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	<title>Knowledge &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>तप और सरल चर्या से संयम सीखा गए आचार्य श्री अजित सागर जी : एक मई को समाधि दिवस पर पुण्य स्मरण का पावन अवसर </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Apr 2026 08:34:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ जैन धर्म में समाज को त्याग, सादा जीवन, सहृदयता के साथ धर्म पालन की शिक्षा देने वाले साधु वंदनीय हैं। आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज के जीवन वृत्त से संस्कारों की अकूत संपदा के दर्शन होते हैं, जो सहजता, सरलता और धैर्य की शिक्षा देते हैं। ऐसे ही महामुनिराज आचार्य श्री अजित सागर जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> जैन धर्म में समाज को त्याग, सादा जीवन, सहृदयता के साथ धर्म पालन की शिक्षा देने वाले साधु वंदनीय हैं। आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज के जीवन वृत्त से संस्कारों की अकूत संपदा के दर्शन होते हैं, जो सहजता, सरलता और धैर्य की शिक्षा देते हैं। <span style="color: #ff0000">ऐसे ही महामुनिराज आचार्य श्री अजित सागर जी के एक मई को समाधि दिवस पर यह विशेष आलेख श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए&#8230;संकलन उप संपादक प्रीतम लखवाल का। </span></strong></p>
<hr />
<p>आचार्य श्री 108 अजित सागर जी महाराज जैन धर्म के उन महान संतों में से हैं, जिन्होंने अपनी तपस्या और सरल चर्या से समाज को नई राह दिखाई। उनके समाधि दिवस पर हम उनके जीवन दर्शन और संयम के मार्ग का स्मरण करते हैं। आचार्य श्री अजित सागर जी का जन्म 1926 में मप्र के आष्टा नगर के समीप भौरा ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम जवरचंद्र और माता का नाम रूपाबाई था। बचपन से ही धार्मिक संस्कारों में पले-बढ़े आचार्य श्री ने 1961 में राजस्थान के सीकर में आचार्य श्री108 शिवसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण की।</p>
<p><strong>आचार्य पद और योगदान</strong></p>
<p>वे त्याग और वैराग्य की प्रतिमूर्ति थे। उन्हें 1987 में उदयपुर में चतुर्विध संघ द्वारा &#8216;आचार्य पद&#8217; से विभूषित किया गया। उनके मार्गदर्शन में अनेकों शिष्यों ने संयम का मार्ग अपनाया। उन्होंने जैन दर्शन के प्रचार-प्रसार और मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए सतत कार्य किया, जिससे समाज में आध्यात्मिक जागृति आई।</p>
<p><strong>समाधि और सल्लेखना की साधना</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों को बहुत ही गरिमामय और तपस्वी रूप में व्यतीत किया। उन्होंने 1990 में राजस्थान के सबला ग्राम (डूंगरपुर) में उत्तम सल्लेखना धारण की और शांत भाव से अपनी नश्वर देह का त्याग किया। उनकी समाधि को आज भी एक महान आध्यात्मिक उपलब्धि के रूप में याद किया जाता है, जो यह सिखाती है कि मृत्यु को भी उत्सव कैसे बनाया जा सकता है।</p>
<p><strong>शिक्षाएं और आदर्श</strong></p>
<p>आचार्य श्री का जीवन &#8220;ज्ञान, ध्यान और तप&#8221; का त्रिवेणी संगम था। वे कहते थे कि सच्चा शिष्य वही है जो गुरु की आज्ञा का पालन करे और परिग्रह से मुक्त होकर आत्म-कल्याण के मार्ग पर चले। उनके समाधि दिवस पर विशेष अनुष्ठान और पूजन का आयोजन किया जाता है, जिसमें श्रद्धालु उन्हें अपनी भावांजलि अर्पित करते हैं। उनका जीवन हमें संयम, क्षमा और परोपकार की राह पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा। आचार्य श्री 108 अजितसागर जी महाराज का जीवन साहित्य सृजन और भव्य धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से धर्म की प्रभावना में समर्पित रहा। उनके द्वारा रचित ग्रंथ और संपन्न कराए गए अनुष्ठान जैन दर्शन की गहराई को दर्शाते हैं।</p>
<p><strong>प्रमुख ग्रंथ एवं साहित्य सृजन</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने अपनी लेखनी के माध्यम से दर्शन और अध्यात्म को जन-जन तक पहुँचाया।</p>
<p>भीतर कहीं: यह उनकी एक महत्वपूर्ण कृति है, जो इनसाइक्लोपीडिया ऑफ जैनिज्म के अनुसार भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुई है।</p>
<p>विद्यावाणी और वीरदेशना: इनके माध्यम से उन्होंने भगवान महावीर के सिद्धांतों और अपने गुरुओं की शिक्षाओं को संकलित किया।</p>
<p>मानस मोती (भाग 1-2): यह कृति साधकों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का कार्य करती है।</p>
<p>अन्य रचनाएँ: उन्होंने &#8216;साधनापक्ष का पाक्षेय&#8217;, &#8216;अहिंसासूत्र&#8217;, &#8216;महाश्रमण&#8217;, और &#8216;विद्याशांति&#8217; जैसी अनेक कृतियों की रचना की, जो दिगंबर जैन आगम के सार को सरल भाषा में प्रस्तुत करती हैं।</p>
<p><strong>विशेष अनुष्ठान एवं धर्म प्रभावना</strong></p>
<p>आचार्य श्री के सानिध्य में जैन धर्म की प्रभावना हेतु कई ऐतिहासिक अनुष्ठान संपन्न हुए, जिन्होंने समाज में नई चेतना जाग्रत की:</p>
<p>पंचकल्याणक प्रतिष्ठा: उनके मार्गदर्शन में 12 से अधिक पंचकल्याणक और गज रथ महोत्सव संपन्न हुए, जो तीर्थंकरों के जीवन की घटनाओं को जीवंत करते हैं</p>
<p>विधान आयोजन: समाज में शांति और भक्ति के संचार के लिए उन्होंने 6 नगरों में कल्पद्रुम मंडल विधान, 7 सिद्धचक्र विधान और नंदीश्वर विधान जैसे अनुष्ठान कराए।</p>
<p>जीर्णोद्धार और शिक्षा: उन्होंने लगभग 25 नगरों के मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और 30-35 नगरों में जैन पाठशालाओं का संचालन शुरू कराया ताकि आने वाली पीढ़ी संस्कारों से जुड़ सके।</p>
<p>वेदी प्रतिष्ठा: उन्होंने 26 नगरों में वेदी प्रतिष्ठाएँ संपन्न कराकर जिनेंद्र देव की आराधना हेतु पवित्र स्थानों का सृजन किया।</p>
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		<title>ग्रिजली पब्लिक विद्यालय के छात्रों ने जाना अपना धर्म : जैन मंदिर के दर्शन कर शांतिधारा की प्रक्रिया समझी </title>
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		<pubDate>Wed, 19 Nov 2025 14:56:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ग्रिजली पब्लिक विद्यालय के 100 छात्र-छात्राएं अपने शिक्षकों के साथ झुमरी तिलैया कोडरमा के डॉक्टर गली स्थित जैन मंदिर में दर्शनार्थ आए। जहां सभी छात्र-छात्राओं को जैन मंदिर में स्थित सभी भगवान का दर्शन कराया गया। झुमरीतिलैया से पढ़िए, यह खबर&#8230; झुमरीतिलैया। ग्रिजली पब्लिक विद्यालय के 100 छात्र-छात्राएं अपने शिक्षकों के साथ झुमरी तिलैया कोडरमा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>ग्रिजली पब्लिक विद्यालय के 100 छात्र-छात्राएं अपने शिक्षकों के साथ झुमरी तिलैया कोडरमा के डॉक्टर गली स्थित जैन मंदिर में दर्शनार्थ आए। जहां सभी छात्र-छात्राओं को जैन मंदिर में स्थित सभी भगवान का दर्शन कराया गया। <span style="color: #ff0000">झुमरीतिलैया से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>झुमरीतिलैया।</strong> ग्रिजली पब्लिक विद्यालय के 100 छात्र-छात्राएं अपने शिक्षकों के साथ झुमरी तिलैया कोडरमा के डॉक्टर गली स्थित जैन मंदिर में दर्शनार्थ आए। जहां सभी छात्र-छात्राओं को जैन मंदिर में स्थित सभी भगवान का दर्शन कराया गया। छात्रों ने भगवान का अभिषेक और विश्व में सभी जीवों की शांति के लिए शांतिधारा कर बच्चों को दिखाया। समाज के विद्वान पं. अभिषेक जैन शास्त्री द्वारा सभी छात्रों को जैन धर्म के बारे में बताया गया। जैन धर्म भारत का सबसे प्राचीन धर्म है।इस धर्म मे 24 भगवान होते हैं। इसमें प्रथम आदिनाथ भगवान और अंतिम महावीर भगवान होते हैं। जैन धर्म आत्मवादी धर्म है। जैन धर्म में ईश्वर के कृतित्व की कोई मान्यता नहीं है। हर आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति है और उस शक्ति की अभिव्यक्ति से ही परमात्मा बना जा सकता है।</p>
<p>जैन धर्म के अनुसार यह संसारी प्राणी का भटकना राग-द्वेष और मोह से है और इस बंधन को सम्यक दर्शन -ज्ञान &#8211; चारित्र से काटा जा सकता है। सच्ची श्रद्धा-सच्चा ज्ञान और सच्चा आचरण से कर्म वंध कटते हैं। जैन धर्म में किसी भी तरह के कर्म कांड और अंध विश्वास को कोई स्थान नहीं है। जैन धर्म कर्म श्रद्धान पर विश्वास करने वाला धर्म है। यह धर्म हमें अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ये पंच सिद्धांत को अपना कर अपने जीवन को सच्चा बना सकते हैं। जैन धर्म खाने-पीने पर विशेष ध्यान रखता है। सात्विक जीवन- शाकाहार ही शुद्ध आहार,अहिंसा युक्त जीवन जीने के बारे में बताया। रात्रि भोजन, पानी छान कर पीना प्रत्येक दिन देवदर्शन जैनों की पहचान है। जैन धर्म दया मूलक है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-94792" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251119-WA0016.jpg" alt="" width="1280" height="425" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251119-WA0016.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251119-WA0016-300x100.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251119-WA0016-1024x340.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251119-WA0016-768x255.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251119-WA0016-990x329.jpg 990w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" />जैन धर्म के बारे में बताये गये व्याख्यान में छात्रों से कुछ प्रश्न पूछे गये जिन छात्रों ने उसका उत्तर दिया उन छात्रों को पुरस्कृत किया गया।जैन समाज के सुप्रसिद्ध गायक सुबोध-आशा गंगवाल के छात्रों को प्रार्थना कराई। समाज के उपमंत्री नरेद्र झांझरी, कोषाध्यक्ष सुरेद्र काला, सरोज पापड़ीवाल, ललित सेठी, रिंकू गंगवाल, रीता सेठी, दिव्या छाबड़ा आदि ने सभी शिक्षकों का स्वागत अभिनंदन किया। सुरेन्द्र काला ने ग्रिजली विद्यालय प्रबंधन समिति का भी स्वागत किया। ग्रिजली पब्लिक स्कूल से मायावती मैम, श्रुति मैम, गुरुजीत शलुजा आदि शिक्षक उपस्थित थे।</p>
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		<title>दीपावली: अहिंसा और प्रकाश का पर्व, पटाखों से नहीं दीपों से सजाएँ : स्वस्थ, सादगीपूर्ण और मंगलकारी दीपावली के लिए पटाखों को कहें “न” </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Oct 2025 11:28:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारत में दीपावली का पर्व प्रकाश, सादगी और अहिंसा का प्रतीक है। पटाखों की बजाय दीपक जलाकर हम स्वास्थ्य, पर्यावरण और संस्कृति की रक्षा कर सकते हैं। व्याकरणाचार्य आकाश जैन ने अपने लेख में बताया कि दीपावली का असली अर्थ है ज्ञान और शांति का प्रकाश फैलाना, न कि विस्फोट और प्रदूषण। पढ़िए व्याकरणाचार्य आकाश [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>भारत में दीपावली का पर्व प्रकाश, सादगी और अहिंसा का प्रतीक है। पटाखों की बजाय दीपक जलाकर हम स्वास्थ्य, पर्यावरण और संस्कृति की रक्षा कर सकते हैं। व्याकरणाचार्य आकाश जैन ने अपने लेख में बताया कि दीपावली का असली अर्थ है ज्ञान और शांति का प्रकाश फैलाना, न कि विस्फोट और प्रदूषण। <span style="color: #ff0000">पढ़िए व्याकरणाचार्य आकाश जैन, चिरगांव, जिला झांसी (उत्तर प्रदेश) की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>भारत की सांस्कृतिक परंपरा में दीपावली का स्थान अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण है। यह पर्व हर भारतीय हृदय में उत्साह, श्रद्धा और उमंग का संचार करता है। दीपावली का संबंध भगवान श्रीरामचंद्र और भगवान महावीर स्वामी से जुड़ा है। श्रीराम के अयोध्या लौटने का उल्लास और महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस की श्रद्धा, दोनों ही मानवता और आत्म-विजय का प्रतीक हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>पटाखों का चलन भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं, बल्कि विदेशी आक्रांताओं से आया दासत्व का प्रतीक है। इसके अलावा, बारूद स्वास्थ्य, पर्यावरण और पशु-पक्षियों के लिए हानिकारक है। ध्वनि और धुएँ से नवजात शिशु, गर्भवती महिलाओं और वयस्कों तक प्रभावित होते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>व्याकरणाचार्य आकाश जैन का कहना है कि दीपावली का वास्तविक अर्थ अहिंसा, करुणा और प्रकाश का उत्सव है। दीपक का शांत प्रकाश अधिक स्थायी और मंगलकारी है, जबकि पटाखे अस्थायी चमक और प्रदूषण फैलाते हैं। हमें बच्चों को भी यह सिखाना चाहिए कि दीपावली का आनंद प्रकाश और सादगी में है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इस दीपावली, आइए हम सब मिलकर पटाखों को “न” कहें और दीपक जलाकर अपने घर, समाज और पर्यावरण को सुरक्षित एवं मंगलमय बनाएँ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1fa94.png" alt="🪔" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/2728.png" alt="✨" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> अहिंसा की दीपावली मनाएँ — बारूद नहीं, प्रकाश जलाएँ! <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/2728.png" alt="✨" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1fa94.png" alt="🪔" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /></p>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में प्रथमाचार्य श्री वीर सागर जी का 68वां अंतर विलय समाधि वर्ष विशेष पूजन : हेय और उपादेय के विवेक से जीवन निर्माण की शिक्षा आचार्य श्री ने दी </title>
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		<pubDate>Sun, 21 Sep 2025 04:42:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[टोंक नगर की धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रथमाचार्य श्री वीर सागर जी के 68वें समाधि वर्ष पर विशेष पूजन एवं गुणानुवाद के अवसर पर प्रवचन दिया। आचार्य ने हेय और उपादेय के विवेक से जीवन निर्माण और सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र के पालन की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि भौतिक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>टोंक नगर की धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रथमाचार्य श्री वीर सागर जी के 68वें समाधि वर्ष पर विशेष पूजन एवं गुणानुवाद के अवसर पर प्रवचन दिया। आचार्य ने हेय और उपादेय के विवेक से जीवन निर्माण और सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र के पालन की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि भौतिक सुख अस्थायी हैं, इसलिए जीवन में विवेकपूर्ण निर्णय आवश्यक हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>टोंक नगर स्थित अतिशयक्षेत्र में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सानिध्य में प्रथमाचार्य श्री वीर सागर जी का 68वां अंतर विलय समाधि वर्ष विशेष पूजन और गुणानुवाद सहित मनाया गया। आचार्य श्री ने उपदेश में बताया कि हम सभी का परम सौभाग्य है कि हमें श्रीमद् जैन धर्म प्राप्त हुआ, जिसमें देव, शास्त्र और गुरु आते हैं। देव अर्थात भगवान के बाद गुरु का स्थान है और भगवान की वाणी शास्त्रों के रूप में हमारे सामने है।</p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र का पालन ही जीवन में शाश्वत सुख-शांति प्रदान करता है। भौतिक इंद्रिय सुख स्थायी नहीं हैं और पुरुषार्थ के बाद भी दुख प्राप्त होता है। उन्होंने हेय और उपादेय के विवेक की महत्ता बताते हुए कहा कि हेय को छोड़ना और उपादेय को ग्रहण करना जीवन का आधार है।</p>
<p>प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी ने बचपन से ही धर्म, नीति, दया, करुणा, दान, स्वाध्याय और ध्यान का पालन किया। खेतों में पशु-पक्षियों के प्रति करुणा दिखाते हुए उन्होंने दूसरों की चोरी भी रोकने के बजाय जीवन में दया का उदाहरण दिया। आचार्य पद ग्रहण करने के बाद भी उनके उपदेश से अन्य धर्म के लोग मांसाहार और शराब का त्याग कर लाभान्वित हुए।</p>
<p>आचार्य श्री ने यह भी बताया कि ध्यान मंदिर में मुनि साधु बिना पंखा, कूलर या एसी के तप साधना करते हैं, जो भौतिक सुविधा के बिना तप और साधना का प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने कहा कि ध्यान आत्मा का अंग है और जीवन की सार्थकता दीक्षा लेने में है। धर्मसभा में आर्यिका श्री देशना मति जी का भी प्रवचन हुआ। विभिन्न नगरों से भक्त आचार्य श्री के दर्शन और पूजन हेतु पधार रहे हैं, जिन्होंने आचार्य के उपदेशों का लाभ प्राप्त किया। यह अवसर जीवन में धार्मिक ज्ञान, नैतिकता और ध्यान की महत्ता को समझने का प्रेरक संदेश प्रदान करता है।</p>
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		<title>शिक्षा ही जीवन का सच्चा धन – नवागढ़ गुरुकुल में गूँजे प्रेरक विचार : डॉ. सत्येंद्र जैन और डॉ. सारिका जैन ने बच्चों को दिया शिक्षा का अमूल्य संदेश </title>
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		<pubDate>Wed, 10 Sep 2025 14:02:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नवागढ़ गुरुकुलम में पधारे डॉ. सत्येंद्र कुमार जैन और डॉ. ब्रह्मचारिणी सारिका जैन ने बच्चों को शिक्षा, अनुशासन और लक्ष्य निर्धारण पर प्रेरक विचार दिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा ही जीवन का सच्चा धन है और संस्कारों के साथ इसे अपनाना ही वास्तविक प्रगति है। पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट… प्रागैतिहासिक अतिशय क्षेत्र नवागढ़ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नवागढ़ गुरुकुलम में पधारे डॉ. सत्येंद्र कुमार जैन और डॉ. ब्रह्मचारिणी सारिका जैन ने बच्चों को शिक्षा, अनुशासन और लक्ष्य निर्धारण पर प्रेरक विचार दिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा ही जीवन का सच्चा धन है और संस्कारों के साथ इसे अपनाना ही वास्तविक प्रगति है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>प्रागैतिहासिक अतिशय क्षेत्र नवागढ़ की पावन भूमि पर एक प्रेरणादायी अवसर देखने को मिला, जब दमोह से पधारे भूगर्भ वैज्ञानिक एवं वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ. सत्येंद्र कुमार जैन तथा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त डॉ. ब्रह्मचारिणी सारिका जैन ने गुरुकुलम के बच्चों से भेंट की और उन्हें शिक्षा के महत्व पर विशेष मार्गदर्शन प्रदान किया।</p>
<p>डॉ. सत्येंद्र जैन ने अपने उद्बोधन में कहा कि “शिक्षा जीवन का असली धन है, जिसे कोई छीन नहीं सकता।” उन्होंने छात्रों को अनुशासन, नियमित अध्ययन और समय सारिणी का पालन करने का संदेश दिया। उन्होंने यह भी बताया कि कठिन परिश्रम और धैर्य ही सफलता की कुंजी है। उनकी प्रेरक बातें सुनकर बच्चों के चेहरे पर उत्साह और जोश झलक उठा।</p>
<p><strong>पढ़ाई बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखती</strong></p>
<p>डॉ. सारिका जैन ने छात्रों को आत्मविश्वास, एकाग्रता और समय प्रबंधन के महत्व पर विशेष रूप से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि सही दिशा में की गई पढ़ाई बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखती है। साथ ही स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने बच्चों को प्रेरित करते हुए कहा कि शिक्षा को केवल परीक्षा पास करने का साधन न समझें, बल्कि इसे जीवन संवारने का अवसर मानें।</p>
<p>इस अवसर पर बाल ब्रह्मचारी जय निशांत जी भैया जी ने भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल रोजगार पाने का साधन नहीं है, बल्कि जीवन को संस्कारित और मूल्यवान बनाने की प्रक्रिया है। शिक्षा से विवेक, धैर्य और सहनशीलता का विकास होता है और संस्कारों के साथ यही सच्ची प्रगति का मार्ग है।</p>
<p>गुरुकुलम में उपस्थित बच्चों ने अतिथियों के मार्गदर्शन को आत्मसात करते हुए गहरी प्रेरणा ली। बच्चों के लिए यह अवसर एक अविस्मरणीय अनुभव रहा।</p>
<p>अंत में शिक्षक अनुराग जैन ने सभी का आभार व्यक्त किया और कहा कि ऐसे अवसर बच्चों के जीवन में नई दिशा और ऊर्जा का संचार करते हैं। कार्यक्रम का समापन गुरु वंदना और बच्चों की उल्लासपूर्ण तालियों के बीच हुआ, जिससे पूरा वातावरण शिक्षा और संस्कारों की सुगंध से भर उठा।</p>
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		<title>त्याग धर्म में राजा श्रेयांस ने सबसे पहले दानतीर्थ का प्रवर्तन किया : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने त्याग और दान को श्रेष्ठतम निरुपित किया  </title>
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		<pubDate>Thu, 04 Sep 2025 10:11:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दसलक्षण धर्म में पहले दिन से चार कषायों का त्याग करने की शिक्षाऔर उपदेश दिए गए। शास्त्रों और पूजन में उल्लेख है कि दान चार प्रकार का है और चार संघ को दीजिए। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म के दिन धर्म सभा में प्रकट की। टोंक से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दसलक्षण धर्म में पहले दिन से चार कषायों का त्याग करने की शिक्षाऔर उपदेश दिए गए। शास्त्रों और पूजन में उल्लेख है कि दान चार प्रकार का है और चार संघ को दीजिए। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म के दिन धर्म सभा में प्रकट की। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> दसलक्षण धर्म में पहले दिन से चार कषायों का त्याग करने की शिक्षाऔर उपदेश दिए गए। शास्त्रों और पूजन में उल्लेख है कि दान चार प्रकार का है और चार संघ को दीजिए। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म के दिन धर्म सभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि त्याग धर्म चार प्रकार के दान आहार, ज्ञान, अभय और शास्त्रदान से होता हैं। साधु को आहारदान देने में चारों दान समाहित हैं। दान हमेशा उत्तम पात्र को संयम उपकरण पीछी कमंडल शास्त्र और आहारदान, औषधिदान देना चाहिए। आचार्यश्री ने कहा कि श्रावक को हमेशा साधु के लिए शुद्ध भोजन बनाकर साधु के लिए द्वार प्रेक्षण करना चाहिए। इस निमित आप भी शुद्ध भोजन करते हैं। यदि साधु का आहार नहीं होता हैं तो भी द्वार प्रेक्षण करने से पुण्य की प्राप्ति होती हैं।</p>
<p><strong>छोटे-छोटे त्याग करने से परमात्मा बन सकते हैं</strong></p>
<p>जिस प्रकार छोटे बीज एक दिन बड़ा वृक्ष बन जाता है ,उसी प्रकार छोटे-छोटे त्याग करने से भी एक दिन आप भी आत्मा से परमात्मा बन सकते हैं। त्याग चेतन और अचेतन द्रव्य का किया जाता है। जिन्होंने चेतन द्रव्य का त्याग किया वह आज साधु बनकर ऊपर मंच पर बैठे हैं। आचार्य श्री ने कहा कि प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान ने 6 माह तप ध्यान किया। उसके बाद अगले 6 माह तक उन्हें आहार नहीं मिला तब राजा श्रेयांश को पूर्व जन्म में आहार देने का जाती स्मरण से भगवान आदिनाथ को सर्वप्रथम आहार दान देकर दान तीर्थ का प्रवर्तन किया। इस 20वीं सदी में भी प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज को क्षुल्लक अवस्था में भी चार दिनों तक उचित विधि से पड़गाहन नहीं करने के कारण आहार नहीं हुआ था।</p>
<p><strong>त्याग से राग द्वेष परिग्रह कम होता है</strong></p>
<p>द्रव्य के त्याग से आप इंद्र ध्वज मंडल विधान की पूजन कर पुण्य और आनंद की अनुभूति कर रहे हो। आचार्य श्री ने आर्यिका श्री ज्ञानमति जी के शीघ्र स्वस्थ होने की मंगल भावना की। आचार्य श्री ने बताया कि राजा श्री वेग ने दो चारण रिद्धिधारी मुनि अर्ककीर्ति और अमितकीर्ति को आहारदान देने के बाद भगवान शांतिनाथ हुए। इसी प्रकार श्रीकृष्ण ने भी मुनिराज को औषधि दान देकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। औषधि दान से साधु के संयम ,व्रत, ध्यान तप की रक्षा होती है। त्याग से राग द्वेष परिग्रह कम होता है। त्याग से यश बढ़ता है, त्याग से सद गति मिलती है, त्याग से आनंद होता है। श्रावक-श्राविकाओं के 6 आवश्यक कार्यों में पूजा और दान प्रमुख है।</p>
<p><strong>दस धर्म अपनाने से सुख शांति होती है</strong></p>
<p>अंगदान शास्त्र अनुसार ठीक नहीं है। आपके अंग का दुरुपयोग व्यसन या हिंसा में हो सकता है। आचार्य श्री ने एक महत्वपूर्ण सूत्र बताया कि आत्म स्वभाव, निज पद को परिग्रह त्याग कर प्राप्त कर सकते हैं। देश विश्व यदि इन दश धर्मों को अपनाता हैं तो सुख और शांति हो सकती हैं। अनेक कथा और उदाहरण से बताया कि त्याग और दान में अनेक प्रसिद्ध हुए हैं। एक ग्वाला मुनिराज को शास्त्र देने से अगले जन्म में कुंदकुंद आचार्य हुए। आज त्याग धर्म का दिन टोंक में स्मरणीय हो गया। जब अनेक भक्तों ने चंचला लक्ष्मी का आहार दान में राशि देकर साधु के चौका लगाने के लिए संकल्पित हुए।</p>
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		<title>गुरु के पास जाने से होता है पुनर्जन्म: जिंदगी की धारा को बदलने का सामर्थ्य केवल के गुरु के पास  </title>
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		<pubDate>Tue, 05 Aug 2025 08:56:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कहते हैं सुजान व्यक्ति समर्थ गुरु की तलाश में भटकता है। जब गुरु से उसका मिलन होता है तो यहीं उसका पुनर्जन्म होता है। सच में धर्मग्रंथों में वर्णित है कि केवल संसार में केवल गुरु ही है, जो जिंदगी की धारा को बदलने का सामर्थ्य रखता है। इंदौर से गुरु की महिमा को बताती [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>कहते हैं सुजान व्यक्ति समर्थ गुरु की तलाश में भटकता है। जब गुरु से उसका मिलन होता है तो यहीं उसका पुनर्जन्म होता है। सच में धर्मग्रंथों में वर्णित है कि केवल संसार में केवल गुरु ही है, जो जिंदगी की धारा को बदलने का सामर्थ्य रखता है। <span style="color: #ff0000">इंदौर से गुरु की महिमा को बताती यह प्रस्तुति पढ़िए&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म में देव शास्त्र गुरु का महात्म्य कई गुना अधिक बताया गया है। देवों से हमें अभय मिलता है। शास्त्र हमें ज्ञान और सद्मार्ग की ओर ले जाते हैं तो गुरु के पास हमें मिलता है मोक्ष जाने का सुगम मार्ग। धर्म शास्त्रों में खूब कहा गया है कि चाहे जितना शास्त्रों का अध्ययन कर लो, जब तक गुरु नहीं मिलता शास्त्रों का सार भी समझ में नहीं आता। सुजान व्यक्ति के लिए गुरु की तलाश बड़ी कठिन होती है, लेकिन जब गुरु से उसका मिलन होता है तो उसी क्षण उसका दूसरा जन्म हो जाता है। यानि वह जो था, वह न होकर एक अलग ही रूप में निखरित होकर अपने कर्मपथ की ओर अग्रसर हो जाता है।</p>
<p>सभी धर्मों में गुरु को देवों से भी कहीं उच्चता का दर्जा इसलिए दिया है कि गुरु पूर्ण होते हैं और वे अपने शिष्य को भी अपूर्ण नहीं रहने देते। जब तीर्थंकर भगवान देशना देते हैं तो पशु-पक्षी और जगत के अन्य जीव-जन्तु वहां एकत्र होकर एकाग्र भाव से उनके उपदेशों को सुनते हैं और अपने इस भव को त्यागकर वे अगले जन्म चक्र में चले जाते हैं।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-86868" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250805-WA0008.jpg" alt="" width="300" height="168" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250805-WA0008.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/08/IMG-20250805-WA0008-215x120.jpg 215w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /></p>
<p>जैन धर्म ग्रंथ में इसका बखूबी प्रमाण मिलता है। यह भी सत्य है कि गुरु के पास ही मोक्ष मार्ग पर जाने का मार्गदर्शन है। उनके सान्निध्य में जीवन कुंदन-कुंदन हो जाता है। इसलिए इन दिनों चल रहे चातुर्मास में जितना अधिक हो सके गुरु का सान्निध्य प्राप्त किया जाए और अपने जीवन को सफल बनाया जाए।</p>
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		<title>सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग: मुनिश्री सारस्वतसागर जी ने धर्मसभा में सम्यक दर्शन और ज्ञान को समझाया  </title>
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		<pubDate>Thu, 03 Jul 2025 14:02:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य विशुद्धसागरजी के शिष्य मुनिश्री सारस्वत सागर जी, मुनिश्री जयंत सागर जी, मुनिश्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी अब नांद्रे में विराजित है। इस अवसर पर मुनिश्री सारस्वत सागर जी ने प्रवचन में कहा कि सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग। यह जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र है। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य विशुद्धसागरजी के शिष्य मुनिश्री सारस्वत सागर जी, मुनिश्री जयंत सागर जी, मुनिश्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी अब नांद्रे में विराजित है। इस अवसर पर मुनिश्री सारस्वत सागर जी ने प्रवचन में कहा कि सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग। यह जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र है। <span style="color: #ff0000">नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>नांद्रे।</strong> आचार्य विशुद्धसागरजी के शिष्य मुनिश्री सारस्वत सागर जी, मुनिश्री जयंत सागर जी, मुनिश्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी अब नांद्रे में विराजित है। इस अवसर पर मुनिश्री सारस्वत सागर जी ने प्रवचन में कहा कि सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग। यह जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र है। सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र की संयुति ही मोक्ष का मार्ग है। सम्यक् शब्द समीचीनता का द्योतक है। यह तीनों में अनुगत है। यहां दर्शन का अर्थ श्रद्धा है, तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप की श्रद्धा को सम्यक् दर्शन कहते हैं। वास्तविक बोध सम्यक् ज्ञान है तथा आत्म-कल्याण के लिए किया जाने वाला सदाचरण सम्यक् चारित्र है।</p>
<p>सम्यक् श्रद्धा, ज्ञान और आचरण तीनों के योग से ही मोक्ष मार्ग बनता है। लोक में रत्नों की तरह दुर्लभ होने के कारण इन्हें रत्नत्रय भी कहते हैं। ये तीनों मिलकर ही मोक्षमार्ग कहलाते हैं। प्रवचन के दौरान महावीर दिगंबर जैन मंदिर के अध्यक्ष जिनेश्वर पाटील, सेक्रेटरी सुधीर चौधरी, अनिल पाचोरे, एनजे पाटील, सुधीर भोरे, मनोज पाटील, शुभम पाचोरे, सुहास पाचोरे, सुदर्शन पाटील,सतीश पाटील (पोपट पाटील), सोनू उपाध्ये, दादासाहेब पाटील (इंगळे), नवीनकुमार पाटील, वैभव चौधरी, सूरज पाचोरे, निखिल पाटील, विनय पाचोरे, भरत पाटील (पांढरे ), अमोल पाटील (लि.), सुहास पाटील (लि.), भरत पाटील (गाका), अभय सकळे, गुलाब मुजावर, भगवान महावीर जैन मंदिर कमेटी व पूजा महा महोत्सव कमेटी, वीर सेवा दल नांद्रे, वीर महिला मंडळ, पार्श्व महिला परिषद, जैन युवा मंच के युवा पदाधिकारी, प्रभावणा समिति के कार्यकर्ता उपस्थित थे।</p>
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		<title>भीड़ का संबंध सत्य से नहीं आकर्षण से होता है: स्वस्ति भूषण माताजी पुस्तक ट्रेनिंग पॉइंट के अंश  </title>
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		<pubDate>Mon, 09 Jun 2025 12:46:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[स्वस्ति भूषण माताजी द्वारा लिखित पुस्तक ट्रनिंग पॉइंट में उन्होंने ऐसे ज्ञान, जीवन-दर्शन और आदर्शों का चित्र सामने रखा है। जो सभी के लिए प्रेरणादायी है। अनुकरणीय भी। रामगंजमंडी से पढ़िए, इस पुस्तक के संकलित अंश, संकलन किया है अभिषेक जैन लुहाड़िया ने&#8230; रामगंजमंडी। स्वस्ति भूषण माताजी द्वारा लिखित पुस्तक ट्रनिंग पॉइंट में उन्होंने ऐसे [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>स्वस्ति भूषण माताजी द्वारा लिखित पुस्तक ट्रनिंग पॉइंट में उन्होंने ऐसे ज्ञान, जीवन-दर्शन और आदर्शों का चित्र सामने रखा है। जो सभी के लिए प्रेरणादायी है। अनुकरणीय भी। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, इस पुस्तक के संकलित अंश, संकलन किया है अभिषेक जैन लुहाड़िया ने&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> स्वस्ति भूषण माताजी द्वारा लिखित पुस्तक ट्रनिंग पॉइंट में उन्होंने ऐसे ज्ञान, जीवन-दर्शन और आदर्शों का चित्र सामने रखा है। जो सभी के लिए प्रेरणादायी है। अनुकरणीय भी। इस पुस्तक के अंश के मुताबिक अक्सर लोग भीड़ से बहुत प्रभावित होते हैं। रास्ते में कहीं जा रहे हैं और रास्ते किनारे भीड़ लगी है तो लोग गाड़ी रोककर उतरकर देखते हैं क्या हुआ? लोगों को लगता है कि भीड़ है तो कुछ ना कुछ जरूर होगा, वरना लोग इकट्ठा क्यों होते ? कहा भी है कि भीड़ भीड़ को खींचती है और पैसा पैसे को खींचता है। उन्होंने आगे कहा है कि कहीं भीड़ दिखे और विचार आए बिना रह जाए, उत्तर खींचे बिना रह जाए ऐसा बहुत मुश्किल है। भीड़ कहीं भी हो सकती है। टॉकिज में देखिए, वहां भी भीड़ मिल जाएगी। डॉक्टर के यहां लाइन लगी मिल जाएगी, ज्योतिषी के यहां भी भीड़ मिल जाएगी। स्कूल कॉलेज भीड़ से भरे पड़े हैं। जिस स्कूल में बच्चे ज्यादा हो आपके हिसाब से वह अच्छा स्कूल है। आपस में चर्चा करते हैं कि उसका बच्चा उस स्कूल में पढ़ता है, फ़लाने का बच्चा उसमें पढ़ता है। इसलिए मैं भी अपने बच्चों को वहीं पर पढ़ाऊंगी। खींचती है भीड़, इंसान को उसके रोम रोम को।</p>
<p><strong>भीड़ में प्रभु के दर्शन का आनंद ?</strong></p>
<p>माताजी ने कहा है कि लोग शिखर जी जाते हैं। एक बार एक व्यक्ति शिखर जी से लौटकर आए बोले पिछले बार शिखरजी गया था तब ज्यादा अच्छा नहीं लगा। बिल्कुल भीड़ नहीं थी मात्र 25-50 लोग पहाड़ पर थे। वंदना करने में मजा ही नहीं आया लेकिन, इस बार तो होली पर गया था। कमरा भी नहीं मिला, बरामदे में सोना पड़ा और भीड़ पहाड़ पर इतनी थी कि चलना मुश्किल हो रहा था लेकिन, बहुत अच्छा लगा। आगे उसने बताया कि माताजी चंदाप्रभु भगवान के दर्शन में लाइन लगानी पड़ी। एक घंटे में नंबर आया और पार्श्वनाथ भगवान के दर्शन में तीन घंटे इंतजार करना पड़ा। बाकी टोक पर भी बड़ी मुश्किल हो रही थी। दर्शन करने में लेकिन, आनंद काफी आया और सोचा कि अब हर साल इन्हीं दौरान जाया करूंगा इस समय भीड़ अच्छी होती है।</p>
<p><strong>लोग बिना समझे बिना भावों के वहां भागते हैं</strong></p>
<p>इस व्यक्ति की बात पर चिंतन करें कि इस व्यक्ति को पहली बार में मेहनत नहीं लगी या सरल भाषा में कहे तो भगवान अकेले में मिल गए तो उस व्यक्ति को मजा नहीं आया। वही दर्शन भीड़ में मिले तो मजा आया। म ैंउन व्यक्ति से कि वह शिखर जी के दर्शन करने गया था कहना चाहिए। वरना कहना तो यही पड़ेगा कि उसे भीड़ के दर्शन में मजा आया। यदि शिखरजी के दर्शन करने गया था तो पहली बार में अच्छा लगना था भीड़ जहां जाती हैं, लोग बिना समझे बिना भावों के वहां भागते हैं। भीड़ का ेदेखते ही लोग उदेदश्य भी भूल जाते हैं और भीड़ के पीछे भागते है। शिखरजी जाना बड़ा पुण्य का काम है, पर वहां जाकर करना क्या है यदि ये नहीं पता तो भीड़ से ही प्रभावित रहोगे। जितने लोग शिखर जी जाते हैं वंदना कैसे करनी है। आधे लोगो को भी नहीं आता। चक्कर लगाकर वापस आ जाते हैं। कोई तीर्थ स्थान हो या पर्यटक स्थल, भीड़ तभी होगी जब भीड़ होगी। आज के प्रचार प्रसार ने इस पर और ज्यादा असर डाला है।</p>
<p><strong>जो सुनाया जा रहा है बस अच्छा लगना चाहिए</strong></p>
<p>बच्चे वहीं चीज खायेंगे जो टी. वी. पर दिखाई जा रही है। भीड़ का संबंध सत्य से नहीं भीड़ ज्ञानियों की नहीं अज्ञानियों की होती है। भीड़ को ये नहीं पता भीड़ का संबंध आकर्षण है। जहां आकर्षण होगा भीड़ वही खिंच जाएगी। भीड़ को यह नहीं पता कि उसे क्या सुनना है, जो सुनाया जा रहा है बस अच्छा लगना चाहिए। प्रभावक से प्रभावित होता है। जितने नये धर्माे का प्रादुर्भाव हुआ है वह सब वाणी के प्रभाव का ही कारण है।</p>
<p><strong>कहानी के सार ने बताया भीड़ किसको चाहती है</strong></p>
<p>एक बार बृहस्पति और लक्ष्मी में विवाद हो गया कि लोग मुझे चाहते हैं। दोनो का विवाद बढ़ गया। विष्णु जी के पास पहुंचे। उनसे निर्णय करने को कहा। उन दोनों को छह माह का समय दिया और कहा जाओ धरती पर अपनी महत्ता सिद्ध करो। पहले बृहस्पति पहुंचे वे बहुत ज्ञानी थे। अतः उन्होने प्रवचन करना प्रारंभ किया। धीरे-धीरे प्रवचन सुनने वालों की संख्या बढ़ने लगी। लोग बृहस्पति के पीछे-पीछे भागने लगे। वे जहां जाते वहां सभी प्रवचन सुनने पहुंच जाते। अपार जन समूह पीछे-पीछे रहने लगा। वृहस्पति को लगा कि ये भीड़ मेरे पीछे है। 6 महीने में कुछ समय बाकी था अपार भीड़ बृहस्पति का प्रवचन सुन रही थी। पीछे एक बुढ़िया, सोने की कटोरे में भीख मांगने आई। लोगों की नजर तब पड़ी जब उसने कहा कि यह कटोरा उसको दूंगी जो मुझे अपनी श्रद्धा से पानी पिलाएगा। भीड़ में 10-20 लोग उठकर उस अम्मा के पीछे पहुंच गए। पीछे की भीड़ देखकर सामने मंच से अध्यक्ष मंत्री भी पहुंच गए। देखें क्या हुआ। बुढ़िया कह रही थी मेरी झोली में बहुत कटोरे हैं सोने के, मैं मंच से बैठकर बाटूंगी। अध्यक्ष मंत्री उसके हाथ जोड़ने लगे कि चलो अम्मा मंच पर चलो। बुढिया बोली पहले उसे बूढ़े को मंच से हटाओ तब मंच पर जाऊंगी। अध्यक्ष मंत्री पहुंच गए बृहस्पति के पास बाबा जी आपके प्रवचन बहुत सुन लिए है। आज प्रवचन रहने दो आज आप आराम करो। बृहस्पति ने कहा आज प्रवचन क्यों छोड़ूं 6 महीने से कर रहा हूं। बुढ़िया के कारण छोड़ दूं। अध्यक्ष मंत्री बोले महाराज आप हाथ जोड़ने से मान जाओ वरना आपका तकता हम उठाकर कमरे में रख देंगे पीछे से बुढ़िया (लक्ष्मी )के बृहस्पति से आंख मटका के बताया देख लिया भीड़ किसको चाहती है।</p>
<p><strong>अज्ञानी की भीड़ स्वार्थ से जुड़ी है</strong></p>
<p>कहानी का सार यह है कि भीड़ का अपना कोई उद्देश्य नहीं, जहां उसके स्वार्थ की पूर्ति होती है वह वही भागने लगती है। उसे मोक्ष आत्म ज्ञान से कुछ लेना-देना नहीं है। अज्ञानी की भीड़ स्वार्थ से जुड़ी है। सबसे पहले स्वार्थ है धन का आकर्षण, जहां विदेश में जाना स्वीकार है। दूसरा आकर्षक रूप अर्थात जिसका रूप दिल को कहा जाए चाहे मिथ्या दृष्टि ही क्यों ना हो। वही भागेगा फिल्मी कलाकारों के पीछे आज के लोग दीवाने हैं। खाना पीना भूल जाए यदि वह हमको मिल जाए तो। शहर में एक तरफ साधु आया हो, दूसरी तरफ फिल्मी कलाकार आया हो तो साधु के पास दो-चार लोग ही मिलेंगे और कलाकार के पास हजारों की भीड़ मिल जाएगी। उस समय साधु संत बाधा प्रतीत होंगे। भीड़ इंसान तो क्या जानवर के पीछे भी मिल सकती है। एक बार हम बिहार कर रहे थे, एक जगह एक कुत्ते के पीछे से करो व्यक्ति भाग रहे थे। हमने पूछा यह क्या हो रहा है तो उन्होंने बताया कि कल यहां चोरी हुई थी यह विशेष कुत्ता है चोरों का पता लगा रहा है। इसका आशय की कुत्ते भी भीड़ की खट्टी कर सकते हैं। घोड़े की रेस देखने बहुत दुनिया जाती है। और लाखों रुपए का जुआ भी खेला जाता है। चिड़ियाघर में भी भीड़ होती है। लाखों लोग जानवरों को देखने लग जाते हैं। इसका आशय है की भीड़ से धर्म का संबंध नहीं।</p>
<p><strong>यह आवश्यक नहीं है कि जहां भीड़ है वहां सत्य होगा</strong></p>
<p>अर्थ समझाते हुए माताजी कहती हैं कि यह आवश्यक नहीं है कि जहां भीड़ है वहां सत्य होगा और यह भी आवश्यक नहीं है कि जहां सत्य है वहां भीड़ जरूरी है। सत्य धर्म एकांत में भी पाया जा सकता है। धर्म को भीड़ की नहीं भाव की जरूरत है। भीड़ का धर्म उन्हें करना पड़ता है जिनसे एकांत में धर्म नहीं होता है। एकांत साधना करने वाले भीड़ से भागते हैं फिर भी भीड़ में रहना पड़े तो भीड़ में रहकर एकांतवास का अनुभव करते हैं। लिखने को तो बहुत लिखा जा सकता है पर इसको पढ़कर आगे का चिंतन आप स्वयं करें तो ज्यादा अच्छा है।</p>
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		<title>पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ का जन्म, ज्ञान मोक्ष कल्याणक: तिथि के अनुसार चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन आती हैं भगवान के तीनों कल्याणक, इस बार यह 8 अप्रैल को  </title>
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		<pubDate>Tue, 08 Apr 2025 05:50:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ जी का जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक 8 अप्रैल को पारंपरिक धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के साथ समूचे देश में मनाया जाएगा। भगवान सुमतिनाथ के जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक चैत्र शुक्ल एकादशी को आते हैं। इस बार यह तिथि 8 अप्रैल को है। श्रीफल जैन न्यूज की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ जी का जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक 8 अप्रैल को पारंपरिक धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के साथ समूचे देश में मनाया जाएगा। भगवान सुमतिनाथ के जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक चैत्र शुक्ल एकादशी को आते हैं। इस बार यह तिथि 8 अप्रैल को है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह विशेष प्रस्तुति पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ जी का जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक 8 अप्रैल को पारंपरिक धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के साथ समूचे देश में मनाया जाएगा। भगवान सुमतिनाथ के जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक चैत्र शुक्ल एकादशी को आते हैं। इस बार यह तिथि 8 अप्रैल को आ रही है। शहर सहित देश के विभिन्न शहरों,नगरों और कस्बों में भगवान सुमतिनाथ के तीनों कल्याणक के अवसर पर दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों में पूरी श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ अभिषेक, शांतिधारा और निर्वाण कांड पाठ सहित निर्वाण लाडू चढ़ाने आदि के विधान पारंपरिक रूप से किए जाएंगे।</p>
<p><strong>मानव जाति के कल्याण के लिए दिए संदेश </strong></p>
<p>भगवान सुमतिनाथ जी ने अपने जीवन काल में जैन धर्मावलंबियों और समस्त मानव जाति को सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने का संदेश दिया। भगवान ने इस मूल मंत्र को स्वयं तो जीवन में उतारा ही साथ ही मानव समाज के लिए उन्होंने अपनी देशनाओं में इस पर अधिक से अधिक जोर दिया। धर्म मार्ग पर चलकर मोक्ष तक का जीवन का सफर उनकी देशनाओं का मुख्य आधार रहा है। अपने धर्म पर अडिग रहने और सत्याचरण कर जीवों पर दया करने और हिंसा का त्याग करने का संदेश जगत में प्रसारित किया। इससे समूल मानव जाति का कल्याण हुआ।</p>
<p><strong>जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक एक ही तिथि को </strong></p>
<p>जैन धर्म के ग्रंथों के अनुसार भगवान सुमतिनाथ जी जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर थे। भगवान सुमतिनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश के राजा मेघप्रय की पत्नी रानी सुमंगला के गर्भ से चैत्र शुक्ल एकादशी को पावन नगरी अयोध्या में हुआ था। इनके शरीर का वर्ण सुवर्ण था, जबकि इनका चिह्न चकवा था। भगवान सुमतिनाथ जी के यक्ष का नाम तुम्बुरव तथा यक्षिणी का नाम वज्रांकुशा था। जैनियों के मतानुसार सुमतिनाथ के गणधरों की संख्या 100 थी। चरम स्वामी इनके गणधरों में प्रथम गणधर थे। भगवान सुमतिनाथ को वैशाख शुक्ल नवमी को अयोध्या में दीक्षा प्राप्ति हुई थी। दीक्षा मिलने के बाद भगवान सुमतिनाथ जी ने 2 दिन बाद खीर से प्रथम पारणा किया था। 20 वर्ष तक कठोर तप के बाद अयोध्या में ही चैत्र शुक्ल एकादशी को ‘प्रियंगु’ वृक्ष के नीचे इन्हें ‘कैवल्य ज्ञान’ की प्राप्ति हुई। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार सुमतिनाथ ने कई वर्षों तक मानव जाति को अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। जैन धर्म की कथानुसार भगवान श्री सुमतिनाथ का चैत्र शुक्ल एकादशी को ही सम्मेद शिखर पर निर्वाण हुआ और वे मोक्ष को प्राप्त हुए।</p>
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