराज ने शुक्रवार को अपने प्रवचन में धर्म और कर्म की शिक्षा देते हुए श्रावकों को जैन और जीवन दर्शन से परिचित कराया। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि जितना लोग दुनिया को बुरा कहते हैं। ये दुनिया उतनी बुरी नहीं है, जितने दुख व्यक्ति संसार में मानता है, उतने दुख संसार में है नहीं। सृष्टि बुरी नहीं है, हमारी दृष्टि बुरी है। अपन संसार पर आरोप लगा देते हैं, संसार बुरा नहीं है, अपनी नियत बुरी है। उसी दुनिया को ज्ञानी व्यक्ति देखता है लेकिन, उसकी नियत खराब नहीं होती। एक ही वस्तु को अनेक लोग देखते हैं, वह सबके लिए नुकसानदायक नहीं होती। जैन दर्शन इतना व्यापक है कि सबको समाहित कर लेता है, बस फर्क है कि इसकी आचार संहिता बहुत कठिन है। विश्व में एक मात्र जैन दर्शन ऐसा है जो हर व्यक्ति को बराबर अधिकार देता है। हर व्यक्ति भगवान बनने की शक्ति रखता है। जैन धर्म कोई जाति नहीं थी, आज जाति बन गई।</p>
<p><strong>सबका एक ही धर्म, एक ही मंदिर था</strong></p>
<p>पहले सभी वर्ण के लोग जैन धर्म मानते थे। वर्ण व्यवस्था थी, ये कर्म के आधीन थी। ये तो आजीविका कमाने का साधन है। धर्म सबका एक था ऋषभदेव के समय। एक भगवान, एक गुरु, एक मंत्र थे। सब एक थे, बस कोई शिल्प का काम करता था तो कोई व्यापार, कोई पंडिताई, कोई क्षत्रियता का। इसलिए सभी जातियां एक दूसरे में संबंध बनाती थी, कोई भी छुआछूत की बीमारी नहीं थी। तुम्हारा मामा शुद्र हो सकता है। तुम्हारा दादा क्षत्रिय हो सकता है, तुम्हारा फूफा वैश्य हो सकता है, तुम्हारी फूफी ब्राह्मण हो सकती है, कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि, ये सब वर्ण व्यवस्थाएं जो थी, मात्र रोजी रोटी कमाने के तरीके थे। इनसे जीवन का कोई संबंध नहीं था, किसी तरीके से कमाओ सबका एक ही धर्म, एक ही मंदिर था।</p>
<p><strong>जैन धर्म था और धर्म सूर्य के समान होता है</strong></p>
<p>ऋषभदेव के समय इंटर कास्ट था ही नहीं, सब एक ही कास्ट के थे। धर्म एक थे, गुरु एक थे, कुछ भेद था ही नहीं। संतान क्रम से वर्णों की व्यवस्थायें नही थी, आजीविका, व्यापार को लेकर वर्ण व्यवस्था थी, आज जो व्यवस्थाएं हैं वो जाति बन गयी है और दुर्भाग्य तो सबसे बड़ा ये है कि जातियों ने भी धर्म को बांट दिया। जैन का जैन धर्म, मुसलमान का मुस्लिम धर्म, इसाई का क्रिश्चियन धर्म। जब जाति संतानकृत, कुलकृत हो गई तो लोगों ने धर्म बांट लिया। ऋषभदेव ने जैन धर्म को व्यापक बताया था कि जैन धर्म जो सच्चा धर्म है वो किसी जाति का या व्यक्ति का नहीं होता, वो प्रत्येक वस्तु का होता है, इसलिए जैन धर्म नाम की कोई जाति थी नहीं, शास्त्रों में उल्लेख नहीं मिला। जैन जाति नहीं, जैन धर्म था और धर्म सूर्य के समान होता है, जैसे सूर्य सबकों एक सामान प्रकाश बांटता है। इसी प्रकार जैनधर्म की आचार संहिता जो बनाई, पहले सबके आचार-विचार एक थे, इसलिए उन्होंने कह दिया, णमो लोए सव्वसाहूणं लेकिन, आज साधुओं के खोटे वेश हो गए। साधु खोटे हो गए और साधु में साधुता खत्म हो गई तो फिर कहना पड़ा कि वे ही सारे साधु वंदनीय हैं जो इस प्रकार की आचार संहिता का पालन करते हैं।</p>
<p><strong>जैन में भी मुनि बनें, आज इज्जत और बढ़ गई</strong></p>
<p>निगोद नीयत से मिलता है और दो इंद्रियपना कर्म से मिलता है। जो इज्जत है, शान है, वो नियतवाद में नहीं है, हमने प्रयास किया हम दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय बनें, इन सबको गौण करते हुए हम मनुष्य बनें, ये प्रकृति की देन नहीं, हमारा प्रोडक्शन है। मनुष्य में भी जैन बनें, ये प्रोडक्शन है तुम्हारा, जैन में भी मुनि बनें, आज इज्जत और बढ़ गई। गुजारो मत महानुभाव, हमारा दिन निकल न जाये, हमारा दिन कुछ खुशहाली देकर निकले।</p>
<p><strong>उससे कहो- चिंता मत करना घर में मैं हूं</strong></p>
<p>परिवार वालों से कहना है। तीन समय कभी कलह मत करना, जब व्यक्ति भोजन कर रहा हो। उस समय कोई कलह वाली बात मत सुनाना लेकिन, पत्नी उसी समय सुनाती है, ये पत्नी नहीं है, पूर्वजन्म की बैरन है। दुश्मन भी जिस समय भोजन के लिए बैठा है, उस समय कोई कलह, दुश्मनी नहीं। भोजन करते समय किसी को ऐसी बात मत सुनाना जिससे वो डर जाए, क्लेश हो जाए। जिंदगी में खाते समय जो नारी या पुरुष कलह करते हैं, जाओ एक दिन तुम्हारी जिंदगी में ऐसा आ जाएगा कि तुम एक दाना भी नही खा पाओगे या ऐसी बीमारी आ जाएगी या ऐसी गरीबी आ जाएगी। कितना भी दुश्मन क्यों न हो, हम भोजन करते समय राग-द्वेष की बातें नहीं करेंगे। दूसरी कलह मत करना जब कोई तुम्हारे घर से बाहर निकल रहा हो, चौखट के बाहर कदम रख रहा हो। उस समय अच्छे से, हंसी खुशी, तिलक लगाकर भेजो। उससे कहो- चिंता मत करना घर में मैं हूं और जाने वालों से कह रहा हूं, घर से बाहर कभी संक्लेश या क्रोध करके मत जाना, हंसते हुए बाहर कदम रखना। तीसरा जिस समय व्यक्ति सोने के लिए तैयार हो रहा है। बस संक्लेश करके मत सोना और परिवार वाले भी किसी को संक्लेशित करके मत सुलाएं। बेटे को रोते हुए, थप्पड़ मारकर मत सुलाना, लोरी गाते हुए सुलाना। कितना दुश्मन क्यों न हो यदि वह सो रहा है तो कलह मत करना।</p>
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