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	<title>Muni Shri Sudha Sagar Maharaj श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : जो-जो तुम्हारे ऊपर अंधविश्वास करते हैं, उनसे कभी विश्वासघात मत करना-मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Mon, 09 Dec 2024 10:40:03 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कुछ आत्माएं स्वयंभू होती हैं, जो पहले से ही इतनी तैयारी कर लेती हैं कि उन्हें वर्तमान जीवन जीने के लिए विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता। कुछ अच्छे विद्यार्थी होते हैं, जो क्लास का इंतजार नहीं करते, छुट्टियों में भी अगली क्लास की तैयारी शुरू कर देते हैं। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कुछ आत्माएं स्वयंभू होती हैं, जो पहले से ही इतनी तैयारी कर लेती हैं कि उन्हें वर्तमान जीवन जीने के लिए विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता। कुछ अच्छे विद्यार्थी होते हैं, जो क्लास का इंतजार नहीं करते, छुट्टियों में भी अगली क्लास की तैयारी शुरू कर देते हैं। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने यह बात धर्म सभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> कुछ आत्माएं स्वयंभू होती हैं, जो पहले से ही इतनी तैयारी कर लेती हैं कि उन्हें वर्तमान जीवन जीने के लिए विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ता। कुछ अच्छे विद्यार्थी होते हैं, जो क्लास का इंतजार नहीं करते, छुट्टियों में भी अगली क्लास की तैयारी शुरू कर देते हैं। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने यह बात धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि जिनकी पहले से तैयारी होती है, वे परीक्षा के दिन पढ़ाई नहीं करते, बल्कि अच्छे से सोते हैं।</p>
<p><strong>संसार और अंधे व्यक्तियों का उदाहरण</strong></p>
<p>यह संसार एक ऐसा हाल है जिसमें एक दरवाजा है और हर व्यक्ति अंधा है। अंधा व्यक्ति दीवार को टटोलते हुए दरवाजे तक पहुंचने की कोशिश करता है, लेकिन जैसे ही दरवाजा आता है, उसे खुजली लगने लगती है। वह सिर खुजलाने में व्यस्त हो जाता है और उतने समय में दरवाजा निकल जाता है। फिर वह दीवार को पकड़कर सोचता है कि इस कमरे में तो दरवाजा ही नहीं है। यही स्थिति चौथेकाल में, जब मोक्ष का दरवाजा आया, हमारे साथ हुई। हम सोचते रहे कि जब फल मिलेगा तब बीज बो देंगे, जब आग लगेगी तब कुआं खोदेंगे। लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा, इसलिए पहले से तैयारी जरूरी है।</p>
<p><strong>पंचमकाल के धर्मी व्यक्ति और मोक्ष का रास्ता</strong></p>
<p>पंचमकाल में जो व्यक्ति धर्म कर रहा है, साधु, त्यागी, व्रती बन रहा है, समाधि ले रहा है, मंदिर जा रहा है, स्वाध्याय कर रहा है, वह वही होशियार विद्यार्थी है जो छुट्टियों में ही अपनी तैयारी शुरू कर देता है। मोक्ष का दरवाजा खुलेगा तब हम मुनि बन जाएंगे—लेकिन यह बहुत दुर्लभ है। जितने तीर्थंकर थे, उन्होंने दस भव पहले से तैयारी की थी, तभी वे गोल्ड मेडलिस्ट बन पाए। भरत चक्रवर्ती ने भी दस भव पहले से तैयारी की, तभी अंतर्मुहूर्त में केवल ज्ञान प्राप्त किया।</p>
<p><strong>कर्म और भाव का अंतर</strong></p>
<p>कितना भी प्रयास करो, अगर तुम्हारे भाव सही नहीं हैं तो तुम पंचकल्याणक की बोली नहीं ले पाओगे। सबसे पहली बात यह है कि यदि तुम्हारे भाव नहीं हैं, तो तुम्हारा धर्म कहेगा कि इस पापी को कंजूस बनाओ। धर्म भिखारी नहीं है, हर व्यक्ति का पैसा नहीं लेता। साधु भिखारी नहीं होते, हर किसी के हाथ का आहार नहीं लेते। साधु की आत्मा स्वयं बोलती है कि कहाँ जाना है, किसके यहाँ जाना है—हर किसी के यहाँ जाने का भाव नहीं होता।</p>
<p><strong>कर्म और धर्म की नीति</strong></p>
<p>जब तुम्हें धर्म करने का समर्थन मिलता है और तुम्हारे धर्म करने का भाव न हो, तो समझ लेना यह कर्म की बड़ी नीति है कि तुम्हें धर्म करने नहीं दिया जाएगा। कर्म कभी सुख नहीं देगा, वह हमेशा दुख ही देगा। पुण्य के उदय में लोग धर्म कम करते हैं और पाप ज्यादा करते हैं, इसलिए उस समय सावधान रहना बहुत जरूरी है।</p>
<p><strong>अय्याशी और गुरु की शरण में जाना</strong></p>
<p>जब तुम्हें अय्याशी करने का भाव हो, उस समय गुरु की शरण में जाना चाहिए। वे नहीं कह रहे हैं जो धर्म के भाव में हैं, बल्कि वे आएं और पूछें कि महाराज, मैं समर्थ हूँ फिर भी मेरे भाव नहीं हो रहे हैं। कर्म तुम्हें कितना भी रोके, अगर तुम उसे पछाड़कर धर्म की राह पर चल पड़ते हो, तो तुम जीत गए और कर्म हार गया।</p>
<p><strong>हिंसा, झूठ और पुरुषार्थ</strong></p>
<p>तुम हिंसा कर सकते हो, लेकिन पुरुषार्थ करो, &#8220;मैं हिंसा नहीं करूंगा&#8221;। झूठ बोलने के पूरे निमित्त बन रहे हैं, तो तुम जो कह दोगे, सामने वाला मान लेगा, लेकिन समझो—मैं झूठ बोलता हूँ, तो सीधा सातवां नरक है। झूठ बोलना बड़ा पाप नहीं है, लेकिन विश्वासघात करना बड़ा पाप है।</p>
<p><strong>विश्वासघात और झूठ बोलने का दुष्परिणाम</strong></p>
<p>जो व्यक्ति तुम्हारे ऊपर विश्वास करता है, उसे कभी धोखा मत देना। बाकी तुम जानो, तुम्हारा काम जाने। अगर तुम जन्म-जन्म तक ठगी करते रहोगे, तो भी तुम्हें दुर्गति नहीं होगी, क्योंकि तुमने विश्वासघात नहीं किया। झूठ बोलना एक पाप है, लेकिन विश्वासघात करना उससे भी बड़ा पाप है।</p>
<p><strong>विश्वास की शक्ति और गुरु का महत्व</strong></p>
<p>यह विश्वास की शक्ति है कि मेरी सास झूठ बोल ही नहीं सकती, यही कारण है कि वह नाग का हार बन गई। और विश्वासघाती के लिए हार का नाग बन जाता है। इसलिए जो जो तुम्हारे ऊपर अंधविश्वास करते हैं, उनसे कभी विश्वासघात मत करना। उसका दुरुपयोग मत करना। झूठ भी बोलना हो, तो अपने दुश्मनों के सामने बोलना, क्योंकि अपनों के सामने झूठ बोलना दुर्गति का कारण है</p>
<p><strong>धर्म, कर्म और मुनि बनने का रास्ता</strong></p>
<p>गुरु इसलिए नहीं बनाना कि वह झूठ बोलना त्याग कर देंगे, क्योंकि यह तुम्हारे वश की बात नहीं है। बस, जिसका तुम्हारे ऊपर विश्वास हो, उससे कभी झूठ मत बोलना। जब भी धर्म करने का निमित्त हो और तुम्हारे धर्म करने के भाव न हो, जबकि तुम करने में समर्थ हो, तो समझ लो धर्म और कर्म ने तुम्हें पापी घोषित कर दिया है और तुम्हारा दिमाग बिगाड़ दिया है। मोक्ष नहीं है, लेकिन मुनि तो बनूँगा। &#8220;अभी मेरा एडमिशन नहीं हुआ है, लेकिन छुट्टियों में पढ़ाई तो करूंगा&#8221;, यही है मेरिट लिस्ट में आने का तरीका।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : जिसको भी देखे, बस एक ही आवाज आये, ऐसा तो मैंने कभी देखा ही नहीं- मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sat, 16 Nov 2024 05:48:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[असाधारण पहचान, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक, हमेशा लोगों के बीच चर्चा का विषय बनती है। साधारण पहचान केवल किसी काम से जुड़ी हो सकती है – चाहे वह अच्छा हो या बुरा। लेकिन, असाधारण पहचान वह होती है, जिसे लोग देखकर, प्रेरित होकर, और अनुकरण करके अपना आदर्श मानें। यह बात मुनि श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>असाधारण पहचान, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक, हमेशा लोगों के बीच चर्चा का विषय बनती है। साधारण पहचान केवल किसी काम से जुड़ी हो सकती है – चाहे वह अच्छा हो या बुरा। लेकिन, असाधारण पहचान वह होती है, जिसे लोग देखकर, प्रेरित होकर, और अनुकरण करके अपना आदर्श मानें। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> असाधारण पहचान, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक, हमेशा लोगों के बीच चर्चा का विषय बनती है। साधारण पहचान केवल किसी काम से जुड़ी हो सकती है – चाहे वह अच्छा हो या बुरा। लेकिन, असाधारण पहचान वह होती है, जिसे लोग देखकर, प्रेरित होकर, और अनुकरण करके अपना आदर्श मानें। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि हम अपनी साधारण पहचान पर गर्व कर सकते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम अपने कार्यों के माध्यम से कैसी छाप छोड़ रहे हैं। क्या हम वही कार्य कर रहे हैं, जो दूसरों को प्रेरित करे? क्या हमारी अच्छाई सिर्फ हमारे दृष्टिकोण में है, या फिर वह वास्तविक रूप से समाज के लिए आदर्श बन चुकी है? हमारे कार्यों की पहचान उस बात से नहीं होती कि हम कितने लोगों को अपने पीछे खड़ा कर सकते हैं, बल्कि यह पहचान इस बात से बनती है कि कितने लोग हमारे कार्यों से प्रभावित हो रहे हैं और उसे अपना आदर्श बना रहे हैं। जब तक हम अपने कार्यों को असाधारण नहीं बनाएंगे, तब तक हमारा संस्कार और संस्कृति समाज में अपनी जगह नहीं बना पाएंगे।</p>
<p><strong>किसी व्यक्ति की पहचान मरण के बाद</strong></p>
<p>मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की अच्छाई का सही मूल्यांकन उसके जीवन के बाद होता है। यह देखा जाता है कि कितने लोग उसकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हैं। अगर किसी की मृत्यु पर लोग खुश हों, तो समझिए उस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी में अच्छे कार्य नहीं किए। वहीं, यदि किसी की मृत्यु पर सभी दुखी हों और उसकी अच्छाई की चर्चा करें, तो यह उसकी उच्च गति का संकेत है।</p>
<p><strong>आचार्य श्री का जीवन और उनकी अद्वितीयता</strong></p>
<p>आचार्य श्री के जीवन में एक ऐसी विशेषता थी कि जब वे हमारे बीच थे, तो हम सब उन्हें युग पुरुष मानते थे। उनके साथ बिताए हर पल की अहमियत थी। उनकी समाधि के बाद, हम सब के मन में यही विचार था कि एक युग का अंत हो गया। आचार्य श्री का आदर्श इतना प्रबल था कि लोग शास्त्र पढ़ने की बजाय उन्हें ही अपना शास्त्र मानने लगे थे। ऐसे महान पुरुषों की अनुपस्थिति कभी पूरी नहीं हो सकती। उनका कोई विकल्प नहीं था।</p>
<p><strong>जीवन का उद्देश्य: असाधारण बनना</strong></p>
<p>हमारा उद्देश्य केवल सांसारिक भोगों का नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें ऐसी कला और गुण हासिल करने चाहिए, जिसे देखकर लोग कहें, &#8220;ऐसा तो मैंने कभी नहीं देखा!&#8221; जीवन में कुछ ऐसा हासिल करो जो 84 लाख योनियों में से किसी अन्य योनि में न प्राप्त हुआ हो। हमें यह अनुभव करना चाहिए कि हम जैनकुल में जन्म लेने के कारण कितना पुण्य इकट्ठा कर चुके हैं। इस पुण्य का सही उपयोग यह है कि हम अपने कार्यों को समाज के लिए असाधारण बनाएं।</p>
<p><strong>स्वाध्याय और आत्मविकास &#8211; एक नया दृष्टिकोण</strong></p>
<p>स्वाध्याय का महत्व न केवल यह है कि हम धार्मिक ग्रंथों को पढ़ें, बल्कि इसका उद्देश्य यह है कि हम उन ग्रंथों से कुछ नया सीखें, जो हमारे जीवन में नकारात्मकता से छुटकारा दिला सके। मंदिर में जाते समय, प्रतिदिन की पूजा में भी हमें वही आदत डालनी चाहिए कि भगवान के दर्शन करते हुए हमेशा कुछ नया अनुभव हो। जैसे पहले किसी मूर्ति को देखा था, वैसा आज नहीं देखा, ऐसा अनुभव हमें चाहिए।</p>
<p><strong>आध्यात्मिक उन्नति- देखने का नया तरीका</strong></p>
<p>अगर हम अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाते हैं, तो हमें हर वस्तु में कुछ नया दिखेगा। मुनि श्री ने यह भी बताया कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने दृषटिकोन को वैज्ञानिक और खोजी बनाना चाहिए। जैसे नित्य जापित णमोकार मंत्र में भी नित्य कुछ नया देखना चाहिए। हर बार जब हम इसे पढ़ें या सुनें, तो एक नई अनुभूति मिलनी चाहिए। यही वह आदत है, जिसे हमें अपनी जिंदगी में अपनाना है।</p>
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		<title>जन्मभूमि पर वर्णी स्मारक का लोकार्पण कार्यक्रम संपन्न : विद्वत संगोष्ठी और स्नातक सम्मेलन के साथ मनाई गई वर्णी जयंती </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/varni_jayanti_celebrated_with_dcholarly_seminar_and_graduate_conference/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Sep 2024 15:30:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ श्री गणेश प्रसाद वर्णी की 151वीं जन्म जयंती के उपलक्ष्य में वर्णी भवन मोराजी में विविध कार्यक्रमों के साथ भव्य आयोजन किया गया। सुबह प्रभात फेरी, ध्वजारोहण और श्री गणेश प्रसाद वर्णी की प्रतिमा के समक्ष विनयांजलि सभा का आयोजन किया गया। इसके बाद दोपहर 1 बजे से विद्वत संगोष्ठी और स्नातक सम्मेलन आयोजित किया [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> श्री गणेश प्रसाद वर्णी की 151वीं जन्म जयंती के उपलक्ष्य में वर्णी भवन मोराजी में विविध कार्यक्रमों के साथ भव्य आयोजन किया गया। सुबह प्रभात फेरी, ध्वजारोहण और श्री गणेश प्रसाद वर्णी की प्रतिमा के समक्ष विनयांजलि सभा का आयोजन किया गया। इसके बाद दोपहर 1 बजे से विद्वत संगोष्ठी और स्नातक सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें मोराजी संस्कृत महाविद्यालय के स्नातक छात्र और ख्यातिप्राप्त विद्वानों ने भाग लिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनीष विद्यार्थी की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> श्री गणेश प्रसाद वर्णी की 151वीं जन्म जयंती के उपलक्ष्य में वर्णी भवन मोराजी में विविध कार्यक्रमों के साथ भव्य आयोजन किया गया। सुबह प्रभात फेरी, ध्वजारोहण और श्री गणेश प्रसाद वर्णी की प्रतिमा के समक्ष विनयांजलि सभा का आयोजन किया गया। इसके बाद दोपहर 1 बजे से विद्वत संगोष्ठी और स्नातक सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें मोराजी संस्कृत महाविद्यालय के स्नातक छात्र और ख्यातिप्राप्त विद्वानों ने भाग लिया।</p>
<p>श्री संस्कृत दिगंबर जैन महाविद्यालय, जिसकी स्थापना 1908 में पूज्य वर्णी जी ने की थी, में शाताधिक विद्वानों की उपस्थिति में मंगलाचरण, दीप प्रज्वलन और चित्र अनावरण के साथ विद्वानों का स्वागत किया गया। मंच पर प्रतिष्ठित विद्वान डॉ. भागचंद भास्कर (नागपुर), डॉ. हरिशचंद्र जैन (मुरैना), पंडित जीवंधर जी (जबलपुर), पंडित जयंत शास्त्री (सीकर), पंडित ज्ञानचंद व्याकरणाचार्य, और पंडित विजय शास्त्री (सागर) उपस्थित रहे। वर्णी संस्थान विकास सभा के पदाधिकारियों द्वारा विद्वानों का सम्मान माला, अंगवस्त्र, बैग और स्मृति चिन्ह देकर किया गया। विद्वानों ने पूज्य गणेश प्रसाद वर्णी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इसके बाद, डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के डॉ. पंकज तिवारी, प्रो. अभय सिंघई, और डॉ. संजीव सराफ के निर्देशन में बनाई गई वर्णी डॉक्यूमेंट्री का लोकार्पण किया गया।</p>
<p>कार्यक्रम का संचालन मुख्य संयोजक चंद्रेश शास्त्री ने किया और आभार संजय शास्त्री ने व्यक्त किया। शाम 7 बजे भाग्योदय तीर्थ में सभी विद्वानों ने निर्यापक मुनि श्री सुधा सागर जी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया और शंका समाधान कार्यक्रम में प्रश्न पूछने का अवसर प्राप्त किया।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-67107" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024.jpg" alt="" width="1280" height="853" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024-768x512.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240923-WA0024-990x660.jpg 990w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" />द्वितीय दिवस पर आयोजन</strong></p>
<p>सुबह 10 बजे पूज्य वर्णी जी की जन्मस्थली हंसेरा मड़ावरा में नवनिर्मित स्मारक का लोकार्पण पंडित देवेंद्र शास्त्री (सोरई) के निर्देशन में संपन्न हुआ। इस अवसर पर मूर्ति का अनावरण किया गया और ग्रामवासियों ने वर्णी जी की आरती उतारी। समिति द्वारा मिष्ठान वितरण और वरिष्ठ ग्रामवासियों का सम्मान किया गया। मनीष विद्यार्थी ने बताया कि पूज्य वर्णी जी द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों को ध्यान में रखते हुए, नवनिर्मित वर्णी स्मारक में बाल संस्कार केंद्र की शुरुआत की जाएगी, जहां बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दी जाएगी। दोपहर 2 बजे आचार्य विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य मुनि श्री अक्षय सागर जी महाराज के सान्निध्य में विद्या वाटिका मड़ावरा में वर्णी जी के व्यक्तित्व पर परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन किया गया।</p>
<p>इस अवसर पर विद्वानों और श्रेष्ठियों ने वर्णी जी के व्यक्तित्व पर अपने विचार व्यक्त किए। गोष्ठी का संचालन चंद्रेश शास्त्री ने किया और कार्यक्रम संयोजक राजकुमार जैन ने आभार व्यक्त किया। अंत में, मुनिश्री ने वर्णी जी के जीवन पर आचार्य श्री विद्यासागर जी के संस्मरण सुनाए और उनके व्यक्तित्व से प्रेरणा लेने की बात कही। कार्यक्रम में मुख्य रूप से त्रिलोक शास्त्री (बड़ागांव), राजेंद्र जैन (दलपतपुर), संजय शास्त्री, कैलाश जैन, कडोरी लाल वण्डा, डी. के. सराफ, सनत जैन, राजकुमार शास्त्री (नेहानगर), अजित जलज (टीकमगढ़), सुरेश शास्त्री (रामपुरा), और कमलेश जेरा सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।</p>
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