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	<title>Muni Shri Sudhasagar Maharaj श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : सामने वाला मेरे संबंध में क्या सोच रहा है, ये ज्ञान होना जरूरी है-मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Wed, 02 Apr 2025 18:11:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बताया कि जीवन में केवल यह जानना कि सामने वाला मेरे बारे में क्या सोच रहा है, यह बहुत जरूरी है। यह ज्ञान हमारे जीवन को बेहतर बना सकता है क्योंकि जीवन में यह समझना जरूरी है कि हमारे आस-पास के लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं [&#8230;]]]></description>
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<p>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बताया कि जीवन में केवल यह जानना कि सामने वाला मेरे बारे में क्या सोच रहा है, यह बहुत जरूरी है। यह ज्ञान हमारे जीवन को बेहतर बना सकता है क्योंकि जीवन में यह समझना जरूरी है कि हमारे आस-पास के लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं और हम उनके बारे में क्या सोचते हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></p>
<hr />
<p>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बताया कि जीवन में केवल यह जानना कि सामने वाला मेरे बारे में क्या सोच रहा है, यह बहुत जरूरी है। यह ज्ञान हमारे जीवन को बेहतर बना सकता है क्योंकि जीवन में यह समझना जरूरी है कि हमारे आस-पास के लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं और हम उनके बारे में क्या सोचते हैं।</p>
<p><strong>संसार और जीवन की सीमाएँ</strong></p>
<p>महाराज जी कहते हैं, संसार अपार है, कार्य अपार है, और जीवन सीमित है। हमारे पास समय बहुत कम है, लेकिन भोग सामग्री बहुत अधिक है। इसी तरह, सुनने की क्षमता सीमित है, लेकिन शब्दों की संख्या अनंत है। हमारे पास करने की क्षमता तो बहुत है, परंतु उसे लागू करने की शक्ति कम है। जैसे सैनिकों के पास आदेशों का पालन करने का ज्ञान होता है, उसी प्रकार हमको अपने जीवन में विभिन्न कार्यों को समझने और उसे सही तरीके से पालन करने का ज्ञान होना चाहिए।</p>
<p><strong>ज्ञान का महत्व</strong></p>
<p>महाराज जी ने उदाहरण के रूप में गृहस्थी और परिवार की जिम्मेदारियों का उल्लेख किया। उदाहरण दिया गया कि घर के मुखिया को चॉकलेट के प्रकार, स्त्री कला, और बच्चों की आवश्यकताओं का ज्ञान होना चाहिए। यदि ये ज्ञान नहीं है, तो जीवन में परेशानियाँ आ सकती हैं। इसी तरह, अगर किसी व्यक्ति को अपनी संपत्ति की सुरक्षा करनी है, तो उसे चोरों की कला का ज्ञान होना चाहिए।</p>
<p><strong>समाज और रिश्तों का ज्ञान</strong></p>
<p>महाराज जी ने यह भी बताया कि यदि आप गृहस्थ हैं, तो गृहस्थी के सभी पहलुओं का ज्ञान होना चाहिए, जैसे कि महिलाओं को खुश कैसे रखा जाए, कैसे अपनी संपत्ति की सुरक्षा की जाए, आदि। इसी प्रकार, एक मालिक को अपने नौकरों का भी ज्ञान होना चाहिए, ताकि वे उसे धोखा न दे सकें। यहाँ तक कि भिखारी को भीख देने से पहले उसके बारे में जानना चाहिए, ताकि वह आपको धोखा न दे।</p>
<p><strong>गृहस्थी और साधु का ज्ञान</strong></p>
<p>गृहस्थों को इस संसार की समस्याओं को समझने और उनका समाधान खोजने का ज्ञान होना चाहिए, लेकिन अगर कोई व्यक्ति साधु बनने का संकल्प करता है, तो उसे गृहस्थी के जीवन का सही ज्ञान होना चाहिए। इस ज्ञान से वह अपनी साधना को श्रेष्ठ बना सकता है। महाराज जी ने बताया कि साधुओं को श्रावक के व्यवहार, व्यापार के तौर-तरीके, और साधु जीवन के नैतिक पहलुओं का ज्ञान होना चाहिए ताकि वे अपने पथ से न भटकें।</p>
<p><strong>मौन का महत्व</strong></p>
<p>उन्होंने मौन के महत्व पर भी प्रकाश डाला। यदि बड़े लोग छोटे लोगों को मौन रहने का निर्देश देते हैं, तो यह बहुत महत्वपूर्ण होता है। इससे समझ में आता है कि बड़े लोगों की बातों में कोई विशेष महत्व है। वहीं, अगर छोटे लोग बड़े लोगों को मौन रहने के लिए कहते हैं, तो यह संकेत है कि कुछ गलत होने वाला है।</p>
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		<title>धर्म सभा में दिए प्रवचन :  समयसार का प्रैक्टिकल है पूजा के आठों अंग- मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sun, 22 Dec 2024 07:40:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जो वस्तु जिस रूप में होती है, वह सदा शक्तिहीन को अपने पक्ष में करने का प्रयास करती है। यदि हमारा उपादान कमजोर है, तो निमित्त हमेशा उसे अपने अनुसार चला लेगा। ऐसे में, आत्मा का कल्याण कभी नहीं हो सकता। इसलिए, पूज्य कुन्दकुन्द स्वामी बार-बार कहते हैं कि हमें अपने उपादान को मजबूत बनाना [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जो वस्तु जिस रूप में होती है, वह सदा शक्तिहीन को अपने पक्ष में करने का प्रयास करती है। यदि हमारा उपादान कमजोर है, तो निमित्त हमेशा उसे अपने अनुसार चला लेगा। ऐसे में, आत्मा का कल्याण कभी नहीं हो सकता। इसलिए, पूज्य कुन्दकुन्द स्वामी बार-बार कहते हैं कि हमें अपने उपादान को मजबूत बनाना चाहिए। अगर उपादान कमजोर रहेगा, तो सब कुछ हमारा होने के बावजूद, हमें उसका सही अनुभव नहीं होगा। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की विस्तृत रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> जो वस्तु जिस रूप में होती है, वह सदा शक्तिहीन को अपने पक्ष में करने का प्रयास करती है। यदि हमारा उपादान कमजोर है, तो निमित्त हमेशा उसे अपने अनुसार चला लेगा। ऐसे में, आत्मा का कल्याण कभी नहीं हो सकता। इसलिए, पूज्य कुन्दकुन्द स्वामी बार-बार कहते हैं कि हमें अपने उपादान को मजबूत बनाना चाहिए। अगर उपादान कमजोर रहेगा, तो सब कुछ हमारा होने के बावजूद, हमें उसका सही अनुभव नहीं होगा। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि हमारी जीवन में साधना का उद्देश्य यह होना चाहिए कि हम कभी किसी वस्तु से अपनी नियत खराब न करें, क्योंकि वस्तु हमारी नहीं है। जब वस्तु हमारी नहीं है, तो उस पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। यदि हमें किसी वस्तु को अपने काम की मानने का विचार आता है, तो समझना चाहिए कि हमारा पुण्य क्षय हो रहा है। और यदि हमें उसे पाने का भाव आ गया तो यह और अधिक हानिकारक हो सकता है। हमें भगवान और गुरुओं से यह आशीर्वाद लेना चाहिए कि हमें किसी भी भौतिक पदार्थ की आवश्यकता न पड़े।</p>
<p><strong>व्रत नियम का पालन और छूट की अवधारणा</strong></p>
<p>व्रत और नियम लेते समय यह भाव नहीं रखना चाहिए कि यदि कोई बीमारी या अन्य परेशानी हो तो नियम को छोड़ा जा सकता है। अगर हम मुनिराज की तरह ये शब्द कहें कि हमारे असंख्य गुणी निर्जरा नहीं बन सकती, तो हमें यह स्पष्ट रूप से कहना पड़ेगा कि जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं इन व्रतों का पालन करूंगा। यदि कोई स्थिति बिगड़ जाए तो नियम छोड़ सकते हैं, लेकिन कोई छूट नहीं लेंगे। जब कोई विपत्ति आती है, तब हम प्रायश्चित कर सकते हैं, लेकिन छूट लेने की व्यवस्था नहीं है।</p>
<p><strong>नकारात्मक सोच से बचें</strong></p>
<p>आज का दिन अच्छा है, तो हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि कल भी अच्छा होगा। अगर कल कुछ गलत हो तो हमें उसे स्वीकार करना होगा, बिना किसी उम्मीद के। तंत्रविद्या में यह भी कहा जाता है कि जब कोई यात्रा पर जाता है, तो उससे पहले उसे सकारात्मक आशीर्वाद देना चाहिए। जैसे, &#8220;तुम्हारी यात्रा सफल हो,&#8221; ये शब्द सकारात्मक शक्ति प्रदान करते हैं और यात्रा को शुभ बनाते हैं।</p>
<p><strong>नियम और छूट में अंतर</strong></p>
<p>व्रति और महाव्रति के बीच बड़ा अंतर है। यदि कोई साधु बीमारी के कारण नियम में कोई छूट लेता है, तो वह पंचम गुणस्थानवर्ती भी नहीं रह सकता, जबकि प्रतिमाधारी साधु उसी स्थिति में भी प्रसंशनीय होता है। इसलिए, हमें नियमों में किसी भी प्रकार की छूट नहीं लेनी चाहिए।</p>
<p><strong>भगवान और आत्मा का दर्शन</strong></p>
<p>हमें कभी यह वरदान नहीं मांगना चाहिए कि जो मैं चाहूं वह मेरा हो जाए। भगवान से यह आशीर्वाद लें कि मुझे किसी और पर निर्भर नहीं रहना पड़े। जब हम दूसरों की तरफ देखते हैं, तो यह हमारी कमजोर स्थिति को दर्शाता है। हमें अपने भीतर के वैभव और शक्ति को पहचानना चाहिए, क्योंकि यही असली सुंदरता है।</p>
<p><strong>समयसार का प्रैक्टिकल</strong></p>
<p>समयसार का प्रैक्टिकल पूजा के आठों अंगों में है। यदि यह ध्यान से किया जाए तो जन्म, जरा और मृत्यु के सभी बंधनों का नाश हो सकता है। यह प्रक्रिया उस स्थिति तक पहुंचने का मार्ग है, जहां बुढ़ापा नहीं आता, जैसे देवता और तीर्थंकरों की अवस्था होती है। ऐसे व्यक्ति, जिनमें बुढ़ापे के लक्षण नहीं होते, वे तीर्थंकर होते हैं।</p>
<p><strong>संयम और व्यसन का विरोध</strong></p>
<p>जैनियों में व्यसन कम होने का कारण यह है कि उनके भगवान और गुरु में कोई व्यसन नहीं होते। जैन धर्म में संयम की परंपरा इसलिए है क्योंकि उनके आराध्य किसी भी प्रकार के अब्रह्म से रहित होते हैं।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन :  आचार्य श्री विद्यासागर जी हम शिष्यों व भक्तों के पुण्य से आचार्य बने- मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/acharya_shri_vidyasagar_ji_became_acharya_by_virtue_of_disciples_and_devotees_muni_shri_sudhasagar_ji_maharaj/</link>
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		<pubDate>Mon, 18 Nov 2024 07:16:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महान व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं। एक वह जो अपनी साधना, तपस्या और पुण्य से महान बनते हैं। वे अपनी आत्मिक यात्रा में आगे बढ़ते हैं। दूसरी प्रकार की महान आत्माएं वे होती हैं, जो निमित्त की शक्ति से महान बनती हैं। निमित्त की शक्ति उपादान शक्ति को जाग्रत करती है। निमित्त का अपना [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>महान व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं। एक वह जो अपनी साधना, तपस्या और पुण्य से महान बनते हैं। वे अपनी आत्मिक यात्रा में आगे बढ़ते हैं। दूसरी प्रकार की महान आत्माएं वे होती हैं, जो निमित्त की शक्ति से महान बनती हैं। निमित्त की शक्ति उपादान शक्ति को जाग्रत करती है। निमित्त का अपना इतना बड़ा पुण्य होता है कि वह महान आत्मा की शक्ति को जाग्रत कर देता है, जो शक्ति उस आत्मा में पहले से थी, लेकिन वह स्वयं उसे जागृत नहीं कर पाता। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> महान व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं। एक वह जो अपनी साधना, तपस्या और पुण्य से महान बनते हैं। वे अपनी आत्मिक यात्रा में आगे बढ़ते हैं। दूसरी प्रकार की महान आत्माएं वे होती हैं, जो निमित्त की शक्ति से महान बनती हैं। निमित्त की शक्ति उपादान शक्ति को जाग्रत करती है। निमित्त का अपना इतना बड़ा पुण्य होता है कि वह महान आत्मा की शक्ति को जाग्रत कर देता है, जो शक्ति उस आत्मा में पहले से थी, लेकिन वह स्वयं उसे जागृत नहीं कर पाता। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि जैसे तीर्थंकरों की प्रकृति कभी आत्मकल्याण के भाव से जागृत नहीं होती, वह केवल भव्य जीवों के पुण्य से तीर्थंकर की शक्ति को प्राप्त करती है। वह महावीर स्वामी का पुण्य नहीं होता, बल्कि वह पुण्य भक्तों के पुण्य से उन आत्माओं में बंधता है।</p>
<p><strong>पुण्य और पुरुषार्थ से तपस्या</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि मैंने आचार्य श्री से कहा था कि आपने मुनि बनने के लिए अपने पुण्य और पुरुषार्थ से तपस्या की, लेकिन आचार्य बनने के लिए आप हमारे सभी भक्तों के पुण्य से बने हैं। हमारी भवितव्यता ने एक मुनि महाराज को आचार्य पद पर प्रतिष्ठापित किया। तीर्थंकर और आचार्य पद दोनों ही नैमित्तिक पद होते हैं, जो आत्मकल्याण में कोई सहायक नहीं होते। हम उत्तरभारत के लोगों का इतना पुण्य था कि हमसे दक्षिण में जन्म लेने वाले एक व्यक्ति को उत्तर में आकर आचार्य पद पर प्रतिष्ठित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के मन में सन 1968 तक आचार्य बनने का कोई विचार नहीं था। जब उन्होंने मुनि विद्यासागर का पूरा व्यक्तित्व और ज्ञान देखा, तो उन्होंने मन बना लिया। अच्छे साधुओं को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित करने के लिए समाज और संघ का संकल्प होता है। प्रायः आचार्य पद उन साधुओं को ही दिया जाता है, जो महान होते हैं। पूज्य आचार्य शांतिसागर जी महाराज को उनके दीक्षित शिष्य ही आचार्य बना पाए थे, क्योंकि उस समय कोई स्पष्ट परंपरा नहीं थी। वीरसागर जी की समाधि के बाद शिवसागर जी को और शिवसागर जी की समाधि के बाद धर्मसागर जी को संघ ने आचार्य बनाया क्योंकि उनके आचार्य की आकस्मिक समाधि हो गई थी।</p>
<p><strong>गुरु भक्ति जरूरी</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जब आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज ने सहज रूप से आचार्य पद स्वीकार किया, तो किसी ने पूछा कि आपने तो स्वयं आचार्य पद स्वीकार किया, आप तो जैसे इसके लिए तैयार ही थे। यह तो आपका समय था, लेकिन उन्होंने कहा, &#8220;यह आचार्य पद मैंने अपने लिए नहीं, मुनि विद्यासागर के लिए लिया है।&#8221; पूरी समाज और संसार का लगाव कभी आचार्य बनने के लिए नहीं हो सकता, न ही कोई आचार्य बना सकता है। इसके लिए गुरु भक्ति का ही उपयोग करना पड़ता है। उन्होंने निमित्त से यह जान लिया था कि यदि मुनि विद्यासागर आचार्य बन गए, तो न जाने कितनों का कल्याण होगा।</p>
<p><strong>खुशी का दिन</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि आचार्य ज्ञानसागर जी के मन में यह विचार आया कि यदि मुनि विद्यासागर आचार्य बन गए, तो लोग कहेंगे कि कुन्दकुन्द का जीवंत अवतार हुआ है। कुन्दकुन्द जीवित हो जाएंगे। गुरु आज्ञा का पालन करते हुए, आचार्य श्री के इस समर्पण का लाभ आचार्य ज्ञानसागर महाराज ने लिया और 22 नवम्बर, मगसिर कृष्णा द्वादशी के दिन, जैसे भरत और राम का कार्य हुआ था, वैसे ही आचार्य ज्ञानसागर और मुनि विद्यासागर का कार्य हुआ। यह कोई साधारण शक्ति नहीं थी, जिसने बुंदेलखंड से इतने रत्न निकाले। इतने आर्यिकाएं, इतने मुनि महाराज, और बड़े-बड़े संघ आए, लेकिन बुंदेलखंड की खदान को कोई नहीं खोल पाया। आचार्य श्री का यह खुशी का दिन है, आषाढ़ सुदी पंचमी और आज का दिन है, हम सभी शिष्यों और भक्तों की खुशी का दिन है, क्योंकि आचार्य श्री हमारे पुण्य से आचार्य बने।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : सुबह उठते ही निकम्मे मत बनो, सोचो कुछ जिंदगी में नया करना है- मुनिश्री सुधासागर जी महाराज </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/dont_be_useless_as_soon_as_you_wake_up_in_the_morning_muni_shri_sudhasagar_ji_maharaj/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Nov 2024 05:43:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बगीचा संस्कारों से बनता है, जंगल संस्कारों से नहीं बनते हैं वो प्रकृति से बनते है। हवाएं जो चलती हैं वह प्रकृति से हैं लेकिन ऑक्सीजन जो है वह एक संस्कारित वायु है। सारी पृथ्वी प्रकृति है लेकिन पृथ्वी को उपयोग में लाना चाहे तो उसे संस्कारित करना पड़ता है क्योंकि प्रकृति के द्वारा दी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बगीचा संस्कारों से बनता है, जंगल संस्कारों से नहीं बनते हैं वो प्रकृति से बनते है। हवाएं जो चलती हैं वह प्रकृति से हैं लेकिन ऑक्सीजन जो है वह एक संस्कारित वायु है। सारी पृथ्वी प्रकृति है लेकिन पृथ्वी को उपयोग में लाना चाहे तो उसे संस्कारित करना पड़ता है क्योंकि प्रकृति के द्वारा दी हुई वस्तु हमारे उपयोग में नहीं आ सकती, हमें उसे संस्कारित करना पड़ेगा, उसे बनाना पड़ेगा। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर।</strong> बगीचा संस्कारों से बनता है, जंगल संस्कारों से नहीं बनते हैं वो प्रकृति से बनते है। हवाएं जो चलती हैं वह प्रकृति से हैं लेकिन ऑक्सीजन जो है वह एक संस्कारित वायु है। सारी पृथ्वी प्रकृति है लेकिन पृथ्वी को उपयोग में लाना चाहे तो उसे संस्कारित करना पड़ता है क्योंकि प्रकृति के द्वारा दी हुई वस्तु हमारे उपयोग में नहीं आ सकती, हमें उसे संस्कारित करना पड़ेगा, उसे बनाना पड़ेगा। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि शिलान्यास करने का अर्थ है कि हमने प्रकृति की दी हुई वस्तु को एक संस्कृति में बदल दिया और यदि हम संस्कृति में नहीं बदलेंगे और उस पृथ्वी का उपयोग करेंगे तो पृथ्वी हमें फलदायी नही होगी, सिद्धिकारक नही होगी।</p>
<p><strong>संस्कृति के हवाले हो जाएं</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि हम कर्मभूमि में जी रहे हैं तो कर्मभूमि में प्रकृति कहती है कि जो प्रकृति से प्रदत्त है वे वस्तु तुम्हें ज्यादा लाभ नहीं दे पाएंगी, आपके जीवन में वही फसल काम आएगी जो आपने पहले खेत को बनाया है, फिर बोया है, फिर संस्कारित किया है, वही सभ्य लोगों का भोजन होगा। जंगल में प्राप्त वस्तुएं सभ्य लोगों का भोजन नहीं है। आज कोई भी अनाज बिना उगाये नहीं उग रहा है, निरुपयोगी पेड़ तो है जो जलाने के काम आते है लेकिन खाने वाले फलों के कोई वन नहीं है। ऐसा ही अपना जीवन है, कोई भी जीवन आज पंचमकाल में जन्म से संस्कारित नहीं मिलेगा, जन्म से सम्यकदर्शन नही मिलेगा। जन्म से तो मात्र वो मिलेगा जो हमारे कोई काम का नहीं है। यदि जन्म से ही मिली हुई चीजों को हमने अपने जीवन का आधार बना लिया तो हम कुछ भी नहीं पा पाएंगे। यदि ऐसी जिंदगी हम जीते रहे तो पशु की जिंदगी हो जाएगी जो प्रकृति प्रदत्त जीवन जीते है। ऐसे ही यदि हमें जीवन को उपयोगी बनाना है तो हमें संस्कृति के हवाले करना पड़ेगा और संस्कारित करना पड़ेगा।</p>
<p><strong>अभिषेक पूजन करो</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि हमने जन्म लेते ही स्वयं को इतना अशुद्ध कर लिया कि मां 45 दिन तक बिना दर्शन के खाती रही, पूरे घर को हमने सूतक लगा दिया, पूरे घर को अशुद्ध कर दिया, उस घर में दस दिन तक मुनिराज नहीं जा सकते। जब तीर्थंकर जन्मते हैं तो उनकी मां को सूतक नहीं लगता, कुटुंब को सूतक लगता है, दुनिया के बालक को दाई छूती है और तीर्थंकर बालक को साक्षात इंद्राणी छूती है यानी कितना पावन है वो बालक। बड़े होने के बाद मैं तुम्हें मंदिर इसलिए नहीं भेज रहा हूँ कि तुम्हारा कल्याण हो जाये, मैं इसलिए भेज रहा हूं कम से कम तुम्हारे कारण मां ने 45 दिन तक बिना भगवान के दर्शन पूजन के भोजन किया है, उस पाप को धोने का एक ही तरीका है कि तुम जिंदगी भर भगवान का अभिषेक पूजन करना, उसी से पाप कटेगा। अन्यथा उपकारी को गंदा करना, ये पाप बहुत खतरनाक होता है।</p>
<p><strong>जिंदगी के कई मोड़ हैं</strong></p>
<p>एक भव पहले जिनकी जिंदगी निश्चित हो गई है उनके लिए कोई भी धर्म कर्म की जरूरत नहीं जैसे भोगभूमि के जीव, देवताओं को, नारकियों को। मोक्ष का पुरुषार्थ, ये धर्म की क्रियाओं का उपदेश उन्ही को है जिनका कुछ भी निश्चित नही है एक भव पहले, जैसे मजदूर लोग कमाते है खाते है। हम सम्यकदर्शन किस्मत से लेकर नहीं आए, हमें प्राप्त करना है। भगवान को, गुरु को, शास्त्र को हमें पहचानना है। अब जो कुछ भी है हमें खुद कमाना है और स्वयं की कमाई में इतना आनंद है जितना वसीयत में नही है। किस्मत की कमाई खाने वाला जिंदगी में कभी भी सुखी नहीं हो सकता क्योंकि वह किस्मत के, मां बाप के, भगवान के भरोसे है। अपने उपादान पर विश्वास करके कुछ संस्कार पैदा करो, कुछ बनने का निर्णय करो, जिंदगी निकलने मत दो। हमारा एक दिन निकले, हमारा लक्ष्य लेकर निकले, हमें कुछ उपलब्धि कराकर निकले। सुबह उठते ही निकम्मे मत बनो, कुछ सोचो आज क्या करना है, आज कुछ नया बनना है, नया सोचना है, नया देखना है, जिंदगी में नया करना है। बनी रहने दो किस्मत को कितना ही निकृष्ट, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, फैसला हमारे हाथ में है कि सुबह उठकर करो कि आज कैसी जिंदगी जीना है। जिंदगी के कई मोड़ हैं एक 8 वर्ष के बाद, एक 18 वर्ष के बाद। जब तक तुम अकेले हो तुम्हें खुद फैसला करना है हमें जिंदगी कैसे जीना है, अकेले ही आए थे अकेले ही जाना है तो क्या अकेले रहना चाहोगे, अशुद्धि के साथ आए थे, शुद्ध के साथ जीयेंगे और मरेंगे। असाधारण बनो, साधारण होकर जिंदगी मत जियो, अपनी खुद की एक पहचान होना चाहिए। तुम 6 द्रव्यों में जीव हो तो सबसे बड़ा आदमी है कोई है तो वह है जीव क्योंकि जीव के पास ऐसा असाधारण लक्षण है जो अन्य द्रव्यों में नहीं पाया जाता। आनंद उसमें है जो किसी के पास नहीं है और तुम्हारे पास है। जो व्यक्ति माँ-बाप से जन्म लेकर माँ-बाप को भूल जाते हैं निश्चित समझना वे पूर्व भव में पशु थे या आगे पशु बनेंगे क्योंकि ये तो पशुओं का लक्षण है, माँ बाप से जन्म लिया, दूध पिया, पढ़ाया लिखाया और जब माँ बाप को तुम्हारी जरूरत पड़ी तो तुम अकेले हो गए।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : भगवान को भगवान कहते हुए स्वयं भगवान बनने का भाव करना, यह जैन दर्शन है- मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Wed, 13 Nov 2024 04:42:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सारी दुनिया को जब हम व्यापक दृष्टि से देखते हैं, तो यह दो रूपों में दिखाई देती है—एक प्रकृति के रूप में और दूसरा संस्कृति के रूप में। जब हम प्रकृति की ओर देखते हैं, तो यह केवल अस्तिमान का रूप है। इस सृष्टि की कोई भी वस्तु मिट नहीं सकती। यदि प्रकृति अपना स्वरूप [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सारी दुनिया को जब हम व्यापक दृष्टि से देखते हैं, तो यह दो रूपों में दिखाई देती है—एक प्रकृति के रूप में और दूसरा संस्कृति के रूप में। जब हम प्रकृति की ओर देखते हैं, तो यह केवल अस्तिमान का रूप है। इस सृष्टि की कोई भी वस्तु मिट नहीं सकती। यदि प्रकृति अपना स्वरूप स्थापित नहीं करती, तो यह सृष्टि कई बार नष्ट होकर फिर से उत्पन्न हो चुकी होती। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर।</strong> सारी दुनिया को जब हम व्यापक दृष्टि से देखते हैं, तो यह दो रूपों में दिखाई देती है—एक प्रकृति के रूप में और दूसरा संस्कृति के रूप में। जब हम प्रकृति की ओर देखते हैं, तो यह केवल अस्तिमान का रूप है। इस सृष्टि की कोई भी वस्तु मिट नहीं सकती। यदि प्रकृति अपना स्वरूप स्थापित नहीं करती, तो यह सृष्टि कई बार नष्ट होकर फिर से उत्पन्न हो चुकी होती। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि प्रकृति ने अपने हाथ में अस्ति का स्वरूप लिया, और जो दुनिया में है, वह अस्ति रूप से सदा रहेगा। दूसरी ओर, नास्तिमान की व्यवस्था भी स्थापित की, जिससे कोई भी वस्तु दूसरी को अपने रूप में परिणत नहीं कर सकती। स्व चतुष्टय की अपेक्षा अस्ति और परचतुष्टय की अपेक्षा नास्ति है।</p>
<p><strong>प्रकृति अस्ति और नास्ति दोनों में विद्यमान </strong></p>
<p>प्रकृति अपने आप में उस साधारण शक्ति को व्यक्त करने की क्षमता नहीं रखती, जो अस्ति और नास्ति दोनों में विद्यमान रहती है। प्रकृति ने शक्ति तो भर दी, लेकिन इसे व्यक्त करने का अधिकार उसने अपने हाथ से अलग कर लिया। इसलिए संस्कृति का निर्माण हुआ। कोई भी संस्कृति किसी भी वस्तु में संस्कृति नहीं डाल सकती, लेकिन शक्ति प्रकृति द्वारा प्रदत्त होती है। जितने भी द्रव्य हैं, उनके पास शक्ति न तो कम होती है, न अधिक; यह शक्ति शाश्वत, अविनाशी और त्रैकालिक होती है, जो घटती-बढ़ती नहीं है। जब से प्रकृति है, तब से संस्कृति का निर्माण हुआ। संस्कृति दोनों को मिलाती है—अस्ति और नास्ति को मिलाने की कोशिश करती है। संस्कृति ने कारण और कार्य की व्यवस्था का आविष्कार किया। उदाहरण के लिए, प्रकृति के द्वारा भरा हुआ दीपक घी से भरा हुआ है, वह शक्ति से परिपूर्ण है, लेकिन प्रकृति में उस दीपक को जलाने की क्षमता नहीं है। बाती और दीपक के गुण हैं, लेकिन घी ही वह शक्ति है। संस्कृति का निर्माण हुआ ताकि दीपक को प्रज्ज्वलित किया जा सके। संस्कृति वह मूल्यवान वस्तु है, जो शक्तिमान दीपक को व्यक्त करके संसार के अंधकार को दूर करती है। संस्कृति ने अस्ति और नास्ति को मिलाया और उन्हें एक-दूसरे का पूरक बना दिया।</p>
<p><strong>भारतीय संस्कृति सबसे अलग</strong></p>
<p>जब तक तुम किसी वस्तु से कुछ पाने का भाव रखते हो, समझ लेना तुम संस्कृति तो बना रहे हो, लेकिन यह पाश्चात्य संस्कृति है। जब विश्व की मीटिंग हुई, तो सभी दर्शकों ने बैठकर यह फैसला किया कि क्या ऐसा कोई विचार है जिसे सारे विश्व के लोग मानते हैं। तब सभी ने यह तय किया कि लोग जो कुछ भी करना चाहते हैं, वह अपने स्वार्थ, अपनी इच्छाओं और अपनी जिंदगी की पूर्ति के लिए करते हैं, भले ही वह पर का उपयोग कर रहे हों। जब हम भगवान, गुरु, या शास्त्र को भी अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करते हैं, तो इसे पाश्चात्य संस्कृति कहा जाता है। लेकिन जब भारत की संस्कृति की बात आती है, तो यह किसी से भी मेल नहीं खाती। भारतीय लोग अपनी जिंदगी की आवश्यकताओं को अनिवार्य नहीं, बल्कि मजबूरी मानते हैं। भारतीय संस्कृति का उद्देश्य रोटी, कपड़ा और मकान नहीं है; इसका मूल उद्देश्य परमार्थ है, जो इन्द्रियातीत और अदृश्य को प्राप्त करने की ललक है। यह ललक सिर्फ भारतीय दर्शनों में पाई जाती है, इसलिए दुनिया को दो भागों में बांट दिया गया—पाश्चात्य संस्कृति और भारतीय संस्कृति।</p>
<p><strong>भारत में दो संस्कृतियां</strong></p>
<p>भारत में भी दो संस्कृतियां सक्रिय हैं। एक संस्कृति में परमात्मा को प्राप्त करने के लिए संसार को त्यागने की आवश्यकता है, जिसमें इन्द्रियों के सुख को छोड़ना पड़ता है। रोटी, कपड़ा और मकान से वंचित रहकर भी परमात्मा के दर्शन की इच्छा रखी जाती है। यह संस्कृति ईश्वर कृतित्ववाद की संस्कृति कहलाती है। दूसरी संस्कृति का मानना है कि आत्मा का दर्शन होना चाहिए, परमात्मा का नहीं। जैन धर्म की एक नई विधा सामने आई, जिसने सब कुछ गौण करके कहा, &#8220;मुझे आत्मदृष्टि चाहिए।&#8221; हमे रोटी नहीं, बल्कि क्षुधा और रोग का नाश चाहिए। जहां ईश्वर कृतित्ववाद आता है, वहां व्यक्ति कहता है कि मुझे परमात्मा के दीपक का प्रकाश चाहिए, लेकिन जब आत्म संस्कृति जागृत होती है, तो वह कहती है, &#8220;मुझे परमात्मा के दीपक की संस्कृति चाहिए।&#8221; परमात्मा का दीपक भी जलता रहे और हमारी आत्मा का दीपक भी जल जाए, यही आत्मप्रधान जैनदर्शन है। हमारे समाज में अक्सर देखा जाता है कि अमीर आदमी को देखकर हमें उसे लूटने का भाव आता है, लेकिन अमीर बनने का भाव नहीं आता। अगर हम जितना भगवान से कुछ पाने का भाव रखते हैं, उतना अगर हम भगवान बनने का प्रयास करें, तो शायद हम भगवान बन जाएं। जितना हम अच्छे व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं, उतना अगर हम अच्छा बनने का प्रयास करें, तो हम अच्छे बन सकते हैं। भगवान को भगवान कहना जैन दर्शन नहीं है; भगवान को भगवान कहते हुए स्वयं भगवान बनने का भाव रखना, यही जैन दर्शन है।</p>
<p><strong>शास्त्र भक्ति का वास्तविक अर्थ</strong></p>
<p>सरस्वती की सेवा का वास्तविक अर्थ है सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र का पुद्गल की पर्याय बनना, जैसा कि तत्वार्थ सूत्र में कहा गया है। वह रत्नत्रय हमारी आत्मा की पर्याय बन जाए—यही शास्त्र भक्ति है। दूसरों के गुणों को देखकर हमें प्रभावित होना चाहिए, ताकि हम अकाल मृत्यु से बच सकें और देश में अकाल न पड़े। गुणीजन का सम्मान इसलिए होना चाहिए, क्योंकि हमें जीवन जीने का सही मार्ग मिल सके।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : चक्रवर्ती विवाह का दृश्य किसी सिद्धचक्र महामंडल विधान से कम नहीं- मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Tue, 12 Nov 2024 09:46:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पूज्य निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने चक्रवर्ती विवाह के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण और विचारणीय वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि चक्रवर्ती विवाह का दृश्य किसी सिद्धचक्र महामंडल विधान से कम नहीं है। विवाह को लेकर मुनि श्री ने गहरे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बात की और यह स्पष्ट किया कि विवाह केवल एक सांसारिक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पूज्य निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने चक्रवर्ती विवाह के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण और विचारणीय वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि चक्रवर्ती विवाह का दृश्य किसी सिद्धचक्र महामंडल विधान से कम नहीं है। विवाह को लेकर मुनि श्री ने गहरे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बात की और यह स्पष्ट किया कि विवाह केवल एक सांसारिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह भगवान के साक्षी में होने वाला एक व्रत है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर।</strong> पूज्य निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने चक्रवर्ती विवाह के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण और विचारणीय वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि चक्रवर्ती विवाह का दृश्य किसी सिद्धचक्र महामंडल विधान से कम नहीं है। विवाह को लेकर मुनि श्री ने गहरे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बात की और यह स्पष्ट किया कि विवाह केवल एक सांसारिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह भगवान के साक्षी में होने वाला एक व्रत है, जो जीवन के आचार-व्यवहार को शुद्ध करने की दिशा में एक कदम है।</p>
<p><strong>विवाह को व्रत के रूप में देखना</strong></p>
<p>मुनि श्री सुधासागर जी ने स्पष्ट किया कि जब पूज्य जिनसेन स्वामी ने संसार की क्रियाओं को भगवान के सामने करने की बात कही थी, तो इसका तात्पर्य था कि विवाह जैसी सांसारिक क्रिया को भी भगवान की साक्षी में किया जाना चाहिए। मुनि श्री ने कहा, &#8220;विवाह में जब दोनों व्यक्ति भगवान जिनेंद्र के सामने मिलते हैं और एक दूसरे से सहिष्णुता और सम्मान का वचन लेते हैं, तो यह केवल एक सांसारिक संबंध नहीं होता, बल्कि एक व्रत, एक संकल्प बन जाता है।&#8221;</p>
<p>उन्होंने कहा कि जब किसी भी बात या संकल्प को तीर्थंकरों या गुरुओं के सामने लिया जाता है, तो वह संकल्प केवल एक सांसारिक क्रिया नहीं, बल्कि एक धार्मिक और आध्यात्मिक शुद्धता का रूप धारण कर लेता है। यह विचार विवाह को एक पवित्र और आध्यात्मिक अनुष्ठान के रूप में प्रस्तुत करता है, जो केवल सांसारिक संबंधों के निर्माण तक सीमित नहीं है।</p>
<p><strong>चक्रवर्ती विवाह और भगवान की साक्षी में संबंध</strong></p>
<p>मुनि श्री ने विवाह की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि चक्रवर्ती विवाह के रूप में जो आज हम देखते हैं, वह भगवान की साक्षी में और उपवास रखकर किया जाता था। उन्होंने बताया कि यह वह परंपरा थी, जहां वर और कन्या दोनों पक्ष भगवान की साक्षी में जाकर धोती और दुपट्टा पहनकर पंच परमेष्ठी विधान करते थे। इसके बाद वर पक्ष का दूल्हा भगवान का अभिषेक करता और अपनी मंगेतर को गंधोदक देता। सभी लोग इस प्रक्रिया को अनुमोदित करते थे, और यह विवाह नहीं बल्कि एक सिद्धचक्र महामंडल विधान जैसा प्रतीत होता था।</p>
<p><strong>संगीत और विवाह की विकृत परंपराएं</strong></p>
<p>मुनि श्री सुधासागर जी ने आजकल विवाह समारोहों में प्रचलित &#8216;महिला संगीत&#8217; की परंपरा पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज महिला संगीत का रूप बहुत विकृत हो गया है, और यह केवल एक सामान्य मनोरंजन बनकर रह गया है। असल में &#8216;दादरा&#8217; की परंपरा बुंदेलखंड में थी, जहां नगर की दादियाँ शुभाशीष देने के लिए आती थीं। मुनि श्री ने कहा कि यदि हम महिला संगीत को बंद करके दादरा और भजन संध्या की परंपरा को पुनः स्थापित करें, तो यह विवाहों में अधिक आध्यात्मिकता और पवित्रता का अहसास कराएगा।</p>
<p><strong>विवाह के बाद की परंपराएं</strong></p>
<p>मुनि श्री ने विवाह के बाद की परंपराओं पर भी अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि पूज्य जिनसेन स्वामी के अनुसार, विवाह के बाद दंपत्ति को 7 दिन का ब्रह्मचर्य व्रत लेना चाहिए। इस अवधि के दौरान उन्हें तीर्थक्षेत्रों, सिद्धक्षेत्रों और गुरुओं के दर्शन के लिए जाना चाहिए। गृहप्रवेश के पहले यह व्रत उन्हें आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और समर्पित बना देता है। यह परंपरा विवाह को एक सांसारिक उत्सव से ज्यादा एक धार्मिक अनुष्ठान बना देती है, जो जीवन में शुद्धता और संतुलन का प्रतीक है।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : ऐसा कुछ देखो, ऐसा सोचो कि तुम्हारी आंख व मन धन्य महसूस करें- मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Mon, 04 Nov 2024 08:56:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ सारी दुनिया मेरे काम आवे, ये अपनी जिंदगी का सबसे पतन का सूत्र है और यही अपना डाउनफॉल करता है, इसी से सब कुछ शुभ होते हुए अशुभ हो जाता है। हर वस्तु पर हम अपना स्वार्थ निम्मजित कर देते हैं, यह वस्तु मेरे काम की है यहां तक ठीक है लेकिन इसके आगे बड़ी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> सारी दुनिया मेरे काम आवे, ये अपनी जिंदगी का सबसे पतन का सूत्र है और यही अपना डाउनफॉल करता है, इसी से सब कुछ शुभ होते हुए अशुभ हो जाता है। हर वस्तु पर हम अपना स्वार्थ निम्मजित कर देते हैं, यह वस्तु मेरे काम की है यहां तक ठीक है लेकिन इसके आगे बड़ी गलती करते हैं कि यह मुझे मिल जाए और तीसरी गलती करते हैं कि मिल जाने के बाद हम उसका उपयोग करते हैं और फिर छोड़ने का भाव नहीं करते, यह तीनों गलतियों के कारण से हमारे बढ़ाते हुए कदम रुक जाते हैं। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर।</strong> सारी दुनिया मेरे काम आवे, ये अपनी जिंदगी का सबसे पतन का सूत्र है और यही अपना डाउनफॉल करता है, इसी से सब कुछ शुभ होते हुए अशुभ हो जाता है। हर वस्तु पर हम अपना स्वार्थ निम्मजित कर देते हैं, यह वस्तु मेरे काम की है यहां तक ठीक है लेकिन इसके आगे बड़ी गलती करते हैं कि यह मुझे मिल जाए और तीसरी गलती करते हैं कि मिल जाने के बाद हम उसका उपयोग करते हैं और फिर छोड़ने का भाव नहीं करते, यह तीनों गलतियों के कारण से हमारे बढ़ाते हुए कदम रुक जाते हैं। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि इसलिए हमने सूत्र दिया था कि अपनी जिंदगी में बस एक ही भावना करो-जिंदगी में मुझे किसी का भी सहारा न देना पड़े, भगवान का, गुरु का, णमोकार मंत्र का किसी का भी सहारा न लेना पड़े लेकिन ऐसी स्थिति मात्र भावनात्मक हो सकती है, प्रैक्टिकल नहीं हो सकता।</p>
<p><strong>दूसरों के काम आओ</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि दूसरा उसके साथ में जब हमें दुनिया से कुछ लेना ही है, दुनिया तुम्हारे काम की है लेकिन तुम किसी काम के हो या नहीं? 90% पिता सोचते हैं कि बेटा मेरे काम का है लेकिन कितने पिता सोचते हैं कि मैं बेटे के काम का हूं। बेटा सोचते हैं कि पिता मेरे काम के है लेकिन कितने बेटे सोचते हैं कि मैं पिता के काम का हूं और मंदिर का तो हाल ही इतना बेहाल है कि 99.99% लोग यही सोचते हैं कि भगवान मेरे काम का है, भाव नहीं आता कि मैं भगवान के काम का हूँ। महानुभाव इतनी भावना से हम भगवान से कुछ भी नहीं पा पाएंगे। कभी ये भाव आ जाए कि भगवान तू मेरी जिंदगी भर काम आया है, तेरी भक्ति करते-करते मेरे मन में भाव आया है कि मैं भी लायक बन गया हूं और मैं तेरे काम आऊंगा। भिखारी को देखते ही भाव करना ये अपनी जिंदगी में कुछ नहीं कर पाएगा, पुण्यहीन है, कर ही नहीं सकता, मैं इसके काम का हूं, मेरे घर में एक रोटी रखी है, वो रोटी इसके काम आ सकती है, बस इस भाव से दे देना। पानी को भी कहा कि पानी का ऐसा कौन सा कार्य है जो पानी स्वयं नहीं कर सकता और वह पानी से ही होता है, वो काम तुम पानी का ऐसा कर दो तो जाओ उस पानी की ऐसी मेहरबानी होगी, कभी डायलिसिस की जरूरत नहीं पड़ेगी, तुम कभी प्यासे नहीं मरोगे, तुम्हारी कंठ से अमृत झरेगा।</p>
<p><strong>अच्छा</strong> <strong>काम करो</strong></p>
<p>बस तुम्हें कुछ नहीं करना है सुबह से शाम तक दिन भर में पानी पीते ही हो, तुम्हें एक कार्य और करना है किसी प्यासे को एक लोटा पानी पिलाना है, चाहे पशु पक्षी, गाय, बैल को पिला देना। प्याऊ खोलना क्यों पुण्य है क्योंकि पानी के बिना प्यास बुझेगी नहीं और पानी प्यास बुझायेगा नही और ज्यादा भाव बने तो मुनिराज आहार के लिए उठे हैं, पानी के बिना उनकी प्यास बुझेगी नहीं, पानी अंजुलि में पहुंच नहीं सकता, तुम शुद्ध धोती दुपट्टा पहनकर मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि कहकर के एक लोटा महाराज की अंजुलि तक भेज दो। पानी कहता है तुमने मेरा वो कार्य कर दिया जो मैं कभी नहीं कर सकता था, इसी का नाम तो सहयोग है। एक अंधा चल नहीं सकता था, तुमने उसका हाथ पकड़ कर रास्ता पार कर दिया, पानी भगवान के सिर तक नहीं पहुंच सकता, तुम एक लोटा भरकर भगवान के सिर तक पहुंचा दो। सारी जिंदगी हो गई, जल जन्म जन्म तक तुम्हारा काम आया, यह जल का उपकार तुम्हारे ऊपर ऐसा है, महानुभाव जिस दिन वसूलने को आ जाएगा न, एक-एक बूंद पानी को तरस जाओगे, प्यास इतनी लगेगी कि सागर का पानी पी जाओ और पीने को एक बूंद नहीं मिलेगा क्योंकि तुमने जिंदगी बदल का उपयोग किया है लेकिन जल का कोई अच्छा काम नहीं किया। सारी पृथ्वी तुम्हारे काम आती है उसे पृथ्वी से पत्थर निकाल कर उसकी मूर्ति बना देना, कोई एक पत्थर निकाल कर किसी मंदिर में लगा देना। ऐसे ही तुमने अपनी जिंदगी में इंद्रियों का उपभोग किया है, मन से अपने स्वार्थ की बात सोची है, ऐसा कुछ देखो, ऐसा सोचो कि तुम्हारी आंख व मन धन्य महसूस करें।</p>
<p><strong>खुद को भाग्यशाली मानो</strong></p>
<p>जितने ये अमीर आदमी होते है, सब पहले के बहुत अच्छे आदमी थे, लक्ष्मी किसी पापी के पास में, धर्मात्मा के पास जाती है। परमात्मा के पास इसलिए जाती है क्योकि मेरा सदुपयोग होगा। मेरे द्वारा वो कार्य होंगे, जो मैं जिंदगी में कभी नहीं कर सकता क्योंकि ये पूर्व जन्म का धर्मात्मा है, जब जब उसके पास गई, इसने कभी कोई गलत कार्य नहीं किया। जिंदगी में जब तुम्हें शगुन मिले यह चीज मेरी जिंदगी में बहुत जरूरी थी जो मेरे पास है, अपने शरीर की इंद्रियां, मन, धन, दौलत जो कुछ भी तुम्हारे पास है, जिस पर तुम्हें ऐसा महसूस हो कि ये मेरे पास नहीं होता हो तो मैं दुखी होता और जो जो चीजें तुम्हारे पास है, उनमें तुम अपने आप को भाग्यशाली मानना। आपका मन, आपकी आंखें अच्छी क्यों है क्योंकि आपने इनसे अच्छे कार्य किये होंगे।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन :  आपकी इच्छाओं की उम्र 6 महीने से ज्यादा नहीं होना चाहिए- निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sun, 03 Nov 2024 05:10:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि प्रथम बार में ही गणधर परमेष्ठी सम्पूर्ण श्रुत का ज्ञान कर लेते है, लाखों करोड़ों वर्षों तक भगवान जब बोलते हैं तो ऐसे टकटकी लगाकर सुनते हैं जैसे सब कुछ नया सुन रहे हैं, इधर अपन को थोड़ा सा ही ज्ञान हो जाये, अरे यह ग्रन्थ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री सुधासागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि प्रथम बार में ही गणधर परमेष्ठी सम्पूर्ण श्रुत का ज्ञान कर लेते है, लाखों करोड़ों वर्षों तक भगवान जब बोलते हैं तो ऐसे टकटकी लगाकर सुनते हैं जैसे सब कुछ नया सुन रहे हैं, इधर अपन को थोड़ा सा ही ज्ञान हो जाये, अरे यह ग्रन्थ क्या पढ़ना, पढ़ना, पढ़ तो चुका हूं चार बार। अच्छे कार्यों में यदि तुम्हें पूर्णता की अनुभूति होने लग जाए और अच्छा कार्य करने में ये भाव हो जाये प्रतिविज्ञान, समझ लेना तुम्हे अभी बहुत कुछ आगे बढ़ना है, तुम कुछ भी अच्छा प्राप्त नहीं कर पाए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर।</strong> प्रथम बार में ही गणधर परमेष्ठी सम्पूर्ण श्रुत का ज्ञान कर लेते है, लाखों करोड़ों वर्षों तक भगवान जब बोलते हैं तो ऐसे टकटकी लगाकर सुनते हैं जैसे सब कुछ नया सुन रहे हैं, इधर अपन को थोड़ा सा ही ज्ञान हो जाये, अरे यह ग्रन्थ क्या पढ़ना, पढ़ना, पढ़ तो चुका हूं चार बार। अच्छे कार्यों में यदि तुम्हें पूर्णता की अनुभूति होने लग जाए और अच्छा कार्य करने में ये भाव हो जाये प्रतिविज्ञान, समझ लेना तुम्हे अभी बहुत कुछ आगे बढ़ना है, तुम कुछ भी अच्छा प्राप्त नहीं कर पाए। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि अच्छी चीज़ वह नहीं है जो तुम्हें अच्छी लग रही है, अच्छी चीज वह है जिसे बार-बार सुनने का, देखने का, करने का मन होता है, कोई सीमा नहीं होना चाहिए, हमें हर कुछ ऐसा लगना चाहिए जैसे जो कुछ भी अपन खाते पीते हैं उसमें नई स्फूर्ति और नया आनंद आता है और खा चुके हैं बहुत बार, जिंदगी भर खाते आये। वही मकान है लेकिन ऐसा भाव नहीं आया कि इसी मकान में कितनी बार आऊं।</p>
<p><strong>लंबे समय तक न हो इच्छा</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा जितने संसार के पाप के कार्य हैं, यदि तुम्हें अनुभूति में आ जाये, कि यही तो सब करता आया हूं, बोरियत होने लग जाए क्या करना, वही तो किया है अनादिकाल से, ऐसी बोरियत की कभी अनुभूति होवे, समझ लेना तुम्हारे बहुत अच्छे दिन आने वाले हैं। तुम्हें संसार छोड़ना नहीं है, इसकी एक मंत्र साधना है, एक छोटी सी तत्वदृष्टि है, जो कुछ तुम सुबह से शाम तक करते हो, बस वहाँ इतना ही सोचना है, क्या यह पहली बार कर रहे हो या बहुत बार कर चुके हो, यदि पहली बार कर रहे हो ऐसी अनुभूति हो तो निश्चित समझना आप अभी बहुत संसार मे भटकने वाले हो। सबसे ज्यादा खरतनाक चीज है यह, मोक्ष तो छोड़ो, समाधि बिगाड़ देगा, ये तो मैंने किया ही नही। साधु हर समय पूर्णता में जीता है, हर मुहूर्त के बाद विराम लगाता है, एक अंतर मुहूर्त से ज्यादा कोई इच्छा नहीं रखता। साधु को इच्छाएं आएगी, राग द्वेष भी उठेगा, संस्कार है लेकिन उसकी उम्र अधिकतम 47 मिनट। श्रावक है तो 15 दिन के अंदर चौदह के चौदस के प्रतिक्रमण करता है, मैंने सब कुछ कर लिया, अब तो यह है कि पेट भरना है तो खाना है। यदि तुम गृहस्थ हो, अव्रती हो तो मात्र 6 महीने के बाद आपने पुनरावृत्ति का बोर्ड नही लगाया तो मिथ्यादृष्टि हो जाओगे। आपकी जो कुछ भी इच्छाएं हैं उनकी 6 महीने से ज्यादा उम्र नहीं होना चाहिए, चाहे राग हो या द्वेष। 6 महीने के अंदर या तो इच्छा पूरी कर लो या संकल्प पूर्वक त्यागना है। 6 महीने के बाद कोई कल्पना की और आपने पूर्ण विराम नहीं लगाया तो आप नियम से मिथ्यादृष्टि है।</p>
<p><strong>पुरुषार्थ करें</strong></p>
<p>वस्तु बंध का कारण नहीं है, आप जो इच्छाएं करती हैं उनकी पूर्ति करने में आपको कितना समय लगता है। मकान है तो है लेकिन मकान पर दूसरी मंजिल चढ़ाने का भाव, नया प्लाट खरीदने का भाव, मकान बनाने का भाव अभी बना नहीं है। 6 महीने के अंदर यदि इच्छा पूरी नहीं हुई है तो आप उस इच्छा का त्याग कीजिए या उस इच्छा को पूर्ण कीजिए। एक बार आपको करना पड़ेगा, एक क्षण एक मिनिट के लिए सही, दूसरे दिन फिर कर लीजिए, मेरी इच्छा की थी कोई मतलब नहीं है, मैं इस इच्छा का त्याग करता हूँ ऐसा भाव आपको 6 महीने के अंतिम 180 वे दिन आना ही चाहिए। इसमे कट लग जायेगा, फिर आप पुनः चालू कर दीजिए, दूसरा छह महीना चालू हो जाएगा। ऐसे छह छह महीने आप विराम दीजिये, आगे बढ़ाइए, फिर विराम दीजिये तो जिंदगी भर आप चलते जायेंगे, वस्तु वही रहेगी, उसके प्रति राग का जो वासना काल है वो टूट जाएगा। बेटे से आपने कोई इच्छा रखी, 6 महीने तक की इच्छा करो, इससे ज्यादा नही, उसके बाद आगे कर लेना। जितनी भी तुम्हारी इच्छाएं हो, उनकी उम्र कुल 6 महीने रखो। यह इच्छा को पूर्ति करने का प्रयास मैं 6 महीने करूंगा, 6 महीने के बाद विराम। फिर पुनः मन कर रहा है, नहीं एक बार पुनः पुरुषार्थ करता हूं।</p>
<p><strong>भरे हाथ लौटो</strong></p>
<p>घर से निकले तो इतनी इच्छा लेकर जाना कि शाम को तुम पूर्ण भरे हुए वापस आओ, खाली घर मत आया करो। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम्हारा सब कुछ हो जाएगा, बस भरे हुए लौटना है, भरा हुआ कलश, भरी हुई जिंदगी, भरी हुई शाम सदा मंगल ही मंगल होता है। तुम जब घर लौटते हो तो हर व्यक्ति तुम्हारा चेहरा देखता है, उसका मूल कारण है कि चेहरे से पता चलता है तुम भरे हुए लौट रहे हो या खाली लौट रहे हो और यदि तुम खाली चेहरे लौट रहे हो तो समझ लेना घर का अपशगुन करके लौट रहे हो। धीरे-धीरे सदा यह करोगे, तुम्हें घर ही अपशगुन हो जाएगा क्योंकि तुम बार-बार अधूरे लौटते हो, वह मकान भी एनर्जी लेस हो जाता है। कम इच्छा लेकर जाओ कि आज मैं दो कदम चलूंगा और 10 कदम चलकर आ जाना, तुम्हारा कलश ओवरफ्लो हो गया, समझ लेना तुम्हारा अच्छा दिन आने वाला है। अपन बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा लेकर जाते हैं, अधूरे लौटते हैं, सब मिटा देते हैं। णमोकार मंत्र से भी ज्यादा मांगलिक है संतोष, देव शास्त्र गुरु से भी ज्यादा शगुन है संतोष। दो बद्दुआ मत लेना जिसका कोई इलाज नहीं है, एक तो स्वयं की बद्दुआ कभी नहीं मिलना चाहिए, स्वयं की बद्दुआ किसी को भी नहीं देना है मकान, गाड़ी, जिंदगी किसी को नही, दोगे तो तुम बर्बाद होंगे। दूसरा अपनों की बद्दुआ मत लेना जो तुम्हारा है, तुम्हें चाहता है, तुम उसे चाहते हो। बर्बाद हो जाओगे मिट जाओगे, कोई तुम्हें दुनिया में पूछने वाला नहीं मिलेगा। रो रो कर मर जाना, न णमोकर मंत्र सुनेगा, न भगवान सुनेगा, न शांतिधारा सुनेगी।।</p>
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		<title>भाग्योदय तीर्थ सागर में हुआ सम्मान समारोह : शिविर क्षेत्रीय प्रभारी विद्वत नवनीत जैन शास्त्री सम्मानित </title>
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		<pubDate>Wed, 30 Oct 2024 11:53:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर (जयपुर) के तत्वावधान में और निर्यापक मुनि सुधासागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में भाग्योदय तीर्थ सागर में 26 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक स्नातक विद्वत सम्मेलन का आयोजन हुआ। पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230; मुरैना। श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर (जयपुर) के तत्वावधान में और निर्यापक मुनि सुधासागर महाराज ससंघ के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर (जयपुर) के तत्वावधान में और निर्यापक मुनि सुधासागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में भाग्योदय तीर्थ सागर में 26 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक स्नातक विद्वत सम्मेलन का आयोजन हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर (जयपुर) के तत्वावधान में और निर्यापक मुनि सुधासागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में भाग्योदय तीर्थ सागर में 26 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक स्नातक विद्वत सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन में सकल दिगंबर जैन समाज सागर और 700 विद्वतजन शामिल हुए। इस दौरान मुनि पुंगव सुधासागर जी महाराज ने प्रेरणादायी देशना दी। उन्होंने भावी पीढ़ी में धार्मिक संस्कारों के सिंचन, परिवार, समाज और राष्ट्र के विकास में धार्मिक शिक्षण शिविरों और द्वादश वर्षीय पाठशाला की महत्ता पर प्रकाश डाला।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-69071" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241030-WA0038.jpg" alt="" width="1141" height="843" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241030-WA0038.jpg 1141w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241030-WA0038-300x222.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241030-WA0038-1024x757.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241030-WA0038-768x567.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241030-WA0038-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241030-WA0038-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241030-WA0038-990x731.jpg 990w" sizes="(max-width: 1141px) 100vw, 1141px" />इसी श्रृंखला में, ग्रीष्मकालीन धार्मिक शिक्षण शिविर के माध्यम से सेवा, समर्पण और आत्मीय वातावरण में बच्चों को धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत जैन धर्म की मौलिक शिक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने पर चम्बल संभाग के क्षेत्रीय शिविर प्रभारी और द्वादश वर्षीय पाठशाला के संयोजक विद्वत नवनीत जैन शास्त्री (मुरैना) को मुनि सुधासागर जी महाराज ने आशीर्वाद प्रदान किया। श्रमण संस्कृति संस्थान जयपुर के अध्यक्ष एसके जैन, कार्याध्यक्ष प्रमोद पहाड़िया, अधिष्ठाता जय कुमार जैन, व्याख्याता अरूण जैन और अधिष्ठात्री शीला डोडिया ने बतौर अतिथि नवनीत जैन शास्त्री को साफा, दुपट्टा ओढ़ाकर और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन :  प्रतिकूलताओ में जीना सीखो, आनंद ही आनंद है- मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 25 Oct 2024 12:41:01 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[प्रवचन]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर महाराज]]></category>
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					<description><![CDATA[दुनिया में हमें किसी को पर मानने का अधिकार नहीं है, मैं स्व तो हूं लेकिन दुनिया पर नहीं हैं। दुनिया को दुनिया की दृष्टि से देखो तो स्व की अनुभूति होती है क्योंकि हर वस्तु अपने स्व चतुष्टय पर आश्रित होकर अपने स्वपने का अनुभव करती हैं। यदि हम पर के भोक्ता न होते [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दुनिया में हमें किसी को पर मानने का अधिकार नहीं है, मैं स्व तो हूं लेकिन दुनिया पर नहीं हैं। दुनिया को दुनिया की दृष्टि से देखो तो स्व की अनुभूति होती है क्योंकि हर वस्तु अपने स्व चतुष्टय पर आश्रित होकर अपने स्वपने का अनुभव करती हैं। यदि हम पर के भोक्ता न होते तो हमें उपदेश की जरूरत न होती। स्व को जानो, स्व का अनुभव करों क्योकि दो काम एक साथ नहीं हो सकते। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर।</strong> दुनिया में हमें किसी को पर मानने का अधिकार नहीं है, मैं स्व तो हूं लेकिन दुनिया पर नहीं हैं। दुनिया को दुनिया की दृष्टि से देखो तो स्व की अनुभूति होती है क्योंकि हर वस्तु अपने स्व चतुष्टय पर आश्रित होकर अपने स्वपने का अनुभव करती हैं। यदि हम पर के भोक्ता न होते तो हमें उपदेश की जरूरत न होती। स्व को जानो, स्व का अनुभव करों क्योकि दो काम एक साथ नहीं हो सकते। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि यदि तुम अपने दुःख का अनुभव कर रहे हो तो तुम्हें दुःख ही प्राप्त होगा। वर्तमान की अनुभूति पर हमारा भविष्य का महिल खड़ा है | अतीत की अनुभूति तो हमारी निकृष्ट थी, उसी का परिणाम तो हम आज भोग रहे है।</p>
<p><strong>मौत में भी हित छिपा है, कांटों में भी हित छिपा है</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि प्रतिकूलता जब भी आए, तुम्हें प्रतिकूलता का अनुभव नहीं करना है। तुम उसमें प्रतिकूलता का अनुभव करोगे, प्रतिकूलता बढ़ेगी। दुःख आये तो दुःख की अनुभूति नहीं करना। दुःख आते ही दुःख की अनुभूति हो जाती है, इसी से असाता कर्म का बंध बढ़ता है। दुःख आने पर तुम उस दुःख में देखो कुछ ऐसा जो तुम्हे सुखी कर दे। दुःख देने वाली वस्तु में कोई न कोई ऐसा गुण होता है जो हमे सुखी कर सकता है| दुश्मन में कोई एक गुण होता है जो तुम्हारा हित करता है। संसार में अज तक कोई ऐसी वस्तु पैदा नही हुई, जिसमे तुम्हारा हित न छिपा हो। मौत में भी हित छिपा है, कांटों में भी हित छिपा है, दुश्मन से ज्यादा दुनियाँ में हित करने वाला कोई नहीं होता है, भगवान भीं नही, गुरु भी नही, मां-बाप भी नही। जब निंदक तुम्हारे जीवन में आ जायज समझ लेना चाहिए तुम बहुत महान शक्ति हो क्योकि महान व्यक्ति की निंदा होती है| जिसके आगे भक्तों की भीड़ लगी हो जरुरी नही कि वो महान हो लेकिन जहां निंदकों की लाइन लगी हो, समझ लेना जरुर ये महान है। नीति है जिस पेड़ पर फल लगते है उसी को दुनिया पत्थर मारती है। प्रतिकूलताओं को हटाओं मत, प्रतिकूलताओं में डटे रहों। जितनी हवायें चलती जाये, तुम संभालते जाना, तुम महान बनते जाओगे। अज्ञानी व्यक्ति को हितैषी भी दुश्मन दिखते है और ज्ञानी को दुश्मन भी हितैषी दिखते है। अग्नि जलाकर राख करती है लेकिन क्या चमत्कार है नवनीत अग्नि पर जलकर घी बन गया।</p>
<p><strong>दुश्मन में भी हित का गुण देखना चाहिए</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि दुश्मन में भी हित का गुण देखना चाहिए, दुश्मन तुम्हारा हित कर सके वो गुण दुश्मन में है और वो गुण हमें खोजना है और जिस दिन हमने खोज लिया, दुश्मन के आते ही ऐसा आनंद आएगा, जैसा कोई सगा व्यक्ति आ रहा हो, गाली भी ऐसी लगेगी जैसे कोई पूजा कर हो, मेरा वखान कर रहा हो। थोडा प्रतिकूलताओ में जीना सीखों, आनंद ही आनंद है। सब तीर्थंकरों की अपेक्षा सबसे ज्यादा संकट पारसनाथ तीर्थंकर पर आये इसलिए वे संकटमोचक बन गए। संकटमोचक वो नहीं है जो संकट दूर करता है, संकटमोचक वह है जो संकटों को सहन करता है, संकट को संकट मानता ही नहीं है। शिष्य जितने संकट सहन करेगा, वह उतना ही महान बनेगा इसलिए गुरु कभी फूलों पे चलने का रास्ता नही सिखाते है, वो काँटों पर चलने का रास्ता दिखाते है। भक्तों के बीच में रहना नहीं सिखाते है, दुश्मनों के बीच में कैसे रहना। दुश्मन का वार कभी खाली नही जायेगा क्योकि वो पूरी ताकत लगाकर रखता है, उसकी निंदा, उसकी बद्दुआ कभी खली नही जाएगी। दुश्मन की हर हरकत यंत्र नही है, मंत्र नहीं है, तंत्र कहलाता है वो और तंत्र विद्या का एक ही उसूल है तुमने स्वीकार कर लिया तो फंस गए और नही स्वीकार तो बच गए। जितनी ये बद्दुआए है ये तंत्र के अंतर्गत आती है, दुश्मन कभी मंत्र का प्रयोगज़ किसी के नाश के लिए नहीं कर सकता, मंत्र के प्रयोग के साथ ही वह मर जाएगा, मात्र तंत्र है और तंत्र का एक छोटा सा मंत्र है मेरी इज्जत ये कभी ख़राब कर ही नहीं सकता, मेरी इज्जत और बढ़ेगी, इसने गाली नहीं दी है, मेरा शगुन किया है।</p>
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