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	<title>Mind &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>Mind &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>श्रावकों का जीवन मन, वचन और काय के संयम और रत्नत्रय धर्म से सफल : आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण ने निवाई में प्रवेश कर दोपहर को किया विहार  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 27 Jan 2026 11:36:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[आचार्य वर्धमान सागर जी जैन समाज के निवेदन पर शीतकालीन प्रवास 32 साधुओं के साथ पार्श्वनाथ नसिया जी संत भवन में कर रहे हैं। जबसे आचार्य श्री पधारे है, प्रति सप्ताह धार्मिक अनुष्ठान होकर धर्म की गंगा बह रही है। निवाई से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर... निवाई। आचार्य वर्धमान सागर जी जैन समाज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य वर्धमान सागर जी जैन समाज के निवेदन पर शीतकालीन प्रवास 32 साधुओं के साथ पार्श्वनाथ नसिया जी संत भवन में कर रहे हैं। जबसे आचार्य श्री पधारे है, प्रति सप्ताह धार्मिक अनुष्ठान होकर धर्म की गंगा बह रही है। <span style="color: #ff0000">निवाई से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर..</span>.</strong></p>
<hr />
<p><strong>निवाई।</strong> आचार्य वर्धमान सागर जी जैन समाज के निवेदन पर शीतकालीन प्रवास 32 साधुओं के साथ पार्श्वनाथ नसिया जी संत भवन में कर रहे हैं। जबसे आचार्य श्री पधारे है, प्रति सप्ताह धार्मिक अनुष्ठान होकर धर्म की गंगा बह रही है। सिद्धचक्र मंडल विधान, प्रथमाचार्य शांति सागर स्मारक ओर प्रतिमा चरण स्थापना का राष्ट्रीय कार्यक्रम 71 वर्ष पूर्व निर्मित 41 फीट के मानस्तंभ में विराजित श्री जी का भव्य पंचामृत अभिषेक 28 जनवरी को होगा। मंगलवार को याग़ मंडल विधान का पूजन हुआ। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघस्थ 83 वर्षीय आर्यिका शीतलमति माताजी ने 23 जनवरी को चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना धारण कर ली। अब पूज्य माताजी निर्जल बिना जल के उपवास कर तप साधना, आत्मा का चिंतन कर रही हैं। 27 जनवरी को 5वां उपवास है। आचार्य वर्धमानसागरजी ,मुनिश्री हितेंद्र सागरजी, मुनिश्री प्रभव सागरजी ,मुनिश्री चिंतनसागरजी , मुनिश्री दर्शितसागरजी, प्रबुद्ध सागरजी, मुमुक्षुसागरजी, प्रणीतसागरजी, ध्येयसागरजी, भुवन सागरजी, आर्यिका शुभमति, शीतलमती ,चैत्यमती,</p>
<p>विलोकमति ,दिव्यांशु मति ,पूर्णिमामति , मुदितमति विचक्षणमति ,समर्पितमति,निर्मुक्तमति विनम्रमति, दर्शनामति ,देशनामति ,महायशमति, देवर्धिमति,प्रणतमति ,निर्माेहमति,</p>
<p>पद्मश मति ,दिव्ययशमति, प्रेक्षामति जिनेशमति, ऐलक हर्षसागर, क्षुल्लक प्राप्तिसागर , सभी साधु उपस्थित रहे।</p>
<p><strong>जन्म अनेक लेते हैं किंतु सभी संयम अपनाते नहीं</strong></p>
<p>इस अवसर पर आचार्य श्री ने धर्मसभा में माताजी को संबोधित कर देशना में बताया कि केवलज्ञान लक्ष्मी से जैनधर्म विभूषित है। जैन धर्म के अंतर्गत सर्वाेच्च सिद्ध अवस्था का मार्ग बतलाया गया है। अनंतानंत भव्य आत्माएं इस मार्ग पर चलकर सिद्ध हुए हैं। संयम धारण करने से जीवन सार्थक होता है। जन्म अनेक लेते हैं किंतु सभी संयम अपनाते नहीं है। जन्म के साथ मरण भी लगा हुआ है। जन्म मरण की सार्थकता सम्यक दर्शन, ज्ञान और सम्यक चारित्र की साधना कर संलेखना से मृत्युंजय मृत्यु पर विजय पाने का पुरुषार्थ से होती है। आर्यिका श्री शीतलमति माताजी ने 54 वर्ष पूर्ण कर आर्यिका दीक्षा ली। जन्म वैराग्य संयम के महान कार्यों से सफल होता है। सर्वश्रेष्ठ अवस्था सिद्ध अवस्था होती है।</p>
<p><strong>आत्मा में लगे कर्मों को साधना तप बल से हटाया जाता है</strong></p>
<p>आचार्य वर्धमानसागर ने उपदेश में बताया कि शीतलमति ने अपने मन को दृढ़ करते हुए वसंतपंचमी के दीक्षा दिन पर संपूर्ण चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना धारण की है। संलेखना शरीर और कषाय को क्रश करने से सफल होती है। उपवास से शरीर को ओर आत्मा में लगे कर्मों को साधना तप बल से हटाया जाता है। उत्साह और भक्ति से धर्म पुरुषार्थ करना चाहिए। इससे आत्मा का कल्याण होता है और अन्य को भी संयम धारण करने की प्रेरणा मिलती है। श्रावक का मानव जीवन मन वचन काय के संयम से सफल होता है। साधु की समाधि देखना सेवा करना तीर्थ यात्रा समान होती है। उत्कृष्ट समाधि होने पर क्षपकसाधु अगले दो से आठ भव में निश्चित रूप से सिद्ध अवस्था को प्राप्त करते हैं।</p>
<p><strong>माताजी का चाकसू की ओर मंगल विहार </strong></p>
<p>पवन बोहरा, हेमंत बाबी,सुशील मोहित ने बताया कि आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी का धूमधाम से मंगल प्रवेश हुआ। माताजी ने श्री जी के दर्शन के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ सहित दर्शन किए। धर्म सभा में आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी और आचार्य श्री के प्रवचन हुए दोपहर को आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी का आहार के बाद निवाई से चाकसू की ओर मंगल विहार हुआ।</p>
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		<title>मुरैना जेल में कैदियों को दिया उदबोधन : शुद्ध मन पापों से रहित होता है &#8211; स्वस्तिभूषण माताजी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 13 Mar 2023 13:23:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Body and Mind]]></category>
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					<description><![CDATA[शुद्ध मन पापों से रहित होता है। व्यक्ति अपनी इच्छापूर्ति के लिए चोरी करता है, दूसरों के धन को हड़पता है । आप विचार कीजिए कि व्यक्ति के धन को आपने हड़पा है या जिस व्यक्ति के यहां आपने चोरी की है वह कितना दुखी हुए होगा। जब वह दुखी है तो आप सुखी कैसे [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>शुद्ध मन पापों से रहित होता है। व्यक्ति अपनी इच्छापूर्ति के लिए चोरी करता है, दूसरों के धन को हड़पता है । आप विचार कीजिए कि व्यक्ति के धन को आपने हड़पा है या जिस व्यक्ति के यहां आपने चोरी की है वह कितना दुखी हुए होगा। जब वह दुखी है तो आप सुखी कैसे रह सकते हो। आप किसी न किसी अपराध में यहां कैद हैं । आपको अपने किये अपराध का प्रायश्चित करना चाहिए। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> मन को शांत रखना बहुत बड़ी साधना है। इच्छाएं मन को अशांत करती हैं। आज भौतिकवादी युग में अशांति का एक कारण मोबाइल भी है। मोबाइल का जितना ज्यादा दुरुपयोग करोगे, मन उतना ही ज्यादा अशांत रहेगा। व्यक्ति मोबाइल में जिस तरह के चित्र देखता है, फिर उसे पाने की लालसा उसके मन में जाग्रत होती है। उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह गलत काम करने लगता है। इसे ही पाप कहा जाता है । जब गलत देखोगे तो मन में गंदगी एकत्रित होगी। जब गलत नहीं देखोगे तो मन शुद्ध रहेगा । शुद्ध मन पापों से रहित होता है।</p>
<p>व्यक्ति अपनी इच्छापूर्ति के लिए चोरी करता है, दूसरों के धन को हड़पता है । आप विचार कीजिए कि व्यक्ति के धन को आपने हड़पा है या जिस व्यक्ति के यहां आपने चोरी की है वह कितना दुखी हुए होगा। जब वह दुखी है तो आप सुखी कैसे रह सकते हो। आप किसी न किसी अपराध में यहां कैद हैं । आपको अपने किये अपराध का प्रायश्चित करना चाहिए । बन्दीगृह में बंद रहते हुए भी प्रभु भक्ति करते हुए, मन की शुद्धि करते हुए नेक इंसान बनने का प्रयास करना चाहिए । जैन साध्वी गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने मुरैना जेल में कैदियों को संबोधित करते हुए यह विचार व्यक्त किए।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39901" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230313-WA0015.jpg" alt="" width="1093" height="1016" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230313-WA0015.jpg 1093w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230313-WA0015-300x279.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230313-WA0015-1024x952.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230313-WA0015-768x714.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230313-WA0015-990x920.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230313-WA0015-559x520.jpg 559w" sizes="(max-width: 1093px) 100vw, 1093px" /></p>
<p><strong>मन को रखें साफ</strong></p>
<p>पूज्य गुरुमां ने कैदियों से कहा कि मन वचन काय से अपराध और पाप होते हैं। पाप की मुख्य जड़ मन है। जिस प्रकार घर की सफाई हम प्रतिदिन करते हैं, उसी प्रकार हमें प्रतिदिन मन की सफाई भी करना चाहिए। कहा गया है कि गन्दे घर में लक्ष्मी का वास नहीं होता, उसी प्रकार गन्दे मन में ईश्वर का वास नहीं होता। मन को साफ रखने के लिए ईर्ष्या, राग, द्वेष से दूर रहकर अपने इष्ट की आराधना करना चाहिए । मन को साफ रखने के लिए प्रयास और मेहनत की आवश्यकता होती है। बाहर का कचरा तो सबको दिखता है, किंतु मन का कचरा तो हमें स्वयं देखना होगा। क्रोध, मान, माया, लोभ, हिंसा, चोरी, कुशल और परिग्रह के कारण ही मन अशांत रहता है। हम अपने मन में वैर, राग, द्वेष रूपी कचरे को इकट्ठा किए रहते हैं। यही पाप का मूल कारण हैं। जब व्यक्ति को क्रोध आता है तो वह स्वयं तो जलता ही है, दूसरों को भी जलाता है । अधिकांशतः अपराध क्रोध में ही होते हैं। आपको किसी ने बुलाया नहीं, आपको किसी ने पूछा नही, आपकी बात किसी ने मानी नहीं, बस आपको बुरा लग गया और क्रोध आ गया। क्रोध आने का मुख्य कारण आपका अहंकार है। व्यक्ति अपने अहंकार और अपनी नाक ऊची रखने के लिए क्रोध करता है और क्रोध के वशीभूत होकर वह अपराध करता है । क्रोध में हम यह भी नहीं देखते की सामने कौन हैं । हम अपराध और पाप कर बैठते हैं। क्रोध शांत होने पर हमें अपने किये पर पछतावा भी होता है।</p>
<p><strong>करें प्रायश्चित</strong></p>
<p>जैन साध्वी श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने कैदियों को समझाते हुए कहा कि आप सभी किसी न किसी अपराध में यहां सजा काट रहे हैं। आपने जाने-अनजाने में जो भी पाप किये हैं, यहां बन्दीगृह में रहते हुए आप सभी उनका प्रायश्चित करें । अपने इष्ट की आराधना करते हुए नेक इंसान बनने की कोशिश करें और भविष्य में कभी भी अपराध न करने की शपथ लें।</p>
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