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	<title>Muni Pujyasagar Maharaj &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>Muni Pujyasagar Maharaj &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>एक संत के स्वप्न से समाज के संस्कार तक : दो दशक का तप, त्याग और धर्म–संस्कारों का उज्ज्वल पुनर्जागरण </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Nov 2025 15:34:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[श्रीफल की 20 साल की यात्रा धर्म, समाज और संस्कारों के पुनर्जागरण का अभियान है, जो मुनि पूज्यसागर महाराज के विज़न और सेवाभाव से फलित हुआ। संपादक रेखा संजय जैन की कलम से&#8230;&#8230; 16 नवंबर 2005— एक युवा ब्रह्मचारी चक्रेश जैन ने एक सपना देखा था। एक ऐसा मंच, जहाँ धर्म केवल पढ़ाया न जाए, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>श्रीफल की 20 साल की यात्रा धर्म, समाज और संस्कारों के पुनर्जागरण का अभियान है, जो मुनि पूज्यसागर महाराज के विज़न और सेवाभाव से फलित हुआ। <span style="color: #ff0000">संपादक रेखा संजय जैन की कलम से&#8230;&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>16 नवंबर 2005—</p>
<p>एक युवा ब्रह्मचारी चक्रेश जैन ने एक सपना देखा था।</p>
<p>एक ऐसा मंच, जहाँ धर्म केवल पढ़ाया न जाए, बल्कि जिया जाए।</p>
<p>जहाँ संस्कृति केवल कही न जाए, बल्कि पीढ़ियों तक संजोकर पहुँचाई जाए।</p>
<p>और इसी सोच से जन्म हुआ— ‘श्रीफल’ का</p>
<p><strong>आज, 16 नवंबर 2025—</strong></p>
<p>श्रीफल अपनी 20 वर्ष की तप, त्याग और निरंतर कर्मयात्रा का स्वर्ण अध्याय पूरा कर चुका है।</p>
<p>ये दो दशक केवल पत्रकारिता का सफर नहीं…</p>
<p>बल्कि धर्म, समाज और संस्कारों के पुनर्जागरण का आंदोलन बन चुके हैं।</p>
<p><strong>इस आंदोलन के केंद्र में हैं—</strong></p>
<p>अंतर्मुखी, तेजस्वी और दूरदर्शी मुनि श्री पूज्यसागर महाराज,</p>
<p>जो कभी ब्रह्मचारी चक्रेश जैन के रूप में श्रीफल के संस्थापक थे,</p>
<p>और आज धर्म व समाज को नई दिशा देने वाले प्रेरक संत हैं।</p>
<p>3 जुलाई 1980, पिपलगोन में जन्मे मुनिश्री का जीवन बचपन से करुणा और संवेदनाओं से भरपूर रहा।</p>
<p>आर्यिका वर्धितमती माताजी के सान्निध्य में वैराग्य का बीज अंकुरित हुआ,</p>
<p>और 2015 में दीक्षा लेकर वे मुनि पूज्यसागर जी बने।</p>
<p>श्रवणबेलगोला में भट्टारक स्वस्तिश्री चारुकीर्ति जी से तत्वज्ञान, वास्तु और ज्योतिष का गहन अध्ययन—</p>
<p>यही श्रीफल की बौद्धिक, आध्यात्मिक और वैचारिक नींव बना।</p>
<p><strong>श्रीफल का मिशन</strong></p>
<p>समाज को जोड़ना…</p>
<p>धर्म को आधुनिक माध्यमों से प्रस्तुत करना…</p>
<p>और युवा पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ना।</p>
<p><strong>इसी सोच से जन्म लिए—</strong></p>
<p>अक्षर कलश, संस्कार यात्रा, ज्ञानामृतम्, श्रीफल पत्रकारिता पुरस्कार, श्रीफल परिवार जैसी पहलें,</p>
<p>जो आज हजारों जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बनी हैं।</p>
<p><strong>गुरुदेव का विज़न</strong></p>
<p>मीडिया हाउस</p>
<p>समाधान केंद्र</p>
<p>संस्कार पाठशालाएँ</p>
<p>चौका-वृक्ष अभियान</p>
<p>आदर्श ग्राम</p>
<p>स्वरोजगार प्रेरणा</p>
<p>—इन दस सूत्रों पर आधारित यह दिशा देशभर में श्रीफल के माध्यम से प्रभाव विस्तार कर रही है।</p>
<p>मेरे लिए भी श्रीफल केवल एक संस्था नहीं,</p>
<p>बल्कि आत्म-विकास का मार्गदर्शक रहा है।</p>
<p>गुरुदेव की कृपा से जो आत्मविश्वास मिला—</p>
<p>वह शब्दों में बयां करना कठिन है।</p>
<p>जीवन पहले परिवार और ऑफिस तक सीमित था…</p>
<p>श्रीफल और गुरुदेव ने सोच बदली, दृष्टि बदली और जीवन का उद्देश्य भी।</p>
<p>आज जब श्रीफल 20 वर्ष पूरे कर रहा है,</p>
<p>तो यह सिर्फ एक संस्था का उत्सव नहीं,</p>
<p>बल्कि एक संत के महान विचार की विजय है।</p>
<p>एक आंदोलन की निरंतरता है।</p>
<p>और प्रमाण है कि—</p>
<p>जब सेवा, साधना और समर्पण एक दिशा में चलें,</p>
<p>तो समाज भी बदलता है और पीढ़ियाँ भी।</p>
<p><strong>श्रीफल</strong>—</p>
<p>एक संत का स्वप्न,</p>
<p>एक समाज का संकल्प,</p>
<p>और आने वाली पीढ़ियों के संस्कारों का आधार।</p>
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		<title>प्रजा के कार्यानुसार दी वर्ण व्यवस्था : भगवान आदिनाथ ने ही दिए थे जीविकोपार्जन के सिद्धांत </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Apr 2024 01:30:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Adinath Jayanti]]></category>
		<category><![CDATA[antarmukhi]]></category>
		<category><![CDATA[First Tirthankar श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
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		<category><![CDATA[jain news]]></category>
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		<category><![CDATA[आदिनाथ जयंती]]></category>
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		<category><![CDATA[प्रथम तीर्थंकर]]></category>
		<category><![CDATA[भगवान आदिनाथ]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि पूज्यसागर महाराज]]></category>
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					<description><![CDATA[भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरुषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओं के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया। भगवान आदिनाथ की जयंती पर पढ़िए अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज का यह विशेष आलेख&#8230; जैन धर्म की परम्परा में वर्तमान काल में भगवान आदिनाथ प्रथम तीर्थंकर हैं। भगवान आदिनाथ [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरुषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओं के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया। <span style="color: #ff0000">भगवान आदिनाथ की जयंती पर पढ़िए अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज का यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म की परम्परा में वर्तमान काल में भगवान आदिनाथ प्रथम तीर्थंकर हैं। भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरुषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओं के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया। अब तक अनंत तीर्थंकर हो चुके हैं। एक काल में 24 तीर्थंकर ही होते हैं। इस काल के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान हैं। काल दो प्रकार के होते हैं। एक उत्सर्पिणी और दूसरा अवसर्पिणी। जो काल उत्थान से पतन की और जाता है वह अवसर्पिणी काल है। जो पतन से उत्थान की और जाए वह उत्सर्पिणी काल है, तो मौजूदा काल अवसर्पिणी काल है और इस काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ हुए हैं।</p>
<p><strong>भोगभूमि से कर्मभूमि तक</strong></p>
<p>भगवान आदिनाथ के जन्म से पहले तक भोगभूमि की व्यवस्था थी। जब उन्होंने जगत को पुरुषार्थ का ज्ञान दिया तब से कर्मभूमि की व्यवस्था शुरू हुई। भोगभूमि में पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं होती। उनमें सब कुछ कल्पवृक्ष से मिलता है। लेकिन कर्मभूमि में मनुष्य को पुरुषार्थ कर जीविकोपार्जन के साधन स्वयं जुटाने पड़ते हैं। यह कैसे करना है, जीवन जीने के तरीके क्या होने चाहिए और समाज में रहने हुनर क्या है, यह सब भगवान आदिनाथ ने बताया। उन्होंने परिवार को बढ़ाने के लिए विवाह पद्धति का वर्णन किया।</p>
<p><strong>दी थी वर्ण व्यवस्था</strong></p>
<p>भगवान आदिनाथ ने सामाजिक व्यवस्था के संचालन के लिए नगर, गांव, मकान आदि बनाने और उन्हें बसाने का उपदेश दिया था। इसी के साथ उन्होंने वर्ण व्यवस्था का उपदेश भी दिया। उन्होंने वर्ण व्यवस्था की स्थापना प्रजा के कार्य के अनुसार की थी। जो लोग विपत्ति के समय मनुष्यों की रक्षा करने के नियुक्त किए गए थे, वे क्षत्रिय कहलाए। वाणिज्य, खेती, गोरक्षा आदि के व्यापार में जो लगे थे वे वैश्य कहलाए। जो निम्नस्तर का कार्य करते थे तथा धार्मिक शास्त्रों से दूर भागते थे, वे शूद्र कहलाए। इसके बाद भरत चक्रवर्ती ने पूजा, पाठ करने वाले और यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने वाले ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की। इस प्रकार से जैन धर्म में चार वर्ण की स्थापना उल्लेख मिलता है। संस्कारों के बीजरूप का शंखनाद करते हुए आदिनाथ भगवान ने अपने पुत्र को अपने हाथों से जनेऊ संस्कार किया। जनेऊ संस्कार का मतलब होता था कि अब यह मद्य, मांस, मधु, बड़, पीपल, कटुम्बर, अंजीर, गूलर आदि का सेव नहीं करेगा। जनेऊ पहनने वाला ही जिनेन्द्र की पूजा, अभिषेक कर सकता है क्यों कि वह अष्टमूलगुणों का पालन करने वाला है।</p>
<p><strong>बताया आजीविका का साधन</strong></p>
<p>भगवान आदिनाथ ने असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प, विद्या जैसे छह कर्मों को आजीविका का साधन बताया। इस व्यवस्था का उद्देश्य था कि इससे दूसरों के जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन हो। मनुष्य एक-दूसरे के जीवनयापन में सहयोगी बन कर सामाजिक व्यवस्थाओं में सहयोगी बनें। अजीविका का अर्जन करते समय भी धर्म के प्रति श्रद्धा बनी रहे, इसके लिए छह आवश्यक कर्म देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, त्याग(दान) बताए, ताकि इनके माध्यम से मनुष्य धर्म ध्यान कर पुण्य का संचय कर सकें और जीवन में जो अशुभ कर्म का बन्ध किया है, उनका नाश कर सके।</p>
<p>समाज में स्त्रीशिक्षा के महत्व को स्थापित करने के लिए भगवान आदिनाथ ने अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि लिखने का एवं सुन्दरी को इकाई, दहाई आदि अंक विद्या सिखाई। इसी प्रकार भगवान ने अपने भरत, बाहुबली आदि सभी पुत्रों को सभी विद्याओं का अध्ययन कराया था। इसी तरह जीवन में कलाओं के महत्व को स्थापित करने के लिए भगवान आदिनाथ ने 72 कलाओं का उपदेश भी दिया है। तो इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य को भोगभूमि से कर्मभूमि में लाकर भगवान आदिनाथ ने पुरुषार्थ का उपदेश दिया और उस व्यवस्था का निर्माण किया जो आज तक चली आ रही है तथा जीविकोपार्जन के मूल सिद्धांतों में शामिल है।</p>
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