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	<title>Minority Status &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Minority Status &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>महाराष्ट्र के मंत्री लोढ़ा के बयान से सकल जैन समुदाय आहत : समग्र जैन समुदाय में तीखी प्रतिक्रियाएं आईं सामने  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 12 Apr 2026 12:56:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा बनाए रखना चाहिए या छोड़ देना चाहिए, इस मुद्दे पर महाराष्ट्र में विवाद खड़ा हो गया है। महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री मंगलप्रभात लोढ़ा ने मुंबई में कहा कि जैन धर्म हिंदू संस्कृति का हिस्सा है और उसे अल्पसंख्यक दर्जा छोड़ने पर विचार करना चाहिए। इस बयान के बाद पूरे भारत [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा बनाए रखना चाहिए या छोड़ देना चाहिए, इस मुद्दे पर महाराष्ट्र में विवाद खड़ा हो गया है। महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री मंगलप्रभात लोढ़ा ने मुंबई में कहा कि जैन धर्म हिंदू संस्कृति का हिस्सा है और उसे अल्पसंख्यक दर्जा छोड़ने पर विचार करना चाहिए। इस बयान के बाद पूरे भारत में समग्र जैन समुदाय में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा बनाए रखना चाहिए या छोड़ देना चाहिए, इस मुद्दे पर महाराष्ट्र में विवाद खड़ा हो गया है। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री मंगलप्रभात लोढ़ा ने मुंबई में कहा कि जैन धर्म हिंदू संस्कृति का हिस्सा है और उसे अल्पसंख्यक दर्जा छोड़ने पर विचार करना चाहिए। इस बयान के बाद पूरे भारत में समग्र जैन समुदाय में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। मंत्री ने जैन समुदाय के लोगों को विश्वास में लिए बिना दिए इस बयान से विश्व की जैन समुदाय में नाराजगी देखी जा रही है। जैन अल्पसंख्यक विकास आर्थिक महामंडल के अध्यक्ष ललित गांधी, विश्व जैन संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय जैन, मयंक जैन, डॉ.जैनेंद्र जैन, प्रदीप बड़जात्या ने मंत्री मंगलप्रभात लोढ़ा के बयान पर कड़ा विरोध जताया है। ललित गांधी ने कहा कि यह बयान अज्ञानता से दिया गया है या किसी पूर्व नियोजित रुख का हिस्सा है। डॉ. जैनेंद्र जैन ने कहा कि जैन धर्म भारत का एक स्वतंत्र और प्राचीन दर्शन है।</p>
<p>यह हिंदू धर्म की शाखा या उपशाखा नहीं है। संजय जैन ने कहा कि जैन समुदाय को मिला अल्पसंख्यक दर्जा हमारा संवैधानिक अधिकार है। यह हमारे प्राचीन विरासत के संरक्षण का एक प्रभावी माध्यम है। राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने मंत्री लोढ़ा विश्व जैन समाज से माफी मांगने और मंत्री पद से इस्तीफा देने की मांग की है।</p>
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		<title>जैन धर्म समन्वय है, परंतु विलय नहीं : अल्पसंख्यक दर्ज़े पर उठते प्रश्न और जैन समाज की स्वतंत्र पहचान </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Apr 2026 06:21:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारत की सांस्कृतिक परंपरा का सबसे बड़ा गुण उसकी विविधता और सहअस्तित्व की भावना है। यहाँ अनेक धार्मिक धाराएँ, संप्रदाय और दार्शनिक परंपराएँ हजारों वर्षों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। इसी बहुलतावादी परंपरा ने भारतीय समाज को एक अनोखी पहचान दी है। आज पढ़िए, राष्ट्र गौरव राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जैन प्रतिनिधि डॉ. इन्दु जैन का यह आलेख&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारत की सांस्कृतिक परंपरा का सबसे बड़ा गुण उसकी विविधता और सहअस्तित्व की भावना है। यहाँ अनेक धार्मिक धाराएँ, संप्रदाय और दार्शनिक परंपराएँ हजारों वर्षों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। इसी बहुलतावादी परंपरा ने भारतीय समाज को एक अनोखी पहचान दी है। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, राष्ट्र गौरव राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जैन प्रतिनिधि डॉ. इन्दु जैन का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>भारत की सांस्कृतिक परंपरा का सबसे बड़ा गुण उसकी विविधता और सहअस्तित्व की भावना है। यहाँ अनेक धार्मिक धाराएँ, संप्रदाय और दार्शनिक परंपराएँ हजारों वर्षों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। इसी बहुलतावादी परंपरा ने भारतीय समाज को एक अनोखी पहचान दी है। जैन धर्म भी इसी प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक धारा की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट परंपरा है। किंतु समय-समय पर यह प्रश्न उठाया जाता रहा है कि जैन धर्म की स्वतंत्र पहचान क्या वास्तव में अलग है या वह केवल हिंदू धर्म की एक शाखा भर है। हाल के वर्षों में यह बहस फिर से सामने आई है, विशेषकर तब , जब कुछ राजनीतिक व्यक्तित्व जैन समाज के अल्पसंख्यक दर्ज़े पर पुनर्विचार की बात कर रहे हैं और व्यर्थ की बयानबाजी कर रहे हैं ।</p>
<p>यह स्मरण रखना आवश्यक है कि जैन समाज को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्ज़ा वर्ष 2014 में प्रदान किया गया था। यह निर्णय किसी आकस्मिक राजनीतिक घोषणा का परिणाम नहीं था, बल्कि लंबे समय से चली आ रही संवैधानिक और वैचारिक बहसों का निष्कर्ष था। जैन समुदाय की जनसंख्या भारत की कुल आबादी का लगभग 0.4 प्रतिशत है, जो कि देश के अनेक अन्य समुदायों की तुलना में अत्यंत कम है। इस दृष्टि से जैन समाज वस्तुतः एक अल्पसंख्यक समुदाय है। अतः यह निर्णय किसी विशेष सुविधा देने का नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक विसंगति को सुधारने का प्रयास था।</p>
<p>जब यह निर्णय घोषित हुआ, तब समाज में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। जैन समाज में प्रसन्नता का वातावरण था, क्योंकि लंबे समय से चली आ रही एक मांग पूरी हुई थी। दूसरी ओर कुछ लोगों ने आशंका व्यक्त की, कि इससे समाज में विभाजन की भावना उत्पन्न होगी। कुछ लोगों ने यह भी प्रश्न उठाया कि जैन तो हिंदू समाज का ही हिस्सा हैं, फिर उन्हें अलग अल्पसंख्यक दर्ज़ा देने की आवश्यकता क्यों पड़ी ?</p>
<p>दरअसल इन प्रश्नों के पीछे एक मूलभूत भ्रम छिपा हुआ है—अल्पसंख्यक शब्द का अर्थ क्या है ? भारत में “अल्पसंख्यक” का अर्थ किसी धर्म से अलगाव या राष्ट्र से दूरी नहीं है। बौद्ध, सिख, ईसाई और पारसी समुदाय भी भारत में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन इससे उनकी भारतीयता या सांस्कृतिक पहचान पर कोई आंच नहीं आती। उसी प्रकार जैन समाज का अल्पसंख्यक दर्ज़ा भी केवल यह स्वीकार करता है कि उसकी अपनी स्वतंत्र धार्मिक परंपरा और पहचान है।</p>
<p>जैन धर्म की विशेषता उसके गहरे और विशिष्ट दर्शन में निहित है। अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह और आत्मशुद्धि की साधना उसके मूल स्तंभ हैं। चौबीस तीर्थंकरों की परंपरा, जैन आगम साहित्य, साधु-संघ की कठोर अनुशासन व्यवस्था और मोक्षमार्ग की विशिष्ट अवधारणा जैन धर्म को भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में एक अलग स्थान प्रदान करती है। यह केवल एक सांस्कृतिक धारा नहीं बल्कि एक पूर्ण विकसित धार्मिक और दार्शनिक परंपरा है।</p>
<p>निस्संदेह जैन धर्म और हिंदू समाज के बीच सांस्कृतिक निकटता रही है। अनेक सामाजिक परंपराएँ, त्योहार और जीवन-मूल्य दोनों समुदायों में समान दिखाई देते हैं। किंतु सांस्कृतिक समानता का अर्थ धार्मिक विलय नहीं होता। भारत की सभ्यता का स्वभाव ही ऐसा रहा है कि यहाँ विभिन्न धार्मिक धाराएँ एक-दूसरे के साथ संवाद करती रही हैं और एक-दूसरे से प्रेरणा भी लेती रही हैं।</p>
<p>वास्तव में “हिंदू” शब्द कई बार एक व्यापक सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक होता है, जिसमें भारत में उत्पन्न अनेक धार्मिक परंपराएँ सम्मिलित हैं। इस दृष्टि से जैन, बौद्ध और सिख परंपराएँ भी भारतीय संस्कृति की धारा से जुड़ी हुई हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी स्वतंत्र धार्मिक पहचान समाप्त हो जाती है या उन्हें किसी एक धर्म की शाखा मान लिया जाए।</p>
<p>आज जो लोग यह कहते हैं कि जैन धर्म को अलग अल्पसंख्यक दर्ज़ा देने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें यह भी समझना चाहिए कि अल्पसंख्यक दर्ज़ा केवल आर्थिक लाभ का विषय नहीं है। भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों को जो अधिकार दिए गए हैं, उनका मुख्य उद्देश्य उनकी भाषा, संस्कृति और शिक्षण संस्थाओं का संरक्षण करना है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि छोटे समुदाय भी अपनी परंपराओं और धरोहरों को सुरक्षित रख सकें।</p>
<p>कभी-कभी यह तर्क भी दिया जाता है कि जैन समाज आर्थिक रूप से समृद्ध है, इसलिए उसे किसी संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। यह भी एक सामान्यीकृत धारणा है। समाज का एक छोटा हिस्सा भले ही आर्थिक रूप से संपन्न हो, किंतु पूरे समुदाय को उसी कसौटी पर नहीं आँका जा सकता। इसके अतिरिक्त किसी समुदाय की आर्थिक स्थिति उसके धार्मिक अधिकारों का आधार नहीं होती।</p>
<p>जैन समाज की पहचान उसके नैतिक मूल्यों से बनती है। अहिंसा, संयम, सादगी और शिक्षा के प्रति गहरा आग्रह जैन जीवन का मूल आधार है। यही कारण है कि जैन समाज ने व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। लेकिन इन उपलब्धियों के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी है—अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के प्रति सजग रहना।</p>
<p>यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझने की आवश्यकता है—समन्वय और विलय में मूलभूत अंतर होता है। जैन धर्म ने सदैव समन्वय की भावना को अपनाया है। अनेकांतवाद का सिद्धांत ही यह सिखाता है कि सत्य को अनेक दृष्टियों से समझा जा सकता है। इसलिए जैन समाज ने कभी किसी अन्य धर्म या संस्कृति से संघर्ष का मार्ग नहीं अपनाया।</p>
<p>परंतु समन्वय का अर्थ अपनी स्वतंत्र पहचान को समाप्त कर देना नहीं है। यदि किसी समुदाय की विशिष्ट धार्मिक पहचान ही धीरे-धीरे विलुप्त होने लगे, तो उसकी परंपराएँ और दार्शनिक विरासत भी कमजोर पड़ सकती हैं।</p>
<p>भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित है। यहाँ अनेक धार्मिक परंपराएँ मिलकर एक विशाल सांस्कृतिक वृक्ष का निर्माण करती हैं। इस वृक्ष की प्रत्येक शाखा का अपना महत्व है। यदि किसी शाखा को यह कहकर समाप्त कर दिया जाए कि वह उसी वृक्ष का हिस्सा है, तो इससे उस वृक्ष की समृद्धि ही घटेगी।</p>
<p>अतः आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय समाज विविधता के इस मूल सिद्धांत को समझे। जैन धर्म भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग अवश्य है, किंतु वह अपनी स्वतंत्र धार्मिक पहचान और दर्शन के साथ अस्तित्व में है। इस स्वतंत्रता का सम्मान करना ही भारतीय लोकतंत्र और सांस्कृतिक परंपरा की सच्ची भावना है।</p>
<p>समन्वय भारतीयता की शक्ति है, लेकिन विलय उसकी कमजोरी बन सकता है। इसलिए जैन समाज के लिए भी और व्यापक भारतीय समाज के लिए भी यही उचित होगा कि सहयोग, सम्मान और संवाद की भावना के साथ प्रत्येक धार्मिक परंपरा की स्वतंत्र पहचान को सुरक्षित रखा जाए। यही भारत की बहुलतावादी आत्मा का वास्तविक सम्मान होगा।</p>
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		<title>अल्पसंख्यक मंत्रालय लेगा सभी राज्यों के अल्पसंख्यक मंत्रियों की बैठकः अल्पसंख्यक वर्ग भारत में सबसे अधिक सुरक्षित </title>
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		<pubDate>Thu, 27 Mar 2025 11:44:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग नेएक महत्वपूर्ण सम्मेलन का आयोजन किया। जिसमें भारत में अल्पसंख्यकों की शिक्षा, समावेशन और सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसमें नीति निर्माताओं, विशेषज्ञों और हितधारकों को एक साथ लाकर अल्पसंख्यक समुदायों के लिए समान अवसर और कल्याण सुनिश्चित करने की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया। पढ़िए जयपुर से जिनेन्द्र जैन की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग नेएक महत्वपूर्ण सम्मेलन का आयोजन किया। जिसमें भारत में अल्पसंख्यकों की शिक्षा, समावेशन और सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसमें नीति निर्माताओं, विशेषज्ञों और हितधारकों को एक साथ लाकर अल्पसंख्यक समुदायों के लिए समान अवसर और कल्याण सुनिश्चित करने की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए जयपुर से जिनेन्द्र जैन की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> राज्य अल्पसंख्यक आयोगों के एक महत्वपूर्ण सम्मेलन के आयोजन में भारत के अल्पसंख्यकों की शिक्षा, समावेशन और सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, विशेषज्ञों और हितधारकों को एक साथ लाकर अल्पसंख्यक समुदायों के लिए समान अवसर और कल्याण सुनिश्चित करने की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया।</p>
<p><strong>विचार-विमर्श वाले सत्र हुए</strong></p>
<p>राजस्थान समग्र जैन युवा परिषद् के अध्यक्ष जिनेन्द्र जैन को सहभागिता करने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रतिष्ठित पैनलिस्टों के साथ विचार-विमर्श वाले सत्र हुए। जिसमें शिक्षा की अल्पसंख्यकों तक पहुंच और सहायता सुनिश्चित करना। समावेशी शिक्षा के लिए चुनौतियों और समाधानों पर विचार करना, अल्पसंख्यक समावेशन और कल्याण सशक्तिकरण और विकास को बढ़ावा देने में सरकार की भूमिका पर विशेष प्रकाश डाला गया।</p>
<p>इस अवसर पर अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री श्री जॉर्ज कुरियन ने अपने उद्घाटन भाषण में बताया कि अल्पसंख्यक समुदायों के उत्थान के लिए कई समर्पित योजनाएं हैं और उनके कल्याण के लिए अतिरिक्त पहल भी की गई हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत में अल्पसंख्यक समुदाय कुछ पड़ोसी देशों की तुलना में अधिक सुरक्षित हैं।</p>
<p><strong>अल्पसंख्यकों को सशक्त बनाने और उनके उत्थान हेतु</strong></p>
<p>समारोह मुख्य अतिथि केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अल्पसंख्यक कल्याण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए उपस्थित लोगों को संबोधित किया। अल्पसंख्यक समुदायों के कल्याण के लिए देशभर में अल्पसंख्यक समुदायों की प्रमुख चिंताओं पर प्राथमिकता से विचार किया जाएगा और उनका समाधान करने के लिए विभिन्न राज्यों के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रियों के साथ एक बैठक बुलाई जाएगी। मंत्रालय अल्पसंख्यकों को सशक्त बनाने और उनके उत्थान के उद्देश्य से योजनाओं एवं पहलों को मजबूत करने तथा लागू करने के लिए राज्य सरकारों से गैप फंडिंग सहायता के अनुरोधों की जांच करेगा,जिससे देश भर में समावेशी विकास सुनिश्चित होगा।</p>
<p><strong>राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को जानकारी दी</strong></p>
<p>इस कार्यक्रम का समापन राज्य अल्पसंख्यक आयोगों के सामने आने वाली चुनौतियों पर एक खुली चर्चा के साथ हुआ। जिसमे राजस्थान समग्र जैन युवा परिषद् के अध्यक्ष जिनेन्द्र जैन ने राजस्थान सरकार के तथा अल्पसंख्यक मामलात विभाग के मुखिया भजनलाल शर्मा और शिक्षा विभाग के मुखिया मदन दिलावर के द्वारा राजस्थान में अल्पसंख्यक वर्ग के हितार्थ अनूठी पहलों के बारे में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष इकबालसिंह लालपुरा को जानकारी प्रदान की। जिस पर राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के कार्यों की प्रशंसा की और सभी राज्यों में अगले वर्ष इसे लागू करने के पर निवेदन कार्यवाही करने का उचित आश्वाशन प्रदान किया। इसके बाद श्री इकबालसिंह लालपुरा द्वारा समापन भाषण दिया गया। समारोह में कई राज्यों के आयोगों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्य, प्रशासनिक अधिकारी एवं अल्पसंख्यक वर्ग के विभिन्न संगठनों ने भाग लिया।</p>
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		<title>उच्च न्यायालय के निर्णय से अब जैन वैवाहिक विवादों के फैसले हिंदू विवाह के तहत होंगेः असमंजस की स्थिति व संशय समाप्त  </title>
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		<pubDate>Tue, 25 Mar 2025 09:18:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कुटुंब न्यायालय द्वारा दिए गए विवादित आदेश को निरस्त किया जिसमें कहा गया था कि जैन समाज पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता। विश्व जैन संगठन एवं जिन शासन एकता संघ के मयंक जैन ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय का स्वागत करते कहा कि जैन दशकों से समाज के वैवाहिक मामलों में हिंदू [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कुटुंब न्यायालय द्वारा दिए गए विवादित आदेश को निरस्त किया जिसमें कहा गया था कि जैन समाज पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता। विश्व जैन संगठन एवं जिन शासन एकता संघ के मयंक जैन ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय का स्वागत करते कहा कि जैन दशकों से समाज के वैवाहिक मामलों में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ही निर्णय करते रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इंदौर से राजेश जैन दद्दू की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने कुटुंब न्यायालय द्वारा दिए गए उस विवादित आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि जैन समाज पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता। उच्च न्यायालय ने इस आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए स्पष्ट किया कि देश के संसद ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत जैन समाज को उक्त अधिनियम के अधीन हिंदुओं के समकक्ष ही माना था। अतः जैन समुदाय के व्यक्तियों के विवाह संबंधी मामलों में हिंदू विवाह अधिनियम 1955 ही प्रभावशाली कानून होगा।</p>
<p><strong>फैसला स्थापित विधिक प्रक्रिया के विपरीत  </strong></p>
<p>हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों को हिंदू विवाह अधिनियम में सम्मिलित किया गया था। विवाह विच्छेद से संबंधित मामलों में जैन दंपतियों पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू न होने का कुटुंब न्यायालय का फैसला न केवल समाज को असमंजस में डालने वाला था, बल्कि यह एक स्थापित विधिक प्रक्रिया के विपरीत भी था।</p>
<p><strong>असमंजस की स्थिति व संशय समाप्त </strong></p>
<p>वर्ष 2014 में केंद्र सरकार ने जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा प्रदान किया था, लेकिन इसके बावजूद विवाह संबंधी हजारों मामले हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत ही निराकृत किए गए हैं। इस निर्णय के बाद जैन समाज के लोग असमंजस में थे कि उनके विवाह संबंधी विवाद किस कानून के तहत सुलझाए जाएंगे। उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अब यह संशय पूरी तरह समाप्त हो गया है। उच्च न्यायालय का यह फैसला न केवल संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करता है, बल्कि जैन समाज के हितों की भी रक्षा करता है।</p>
<p><strong>समाजजनों ने निर्णय को स्वागत योग्य बताया</strong></p>
<p>उच्च न्यायालय के इस फेसले का जैन समाज के वरिष्ठ समाजसेवी डॉ जैनेन्द्र जैन, महावीर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष देवेन्द्र कांसल, सुशील पांड्या, हंसमुख गांधी, टीके वेद एवं फेडरेशन की राष्ट्रीय शिरोमणि संरक्षिका पुष्पा कासलीवाल परवार समाज महिला संगठन की अध्यक्ष मुक्ता जैन आदि ने उच्च न्यायालय के इस साहसिक निर्णय को स्वागत योग्य बताया।</p>
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		<title>जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक पर प्रतियोगिता का आयोजनः जैन धर्म के प्रति सम्मान प्रदर्शित  </title>
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		<pubDate>Sun, 23 Mar 2025 04:01:03 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक के उपलक्ष्य में उत्सव रूप में मनाते हुए विभिन्न गतिविधियों को शामिल किया गया। जिसमें विद्यार्थियों ने ऋषभदेवजी के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर प्रकाश डालते हुए प्रतियोगिता को सफल बनाया। पढ़िए बीकानेर से जितेन्द्र जैन की यह पूरी खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक के उपलक्ष्य में उत्सव रूप में मनाते हुए विभिन्न गतिविधियों को शामिल किया गया। जिसमें विद्यार्थियों ने ऋषभदेवजी के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर प्रकाश डालते हुए प्रतियोगिता को सफल बनाया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बीकानेर से जितेन्द्र जैन की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बीकानेर।</strong> श्री जैन पब्लिक स्कूल, बीकानेर में राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित जैन धर्म के प्रवर्तक देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक के उपलक्ष्य में उत्सव रूप में मनाते हुए चार्ट निर्माण, रंगोली, सजावट, पोस्टर एवं निबंध लेखन जैसी गतिविधियों को शामिल किया गया। जिसमें कक्षा 1 से 12वीं तक के 100 से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लेते हुए ऋषभदेव जी के जीवन और उनकी शिक्षाओं से जुड़ी बातों पर प्रकाश डालते हुए प्रतियोगिता को सफल बनाया।</p>
<p><strong>जैन धर्म के प्रति सम्मान प्रदर्शित </strong></p>
<p>शालाध्यक्ष विजय कुमार कोचर के अनुसार राज्य सरकार का यह निर्णय न केवल जैन धर्म के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का एक महत्वपूर्ण कदम है बल्कि यह हमारे विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं से परिचित कराने का एक सार्थक प्रयास भी है। इससे विद्यार्थियों में नैतिक मूल्य और सामाजिक सद्भाव की भावना का विकास होगा जो उनके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।</p>
<p><strong>राज्य सरकार के निर्णय का स्वागत</strong></p>
<p>सचिव सीए माणक कोचर ने विद्यार्थियों के जीवन में भारतीय संस्कृति एवं अध्यात्म की जड़ों को सिंचित करने का प्रयास करती इस प्रतियोगिता को करवाने के राज्य सरकार के निर्णय का हृदय से अति आभार व्यक्त करते हुए विद्यार्थियों के संचित ज्ञान का उत्कृष्ट प्रदर्शन देखकर उनके उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ प्रेषित की। सीईओ सीमा जैन एवं प्रधानाचार्या रूपश्री सिपानी ने प्रतियोगिता के दौरान बच्चों के उत्साह को देखते हुए आगामी सत्र में भी इस तरह की विभिन्न धार्मिक गतिविधियों को करवाने का आश्वासन दिया।</p>
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		<title>भगवान ऋषभदेव जन्म वं दीक्षा कल्याणक पर शिक्षा एवं अल्पसंख्यक विभाग की अनूठी पहलः राजस्थान के विद्यालयों में हुआ साकार </title>
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		<pubDate>Fri, 21 Mar 2025 13:33:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान सरकार एवं अल्पसंख्यक मामलात विभाग के मुखिया और शिक्षा विभाग के मुखिया के दिशा निर्देश पर जैन धर्म के प्रवर्तक देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक के उपलक्ष्य में सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में ऋषभदेव भगवान के जीवन पर विभिन्न प्रतियोगिता का आयोजन आयोजन किया गया। पढ़िए बामनवास से जिनेन्द्र जैन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>राजस्थान सरकार एवं अल्पसंख्यक मामलात विभाग के मुखिया और शिक्षा विभाग के मुखिया के दिशा निर्देश पर जैन धर्म के प्रवर्तक देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक के उपलक्ष्य में सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में ऋषभदेव भगवान के जीवन पर विभिन्न प्रतियोगिता का आयोजन आयोजन किया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए बामनवास से जिनेन्द्र जैन की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बामनवास।</strong> राजस्थान सरकार एवं अल्पसंख्यक विभाग के मुखिया भजनलाल शर्मा और शिक्षा विभाग के मुखिया मदन दिलावर के दिशा निर्देश पर जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक के उपलक्ष्य में सम्पूर्ण बामनवास ब्लॉक के सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में उनके जीवन पर विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन करने के साथ, चार्ट बनाना, रंग-रोगन करना, पोस्टर बनाना, निबन्ध लेखन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया।</p>
<p><strong>प्रतियोगिताओं के माध्यम से जीवन चरित्र की जानकारी </strong></p>
<p>इस अवसर पर ज्योति शिक्षण संस्थान उच्च माध्यमिक विद्यालय और श्री वर्धमान दिगम्बर जैन विकास समिति पिपलाई की ओर से विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। समारोह की अध्यक्षता करते हुए निदेशक अखलेश गुर्जर ने बताया की जीवन जीने की कला के प्रवर्तक तीर्थंकर ऋषभदेव भारत के स्वाभिमान, स्वालम्बन और स्वाधीनता के लिए अतुलनीय योगदान है। शिक्षा एवं अल्पसंख्यक मामलात विभाग के द्वारा सभी विद्यालयों, पंजीकृत मदरसो, अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों, अल्पसंख्यक बालक एवं बालिका छात्रावासों तथा आवासीय विद्यालयों में भगवान ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक महोत्सव के पूर्व इन प्रतियोगिताओं के माध्यम से बच्चों को उनके जीवन चरित्र की जानकारी मिल रही है। ये बच्चों और शिक्षको के लिए प्रसन्नता का विषय है।</p>
<p><strong>प्रागैतिहासिक काल के शलाका पुरूष है </strong></p>
<p>इस अवसर पर प्रधानाचार्य अशोक शर्मा ने बताया कि जैन परम्परा के अनुसार काल का न आदि है न अंत है। काल का जो भाग पकड़ में नहीं आता, उसे हम प्रागैतिहासिक काल कह देते है। ऐसे ही प्रागैतिहासिक काल के शलाका पुरूष है देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव जिन्हें इतिहास काल की सीमाओं में नही बांध पाता है। किन्तु वे आज भी भारत की सम्पूर्ण भारतीयता तथा जनजातीय स्मृतियों में पूर्णतय सुरक्षित है। वरिष्ठ शिक्षक कृपा डोई, जितेन्द्र शर्मा, मुकेश मीना, मालती शर्मा, गायत्री गौड़, गणेश योगी ने ऋषभदेव के अध्यात्म, दर्शन एवं साहित्य जगत तथा सामाजिक व्यवस्था के लिए दिए गए योगदान पर प्रकाश डाला।</p>
<p><strong>भारतीय संस्कृति का नया मार्ग प्रशस्त होगा </strong></p>
<p>श्री वर्धमान दिगम्बर जैन विकास समिति की कार्यकारणी सदस्य एवं कोचिंग संस्थान की निदेशक एकता जैन ने बताया की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय संस्कृति को जोड़कर रखने वाले भगवान ऋषभदेव के जन्म कल्याणक को सभी मिलकर मनाएं तो भारतीय संस्कृति का नया मार्ग प्रशस्त होगा। इस अवसर पर निबन्ध प्रतियोगिता में असद खान, किशन गुर्जर, आमना बानो, कपिल गौड़, अंजू मीणा, आरिश खांन, भावेश जांगिड़ आदि ने तथा प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में नैतिक गौड़, अयान खांन, अलशीफा बानो, हितांशी रैगर आदि ने एवं पोस्टर प्रतियोगिता में रक्षिता गौड़, शिवानी खटाना, तेजश्वनी सिसोदिया, आलिया बानो, आराध्या वैष्णव आदि ने व चित्रकला प्रतियोगिता में चार्ट प्रतियोगिता में जोयब खांन, सागर महावर, अजय लोदवाल, साहिल खांन आदि ने भाग लिया।</p>
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