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	<title>muni niranjan sagar &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>muni niranjan sagar &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग में प्रवचन : दिगम्बरत्व भारतीय सनातन संस्कृति की पहचान है &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर जी </title>
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		<pubDate>Wed, 03 May 2023 13:21:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम सनातन संस्कृति की प्रस्तोता दिगम्बरत्व पर चर्चा करने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति में जितने भी वेद, पुराण हैं, उन सभी में दिगम्बरत्व को यथास्थान बहुमान दिया है। पढ़िए राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट&#8230; कुम्हारी(दमोह)। साइंस [&#8230;]]]></description>
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<p>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम सनातन संस्कृति की प्रस्तोता दिगम्बरत्व पर चर्चा करने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति में जितने भी वेद, पुराण हैं, उन सभी में दिगम्बरत्व को यथास्थान बहुमान दिया है। पढ़िए राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट&#8230;</p>
<hr />
<p><strong>कुम्हारी(दमोह)।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम सनातन संस्कृति की प्रस्तोता दिगम्बरत्व पर चर्चा करने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति में जितने भी वेद, पुराण हैं, उन सभी में दिगम्बरत्व को यथास्थान बहुमान दिया है। यह निर्विकार दिगम्बर मुद्रा ही प्रमुख कारण है, जिससे यह भारतीय सनातन संस्कृति विश्व गुरु के रूप में अपनी पहचान अनादि काल से बनाए हुए हैं। सम्पूर्ण विश्व आज भी आश्चर्य के साथ इस विषय पर चिन्तन करता है कि निर्विकार अवस्था के साथ यह कैसा जीवन है? वासना विजय का यह स्वरूप आज भी वैसा ही है, जैसा कि भगवान महावीर स्वामी का था। इस मुद्रा के माध्यम से किसी भी प्राणी मे राग की, विकार की, वासना की उत्पत्ति नहीं होती है, बल्कि वैराग्य की उत्पत्ति में यह मुद्रा सशक्त माध्यम है।</p>
<p><strong>सद्दर्शन से ही सद्गति की प्राप्ति</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि, &#8221; कारण सदर्शम् कार्यम् &#8221; अर्थात कारण के अनुरूप ही कार्य होता है। सद्दर्शन से ही सद्गति की प्राप्ति होती है। ऐसी वीतरागी दिगम्बर मुद्रा का दर्शन पाप का नाश करने वाला है। साथ ही साथ स्वर्ग व मोक्ष का साधनभूत है। जिस प्रकार छिद्र सहित हाथों में जल ज्यादा देर तक नहींं ठहरता है अर्थात् नष्ट हो जाता है, उसकी प्रकार इस वीतराग नग्न मुद्रा के दर्शन से वन्दना आदि करने से पाप कर्म का तीव्र उदय भी अधिक समय तक नहीं ठहरता। ऐसी प्रशान्त दिगम्बर मुद्रा का दर्शन पुण्य संचय करने वाला होता है और देवता भी इसके लिए तरसते हैं। विश्व विजेता सिकन्दर भी जब भारत आया था, तब वह भी इस वीतराग मुद्रा को देख मन्त्र मुग्ध हो गया था। आप ही लोग कहते हो &#8221; हे गुरुवर! शाश्वत सुख दर्शक यह नग्न स्वरूप तुम्हारा है जग की नश्वरता का सच्चा दिग्दर्श कराने वाला है।&#8221;</p>
<p><strong>जहां राग है, वहीं सुख नहीं</strong></p>
<p>सम्पूर्ण विश्व आज सुख चाहता है, शान्ति चाहता है और इस संसार में अगर शान्ति है, तो वह है वीतरागी सन्तों के पास, चलते-फिरते भगवन्तो के पास। जहां राग है, वहां सुख नहीं। वीतरागी संत तुम्बी के समान है। जिस प्रकार सुखी तुम्बी पानी में नहीं डूबती और उसका सहारा लेने बाला भी नहीं डूबता, ठीक उसी प्रकार, वीतरागी देव, गुरु हुआ करते हैं। जो इनका सहारा ले लेता है, वह भवसागर में कभी डूबता नहीं पार उतर जाता है। यह दिगम्बर मुद्रा देह से देहातीत होने की यात्रा का द्योतक है। वेदों में, पुराणों में इस दिगम्बर अवस्था को मंगलकारी माना है। इस मुद्रा का दर्शन मात्र कार्य की सफलता का द्योतक है। आचार्यों ने इसे यथाजात रूप कहा है अर्थात् जैसा जन्म के समय बालक होता है, वैसा ही यह स्वरूप है। दिशाएं हैं जिनकी अम्बर, वही सही दिगम्बर है। जिनके पास ना अम्बर (वस्त्र) है और ना आडम्बर (परिग्रह) है, वही सही में दिगम्बर है।</p>
<p><strong> नग्न मुद्रा पूजनीय</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि महाभारत के युद्ध में नारायण श्री कृष्ण ने युद्ध के समय अर्जुन से कहा &#8220;देखो पार्थ, उस ओर से दिगम्बर मुनि आ रहे हैं। यह महान मंगलकारी दर्शन होने से हमारी विजय निश्चित है। भारतीय सनातन संस्कृति मे वेदों, ग्रन्थों पुराणों को प्रमाण माना जाता है और सभी में यह निर्विकार नग्न मुद्रा सम्मानीय दृष्टि से पूज्यनीय स्वीकार की गई है। यह मुद्रा ही मुक्ति का साक्षात् कारण है।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र : बिना मन को मारे राम नहीं बना जा सकता &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Mar 2023 13:41:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा/संजय जैन हटा की विशेष रिपोर्ट&#8230; हटा। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>इंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा/संजय जैन हटा की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>हटा।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि निरंजन सागर महाराज ने कहा कि आज हम उन्हें याद करेंगे, जो हम सभी के अन्तरंग मे रमा है, जिसे राम कहते हैं। श्री रामजी का जीवन, राजभवन से वन और वन से राजभवन एवं पुनः राजभवन से वन की यात्रा का एक ऐसा जीवन्त अनोखा उदाहरण है, जिसने सम्पूर्ण विश्व को एक आदर्श मार्ग दिखा दिया।</p>
<p>सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में ऐसे दो महापुरुष हुये है, जो सर्वाधिक प्रसिद्धि को प्राप्त हुये हैं। एक हैं भगवान आदि ब्रह्मा आदिनाथ, जिन्हें ऋषभनाथ, वृषभनाथ भी कहते हैं। जिनके पुत्र सम्राट भरत चक्रवर्ती के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। दूसरे हैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी। दोनों महापुरुषों में कई समानताएं है।</p>
<p>जैसे दोनों का जन्म नवमी के दिन ही हुआ। दोनों का जन्म चैत्र मास में ही हुआ। दोनों उसी भव से मोक्ष को प्राप्त हुये। दोनों के पुत्र परम पराक्रमी थे। दोनों शलाका अर्थात् प्रसिद्ध पुरुष थे। दोनों उत्तम लक्षणों से युक्त शरीर के धारी थे। दोनों देवताओं की तरह ही रूप लावण्य धारी थे अर्थात् दोनों के दाढी-मूंछ आदी नहीं थे।</p>
<p><strong>विश्वव्यापी हैं राम</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि राम विश्वव्यापी व्यक्तित्व हैं। जैनाचार्यों ने भी श्री रामजी के जीवन को विश्व के सामने रखा है। आचार्य रविषेण जी महाराज द्वारा लिखित ग्रन्थराज पद्मपुराण, जो की पद्म अर्थात् राम के जीवन के जानने का सशक्त माध्यम है एवं आचार्य गुणभद्र कृत उत्तर पुराण में भी रामजी का जीवन वृतान्त अंकित है। पूरे विश्व मे लगभग हजार प्रकार से राम का जीवन पढ़ने को प्राप्त होता है।</p>
<p>जब भी राम जी के जीवन के चक्र पर चिन्तन करते हैं हर बार एक नया राम सामने आता है। एक ऐसा महापुरुष, जिसने अपने लिये नहीं बल्कि दूसरों के लिये ही जीवन जिया है। पहले पिता के वचनों का मान रखा, फिर पत्नी के सम्मान के लिए युद्ध किया और फिर एक न्यायप्रिय राजा होने के नाते सीता सती की परीक्षा तक के डाली।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र जारी : लड़ाई हो तो भरत-बाहुबली जैसी हो, वरना न हो &#8211; मुनि श्री निरंजनसागर जी महाराज </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Mar 2023 12:07:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कुंडलपुर में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा कि हमें भरत-बाहुबली से सीखना चाहिए, जिन्होंने युद्ध विजय के बाद वैराग्य धारण किया था। पढ़िए जयकुमार जैन जलज/राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट&#8230; कुंडलपुर। साइंस ऑफ लिविंग में आज हम एक ऐसा अनोखा विषय प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे हर व्यक्ति परिचित है। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>कुंडलपुर में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा कि हमें भरत-बाहुबली से सीखना चाहिए, जिन्होंने युद्ध विजय के बाद वैराग्य धारण किया था। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए जयकुमार जैन जलज/राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर।</strong> साइंस ऑफ लिविंग में आज हम एक ऐसा अनोखा विषय प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे हर व्यक्ति परिचित है। पर क्या उचित है, क्या अनुचित है, यह समझने का प्रयास हम सभी करेंगे। संपत्ति और स्वाभिमान को लेकर एक ऐसा महायुद्ध हुआ, जिसका अपना ही इतिहास है। यूं तो रामायण और महाभारत आदि बड़े-बड़े ग्रंथ युद्ध और योद्धाओं के रण कौशल और वीरता के इतिहास से भरे पड़े हैं। पर आज हम जिस युद्ध की चर्चा करने जा रहे हैं, वह युद्ध भी विशेष है और उसके योद्धा भी। उस युद्ध की दर्शक थी दोनों पक्ष की सेना। यह बात मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने प्रवचन के दौरान कही।</p>
<p>उन्होंने कहा कि प्रश्न खड़ा होता है कि जब सेना दर्शक थी तो युद्ध हुआ किसमें? इस प्रश्न का उत्तर मिला आचार्य जिनसेन स्वामी द्वारा लिखित ग्रंथराज आदिपुराण में। दोनों ही सेनाओं में जो मुख्य- मुख्य मंत्री आदि थे, उन्होंने विचार विमर्श किया। ये दोनों भाई आदि ब्रह्मा आदिनाथ भगवान के पुत्र थे। एक चक्रवर्ती सम्राट भरत है, जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा और जिनके सामने पूरा विश्व नतमस्तक है। अर्थात सम्राट भरत ने संपूर्ण पृथ्वी पर दिग्विजय प्राप्त की है। दूसरे हैं महाराज बाहुबली जिनमें यथा नाम तथा गुण है अर्थात महाराज बाहुबली के बाहुबल के आगे कोई भी नहीं टिक पाया। दोनों चरम शरीरी हैं। इनके पराक्रम के आगे देवता भी नतमस्तक हैं। इन दोनों महावीरों की तो कुछ भी क्षति नहीं होगी।</p>
<p>केवल युद्ध के कारण से दोनों पक्षों के लोगों का ही मरण होगा। जब इस बात का भरत और बाहुबली के समक्ष निवेदन किया, तब दोनों वीर सम्राटों ने बड़े धैर्य के साथ विचार कर कहा कि हमारे वर्चस्व के संग्राम में किसी प्रकार की ना ही जनहानि हो और ना ही धन हानि। बस यहां हानि अगर होगी तो वह होगी अहंकार की मान की। एक ऐसा युद्ध हो जिसमें हम दोनों ही परस्पर में जय- पराजय का निर्णय करें। धर्मयुद्ध की एक ऐसी संयोजना बनाई गई जिसमें जल युद्ध, दृष्टि युद्ध और मल्ल युद्ध ऐसे तीन युद्धो के माध्यम से निर्णय हो सके। तीनों ही युद्धों में छोटे भाई बाहुबली विजय श्री को प्राप्त हुए।</p>
<p>चक्रवर्ती भरत के मान को गहरा धक्का लगा और उन्होंने क्रोध के आवेग में अपना सुदर्शन चक्र बाहुबली के ऊपर चला दिया। चूंकि देवोपनीत शस्त्र कुटुंब के लोगों पर कार्यकारी नहीं रहता है। अतः वह चक्र भी बाहुबली की परिक्रमा कर शांत हो गया। भरत चक्रवर्ती के इस कृत्य को सभी ने निंदनीय कहा और चहुंओर से बाहुबली की जय-जयकार से वातावरण गुंजायमान हो गया। उस समय एक ऐसा महान आश्चर्य कारी दृश्य सभी के देखने में आया, जिसमें सभी दर्शकों की आंखें और ह्रदय भीग गए। विजयश्री प्राप्त होने पर भी बाहुबली को घोर पश्चाताप हुआ। बाहुबली ने कहा कि बड़ा भाई पिता तुल्य होता है और मैं इतना निकृष्ट कैसे हो गया कि पिता तुल्य बड़े भाई पर इस नश्वर राजलक्ष्मी के लिए मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला।</p>
<p>मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं इस वैभव का त्याग कर वैराग्य की ओर जा रहा हूं। मैं इस राजलक्ष्मी का त्याग कर तपलक्ष्मी को अंगीकार करता हूं। मैं दिगंबर जैनेश्वरी दीक्षा को स्वीकार करता हूं। भरत महाराज ने कहा, भाई तुमने नहीं मैंने दुष्टता का कार्य किया है। छोटा भाई तो पुत्र के समान होता है। यह मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया है, अनर्थ हो गया है। भाई मुझे क्षमा कीजिए। दोनों भाई फूट-फूटकर एक दूसरे से क्षमा याचना कर रहे। दोनों भाई अपने आप को अपराधी कह रहे, पापी कह रहे हैं और भाई से भाई क्षमा प्रार्थना कर रहे हैं ।बाहुबली अपने संकल्प पर दृढ़ रहते हुए पुत्र महाबली को राज्य सौंपते हुए कह गए कि भरत महाराज की आज्ञा अनुसार राज्य शासन करना। वे बड़े हैं ,महान है उनके मार्गदर्शन में ही कार्य करना। इतना कह सभी से क्षमा याचना कर बाहुबली वन को चले गए। यह प्रसंग बहुत मार्मिक शिक्षा देता है।</p>
<p>बाहुबली तो वन को गए और हम थाने जाते हैं, कोर्ट जाते हैं। भरत -बाहुबली तो एक -दूसरे से क्षमा याचना कर रहे थे और हम एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते रहते हैं। क्या कभी हमें हमारे जीवन में कभी ऐसे प्रसंग पर वैराग्य आया है, आत्म ग्लानि हुई, पश्चाताप हुआ, क्यों नहीं हुआ? प्रश्न का उत्तर आप सभी जानते हैं।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र जारी : जो खुद को समझ पाते हैं वे ही खुदा बन पाते हैं- मुनि श्री निरंजनसागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Mon, 27 Feb 2023 15:21:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कुंडलपुर में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा कि हम स्व की ओर ध्यान न देकर पर की ओर ध्यान देते हैं, तो यह हमारी अज्ञानता है। पढ़िए जयकुमार जैन जलज/राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट&#8230; कुंडलपुर। सुप्रसिद्ध सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि सब का पता [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>कुंडलपुर में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा कि हम स्व की ओर ध्यान न देकर पर की ओर ध्यान देते हैं, तो यह हमारी अज्ञानता है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए जयकुमार जैन जलज/राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर।</strong> सुप्रसिद्ध सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि सब का पता हमें पता है पर खुद का पता पता नहीं। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में हम खुद को खोजने जा रहे हैं। यह प्रयास जिन्होंने पूर्ण कर लिया, उन्होंने अनंत आनंद की प्राप्ति कर ली है। हम स्व और पर के भेद विज्ञान को समझने का प्रयास करें। स्व अर्थात आत्म तत्व और पर अर्थात इस आत्म तत्वों से भिन्न जो भी दृश्यमान अदृश्य मान सत्व है सभी। हम स्व की ओर ध्यान न देकर पर की ओर ध्यान देते हैं, तो यह हमारी अज्ञानता है। आचार्य कहते हैं कि उत्तमा स्व आत्म चिंता अर्थात अपनी आत्मा की चिंता करना उत्तम है,श्रेष्ठ है।</p>
<p>इसे सही स्वार्थी कहा है (स्व+ अर्थी) जो अपने आत्म तत्व को ग्रहण करता है, उसे स्वार्थी कहते हैं। लौकिक जगत में स्वार्थी तो सभी हैं परंतु आध्यात्मिक जगत में स्वार्थी बनना सही मायने में स्वार्थी है। हम देहाती है (देह+ अति) जो देह पर अतिरिक्त ध्यान दे, वह देहाती ही तो है। यह बहुमूल्य नर पर्याप्त नारायण बनने का खुद से खुदा बनने का आत्मा से परमात्मा बनने का मार्ग प्रशस्त करने वाला पर्याय है। जो व्यक्ति स्वयं चार कदम नहीं चल सकता, वह दूसरों को क्या सहारा देगा।</p>
<p>इसी प्रकार जो अपना आत्म कल्याण नहीं कर सकतास वह दूसरों का या जगत का कल्याण क्या करेगा। इसलिए सर्वप्रथम अपने आत्मतत्व की चिंता अर्थात उसका ध्यान, मनन ,श्रद्धान चिंतवन करो, जिसके माध्यम से इस निरंजन निराकार ज्योति स्वरूप की प्राप्ति की जा सके। हमारा पता हमें पता नहीं और जगत का पता हम पता करने में लगे हैं। ऐसा व्यक्ति लापता( मूर्ख)ही कहलाता है। जिसे स्वयं का पता भी पता नहीं। हम आज तक देहाती बनते आए हैं पर देहातीत (देह + अतीत) नहीं बन पाए हैं। उस सिद्ध अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाए हैं। आज भगवान बनने की होड़ सी मची रही है। सभी ऐश्वर्य वाली प्रभुता से युक्त बनना चाहते हैं।</p>
<p>अपनी ढपली अपना राग। स्वयं तो निराधार और जगत को दिखा रहे आधार।ऐसे लोगों का नारा है भक्त नहीं भगवान बनेंगे। आप भगवान बनें और सभी भगवान बनें यह श्रेष्ठ विचार है, परंतु बिना भक्त बने भगवत सत्ता को प्राप्त करना त्रिकाल असंभव है। हमने आज तक ऐसी भक्ति नहीं की जिसके माध्यम से भगवान बनने का मार्ग खुल जाए। बिना मार्ग पर चले मंजिल नहीं मिलती। मोक्ष के मंदिर तलक हरगिज़ कदम जाता नहीं। जो बिना भक्त बने भगवान की परिकल्पना मन में रखे हुए हैं, यह एक विकृत मानसिकता का नकारात्मक परिणाम है। खुदा बनने के पहले खुद को समझना होगा। इस संसार में स्वयं को समझने के तीन ही ऐसे समीचीन माध्यम हैं, जिनका अवलंबन लेकर खुद को समझा जा सकता है।</p>
<p>जिसके जीवन में सच्चे देव हैं, जिसके जीवन में सच्चे गुरु हैं और जिसके जीवन में सच्चे शास्त्र हैं, वही व्यक्ति इन तीन रत्नों के माध्यम से अपने स्वरूप तक पहुंच सकता है। यह शरीर शव बने इसके पहले शिव (मोक्ष) को जाने का मार्ग जानना उस पर चलना होगा। अर्थी से पहले अर्थ को समझें, उस अर्थ को सार्थक करें वरना अनर्थ निश्चित है। जो सिद्धि प्रसिद्धि से कोसों दूर है, उसने ही अपने आत्म तत्व को सिद्ध किया है। जिसने खुद को समझने का प्रयास किया है, पूरी दुनिया ने भी उसी को समझने का प्रयास किया है। पूरी दुनिया में ऐसे विरले ही लोग हैं, जो खुद को समझ पाते हैं, वही खुदा बन पाते हैं।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग पर प्रवचन दे रहे हैं : संघर्ष भी सहर्ष स्वीकार करना चाहिए &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर जी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Feb 2023 10:06:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
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		<category><![CDATA[संघर्ष]]></category>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि जिस भी व्यक्ति ने संघर्षों को सहर्ष के साथ स्वीकार किया है, उस संघर्ष के काल में जिसने धैर्य को नहीं खोया, उसी व्यक्ति ने अपना जीवन सफल बनाया है। पढ़िए जयकुमार जैन जलज/राजेश रागी की विस्तृत रिपोर्ट&#8230; कुण्डलपुर। साइंस ऑफ लिविंग के आज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि जिस भी व्यक्ति ने संघर्षों को सहर्ष के साथ स्वीकार किया है, उस संघर्ष के काल में जिसने धैर्य को नहीं खोया, उसी व्यक्ति ने अपना जीवन सफल बनाया है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए जयकुमार जैन जलज/राजेश रागी की विस्तृत रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुण्डलपुर।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के आज के सत्र में हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि जीवन के विपरीत समय को किस तरह आनंद के साथ व्यतीत करना है। ज्ञात रहे कि किसी तरह पांडवों ने अपना अज्ञातवास का विपरीत काल व्यतीत किया। कई लोगों को लगता है कि इसमें क्या खास है। यह तो कथा -कहानी है। लेकिन अगर आप इस प्रसंग को मैनेजमेंट विजन (प्रबंधन की दृष्टि) से देखेंगे तो आपको यह प्रसंग बहुत बड़ा संदेशदायक दिखेगा। यह बात निरंजन सागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि हम सभी के जीवन में ऐसे प्रसंग कई बार आते हैं।</p>
<p>कई बार हम सभी को एक ऐसी परिस्थिति को महसूस करना पड़ता है, जिसे हम सभी नहीं चाहते। ऐसी परिस्थिति में हम बस एक ही प्रयास करते हैं कि येन- केन- प्रकारेण यह प्रतिकूल परिस्थिति हमारे अनुकूल बन जाए। जिस भी व्यक्ति ने संघर्षों को सहर्ष के साथ स्वीकार किया है, उस संघर्ष के काल में जिसने धैर्य को नहीं खोया, उसी व्यक्ति ने अपना जीवन सफल बनाया है। सही तैराक वही माना जाता है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी तैरना जानता हो। मुनि श्री ने कहा कि अनुकूल परिस्थितियों में तो सामान्य सा तैराक भी तैर लेता है।</p>
<p>एक महान राजवंश के उत्तराधिकारी थे पांडव, राजपुत्र थे, तब भी उनके साथ ऐसी परिस्थिति निर्मित हो गई। परिस्थिति का निर्मित होना महत्वपूर्ण बात नहीं है, वह तो किसी के भी साथ निर्मित हो सकती है। महत्वपूर्ण बात है उस परिस्थिति का सामना करना। पांडवों ने हिम्मत नहीं हारी और नतीजा सभी को भलीभांति अवगत है। विजय श्री ने पांडवों की चरण रज को शिरोधार्य किया। आपके जीवन में आई विपरीत परिस्थितियां संकेत हैं आपके महान बनने का। विश्व में जितने भी महान व्यक्ति हैं, उन्होंने उनके जीवन काल में आई विपरीत परिस्थिति का किस तरह धैर्य के साथ सामना किया, यह इतिहास हमें बतलाता है। ऐसे व्यक्ति ही इतिहास बनाते हैं। आपका जीवन भी विशेष तभी बनता है, जब आप कुछ विशेष करते हैं।</p>
<p>विशेषता के कारण ही वह सामान्य से अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। वे महान व्यक्ति हमारे लिए मिसाल बन जाते हैं। जिस-जिस व्यक्ति के जीवन में वन का संयोग मिला अर्थात वनवास मिला, उन-उन व्यक्तियों का आज अलग ही इतिहास है। जीवन (जी + वन) शब्द का अर्थ है जिसका जी अर्थात मन, वन अर्थात जंगल में भी लग जाए ऐसा जीवन ही मंगलमय बनता है। विपरीत परिस्थितियों में जिसने अपनी मन: स्थिति को संभाल लिया और धैर्य का संयम का परिचय दिया, वही आज इतिहास में उच्च स्थिति पर पहुंचा है। जिस युधिष्ठिर को धर्मराज कहा जाता था, जिसने कभी किसी का अहित नहीं किया। ऐसे धर्मराज युधिष्ठिर को धर्म उपदेश देने वाला पुरोहित बनना पड़ा।</p>
<p>उन्होंने कहा कि जिसके एक इशारे पर स्वादिष्ट भोजन के थाल के थाल सामने आते थे, ऐसे महाबली भीम को भी रसोईया बनना पड़ा। अर्जुन के एक संकेत पर सैकड़ों नृतक-नृतकी मनोरंजन के लिए तुरंत आते थे, ऐसे पार्थ को भी नृत्य का प्रशिक्षण देने वाला ब्रह्न्नला बनना पड़ा। जो स्वयं एक श्रेष्ठ योद्धा है श्रेष्ठ घुड़सवार थे, उनके एक आदेश पर एक से बढ़कर एक घोड़े उनकी सवारी को हाजिर रहते थे। ऐसे नकुल कुमार को भी घुड़साल में सेवा करनी पड़ी। सैकड़ों गोशाला और करोड़ों गोवंश जिनके राज्य में जिनकी सेवा करते थे, ऐसे सहदेव को भी राजा का सेवक वन गायों की सेवा करनी पड़ी। क्या नहीं बीता पांडवों पर लेकिन उन्होंने संघर्ष किया वह भी हर्ष के साथ। विपरीत परिस्थितियों को सहना जिसने सीख लिया है, उसने जीवन को जीना सीख लिया है। मायने यह नहीं रखता कि आदमी कितना जिया, मायने रखता है आदमी कैसे जिया।</p>
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		<title>शब्दों का खेल ,कभी मेल...तो कभी बेमेल: मुनि श्री निरंजन सागर जी की वाणी पर आधारित लेख </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 17 Feb 2023 13:55:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[inspairing stories]]></category>
		<category><![CDATA[jain katha]]></category>
		<category><![CDATA[jain pravachan]]></category>
		<category><![CDATA[kundalpur jain program]]></category>
		<category><![CDATA[muni niranjan sagar]]></category>
		<category><![CDATA[sant vani]]></category>
		<category><![CDATA[कुंडलपुर में जैन कार्यक्रम]]></category>
		<category><![CDATA[जिनवाणी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन कथाएं]]></category>
		<category><![CDATA[जैन प्रवचन]]></category>
		<category><![CDATA[प्रेरणादायी कहानियां]]></category>
		<category><![CDATA[संत वाणी]]></category>
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					<description><![CDATA[कुंडलपुर में आयोजित धर्म सभा में मुनि श्री निरंजन सागर जी ने हित ,मित और प्रिय शब्दों का प्रयोग करने को कहा है। हितकारी वचन अर्थात जो दूसरों के लिए और अपने लिए कल्याणकारी हो । जिसमें अपना वा दूसरों का स्वार्थ सधता हो, वे हितकारी वचन नहीं है । विस्तारपूर्वक पढ़िए ये संत वाणी,जिेस [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कुंडलपुर में आयोजित धर्म सभा में मुनि श्री निरंजन सागर जी ने हित ,मित और प्रिय शब्दों का प्रयोग करने को कहा है। हितकारी वचन अर्थात जो दूसरों के लिए और अपने लिए कल्याणकारी हो । जिसमें अपना वा दूसरों का स्वार्थ सधता हो, वे हितकारी वचन नहीं है । <span style="color: #ff0000;">विस्तारपूर्वक पढ़िए ये संत वाणी,जिेस आप तक पहुंचा रहे हैं हमारे सहयोगी जयकुमार जलज हटा और राजेश रागी बकस्वाहा</span></strong></p>
<hr />
<p>&#8220;मितकारी वचन अर्थात संक्षिप्त ,सारगर्भित, सांकेतिक( टू द प्वाइंट)। यदि दो शब्द से काम चल जाए तो तीसरा शब्द बोलने की आवश्यकता नहीं है । लोकोक्ति भी है कि &#8220;समझदार के लिए इशारा ही काफी है&#8221;। प्रिय कारी अर्थात अमृतमय सत्य। सामान्य रूप से कहने में यही आता है कि&#8221; सच कड़वा होता है।&#8221; एक जगह हमें पढ़ने को मिला कि सच केवल कड़वा ही नहीं होता । सच अमृत के समान भी होता है । जिनके भीतर विष होता है उन्हें वह विषाक्त मालूम होता है । लेकिन वह होता अमृतमय है । जिस प्रकार ज्वर से संतृप्त पुरुष को कुछ भी खिलाएं पिलाएं उसे उसका स्वाद कड़वा ही लगता है । आचार्यों ने स्पष्ट कहा है&#8221; सत्यम अपि विपदे&#8221; अर्थात ऐसा शब्द जिसमें दूसरों को क्षति पहुंचती हो वह सत्य भी असत्य की श्रेणी में है । यह मात्र जैन दर्शन में पढ़ने, देखने और जानने को मिलता है । पूरी दुनिया सत्य के बारे में यही मानती है कि जैसा देखा, सुना ,जाना वैसे का वैसा कह दो इसी का नाम सत्य है ।</p>
<p><strong>सत्य वद्- प्रियंवद् अप्रियं न वद् कथन को कहानी से समझिए</strong><br />
आचार्य कहते हैं सत्य वद्- प्रियंवद् अप्रियं न वद् । प्रिय असत्यं अपि न वद्। अप्रियं सत्य कदापि ना वद्। इस प्रसंग को एक उदाहरण से समझते हैं । एक राजा को अपना चित्र बनवाना था। इसके लिए बहुत सारे कलाकार बुलवाएं । राजा का चित्र तो सुंदर ही बनना चाहिए । पर राजा के साथ मुश्किल यह थी कि उनकी एक आंख नहीं थी। अब राजा का सुंदर चित्र बनाना है। अगर चित्र सच्चा बनाते हैं तो सुंदर नहीं बनेगा क्योंकि एक आंख नहीं बनेगी ।एक चित्रकार ने कहा इससे कोई मतलब नहीं जो सच है वही बनाएंगे । उसने राजा की एक आंख नहीं बनाई बाकी तो सब सुंदर था । राजा को वह चित्र पसंद नहीं आया। दूसरे कलाकार ने सोचा अरे वाह सुंदर बनाना चाहिए। सच से क्या मतलब उसने राजा की दोनों आंखें एकदम दुरुस्त एकदम बढ़िया बना दी ।उसे देखकर राजा ने कहा यह चित्र झूठा है । सुंदर तो है । यह प्रिय मालूम पड़ता है लेकिन झूठा है। पहले वाला अप्रिय मालूम पड़ रहा था वह सच्चा था। दोनों ही रिजेक्ट (अस्वीकृत )हो गए । सच जो प्रिय है वह भी ठीक नहीं है और झूठ जो कि प्रिय है वह भी ठीक नहीं है । तीसरे कलाकार ने चित्र बनाया राजा बहुत शूरवीर है बलवान है और तीरंदाज है । वह हाथ में धनुष बाण लिए है और निशाना साध रहे हैं । निशाना साधने पर एक आंख बंद रहती है। चित्र में इस प्रकार एक आंख बंद दिखाई गई । वह चित्र पास हो गया । क्योंकि वह सत्य भी है प्रिय भी है । आप सब समझ रहे हैं इस बात को हमें सत्य भी और प्रिय भी किस तरह से इस बात का ध्यान रखना है । इस प्रकार अपन अगर थोड़ी सावधानी रखकर अपने वचनों का प्रयोग करें तो अपन अपने जीवन को बहुत ऊंचा उठा सकते हैं । आपके वचन, वाद-विवाद का कारण न बनें । बल्कि सही वचनों का प्रयोग वाद को पलटने की क्षमता रखता है । शब्दों का खेल ,कभी मेल, तो कभी बेमेल ।शब्द अर्थ बने अनर्थ ना हो तभी तो सार्थकता है । नहीं तो, वाद विवाद, वाद विलोम रूप से कह रहा है वा&#8212;द, द&#8212;वा। शब्दों में प्राणदायक शक्ति भी होती है और प्राणहारक भी।</p>
<p>&nbsp;</p>
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