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	<title>Jal Abhishek &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>धूप दशमी और अनंत चतुर्दशी का विशेष महत्व : पर्युषण पर्वराज 28 अगस्त से 6 सितंबर तक मनाया जाएगा  </title>
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		<pubDate>Tue, 26 Aug 2025 14:58:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पर्वराज पर्युषण पूरे भारत में दिगंबर जैन समाज बड़ी भक्ति भाव से मनाएगा। नगर के सभी जिनालयों में पर्व राज पर्यूषण महापर्व की विशेष साज सज्जा के साथ तैयारी की गई है। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। पर्वराज पर्युषण पूरे भारत में दिगंबर जैन समाज बड़ी भक्ति भाव से मनाएगा। नगर के सभी जिनालयों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पर्वराज पर्युषण पूरे भारत में दिगंबर जैन समाज बड़ी भक्ति भाव से मनाएगा। नगर के सभी जिनालयों में पर्व राज पर्यूषण महापर्व की विशेष साज सज्जा के साथ तैयारी की गई है। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> पर्वराज पर्युषण पूरे भारत में दिगंबर जैन समाज बड़ी भक्ति भाव से मनाएगा। नगर के सभी जिनालयों में पर्व राज पर्यूषण महापर्व की विशेष साज सज्जा के साथ तैयारी की गई है। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि पर्युषण पर्व में 10 दिन जिनेंद्र प्रभु महा अर्चना भक्ति की जाएगी। 28 अगस्त से 6 सितंबर तक सभी जिन मंदिरों में प्रतिदिन प्रातः 6.30 बजे से श्रीजी का जलाभिषेक एवं शांतिधारा, नित्य नियम पूजन एवं विशेष दसलक्षण विधान आदि नगर में विराजित आचार्य संसघ, आर्यिका माता एवं मुनि संघों की प्रातः 9 बजे से मंगल देशना, प्रातः 10 बजे मुनिराजों की आहारचर्या, दोपहर 3 बजे से सिद्धांत ग्रंथ तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन (प्रतिक्रमण), शाम 6.30 बजे से सामूहिक सामायिक पाठ, 7.30 बजे श्रीजी की संगीतमय महाआरती, रात्रि 8 बजे नगर के विद्वत एवं बाहर से पधारे शास्त्रियों द्वारा आगम शास्त्र सभा, रात्रि में 9 बजे सभी जिनालयों में पाठशालाओं के बच्चों एवं महिला मंडल के सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। दद्दू ने कहा कि पर्वराज पर्यूषण पर्व के दिनों में धूप दशमी एवं अनंत चतुर्दशी का विशेष महत्व है।</p>
<p><strong>सुहाग की मंगल कामना के लिए उपवास</strong></p>
<p>धूप दशमी के दिन नगर के सभी जिन मंदिरों में विशेष साज सज्जा आकर्षक मंडल एवं झांकियों को विशेष तैयारी के साथ प्रस्तुत किया जाता है। दद्दू ने कहा कि धूप दशमी को सुगंध दशमी भी कहा जाता है। इस दिन सभी समाज जन सपरिवार नगर के सभी जिनालयों के दर्शनार्थ जाते हैं। सुगंधित धूप अग्नि में समर्पित कर अष्टकर्मों के विनाश के लिए प्रार्थना करते हैं। धूप दशमी पर महिलाएं अपने सुहाग की मंगल कामना के लिए उपवास एवं अपने पति की सुख शांति समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।</p>
<p><strong>विश्व की मंगल भावना भाते हैं</strong></p>
<p>पर्वराज पर्यूषण पर्व के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी को सभी समाज जन सपरिवार प्रभु की विशेष आराधना करते हैं। इस दिन शायद ही कोई जैन ऐसा होगा, जो अभिषेक, पूजन और व्रत नहीं करता होगा। इस दिन जैन परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी सामर्स्थानुसार श्री जिनेंद्र प्रभु की आराधना करते हुए मोक्ष लक्ष्मी की मंगल भावना भाते है। दोपहर में श्रीजी को पालकी विमान में विराजमान कर श्रीजी की शोभायात्रा निकालकर श्री जिनेंद्र प्रभु का जलाअभिषेक कर विश्व की मंगल भावना भाते हैं।</p>
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		<title>अकाट्य श्रद्धा से परमात्मा बनना संभव: क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी ने धर्मसभा में बताया श्रद्धा का महत्व  </title>
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		<pubDate>Mon, 21 Jul 2025 08:57:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[क्षुल्लक द्वय श्री महोदय सागर जी, क्षुल्लक श्री पुण्योदय सागर जी महाराज ससंघ सान्निध्य में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का जलाभिषेक पंचामृत अभिषेक, महा शांतिधारा छहढाला कक्षा शिक्षण, इष्टोपदेश ग्रंथ पर प्रवचन, सायंकल श्रीजी देव शास्त्र गुरु की आरती, भक्ति, जिनदर्शन क्यों? कैसे! पर विवेचना, प्रश्नमंच, पुरस्कार वितरण के कार्यक्रम प्रतिदिन हो रहे हैं। धरियावद से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>क्षुल्लक द्वय श्री महोदय सागर जी, क्षुल्लक श्री पुण्योदय सागर जी महाराज ससंघ सान्निध्य में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का जलाभिषेक पंचामृत अभिषेक, महा शांतिधारा छहढाला कक्षा शिक्षण, इष्टोपदेश ग्रंथ पर प्रवचन, सायंकल श्रीजी देव शास्त्र गुरु की आरती, भक्ति, जिनदर्शन क्यों? कैसे! पर विवेचना, प्रश्नमंच, पुरस्कार वितरण के कार्यक्रम प्रतिदिन हो रहे हैं। <span style="color: #ff0000">धरियावद से पढ़िए, श्रीफल साथी अशोककुमार जेतावत की यह खबर&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धरियावद।</strong> श्रद्धा वह है, जो कभी देखा न हो, सुना न हो, फिर भी विश्वास किया जाता है। श्रद्धा की भाषा, परिभाषा, बोल कुछ नहीं होते हैं, वह तो हमारे हृदय से प्रगट होती है। श्रद्धा देखी नहीं है, सुनी होती है पर वर्तमान में हमारी तो श्रद्धा तो कांच के प्याले की तरह होती है। थोड़ा सा धक्का लगे तो टूट जाती है। यह प्रबोधन क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी महाराज ने रविवार को श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया। क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी ने कहा कि आप मंदिर में वेदी पर द्रव्य चढ़ाते हैं, पर अपने मन के श्रद्धा की वेदी पर द्रव्य न चढ़ाने से वह अनमोल नहीं बन पाता है, वह निष्फल ही रहता है। अतः अकाट्य श्रद्धा का होना जरूरी है, तभी वह द्रव्य चढ़ाना सार्थक हो पता है। प्रभु के दरबार में पहले विश्वास करो फिर इस्तेमाल करो वाला फॉर्मूला (सिद्धांत) चलता है, न कि पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो वाला।</p>
<p><strong>दुनिया के सारे काम में दिखावा करें तो चलेगा </strong></p>
<p>क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी ने कहा कि जिसने अपने जीवन में श्रद्धा रूपी स्टैंड डाल दिया तो चाहे उसका जीवन रहे ना रहे, पर धर्म सदा जीवित रहेगा। श्रद्धा और श्रद्धेय के बीच में कोई तत्व नहीं रहता है। श्रद्धा किसी के वास्ते नहीं रहती है, वह अपना रास्ता स्वयं बना लेती है। उसे किसी माइल स्टोन की आवश्यकता नहीं रहती है। आजकल मंदिरों भीड़ बढ़ रही है, पर श्रद्धा घट रही है। मंदिर में प्रतिमाएं बढ़ रही है, पर भक्त कम हो रहे हैं। हमारे अंतरंग में निश्चल, दृढ़ निर्मल होकर अकाट्य श्रद्धा करने से परमात्मा तक बन सकते हैं। हमें भक्तिपूर्वक, भावपूर्वक जिनेंद्र भगवान के जिन मंदिर में आना चाहिए। दिखावे के लिए नहीं आना चाहिए। दुनिया के सारे काम में दिखावा करें तो चलेगा पर जिनेंद्र भगवान के दरबार में आकर दिखावा करने वालों को फूटी कौड़ी भी मिलने वाली नहीं है। अतः हमारे अंतरंग में श्रद्धा का अकाट्य श्रीफल चढ़ाना चाहिए।</p>
<p><strong>धार्मिक प्रश्नोत्तरी क्विज प्रतियोगिता जारी </strong></p>
<p>क्षुल्लक द्वय श्री महोदय सागर जी, क्षुल्लक श्री पुण्योदय सागर जी महाराज ससंघ सान्निध्य में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का जलाभिषेक पंचामृत अभिषेक, महा शांतिधारा छहढाला कक्षा शिक्षण, इष्टोपदेश ग्रंथ पर प्रवचन, सायंकल श्रीजी देव शास्त्र गुरु की आरती, भक्ति, जिनदर्शन क्यों? कैसे! पर विवेचना, प्रश्नमंच, पुरस्कार वितरण के कार्यक्रम प्रतिदिन हो रहे हैं। साथ ही प्रत्येक रविवार को रात्रि 8 बजे से एंड्रॉयड मोबाइल पर कंप्यूटराइज्ड धार्मिक प्रश्नोत्तरी क्विज प्रतियोगिता भी हो रही है।</p>
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		<title>तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का गर्भ कल्याणक मनाया: मूलनायक भगवान का जलाभिषेक किया  </title>
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		<pubDate>Tue, 01 Jul 2025 15:26:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन समाज डडूका की ओर से चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का गर्भ कल्याणक पर्व मनाया गया। प्रातः राजेंद्र कोठिया के मंत्रोच्चार के साथ मूलनायक का जलाभिषेक किया। डडूका से पढ़िए, यह खबर&#8230; डडूका। दिगंबर जैन समाज डडूका की ओर से चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का गर्भ कल्याणक पर्व मनाया गया। प्रातः राजेंद्र [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन समाज डडूका की ओर से चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का गर्भ कल्याणक पर्व मनाया गया। प्रातः राजेंद्र कोठिया के मंत्रोच्चार के साथ मूलनायक का जलाभिषेक किया। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> दिगंबर जैन समाज डडूका की ओर से चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का गर्भ कल्याणक पर्व मनाया गया। प्रातः राजेंद्र कोठिया के मंत्रोच्चार के साथ अनिल बदामीलाल कोठिया रजनी कोठिया, आयुष, नमन, निशि कोठिया परिवार ने मूलनायक का जलाभिषेक किया। प्रथम चार कलश रमनलाल पी शाह, अजीत बी शाह, कांतिलाल नाथूलाल शाह ने समर्पित किए। इस अवसर पर मनोज शाह, अजीत कोठिया, राजमल शाह सहित कई भक्तों ने जलाभिषेक कर भगवान महावीर के गर्भ कल्याणक पर अर्घ्य समर्पित किए।</p>
<p>समाज अध्यक्ष राजेश शाह ने सभी को महावीर गर्भ कल्याणक पर्व पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी। इसी क्रम में 22वे तीर्थंकर भगवान नेमीनाथ स्वामी के मोक्ष कल्याणक पर्व पर 2 जुलाई को प्रातः पार्श्वनाथ जिनालय डडूका में मुक्ति का प्रतीक निर्वाण लाडू समर्पित किया जाएगा।</p>
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		<title>ऋषभदेव की निर्वाण भूमि अष्टापद के दर्शन किए : जलाभिषेक एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य लिया </title>
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		<pubDate>Wed, 04 Jun 2025 06:31:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ऋषभदेव की निर्वाण भूमि अष्टापद में प्राचीन चरण के जलाभिषेक एवं शांतिधारा समाजजनों ने की। यह सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ। श्रमण संस्कृति से देवभूमि उत्तराखंड का महत्वपूर्ण इतिहास जुड़ा हुआ है। इंदौर और /अष्टापद से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर/अष्टापद। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के सदस्य एवं समर्थ सिटी के समाजजन प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव की निर्वाण [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>ऋषभदेव की निर्वाण भूमि अष्टापद में प्राचीन चरण के जलाभिषेक एवं शांतिधारा समाजजनों ने की। यह सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ। श्रमण संस्कृति से देवभूमि उत्तराखंड का महत्वपूर्ण इतिहास जुड़ा हुआ है। <span style="color: #ff0000">इंदौर और /अष्टापद से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर/अष्टापद।</strong> वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के सदस्य एवं समर्थ सिटी के समाजजन प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव की निर्वाण भूमि अष्टापद दर्शन वंदना करने पहुंचे। बद्रीनाथ मंदिर में अति प्राचीन प्रतिमा के प्रातः कालीन दर्शन का लाभ प्राप्त किया। इसके बाद भगवान आदिनाथ स्वामी के हजारों वर्ष प्राचीन चरणों का जलाभिषेक एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य शैलेन्द्र जैन, अनिल जैन, संतोष जैन आदि सदस्यों को प्राप्त हुआ। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि अष्टापद तीर्थ वह पर्वत है। जिस पर प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने निर्वाण प्राप्त किया था और इसे सबसे पवित्र जैन तीर्थ माना जाता है। अष्टपद का शाब्दिक अर्थ है आठ सीढ़ियां, जो पहाड़ पर चढ़ने के लिए आठ विशाल सीढ़ियां या आठ पर्वत चोटियों की एक श्रृंखला मानी जाती हैं। हिमालय का क्षेत्र भगवान आदिनाथ स्वामी की साधना स्थली मानी जाती है।</p>
<p><strong>हिमालय को अष्टापद भी कहा जाता है</strong></p>
<p>आठ पहाड़ियों की बात के संदर्भ में बताया गया है कि बद्रीनाथ के आसपास की पहाड़ियों की श्रृंखलाएं विद्यमान हैं। जिसमें गौरीशंकर, कैलाश मान सरोवर, बद्रीविशाल, नंदा, द्रोणगिरि, नारायण, नर, और त्रिशूली के नाम से जाना जाता है। इन आठ पहाड़ियों के कारण हिमालय को अष्टापद भी कहा जाता है। यह भी माना जाता है कि अष्टापद कैलाश पर्वत और मानसरोवर के आसपास स्थित है। हालांकि यह सभी खोज का विषय है लेकिन, जैन धर्मावलंबियों की आस्था बद्रीनाथ एवं मानसरोवर पर अधिक है। इस बारे में खोजें हुईं हैं, जो अब भी जारी है कि वह</p>
<p>कौन-सा स्थान है जहां से प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ स्वामी ने मोक्ष की प्राप्ति की थी। यह बात तय मानी जाती है कि उनकी साधना स्थली हिमालय ही है।</p>
<p>जैन इतिहास में अष्टापद को सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है इसलिए, पिछले कई वर्षों से इसके स्थान पर निरंतर शोध चल रहा है।</p>
<p><strong>&#8230;इससे अधिक सुंदर स्थान कभी नहीं देखा</strong></p>
<p>अब तक एकत्रित जानकारी पर दर्जनों शोधपत्र लिखे जा चुके हैं और कई पुस्तिकाएं प्रकाशित हो भी हो चुकी हैं। एक अन्य ख़ोज जो एक अंग्रेज शोधकर्ता जोसेफ रॉक ने दावा किया था कि आधुनिक समय में अष्टापद को देखने वाला वह पहला व्यक्ति था और उसके अनुसार उसने पूरी दुनिया में इससे अधिक सुंदर स्थान कभी नहीं देखा। उन्होंने कहा कि &#8216;यदि अष्टापद के बारे में पर्याप्त गहन शोध किया जाए, तो शायद हम मानव सभ्यता के स्रोत तक पहुंच सकते हैं। यह संभव है कि इस क्षेत्र में मानव का विकास न हुआ हो, लेकिन यह निश्चित रूप से एक ऐसा स्थान होगा, जहां सभ्यता की शुरुआत हुई।</p>
<p><strong> आदिनाथ स्वामी के अति प्राचीन चरण हैं</strong></p>
<p>यह बात स्वतंत्रता प्राप्त के पूर्व वर्ष 1930 की है।</p>
<p>आचार्य श्री विद्यानंद जी महाराज द्वारा आज से लगभग 50-55 वर्षों पूर्व अष्टापद यात्रा के दौरान अष्टापद पर्वत श्रृंखलाओं में साधना करते हुए ख़ोजे गए भगवान श्री आदिनाथ स्वामी के अति प्राचीन चरण हैं। यह जानकारी अष्टापद जैन भवन के महामंत्री कीर्ति पांड्या ने दी। ज्ञातव्य है कि अष्टापद चौबीसी चरण तीर्थ क्षैत्र के विकास में देवकुमार, प्रदीप, अमित कासलीवाल परिवार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।</p>
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		<title>महावीर जन्म कल्याणक पर निकली भव्य रथयात्रा: महावीर के जीवन और संदेशों को आत्मसात करने की प्रेरणा दी </title>
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		<pubDate>Fri, 11 Apr 2025 07:45:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक महोत्सव श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया गया। सुबह प्रभात फेरी निकाली गई। यह नगर के मुख्य बाजारों से होती हुई बड़े जैन मंदिर पहुंची।जगह-जगह पुष्पवर्षा कर स्वागत किया गया। महावीर के जीवन और संदेशों को आत्मसात करने की प्रेरणा दी। अंबाह से अजय जैन की पढ़िए यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक महोत्सव श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया गया। सुबह प्रभात फेरी निकाली गई। यह नगर के मुख्य बाजारों से होती हुई बड़े जैन मंदिर पहुंची।जगह-जगह पुष्पवर्षा कर स्वागत किया गया। महावीर के जीवन और संदेशों को आत्मसात करने की प्रेरणा दी। <span style="color: #ff0000">अंबाह से अजय जैन की पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अंबाह।</strong> नगर में भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक महोत्सव श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया गया। सुबह प्रभात फेरी निकाली गई। यह नगर के मुख्य बाजारों से होती हुई बड़े जैन मंदिर पहुंची। प्रभात फेरी में भगवान महावीर के जीवन और संदेशों का प्रचार हुआ। समापन विश्व शांति और जनकल्याण की कामना के साथ हुआ। दोपहर 1 बजे श्री आदिनाथ जैन मंदिर से रथ यात्रा निकली। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु, माताएं और बहनें शामिल रहीं। रथ यात्रा के दौरान भगवान महावीर के जन्म से जुड़े भजन गूंजते रहे। श्रद्धालु एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते नजर आए। यात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई परेड चौराहा स्थित जैन बगीची पहुंची। यहां वात्सल्य भोज के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।</p>
<p><strong>भगवान जिनेंद्र की झलक पाने को आतुर रहे भक्त </strong></p>
<p>नगरवासियों ने जगह-जगह पुष्प वर्षा की। आरती उतारी। शीतल पेय वितरित कर श्रद्धालुओं का स्वागत किया। इटावा का मयूर बैंड आकर्षण का केंद्र रहा। बैंड की भक्ति धुनों पर श्रद्धालु नाचते हुए भगवान महावीर के जन्म की खुशी में मगन दिखे। तपती दोपहरी में भी श्रद्धालु भगवान जिनेंद्र की झलक पाने के लिए डटे रहे।</p>
<p><strong>जयकारों से आकाश गूंज उठा</strong></p>
<p>जैसे ही भगवान जिनेंद्र का रथ मुख्य मंदिर से बाहर निकला, जय जिनेंद्र के जयकारों से आकाश गूंज उठा। रथ के आगे श्रद्धालु नाचते-गाते, सिर झुकाते हुए जयकारे लगाते आगे बढ़ते रहे। समापन पर रथ जैन बगीची पहुंचा। यहां भगवान श्रीजी का जल से अभिषेक हुआ। पंडित मुकेश शास्त्री ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ जलाभिषेक करवाया। रथयात्रा में आचार्य श्री विवेक सागर जी महाराज के शिष्य ऐलक विप्रमाण सागर जी महाराज, आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के शिष्य क्षुल्लक श्री विश्वरक्ष सागर जी महाराज की उपस्थिति रही। बैंडबाजे की धुन पर श्रद्धालु जमकर नाचते रहे। आयोजन के समापन पर वात्सल्य भोज का आयोजन हुआ जिसमें भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया।</p>
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		<title>पवित्रमति माताजी के संसंघ सानिध्य में डडूका के वो तेरह दिन: आध्यात्मिक भक्ति से ओतप्रोत रहे भक्तजन  </title>
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		<pubDate>Tue, 01 Apr 2025 09:44:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आर्यिका पवित्रमति माताजी के ससंघ सानिध्य में 18 मार्च से 30 मार्च तक वो तेरह दिन मेरे जीवन के सबसे अच्छे, यादगार दिन रहे। उनके सानिध्य में कई विधान, अभिषेक, पूजन आदि कार्यक्रम हुए। सभी भक्तजन श्रद्धा और आस्था से डूबे रहे। पढ़िए डडूका से अजीत कोठिया की यह खबर&#8230; डडूका। आर्यिका विज्ञान मति माताजी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आर्यिका पवित्रमति माताजी के ससंघ सानिध्य में 18 मार्च से 30 मार्च तक वो तेरह दिन मेरे जीवन के सबसे अच्छे, यादगार दिन रहे। उनके सानिध्य में कई विधान, अभिषेक, पूजन आदि कार्यक्रम हुए। सभी भक्तजन श्रद्धा और आस्था से डूबे रहे। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डडूका से अजीत कोठिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> आर्यिका विज्ञान मति माताजी की शिष्या आर्यिका पवित्रमति माताजी के ससंघ सानिध्य में 18 मार्च से 30 मार्च तक वो तेरह दिन मेरे जीवन के सबसे अच्छे, यादगार दिन रहे। इसके साथ सुनहरे आध्यात्मिक पल एवं अपने अंतर्मन में झांकने के स्वर्णिम मौके बन गए। आंजना और बोरी से विहार कर जब 18 मार्च को माताजी जब अवलपुरा से पारंपरिक मार्ग से सुबह 8.30बजे यहां मंगल प्रवेश करती हैं तो समाजजन उनकी अगवानी में पलक पांवड़े बिछाए तैयार थे। पारसनाथ जिनालय पहुंच कर माताजी ने मूलनायक पार्श्वनाथ भगवान के दर्शन किए। अजीत कोठिया ने बताया कि माताजी के संघ में आर्यिका करणमती माताजी, आर्यिका गरिमामती माताजी तथा ब्रह्मचारिणी सोनल दीदी भी डडूका पधारीं। ऐतिहासिक डडूका नगरी में अपने प्रथम प्रवचन में ही यहां के जैन समाज की भक्ति से प्रभावित होकर माताजी ने आदिनाथ जन्म तप कल्याणक पर्व मनाने की घोषणा कर दी। हमारे तो मानो भाग ही खुल गए। अपने प्रातः कालीन प्रवचनों की श्रृंखला में माताजी ने आलोचना पाठ पर प्रातः 8से 9बजे तक वो तत्व गंगा बहाई, जिसमें हमारी कई अनसुलझी बातों और शंकाओं का स्वतः ही समाधान निकल आया।</p>
<p><strong>पार्श्वनाथ भगवान का जलाभिषेक करवाया</strong></p>
<p>आर्यिका पवित्रमति जी की वाणी में वो सम्मोहन है कि क्या युवा, क्या बुजुर्ग, क्या बच्चे, क्या बहनें सब के सब उनकी जिनवाणी मय वाणी से चुंबकीय आकर्षण की तरह जुड़ गए। अजीत कोठिया ने बताया कि दोपहर में माताजी ने बहनों के लिए पृथक से कक्षा लगाई। शाम प्रतिदिन 6.30से 7.30बजे तक कथा आर्यिका गरिमा मति माताजी ने सुनाई तो श्रोताओं को प्रथमानुयोग से सराबोर कर दिया। प्रतिदिन प्रातः गर्भ गृह के मूलनायक पार्श्वनाथ भगवान का जलाभिषेक माताजी करणमति ने मंत्रोच्चार से इस तन्मयता से कराया कि बच्चे, युवा, बुजुर्ग सब के सब जुड़ गए। आदिनाथ जन्म तप कल्याणक पर्व पर माताजी पवित्रमतिजी ने पार्श्वनाथ सभागार में आदिनाथ विधान कराया। जिसमें समाजजनों ने भक्ति से हिस्सा लिया।</p>
<p><strong>वर्षायोग के लिए किए श्रीफल भेंट </strong></p>
<p>अगले ही दिन पार्श्वनाथ विधान कराया तो भक्ति की चमक और बढ़ गई। अपने प्रवास के दौरान माताजी ससंघ सानिध्य में डडूका में तीर्थंकर अनंतनाथ भगवान एवं अरहनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक पर्व पर निर्वाण लाडू अर्पित किए गए। आंजना, परतापुर और आदिनाथ कॉलोनी एवं नौगामा के भक्तों का भी डडूका आना-जाना लगा रहा। पवित्रमति माताजी की चर्याएं चतुर्थकाल के साधुओं जैसी है और वे ऐसी साध्वी हैं। जिन्हें प्रचार-प्रसार और मीडिया का कोई मोह नहीं है। वे सिर्फ और सिर्फ धर्म वृद्धि और तत्त्व चर्चा की ही पक्षधर हैं। जैन समाज डडूका की हार्दिक इच्छा है कि पवित्रमति माताजी का वर्षा योग 2025 का सौभाग्य हमें मिले। इसके लिए समाजजनों ने उन्हें श्रीफल भेंट कर विनती की। गांगड़ तलाई में प्रवास कर रही उनकी गुरु मां विज्ञानमति माताजी से भी निवेदन करने जैन समाज का प्रतिनिधि मंडल पहुंचा। सभी ये उम्मीद करते हैं कि माताजी के चतुर्मास का सौभाग्य डडूका को मिले।</p>
<p><strong>परतापुर की ओर विहार में शामिल रहे जैन समाज के भक्त  </strong></p>
<p>प्रवास के तेरहवें दिन माताजी ने प्राचीन मनोहारी जिनालय डडूका के प्रांगण में एक बार और पार्श्वनाथ विधान कराया। फिर परतापुर की ओर शाम 4.30बजे विहार कर र्गइं। भक्तों की आंखें आंसुओं भरी थीं। सभी भक्त परतापुर तक वाया खेरन का पारड़ा विहार में सम्मिलित हुए। माताजी को परतापुर तक विहार करा परतापुर जिनालय के मूलनायक नेमीनाथ भगवान और अतिशययुक्त बेड़वा वाले बाबा आदिनाथ भगवान के दर्शन कर मां पवित्र मति माताजी का आशीर्वाद लेकर हम डडूका बड़े भारी मन से लौटे। माताजी के मांगलिक सानिध्य में बीते ये तेरह दिन हम सब की अनमोल थाती हैं। दिगंबर जैन पाठशाला के बच्चे सोनल दीदी द्वारा दिए गए तत्वज्ञान और व्यावहारिक ज्ञान को जीवन में अपनाने को संकल्प बद्ध हैं। हमें भविष्य में भी ऐसे संतों, साध्वियों का सानिध्य मिलता रहे, जो हमारे जीवन पथ को आलोकित करता रहे।</p>
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		<title>कर्म को प्रधान बताने वाले दार्शनिक का जन्म एवं तप कल्याणक मनाया: श्री वर्धमान दिगंबर जैन विकास समिति की ओर से हुआ कार्यक्रम </title>
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		<pubDate>Mon, 24 Mar 2025 12:51:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन मंदिरों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव धार्मिक उल्लास से मनाया गया। श्री वर्धमान दिगंबर जैन विकास समिति की ओर से दिगंबर जैन मंदिर पिपलाई में जलाभिषेक और शांतिधारा की गई। भगवान आदिनाथ की विशेष पूजा भी की गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजनों भाग लिया। बामनवास [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन मंदिरों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव धार्मिक उल्लास से मनाया गया। श्री वर्धमान दिगंबर जैन विकास समिति की ओर से दिगंबर जैन मंदिर पिपलाई में जलाभिषेक और शांतिधारा की गई। भगवान आदिनाथ की विशेष पूजा भी की गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजनों भाग लिया। <span style="color: #ff0000">बामनवास से पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बामनवास।</strong> ब्लॉक में स्थित सभी जैन मंदिरों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव धार्मिक उल्लास से मनाया गया। श्री वर्धमान दिगंबर जैन विकास समिति की ओर से दिगंबर जैन मंदिर पिपलाई में सबसे पहले बृजेंद्र कुमार जैन, सुनील कुमार जैन, आशीष जैन ने भगवान का जलाभिषेक किया। शांतिधारा का सौभाग्य बृजेंद्र कुमार जैन को प्राप्त हुआ। इसके बाद ऋषभदेव भगवान की विशेष पूजा की गई। शाम को महाआरती रखी गई। जिसमें सभी श्रावक-श्राविकाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस अवसर पर श्री वर्धमान दिगंबर जैन विकास समिति के मंत्री एवं सदस्य सुनीलकुमार जैन और आशीष जैन ने बताया कि जैन संस्कृति में भगवान ऋषभदेव को इस युग का आदि प्रवर्तक माना जाता है। इसलिए उनको आदिनाथ भी कहा जाता है। ऋषभदेव चौबीस तीर्थंकरों में सबसे पहले तीर्थंकर थे। सबसे बड़े पुत्र भरत के नाम से इस देश का नाम प्राचीन काल में भारत पड़ा। दूसरे पुत्र बाहुबली नाम से प्रसिद्ध थे। जिनकी सत्तावन फीट ऊंची एक पत्थर पर उकेरी गई प्रतिमा कर्नाटक के श्रवणबेलगोल में पहाड़ी पर बनी हुई है। स्थानीय लोगों में यह भगवान गोमट्टेश के नाम से प्रसिद्ध हैं। यह संसार के सबसे सुंदर प्रतिमाओं में गिनी जाती है और देश-विदेश से लाखों पर्यटक इसको देखने आते हैं।</p>
<p><strong> तुच्छ और सूक्ष्म जीवों की रक्षा करना भी सिखाया</strong></p>
<p>इस अवसर पर प्रवक्ता बृजेंद्रकुमार जैन ने बताया कि भगवान ऋषभदेव ने लौकिक जगत में स्वयं, परिवार, समाज और धर्म के शत्रु से रक्षा करने के लिए अस्त्र-शस्त्र चलाना भी सिखाया। वहीं दूसरी ओर ऋषभदेव ने सुरक्षा और आत्मरक्षा का भी पाठ पढ़ाया था। आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने के लिए चींटी से भी तुच्छ और सूक्ष्म जीवों की रक्षा करना भी सिखाया। उन्होंने ‘जियो और जीने दो’ का संदेश दिया। जिस संदेश को अंतिम और चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी ने आगे बढ़ाया। रमेशचंद जैन और विनोदकुमार जैन ने बताया कि भगवान ऋषभ देव ने सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, तप और अपरिग्रह-रूप महान आदर्शों द्वारा ही उन्होंने मानव कल्याण की प्रेरणा दी। उनके जीवन के कण-कण में मानवता के प्रति असीम प्रेम करुणा और अभ्युदय की अनंत अभिलाषा प्रगट होती है। उन्होंने मनुष्य जन्म से नहीं बल्कि कर्म से महान बनने की प्रेरणा दी।</p>
<p><strong>कार्यक्रम में यह समाजजन मौजूद रहे। </strong></p>
<p>मानव के बीच समानता की भावना एवं कर्म श्रेष्ठता का सिद्धांत स्थापित किया और प्रत्येक प्राणी में एक ज्योतिर्मयी अनंत शक्ति रूप आत्मतत्व की सत्ता को बताकर सारे भेदभावों को समाप्त किया। इस अवसर पर सुमनलता जैन, आशा जैन, रजनी जैन, सपना जैन, एकता जैन, रश्मि जैन, मेघना जैन, दीक्षिता जैन, वर्णिका जैन, जिनेंद्र जैन, अमित जैन, अभिनंदन जैन, भव्य जैन और अयांश जैन सहित कई श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।</p>
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