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	<title>Munishree Vinishchay Sagarji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>Munishree Vinishchay Sagarji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मृत्यु आने पर सब यहीं धरा रहता है, जीव अकेला जाता है : मुनिश्री विनिश्चय सागर ने बताया आत्मा का वास्तविक कर्तव्य स्वयं को जानना है </title>
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		<pubDate>Sat, 30 May 2026 09:29:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शरीर के कार्य और संसार की बातें समय के साथ भूल जाती हैं, लेकिन आत्मा का वास्तविक कर्तव्य स्वयं को समझना और अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानना है। मनुष्य को विवेक और समझदारी के साथ जीवन जीना चाहिए। यह प्रेरक उद्बोधन मुनिश्री विनिश्चयसागर जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शरीर के कार्य और संसार की बातें समय के साथ भूल जाती हैं, लेकिन आत्मा का वास्तविक कर्तव्य स्वयं को समझना और अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानना है। मनुष्य को विवेक और समझदारी के साथ जीवन जीना चाहिए। यह प्रेरक उद्बोधन मुनिश्री विनिश्चयसागर जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना/शामली।</strong> शरीर के कार्य और संसार की बातें समय के साथ भूल जाती हैं, लेकिन आत्मा का वास्तविक कर्तव्य स्वयं को समझना और अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानना है। मनुष्य को विवेक और समझदारी के साथ जीवन जीना चाहिए। यह प्रेरक उद्बोधन मुनिश्री विनिश्चयसागर जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि संसार में जीव को आगे बढ़ाने वाले कर्म ही जन्म और मृत्यु के चक्र का कारण बनते हैं। मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि कर्मों के अनुसार एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाने का नाम है। मुनिश्री कहते है कि इसलिए मनुष्य को सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि यह शरीर नश्वर है और एक दिन इसका अंत निश्चित है। यदि मन में यह भावना बनी रहे कि मुझे एक दिन संसार छोड़कर जाना है, तो जीवन की दिशा बदल जाती है। तब व्यक्ति मोह, अहंकार और संग्रह की प्रवृत्ति को कम करता है तथा धर्म, संयम और आत्मकल्याण की ओर अग्रसर होता है।</p>
<p><strong>हम केवल शरीर और भौतिक सुखों तक सीमित न रहें</strong></p>
<p>मुनिश्री कहते है कि मृत्यु का स्मरण भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए है। जो व्यक्ति मृत्यु की निश्चितता को समझ लेता है, वह अपने समय का सदुपयोग करता है, अच्छे कर्म करता है और आत्मा की उन्नति के लिए प्रयासरत रहता है। इसलिए आवश्यक है कि हम केवल शरीर और भौतिक सुखों तक सीमित न रहें, बल्कि आत्मा के कल्याण, सदाचार, धर्म और आध्यात्मिक उन्नति को भी अपने जीवन का लक्ष्य बनाएं। यही जीवन की वास्तविक सफलता है।मनुष्य का अधिकांश जीवन योजनाएँ बनाने में बीत जाता है। वह सोचता रहता है-यह कर लूँगा, वह कर लूँगा, आगे ऐसा करूँगा। इसी प्रकार इच्छाओं और कल्पनाओं का सिलसिला चलता रहता है लेकिन, यह निश्चित नहीं है कि उसे इतना समय मिलेगा भी या नहीं।</p>
<p><strong>यह शरीर, धन और वैभव सब नश्वर हैं</strong></p>
<p>मुनिश्री विनिश्चय सागर जी ने कहा कि संसार में जो कुछ भी हमें अपना दिखाई देता है-धन, संपत्ति, परिवार, पद और प्रतिष्ठा वास्तव में इनमें से कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है। मृत्यु आने पर सब कुछ यहीं रह जाता है और जीव अकेला ही अपने कर्मों के साथ आगे बढ़ता है। मनुष्य बार-बार यह भूल करता है कि जो वस्तुएँ आज उसके पास हैं, वे सदैव उसके साथ रहेंगी। इसी भ्रम के कारण वह मोह और आसक्ति में फँसा रहता है। जबकि सच्चाई यह है कि संसार की कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है। जागरूक व्यक्ति वही है जो बार-बार अपने जीवन पर विचार करता है और स्वयं से पूछता है कि उसका वास्तविक लक्ष्य क्या है। वह समझता है कि यह शरीर, धन और वैभव सब नश्वर हैं, इसलिए इन पर अत्यधिक अहंकार या आसक्ति उचित नहीं है।</p>
<p><strong>सत्य स्वीकारने से आत्मकल्याण की भावना जागृत होने लगती है</strong></p>
<p>जो व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार कर लेता है, उसके जीवन में वैराग्य, विवेक और आत्मकल्याण की भावना जागृत होने लगती है। वह धर्म, सदाचार और आत्मचिंतन को महत्व देता है तथा अपने समय का सदुपयोग करता है। इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि संसार की वस्तुएँ हमेशा हमारे पास रहने वाली नहीं हैं। वास्तविक संपत्ति अच्छे संस्कार, श्रेष्ठ कर्म और आत्मिक उन्नति है, जो जीवन के प्रत्येक चरण में हमारा कल्याण करती है। ’प्रवचन का मुख्य संदेश है जो आज अपना प्रतीत हो रहा है, वह सदा साथ नहीं रहेगा; इसलिए मोह में न फँसकर आत्मकल्याण और सद्कर्मों पर ध्यान देना चाहिए।</p>
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