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	<title>MangalVihar &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>इच्छापूर्ति के बाद इच्छाएं बढ़ा देना पाप है: मुनिश्री सुधासागर की संदेशानाएं बदल रही जीवन मूल्यों को </title>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों का सार जीवन मूल्यों को बदलने में महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो रहा है। मुनिश्री की धर्मसभाओं में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को उनके प्रवचनों से आत्मिक आनंद की अनुभूति तो होती ही है। वे अहम संदेशों को जीवन में उतारने के लिए कृतसंकल्पित भी हो रहे हैं। पढ़िए सागर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों का सार जीवन मूल्यों को बदलने में महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो रहा है। मुनिश्री की धर्मसभाओं में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को उनके प्रवचनों से आत्मिक आनंद की अनुभूति तो होती ही है। वे अहम संदेशों को जीवन में उतारने के लिए कृतसंकल्पित भी हो रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने शनिवार को धर्मसभा के दौरान अपने प्रवचन में कहा कि जिंदगी निकालना नहीं चाहिए, जिंदगी जीना चाहिए। जैसे व्यापारी कोई भी कार्य करता है तो वह उसमें कुछ लाभ चाहता है। ऐसे ही जिंदगी को हम सांसारिक दृष्टिकोण से देखें तो एक व्यापारी बन जाओ। शाम को व्यापारी अपनी बैलेंस शीट मिलाता है। तुम अपनी जिंदगी की बैलेंस शीट मिलाओ कि आज हमने दिनभर में जो कुछ किया, उसमें हमें उपलब्धि क्या हुई? यह दिन निकला है, यह निकाला है और मिला क्या है? क्या आपको ऐसी अनुभूति हुई कि आज के दिन बहुत लाभ हुआ, आज का दिन स्मरणीय रहेगा। यदि शाम को ऐसी अनुभूति हो जाए तो समझ लेना कल तुम्हारा बहुत अच्छा दिन आने वाला है। अच्छे दिन के पहले का निर्णय करना है, हर भविष्य को अपन को सोचना है और भविष्य हमारा हमेशा बिफोर टाइम शुरू होता है। कल दिन अच्छा आएगा। निर्णय तो आज की शाम करेगी।</p>
<p><strong>&#8230;इसलिए दुकान खोलते समय प्रसन्न रहो</strong></p>
<p>जब तुम शाम को बाहर से लौटते हो तो सारा परिवार तुम्हारे चेहरे को देखता है, चेहरे पर मुस्कान है या चेहरा लटका हुआ लौट रहे हो। यदि चेहरा लटका हुआ लौटता है तो घर में अपशगुन माना जाता है। जब तुम घर से निकलते हो तो तुम्हारे व्यापार का शगुन माना जाता है। वास्तु में लिखा है कि किसी कार्य को जाते समय यदि घर में क्लेश हो जाता है, क्रोध आ जाता है, संक्लेश हो जाता है तो सबसे बड़ा अपशगुन माना जाता है क्योंकि, तुम घर से निकल रहे थे उसी समय क्लेश या संक्लेश हो गया, अब तुम्हारा आज का व्यापार, आज की दुकान अच्छी नहीं चलेगी। इसलिए दुकान खोलते समय कितने प्रसन्नचित्त से खोली है।</p>
<p><strong>अंदर से परिणाम आ जाए कि कुछ नहीं होना</strong></p>
<p>वास्तु यह कहता है कि तुम जिस भूमि पर कदम रख रहे हो। जिस कार्य को करने जा रहे हो, उस समय तुम्हें कैसा लग रहा है? यदि डर लग रहा है, संदेह हो रहा है। आपके मन मे क्लेश भरा है तो थोड़ा आप रुक जाइए क्योंकि, आपके अंदर खुद निर्णय कर रही है आपकी आत्मा, पता नहीं यह कार्य मैं कर रहा हूं तो क्या होगा। लग रहा है कुछ गलत ना हो जाए इससे बड़ा जो ज्योतिषचार्य कोई नहीं होता। यदि अंदर से परिणाम आ जाए कि कुछ नहीं होना है, जो होना है वह अच्छा ही होना है तो सब अच्छा ही होगा।</p>
<p><strong>‘&#8230;देखना आपकी हर यात्रा शगुन है’</strong></p>
<p>जब घर से बाहर जाते हो, दुकान की तरफ जाते हो तो दुकान का शगुन-अपशगुन होता है और दुकान से जब घर लौटते हो तो घर का शगुन-अपशगुन होता है। घर से निकलते समय सब लोगों ने जितना खुशी-खुशी विदा किया है और तुम खुशी-खुशी गए हो, शुभ सोचकर गए हो, जाओ तुम्हारा सब कार्य शुभ होगा। तुम जिस कार्य में हाथ डालोगे तुम्हें सफलता ही सफलता मिलेगी। तुम बड़ी उम्मीद लेकर खुशहाली में गए हो, देखना आपकी हर यात्रा शगुन है। जब लौटों तो घर का शगुन करना। अधूरे, अतृप्त होकर मत लौटना, पूर्ण होकर लौटों, जाओ घर में लक्ष्मी बरसेगी। घर तुम्हारा मंदिर है, घर तुम्हारी जिंदगी है, घर तुम्हारा जीवन है, उसको उतना ही पवित्र रखो, जितना तुम मंदिर के लिए पवित्र रखते हो।</p>
<p><strong>इसलिए कहा है कि तुम असीम हो जाओ</strong></p>
<p>मंदिर में जिस तरह हम भाग्यशाली बनाकर प्रवेश करते हैं। इसी तरह घर में भाग्यशाली बनकर एक आनंद के साथ प्रवेश करो। सारे लोग तुम्हारा चेहरा देखकर कहे कि देखो चेहरा खिला हुआ आ रहा है। इसका अर्थ है इस कार्य के लिए गए थे। उसमें सफलता मिल गई। यही सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसलिए यह जैनाचार्यों ने कहा कि उतनी इच्छा करके जाओ जिसको लौटते समय तुम कह सको जिसको सोच कर गया था वह हो गया। अपनी कूबत से थोड़ा कम कहकर जाओ। तुम ज्यादा करके आओगे तो तुम्हारा मन भी खुश होगा और परिवार भी खुश होगा। इच्छाओं को सीमित करने के लिए इसलिए नहीं कहा कि तुम सीमित हो जाओ, इसलिए कहा है कि तुम असीम हो जाओ।</p>
<p><strong> सुबह उठते ही तुम्हें काउंट करना है</strong></p>
<p>किसी कार्य को प्रारंभ करने के पहले की जो इच्छा है। मंदिर जाते समय, मुनि बनते समय या प्रतिमा लेते समय। बस तुम पहली इच्छा को काउंट करो। सुबह उठते ही तुम्हें काउंट करना है क्या दिन भर में तुम्हारी क्या इच्छाएं हैं, रिश्तेदार बनाते समय रिश्तेदार से प्रारंभ में तुम्हारी क्या इच्छाएं हैं, दान देते समय तुम्हारी क्या इच्छाएं हैं ये लिखने के बाद नीचे एक नोट लगा दो जो इच्छा मेरी हुई है, ये इच्छा पूरी करने के बाद फिर मैं आगे कोई इच्छा नहीं करूंगा। इच्छाएं करना पाप नहीं है लेकिन, पाप है इच्छापूर्ति के बाद इच्छाएं बढ़ा देना।</p>
<p><strong>पिता के थप्पड़ मारने पर खुश होगे तो तुम्हारा बेड़ा पार </strong></p>
<p>तुम्हारे घर में अपने भाई को बढ़ता हुआ ना देख पाओं तुम भाई को ही काटने लग जाओ, समाज की बढ़ोतरी न देख पाए, समझ लेना या तो तुम कुत्ते थे या फिर आगे कुत्ते बनने का अभ्यास चालू हो गया। बाप भी बेटे की बुराई करता है तो बेटे को बहुत बुरा लगता है। यही तेरी अंतिम कमजोरी है, तुझे पिता की बुराई करना बुरा लग रहा है, जाओ तुम्हारा विकास रुक गया। तुम्हें तो गुरु की डांट भी बुरी लगती है और यदि तुम्हे आनंद आ जाए तो समझ लेना कि तुम्हारा भविष्य उज्जवल हो गया। हजार आशीर्वाद तुम्हारा उद्धार करेंगे या नहीं, बाप के एक थप्पड़ मारने पर तुम खुशी मना लेना तो तुम्हारा बेड़ा पार निश्चित है। तुम्हारी गलती करनी है पर तुम्हें डांटना पड़े तो समझना तुम्हे बाप ने अपनी दृष्टि से निकाल दिया है और गलती करने पर डांट पड़े तो समझना गुरु ने तुम्हें स्वीकार कर लिया है।</p>
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		<title>किस्मत जहां तक ले जाती है एक बार अंतिम एवरेस्ट की ऊंचाई छूना चाहिए: मुनिश्री सुधासागर जी ने श्रावकों को जन्म लेने का महत्व बताया </title>
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		<pubDate>Fri, 07 Feb 2025 15:21:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में मनुष्य जीवन में जन्म, कर्म और धर्म के महत्व को प्रतिपादित करते हुए देशना दी। मुनिश्री की धर्मसभा में नित बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन पहुंच रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचनों से मानव कल्याण के रास्ते पर चलने का संदेश दिया है। पढ़िए सागर से राजीव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में मनुष्य जीवन में जन्म, कर्म और धर्म के महत्व को प्रतिपादित करते हुए देशना दी। मुनिश्री की धर्मसभा में नित बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन पहुंच रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचनों से मानव कल्याण के रास्ते पर चलने का संदेश दिया है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई मोनू की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> कोई भी वस्तु होती है सबसे पहले उसकी अर्थ क्रिया जानना चाहिए, मां-बाप ने तुम्हें जन्म दिया, क्या कारण है उसको जानों। तुम भारत में जन्मे, क्यों तुम्हें जन्म दिया कर्म ने भारत में, कर्म ने क्यों तुम्हें मनुष्य बनाया, नारकी, कीड़े मकोड़े भी बना सकता था। जब-जब हमें किसी भी कार्य की उपलब्धि हो तो तुरंत हमारे अंदर क्यों प्रत्यय आना चाहिए। उहापोह जिसे दार्शनिक भाषा में रहते हैं उहां और पोह-क्यों किया है और मुझे क्या करना है। यदि हमने थोड़ा सा भी विचार कर लिया तो कर्म इतना प्रसन्न होगा कि इन्होंने हमारी केअर कर ली।</p>
<p><strong>थोड़ी कदर कर लो एक बार जिंदगी में </strong></p>
<p>शास्त्र पढ़ो तो शास्त्र में खोजो और ध्यान करो तो ध्यान में सोचो-मुझे क्यों बनाया गया मनुष्य, फिर सोचो कि मनुष्य तो बनाया, मुझे इतना अच्छा मन क्यों दिया? कितने लोग हैं जिनके पास मन ही नहीं है या जिनका मन विक्षिप्त है। मेरी आंखें इतनी अच्छी क्यों बनाई? कितने लोग हैं जो जन्म से अंधे हैं। मेरे कान अच्छे बना दिए, मैं सुन रहा हूं, कई लोग बहरे हैं। क्यों मुझे कर्म ने भारत मे जन्म दिया और भारत में भी जैनकुल में। थोड़ी कदर कर लो एक बार जिंदगी में विचार करो तो यह कर्म और देने वाला इतना खुश हो जाएगा कि जनम जनम तक तुम पर मेहरबानी करता रहेगा। तुम्हें कुछ नहीं करना है, देने वाला देता है, तुम्हें मात्र उसका आभार मानना है।</p>
<p><strong>जितना हम सोच सकते हैं उतना सोचना चाहिए</strong></p>
<p>अब दूसरा नम्बर आता है अपोह का, कर्म को जो करना था कर लिया, जिस मार्ग में तुम प्रवेश करो, किस्मत जहां तक ले जाती है एक बार अंतिम एवरेस्ट की ऊंचाई छूना चाहिए। हम कितना सोच सकते हैं उतना सोचना चाहिए। व्यक्ति को किस्मत से जो कुछ देते हैं उसका पूरा उपयोग करना चाहिए। पंचमकाल में प्रकृति ने हमें कहां तक जाने की अनुमति दी है, वहां तक हमें जाना चाहिए। जितना हम सोच सकते हैं उतना सोचना चाहिए। जितना हम देख सकते हैं उतना देखना चाहिए, जितना हम सुन सकते हैं उतना सुनना चाहिए और जितना हम बोल सकते हैं उतना बोलना चाहिए। कितना हम पढ़ सकते हैं, पढ़ना चाहिए और जितना तुम कमा सकते हैं उतना कमाना चाहिए। पंचम काल में जो तुम्हारी में योग्यता है उसको कभी मरने नहीं देना चाहिए क्योंकि, जो योग्यता हमें कर्म से, किस्मत से, प्रकृति से मिलती है, उस योग्यता को यदि हमने उपयोग नहीं किया तो वह योग्यता खत्म हो जाती है। तुम बहुत अच्छा सोच सकते हो और नहीं सोच रहे हो, अपनी योग्यता को छुपा लोगे तो कल सोचने की शक्ति ही नहीं रहेगी। तुम देखकर चल सकते हो और तुम नहीं देख रहे हो तो कल देखने लायक नही रहोगे क्योंकि, तुमने योग्यता का अनादर किया है। पंचम काल में हमारी योग्यता मुनि बनने तक की है। आप जैन श्रावक है तो आगम को पढ़ो कि जैन श्रावक को क्या-क्या योग्यताएं दी गई है?</p>
<p><strong>उपादान शक्ति बलजोरी होती है </strong></p>
<p>मिथ्या दृष्टि स्वाध्याय करता है जानने, समझने के लिए और सम्यकदृष्टि स्वाध्याय करता है करने, पाने के लिए। यदि प्रवचन आप इसलिए सुन रहे हो कि मुझे कुछ ज्ञान मिलेगा तो आप अभी सम्यकदृष्टि नहीं हो और प्रवचन इसलिए सुन रहे हो कि महाराज जो कहेंगे मुझे करना है तो समझ लो सम्यकदृष्टि हो। आहार देना है मिथ्यादृष्टि हो और आहार देकर जीवन धन्य करना है तो सम्यक दृष्टि हो। साधु की निमित्त शक्ति कमजोर होती है और उपादान शक्ति बलजोरी होती है और गृहस्थ की उपादान कमजोर और निमित्त शक्ति बलजोर होती है। जब निमित्त शक्ति बलजोर होती है तब व्यक्ति को कोई न कोई अच्छे निमित्त मिलाना पड़ते हैं और जिनकी उपादान शक्ति बलजोर होती है। उनको निमित्त नहीं मिलाना पड़ते, हम लोगों को मंदिर की जरूरत नहीं है, हम लोग णमोकार मंत्र को इतना महत्व नहीं देते और साधु जिस निमित्त से प्रभावित हो जाए समझना उस निमित्त में दम है।</p>
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		<title>आचार्यश्री वर्धमान सागर जी का हुआ मंगल विहार: अश्रुपूरित नेत्रों से दी विदाई  </title>
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		<pubDate>Fri, 07 Feb 2025 14:07:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ससंघ और आर्यिका संघ ने शुक्रवार को पारसोला से विहार किया। इस अवसर पर यहां के सकल जैन समाज ने उन्हें भावभीनी विदाई दी। आचार्यश्री ने संबोधन कर पारसोला नगर और यहां के समाजा की सराहना की। उन्होंने यहां 248 दिन प्रवास किया और धर्म प्रभावना के लिए अपने प्रवचनों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ससंघ और आर्यिका संघ ने शुक्रवार को पारसोला से विहार किया। इस अवसर पर यहां के सकल जैन समाज ने उन्हें भावभीनी विदाई दी। आचार्यश्री ने संबोधन कर पारसोला नगर और यहां के समाजा की सराहना की। उन्होंने यहां 248 दिन प्रवास किया और धर्म प्रभावना के लिए अपने प्रवचनों से जनता को लाभान्वित किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पारसोला से राजेश पंचोलिया की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पारसोला।</strong> यहां से आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 28 जनवरी से 7 फरवरी के दौरान 248 दिवसीय प्रवास के दौरान अनेक धार्मिक अनुष्ठानों को प्रभावना पूर्वक कर शुक्रवार को मंगल विहार किया। मंगल विहार के पूर्व समाज की धर्म सभा में मंगल देशना में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि हमने कर्नाटक से राजस्थान की ओर मंगल विहार किया। हमने कर्नाटक से राजस्थान आने का संकल्प किया। वह भक्तों की भक्ति और पुरुषार्थ से वह कार्य सफल हुआ। हमारा संकल्प और समाज का पुरुषार्थ भक्ति से अनेक कार्य सिद्ध हो जाते हैं। राजस्थान के अतिरिक्त अन्य नगरों के लोग पारसोला की प्रशंसा करते हैं क्योंकि, पारसोला समाज में आचार्य परंपरा के प्रति भक्ति और अटूट श्रद्धा है। यह अनुकरणीय और प्रशंसनीय है। समाज में 40 से अधिक सक्रिय बालक बालिका युवा महिलाओं सभी वर्ग के मंडल हैं। यह मंडल धरातल पर समाज के हित में कार्य करते हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि यह मंडल है। बंडल नहीं है।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-74050" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0044-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1155" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0044-scaled.jpg 2560w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0044-300x135.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0044-1024x462.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0044-768x346.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0044-1536x693.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0044-2048x924.jpg 2048w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0044-990x446.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0044-1320x595.jpg 1320w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" />मुनिश्री संघ और आर्यिका संघ ने किया विहा</strong></p>
<p>पारसोला में मार्च माह में पंचकल्याणक में समाज ने अटूट श्रद्धा भक्ति से महोत्सव को सफल बनाया। समाज के उत्साह भक्ति को देखकर यह विश्वास हुआ कि पारसोला की संगठन शक्ति में बड़े से बड़े आयोजन करने की क्षमता को दृष्टिगत रख आचार्य संघ ने पारसोला चातुर्मास करने का निर्णय अनेक माह पूर्व लिया। पारसोला नगर से ब्रह्मचारी गज्जू भैया, राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के साथ मुनिश्री चिन्मयसागर जी, श्री हितेंद्रसागर जी श्री प्रशंमसागर जी, श्री प्रभवसागर जी, श्री चिंतनसागर जी, श्री दर्शित सागर जी, श्री प्रबुद्धसागर जी, मुनि श्री मुमुक्षुसागरजी, मुनि श्री प्रणितसागरजी, आर्यिका श्री शुभमति जी, श्री शीतलमति जी, आ श्री चैत्यमति जी ,आश्री वत्सलमतिजी, श्री विलोकमति जी, ,आश्री दिव्यांशु मति जी, आश्री पूर्णिमामति जी आश्री मुदितमति जी,आ श्री समर्पितमति जी, आश्री विचक्षणमति जी आश्री निर्मुक्त मति जी, आश्री विन्रममतिजी, आश्री दर्शनामति जी, आश्री देशनामतिजी, आश्री महायशमती जी, आर्यिका श्री देवर्धिमति आश्री प्रणतमति आश्री निर्माेहमति, श्री पद्मयशमति आश्री दिव्ययश मति, आर्यिका श्री प्रेक्षामति जी, आर्यिका श्री जिनेश मति, श्री क्षुल्लक श्री विशाल सागर जी, श्री प्राप्ति सागरजी का पारसोला नगर से शुक्रवार को आहार के बाद दोपहर को विहार हुआ।</p>
<p><strong>आहार चर्या श्रवण नगर में होगी</strong></p>
<p>संघ का रात्रि विश्राम श्रवण नगर में हुआ। 8 फरवरी को आचार्य श्री संघ की आहार चर्या श्रवण नगर मुंगाना रोड पर होने के बाद दोपहर को विहार कर रात्रि विश्राम मुंगाना में होगा। राजस्थान के अनेक नगरों से आचार्य संघ के आगमन के लिए श्रीफल भेंटकर निवेदन प्रतिदिन किया जा रहा है। प्रतापगढ़ दिगंबर जैन समाज ने भी निवेदन किया।</p>
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		<title>दम होना महत्वपूर्ण है लेकिन, दंभ न हो : आर्यिका विज्ञमति माताजी ने किया संबोधन </title>
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		<pubDate>Fri, 07 Feb 2025 12:37:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ आर्यिका रत्न श्री विशुद्धमति माताजी एवं आर्यिकारत्न श्री विज्ञमति माताजी ससंघ ने बैंडबाजों के साथ नेमिनाथ उद्यान नुनिहाई जैन मदिर से मंगल विहार कर बेलनगंज,धूलियागंज,घटिया होते हुए हरि पर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में मंगल प्रवेश किया। इस अवसर पर उन्होंने संबोधन दिया। उनके अंजना के आंसू पर भी मंगल प्रवचन होंगे। आगरा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> आर्यिका रत्न श्री विशुद्धमति माताजी एवं आर्यिकारत्न श्री विज्ञमति माताजी ससंघ ने बैंडबाजों के साथ नेमिनाथ उद्यान नुनिहाई जैन मदिर से मंगल विहार कर बेलनगंज,धूलियागंज,घटिया होते हुए हरि पर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में मंगल प्रवेश किया। इस अवसर पर उन्होंने संबोधन दिया। उनके अंजना के आंसू पर भी मंगल प्रवचन होंगे। <span style="color: #ff0000">आगरा से पढ़िए मनोज जैन बाकलीवाल की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>आगरा।</strong> आर्यिका रत्न श्री विशुद्धमति माताजी एवं आर्यिकारत्न श्री विज्ञमति माताजी ससंघ ने बैंडबाजों के साथ नेमिनाथ उद्यान नुनिहाई जैन मदिर से मंगल विहार कर बेलनगंज,धूलियागंज,घटिया होते हुए हरि पर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में मंगल प्रवेश किया। जहां आगरा सकल जैन समाज ने गुरु मां का पाद प्रक्षालन एवं मंगल आरती कर भव्य स्वागत किया। गुरु मां ससंघ ने श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान सभी प्रतिमाओं के दर्शन किए। इसके बाद आगरा दिगंबर जैन परिषद के तत्वावधान में आर्यिका रत्न श्री विज्ञमति माताजी की धर्मसभा आचार्य शांतिसागर सभागार में आयोजित हुई।</p>
<p>इसमें माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए भक्तों से कहा कि आगरा जैन समाज दमदार समाज है, परंतु सुनिश्चित रखें कि दम तो ठीक है, लेकिन दंभ न हो। धर्म से ही कर्म सुधरता है। अत:सुनिश्चित करें कि कभी धर्म न छोडें। सुनिश्चित करे कि अपनी एक संतान को धर्म मार्ग की ओर ले जाएं तो दूसरी वंश बनाएं।</p>
<p><strong>एक कॉमा से अर्थ बदल सकता है</strong></p>
<p>उन्होने आगे कहा कि शब्दों में बहुत ताकत है। फर्क है कि कैसे कहा गया है। उन्होंने समझाया कि मात्र एक कॉमा से अर्थ बदल सकता है जैसे-&#8216;रोको, मत जाने दो&#8217; का कॉमा आगे लगा दें तो वही ऊपर का शब्द रोको मत,जाने दो&#8217; हो जाएगा। धर्म सभा का संचालन मनोज जैन बाकलीवाल द्वारा किया गया। गुरु मां ससंघ के मंगल विहार की व्यवस्था ज्ञानोदय क्लब के सदस्यों द्वारा संभाली गई।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-74032" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0035.jpg" alt="" width="1280" height="720" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0035.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0035-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0035-1024x576.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0035-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0035-990x557.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0035-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0035-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0035-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250207-WA0035-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" />&#8216;अन्जना के आंसू&#8217; विषय पर मंगल प्रवचन</strong></p>
<p>इस दौरान आगरा दिगंबर जैन परिषद के प्रतिनिधियों ने गुरु मां संसघ के समक्ष 2025 चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंटकर निवेदन किया और मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। मीडिया प्रभारी शुभम जैन ने बताया कि आगरा वालों के विशेष अनुरोध पर गुरु मां द्वारा चार दिवसीय प्रवचन माला &#8216;अन्जना के आंसू&#8217; विषय पर मंगल प्रवचन प्रात:8.30 से आचार्य शांति सभागार में होंगे। इस अवसर पर आगरा दिगंबर जैन परिषद के अध्यक्ष जगदीश प्रसाद जैन, जितेन्द्र जैन, हीरालाल जैन बैनाडा, राकेश जैन पर्दावाले, मनोज जैन बांकलीवाल, सुनील जैन ठेकेदार, महिपाल जैन, सुरेश जैन, शुभम जैन, अनिल रईस, अनिल जैन, अकुंश जैन, संजीव जैन, राजकुमार जैन आदि मौजूद रहे।</p>
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		<title>इस युग में भगवान का रूप बन चुके थे आचार्य श्री : मुनि सुधासागर जी ने अपने प्रवचन में किया गुणानुवाद </title>
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		<pubDate>Fri, 07 Feb 2025 11:14:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को याद करते हुए उनकी इस सदी में महत्ता को प्रतिपादित किया। उन्होंने प्रवचन में विशेष रूप से दिए उपदेश में जीवन के यथार्थ को बताया। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; सागर। जिंदगी हमारी गुजर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को याद करते हुए उनकी इस सदी में महत्ता को प्रतिपादित किया। उन्होंने प्रवचन में विशेष रूप से दिए उपदेश में जीवन के यथार्थ को बताया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> जिंदगी हमारी गुजर न जाए, हमें जिंदगी जीना है, जिंदगी तो निकलती है निकल जाएगी, सूर्य उगता है ढल जाएगा। जो कुछ हाथ में है वह एक दिन चला जाएगा। कुछ भी इस दुनिया में स्थिर नहीं है लेकिन, जिंदगी जीना है निकालना नहीं है। हमें सुबह उठते ही प्लानिंग करना है, हमें जिंदगी की शाम होने के पहले पहले कुछ करना है, जिसमें हमें ऐसा लगे कि मेरी जिंदगी निकली नहीं है, मैं जिंदगी जिया हूं।</p>
<p><strong>एक छोटा सा दीपक शगुन हो जाता है</strong></p>
<p>दिन हमें गुजारना न पड़े, दिन हमारी जिंदगी की बहुत बड़ी उपलब्धि बनकर आवे। हमें जैसा निमित्त मिलता है हम वैसे ढल जाते हैं, खुद की जिंदगी हम अपनी मर्जी से नहीं जी पा रहे हैं, हमारे खुद का जीवन जीवंत नहीं हो पा रहा है जो दूसरों के लिए आदर्श बन जाये। सूर्य के प्रकाश को मंगल नहीं कहा लेकिन, एक छोटा सा दीपक शगुन हो जाता है, छोटा सा दिन हमारी जिंदगी के लिए शगुन बन जाए।</p>
<p><strong>&#8230;हमारी जिंदगी कैसी होना चाहिए?</strong></p>
<p>धन कमाने के लिए व्यक्ति को कितना पढ़ना पड़ता है, एक मकान बनाने के लिए व्यक्ति को कितना सोचना पड़ता है। एक शरीर का डॉक्टर 25 साल पढ़ता है तब वह शरीर को स्वस्थ रख पाता है लेकिन, तुमने अपनी जिंदगी को इतना समय दिया? क्या प्लानिंग बनाई है, क्या सोचा है कि हमारी जिंदगी कैसी होना चाहिए। हमारे जीवन का दिन कैसा निकालना चाहिए, इसके लिए हमने कुछ सोचा ही नहीं। हम कर्म की कठपुतली बन जाते हैं, कर्म जैसा नचाता है वैसे हम नाचने लग जाते है।</p>
<p><strong>हम सुख की अनुभूति करने लगते हैं</strong></p>
<p>हमारे अंदर से जीने की कोई ख्वाहिश नहीं उठ रही है, जितनी ख्वाहिशें उठती है सब पराधीन होती है, हमारे कोई भी सुख की कामना है, वह पराधीन है। हमारे हाथ में न सुखी रहना है न दुख का निवारण। भूख लगती है हम रोटी के अधीन हो जाते हैं, रोटी मिल जाती है हम सुख की अनुभूति करने लगते हैं लेकिन कभी यह अनुभूति नहीं आती कि सब कुछ खत्म हो गया लेकिन, मैं तो हूं।</p>
<p><strong>जब व्यक्ति किसी को आदर्श बनाता है&#8230;</strong></p>
<p>तुम्हारी जिंदगी में वह महत्वपूर्ण नहीं है कि हमारे पास कितना धन है, कितना परिवार है, कितना व्यापार है, हमारा महत्वपूर्ण समय है कि हमारे पीछे कितने लोग चलने की सोच रहे। जब व्यक्ति किसी को आदर्श बनाता है तो वह सबकुछ पीछे उसको समर्पित कर देता है। हमने जिंदगी में जो कुछ किया, क्या कोई हमारे पीछे चल रहा, जिस चीज को पाया, क्या हमारे पाना किसी के लिए शगुन बन रहा है।</p>
<p><strong>जिंदगी का निर्देशक कौन है?</strong></p>
<p>तुम्हारा कितनों पर विश्वास है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, तुम पर कितनों लोग विश्वास करते हैं, ये महत्वपूर्ण है। यदि अच्छा भगवान खोज लिया तो तुम्हारा अनंत संसार चुल्लू भर रह जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण है कि तुम्हारी जिंदगी का निर्देशक कौन है? क्या तुम ऐसी व्यक्ति को खोज पाए जिसको खोजने के बाद में किसी को खोजने की जरूरत न पड़े।</p>
<p><strong>ऐसा भाव आ जाए मंदिर भगवान का है</strong></p>
<p>जब तुम्हारे पास कुछ भी न हो और तुम्हारे आदर्श के पास जो भी कुछ है, उसमें तुम्हें अनुभव आ जाए कि यह सब कुछ मेरा है। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है लेकिन तुम्हारे मालिक, पिता, गुरु और भगवान के पास जो कुछ है वह सबकुछ मेरा है, ऐसी अनुभूति जैसे एक बेटा अपने मित्र को अपने पिता का मकान दिखाते हुए कहता है कि यह मकान मेरा है, यही आत्मीयता और बेटे तथा पिता का संबंध है। इसी उदाहरण को लेकर कभी ऐसा भाव आ जाए मंदिर भगवान का है और कोई पूछे कि मंदिर किसका है तो कहे मेरा मंदिर है, मेरे भगवान है।</p>
<p><strong>किसी का मंगल बन सकूं</strong></p>
<p>वेदी पर बैठे भगवान को देख रहा है और उस अनुभव हो जाता है कि मैं खुद चैतन्य भगवान आत्मा हूँ। भगवान जैसा तू मेरे लिए मंगल बना है, वैसे मैं भी किसी का मंगल बन सकूं। जैसा आज मैंने तेरी वसीयत पाया है, मैं भी किसी के लिए वसीयत को दे सकूं। जो कमाई तूने की है, कल मैं भी कमाई करूं।</p>
<p><strong>आचार्य श्री को पढ़ लो, वही तो शास्त्र</strong></p>
<p>तुम्हें प्रयास करना है यह नहीं कि तुम किसके पीछे चल रहे हो, यह सोचो कि कोई तुम्हारे पीछे चल रहा है कि नहीं। आचार्य श्री जी की सबसे बड़ी विशेषता थी उनके पीछे दुनिया चल रही थी। तुम अनाथ हुए हो बहुत बार, यह कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन, तुमने कितनों को अनाथ किया है यह बहुत बड़ी बात है। क्या तुम्हारे जाने के बाद ऐसी फीलिंग हो रही है कि हमारा सब कुछ चला गया, ये है जिंदगी की कमाई। कौन व्यक्ति मरा है इसका निर्णय जाने वाले की अपेक्षा नहीं रोने वाले की अपेक्षा किया जाता है। जितने ज्यादा लोगों को अनाथपने की अनुभूति महसूस हो, समझ लेना उतना बड़ा ही नाथ मरा है। आचार्य श्री जब दुनिया में थे, अपन को एक ही बात लगती थी कि भगवान मेरी दुनिया में है। सारी समाज के लिए इस कलयुग में भगवान का रूप बन चुके थे आचार्य श्री। लोगों ने शास्त्रों को पढ़ना बंद कर दिया बोले क्या पढ़ना आचार्य श्री को पढ़ लो, वही तो शास्त्र हैं। उनके मुख से जो निकला वही तो जिनवाणी है। उनका आचरण ही आगम है। हर व्यक्ति ये मानने लगा था कि उन्होंने जो सोच लिया है उससे आगे सोचने वाला दुनिया मे कोई व्यक्ति है नहीं।</p>
<p><strong>इसलिए जैन दर्शन में देव दर्शन कहा</strong></p>
<p>हमारे आचार्य श्री कुछ नहीं बोलते थे लेकिन उनकी मुद्रा बहुत शुभ थी, शगुन था। एक व्यक्ति ऐसा है जिसके पास एक दरवाजा है, जहां जाता है तो कुछ नहीं मिलता मात्र दर्शन करने के बाद ही वो खुश हो जाता है इसलिए जैन दर्शन में देव दर्शन कहा। कैसी सातिशय साधना की पूज्य गुरुदेव ने कि लोग उनसे कुछ नहीं चाहते थे, मात्र दर्शन करते थे और धन्य हो जाते थे। लोगों को उन्हें नमोस्तु करने में आनंद आता था, महाराज को मैंने जी भर देख लिया, ये आनंद था। जब कोई मुझे देख रहा है तो मुझे अच्छा लग रहा है यह राग है, जब वह बिल्कुल भी नहीं देख रहा है और हमारी पलक भी नहीं झपक रहे हैं तो यह वीतराग है।</p>
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		<title>भगवान के दर्शन में हमें भगवान बनने की अनुभूति हो तो दर्शन सफल : प्रवचन के संदेशों से मिल रहा ज्ञान का प्रकाश </title>
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		<pubDate>Thu, 06 Feb 2025 14:43:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज की धर्मसभा में प्रवचनों के दौरान जैन धर्म अनुयायी बड़ी संख्या में पुण्यार्जन कर रहे हैं। बुधवार को धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि क्या होता है यह मूल्यवान नहीं है, क्या करते हो ये मूल्यवान है। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज की धर्मसभा में प्रवचनों के दौरान जैन धर्म अनुयायी बड़ी संख्या में पुण्यार्जन कर रहे हैं। बुधवार को धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि क्या होता है यह मूल्यवान नहीं है, क्या करते हो ये मूल्यवान है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर</strong>। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज की धर्मसभा में प्रवचनों के दौरान जैन धर्म अनुयायी बड़ी संख्या में मौजूद रहकर पुण्यार्जन कर रहे हैं। बुधवार को धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि क्या होता है यह मूल्यवान नहीं है, क्या करते हो ये मूल्यवान है। जो अपने आप हुआ था, जो अपने आप होगा, उससे तेरा कोई कार्य होने वाला नहीं है। कर्म बंधते है, उदय में आते है, निर्जरा को प्राप्त हो जाते है।</p>
<p><strong>जिंदगी निकल रही इसका कोई महत्व नहीं</strong></p>
<p>पेड़ इतने फल देता है लेकिन, उसको कोई पुण्य बंध नहीं होता क्योंकि वो देता नहीं है, दुनिया को पेड़ से फल मिल जाते हैं। तुम्हारे द्वारा कितनों को लाभ हुआ है, इसकी कोई कीमत नहीं है, महत्वपूर्ण है कितनों को तुमने लाभ दिया है। जिंदगी निकल रही है इसका कोई महत्व नहीं है, कितनी जिंदगी है जो तुमने जी है, जो जिंदगी तुम्हारे होश में गुजरी है। सुबह उठते ही एहसास हो कि आज मैं जिंदा हूँ और जिंदा रहने का अर्थ है शाम को ऐसा लगे कि हमने दिनभर में कुछ किया है। कल क्या होना है इसका तुम्हें विचार नहीं करना, कल तुम्हें क्या करना है इस पर विचार करना है।</p>
<p><strong>भक्त भी सेवा के लिए नहीं बनाते</strong></p>
<p>जैनदर्शन किसी को दास नहीं बनाता है, भक्त बनाता है और भक्त भी सेवा के लिए नहीं बनाते। भगवान के दर्शन करते-करते हमें खुद भगवान बनने की अनुभूति हो जाए दर्शन सफल हो जाता है।भगवान की सेवा और पूजा करना ये तो सारी दुनिया में होता है, जैन दर्शन कहता है कि भगवान का दर्शन करते-करते कभी भाव आ जाए कि मुझे भगवान का दर्शन इसलिए करना है कि मुझे भगवान बनना है।</p>
<p><strong>चारित्र मोहनीय कर्म का क्षयोपशम होगा</strong></p>
<p>मुनि को आहार देते समय कभी यह भाव आ जाए कि मुझे आहार देना नहीं, लेना है, ये बात महत्वपूर्ण है, आपके उस समय ऐसे चारित्र मोहनीय कर्म का क्षयोपशम होगा कि आप यहां से सीधे विदेह क्षेत्र में जाकर 8 वर्ष अन्तर्मुहूर्त के अंदर तुम्हारे हाथ में पिच्छी कमंडल होगा। हर नारी को भगवान का अभिषेक देखते समय यह भाव आ जाए कि यह जो अभिषेक कर रहा है न, बस भगवन एक दिन मुझे भी करना है, मैं देखने मे संतुष्ट नहीं हूं। ऐसी तलब यदि तुम्हें लग जाए तो उसी समय तुम्हारी स्त्री पर्याय नष्ट होकर पुरुष पर्याय का बंध चालू हो जाएगा।</p>
<p><strong>मैं बड़ा इंद्र नहीं तो छोटा इंद्र बनूंगा</strong></p>
<p>यदि तुम्हारा यह भाव है कि आज बोली तो लेना नहीं क्या करेंगे पंडाल में जाकर, आज तो बोलियों में समय लगेगा, बहुत बड़ी भूल कर रहे हो तुम जिंदगी में कभी समर्थ नहीं हो पाओगे, तुम आज भी गरीब हो और कल भी गरीब रहोगें। हर व्यक्ति को एक मन बनना है कि पंचकल्याणक होगा नहीं, मैं पंचकल्याणक करूंगा, मेरी साक्षी में पंचकल्याणक होगा तो मैं कुछ न कुछ करूंगा, मैं बड़ा इंद्र नहीं तो छोटा इंद्र बनूंगा</p>
<p><strong>एक रिलेशनशिप बनाओ, रिश्तेदारी नहीं</strong></p>
<p>जब तुम जैन लिखो तो अपन सब का पिता एक ही है जिनेंद्र देव। जिनेंद्र से उत्पत्ति हुई है जैन की, हम जिनेन्द्र देव के कुटुंब के हैं और जिनेन्द्र देव का पंचकल्याणक हो रहा है तो उसमें घराती बनकर जाना, बराती बनकर नहीं। हम जैन है, जिनेन्द्र देव के कुटुंब के, एक रिलेशनशिप बनाओ, रिश्तेदारी नहीं। समर्थन बाहर से नहीं अंदर से देना है।</p>
<p><strong>मैं तेरा मंदिर बनाकर मर सकूं </strong></p>
<p>जब व्यापार धंधा करते हो तो आपको भाव आता है कि मेरा इतना व्यापार हो जाये कि मेरा खुद का मकान हो जाए, मेरी खुद के गाड़ी घोड़ा हो जाए, मेरे बच्चों की शादी विवाह शान शौकत से कर सकूँ। कोई बात नहीं, आप गृहस्थ है आपकी ये अपेक्षाएं होती है, होनी ही चाहिए, आपकी ये भावना पूरी हो बस इतना सा कर लेना नांगल के दिन एक भावना कर लेना कि इस दुकान से इतनी बरकत हो जाए कि भगवन मैं तेरा मंदिर बनाकर मर सकूं।</p>
<p><strong>&#8230;गजरथ की फेरी निकाल सकूं</strong></p>
<p>इतना समर्थ कर देना कि एक दिन तुझे रथ पर बैठालकर गजरथ की फेरी निकाल सकूं। तुम लोग साल भर में एकाध बार पूरे कुटुंबी, रिश्तेदार किसी न किसी से कारण से इकट्ठे हो जाते हो, बस जिंदगी में एक भाव करना कि इतनी बुद्धि और दे देना भगवन! एक बार में सारे रिश्तेदारों को तेरी भक्ति के लिए इकट्ठा कर सकूं।</p>
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		<title>जो हमारे बारे में चिंतित हो ऐसी शक्ति को खोजना: मुनि सुधासागर जी की मंगल देशना का पुण्य अर्जित कर रहे श्रावक </title>
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		<pubDate>Tue, 04 Feb 2025 17:34:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचन सुनने के लिए जिनालयों में जैन समाज के श्रद्धालु मौजूद रहते हैं। मंगलवार को भी मुनिश्री ने अपने प्रवचन में जीवन दर्शन के संदेशों से जैन समाज के श्रावकों को लाभान्वित किया। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; सागर। जिस व्यक्ति ने तुम्हारी आंख के लिए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचन सुनने के लिए जिनालयों में जैन समाज के श्रद्धालु मौजूद रहते हैं। मंगलवार को भी मुनिश्री ने अपने प्रवचन में जीवन दर्शन के संदेशों से जैन समाज के श्रावकों को लाभान्वित किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> जिस व्यक्ति ने तुम्हारी आंख के लिए ये गाली दे दी कि इसकी आंख फूट जाए ये घूर रहा है। उसी समय ये आंख तुम्हें अभिशाप देगी और तुम जन्म से ही अंधे पैदा होंगे यह प्रबोधन निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्म सभा में दिया। उन्होंने कहा कि हमें वह शक्ति चाहिए, जो हमें कुछ देना चाहती हो, जो हमारे लिए जिए हमारे लिए सोचें, हमारे लिए कुछ कार्य करें। जो हमारे संबंध में चिंतित हो, ऐसी शक्ति को खोजना पड़ता है। उपकारी वह नहीं है जिससे उपकार हो रहा है।</p>
<p><strong>सूर्य से उपकार हो रहा है</strong></p>
<p>उपकार का अर्थ है- जो हमारा उपकार करता है। उपकार होना और उपकार करना दोनों में बहुत अंतर है, सूर्य, उपकार कर नहीं रहा है, सूर्य से उपकार हो रहा है। पानी उपकार कर नहीं रहा है, पानी से उपकार हो रहा है। जिनसे उपकार हो रहा है। उनके संबंध में हमें कोई विचार नहीं करना क्योंकि, वह तो हो रहा है, हमें उसका आभार मानने की जरूरत नहीं क्योंकि, वो तो उपकार करता है। हमें उस शक्ति खोजना है उस व्यक्ति को, जिससे उपकार होता नहीं है। वह उपकार करता है।</p>
<p><strong> कर्म तो अपनी सजा देगा</strong></p>
<p>जिसका काम मिटाना ही है। उससे हमें डरने की जरूरत नहीं क्योंकि, हम कितना ही डरेंगे वह तो मिटाएगा। हमें उससे बचना है जिसके द्वारा हम मिटेंगे नहीं, मिटायें जाएंगे। जो कर्म बांध लिया है। उससे डरने की जरूरत नहीं क्योंकि, वो कर्म तो अपनी सजा देगा। अपराध करने के बाद जेल से नहीं डरना क्योंकि जेल तो होगा ही होगा। अपराध करने के बाद जो भागता है। उस पर एक नई सजा और लगती है। भगोड़े की, इसलिए ज्ञानी व्यक्ति कहते हैं कि अपराध हो गया है तो भागो मत, सजा को स्वीकार करो। समर्पित हो जाओ क्योंकि, अब सजा तो मिलना ही मिलना है। अपराध करने के बाद अपराध से मुक्ति का एक ही उपाय है, सजा को स्वीकार करना।</p>
<p><strong>तुम्हारी आत्मा में शक्ति जगाने वाली है</strong></p>
<p>पहली बात तो तुम्हें अपराध से भागना चाहिए था कि अपराध होते नहीं है, अपराध किए जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति वही है जो अपराध से भागता है। जैसे ही आपके मन में पाप का भाव आता है तो क्या आपकी आत्मा कांप जाती है- ओहो मेरे में बहुत गंदा भाव आ गया और इतनी कांप जाए कि पश्चाताप की आग में भी जाने को तैयार हो जाये, समझ लेना तुम संसार से बहुत जल्दी तरने वाले हो। जब जब तुम्हारी आंख पाप देखने में काँप जाती है, समझ लेना तुम्हारी आत्मा में ही ऐसी शक्ति जगाने वाली है, जो तुम्हें आंखों से दिखता है, वह आंख बंद करने के बाद भी दिखना चालू हो जाएगा।</p>
<p><strong>विचार करने का प्रयास करो&#8230;</strong></p>
<p>इसी का नाम है दुर्दशित्व ऋद्धि। हर चीज को छोड़ने की होड़ मत करो, पहले यह मन मे बैठालों कि बुरा क्या है? यह विचार करने का प्रयास करो कि क्या नहीं देखना चाहिए। तुम्हें निर्णय करना है कि जो बुरा सामने आया है, उसको देखने में तुम्हे रुचि है और आंख खोल रहे हो तो समझ लेना तुम नेत्रहीन होने वाले हो क्योंकि, तुम उस चीज को देखने में रुचि लगा रहे हो, जिसे देखने के लिए मना किया गया है।</p>
<p><strong>जो तुमसे छुप रहा है उसे झांककर मत देखना</strong></p>
<p>पहली बार तो जो चीज देखने लायक नहीं है। उसका मन बना लो कि हम देखेंगे नहीं, हमारी दृष्टि झुकी हुई रहेगी क्योंकि, आप गृहस्थ हैं। कई बार नहीं देखने वाली चीजें भी देखनी पड़ती है तो कोई बात नहीं तुम एक नियम कर लो, जब सामने वाला नहीं चाहता है कि मैं देखूं, उसे मत देखना। जो तुमसे छुप रहा है, उसे झांककर मत देखना। मेरा उसको देखना मेरे परिवार को, समाज को, धर्म शास्त्र को भी अच्छा नहीं लगता, उसको मत देखना, ये एक नेत्र का बलात्कार है। मन का पापी, मन से बलात्कार करना- जो वस्तु हमारी नहीं है, जो हमारे लिए कोई इष्ट नहीं है।</p>
<p><strong>आंख तुम्हें अभिशाप देगी</strong></p>
<p>हम उस संबंध में सोच या देख रहे हैं, उसे नही देखेंगे। तुम्हारी आंखें अनमोल है फालतू नहीं है कि जिसे चाहे उसे देखें। हमारी तो वो आंख है कि लोग तरसे एक बार तो देख लेवें, आंख को इतना कीमती बनाओ। जिस व्यक्ति ने तुम्हारी आंख के लिए ये गाली दे दी कि इसकी आंख फूट जाए, ये घूर रहा हैं। महानुभाव उसी समय ये आंख तुम्हें अभिशाप देगी और तुम जन्म से ही अंधे पैदा होंगे। वो आंख क्या तुम्हारे पास आएगी, वो आंख तुम्हें इज्जत वाला मानकर आई थी कि तुम मुझे इज्जत दोगे।</p>
<p><strong>एक ही नाम है वह है तीर्थंकर</strong></p>
<p>इसी तरह अपने कानों को कीमती बनाओ कि हमें इनसे बुरा नहीं सुनेंगे। तुम्हारे भगवान है गुरु कुछ करते नहीं है लेकिन, अपनी बात उन तक पहुंचाना और तुम्हारे लिए अनुभव में आ गया कि अब कोई चिंता की बात नहीं। अब मरूं तो मर जाऊं, मेरी बात गुरु के कानों तक पहुंच गई। समझ लेना तुम्हारा अच्छा दिन चालू हो गया। ऐसी अनमोल बनाओ इस वाणी को, इस मुंह से जो चाहे मत निकालो, कोई यह बोल दे कि कहां क्या बक रहा है, समझ लेना गूंगे बनने की तैयारी हो गई और लोग तरस जाए कि इनके मुख से दो शब्द सुनने को हमे मिल जाए, ऐसी साधना बनाओ कि जब नगर में प्रवेश हो सारे नगर में खुशहाली छा जाए। जो देना चाहता है उसी से लेना है, जो मेरे संबंध में कुछ सोचता है वही मेरे काम आने वाला है, दुनिया में ऐसा कौन व्यक्ति है जिसने तुम्हारे लिए सोचा हो, उसका एक ही नाम है वह है तीर्थंकर। हम क्यों मनाते हैं इनके पंचकल्याणक क्योंकि उन्होंने एक ही बात की थी कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं सारे जगत को सुखी देखना चाहता हूं।</p>
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		<title>...तो जाओ तुम्हारी जिंदगी में खुशियों की बौछार बनी रहेगी: मुनिश्री के प्रवचनों का धर्मलाभ ले रहे हैं धर्मावलंबी श्रद्धालु </title>
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					<description><![CDATA[निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचन सुनने के लिए जिनालयों में जैन समाज के धर्मावलंबी श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थित रहती है। सोमवार को भी मुनिश्री ने अपने प्रवचन में जीवन के दर्शन को लेकर महत्वपूर्ण बातों से जैन समाज के श्रद्धालुओं को लाभान्वित किया। पढ़िए उनके प्रवचनों के खास अंशों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचन सुनने के लिए जिनालयों में जैन समाज के धर्मावलंबी श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थित रहती है। सोमवार को भी मुनिश्री ने अपने प्रवचन में जीवन के दर्शन को लेकर महत्वपूर्ण बातों से जैन समाज के श्रद्धालुओं को लाभान्वित किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए उनके प्रवचनों के खास अंशों को इस खबर में&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> जिन्होंने अपने जीवन को इतना संस्कारित और साधनामय बनाया। वह भले ही हजारों लाखों साल पहले मोक्ष चले गए लेकिन जिस रास्ते से वे गुजरे, उन रास्तों पर उनके चिन्ह आज भी विद्यमान हैं और उनकी आदर्शताओं को ध्यान में रखकर उनके आचरण को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए जिनेंद्र देव की स्थापना करते हैं क्योंकि, इस कलयुग में और खासतौर से श्रावक उपादान कृत धर्म से अपना जीवन नहीं चला पाता, उसके उपादान में इतनी ताकत नहीं होती कि वह अपनी इच्छानुसार जीवन जी सके। वह अपने ही जीवन के सुख-दुःख से सुखी दुःखी नहीं होता, उसके साथ उसका परिवार भी है, रिश्तेदार, समाज भी है। यह उद्गार मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि इन सारी परिस्थितियों में गृहस्थ कैसे अपने जीवन को इस कठिन मोड़ या कठिन संसार से सकुशल निकाल ले जाए, इसके लिए ही जिनवाणी ने श्रावकों को जिनेंद्र देव और जिनेंद्र पूजा का उपदेश दिया और गृहस्थ से कहा कि तुम इतना पुण्य लेकर नहीं आए हो कि तुम्हारी जिंदगी में कभी आंसू न आए। तुम इतना पुण्य लेकर नहीं आए हो कि तुम्हारा चेहरा सदा मुस्कुराता रहे। तुम इतना पुण्य लेकर नहीं आए हो कि तुम घोषणा कर सको कि मेरी जिंदगी में कभी विपरीत समय नहीं आएगा। तब जिनवाणी ने एक सूत्र तुम्हें दिया कि तुम एक काम करो-दुनिया में जिसको कभी दुःख न हुआ हो, जिसकी जिंदगी में हमेशा सुख ही सुख रहा हो और दुःख भी आया है तो उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया। ऐसे लोगों की खुशी में शामिल हो जाओ, तुम्हारी जिंदगी खुशमय हो जाएगी। ऐसी महान आत्माओं के दुःख को दूर करने का भाव करो, तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा।</p>
<p><strong>भगवान का पंचकल्याणक होगा तो हम उसमें पात्र बनेंगे</strong></p>
<p>यदि तुम चाहते हो कि मेरी जिंदगी में कोई संकट आए तो वह टल जाए तो तुम अपनी जिंदगी में एक मंत्र ले लेना-जो मुझसे बड़े हैं, मैं उनकी जिंदगी में कभी संकट नहीं आने दूंगा। यदि मेरे हाथ में है तो कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। यदि तुम अपनी जिंदगी में अपने परिवार में खुशहाली चाहते हो तो दूसरा नियम तुम्हें लेना है, जो तुम्हारी महान आत्मा हो, जिसको तुम सर्वश्रेष्ठ मानते हो, उसकी खुशी में तुम सदा शामिल रहोगे। जाओ तुम्हारी जिंदगी में खुशियों की बौछार बनी रहेगी। क्यों मनाते हैं जयंतियां, क्यों मनाते हैं पंचकल्याणक, मूल भगवान के पंचकल्याणक से हमें कोई लेना देना नहीं लेकिन, नीति है जो व्यक्ति अपने आदर्श की खुशियों में शामिल होता है, उसकी जिंदगी अपने आप खुशमय हो जाती है। क्या तुम कभी भगवान के महोत्सव में शामिल हुए, क्या तुमने कभी भगवान के लिए धन कमाया कि भगवान का पंचकल्याणक होगा तो हम उसमें पात्र बनेंगे।</p>
<p><strong>&#8230;तो भगवान तुम्हारे लिए समर्पित रहेगा</strong></p>
<p>यदि नहीं तो वे कभी उम्मीद न करें कि इस दरवाजे से कभी तुम्हें कोई खुशी मिल जाएगी क्योंकि, टीट फॉर टैट, तुम भगवान के लिए समर्पित रहोगे तो भगवान तुम्हारे लिए समर्पित रहेगा। जब तुम समर्थ थे तब तुमने उसकी कद्र नहीं की इसलिए कर्म ने आज तुम्हें असमर्थ बना दिया। जो आज कुल से, जाति से, परिवार से, काल से समर्थ हैं इसके बाबजूद भी तुम्हारा मन भागीदारी में न हो तो नोट कर लेना कि कल तुम इतने असमर्थ हो जाओगे कि चाहते हुए भी कर नहीं पाओगे क्योंकि, तुमने समर्थ होकर नहीं किया।</p>
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		<title>सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव और दीन-दुःखियों पर रखें करुणा और दया: महावीरनगर की ओर किया आचार्य ने विहार </title>
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		<pubDate>Tue, 04 Feb 2025 07:58:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज कोटा के आरके पुरम त्रिकाल चौबीसी जैन मंदिर में विराजित होकर धर्मसभा को संबोधित कर रहे हैं। यहां के जैन समाज के गुरु भक्त श्रावक-श्राविकाएं उनकी देशनाएं सुन रहे हैं और धर्मलाभ उठा रहे हैं। सोमवार को भी आचार्यश्री ने धर्मसभा को संबोधित किया। सुबह आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज कोटा के आरके पुरम त्रिकाल चौबीसी जैन मंदिर में विराजित होकर धर्मसभा को संबोधित कर रहे हैं। यहां के जैन समाज के गुरु भक्त श्रावक-श्राविकाएं उनकी देशनाएं सुन रहे हैं और धर्मलाभ उठा रहे हैं। सोमवार को भी आचार्यश्री ने धर्मसभा को संबोधित किया। सुबह आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में अभिषेक और विश्व में शांति-सद्भाव के लिए शांतिधारा की गई। मंगलवार सुबह आचार्यश्री का महावीरनगर की ओर मंगलविहार हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कोटा से पारस जैन ‘पार्श्वमणि’ की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>कोटा।</strong> आरके पुरम त्रिकाल चौबीसी जैन मंदिर में विराजमान आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी महाराज ने यहां धर्मसभा को संबोधित किया। वे यहां पर दिगंबर जैन समाज को अपनी देशना से धर्म प्रभावना के लिए जगा रहे हैं। धर्मसभा में आचार्यश्री ने कहा कि संसार के सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव बनाए रखिए। मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों पर नित्य रहे, दिन दुःखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्तोत्र बहे, अर्थात दिन दुःखी जीवों के प्रति सदैव करुणा भाव हृदय में रखना चाहिए।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-73690" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000.jpg" alt="" width="1600" height="1066" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-768x512.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-1536x1023.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-990x660.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250204-WA0000-1320x879.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />मन परमात्मा की भक्ति में लग गया, वो निकट भव्य है</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि घृणा भाव आपको घृणित बनाता है। मैत्री भाव अंतर्मन में प्रेम जगाता है। संसार में बुरा कोई नहीं है। आपकी उसके प्रति गलत धारणा सोच ही उसको भला बुरा बनाती है। मानव की जैसी सोच होती है। वैसा ही उसका जीवन बन जाता है। जिस प्राणी का मन परमात्मा की भक्ति में लग गया, वो निकट भव्य है और जिनका मन मंदिर जाने के बाद भी भगवान की पूजा, पाठ, स्तुति, ध्यान, जाप में नहीं लगता वो निकट भव्य नहीं है। उस प्राणी का संसार परिभ्रमण अभी बाकी है। यह बात सार्वभौमिक सत्य है। जिसको नकारा नहीं जा सकता।</p>
<p><strong>सांगोद वाले परिवार को मिला सौभाग्य</strong></p>
<p>मंदिर समिति के अध्यक्ष अंकित जैन महामंत्री अनुज गोधा और कोषाध्यक्ष ज्ञानचंद जैन ने बताया कि सुबह आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में अभिषेक और विश्व में शांति-सद्भाव के लिए शांतिधारा की गई। मंदिर समिति के कार्यांध्यक्ष प्रकाश जैन ने बताया कि सोमवार को मंगल दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं मां जिनवाणी समर्पित करने का सौभाग्य शांतिदेवी जैन, विनय, प्रवीण, जयकुमार, दिनेश, विपिन, शुद्धात्म जैन सांगोद वाले परिवारजनों को मिला।</p>
<p><strong>आचार्य श्री का हुआ विहार, इनकी रही उपस्थिति</strong></p>
<p>मंदिर समिति के उपाध्यक्ष लोकेश बरमुंडा ने बताया कि मंगलवार सुबह आचार्य श्री ससंघ का आरके पुरम त्रिकाल चौबीसी जैन मंदिर से महावीर नगर विस्तार योजना जैन मंदिर के लिए मंगल विहार हुआ। सायंकाल गुरु भक्ति एवं आनंद यात्रा आयोजित होगी। धर्मसभा में सकल दिगंबर जैन समाज समिति के अध्यक्ष विमल जैन, नान्ता, महामंत्री विनोद जैन, टोरडी, राजमल पाटौदी, जेके जैन, प्रकाश बज, जीतू डूंगरवाल, पंकज जैन, भागचंद मित्तल, मुकेश जैन, राजकुमार जैन उपस्थित रहे।</p>
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		<title>मुनि श्री का बरुआसागर से झांसी मंगल विहार: आज शाम छह बजे होगा शंका समाधान सत्र  </title>
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		<pubDate>Sun, 21 May 2023 07:06:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[जिस प्रकार नदी का पानी निरन्तर गतिशील रहता है उसी प्रकार दिगम्बर संत में निरन्तर विहार करते है और धर्म की प्रभावना करते है। श्रमण मुनि पुगंव श्री 108 सुधासागर महाराज का विहार बरुआसागर से झांसी की ओर हो गया है। पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट&#8230; झांसी। जिस प्रकार नदी का पानी निरन्तर गतिशील रहता [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जिस प्रकार नदी का पानी निरन्तर गतिशील रहता है उसी प्रकार दिगम्बर संत में निरन्तर विहार करते है और धर्म की प्रभावना करते है। श्रमण मुनि पुगंव श्री 108 सुधासागर महाराज का विहार बरुआसागर से झांसी की ओर हो गया है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>झांसी।</strong> जिस प्रकार नदी का पानी निरन्तर गतिशील रहता है उसी प्रकार दिगम्बर संत में निरन्तर विहार करते है और धर्म की प्रभावना करते है। श्रमण मुनि पुगंव श्री 108 सुधासागर महाराज का विहार बरुआसागर से झांसी की ओर हो गया है। मुनि श्री वर्तमान में झांसी-बरूआसागर मार्ग पर बेतवा नदी के पास कन्स्ट्रक्शन साइट पर विराजमान है। सायं 6 बजे गुरूदेव का जिज्ञासा समाधान हुआ।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-44472" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230521-WA0001.jpg" alt="" width="719" height="1600" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230521-WA0001.jpg 719w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230521-WA0001-135x300.jpg 135w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230521-WA0001-460x1024.jpg 460w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/05/IMG-20230521-WA0001-690x1536.jpg 690w" sizes="auto, (max-width: 719px) 100vw, 719px" /></p>
<p>आज गुरूदेव का मंगल विहार स्पेस मून सिटी में होगा, जहां सुबह प्रवचन आहार चर्या, एवं सायं 6 बजे ‘शंका समाधान&#8217; सत्र होगा। 22 मई को सुबह 5 बजे परमपूज्य गुरूदेव का मंगल विहार रिसाला चुंगी, यूनिवर्सिटी मार्ग से करगुवां जी की ओर होगा। जहाँ परमपूज्य गुरूदेव के मंगल सानिध्य में श्री जी का अभिषेक, शांतिधारा होगी, तत्पश्चात परमपूज्य गुरूदेव के मुखार विंद से अमृत देशना होगी।</p>
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