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	<title>Jain Sadhu श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>Jain Sadhu श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>दैलवारा के लिए हुआ मंगल विहार : उपाध्याय विशोक सागर ससंघ की हुई प्रभावना पूर्ण अगुवाई </title>
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		<pubDate>Thu, 13 Apr 2023 14:07:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उपाध्याय विशोक सागर महाराज, मुनि विनिवोध सागर महाराज, क्षुल्लक विभ्रद सागर महाराज का दिगम्बर जैन पार्श्वनाथ मंदिर इलाइट में प्रवेश हुआ, जहां समाज के लोगों ने विराजमान आर्यिका विपुलमति माता जी एवं विमुक्तमति माता जी के साथ प्रभावना पूर्वक अगुवाई की। पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट&#8230; ललितपुर। गणाचार्य विरागसागर महाराज संघस्थ नगर गौरव उपाध्याय विशोक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>उपाध्याय विशोक सागर महाराज, मुनि विनिवोध सागर महाराज, क्षुल्लक विभ्रद सागर महाराज का दिगम्बर जैन पार्श्वनाथ मंदिर इलाइट में प्रवेश हुआ, जहां समाज के लोगों ने विराजमान आर्यिका विपुलमति माता जी एवं विमुक्तमति माता जी के साथ प्रभावना पूर्वक अगुवाई की। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर।</strong> गणाचार्य विरागसागर महाराज संघस्थ नगर गौरव उपाध्याय विशोक सागर महाराज, मुनि विनिवोध सागर महाराज, क्षुल्लक विभ्रद सागर महाराज का दिगम्बर जैन पार्श्वनाथ मंदिर इलाइट में प्रवेश हुआ, जहां समाज के लोगों ने विराजमान आर्यिका विपुलमति माता जी एवं विमुक्तमति माता जी के साथ प्रभावना पूर्वक अगुवाई की। इससे पहले आदिनाथ मंदिर में विराजमान उपाध्याय श्री विशोक सागर महाराज ने ससंघ श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर इलाइट के लिए विहार किया। उनके साथ मंदिर प्रबंधक मंदिर प्रबंधक सुवेन्दु बंट, जितेन्द्र जैन राजू, सत्येन्द्र जैन गदयाना सहित अनेकों श्रावकों ने मुनि संघ का पदविहार कराया। स्थान-स्थान पर मुनि संघ की आरती उतारी गई और श्रावकों ने आशीर्वाद ग्रहण किया। पार्श्वनाथ इलाइट मंदिर पर मुनि संघ की अगुवाई विराजमान आर्यिका विपुल मति माता जी एवं विमुक्त मति माता जी ने समाज श्रेष्ठियों के साथ की।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-42168" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230413-WA0030.jpg" alt="" width="888" height="923" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230413-WA0030.jpg 888w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230413-WA0030-289x300.jpg 289w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230413-WA0030-768x798.jpg 768w" sizes="(max-width: 888px) 100vw, 888px" /></p>
<p><strong>इन्होंने किया पुण्यार्जन</strong></p>
<p>उपाध्याय मुनि श्री विशोक सागर महाराज के मुखारविन्द से मंदिर जी में शान्तिधारा हुई, जिसका पुण्यार्जन महायज्ञनायक भागचंद, राकेशजैन, राजकमल परिवार, यज्ञनायक वीरेन्द्र कुमार, आशीष कुमार बछरावनी परिवार, महेन्द्र चुनगी संस्कारवेली परिवार, नवीन संजीव जैन म्यूजिक महल, जयकुमार आदर्श मोबाइल परिवार ने की। दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र सतोदय तीर्थ के अध्यक्ष सतीश जैन बंटी, महामंत्री मनोज जैन, बबीना कोषाध्यक्ष विजय जैन लागौन ने मुनि संघ को श्रीफल भेंटकर सानिध्यता हेतु आग्रह किया।</p>
<p><strong>ये रहे मौजूद</strong></p>
<p>इस मौके पर प्रमुख रूप से जैन पंचायत अध्यक्ष अनिल जैन, अंचल महामंत्री डॉ. अक्षय टडैया, मंदिर प्रबंधक राजकुमार जैन खिरिया, वीरेन्द्र जैन बछरावनी, धार्मिक संयोजक मनोज जैन बबीना, मीडिया प्रभारी अक्षय अलया, निहाल चंद जैन, प्रदीप जैन खिरिया, भागचंद जैन, राहुल खजुरिया, राहुल जैन, मनोज जैन बूचा, आदि मौजूद रहे।</p>
<p><strong>हुआ विहार</strong></p>
<p>सायंकाल उपाध्याय विशोक सागर महाराज का इलाइट मंदिर से दैलवारा के लिए विहार हुआ प्रातःकाल मुनि संघ का अतिशय क्षेत्र सतोदय में मंगल प्रवेश होगा। इसके पूर्व उपाध्याय श्री ने अभिनंदनोदय तीर्थ पहुंचकर नवनिर्मित जिनालय के दर्शन किए और वहां की मूर्तिकला को अनुपम बताया।</p>
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		<title>आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के दीक्षा दिवस 31 मार्च पर विशेष :  सराकोद्धारक व सराको के राम नाम से हुए प्रसिद्ध </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Mar 2023 10:38:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुरैना में 01 मई 1957 को श्री शांतिलाल जैन (विचपुरी वाले) के घर मां श्रीमती अशर्फी देवी की कुक्षी से एक बालक का जन्म हुआ। पंडित जी ने बालक की कुंडली बनाकर नाम रखा उमेश। यही उमेश आगे चलकर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए। आपने भगवान महावीर स्वामी जन्मकल्याणक के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुरैना में 01 मई 1957 को श्री शांतिलाल जैन (विचपुरी वाले) के घर मां श्रीमती अशर्फी देवी की कुक्षी से एक बालक का जन्म हुआ। पंडित जी ने बालक की कुंडली बनाकर नाम रखा उमेश। यही उमेश आगे चलकर आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए। आपने भगवान महावीर स्वामी जन्मकल्याणक के पावन अवसर पर चैत सुदी तेरस 31 मार्च, 1988 को श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी में आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण की। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनोज जैन नायक का यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना, मनोज जैन नायक।</strong> चम्बल अंचल की पावन व पवित्र वसुन्धरा पर संस्कारधानी धर्म नगरी मुरैना में 01 मई 1957 को श्री शांतिलाल जैन (विचपुरी वाले) के घर मां श्रीमती अशर्फी देवी की कुक्षी से एक बालक का जन्म हुआ। पंडित जी ने बालक की कुंडली बनाकर नाम रखा उमेश। बालक उमेश प्रारम्भ से ही धार्मिक संस्कारों से प्रभावित रहे। आप शुरू से ही देव- शास्त्र -गुरु की भक्ति में मग्न रहते थे।</p>
<p><strong>विरासत में मिली प्रेरणा</strong></p>
<p>आपको संयम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा विरासत में ही मिली थी। आपके बाबा शंकरलाल जी (क्षुल्लक वर्धमान सागर) एवं मुरैना के श्री गोपाल दिगम्बर जैन संस्कृत महाविद्यालय से प्राप्त शिक्षा व संस्कारों का ऐसा प्रभाव रहा कि आपको आधुनिक भौतिक परिवेश व सांसारिक सुख भी प्रभावित नहीं कर सका। मात्र 19 वर्ष की अल्पआयु में गृह त्यागकर संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से ग्राम वीरमपुर-अजमेर में सन 1974 में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार कर संयम के मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प लिया।</p>
<p>आपके दृढ़ निश्चय को देखते हुए 5 नवम्बर, 1976 को श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी में आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज ने आपको क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की और नाम रखा क्षुल्लक गुण सागर जी महाराज। दीक्षा लेने के बाद अपने जैन शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। आपकी क्षुल्लक अवस्था की उत्कृष्ट साधना से अनेक धर्मानुरागी बन्धु प्रभावित हुए।</p>
<p>उनमें से जयकुमार एवं वीरेंद्र जी ने तो आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से मुनिदीक्षा ग्रहण की और मुनिश्री सुधासागर जी व मुनिश्री क्षमासागर जी महाराज के रूप में साधनारत हैं। दीक्षा लेने के बाद सन 1979 में मानस्तम्भ पंचकल्याणक महोत्सव के अवसर पर आचार्य श्री विद्यासागर जी के साथ एक दिन के अल्पप्रवास पर आप मुरैना आये थे। क्षुल्लक अवस्था में आपने कभी भी वाहन का उपयोग नहीं किया और न ही कभी दुपट्टे का उपयोग किया।</p>
<p><strong>दुर्गम स्थानों पर पद विहार</strong></p>
<p>भगवान महावीर स्वामी जन्मकल्याणक के पावन अवसर पर चैत सुदी तेरस 31 मार्च, 1988 को श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी में आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण की। नाम रखा गया मुनिश्री ज्ञानसागर जी महाराज। पूज्य गुरुदेव ने आपकी प्रतिभा को देखते हुए आपको उपाध्याय पद से विभूषित किया। आपने दुर्गम स्थानों में पद विहार करते हुए जैन धर्म से विमुख हुए सराक बन्धुओं को पुनः समाज की धारा में लाने का सतत प्रयास किया। इसी कारण आप सराकोद्धारक व सराको के राम नाम से प्रसिद्ध हुए। श्री अतिशय क्षेत्र बड़ागांव (बागपत) त्रिलोकतीर्थ धाम में 27 मई 2013 में आपको आचार्य श्री शांतिसागर (छाणी) परम्परा के षष्ट पट्टाचार्य के रूप में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया।</p>
<p><strong>ऐसा हुआ ज्ञानतीर्थ का निर्माण</strong></p>
<p>सराकोद्धारक षष्ट पट्टाचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के परम भक्त अनूप जैन भण्डारी मुरैना ने बताया कि दिगम्बर अवस्था में पूज्य गुरुदेव अपनी जन्मस्थली मुरैना में पहलीबार 26 जनवरी 2003 में अतिशय क्षेत्र सिहोनियां जी पंचकल्याक महोत्सव के निमित्त आये थे। तब पूज्य गुरुदेव की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से ए बी रोड मुरैना में ज्ञानतीर्थ जैन मंदिर निर्माण हेतु जमीन खरीदी गई और ज्ञानतीर्थ निर्माण की आधार शिला रखी गई। पूज्य आचार्य श्री के सान्निध्य में मुरेना नगर में श्री नन्दीश्वरदीप पंचकल्याणक 3 फरवरी 2006 में हुआ और ऐतिहासिक नगर गजरथ निकाला गया। वर्ष 2016 में पूज्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का ज्ञानतीर्थ मुरैना में चातुर्मास हुआ। गुरुदेव के ज्ञानतीर्थ आने से ज्ञानतीर्थ के निर्माणकार्य में गति आई। ज्ञानतीर्थ के शिखर पर बड़े बाबा श्री आदिनाथ की विशाल एवं भव्य पदमासन मूर्ति 14 जुलाई 2016 को विराजमान की गई। ज्ञानतीर्थ जैन मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के पूर्व ही गुरुदेव ने धर्म प्रभावना हेतु विहार कर दिया।</p>
<p><strong>साधना करते हुए मोक्षगामी</strong></p>
<p>विधि के विधान को कौन टाल सकता है। गुरुदेव विहार करते हुए कोटा के नजदीक अतिशय क्षेत्र वांरा (राज.) पहुंचे और वहीं पर अपने अंतिम वर्षायोग में साधना करते हुए भगवान महावीर निर्वाण दिवस की पावन बेला में कार्तिक कृष्ण अमावस्या 15 नबंवर 2020 को समाधि को प्राप्तकर मोक्षगामी हो गए। सप्तम पट्टाचार्य श्री ज्ञेयसागर जी महाराज, आचार्य श्री विनीत सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में एवं स्वस्तिधाम प्रणेत्री गुरुमां श्री स्वस्तिभूषण माताजी के पावन निर्देशन में 01 फरवरी से 06 फरवरी 2023 तक मुरैना ज्ञानतीर्थ जैन मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। आज 31 मार्च को ऐसे पूज्य गुरुदेव श्री ज्ञानसागर जी महाराज के दीक्षा दिवस पर उनके चरणों में कोटि-कोटि नमन।</p>
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		<title>समाधिस्थ आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज को याद दिया : पुण्य स्मृति दिवस पर हुए अनेकों कार्यक्रम </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Mar 2023 17:31:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[समाधिस्थ आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज की पुण्य स्मृति दिवस पर फल वितरण एवं भंडारे का आयोजन किया गया। यह आयोजन श्री सृष्टि भूषण माताजी के सानिध्य में हुआ। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230; अम्बाह। समाधिस्थ आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज की पुण्य स्मृति दिवस पर फल वितरण एवं भंडारे का आयोजन किया [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>समाधिस्थ आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज की पुण्य स्मृति दिवस पर फल वितरण एवं भंडारे का आयोजन किया गया। यह आयोजन श्री सृष्टि भूषण माताजी के सानिध्य में हुआ। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अम्बाह।</strong> समाधिस्थ आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज की पुण्य स्मृति दिवस पर फल वितरण एवं भंडारे का आयोजन किया गया। छाणी परम्परा के पंचम पट्टाचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज की परम प्रभावक शिष्या आर्यिका श्री सृष्टि भूषण माताजी संघ सानिध्य में पूज्य गुरुदेव की समाधि पर प्रातः परेड जैन मंदिर में दीप प्रज्वलन एवं मंगलाचरण अशोका देवी जैन ने किया। उसके बाद आर्यिका श्री 105 सृष्टि भूषण माताजी ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज एक सिध्दांतवादी सन्त थे।</p>
<p>उन्होंने अनेकों शहरों में मंदिरों के निर्माण की प्रेरणा दी और पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव कराये। पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज का अम्बाह के पास बरबाई गांव में जन्म हुआ था। आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज ने 14 मार्च 2013 को शकरपुर दिल्ली में समाधिपूर्वक मरण कर इस नश्वर देह का त्याग किया था। पूज्य आचार्य श्री का जितना विशाल एवं अगाध व्यक्तित्व था, उनका कृतित्व उससे भी अधिक विशाल था। आपने अतिशय बड़ागांव में त्रिलोकतीर्थ धाम की रचना कर एक अद्भुत कृति प्रदान की है। विश्व में प्रथमवार सिंहरथ का संचालन कर आपने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था।</p>
<p>आचार्य श्री के कर कमलों द्वारा अनेक भव्य जीवों ने जैनेश्वरी दीक्षा अंगीकार कर अपना जीवन धन्य किया। इस पुण्य स्मृति दिवस पर परेड जैन मंदिर में भंडारे का आयोजन किया गया। सभी को फल वितरित किये गए। रात्रि 7 बजे आरती एवं भजन संध्या एवं आधे घंटे का णमोकार मंत्र का सामूहिक पाठ भी किया गया, जिसमें महिलाएं, पुरुष, बच्चे सभी सम्मिलित हुए ।</p>
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		<title>मुनि सुधासागर जी महाराज के प्रवचन : अंतरचेतना ही होती है कल्याणकारी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Mar 2023 13:50:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि हम जिन रास्तों पर चल रहे हैं, वह रास्ते अंजाने हैं। जाने हुए रास्तों पर चलना कोई बड़ी बात नहीं है, जो रास्ते हम जानते हैं वह आज तक किसी मंजिल पर नहीं पहुंचे हैं। पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट&#8230; टीकमगढ़। पारसनाथ दिगंबर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि हम जिन रास्तों पर चल रहे हैं, वह रास्ते अंजाने हैं। जाने हुए रास्तों पर चलना कोई बड़ी बात नहीं है, जो रास्ते हम जानते हैं वह आज तक किसी मंजिल पर नहीं पहुंचे हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टीकमगढ़।</strong> पारसनाथ दिगंबर जैन, मंझार मंदिर में निर्यापक मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज एवं क्षुल्लक गंभीर सागर जी महाराज विराजमान हैं। प्रतिदिन मुनि श्री के प्रवचन एवं शाम को जिज्ञासा समाधान का आयोजन किया जा रहा है। मंच संचालन अमित भैया, जबलपुर द्वारा किया जा रहा है। मंझार जैन मंदिर के नव निर्माण की तैयारी चल रही है। शनिवार को मुनि श्री 8:30 बजे मंच पर विराजमान हुए।</p>
<p>मुनि श्री के पाद प्रक्षालन एवं चित्र आनावरण एवं शास्त्र भेंट का कार्यक्रम संपन्न हुआ। मुनि श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि हम जिन रास्तों पर चल रहे हैं, वह रास्ते अंजाने हैं। जाने हुए रास्तों पर चलना कोई बड़ी बात नहीं है, जो रास्ते हम जानते हैं वह आज तक किसी मंजिल पर नहीं पहुंचे हैं। हम उन रास्तों को रास्ते मानते हुए जिंदगी समाप्त कर देते हैं।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39225" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230304-WA0025.jpg" alt="" width="1280" height="960" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230304-WA0025.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230304-WA0025-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230304-WA0025-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230304-WA0025-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230304-WA0025-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230304-WA0025-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230304-WA0025-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230304-WA0025-990x743.jpg 990w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि मरते समय व्यक्ति अधूरा मरता है, अतृप्त होकर मरता है। हमें लगता जैसे भी कुछ और बाकी है, प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिंदगी को पूर्ण तृप्त नहीं छोड़ता है। सोचता है कि मैं पूर्ण हो जाऊंगा लेकिन पूर्ण नहीं होता। गर्मी में जब प्यास लगती है तो हम पानी पीकर पेट तो भर लेते लेकिन कंठ सूखा रह जाता। हमें पानी पीने की इच्छा तो है लेकिन पेट भरा हुआ है। इसी प्रकार इस जिंदगी में होता है। कुछ करने की इच्छा है लेकिन करने लायक रहा नहीं। चलने की इच्छा है लेकिन चलने लायक रहा नहीं। कुछ देखने की इच्छा है लेकिन देखने लायक रहा नहीं।</p>
<p>कुछ सुनने की इच्छा है लेकिन सुनने लायक नहीं रहा। कुछ ऐसा मन है कि मैं कुछ और करूं लेकिन करने लायक नहीं रहा। यह जीवन का अटल सत्य है। मुनि श्री ने कहा कि महावीर भगवान का जीव 10 भव पहले खूंखार शेर की पर्याय में था। एक दिन वह जीवित हिरण को पकड़कर फाड़ रहा था। उसी समय आकाश मार्ग से दो मुनिराज निकले। उन्होंने यह दृश्य देखा। उनके मन में विचार आया यह शेर तो बड़ा पापी है, निर्दयी है लेकिन मुनिराज ने उस शेर को पापी कहके संबोधित नहीं किया।</p>
<p>उससे कहा, अहो भावी तीर्थंकर, अहो भावी भव्य जीव, अहो आसन भव्य जीव कह कर संबोधित किया। मुनिराज के शब्द सुनकर शेर का जीव कहता है, मुझे तो आज तक किसी ने अच्छा नहीं कहा। आप कौन हैं जो मुझे अच्छे से संबोधित कर रहे हैं। मुनिराज के शब्द शेर की समझ में नहीं आए लेकिन गुरु की भाव वाचना को शेर ने भली-भांति समझ लिया। मुनि श्री ने कहा कि साधु की जो अंतर चेतना होती है और बहुत ताकतवर होती है। वह आत्म कल्याण करने वाली होती है और साधु के अंदर जो वेदना होती है, बहुत खतरनाक होती है।</p>
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		<title>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज : वर्तमान युग में भी चारित्र चक्रवर्ती प्रथम आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की बनाई हुई चर्या का कर रहे हैं पालन </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Feb 2023 08:12:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज जी के 55वे संयम वर्ष वर्धन दिवस पर विशेष (संयम दीक्षा दिवस &#8211; फागुन कृष्णा 8 अष्टमी, 24 फरवरी 1969) आपका व्यक्तित्व अनेक विशेषताओं से भरा हुआ है। आपकी निर्भय एवं निरीहवर्ति समन्वित सम दृष्टि इस आशय का द्योतक है कि निर्धन और श्रीमंत आदि सभी के प्रति [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज जी के 55वे संयम वर्ष वर्धन दिवस पर विशेष (संयम दीक्षा दिवस &#8211; फागुन कृष्णा 8 अष्टमी, 24 फरवरी 1969)</strong></p>
<hr />
<p><strong>आपका व्यक्तित्व अनेक विशेषताओं से भरा हुआ है। आपकी निर्भय एवं निरीहवर्ति समन्वित सम दृष्टि इस आशय का द्योतक है कि निर्धन और श्रीमंत आदि सभी के प्रति आपका समान व्यवहार है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए उनकी संघस्थ शिष्या आर्यिका श्री महायशमति माताजी का विशेष आलेख</span></strong></p>
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<p>परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल परम्परा के पंचम पट्टाधीश आचार्य गुरुवर श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज जी हैं।</p>
<p>आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज द्वारा आरोपित चरित्र रूपी पौधे की वृद्धि एवं रक्षा आचार्य श्रीवीर सागर जी महाराज, आचार्य श्री शिव सागर, आचार्य श्री धर्म सागर, आचार्य श्री अजित सागर जी महाराज के द्वारा अभी तक हुई हैं। पूर्वाचार्यों द्वारा अभिसिंचित उस चारित्र वृक्ष ने वर्तमान में विशाल रूप धारण किया है और उसका संरक्षण, सिंचन एवं संवर्धन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी बहुत ही कुशलता से कर रहे हैं।</p>
<p><strong>महान शासन पद्धति</strong></p>
<p>आपकी शासन पद्धति अपने आप में बहुत ही महान है। आप के शासन में इस निकृष्ट काल लिखकर तत्काल में भी पूर्वाचार्यों के समान विशाल संघ एक सूत्र में अनुबद्ध है। आपके हृदय में स्थित मृदुता की प्रतीक सरल, स्पष्ट एवं मृदु वाणी, हास्य युक्त प्रसन्न मुख- मुद्रा से प्रभावित होकर अनेक भव्य आत्मा अपने पापों का पक्षालन करते हुए जीवन सफल एवं धन्य मनाते हैं।</p>
<p><strong>विशेष है व्यक्तित्व</strong></p>
<p>आपका व्यक्तित्व अनेक विशेषताओं से भरा हुआ है। आपकी निर्भय एवं निरीहवर्ति समन्वित सम दृष्टि इस आशय का द्योतक है कि निर्धन और श्रीमंत आदि सभी के प्रति आपका समान व्यवहार है। इस प्रकार आपके ज्योतिर्मय जीवन की जगमगाती ज्योति से आज कितने ही प्राणी अपने आत्म ज्योति का अन्वेषण कर रहे हैं और करते रहेंगे। आपकी अथाह महिमा को प्रदर्शित करना अशक्य है। मैं छोटी सी शिष्या आचार्य श्री के चरणों में त्रिकाल नमोस्तु करती हूं</p>
<p>तथा मन के कुछ भावों के श्रद्धा सुमन को अर्पित करती हुई भावना करती हूं कि गुरुदेव शतायु होकर हमें मार्गदर्शन देते रहें। आपके द्वारा प्रदत आर्यिका व्रत आपकी पुनीत छत्र छाया में निर्दोष पलता रहे। आपके संपर्क में जो व्यक्ति एक बार आ गया, वह आपकी सौम्य प्रशांत मूर्ति को विस्मृत नहीं कर सकता।आपका व्यवहार पक्ष जितना सुंदर और सबल है, उतना ही आध्यात्मिक पक्ष प्रबल है। समता आपके व्यवहार में सहचरिणी के रूप में रहती है। सच तो यह है कि आप की मधुर वाणी सौम्य छवि ने वात्सल्यता के कारण जन-जन के हृदय में अपना स्थान बना लिया है। आपके निर्मल मन की आभा ने लोगों को अपनी ओर खींच लिया है और आपकी सरलता और भद्रता ने देश व समाज पर मानो जादू कर दिया है। आपके जीवन का प्रत्येक क्षण उच्च साधना का परिचय देता है क्योकि मिथ्यान्धकार से ग्रसित जीवों को आप अपने आलोक से प्रकाश प्रदान करने में सूर्य व्रत सिद्ध हुए हैं।</p>
<p><strong>रत्नत्रय की निधि में आलोकित</strong></p>
<p>पूज्य गुरुदेव लोकानुरंजन से दूर रहते हैं और रत्नत्रय की निधि में आप सदा आलोकित रहते हैं।आप की आगम निष्ठा एवं तपश्चरण अग्नि सराहनीय है। तभी तो आज दिगंबर साधु समुदाय में आपका जीवन अत्यंत गौरवपूर्ण श्रद्धा के आधार का केंद्र बना हुआ है। वर्तमान की भौतिकता के युग में भी आप चतुर्थ काल के जैसी चर्या या यूं कहें कि चारित्र चक्रवर्ती प्रथम आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की बनाई हुई आगम परंपरा के अनुसार चर्या का पालन कर रहे हैं और संघ के साधुओं से करवा रहे हैं। आप इस युग के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिसकी दिव्य दृष्टि सदा सदैव बनी रहेगी।</p>
<p><strong>दिव्य ज्योति करुणा के सागर</strong></p>
<p>वीतराग वाणी को जीवन में आकार रूप देने वाले आर्त और रौद्र ध्यान से दूर रहने वाले स्व पर कल्याण में दत्तचित पत्ती की तरह रहने वाले साधना में सर्वोच्च स्थान रखने वाले प्रेरणास्पद व्यक्तित्व के धनी दिव्य ज्योति करुणा के सागर प्रवचन पटू शांत स्वभावी भद्र परिणामी ज्ञान ध्यान तप में सदा रहने वाले, सहिष्णुता की साकार मूर्ति अद्वितीय संत&#8230; बस यही है आपका जीवन परिचय। जो स्वयं मोह को छोड़कर कुल पर्वतों के समान पृथ्वी का उद्धार करने वाले हैं। जो समुद्र के समान स्वयं धन की इच्छा से रहित होकर रत्नों के स्वामी हैं तथा जो आकाश के समान व्यापक होने से किसी के द्वारा स्पष्ट ना होकर विश्व की विश्रांति के कारण हैं। ऐसे अपूर्व गुणों के धारक पुरातन पूर्वाचार्यों के समान उनके गुणों का अनुकरण करने वाले महान आचार्य परमेष्ठी हैं। निर्ग्रन्थ चर्या में वैसे तो प्रत्येक युग में कठिन चर्या रही है किंतु इस कलियुग में तो ओर भी कठिन हो गई है क्योंकि इस भौतिक युग में लोगों की भोग लिप्सा प्राणियों में आत्म रुचि तथा संसार से विरक्त नहीं होने देती है।</p>
<p><strong>आचार्य श्री सोमदेव ने कहा भी है&#8230;</strong></p>
<p>इस कलिकाल में मनुष्यों का चित्त चंचल हो गए धर्म में उपयोग- स्थिर नहीं रहता तथा शरीर अन्न का कीड़ा बन गया है तथापि आज भी बड़ा आश्चर्य है कि आज भी जिनेद्र रूप के धारक निर्ग्रन्थ साधु पाए जाते हैं।</p>
<p><strong>यह सब प्रताप आचार्य शांतिसागर महाराज का है।</strong></p>
<p>साधूना दर्शनम पुण्यं तीर्थ भूता ही साधक कालेन फलति तीर्थ सद्य साधो समागम</p>
<p><strong>यानी</strong></p>
<p>साधु के दर्शन करने से पुण्य तो होता है क्योंकि साधु तीर्थ स्वरूप हैं। तीर्थ दर्शन तो कालांतर में फलदाई होता है किंतु साधु दर्शन से तत्काल ही फल मिलता है। इसी उक्ति के अनुसार मेरे मन में साधु समागम की उत्कृष्ट भावना घर कर गई और परम शांत वात्सल्य मूर्ति ऋषि राज का दर्शन ही निर्मल दृष्टि का कारण बना। उसी समय जीवन में रत्नत्रय को धारण करके जिनके जैसा बनना है, दृढ़ संकल्प लिया। प्रताप गुरु भक्ति के सब मुक्ति प्राप्त होती है तो क्या उसे सूची पदार्थों की प्राप्ति नहीं हो सकती।</p>
<p><strong>गुरुभक्ति सती मुक्तये शूद्रा कि वा ना साध यति</strong></p>
<p><strong>त्रैलोक्य मूल्यरत्नेन दुर्लभा किम प्रयोजनम</strong></p>
<p>अर्थात गुरुभक्ति से जब मुक्ति प्राप्त होती है तो क्या क्षुद्र पदार्थों की प्राप्ति नहीं हो सकती। जैसा अमूल्य रत्न से तीनों लोक की संपत्ति प्राप्त होती है तो उससे धान्य का छिलका प्राप्त नहीं हो सकता है। इन्हीं विचारों ने मन को प्रेरित किया कि अनादि काल से संसार के दुःखों से संतृप्त मुझ को इन गुरुदेव की भक्ति और इनके चरण सानिध्य में ही संसार समुद्र से पार होने का उपाय प्राप्त हो सकता है। अतः मैंने निर्णय लिया कि अब इन परम गंभीर एवं शांत गुरुवर के सानिध्य में ही अपना जीवन व्यतीत करना है।</p>
<p><strong>श्री शांति सिंधु सी निर्भयता</strong></p>
<p><strong>हो वीर सिंधु सी निर्मलता</strong></p>
<p><strong>शिव सागर सा अनुशासन हो</strong></p>
<p><strong>हो धर्म सिंधु सी निस्पर्हता</strong></p>
<p><strong>संयत वाणी चिंतन शक्ति होअजित सुरिवर सी दृढ़ता</strong></p>
<p><strong>इन सर्व गुणों का संचय हो</strong></p>
<p><strong>वृद्धि गत हो मन की मृदुता</strong></p>
<p><strong>हो मार्ग आपका निष्कंटक</strong></p>
<p><strong>यशवती बने यह परम्परा</strong></p>
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