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	<title>Munishri Viloksagarji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Munishri Viloksagarji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मुनिश्री विलोकसागरजी का 11 को होगा सिहोनिया में मंगल आगमन : मुनिराज अतिशयकारी भगवान शांतिनाथजी, कुंथनाथजी, अरहनाथजी के दर्शन करेंगे </title>
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		<pubDate>Sun, 09 Nov 2025 13:24:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन मुनिराजों का जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र सिहोनिया में 11 नवंबर को प्रातः भव्य मंगल आगमन होने जा रहा है। आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज, आचार्यश्री आर्जवसागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का मंगल विहार 10 नवंबर को दोपहर पोरसा से होगा। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन मुनिराजों का जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र सिहोनिया में 11 नवंबर को प्रातः भव्य मंगल आगमन होने जा रहा है। आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज, आचार्यश्री आर्जवसागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का मंगल विहार 10 नवंबर को दोपहर पोरसा से होगा। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> दिगंबर जैन मुनिराजों का जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र सिहोनिया में 11 नवंबर को प्रातः भव्य मंगल आगमन होने जा रहा है। आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज, आचार्यश्री आर्जवसागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का मंगल विहार 10 नवंबर को दोपहर पोरसा से मुरैना की ओर होगा। युगल मुनिराज जैन तीर्थ सिहोनियाजी की वंदना करते हुए मुरैना की ओर पद विहार करेंगे। युगल मुनिराजों का 31 अक्टूबर को पोरसा मंगल आगमन हुआ था। उनके पावन सान्निध्य में 8 दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ और काफी धर्म प्रभावना हुई। मुनिराज सोमवार 10 नवंबर को आहारचर्या एवं सामायिक के बाद दोपहर को पोरसा से जैन तीर्थ सिहोनिया के लिए मंगल विहार करेंगे। रात्रि विश्राम ग्राम मानपुर में होने की संभावना है। श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र सिहोनिया में युगल मुनिराजों का मंगलवार 11 नवंबर को प्रातः कालीन बेला में भव्य मंगल आगमन होगा।</p>
<p>बताया जाता है कि युगल मुनिराज प्रथमवार भू-गर्भ से प्राप्त अतिशयकारी भगवान शांतिनाथजी, कुंथनाथजी एवं अरहनाथजी के दर्शन करेंगे। मंगलवार को आहारचर्या सिहोनिया जी में ही होगी। दोपहर को सामयिक के पश्चात पुनः मुरैना की ओर विहार होगा। रात्रि विश्राम ग्राम मिरघान में कोठी पर होने की संभावना है। बुधवार 12 नवंबर की आहारचर्या चौहान साहब के मकान पर ग्राम खेरा में एवं रात्रि विश्राम मुड़ियाखेड़ा/बड़ोखर के आसपास होने की संभावना है।</p>
<p><strong>मुरैना में 13 नवंबर को प्रातः होगा मंगल प्रवेश</strong></p>
<p>मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का 13 नवंबर को प्रातः मुरैना नगर में भव्य मंगल प्रवेश होगा। मुनिश्री के सान्निध्य में पुण्यार्जक परिवार कैलाशचंद राकेशकुमार जैन के सौजन्य से मुरैना के श्री पार्श्वनाथ बड़ा जैन मंदिर में 8 दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान 14 से 21 नवंबर तक होने जा रहा है। इस अनुष्ठान को सान्निध्य प्रदान करने के लिए युगल मुनिराजों का पुनः मुरैना आगमन हो रहा है।</p>
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		<title>स्वयं के बांधे कर्मों का फल स्वयं को ही भोगना है: मुनिश्री विलोकसागर जी ने कथनी-करनी में भेद समझाया  </title>
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		<pubDate>Wed, 20 Aug 2025 11:56:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। मुरैना से पढ़िए मनोज जैन की , [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए मनोज जैन की , यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। दुनिया में छह द्रव्य जीव पुदगल धर्म अधर्म आकाश और काल के बारे में समझाते हुए कहा कि जीव और पुदगल का संयोग जब होता है तब कर्म बंध होता है। शेष चार द्रव्य धर्म, अधर्म, आकाश और काल तो अपने आप में रहते हैं। जो भी कर्म बंध होता है वह जीव और पुदगल के संयोग से ही होता है। जो भी शुभ अशुभ फल होता है, जो भी बंध होता है वह हमारे स्वयं के द्वारा ही होता है। जब हम कूलर या एसी की हवा खाते हैं तो उसका बिल किसे भरना पड़ेगा, हमें ही तो भरना पड़ेगा, हमें ही तो चुकाना पड़ेगा।</p>
<p><strong>भेद विज्ञान को समझ लेंगे, तब हमारे वस्त्र स्वयं ही छूट जाएंगे</strong></p>
<p>इसी प्रकार हम जिस प्रकार की सांसारिक क्रियाओं में लिप्त रहते हैं तो उनके द्वारा बांधे गए कर्माें का फल हमको ही भोगना पड़ेगा। कोई दूसरा हमारा अच्छा या बुरा नहीं कर सकता। यदि हम अधर्म के कामों में, पाप कर्मों में लिप्त रहेंगे तो परमात्मा भी हमारे दुःखों को हमारे कष्टों को दूर नहीं कर सकता। हमें स्वयं को इसके लिए पुरुषार्थ करना होगा, हमें ही जागृत होना पड़ेगा। जब हम जागृत हो जाएंगे, भेद विज्ञान को समझ लेंगे, तब हमारे वस्त्र स्वयं ही छूट जाएंगे। हम स्वयं ही संसार से विरक्त हो जाएंगे। वस्त्र उतारे नहीं जाते, स्वयं ही उतर जाते हैं। त्याग विरक्ति तो अंतरंग से आती है। जब सच्चाई का ज्ञान हो जाता है, जब स्व और पर का भेद समझ आ जाता है, तब मन संसार से विरक्त होकर जीव मोक्ष मार्गी हो जाता है।</p>
<p><strong>जैन दर्शन में कर्मों के बंधन से मुक्त होना ही मुख्य लक्ष्य</strong></p>
<p>जैन धर्म में, जीव और पुद्गल दो अलग-अलग द्रव्य हैं जो इस ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं। जीव चेतन तत्व है, जबकि पुद्गल जड़ (निर्जीव) पदार्थ है। जीव को आत्मा भी कहा जाता है, जो शाश्वत और चेतन तत्व है। यह सुख-दुःख का अनुभव करता है और कर्मों के बंधन में बंधा होता है। जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराना है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो सके। पुद्गल जड़ (निर्जीव) पदार्थ है, जो विभिन्न रूपों में मौजूद है। यह दिखाई देने वाला, स्पर्श करने योग्य और परिवर्तनशील है। पुद्गल में वर्ण (रंग), गंध (गंध), रस (स्वाद) और स्पर्श (स्पर्श) गुण होते हैं। शरीर, मन, वचन और सांसें सभी पुद्गल से बनी हैं। जैन धर्म में, पुद्गल को कर्मों के रूप में भी माना जाता है जो आत्मा के साथ बंधते हैं।</p>
<p><strong>जैन दर्शन में जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त होना ही मुख्य ध्येय</strong></p>
<p>जैन धर्म के अनुसार, जीव और पुद्गल अनादि काल से एक दूसरे से बंधे हुए हैं। जीव पुद्गल के साथ मिलकर संसार में जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहता है। जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराने के लिए, उसे पुद्गल से अलग होना होगा, यानी कर्मों से छुटकारा पाना होगा। पुद्गल से मुक्ति पाने के लिए, जीव को सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चारित्र का पालन करना होता है। जैन धर्म में जीव और पुद्गल दो अलग-अलग तत्व हैं, लेकिन वे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराने के लिए, उसे पुद्गल से अलग होना होगा, जो जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य है।</p>
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		<title>व्यसन करने वाला धार्मिक अनुष्ठान करने का पात्र नहीं : मुनिश्री विलोकसागर’जी ने व्यसनों को त्यागने का दिया उपदेश </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Jul 2025 09:54:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[व्यसन करने वाले को सभी जगह हेय दृष्टि से देखा जाता है, ऐसा व्यक्ति सर्वत्र निंदा का पात्र बनता है। यह उद्गार मुनि श्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। व्यसनों में लिप्त सांसारिक प्राणी धार्मिक अनुष्ठान, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>व्यसन करने वाले को सभी जगह हेय दृष्टि से देखा जाता है, ऐसा व्यक्ति सर्वत्र निंदा का पात्र बनता है। यह उद्गार मुनि श्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> व्यसनों में लिप्त सांसारिक प्राणी धार्मिक अनुष्ठान, पूजा, पाठ आदि करने की पात्रता नहीं रखता है। व्यसनी व्यक्ति श्री जिनेंद्र प्रभु का स्पर्श तक नहीं कर सकता, पूजा पाठ अभिषेक तो बहुत दूर की बात है। व्यसन करने वाले को सभी जगह हेय दृष्टि से देखा जाता है, ऐसा व्यक्ति सर्वत्र निंदा का पात्र बनता है। यह उद्गार मुनिराजश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होने कहा कि व्यसनी व्यक्ति देश धर्म समाज एवं परिवार पर बोझ होता है। वह सदैव अपने आप को एवं अपने परिवार को दुखी करता है, संकट में डालता है। व्यसनों से मुक्त रहना जैन धर्म के पालन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुनिश्री ने बताया कि जैन धर्म के सिद्धांतों का पालन करते हुए व्यक्ति अपने जीवन को शुद्ध, पवित्र और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बना सकता है। व्यसनों से दूर रहकर ही हम आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।</p>
<p><strong>यसनी व्यक्ति कभी भी संयम की साधना नहीं कर सकता </strong></p>
<p>जैन सिद्धांत हमें सिखाता है कि सभी के लिए खासकर एक सच्चे जैन अनुयायी के लिए व्यसनों का त्याग अनिवार्य है, जो उसे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ बनाता है। जैन दर्शन में मांसाहार, मद्यपान, जुआ, चोरी, पर स्त्री सेवन, शिकार और वेश्यागमन सात व्यसन बताए गए हैं। ये सभी कर्मों को बढ़ाने वाले और आत्मा को दुःख देने वाले माने जाते हैं। इन सात व्यसनों को जैन धर्म में महापाप माना जाता है और इनसे दूर रहने की शिक्षा दी जाती है। इन व्यसनों का त्याग करके ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। व्यसनी व्यक्ति कभी भी संयम की साधना नहीं कर सकता। जैन धर्म में इन सात व्यसनों का त्याग अनिवार्य माना गया है, क्योंकि ये व्यक्ति के आत्मिक उत्थान में बाधा उत्पन्न करते हैं। इन सप्त व्यसनों का त्याग करने वाला श्रावक ही मुनिराजों को आहार आदि दान देने के योग्य है, सप्त-व्यसनी नहीं।</p>
<p><strong>मुनिश्री विबोधसागर ने सैकड़ों श्रावकों को कराया व्यसन मुक्त</strong></p>
<p>मुनिराजश्री विवोधसागरजी महाराज नित्य ही अपने पास आने वाले भक्तों को व्यसनों के त्याग की शिक्षा देते हैं। वे आने वाले भक्तों को तब तक नहीं छोड़ते जब तक कि वो धूम्रपान, गुटका आदि का त्याग नहीं कर देता। पूज्य मुनिश्री ने अभी तक सैकड़ों लोगों को व्यसन मुक्त किया है। गुरुदेव ने अभी हाल ही में सारगर्भित उद्वोधन देकर पदमचंद जैन, मुकेश जैन, वीरेंद्र जैन, मनोज जैन सहित अनेकों बंधुओं को गुटका और धूम्रपान की लत से छुटकारा दिलाया। मुनिश्री विबोध सागर महाराज का कहना है कि व्यसनी व्यक्ति समाज व परिवार के लिए एक कलंक के समान है। व्यसनी व्यक्ति को अपने लिए न सही लेकि, अपने बीबी और बच्चों की खातिर व्यसनों को त्याग देना चाहिए। आप धर्म की बात मत करिए, किन्तु अपने स्वास्थ्य की खातिर, अपने शरीर के लिए इन सबका त्याग कर देना चाहिए। ऐसा करने से आप स्वयं स्वस्थ और खुशहाल तो होंगेही आपका परिवार भी प्रसन्नचित रहेगा। व्यसनों में लिप्त व्यक्ति अक्सर अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर नियंत्रण खो देता है, जिससे वह दूसरों के प्रति हिंसक या असंवेदनशील हो सकता है। इस प्रकार, व्यसन अहिंसा के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन करते हैं।</p>
<p><strong>’व्यसन आत्मा की शुद्धि में बाधक होते हैं’</strong></p>
<p>व्यसन किसी भी प्रकार की बुरी आदत या नशा होता है जो व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। इनमें धूम्रपान, गुटका, शराब, मादक पदार्थों का सेवन, जुआ खेलना आदि शामिल हैं। ये व्यसन व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति को कम करते हैं और उसे नैतिक और आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनाते हैं। जैन धर्म में व्यसनों को गंभीर पाप माना गया है। जैन श्रावकों के लिए व्यसनों का त्याग आवश्यक है, क्योंकि ये आत्मा की शुद्धि में बाधक होते हैं। जैन धर्म के अनुसार, किसी भी प्रकार का व्यसन अहिंसा के सिद्धांत का उल्लंघन है। शराब पीने या मादक पदार्थों का सेवन करने से व्यक्ति विवेक शून्य हो जाता है, व्यसन व्यक्ति को हिंसक बना सकता है और उसके विचारों को दूषित कर सकता है । जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत अहिंसा है, जो केवल शारीरिक हिंसा को ही नहीं, बल्कि मानसिक और वाणी के माध्यम से की जाने वाली हिंसा को भी पाप समझता है।</p>
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		<title>साधु संतों के सानिध्य से विकार होते हैं नष्ट : जैन मंदिर में नित्य होते हैं मुनिराज जारी हैं प्रवचन </title>
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		<pubDate>Thu, 24 Jul 2025 13:48:03 +0000</pubDate>
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<p><strong>वर्षायोग के चार माह धर्म ध्यान, पूजन, तप, स्वाध्याय, भक्ति एवं साधना के लिए सबसे उत्तम समय रहता है। इस समय का सभी श्रावकों को सदुपयोग करना चाहिए। इस अवसर पर यदि साधु संतों का समागम मिल जाएं तो सोने पर सुहागा है। साधु-संतों की महिमा उनके आध्यात्मिक ज्ञान, भक्ति, और प्रेम के संदेश में निहित है। यह प्रबोधन मुनिश्री विलोकसागरजी ने दिए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> वर्षायोग के चार माह धर्म ध्यान, पूजन, तप, स्वाध्याय, भक्ति एवं साधना के लिए सबसे उत्तम समय रहता है। इस समय का सभी श्रावकों को सदुपयोग करना चाहिए। इस अवसर पर यदि साधु संतों का समागम मिल जाएं तो सोने पर सुहागा है। साधु-संतों की महिमा उनके आध्यात्मिक ज्ञान, भक्ति, और प्रेम के संदेश में निहित है। यह उद्गार बड़े जैन मंदिर में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने धर्मसभा में व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि प्रेम के संदेश समाज के लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं, लोगों को धार्मिकता और सद्गुणों की ओर प्रेरित करते हैं। साथ ही अपने आचरण से, अपनी चर्या से, अपने उपदेशों से दूसरों के लिए उदाहरण स्थापित करते हैं। हम जिस प्रकार की संगति में रहते हैं, उसी के अनुसार हमारे विचार और व्यवहार हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम बुरे लोगों के साथ रहते हैं तो उनके अगुण हमारे अंदर प्रवेश कर जाते हैं। जिस प्रकार अग्नि के पास में पानी रखने पर वह गर्म हो जाता है, उसी प्रकार बुरे व्यक्तियों की संगति से उनके अगुण हमारे अंदर आ जाते हैं।</p>
<p><strong>संगति द्वारा व्यक्ति में सद्गुण आते हैं</strong></p>
<p>साधु संतों की संगति से हमारा मन निर्मल रहता है। हमें प्रभु भक्ति की प्रेरणा मिलती है। साधु-संतों के प्रभाव से हमें अच्छे कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त होती है और हमारा मन बुरे कर्म, बुरे विचारों से मुक्त हो जाता है। साधु-संतों की संगति का व्यक्ति के चरित्र पर बहुत बड़ा एवं महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। वह संगति ही है, जो आपके अवगुणों को गुणों में परिवर्तित कर सकती है। संगति द्वारा व्यक्ति में सद्गुण तो आते हैं, किंतु वहीं यदि संगति अच्छी ना हो, तो व्यक्ति के अच्छे गुण भी नष्ट हो सकते हैं। मुनिश्री ने बताया कि बुरी संगति ना केवल हमारे चरित्र, स्वभाव एवं आचरण को खराब करती है, बल्कि समाज में हमारा मान &#8211; सम्मान एवं प्रतिष्ठा भी धूमिल हो जाती है। यही कारण है कि हमारे बड़े, गुरु जन एवं हमारे हितेषी सदैव हमें अच्छे लोगों के साथ रहने की सलाह देते हैं। अच्छी संगति का जीवन में बहुत महत्व है। यह व्यक्ति के विकास, चरित्र निर्माण और सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बुरी संगति से व्यक्ति पतन की ओर जाता है, जबकि अच्छी संगति उसे महान बनाती है।</p>
<p><strong>कुसंगति विनाश की ओर ले जाती है</strong></p>
<p>उत्तम स्वभाव वाले व्यक्ति पर कुसंगति का असर नहीं होता क्योंकि उनका स्वभाव और चरित्र मजबूत होता है। वे अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर अडिग रहते हैं और गलत संगति का प्रभाव उन पर नहीं पड़ता। कुसंगति का मानव जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। यह व्यक्ति को गलत रास्ते पर ले जाती है, उसकी बुद्धि को भ्रष्ट करती है और उसे विनाश की ओर ले जाती है। कुसंगति के कारण व्यक्ति अपने परिवार और समाज से दूर हो जाता है और उसके जीवन में नकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं।</p>
<p><strong>जैन मंदिर में गूंज रहा है महामंत्र णमोकार</strong></p>
<p>नगर के बड़े जैन मंदिर में मुनिराज विलोक सागर एवं मुनिराज विबोध सागर महाराज का आध्यात्मिक वर्षायोग चल रहा है। प्रातः से ही जैन मंदिर में महामंत्र णमोकार की गूंज सुनाई देती है। प्रतिदिन प्रातःकालीन वेला में मुनिश्री विबोध सागर महाराज साधर्मी बंधुओं को योग की साधना कराते हुए योगाभ्यास कराते हैं। युगल मुनिराजों के सानिध्य में श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन होती है। तत्पश्चात मुनिश्री विलोक सागर महाराज जैनागम के सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार एवं रयणसार का स्वाध्याय कराते हुए उसका अर्थ समझाते हैं। दोपहर में पुनः धर्म की कक्षाएं लेते हैं। शाम को शंका समाधान कार्यक्रम होता है। गोधूली वेला में भक्ति एवं आरती के पश्चात शास्त्र सभा में ब्रह्मचारी संजय भैया (झापन तमूरा वाले) दमोह के प्रवचनों से सकल जैन समाज लाभान्वित होती है। प्रतिदिन मुनिश्री के प्रवचन होते हैं।</p>
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		<title>जैन दर्शन का मूल आधार अहिंसा : मुनिश्री विलोकसागरजी दे रहे हैं संयम साधना के संस्कार </title>
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		<pubDate>Thu, 17 Jul 2025 08:08:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विबोध सागर जी महाराज द्वारा कक्षाओं के माध्यम से पूर्व आचार्यो द्वारा रचित ग्रंथों का पठन- पाठन चल रहा है।मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। जैन धर्म का मूल सिद्धांत अहिंसा है। जैन धर्म में अहिंसा को सर्वोपरि माना गया है। वैसे तो सभी धर्मों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विबोध सागर जी महाराज द्वारा कक्षाओं के माध्यम से पूर्व आचार्यो द्वारा रचित ग्रंथों का पठन- पाठन चल रहा है।<span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैन धर्म का मूल सिद्धांत अहिंसा है। जैन धर्म में अहिंसा को सर्वोपरि माना गया है। वैसे तो सभी धर्मों में अहिंसा धर्म को सबसे ऊपर माना जाता है, अहिंसा को ही प्रधानता दी जाती है। अहिंसा का पालन करने से व्यक्ति न केवल अपने जीवन में शांति और सद्भाव प्राप्त करता है, बल्कि दूसरों के जीवन को भी बेहतर बनाने में मदद करता है। अहिंसा का पालन करने से व्यक्ति कर्मों के बंधन से भी मुक्त हो जाता है। अहिंसा परमो धर्म का अर्थ है अहिंसा परम धर्म है। यह जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसका अर्थ है कि किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से कोई हानि नहीं पहुंचानी चाहिए। जैन धर्म में अहिंसा को सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है। इसका अर्थ है कि किसी भी जीवित प्राणी को किसी भी रूप में नुकसान पहुंचाने से बचना, चाहे वह शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक हो। जैन धर्म में अहिंसा का पालन न केवल मनुष्यों के लिए, बल्कि सभी जीवित प्राणियों के लिए भी आवश्यक माना जाता है। यह उद्बोधन मुनिश्री विलोक सागर जी ने बड़े जैन मंदिर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।</p>
<p>मुनिश्री ने अहिंसा धर्म की व्याख्या करते हुए बताया कि जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ बहुत व्यापक है। किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना। मन में किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी नुकसान न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी की हिंसा न करना, यह अहिंसा है। किसी का बुरा सोचना भी हिंसा है, किसी पर अन्याय होते देख कर खुश होना भी हिंसा है, किसी की निंदा-चुगली करना, किसी को धोखा देना, किसी पर कलंक लगाना इत्यादि सब हिंसा की श्रेणी में आता है। सही अर्थों में तो प्राणी मात्र के प्रति संयमपूर्ण व्यवहार अहिंसा है।</p>
<p>जैन दर्शन के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति में भी जीवन है, अतएव पृथ्वी आदि एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा का भी निषेध किया गया है। गृहस्थ पृथ्वी, जल-रूप, वायु-रूप, अग्नि-रूप और वनस्पति-रूप स्थावर जीवों की हिंसा से नहीं बच सकता। अतः उनके लिए एकेन्द्रिय जीवों की कम से कम हिंसा का नियम है।</p>
<p><strong> हिंसा के दो रूप बताये गये हैं </strong></p>
<p>द्रव्य-हिंसा और भाव-हिंसा। किसी के द्वारा किसी जीव की हत्या हो जाना अपने आप में हिंसा नहीं कहलाता, अपितु यदि क्रोध भाव से, मान भाव से, माया भाव से, अथवा लोभ भाव से किसी जीव के प्राणों को नष्ट किया जाता है अथवा उसे कष्ट दिया जाता है तो वह हिंसा कहलायेगा। अन्य शब्दों में क्रोध, मान, माया, लोभ, घृणा, द्वेष आदि दुर्भाव यदि मन में हैं और मारने की दुर्वृत्ति के साथ जीवों को मारा जाए या सताया जाये, तो वहाँ हिंसा होती है। इस प्रकार की हिंसा को भाव-हिंसा कहा गया है।</p>
<p><strong>मुनिराज कक्षाओं के माध्यम से करा रहे स्वाध्याय</strong></p>
<p>आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज, मुनिश्री विबोध सागर जी महाराज श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर, मुरैना में विराजमान हैं। मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विबोध सागर जी महाराज द्वारा कक्षाओं के माध्यम से पूर्व आचार्यो द्वारा रचित ग्रंथों का पठन- पाठन चल रहा है।</p>
<p><strong>कक्षाएं लगने का समय</strong></p>
<p>प्रातः &#8211; 8 से 8:45 बजे तक समयसार</p>
<p>प्रातः- प्रातः 8:45 से 9:30बजे तक रयणसार</p>
<p>दोपहर- 3:45 से 4:30 बजे तक रत्नकरण्ड श्रावकाचार</p>
<p>सांय काल- 6:30 से 7:30 बजे तक स्तोत्र एवं पाठों का पठन।</p>
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		<title>जैन दर्शन में अहिंसा धर्म का पालन ही चातुर्मास है : मुनिराजों ने बड़े जैन मंदिर में किया चातुर्मास प्रतिष्ठापन </title>
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		<pubDate>Wed, 09 Jul 2025 11:20:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विवोधसागरजी महाराज ने श्री जिनेंद्र भगवान के समक्ष भक्ति एवं निर्जल उपवास करते हुए संकल्प पूर्वक चातुर्मास की स्थापना की। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज मुरैना ने श्रीफल अर्पण करके आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान प्रवचन भी हुए। मुरैना से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विवोधसागरजी महाराज ने श्री जिनेंद्र भगवान के समक्ष भक्ति एवं निर्जल उपवास करते हुए संकल्प पूर्वक चातुर्मास की स्थापना की। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज मुरैना ने श्रीफल अर्पण करके आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान प्रवचन भी हुए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> मुरैना।</strong> जैन साधु साध्वियां पंच महाव्रत अहिंसा, सत्य, अचौर्य, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य का मन वचन काय से निर्दाेष रूप से पालन करते हैं। अहिंसा महाव्रत का पूर्ण रूपेण पालन हो, इसीलिए जैन साधु, मुनिराज चातुर्मास करते हैं। बरसात के मौसम में असंख्यात सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते हैं, जो दिखाई भी नहीं देते। इन्हीं जीवों की रक्षार्थ जैन साधु मुनिराज वर्षा ऋतु के चार माह पद विहार न करते हुए एक ही स्थान पर चार माह आत्म साधना करते हैं। स्व कल्याण के साथ साथ प्राणी मात्र के कल्याण हेतु प्रेरित करते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में चातुर्मास प्रतिष्ठापन के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अहिंसा धर्म का पालन करना ही चातुर्मास का मुख्य उद्देश्य होता है। इन चार माह में सभी साधु साध्वियां पूर्वाचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों का स्वाध्याय एवं अध्ययन करते हुए तत्व चिंतन करते हैं। जैन दर्शन में दिगंबर जैन संत संयम की साधना करते हुए कर्मों को नष्ट करने हेतु तप करते हुए भगवान महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को अंगीकार करते हैं। मुनि श्री ने कहा कि आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को श्री जिनेंद्र प्रभु की भक्तियों का वाचन कर कायोत्सर्ग कर चातुर्मास का प्रतिष्ठान किया जाता है और कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को चातुर्मास का निष्ठापन किया जाता है। सभी साधु व्रत उपवास कर सिद्ध भक्ति, आचार्य भक्ति आदि के माध्यम से संकल्पित होकर वर्षाकाल के चार माह एक ही स्थान पर रुककर अपने महाव्रतों का पालन करते हैं।</p>
<p><strong>बड़े जैन मंदिर में मुनिराजों ने किया चातुर्मास प्रतिष्ठापन</strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी संजय भैयाजी (मुरैना वाले) ने बताया कि श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान आचार्य विद्यासागरजी महाराज से दीक्षित आचार्यश्री आर्जव सागर महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विवोधसागरजी महाराज ने श्री जिनेंद्र भगवान के समक्ष भक्ति एवं निर्जल उपवास करते हुए संकल्प पूर्वक चातुर्मास की स्थापना की। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज मुरैना ने श्रीफल अर्पण करके आशीर्वाद प्राप्त किया और संकल्प किया कि हम सभी आपकी साधना में निष्ठा, समर्पण, भक्ति के साथ सहभागी बनेंगे। युगल मुनिराजों ने सबको आशीर्वाद देते हुए कहा साधु अपनी साधना और अहिंसा धर्म का पालन करने के लिए चातुर्मास किया करते हैं। इसमें श्रावक की एक अहम भूमिका रहती है। साधुओं ने तो आपके यहां चातुर्मास करने का संकल्प ले लिया। अब आपका उत्तरदायित्व है कि साधुओं की चर्या में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो, इस हेतु संपूर्ण समाज को एकजुटता के साथ सहभागिता निभाने को दृढ़ संकल्पित होना होगा।</p>
<p><strong>चातुर्मास साधु और श्रावक दोनों के लिए </strong></p>
<p>मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने बताया कि जैन दर्शन में चातुर्मास साधुओं और श्रावकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। यह आत्म-सुधार, धार्मिक गतिविधियों में संलग्नता और आध्यात्मिक विकास, अध्यात्म के प्रति पुरुषार्थ करने का समय होता है । भूलवश, अज्ञानतावश, जाने अनजाने में हमसे जो पाप हुए हैं, उनको नष्ट करने हेतु इन चार माह में प्रभु आराधना का समय होता है चातुर्मास । जैन धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व है, जैन साधु एवं श्रावक वर्षा ऋतु के चार महीनों में तप त्याग संयम की साधना के साथ इसे मनाते है। इस दौरान जैन साधु-साध्वी एक ही स्थान पर रुकते हैं और धार्मिक गतिविधियों जैसे-स्वाध्याय, प्रवचन और तपस्या में संलग्न होते हैं। श्रावक (गृहस्थ जैन) भी इस दौरान विशेष रूप से धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते हैं, उपवास, प्रतिक्रमण और अन्य धार्मिक कार्यों द्वारा आत्म-सुधार का प्रयास करते हैं। श्रावकों के लिए चातुर्मास आत्म-सुधार और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने का एक महत्वपूर्ण समय होता है। इस समय का सभी को सदुपयोग करते हुए लाभ उठाना चाहिए।</p>
<p><strong>विधान में सिद्धों की भक्ति के साथ 1024 अर्घ्य होंगे समर्पित</strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर में चल रहे आठ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान में सातवें दिन सिद्धों की आराधना करते हुए 512 अर्घ्य समर्पित किए गए। जिसमें पंच परमेष्ठी को स्मरण करते हुए पूजा संपन्न हुई एवं पूज्य युगल मुनिराजों के माध्यम से मंत्रोचार किए गए। गुरुवार को आठवें दिन 1024 अर्घ्य समर्पित करते हुए सिद्ध परमेष्ठि की आराधना पूर्ण होगी। शुक्रवार 11 जुलाई को विश्व शांति महायज्ञ का आयोजन होगा। विश्व शांति एवं कल्याण की भावना के साथ महायज्ञ में आहुति दी जाएगी। महायज्ञ के पश्चात श्री जिनेंद्र प्रभु की भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। श्री जिनेंद्र प्रभु को पांडुक शिला पर विराजमान कर कलशाभिषेक किए जाएंगे।</p>
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		<title>धर्म की आराधना से जीवन पवित्र हो जाता है : मुनिश्री विलोकसागरजी ने सिद्धचक्र विधान में धर्म के प्रभाव पर प्रकाश डाला </title>
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		<pubDate>Fri, 09 May 2025 12:58:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बड़े जैन मंदिर में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान 512 अर्घ्य समर्पित किए गए। इस अवसर पर मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि धर्म की आराधना करने से सब कुछ शीतल हो जाता है। मुनिश्री ने कहा कि शास्त्रों और पुराणों में अनेकों घटनाओं से साबित होता है कि धर्म [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बड़े जैन मंदिर में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान 512 अर्घ्य समर्पित किए गए। इस अवसर पर मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि धर्म की आराधना करने से सब कुछ शीतल हो जाता है। मुनिश्री ने कहा कि शास्त्रों और पुराणों में अनेकों घटनाओं से साबित होता है कि धर्म हमें जीवन जीने की कला सिखाता है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> सांसारिक प्राणी धर्म को यहां-वहां ढूंढता फिरता है। वह धर्म को मंदिरों में, पहाड़ों में तलाशता है लेकिन, धर्म कहां है, धर्म तो प्राणी मात्र के अंदर है। प्रत्येक प्राणी के हृदय में धर्म विराजमान हैं। धर्म कोई बाजारू वस्तु नहीं हैं, जिसे बाजार से खरीदा जा सके। धर्म तो अनुभव करने की चीज है। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि धर्म के प्रभाव से जहर भी अमृत बन जाता है। तलवार की धार भी अपनी प्रकृति बदल लेती है, सर्प भी हार का रूप ले लेता है। धर्म की आराधना करने से सब कुछ शीतल हो जाता है। मुनिश्री ने कहा कि शास्त्रों और पुराणों में अनेकों घटनाओं से साबित होता है कि धर्म हमें जीवन जीने की कला सिखाता है।</p>
<p>संसार में रहते हुए भी हम धर्म के बल पर सात्विक जीवन जी सकते हैं। धर्म हमें शक्ति देता है, प्रेरणा देता है, हमें दुखों से छुटकारा दिलाता है। धर्म क्या है, धर्म से क्या मिलता है। धर्म प्राणी मात्र को जीवन जीने की कला सिखाता है। नफरत में वात्सल्य के बीज अंकुरित करता है, आने वाले संकटों से निपटने की शक्ति देता है। धर्म से इंद्रिय सुख भले ही न मिले लेकिन, अतेंद्रीय सुख की प्राप्ति होती है। धर्म सांसारिक प्राणी के दुखों का नाश करता है, धर्म प्राणी मात्र को दुखों से निकालकर सुख की अनुभूति कराता है। जब अपने-अपनों से दूर हो जाएं, प्राणी संकटों ओर विषम परिस्थितियों में घिर जाए, आपका कोई सहारा न हो तब धर्म ही हमें सही रास्ता दिखाता है।</p>
<p><strong>जीने के लिए वायु की तरह धर्म भी आवश्यक है</strong></p>
<p>हमें धर्म की आराधना करते समय अपने इष्ट से यही प्रार्थना करना चाहिए कि हमारी आस्थाएं मजबूत हों। हम पर कैसा भी संकट आ जाए, कैसी भी विपत्ति आ जाए, हम अपने धर्म से दूर न हो जाएं, हे! भगवन हमें ऐसी शक्ति देना। धर्म की आराधना करने से जीवन पावन व पवित्र हो जाता है। जब सभी रास्ते बंद हो जाते है तब केवल धर्म का सहारा ही रह जाता है। भगवान राम ने जब सीताजी का त्याग किया था तब सीताजी ने धर्म का ही सहारा लिया था। जीवन रूपी नैया को पार करने के लिए धर्म परम आवश्यक है। यदि हम 24 घंटों में से कुछ समय धर्म को देंगे तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा। जिस तरह हमें जीवन जीने की लिए वायु की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार संस्कारित जीवन जीने के लिए धर्म भी अतिआवश्यक होता है।</p>
<p><strong>22 मई को होगी ज्ञान परीक्षा, सभी को मिलेगें पुरस्कार</strong></p>
<p>युगल मुनिराजों के पावन सानिध्य में 22 मई को आम लोगों के ज्ञान की परीक्षा ली जाएगी। मुनिश्री ने बताया कि भगवान महावीर स्वामी के व्यक्तित्व और कृतित्व से संबंधित 150 प्रश्नों का एक प्रश्न पत्र सभी को वितरित किया जाएगा। आप सभी उस प्रश्नपत्र को घर ले जाकर परीक्षा की तैयारी कर सकते हैं। इस ज्ञान परीक्षा में किसी भी उम्र का, कोई भी जैन अथवा अजैन व्यक्ति सम्मिलित हो सकता है। 22 मई को बड़े जैन मंदिर के प्रांगण में उसी प्रश्नपत्र के माध्यम से आपकी एक घंटे की परीक्षा होगी। ज्ञान परीक्षा में प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इस ज्ञान परीक्षा को कराने का उद्देश्य आम लोगों को भगवान महावीर स्वामी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से परिचित कराना है।</p>
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