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	<title>Madhya Pradesh श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>आर्यिका श्री स्वर्णमति माताजी का समाधि मरण: जैन समाज में शोक </title>
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		<pubDate>Sat, 15 Feb 2025 16:40:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धरियावद। परम पूज्य मुनि श्री पुण्य सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका श्री स्वर्णमति माताजी का आज समाधि मरण धरियावद में हुआ। पढ़िए राजेश पंचोलिया की खबर धरियावद। परम पूज्य मुनि श्री पुण्य सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका श्री स्वर्णमति माताजी का आज समाधि मरण धरियावद में हुआ। माताजी का परिचय आर्यिका श्री स्वर्णमति [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धरियावद। परम पूज्य मुनि श्री पुण्य सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका श्री स्वर्णमति माताजी का आज समाधि मरण धरियावद में हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया की खबर</span></strong></p>
<hr />
<p>धरियावद। परम पूज्य मुनि श्री पुण्य सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका श्री स्वर्णमति माताजी का आज समाधि मरण धरियावद में हुआ।</p>
<p><strong>माताजी का परिचय</strong></p>
<p>आर्यिका श्री स्वर्णमति माताजी का पूर्व नाम श्रीमती सुनीता छाबड़ा था। आप डिब्रूगढ़, असम की निवासी थीं। आपने 2 जुलाई 2023 को मुनि श्री पुण्य सागर जी महाराज से सिद्ध क्षेत्र सोनागिर, मध्यप्रदेश में आर्यिका दीक्षा प्राप्त की थी। आप श्रीमती रतनी देवी और श्री देवीलाल पटौदी की पुत्री थीं। आपका जन्म 10 दिसंबर संवत 2049 को हुआ था। आपके गृहस्थ जीवन में रतन लाल जी छाबड़ा से विवाह हुआ और उनके दो पुत्र व एक पुत्री हैं।</p>
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		<title>मुनि पूज्य सागर की प्रेरणा से दिगंबर अवस्था में प्राप्त हुआ समाधिमरण : सुसनेर के 72 वर्षीय जैन संत आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज का समाधिमरण </title>
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		<pubDate>Sun, 01 Dec 2024 11:54:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सुसनेर, मध्य प्रदेश के 72 वर्षीय प्रतिष्ठित जैन संत आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज का समाधिमरण 1 दिसंबर को शाम 5 बजे के लगभग हो गया। डोला 2 दिसंबर सुबह 8 बजे निकला जाएगा । आचार्य श्री ने अपने जीवन में 188 पंचकल्याणक महोत्सवों का आयोजन किया और 47 वर्षों की साधना में 2 [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सुसनेर, मध्य प्रदेश के 72 वर्षीय प्रतिष्ठित जैन संत आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज का समाधिमरण 1 दिसंबर को शाम 5 बजे के लगभग हो गया। डोला 2 दिसंबर सुबह 8 बजे निकला जाएगा । आचार्य श्री ने अपने जीवन में 188 पंचकल्याणक महोत्सवों का आयोजन किया और 47 वर्षों की साधना में 2 लाख किलोमीटर की पदयात्रा की। उनका जीवन न केवल जैन धर्म के प्रति समर्पण और तपस्या का प्रतीक था, बल्कि उन्होंने समाज में भी धर्म और संस्कारों के प्रचार-प्रसार के लिए अपार योगदान दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा जैन की रिपोर्ट ।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। सुसनेर, मध्य प्रदेश के 72 वर्षीय प्रतिष्ठित जैन संत आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज का समाधिमरण 1 दिसंबर को हो गया। आचार्य श्री ने अपने जीवन में 188 पंचकल्याणक महोत्सवों का आयोजन किया और 47 वर्षों की साधना में 2 लाख किलोमीटर की पदयात्रा की। उनका जीवन न केवल जैन धर्म के प्रति समर्पण और तपस्या का प्रतीक था, बल्कि उन्होंने समाज में भी धर्म और संस्कारों के प्रचार-प्रसार के लिए अपार योगदान दिया। आचार्य श्री ने सुसनेर के सकल दिगंबर जैन समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया, और सुसनेर के इंदौर-कोटा मार्ग पर त्रिमूर्ति मंदिर का निर्माण कर समाज को धर्म से जोड़ा। उनकी शिक्षा, मार्गदर्शन और उपदेशों ने समाज को सच्चे अर्थों में एकजुट किया।</p>
<p><strong>आचार्य श्री का जीवन: एक तपस्वी यात्रा</strong></p>
<p>आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज के जीवन में धर्म और तपस्या का महत्वपूर्ण स्थान रहा। उनके सानिध्य में सुसनेर में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव हर वर्ष एक भव्य आयोजन बनता रहा। उन्होंने अंहिसा परमो धर्म का संदेश देते हुए समाज में जैन धर्म के प्रति निष्ठा और भक्ति का प्रचार किया। उनके सानिध्य में सुसनेर में 189वां पंचकल्याणक महोत्सव 23 जनवरी से 30 जनवरी तक आयोजित किया जाना था। करीब 2 लाख किलोमीटर की पदयात्रा के दौरान आचार्य श्री ने समाजजनो को केवल धर्म का अनुसरण करने की शिक्षा दी, और यही कारण है कि सुसनेर का जैन समाज हर वर्ष होने वाले कार्यों को आचार्य श्री के ही सानिध्य में करता आ रहा।</p>
<p><strong>जीवन की संक्षिप्त यात्रा </strong></p>
<p>आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज का जन्म 13 अगस्त 1947 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिताजी का नाम श्री सूरजभान जी जैन और माताजी का नाम श्रीमती रत्नमला जी जैन था। आचार्य श्री ने 21 फरवरी 1972 को तिजारा, राजस्थान में आचार्य श्री 108 निर्मल सागर जी महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत लिया और उसी गुरु के सान्निध्य में 9 अप्रैल 1972 को तिजारा में क्षुल्लक दीक्षा प्राप्त की। इसके बाद, 13 मार्च 1973 को उन्होंने बूंदी,राजस्थान में मुनि दीक्षा ली। 13 अप्रैल 1973 को गणधर पद संगोद राजस्थान में मिला। इसके बाद आचार्य श्रीनिर्मल सागर जी महाराज से दीक्षा लेकर, 11 फरवरी 1984 को आगरा, उत्तर प्रदेश में आचार्य पद की पदवी प्राप्त की। यह उपाधि आचार्य श्री सुमति सागर जी महाराज ने प्रदान की। दीक्षा के पश्चात उनका नाम आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज रखा गया। आचार्य श्री के जीवन की विशेषता उनकी सरलता और सहजता थी, जिसके कारण समाज के हर वर्ग के लोग उनके परम भक्त बन गए। उनकी शिक्षाओं और गुणों को शब्दों में व्यक्त करना कठिन है, क्योंकि उनके जीवन का प्रत्येक पहलू एक प्रेरणा है।</p>
<p><strong>मिलीं अनेक उपाधियां</strong></p>
<p>आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज को उनके महान कार्यों और योगदान के लिए अनेक उपाधियां मिलीं, जिनमें ऋषिरत्न, सन्मार्ग दिवाकर, विधान सम्राट, और उपसर्ग विजेता जैसी उपाधियां प्रमुख हैं। उनके योगदान में सुसनेर, मध्य प्रदेश में त्रिमूर्ति मंदिर और इंदौर में नवग्रह मंदिर का निर्माण करवाने की प्रेरणा देना शामिल है। इसके अलावा, पिड़ावा में श्री पार्श्वनाथ जिनबिम्ब प्रतिष्ठा महोत्सव में सान्निध्य प्रदान करना, सुसनेर में छात्रावास-गुरुकुल की स्थापना, और कई महत्वपूर्ण विधियों में सान्निध्य प्रदान करना उनके समाज के प्रति समर्पण का प्रमाण है। आचार्य श्री ने अपने जीवन में केवल साधना और तपस्या के माध्यम से ही समाज को दिशा दी, बल्कि उन्होंने विभिन्न धार्मिक और सामाजिक कार्यों को भी अपनी प्रेरणा से सफल बनाया। उनके योगदान और मार्गदर्शन से जैन समाज में एक नई जागृति आई और धर्म के प्रति श्रद्धा और विश्वास को और मजबूत किया गया।</p>
<p><strong>धर्म के प्रति प्रतिबद्धता: 25 चातुर्मास सुसनेर में</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने अपने जीवन के 25 चातुर्मास सुसनेर में ही किए, जिनमें से कुछ चातुर्मास दिल्ली, इंदौर, कोटा, बूंदी, निवई, अजमेर और उज्जैन में भी किए। फिर भी, उन्होंने सुसनेर को अपनी स्थाई साधना स्थली बनाए रखा और यहां पर सबसे अधिक चातुर्मास किए।</p>
<p><strong>शिक्षा और समाज उत्थान में योगदान</strong></p>
<p>आचार्य श्री के मार्गदर्शन में सुसनेर में &#8220;आचार्य श्री दर्शन सागरजी महाराज ज्ञान मंदिर स्कूल&#8221; और ट्रस्ट का संचालन हो रहा है, जो उनकी प्रेरणा से समाजजनों द्वारा संचालित है। आचार्य श्री ने सुसनेर के जैन समाज को शिक्षा और अन्य कारोबार में प्रगति दिलाने के लिए कई कदम उठाए और समाज को संगठित किया।</p>
<p><strong>38 दीक्षाएं और 3 आर्यिका माताजी</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने अपने 47 वर्षों के जीवन में 38 दीक्षाएं दीं, जिनमें 16 मुनि, 20 क्षुल्लक और 3 आर्यिका माताजी शामिल हैं। उनकी सरलता और सहजता के कारण समाज का हर वर्ग, हर व्यक्ति उन्हें विशेष परम भक्त मानता है।</p>
<p><strong>मुनि पूज्य सागर जी की प्रेरणा से दिगंबर अवस्था में समाधिमरण</strong></p>
<p>आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज का स्वास्थ्य पिछले चार वर्षों से अस्वस्थ था और उनकी सेवा सुसनेर समाज द्वारा गृहस्थ अवस्था में की जा रही थी। पिछले दो महीनों से उन्हें नवग्रह अतिशय क्षेत्र, ग्रेटर बाबा परिसर, इंदौर में लाकर चिकित्सा दी गई थी। गुरु भक्त नरेंद्र वेद ही उन्हें वहां लेकर आए थे और वही सेवा कर रहे थे। आचार्य श्री 22 नवंबर से कुछ भी नहीं ले पा रहे थे, यहां तक कि एक या दो घूंट पानी भी नहीं पिया जा रहा था। तब नवग्रह अतिशय क्षेत्र में विराजमान अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज ने इंदौर जैन समाज के सामाजिक संसद के अध्यक्ष नरेंद्र वेद और सुसनेर के अध्यक्ष एवं समाजजनों को निर्देशित किया कि भगवान के सामने गुरुदेव के वस्त्र उतारकर और उनके पीछे कमंडल रखकर उन्हें दीक्षा दी जाए, ताकि वे दिगंबर मुनि बनकर जीवनभर त्याग, तपस्या और मार्ग पर चलते हुए जैन धर्म के लिए अपना जीवन समर्पित कर सकें। इस दीक्षा के बाद पूर्वाचार्य का समाधि मरण दिगंबर अवस्था में ही हो, ताकि उनकी जीवनभर की तपस्या सफल हो सके। इसके बाद 28 नवंबर को नरेंद्र वेद के द्वारा उन्हें सुसनेर ले जाया गया, जहां 29 नवंबर को आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज ने भगवान के सामने मुनि रूप में दीक्षा ली। आज, 1 दिसंबर  को उनका समाधिमरण हो गया। सुसनेर में हजारों भक्त उन्हें नम आंखों से श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे।</p>
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		<title>भावपूर्ण श्रद्धांजलि -गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज : श्रमण संस्कृति के एक दैदीप्यमान नक्षत्र का अवसान  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Jul 2024 10:14:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[2024 में जैन श्रमण संस्कृति के दो बड़े संघों के नायक (आचार्यों) की समाधि होने से सकल जैन समाज स्तब्ध है। फरवरी में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी के बाद अब दूसरे बड़े संघ के आचार्य विरागसागर जी की समाधि हुई है। पढ़िये सुनील जैन &#8216;संचय&#8217; का विशेष आलेख&#8230;. परम पूज्य गणाचार्य विरागसागर महाराज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>2024 में जैन श्रमण संस्कृति के दो बड़े संघों के नायक (आचार्यों) की समाधि होने से सकल जैन समाज स्तब्ध है। फरवरी में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी के बाद अब दूसरे बड़े संघ के आचार्य विरागसागर जी की समाधि हुई है।<span style="color: #ff0000"> पढ़िये सुनील जैन &#8216;संचय&#8217; का विशेष आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>परम पूज्य गणाचार्य विरागसागर महाराज की संलेखना समाधि बुध-गुरुवार की मध्यरात्रि 2.30 बजे महाराष्ट्र के जालना में हो गई । रात से ही यह खबर जैसे ही सोशल मीडिया के माध्यम से आई लोग स्तब्ध रह गए। किसी को भी गुरुवर की समाधि की खबर एक सपना जैसे महसूस हुई, लेकिन सच्चाई यही थी। जिसने भी सुना स्तब्ध रह गया, इस खबर के साथ समूचे देशभर की जैन समाज में शोक की लहर व्याप्त हो गई। हालांकि साधु के लिए समाधि उत्सव का दिन होता है।</p>
<p>उनकी आदर्श समाधि हुई है, सभी कार्य उन्होंने समय से किए। मौत सामने खड़ी थी, लोग हॉस्पिटल जाने का निवेदन करते रहे लेकिन वे अडिग थे ,सारी सुविधायें उपलब्ध थीं लेकिन अपने नियमों पर अडिग रहे, आगम के आदेश को माना, निश्चित ही यही सच्ची साधना है, यही मुनि अवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा है और वे महामना इस परीक्षा में प्रतिशत सफल रहे।</p>
<p>भारतीय वसुन्धरा को इस बात का महान् गौरव है कि इसने अनेक महान् नर रत्नों को जन्म दिया। रत्न की कीमत फिर भी आंकी जा सकती है किन्तु धर्मात्मा नर रत्नों की कीमत नहीं आंकी जा सकती, क्योंकि उनका कोई मूल्य नहीं होता, वे अमूल्य होते हैं। ऐसे ही अमूल्य रत्न, वात्सल्य के धनी, प्रशांतमूर्ति आचार्य श्री विरागसागरजी महाराज थे। आपके दिव्य व्यक्तित्व का प्रभाव आपके द्वारा दीक्षित साधु वर्ग में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। आचार्यश्री के निर्देशन, प्रेरणा एवं सान्निध्य में जैन समाज को अनेक महान उपलब्धियां हासिल हुई हैं। समाजोत्थान हेतु आपका अविस्मरणीय योगदान है। आचार्यश्री ने अपने अंदर कभी अभिमान नहीं पनपने दिया, हमने जब भी देखा है तो प्रसन्नता ही देखने को मिली। वे वात्सल्य के धनी थे,साधुओं पर उनका अतीव वात्सल्य झलकता था। विद्वानों के प्रति भी उनका असीम वात्सल्य देखने को मिलता था।</p>
<p><strong>यति सम्मेलन-युग प्रतिक्रमण की प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित किया </strong></p>
<p>जैन शासन में युग प्रतिक्रमण यति सम्मेलन की पुरातन परम्परा है। अर्हद्बलि आचार्य भगवन् ने यति सम्मेलन युग प्रतिक्रमण किया था। पांच वर्ष का एक युग माना गया है, इसलिए इसे युग सम्मेलन भी कहते हैं। इस सम्मेलन में सौ योजन (लगभग 1200 किलोमीटर) दूर तक के साधु इसमें सम्मिलित होते थे। उस काल में हुए यति सम्मेलन में जिनशासन की प्रभावना के निमित्त मुनिराजों के द्वारा अनेक निर्णय लिये गये थे। आचार्य श्री विरागसागरजी महाराज ने यति सम्मेलन व युग प्रतिक्रमण की एक अति प्राचीन जैन परम्परा को पुनर्जीवित करने का स्तुत्य प्रयास किया । इसको व्यवस्थित रूप से सन् 2012 में जयपुर से शुरु किया और इसके बाद निरंतर श्रृंखला चलती रही है। 2017 में अतिशय क्षेत्र करगुवां जी-झांसी में आयोजित यति सम्मेलन व युग प्रतिक्रमण कार्यक्रम में आयोजित विद्वत् संगोष्ठी में सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ था। उसी परम्परा को जीवंत रखते हुए जन्म भूमि पथरिया (दमोह) में फरवरी 2023 में बहुत महत्त्वपूर्ण आयोजन हुआ था जिसमें विविध आयोजन हुए साथ ही साथ में साधु संघ का विशाल संघ भी इसमें जुटा और विविध चर्चा-परिचर्चा, संवाद-विमर्श हमें देखने को मिले।</p>
<p><strong>साहित्य साधना </strong></p>
<p>पूज्य गणाचार्यश्री द्वारा चेतन कृतियों के साथ अनेक ग्रंथों, टीकाओं को लिखकर श्रुत सम्वर्द्धन किया है। आचार्य विरागसागर ने 6 से अधिक साहित्य पर शोध किया था। शोध में वारसाणुपेक्खा पर 1100 पृष्ठीय सर्वोदयी संस्कृत टीका, रयणसार पर 800 पृष्ठीय रत्नत्रयवर्धिनी संस्कृत टीका, लिंग पाहुड़ पर श्रमण प्रबोधनी टीका, शील पाहुड़ पर श्रमण संबोधनी टीका, शास्त्र सार समुच्चय पर चूर्णी सूत्र और अनेक शोधात्मक ,शुद्धोपयोग, सम्यकदर्शन, आगमचक्खूसाहू आदि, चिन्तनीय बालकोपयोगी कथा अनुवाद गद्य संपादित साहित्य, जीवनी व प्रवचन साहित्य 150 से अधिक पुस्तकों का लेखन किया।गणाचार्य श्री विरागसागरजी महाराज के शिष्यों ने साहित्य सृजन के क्षेत्र में विशेष क्रांति लायी है।</p>
<p><strong>अद्भुत संयोग </strong></p>
<p>दक्षिण में जन्में संत आचार्य श्री विद्यासागर जी की समाधि उत्तर में हुई और उत्तर में जन्मे गणाचार्य श्री विरागसागर जी की समाधि दक्षिण में हुई। दोनों महान आत्माओं की समाधि का समय भी लगभग एक समान है। एक अष्टमी पर्व पर तो दूसरे चतुर्दशी पर्व पर समाधि को प्राप्त हुए । गणाचार्य श्री विराग सागर जी का जन्म गुरुवार को हुआ था और समाधि भी गुरुवार को हुई, यह अपने आपमें स्मरणीय तथ्य है।</p>
<p><strong>एक के बाद एक श्रमण सूर्य का अवसान बहुत बड़ी क्षति </strong></p>
<p>2024 में जैन श्रमण संस्कृति के दो बड़े संघों के नायक (आचार्यों) की समाधि होने से सकल जैन समाज स्तब्ध है। फरवरी में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी के बाद अब दूसरे बड़े संघ के आचार्य विरागसागर जी की समाधि हुई है। इसके पूर्व में हाल ही के वर्षों में आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज, सराकोद्धारक आचार्य श्री ज्ञान सागर जी महाराज, आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज, मुनि श्री तरुणसागर जी महाराज, आचार्य श्री निर्मल सागर जी महाराज आदि जैसे प्रभावक दिगम्बर संतों की समाधि ने बहुत बड़ा शून्य पैदा कर दिया है जिसकी भरपाई असंभव दिख रही है। एक के बाद एक बड़े बड़े संतों की समाधि से श्रमण संस्कृति , जैन समाज को गहरा आघात पहुँचा है।</p>
<p><strong>जन्म से समाधि तक का सफर एक ही दिन </strong></p>
<p>आपका जन्म 2 मई 1963 , गुरुवार को पथरिया जिला दमोह में श्रेष्ठि श्री कपूरचंद जी (समाधिस्थ मुनि श्री विश्व वंद्य सागर जी) एवं माता श्रीमती श्यामा देवी( समाधिस्थ आर्यिका श्री विशांतमति) के यहां पथरिया जिला दमोह में हुआ आपका बचपन का नाम श्री अरविंद कुमार जैन था ।आपने 5 तक की शिक्षा पथरिया में प्राप्त करने के बाद सन 1974 में कटनी श्री शांति सागर निकेतन संस्कृत विद्यालय में धार्मिक शिक्षण 6 वर्ष प्राप्त कर 11 तक की लौकिक शिक्षा तथा शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की आपने 20 फरवरी 1980 को 17 वर्ष की उम्र में बुढ़ार में आचार्य श्री सन्मति सागर जी से क्षुल्लक दीक्षा ली आपका नाम श्री पूर्णसागर किया गया आपने 9 दिसंबर 1983 को औरंगाबाद में मुनि दीक्षा आचार्य श्री विमल सागर जी से प्राप्त की आपका नाम श्री विराग सागर जी किया गया। आपको आचार्य पद 9 नवंबर 1992 को 29 वर्ष की उम्र में सिद्ध क्षेत्र द्रोणगिरी में दिया गया ।</p>
<p><strong>प्रभावनामयी अनेक आयोजनों के प्रेरणास्रोत </strong></p>
<p>29 की उम्र में ही आचार्य पद की जिम्मेदारी मिलने के बाद गणाचार्य विरागसागर जी मुनिराज ने जैन संस्कृति की धर्म प्रभावना को ऐसा बढ़ाया कि हर युवा उनसे प्रभावित होने लगा। न सिर्फ बुंदलेखंड, मप्र बल्कि उप्र, विहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों में विहार करते हुए धर्म पताका फहराया।</p>
<p>उनके सान्निध्य में अनेक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुईं। शाकाहार और व्यसन मुक्त जीवन के लिए उनकी प्रेरणा से अनेक आयोजन हुए जिससे लाखों लोग प्रभावित हुए, उन्हें नया जीवन मिला। सम्यक ज्ञान शिविर, पूजन प्रशिक्षण शिविर, श्रावक संस्कार शिविरों से युवा वर्ग में एक अनोखी जागृति देखने को मिली।</p>
<p><strong>पांच सौ से अधिक शिष्य- प्रशिष्य </strong></p>
<p>प्राप्त जानकारी के अनुसार आचार्य विरागसागर ने संघ में 94 मुनियों, 73 आर्यिकाओं, 5 ऐलक, 23 क्षुल्लक, 32 क्षुल्लिका दीक्षाएं देकर चेतन कृतियों का निर्माण कर मोक्षमार्ग की ओर प्रशस्त किया। इस तरह करीब 222 साधु, साध्वियां विराग सागर के बड़े संघ में हैं। 9 आचार्य बनाए। उनके शिष्य प्रशिष्य को मिलाकर पांच सौ से अधिक यह संख्या पहुँच जाती है जो श्रमण संस्कृति को गौरवमयी है।</p>
<p>इसके अलावा 133 से अधिक संलेखना करा एक महनीय कार्य संपादित किया।</p>
<p><strong>संघ को समय पर किया व्यवस्थित </strong></p>
<p>समाधि के परम पूज्य निर्यापक मुनि श्री सुधा सागर जी महाराज ने अपनी विनयांजलि में कहा कि उनका संघ अनाथ नहीं हुआ है, वे समय-समय पर अपने शिष्यों को अधिकार देते गए और संघ को व्यस्थित करते गए। शायद उन्हें पहले से महसूस हो गया था कि वे जल्दी चले जायेंगे। श्रमण संस्कृति की बहुत बड़ी कतार उनके निमित्त से मिली।</p>
<p>मजबूत हाथों में पट्टाचार्य पद ; गणाचार्य श्री विराग सागर जी को शायद पहले से महसूस हो गया था कि अब उनकी देह ज्यादा समय इस धरती पर रहने वाली नहीं है इसलिए उन्होंने समय रहते समाधि के एक दिन पूर्व ही अपने अंतिम संबोधन में पट्टाचार्य का पद अपने सुयोग्य शिष्य योग्य प्रभावक संत चर्या शिरोमणि आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज को देने की घोषणा कर आगम की परंपरा का पालन किया। निश्चित ही पूज्य आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज को यह पद दायित्व सौपकर अपनी विरासत को मजबूत हाथों में प्रदान किया है।</p>
<p>पूज्य गुरुदेव का संपूर्ण जीवन &#8216;स्व&#8217; और &#8216;पर कल्याण&#8217; के लिए समर्पित रहा। वे अध्यात्म के सूर्य थे। मुझे भी अनेक बार उनके दिव्य सानिध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जहाँ विद्वत् संगोष्ठियों में सहभागिता की वही प्रतिभा सम्मान और पत्रकार सम्मेलन जैसे आयोजनों में उनके सान्निध्य में योगदान देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अनेकबार निकटता से चर्चा और आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।</p>
<p>आज भौतिक रूप से भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनकी शिक्षाएं, विचार, व्यवहार और उनका व्यक्तित्व हमें सदैव सन्मार्ग की दिशा दिखाता रहेगा।</p>
<p>परम पूज्य जैन दिगम्बर आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के विचार प्रकाश स्तंभ बनकर सदैव हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे। समाधी नमन !</p>
<p>साधना की जगमगाती देहरी से,</p>
<p>एक दीपक फिर किनारा कर गया।</p>
<p>मंजिलों की दूरियां पूछें कहाँ से,</p>
<p>मील का पत्थर किनारा कर गया।।</p>
<p>हम सब का परम दायित्व और कर्त्तव्य है कि हम उनके बताए मार्ग पर चलें तभी सच्ची विनयांजलि होगी।</p>
<p>&#8216;गुरुवः पांतु नो नित्यं, ज्ञान- दर्शन नायकाः । चारित्रार्णव गंभीरा मोक्ष मार्गोपदेशकाः।।&#8221;</p>
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		<title>आचार्य श्री विराग सागर महाराज का समाधि मरण : मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने लिखा शोक संदेश </title>
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		<pubDate>Fri, 05 Jul 2024 09:39:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विराग सागर महाराज के समाधि मरण पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पत्र लिखकर शोक संवेदना व्यक्त की है। उन्होंने लिखा है कि परम पूज्य गणाचार्य 108 श्री विरागसागर जी महाराज की जालना (महाराष्ट्र) के पास समाधि का समाचार प्राप्त हुआ। पढ़िए यह पूरा शोक संदेश&#8230;. इंदौर। आचार्य श्री विराग सागर महाराज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विराग सागर महाराज के समाधि मरण पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पत्र लिखकर शोक संवेदना व्यक्त की है। उन्होंने लिखा है कि परम पूज्य गणाचार्य 108 श्री विरागसागर जी महाराज की जालना (महाराष्ट्र) के पास समाधि का समाचार प्राप्त हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह पूरा शोक संदेश&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> आचार्य श्री विराग सागर महाराज के समाधि मरण पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पत्र लिखकर शोक संवेदना व्यक्त की है। उन्होंने लिखा है कि परम पूज्य गणाचार्य 108 श्री विरागसागर जी महाराज की जालना (महाराष्ट्र) के पास समाधि का समाचार प्राप्त हुआ।</p>
<p>परम पूज्य गणाचार्य श्री विरागसागर जी का जन्म मध्यप्रदेश की धरती पर पथरिया में हुआ था। इस नाते मध्यप्रदेश वासियों के लिए भी उनकी समाधि का समाचार पीड़ादायक है। संयोग से आचार्य विद्यासागर जी ने भी मध्यप्रदेश के अनेक स्थानों पर प्रवास किया। प्रदेश के निवासियों से उनके आत्मीय संबंध रहे। उनका आशीर्वाद मध्यप्रदेश वासियों को मिला। उनके देह त्यागने के पश्चात कम समय में ही यह दूसरी बड़ी सामाजिक क्षति हुई है।</p>
<p>श्री विरागसागर जी ने धर्म और आध्यात्म का मार्ग चुना। पूरे राष्ट्र में उनका प्रवास होता था। उनकी शिक्षाएं सदैव समाज कल्याण के लिए सभी को प्रेरित करती रहेंगी। उनके सार्थक जीवन का उदाहरण हमारे समक्ष दीर्घ अवधि तक रहेगा।</p>
<p>इस घड़ी में परम पूज्य गणचार्य के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए मैं देश समग्र जैन समाज के पदाधिकारियों और सदस्यों को अपनी भावना से अवगत करवाना चाहता हूं। निश्चित ही यह एक गहरा आघात है। परम पूज्य गणाचार्य के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं।</p>
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		<title>भारतीय मानव अधिकार सहकार ट्रस्ट में आस्था जैन सचिव नियुक्त आम जनता की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने का संकल्प </title>
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		<pubDate>Mon, 27 May 2024 06:51:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतीय मानव अधिकार ट्रस्ट के नागदा तहसील अध्यक्ष जीवनलाल जैन,अनुशंसा व संस्थापक मालती सुनील सिंह यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष- मा.सुनील सिंह यादव, राष्ट्रीय सचिव- शिवम तिवारी, शिखा गुप्ता संगठन मंत्री जिला उज्जैन, मनीष गुप्ता प्रदेश कार्य कारिणी सदस्य मध्य प्रदेश, संतोष मनोज सांवरिया नागदा मानव अधिकार सहकार ट्रस्ट द्वारा आस्था जैन को मध्यप्रदेश के इन्दौर जिले [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारतीय मानव अधिकार ट्रस्ट के नागदा तहसील अध्यक्ष जीवनलाल जैन,अनुशंसा व संस्थापक मालती सुनील सिंह यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष- मा.सुनील सिंह यादव, राष्ट्रीय सचिव- शिवम तिवारी, शिखा गुप्ता संगठन मंत्री जिला उज्जैन, मनीष गुप्ता प्रदेश कार्य कारिणी सदस्य मध्य प्रदेश, संतोष मनोज सांवरिया नागदा मानव अधिकार सहकार ट्रस्ट द्वारा आस्था जैन को मध्यप्रदेश के इन्दौर जिले में इन्दौर जिला सचिव के पद पर नियुक्त किया गया है। <span style="color: #ff0000">पढि़ए जीवन लाल जैन की रिपोर्ट……</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भारतीय मानव अधिकार ट्रस्ट के नागदा तहसील अध्यक्ष जीवनलाल जैन,अनुशंसा व संस्थापक मालती सुनील सिंह यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष मा.सुनील सिंह यादव, राष्ट्रीय सचिव शिवम तिवारी, शिखा गुप्ता संगठन मंत्री जिला उज्जैन, मनीष गुप्ता प्रदेश कार्य कारिणी सदस्य मध्य प्रदेश, संतोष मनोज सांवरिया नागदा मानव अधिकार सहकार ट्रस्ट द्वारा आस्था जैन को मध्यप्रदेश के इन्दौर जिले में इन्दौर जिला सचिव के पद पर नियुक्त किया गया है।</p>
<p>मानव अधिकारों की रक्षा हेतु कार्य एवं भ्रष्टाचार, कन्या भ्रूण हत्या, जल संरक्षण, ग्लोबल वार्निग, जन कल्याणकारी योजना आदि के निराकरण के लिए जन अभियान चलाकर आम जनता की नि:स्वार्थ भाव से सेवा संकल्प से जुडने पर आस्था जैन को अनेक गणमान्य लोगों ने बधाई दी है।</p>
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		<title>मध्य प्रदेश सिविल जज में ज्योति जैन ने प्राप्त किया तृतीय स्थान  धर्म और जिनदेव में अटूट श्रद्धा रखती है ज्योति  </title>
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		<pubDate>Tue, 30 Apr 2024 05:19:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बटियागढ़ खड़ैरी निवासी मध्यम परिवार की होनहार बेटी ज्योति जैन ने अपने परिवार के साथ-साथ गांव, जिले, संभाग और पूरे प्रदेश का एवं जैन समाज का नाम ऊंचा करते हुए सिविल जज परीक्षा में मध्यप्रदेश में तृतीय स्थान प्राप्त किया है ।पढि़ए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट …… दमोह। बटियागढ़ खड़ैरी निवासी मध्यम परिवार की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>बटियागढ़ खड़ैरी निवासी मध्यम परिवार की होनहार बेटी ज्योति जैन ने अपने परिवार के साथ-साथ गांव, जिले, संभाग और पूरे प्रदेश का एवं जैन समाज का नाम ऊंचा करते हुए सिविल जज परीक्षा में मध्यप्रदेश में तृतीय स्थान प्राप्त किया है ।<span style="color: #ff0000">पढि़ए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट ……</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>दमोह।</strong> बटियागढ़ खड़ैरी निवासी मध्यम परिवार की होनहार बेटी ज्योति जैन ने अपने परिवार के साथ-साथ गांव, जिले, संभाग और पूरे प्रदेश का एवं जैन समाज का नाम ऊंचा करते हुए सिविल जज परीक्षा में मध्यप्रदेश में तृतीय स्थान प्राप्त किया है। इंदौर दिगम्बर जैन समाज समाजिक सांसद के मंत्री डॉ जैनेन्द्र जैन ,महावीर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, सुशील पांड्या,हंसमुख गांधी ,टीके वेद,राजेश जैन दद्दू एवं परवार समाज महिला संगठन की अध्यक्ष मुक्ता जैन ,सारिका जैन, पुष्पा कासलीवाल आदि समाज जनों ने बधाई देते हुए ज्योति के उज्जवल भविष्य की कामनाएं की है ।</p>
<p>धर्म और जिनदेव में अटूट श्रद्धा रखने वाली ज्योति ने परिणाम के आने वाले दिन जिन मंदिर में शांतिधारा भी करवाई थी। उनकी इस उपलब्धि पर बहुत-बहुत बधाई ।</p>
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		<title>मनावर में मानस्तंभ जिन बिम्ब प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न: 81 जलपूरित कलशों से मानस्तंभ वेदी की हुई शुद्धि क्रिया </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/manastambh_jin_bimba_pratisthan_mahotsav_concluded_in_manawar/</link>
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		<pubDate>Tue, 16 Apr 2024 11:47:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मध्य प्रदेश के दिगम्बर जैन तीर्थ बावनगजा के समीपस्थ मनावर नगर के प्राचीन अजितनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर प्रागंण में मोहनलाल बडजात्या परिवार द्वारा नवनिर्मित 41 फीट उत्तुंग मानस्तंभ प्रतिष्ठा महोत्सव तथा जिन बिम्ब स्थापना समारोह प्रतिष्ठाचार्य विनोद पगारिया विरल सागवाडा के तत्वावधान मे सोमवार को सम्पन्न हुआ। पढि़ए पूरी रिपोर्ट&#8230; मनावर नगर। मध्य प्रदेश के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मध्य प्रदेश के दिगम्बर जैन तीर्थ बावनगजा के समीपस्थ मनावर नगर के प्राचीन अजितनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर प्रागंण में मोहनलाल बडजात्या परिवार द्वारा नवनिर्मित 41 फीट उत्तुंग मानस्तंभ प्रतिष्ठा महोत्सव तथा जिन बिम्ब स्थापना समारोह प्रतिष्ठाचार्य विनोद पगारिया विरल सागवाडा के तत्वावधान मे सोमवार को सम्पन्न हुआ। <span style="color: #ff0000">पढि़ए पूरी रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मनावर नगर।</strong> मध्य प्रदेश के दिगम्बर जैन तीर्थ बावनगजा के समीपस्थ मनावर नगर के प्राचीन अजितनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर प्रागंण में मोहनलाल बडजात्या परिवार द्वारा नवनिर्मित 41 फीट उत्तुंग मानस्तंभ प्रतिष्ठा महोत्सव तथा जिन बिम्ब स्थापना समारोह प्रतिष्ठाचार्य विनोद पगारिया विरल सागवाडा के तत्वावधान मे सोमवार को सम्पन्न हुआ। प्रतिष्ठाचार्य पगारिया ने बताया कि सकल दिगम्बर जैन समाज मनावर के संयोजन मे आयोजित दो दिवसीय प्रतिष्ठा महोत्सव के तहत रविवार को प्रात: घटयात्रा, शोभायात्रा निकाली गयी उसके बाद ध्वजारोहण किया गया साथ ही महिलाओ द्वारा 81 जल पूरित कलशों से मानस्तंभ की वेदी की शुद्धि क्रिया की गई।</p>
<p>वहीं दोपहर में जिनालय में योग मण्डल विधान मडंप पर इन्द्र-इन्द्राणी समूह द्वारा अष्ट द्रव्य श्रीफल युक्त 251 अर्घ समर्पित किए गए। महोत्सव के दूसरे दिन सोमवार को प्रात: जिनेन्द्र भगवान के अभिषेक व शान्तिधारा के बाद सर्व शान्ति महायज्ञ हुआ। साथ मानस्तंभ के उपर व नीचे निर्मित कमलासन वेदी पर चारों दिशाओं में जिनेन्द्र भगवान की आठ प्रतिमाएं प्रतिष्ठाचार्य पगारिया के मंत्रोच्चारण के साथ स्थापित की गई तथा मानस्तंभ शिखर पर कलश, ध्वजदण्ड स्थापना के साथ महोत्सव सम्पन्न हुआ।</p>
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		<title>तीर्थ यात्रा पार्ट 1 पग पग जिन दर्शन डग डग तीर्थ वंदन को साकार करता है मध्यप्रदेश          :  मंदिरों के उत्तम शिखर पर लहरा रही है जिन धर्म की पताका </title>
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		<pubDate>Sat, 30 Mar 2024 23:30:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्राचीन काल में मध्यप्रदेश जैन संस्कृति का समृद्ध इलाका रहा होगा, जहां आध्यात्मिक और धार्मिकता का प्रभाव जीवन के मूल धारा में सहज ही होता होगा। इसी कारण यहां विपुल मात्रा में मंदिर बने, काल के प्रभाव से नष्ट भी हुए लेकिन भूगर्भ में प्रतिमाएं सुरक्षित रहीं, जो समय-समय पर पूर्णआत्माओं के द्वारा नवीन मंदिर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्राचीन काल में मध्यप्रदेश जैन संस्कृति का समृद्ध इलाका रहा होगा, जहां आध्यात्मिक और धार्मिकता का प्रभाव जीवन के मूल धारा में सहज ही होता होगा। इसी कारण यहां विपुल मात्रा में मंदिर बने, काल के प्रभाव से नष्ट भी हुए लेकिन भूगर्भ में प्रतिमाएं सुरक्षित रहीं, जो समय-समय पर पूर्णआत्माओं के द्वारा नवीन मंदिर में स्थापित की गई। <span style="color: #ff0000">मध्यप्रदेश के तीर्थक्षेत्रों पर पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा संजय जैन की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>इंदौर</strong>। देश का हृदय स्थल, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व की भूमि, ऐतिहासिक धरोहरों का राज्य, सांस्कृतिक विविधता से परिपूर्ण जैन तीर्थ स्थलों का बाहुल्य प्रदेश&#8230;&#8230; यह सब कहीं है तो केवल और केवल मध्य प्रदेश में। हर बात में खास इस राज्य में तीर्थ स्थलों की संख्या अत्यधिक है इसलिए &#8220;पग पग जिन दर्शन डग डग तीर्थ वंदन&#8217; कहावत का प्रयोग भी अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं होगा। प्राचीन काल में यह शायद जैन संस्कृति का समृद्ध इलाका रहा होगा, जहां आध्यात्मिक और धार्मिकता का प्रभाव जीवन के मूल धारा में सहज ही होता होगा। इसी कारण यहां विपुल मात्रा में मंदिर बने, काल के प्रभाव से नष्ट भी हुए लेकिन भूगर्भ में प्रतिमाएं सुरक्षित रहीं, जो समय-समय पर पूर्णआत्माओं के द्वारा नवीन मंदिर में स्थापित की गई। नैसर्गिक सौंदर्य के साथ यह भूमि साधना की उपयुक्त स्थल रहा होगा, तभी तो यहां अनेकों सिद्ध एवं अतिशय क्षेत्र स्थित हैं। यहां की मिट्टी के संस्कार ही हैं जो इन प्राचीन तीर्थ के अतिरिक्त साधु-संतों व समाज ने ऐतिहासिक महत्व के रमणीय स्थलों पर भी तीर्थ विकसित किए हैं। यही नहीं, शहरों, नगरों व गांव में भी भव्य मंदिरों के उत्तम शिखर पर जिन धर्म की पताका लहरा रही है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-57912" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/images-27-300x176.jpeg" alt="" width="300" height="176" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/images-27-300x176.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/images-27.jpeg 675w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /><strong>78 तीर्थ क्षेत्रों की स्थली </strong></p>
<p dir="ltr"><span style="color: #ff0000">मध्य प्रदेश में कुल मिलाकर 78 तीर्थ क्षेत्र हैं, जिसमें 12 सिद्ध क्षेत्र, 60 अतिशय क्षेत्र हैं और 6 कला आदि अन्य क्षेत्र हैं। </span></p>
<p dir="ltr"><strong>अतिशय क्षेत्र</strong> &#8211; तीर्थंकरों की प्राचीनतम मूर्तियों में कोई विशेष बात, या चमत्कार दृष्टिगत होता है और मनवाञिछत कार्य की सिद्धि होती है वह क्षेत्र अतिशय क्षेत्र कहलाते हैं। अतिशय का एक अर्थ चमत्कार भी है।</p>
<p dir="ltr"><strong>सिद्ध क्षेत्र &#8211;</strong> जिस क्षेत्र (स्थान) से तीर्थंकर और सामान्य केवली को मोक्ष की प्राप्ति हुई है, ऐसे परम पावन क्षेत्र को सिद्धक्षेत्र कहते हैं।</p>
<p dir="ltr"><strong>12 सिद्ध क्षेत्र के नाम हैं</strong> &#8211; अहारजी, बावनगजा, द्रोणगिरि, फलहोड़ी बड़ागांव, गोपाचल पर्वत, कुंडलपुर, मुक्तगिरि, नैनागिरी, नेमावर, सिद्धवरकुट, सोनागिरी जी और ऊन।</p>
<p dir="ltr"><strong><img decoding="async" class="alignnone wp-image-57921 size-large" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0063-1024x1005.jpg" alt="" width="1024" height="1005" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0063-1024x1005.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0063-300x294.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0063-768x754.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0063-1536x1507.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0063-65x65.jpg 65w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0063-990x971.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0063-1320x1295.jpg 1320w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0063.jpg 1600w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" />60 अतिशयश्रेत्र के नाम &#8211; </strong> आहूजी, अजयगढ़, अमरकंटक, बाड़ी, बही पार्श्वनाथ, बहोरीबंद, बजरंगगढ़, बंधाजी, बनेडियाजी, बरासोंजी, बरेला, बरही(वल्लभपुर), भोजपुर, भौंरासा, बिजौरी, बिनाजी(बारहा), चंदेरी, छोटा महावीरजी, ईसुरवारा, गोलाकोटा, गोमटगिरी(इंदौर), गुडर, ग्यारसपुर, जामनेर, जयसिंहपुरा(उज्जैन), कैथूली, खजुराहो, खंदारगिरि, कुण्डरगिरी(कोनीजी), लखनादौन, महावीर तपोभूमि(उज्जैन), मक्सी पार्श्वनाथ, मंगलगिरी(सागर), मनहरदेव, मानतुंगगिरी(धार), नेमिगिरी(बण्डा), निसईजी सूखा(पथरिया), नोहटा(आदिश्वरगिरी), पचराई, पजनारी, पनागर, पपोराजी, पार्श्वगिरी(बड़वानी), पटेरिया(गढ़ाकोटा), पटनागंज(रहली), पावई(पावागढ़), पिडरूवा, पिसनहारी(मढियाजी), पुष्पगिरी, पुष्पवती बिलहरी, सेमरखेड़ी(निसाईंजी), सेसई, श्रेयांसगिरी, सिहोंनियाजी, सिरोंज, तालनपुर, तेजगढ़, थुबोनजी, तिगोड़ाजी, उरवाहा।</p>
<p dir="ltr"><strong><img decoding="async" class="alignnone wp-image-57919 size-full" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0065.jpg" alt="" width="871" height="1600" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0065.jpg 871w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0065-163x300.jpg 163w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0065-557x1024.jpg 557w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0065-768x1411.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0065-836x1536.jpg 836w" sizes="(max-width: 871px) 100vw, 871px" />6 कला व दर्शनीय स्थल हैं &#8211;</strong>  बड़ोह, गंधर्वपुरी, ग्वालियर(स्वर्ण मंदिर), खनियांघाना, निन्सईंजी(मल्हारगढ़), पानीगांव।</p>
<p dir="ltr"><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-57918" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0064-1024x664.jpg" alt="" width="1024" height="664" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0064-1024x664.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0064-300x195.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0064-768x498.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0064-1536x996.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0064-990x642.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0064-1320x856.jpg 1320w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240330-WA0064.jpg 1600w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" />52 गजा है अद्भुत तो नैनागिरी में प्राचीन जिनालय</strong></p>
<p dir="ltr">कुंडलपुर में 15 फीट ऊंची पद्मासन आदिनाथ भगवान की मूर्ति है। बावनगजा की सबसे बड़ी पाषाण मूर्ति आदिनाथ भगवान की है, जो 27 मी (84 फीट) प्रतिमा है। 52 हाथ ऊंची होने के कारण ही इसे 52 गजा क्षेत्र कहते हैं। यह मूर्ति 13वीं शताब्दी से पहले की बनी है। यहां प्रत्येक 12 वर्ष में महामस्तकाभिषेक व मेला आयोजित होता है। सिद्धवरकुट अपने आप में एक अलग ही अलौकिक व दर्शनीय सिद्ध क्षेत्र है, जो 2000 वर्ष प्राचीन है।</p>
<p dir="ltr"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-57923" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG_20240330_215224.jpg" alt="" width="334" height="232" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG_20240330_215224.jpg 334w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG_20240330_215224-300x208.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 334px) 100vw, 334px" /><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-57924" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/images-28.jpeg" alt="" width="641" height="478" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/images-28.jpeg 641w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/images-28-300x225.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/images-28-74x55.jpeg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/images-28-111x83.jpeg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/images-28-215x161.jpeg 215w" sizes="auto, (max-width: 641px) 100vw, 641px" /></p>
<p dir="ltr">पावागिरी (ऊन) न्यून से ऊन बना है यह क्षेत्र। 12 फीट की शांतिनाथ भगवान की खड्गासन व कुंथुनाथ और अरहनाथ जी की 8-8 फुट की मूर्तियां हैं यहां पर।</p>
<p dir="ltr"><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-57925" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG_20240330_215211.jpg" alt="" width="464" height="395" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG_20240330_215211.jpg 464w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG_20240330_215211-300x255.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 464px) 100vw, 464px" />नैनागिरी सबसे प्राचीन जिनालय संवत 1109 ई सन 1042 का है। मुक्तागिरी सिद्ध क्षेत्र भी 2500 वर्षों से अधिक प्राचीन तीर्थ है। बड़ा गांव में आदिनाथ भगवान की 16 फीट ऊंची पद्मासन प्रतिमा है। गोपाचल पर्वत पर सबसे विशाल आदिनाथ भगवान की 57 फीट ऊंची खड्गासन प्रतिमा है। भगवान पारसनाथ की 42 फीट ऊंची व 30 फीट चौड़ी पद्मासन विश्व की सबसे बड़ी पद्मासन प्रतिमा है। बहेरी बंद में 1666 वर्ष पुरानी भगवान शांतिनाथ की 16 फीट ऊंची व 4 फीट चौड़ी खड्गासन प्रतिमा है। चंदेरी जी में 9वी से 12वीं शताब्दी के बीच की प्राचीन प्रतिमाएं हैं। पपौरा जी में 12वीं से 20वीं शताब्दी की प्रतिमाएं हैं। मक्सी पारसनाथ जी में 2500 साल पुरानी पारसनाथ भगवान की काले पाषाण से बनी साढ़े 3 फीट की प्रतिमा है। थुबोनजी में 28 फीट की आदिनाथ भगवान की प्रतिमा है और यह मंदिर 12वीं शताब्दी का मंदिर है। तालनपुर में मल्लिनाथ भगवान की प्रतिमा है। पटनागंज में 1200 वर्ष प्राचीन मूलनायक प्रतिमा मुनि सुव्रतनाथ भगवान की है, जो कि पद्मासन और गहरे लाल पाषाण की बनी हुई है और यहीं पर महावीर भगवान की 13 फीट की ऊंची पद्मासन प्रतिमा है। पनागर तीर्थ में 9 फीट उतंग भगवान शांतिनाथ जी की प्रतिमा है। बीनाजी में शांतिनाथ भगवान की 18 फीट ऊंची खड्गासन प्रतिमा है और यह तीर्थस्थली 500 साल प्राचीन है। यहीं पर 16 फीट ऊंची भगवान महावीर की प्रतिमा है जो कि चूने और गारे से बनी हुई है।</p>
<p dir="ltr"><strong>रद्दी अभियान चला लगाए वाटर कूलर</strong></p>
<p dir="ltr">तीर्थ क्षेत्र कमेटी के डी के जैन बताते हैं कि भोजपुर में मानतुंग आचार्य की जो हजारों साल पुरानी छतरी है, जहां उनके चरण थे, कमेटी के सौजन्य से वहां का नवीनीकरण करा कर नई छतरी प्रदान की है। बनेडिया जी में संत सदन बनवाया। बावनगजा में एक सभाकक्ष और चारों तरफ सिक्योरिटी सिस्टम लगवाया गया है। मध्य प्रदेश के जितने भी तीर्थ हैं, उन सब में वाटर कूलर कमेटी की ओर से भेजे गए हैं। इसके लिए रद्दी अभियान चलाकर जैन परिवारों से रद्दी ली गई और उसे बेचकर सभी जगह पर वाटर कूलर लगवाए। सीसीटीवी कैमरे लगवाए हैं। थौवनजी, बड़ागांव, बजरंगगढ़ में गेस्ट हाउस बनवाने और अन्य कार्य के लिए लाखों रुपए का दान दिया गया है।</p>
<p dir="ltr"><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-57927" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG_20240330_220232.jpg" alt="" width="480" height="502" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG_20240330_220232.jpg 480w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG_20240330_220232-287x300.jpg 287w" sizes="auto, (max-width: 480px) 100vw, 480px" />स्तोत्र &#8211; भारत के दिगम्बर  जैन तीर्थ ,दिगंबर जैन तीर्थ निर्दिशिका  </strong></p>
<p dir="ltr">
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		<title>अध्यक्ष पद पर भी होगा चुनाव :  श्री पारसनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर कमेटी के चुनाव 31 मार्च को </title>
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		<pubDate>Wed, 27 Mar 2024 11:15:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर मुरैना की प्रबंध कार्यकारिणी के गठन के लिए इन दिनों चुनाव प्रक्रिया चल रही है, जिसके तहत 31मार्च को मतदान होना है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230; मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर मुरैना की प्रबंध कार्यकारिणी के गठन के लिए इन दिनों चुनाव प्रक्रिया चल रही [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर मुरैना की प्रबंध कार्यकारिणी के गठन के लिए इन दिनों चुनाव प्रक्रिया चल रही है, जिसके तहत 31मार्च को मतदान होना है।<span style="color: #ff0000"> पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर मुरैना की प्रबंध कार्यकारिणी के गठन के लिए इन दिनों चुनाव प्रक्रिया चल रही है, जिसके तहत 31मार्च को मतदान होना है। निर्वाचन प्रक्रिया के निर्वाचन अधिकारी सुनील जैन बीमा वालों ने बताया कि उपरोक्त निर्वाचन में अध्यक्ष पद के फार्म वापसी दिनांक के पश्चात दो उम्मीदवार अनिल जैन व्याख्याता एवं पदम चंद्र जैन चैटा वाले शेष बचे हुए थे जिसमें से फार्म वापसी दिनांक 17 मार्च की तारीख निकालने के पश्चात 20 मार्च को पदमचंद जैन द्वारा अपना समर्थन अनिल जैन के पक्ष में दिया गया था और इसी आधार पर अनिल जैन व्याख्याता के समर्थकों द्वारा इस आशय की आपत्ति चुनाव अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत की थी कि अध्यक्ष पद पर चुनाव न कराया जाए और अनिल जैन व्याख्याता को निर्विरोध अध्यक्ष घोषित किया जाए जबकि पदमचंद जैन द्वारा जो नाम वापसी का आवेदन दिया गया था, वह आवेदन नाम वापसी की तारीख निकालने के बाद दिया गया था। ऐसी स्थिति में अनिल जैन व्याख्याता को नियम अनुसार निर्विरोध अध्यक्ष घोषित नहीं किया जा सकता है।</p>
<p>जिस पर 26 मार्च को निर्वाचन अधिकारी द्वारा उपरोक्त सभी आपत्तियों को निरस्त करते हुए अध्यक्ष पद पर चुनाव किया जाना सुनिश्चित कर दिया है। इसका पदमचंद जैन चैटा वालों के समर्थकों ने स्वागत किया है। अब यह चुनाव पदमचंद जैन एवं अनिल जैन व्याख्याता के बीच होगा। इसके साथ ही निर्विरोध होने के बाद शेष बचे अन्य पदों का चुनाव भी इसी दिन कराया जाएगा। ज्ञात रहे कि समाज के संविधान के अनुसार यह चुनाव प्रक्रिया संपन्न होनी है, जिसमें यह स्पष्ट हो चुका है कि मतदान प्रक्रिया संपन्न होने के पश्चात ही विजय उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित किया जा सकेगा। अब ऐसी स्थिति में निर्वाचन प्रक्रिया संपन्न होने के बाद ही विजय उम्मीदवार की घोषणा की जावेगी। मतदान अधिकारी ने सभी मतदाताओं से नियम अनुसार चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराने में सहयोग करने की अपील की है।</p>
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		<title>भुतबली सागर जी का समाधिमरण :  डोल यात्रा 4.30 बजे </title>
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		<pubDate>Wed, 27 Mar 2024 11:10:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इंदौर।आचार्य भगवन विद्यासागर जी के परम शिष्य पूज्य मुनि श्री भुतबली सागर जी महाराज जी की समाधि आष्टा, मध्यप्रदेश में अभी-अभी हो गई है। भुतबली सागर जी ने नेमीनगर जैन कालोनी में चातुर्मास भी किया था। इंदौर दिगम्बर जैन समाज सामाजिक संसद के मंत्री डॉ. जैनेन्द्र जैन ने कहा कि गुरु देव की समाधि होना [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>इंदौर।</strong>आचार्य भगवन विद्यासागर जी के परम शिष्य पूज्य मुनि श्री भुतबली सागर जी महाराज जी की समाधि आष्टा, मध्यप्रदेश में अभी-अभी हो गई है। भुतबली सागर जी ने नेमीनगर जैन कालोनी में चातुर्मास भी किया था। इंदौर दिगम्बर जैन समाज सामाजिक संसद के मंत्री डॉ. जैनेन्द्र जैन ने कहा कि गुरु देव की समाधि होना जैन समाज के लिए बहुत बड़ी क्षति है।</p>
<p>इन्दर सेठी, कैलाश लुहाड़िया, प्रदीप बडजात्या, राजेश जैन दद्दू ने भी गुरु देव की समाधि पर शोक व्यक्त किया है। डोला आज दोपहर बाद 4:30 बजे किला मंदिर के पास से निकलेगा।</p>
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