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	<title>Jain monks &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Jain monks &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>चातुर्मास 29 जुलाई से, संयम और संस्कारों से जुड़ेगा समाज : चार माह तक एक ही स्थान पर रहकर जनजागरण करेंगे जैन साधु-साध्वी </title>
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		<pubDate>Mon, 20 Jul 2026 10:13:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[29 जुलाई से प्रारंभ होने वाला चातुर्मास जैन धर्म का प्रमुख साधना काल है। चार माह तक साधु-साध्वियाँ एक स्थान पर रहकर धर्म, संयम, तप एवं संस्कारों का संदेश देंगे। पढ़िए श्रीफल साथी संपादकीय डेस्क की यह रिपोर्ट। नई दिल्ली। जैन धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधना काल चातुर्मास इस वर्ष 29 जुलाई 2026 से प्रारंभ [&#8230;]]]></description>
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<p style="text-align: left"><strong>29 जुलाई से प्रारंभ होने वाला चातुर्मास जैन धर्म का प्रमुख साधना काल है। चार माह तक साधु-साध्वियाँ एक स्थान पर रहकर धर्म, संयम, तप एवं संस्कारों का संदेश देंगे। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी संपादकीय डेस्क की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p style="text-align: left"><strong>नई दिल्ली।</strong> जैन धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधना काल चातुर्मास इस वर्ष 29 जुलाई 2026 से प्रारंभ होगा। वर्षा ऋतु के चार महीनों में जैन साधु-साध्वियाँ एक ही स्थान पर निवास कर आत्मसाधना, स्वाध्याय, तप, त्याग, प्रवचन एवं धर्मप्रभावना के माध्यम से समाज में संयम, सदाचार, अहिंसा और नैतिक जीवन का संदेश देंगे। इस अवधि में देशभर के जैन मंदिरों, स्थानकों एवं उपाश्रयों में धार्मिक, आध्यात्मिक और संस्कारमूलक कार्यक्रमों का आयोजन होगा।</p>
<p><strong>आगमिक परंपरा का पालन</strong></p>
<p>श्रमण डॉ. पुष्पेंद्र ने बताया कि जैन आगमों के अनुसार वर्षा ऋतु में असंख्य सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती है। अहिंसा की भावना को सर्वोच्च मानते हुए जैन साधु-साध्वियाँ इस काल में विहार नहीं करते, बल्कि एक ही स्थान पर निवास करते हैं। आगमिक व्यवस्था के अनुसार वे चातुर्मास के दौरान निर्धारित सीमा से बाहर नहीं जाते। इस वर्ष पक्खी पर्व होने के कारण चातुर्मास का शुभारंभ 29 जुलाई से होगा।</p>
<p><strong>आत्मजागरण का विशेष अभियान</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि चातुर्मास केवल संतों के स्थिर निवास का समय नहीं, बल्कि समाज के आध्यात्मिक जागरण का चार माह का महाअभियान है। इस दौरान प्रवचन, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, जप, तप, ध्यान, आयंबिल, उपवास, एकासन, पौषध, नवकारसी एवं अन्य धार्मिक आराधनाएँ कराई जाती हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु त्याग, व्रत एवं आत्मसंयम का संकल्प लेकर अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं।</p>
<p><strong>वर्तमान समय में बढ़ा महत्व</strong></p>
<p>श्रमण डॉ. पुष्पेंद्र ने कहा कि आज का समाज तनाव, प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद और मानसिक अशांति जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में चातुर्मास व्यक्ति को संयम, आत्मनिरीक्षण, अनुशासन, सादगी, जीवदया, पर्यावरण संरक्षण, नैतिकता और पारिवारिक संस्कारों से जोड़ने का सशक्त माध्यम है। यह पर्व आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।</p>
<p><strong>सात्विक जीवनशैली का संदेश</strong></p>
<p>चातुर्मास के दौरान सात्विक एवं संयमित भोजन पर विशेष बल दिया जाता है। श्रद्धालु जमीकंद, गरिष्ठ भोजन तथा अनेक तिथियों पर हरी सब्जियों एवं फलों का भी त्याग करते हैं। आयंबिल, उपवास, एकासन, पौषध, सामायिक एवं प्रतिक्रमण जैसी आराधनाओं के माध्यम से आत्मसंयम का अभ्यास किया जाता है।</p>
<p><strong>चातुर्मास के प्रमुख पर्व</strong></p>
<p>चातुर्मास के दौरान अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व मनाए जाएंगे—</p>
<p>&#8211; 29 जुलाई – चातुर्मास प्रारंभ</p>
<p>&#8211; 8 सितंबर – पर्यूषण महापर्व प्रारंभ (श्वेतांबर)</p>
<p>&#8211; 15 सितंबर – संवत्सरी महापर्व एवं दशलक्षण पर्व प्रारंभ (दिगंबर)</p>
<p>&#8211; 25 सितंबर – अनंत चतुर्दशी</p>
<p>&#8211; 18 अक्टूबर – नवपद आयंबिल ओली प्रारंभ</p>
<p>&#8211; 9 नवंबर – भगवान महावीर का 2553वाँ निर्वाण कल्याणक</p>
<p>&#8211; 10 नवंबर – गौतम प्रतिपदा एवं वीर निर्वाण संवत् 2553 का शुभारंभ</p>
<p>&#8211; 14 नवंबर – ज्ञान पंचमी</p>
<p>&#8211; 24 नवंबर – चातुर्मास पूर्णाहुति</p>
<p>इसके अतिरिक्त संतों की जन्म जयंती, पुण्यतिथि, धार्मिक संगोष्ठियाँ, संस्कार शिविर, युवा एवं महिला सम्मेलन तथा सामूहिक आराधनाओं का भी आयोजन होगा।</p>
<p><strong>देशभर में 19 हजार से अधिक साधु-साध्वियाँ</strong></p>
<p>श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रमण संघ की वर्ष 2026 की सूची के अनुसार इस वर्ष संघ में 362 चातुर्मास निर्धारित किए गए हैं। वर्तमान में संघ में 214 साधु एवं 961 साध्वियाँ धर्मप्रभावना में सक्रिय हैं। वहीं देश की चारों प्रमुख जैन परंपराओं—स्थानकवासी, मूर्तिपूजक, तेरापंथ एवं दिगंबर—को मिलाकर लगभग 19 हजार से अधिक साधु-साध्वियाँ धर्म, शिक्षा, संस्कार, अहिंसा और सामाजिक जागरण का कार्य कर रहे हैं।</p>
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		<title>मोरपंख विवाद : लाखों अहिंसक जैन श्रावकों की भावनाएँ आहत : तथ्य आधारित संवाद की उठी मांग </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Jun 2026 15:28:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मोरपंख को लेकर दिए गए बयान के बाद जैन समाज में व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। समाजजनों ने इसे अहिंसा की परंपरा पर प्रश्नचिह्न बताया और तथ्य आधारित संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। पढ़िए डॉ. जयेन्द्र जैन &#8216;निप्पू चन्देरी&#8217; का आलेख । चन्देरी। मोरपंख को लेकर दिए गए एक बयान के बाद [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मोरपंख को लेकर दिए गए बयान के बाद जैन समाज में व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। समाजजनों ने इसे अहिंसा की परंपरा पर प्रश्नचिह्न बताया और तथ्य आधारित संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. जयेन्द्र जैन &#8216;निप्पू चन्देरी&#8217; का आलेख ।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चन्देरी।</strong> मोरपंख को लेकर दिए गए एक बयान के बाद देशभर के लाखों जैन श्रावकों में गहरी पीड़ा और असंतोष व्याप्त है। जैन समाज का कहना है कि अहिंसा और जीवदया उसके मूल सिद्धांत हैं, इसलिए किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाकर धार्मिक कार्यों में उपयोग की कल्पना भी जैन दर्शन के विपरीत है।</p>
<p><strong>भारतीय संस्कृति में मोरपंख का महत्व</strong></p>
<p>जैन समाज के अनुसार भारतीय संस्कृति में मोरपंख का विशेष महत्व रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में मोरपंख का उल्लेख पवित्रता, सौंदर्य और प्रकृति के प्रति सम्मान के प्रतीक के रूप में किया जाता है। जैन साधु-संतों की परंपरा में भी मोरपंख से निर्मित पिच्छिका का उपयोग जीवों की रक्षा और अहिंसा की भावना के साथ किया जाता है।</p>
<p><strong>पिच्छिका का उद्देश्य</strong></p>
<p>समाजजनों का कहना है कि दिगंबर जैन साधु पिच्छिका का उपयोग सूक्ष्म जीवों की रक्षा के लिए करते हैं। यह उपकरण जैन साधना और संयम का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है तथा इसका उद्देश्य किसी जीव को हानि पहुँचाना नहीं, बल्कि अहिंसा का पालन करना है।</p>
<p><strong>तथ्यों के आधार पर समाज का पक्ष</strong></p>
<p>जैन समाज के अनुसार देश में लगभग 1500 श्रमण मुनि हैं और प्रत्येक मुनि वर्ष भर में लगभग 500 से 1000 मोरपंखों से निर्मित पिच्छिका का उपयोग करते हैं। समाज का कहना है कि इस आधार पर लाखों मोरों की हत्या या प्रताड़ना का आरोप तथ्यात्मक रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता, क्योंकि मोर अपने प्राकृतिक जीवनचक्र में स्वयं पंख छोड़ते हैं, जिन्हें परंपरागत रूप से संग्रहित किया जाता रहा है।</p>
<p><strong>संवेदनशीलता और अध्ययन की आवश्यकता</strong></p>
<p>समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि किसी भी धार्मिक परंपरा पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से पूर्व उसके ऐतिहासिक, धार्मिक और व्यावहारिक पक्षों का समुचित अध्ययन किया जाना चाहिए। करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े विषयों पर तथ्यात्मक एवं संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।</p>
<p><strong>अहिंसा और जीवदया का प्रतीक</strong></p>
<p>जैन समाज का मानना है कि मोरपंख किसी हिंसा का नहीं, बल्कि अहिंसा, करुणा और जीवदया का प्रतीक है। समाज ने कहा कि बिना पूर्ण तथ्यों के की गई टिप्पणियाँ लाखों अहिंसक श्रावकों की धार्मिक भावनाओं को आहत करती हैं।</p>
<p><strong>संवाद को मिले प्राथमिकता</strong></p>
<p>समाजजनों ने आग्रह किया कि ऐसे विषयों पर आरोप-प्रत्यारोप के बजाय संवाद, अध्ययन और तथ्य आधारित विमर्श को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि यही मार्ग सामाजिक सौहार्द, धार्मिक सम्मान और पारस्परिक समझ को सुदृढ़ करेगा।</p>
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		<title>मेनका गांधी जैन समाज से माफी मांगें : पिच्छिका संबंधी बयान पर विश्व जैन संगठन और समाजजनों ने जताई आपत्ति </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 Jun 2026 08:27:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पिच्छिका के उपयोग को लेकर दिए गए कथित बयान पर विश्व जैन संगठन एवं राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ से जुड़े पदाधिकारियों और समाजजनों ने आपत्ति जताई है। उन्होंने बयान को निराधार बताते हुए मेनका गांधी से सार्वजनिक क्षमा मांगने की मांग की है। पढ़िए इंदौर ब्यूरो की यह रिपोर्ट। इंदौर। पिच्छिका के उपयोग को [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>पिच्छिका के उपयोग को लेकर दिए गए कथित बयान पर विश्व जैन संगठन एवं राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ से जुड़े पदाधिकारियों और समाजजनों ने आपत्ति जताई है। उन्होंने बयान को निराधार बताते हुए मेनका गांधी से सार्वजनिक क्षमा मांगने की मांग की है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इंदौर ब्यूरो की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। पिच्छिका के उपयोग को लेकर हाल ही में दिए गए कथित बयान पर जैन समाज में नाराजगी देखने को मिल रही है। विश्व जैन संगठन एवं राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ से जुड़े पदाधिकारियों और समाजजनों ने इसे जैन धर्म एवं संस्कृति की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया है।</p>
<p><strong>बयान को बताया निराधार</strong></p>
<p>धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू, वरिष्ठ समाजसेवी सलेकचंद जैन, राकेश जैन, मयंक जैन, डॉ. जैनेन्द्र जैन, अमित कासलीवाल, हंसमुख गांधी, टीके वेद सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों ने संयुक्त रूप से कहा कि संबंधित बयान तथ्यहीन, मनगढ़ंत और अप्रमाणिक है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म अहिंसा, करुणा और जीव संरक्षण के सिद्धांतों पर आधारित है।</p>
<p><strong>पिच्छिका के उपयोग का बताया महत्व</strong></p>
<p>समाजजनों ने कहा कि जैन साधु-संत पिच्छिका का उपयोग सूक्ष्म जीवों की रक्षा और अहिंसा के पालन के लिए करते हैं। उनका कहना है कि यह संयम और जीवदया का प्रतीक है तथा इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार की हिंसा से बचना है।</p>
<p><strong>विशेषज्ञों ने रखे तर्क</strong></p>
<p>डॉ. जैनेन्द्र जैन ने कहा कि जैन धर्म सदैव जीव मात्र की रक्षा का संदेश देता है। समाजजनों ने यह भी कहा कि मोर प्राकृतिक रूप से अपने पंख त्यागता है और परंपरागत रूप से प्राप्त ऐसे पंखों का ही धार्मिक उपयोग किया जाता है।</p>
<p><strong>धार्मिक भावनाएं आहत होने का आरोप</strong></p>
<p>विश्व जैन संगठन और राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि इस प्रकार के वक्तव्यों से जैन समाज की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से तथ्य स्पष्ट करने और समाज से क्षमा मांगने की मांग की है।</p>
<p><strong>कानूनी कार्रवाई की चेतावनी</strong></p>
<p>संगठनों ने कहा कि यदि जल्द ही इस विषय पर स्पष्टीकरण या क्षमा याचना नहीं की जाती है तो आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा। समाजजनों ने सभी समुदायों की धार्मिक मान्यताओं के प्रति सम्मान बनाए रखने की अपील की है।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>साधु-साध्वियों के सुरक्षित विहार के लिए समाजजनों से अपील : साधु-साध्वियों के विहार में संभावित अप्रिय घटनाओं की रोकथाम की जा सकेगी  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/appeal_to_the_community_for_the_safe_movement_of_sadhus_and_sadhvis/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 30 May 2026 14:37:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री दिगंबर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट की ओर से समाजजनों से आह्वान किया गया है कि आगामी चातुर्मास एवं विहार काल को ध्यान में रखते हुए साधु-साध्वियों की सुरक्षा एवं सुगम यात्रा सुनिश्चित करने में सक्रिय सहयोग प्रदान करें। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। श्री दिगंबर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट की ओर से समाजजनों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री दिगंबर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट की ओर से समाजजनों से आह्वान किया गया है कि आगामी चातुर्मास एवं विहार काल को ध्यान में रखते हुए साधु-साध्वियों की सुरक्षा एवं सुगम यात्रा सुनिश्चित करने में सक्रिय सहयोग प्रदान करें। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। श्री दिगंबर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट की ओर से समाजजनों से आह्वान किया गया है कि आगामी चातुर्मास एवं विहार काल को ध्यान में रखते हुए साधु-साध्वियों की सुरक्षा एवं सुगम यात्रा सुनिश्चित करने में सक्रिय सहयोग प्रदान करें। ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल ने जारी पत्र में बताया कि चातुर्मास का समय निकट है और इस अवधि में साधु-संघों एवं आर्यिकाओं का विभिन्न क्षेत्रों में विहार संभावित है। ऐसे में उनके विहार के दौरान सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना समाज का नैतिक एवं सामाजिक दायित्व है। पत्र में समाजजनों से अनुरोध किया गया है कि वे संबंधित क्षेत्रों के जिला प्रशासन, तहसील कार्यालय एवं पुलिस थाने को आवश्यक सूचना प्रदान करें तथा उसकी प्राप्ति पावती भी प्राप्त करें।</p>
<p>साथ ही शासन एवं प्रशासन द्वारा आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित कराने में अपेक्षित सहयोग प्रदान करें। ट्रस्ट ने कहा है कि समाज की सजगता एवं सहयोग से साधु-साध्वियों के विहार के दौरान संभावित अप्रिय घटनाओं की रोकथाम की जा सकेगी तथा उनके सुरक्षित एवं निर्विघ्न विहार में सहायता मिलेगी। ट्रस्ट ने समाज के सभी वर्गों से इस महत्वपूर्ण विषय की गंभीरता को समझते हुए आवश्यक कार्रवाई करने एवं धर्मसंघ की सुरक्षा में सहभागी बनने की अपील की है।</p>
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		<title>केशलोचन के माध्यम से साधुओं ने दिया त्याग, तप और अहिंसा का संदेश: चंद्रपुरी जिनालय में मुनिराजों और आर्यिका माताजी ने श्रद्धालुओं की उपस्थिति में किया केशलोचन, उपवास कर निभाई परंपरा </title>
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		<pubDate>Fri, 29 May 2026 17:06:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जयपुर के चंद्रप्रभ जिनालय, चंद्रपुरी में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के शिष्यों ने विधि-विधान से केशलोचन किया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने त्याग, तप और अहिंसा की अनूठी साधना का साक्षात दर्शन किया। पढ़िए डॉ. राजेश पंचोलिया, की यह खबर जयपुर के बड़ के बालाजी स्थित चंद्रप्रभ जिनालय, चंद्रपुरी में इन दिनों आचार्य श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जयपुर के चंद्रप्रभ जिनालय, चंद्रपुरी में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के शिष्यों ने विधि-विधान से केशलोचन किया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने त्याग, तप और अहिंसा की अनूठी साधना का साक्षात दर्शन किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. राजेश पंचोलिया, की यह खबर</span></strong></p>
<hr />
<p>जयपुर के बड़ के बालाजी स्थित चंद्रप्रभ जिनालय, चंद्रपुरी में इन दिनों आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज का विशाल संघ ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु विराजमान है। संघ में 10 मुनिराज, 20 आर्यिकाएं, 1 ऐलक, 4 क्षुल्लक-क्षुल्लिकाएं सहित कुल 36 साधु-साध्वियां धर्म प्रभावना में संलग्न हैं।</p>
<p><strong>श्रद्धालुओं के समक्ष हुआ केशलोचन</strong></p>
<p>29 मई को अनेक श्रद्धालुओं की उपस्थिति में आचार्य श्री के शिष्य मुनि श्री ध्येयसागर जी, मुनि श्री भुवनसागर जी, मुनि श्री गुणोदयसागर जी एवं आर्यिका श्री पूर्णिमामति माताजी ने केशलोचन किया। इस आध्यात्मिक साधना को देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।</p>
<p><strong>क्या है केशलोचन का महत्व?</strong></p>
<p>संघ के मुनि श्री हितेंद्रसागर जी ने बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु के लिए दो से चार माह के भीतर केशलोचन करना अनिवार्य होता है। यह केवल बाल हटाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि राग, मोह और देहाभिमान को त्यागने का आध्यात्मिक अभ्यास है। केशलोचन दिगंबर साधु जीवन का एक मूल गुण माना जाता है।</p>
<p><strong>अहिंसा का जीवंत स्वरूप</strong></p>
<p>मुनि श्री ने बताया कि जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है। यदि बालों का लोचन नहीं किया जाए तो उनमें सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होने की संभावना रहती है। जीवों की रक्षा और अहिंसा के पालन के लिए साधु केशलोचन करते हैं। यही कारण है कि दिगंबर साधु अहिंसा धर्म के महाव्रती कहलाते हैं।</p>
<p><strong>उपवास के साथ निभाई परंपरा</strong></p>
<p>सुरेश सबलावत एवं भागचंद चूड़ीवाल के अनुसार मुनि श्री ने बताया कि जिस दिन केशलोचन किया जाता है, उस दिन साधु उपवास भी रखते हैं। यह तप, त्याग और आत्मसंयम का अद्भुत संगम होता है।</p>
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		<title>तीर्थंकरों के वर्णों का वर्णन सुन भावविभोर हुए भक्त : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया तीर्थंकर 24 ही क्यों?  </title>
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		<pubDate>Thu, 28 May 2026 12:50:15 +0000</pubDate>
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<p><strong>30 मई तक धर्म संवर्धन संस्कृति शिविर लगाया गया है। इसमें आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, श्री प्रभव सागर जी, श्री मुमुक्षु सागर जी, आर्यिका देवर्धि मति, श्री पद्मयशमति सहित अनेक साधुओं द्वारा तत्व तत्वार्थ सूत्र, छहढ़ाला ,धार्मिक संस्कार प्रथम एवं द्वितीय भाग, भक्तामर स्त्रोत,द्रव्य संग्रह आदि धार्मिक विषयों पर शिक्षण शिविर में उपदेश दिया जा रहा है। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, डॉ.राजेश पंचोलिया की खबर&#8230;</span></strong></p>
<p><strong><del></p>
<hr />
<p></del>जयपुर।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी बड़ के बालाजी में 36 साधुओं सहित ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। श्रावक-श्राविकाओं की भावना रहती हैं कि आचार्य संघ का सानिध्य अधिक से अधिक मिले। इसके उपाय में धार्मिक अनुष्ठान, कार्यक्रम करते हैं ताकि संत समागम अधिक से अधिक समय मिले। जब से गुरुदेव पधारे हैं। नियमित धार्मिक आयोजन हो रहे हैं। सुनीता,भागचंद चूड़ीवाल ने बताया कि 21 से 30 मई तक धर्म संवर्धन संस्कृति शिविर लगाया गया है। इसमें आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, श्री प्रभव सागर जी, श्री मुमुक्षु सागर जी, आर्यिका देवर्धि मति, श्री पद्मयशमति सहित अनेक साधुओं द्वारा तत्व तत्वार्थ सूत्र, छहढ़ाला ,धार्मिक संस्कार प्रथम एवं द्वितीय भाग, भक्तामर स्त्रोत,द्रव्य संग्रह आदि धार्मिक विषयों पर शिक्षण शिविर में उपदेश दिया जा रहा है। जिसमें भक्तों द्वारा भाग लिया जा रहा है। जोबनेर मंगलम सिटी, श्याम नगर, मालवीय नगर आदि से सभी उम्र के भक्त शामिल हो रहे हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने तीर्थंकर के शरीर का वर्ण दोहे के माध्यम से बताया दो गोरे,दो सांवरे, दो हरियल, दो लाल। सोलह प्रतिमा स्वर्ण मई, तिन्हें नवाऊँ भाल।। अर्थात चंद्रप्रभ एवं पुष्पदंत सफेद वर्ण, मुनिसुव्रतनाथ एवं नेमिनाथ श्याम वर्ण/नील वर्ण, पद्मप्रभ एवं वासुपूज्य लाल वर्ण, सुपार्श्वनाथ एवं पार्श्वनाथ हरित वर्ण तथा शेष सोलह तीर्थंकर का पीत वर्ण (तपाए हुए स्वर्ण समान) हैं। सुरेश सबलावत के अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि बाहुबली स्वामी ने तपस्या करके केवलज्ञान और फिर मोक्ष प्राप्त किया था। अतः वे भगवान हैं, लेकिन तीर्थंकर नामकर्म प्रकृति का उन्हें न तो बंध था, न उदय।</p>
<p>अतः वे तीर्थंकर नहीं हैं तीर्थंकर 24 ही क्यों? जब ये प्रश्न किया गया तब उनका उत्तर था- इस मान्यता में कोई अलौकिकता नहीं है क्योंकि, लोक में अनेक ऐसे पदार्थ है जैसे- ग्रह, नक्षत्र, राशि, तिथियां और तारागण जिनकी संख्या काल योग से नियत है, तीर्थंकर सर्वाेत्कृष्ट होते हैं। अतः उनके जन्मकाल योग भी विशिष्ट उत्कृष्ट ही होना चाहिए या होते हैं। ज्योतिषाचार्यों का मत है कि प्रत्येक कल्पकाल के दुषमा सुषमा काल में ऐसे उत्तम योग 24 ही पड़ते हैं, जिसमें तीर्थंकरों का जन्म होता है।</p>
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		<title>आर्यिका श्री महायश मति जी ने किए केश लोच : केशलोचन के माध्यम से शरीर से राग और मोह दूर होता है </title>
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		<pubDate>Thu, 21 May 2026 06:09:28 +0000</pubDate>
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<p><strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 10 मुनिराज, 20 आर्यिकाओं 1 ऐलक, 4 क्षुल्लक -क्षुल्लिका 36 साधुओं सहित जयपुर चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी बड़ के बालाजी में ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। अनेक श्रद्धालुओं के सामने श्री वर्धमान सागर जी की सुशिष्या आर्यिका श्री महायश मति ने गुरुवार को केशलोचन किया। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 10 मुनिराज, 20 आर्यिकाओं 1 ऐलक, 4 क्षुल्लक -क्षुल्लिका 36 साधुओं सहित जयपुर चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी बड़ के बालाजी में ग्रीष्मकालीन वाचना के लिए विराजित हैं। अनेक श्रद्धालुओं के सामने श्री वर्धमान सागर जी की सुशिष्या आर्यिका श्री महायश मति ने गुरुवार को केशलोचन किया। केशलोचन के बारे में संघ की आर्यिका श्री पूर्णिमा मति जी ने चर्चा में बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु को 2 से 4 माह की अवधि के भीतर के केशलोचन करना अनिवार्य है। केशलोच दिगंबर साधु का मूल गुण है। केशलोचन के माध्यम से शरीर से राग और मोह दूर होता है। जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है, बालों का लोचन अगर नहीं किए जाएं तो उसमें छोटे-छोटे जीवों की उत्पत्ति होने की संभावना होती है। जैन साधु अहिंसा धर्म के महाव्रती होते हैं। सुरेश सबलावत भागचंद चूड़ीवाल के अनुसार माताजी ने बताया कि जैन साधु अपरिग्रही होते हैं। इसलिए जैन साधु अपने हाथ से केशलोचन करते हैं। केश लोच से शरीर से ममत्व दूर होता है। केश लोचन के समय तप, संयम, धैर्य के साथ धर्म की प्रभावना होती है। जिस दिन जैन साधु केशलोच करते हैं, उस दिन उपवास करते हैं।</p>
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		<title>सराक क्षेत्र के मंदिरों में सामूहिक पूजन से हो रही धर्म प्रभावना : प्रतिभा सम्मान समारोह के साथ होगा, शिविरों का समापन 20 मई को </title>
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		<pubDate>Tue, 19 May 2026 10:20:21 +0000</pubDate>
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<p><strong>पश्चिम बंगाल,झारखंड, उड़ीसा प्रांत के विभिन्न चरणों में चल रहे ज्ञान संस्कार शिक्षण समिति के अवसर पर जिन मंदिरों में प्रतिदिन सामूहिक पूजन एवं जिन मंदिरों की सुरक्षा एवं स्वच्छता के उद्देश्य को लेकर 20 जिन मंदिर के बाद आज श्री दिगंबर जैन आदिनाथ मंदिर राजामेला पश्चिम बंगाल के मंदिर में सामूहिक अभिषेक पूजन हुआ। <span style="color: #ff0000">बांकुडा सं पढ़िए, मनीष जैन विद्यार्थी की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांकुडा प. बंगाल।</strong> आचार्य श्री ज्ञानसागर जी के अवतरण दिवस के अवसर पर आचार्य श्री ज्ञेयसागर जी महाराज, आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माता जी, आर्यिका श्री आर्ष माताजी, आर्यिका श्री सुज्ञानमती माता जी के आशीर्वाद से ब्र.मंजुला दीदी, ब्र.मनीष भैया के निर्देशन पश्चिम बंगाल,झारखंड, उड़ीसा प्रांत के विभिन्न चरणों में चल रहे ज्ञान संस्कार शिक्षण समिति के अवसर पर जिन मंदिरों में प्रतिदिन सामूहिक पूजन एवं जिन मंदिरों की सुरक्षा एवं स्वच्छता के उद्देश्य को लेकर 20 जिन मंदिर के बाद आज श्री दिगंबर जैन आदिनाथ मंदिर राजामेला पश्चिम बंगाल के मंदिर में सामूहिक अभिषेक पूजन हुआ। मंदिर के व्यवस्थापक लखन जैन सराक ने बताया कि यहां के मंदिर का अभी जीर्णाेद्धार का कार्य हुआ है। मंदिर की व्यवस्थाओं का बड़ा ध्यान रखा गया है। प्रतिदिन पूजन करने 10, 12 लोगों के अलावा बच्चों एवं महिलाएं भी आती हैं। धर्म प्रभावना के इस कार्य में पं. जयकुमार दर्ग, पं. राजकुमार जी कर्द, विदुषी बहन राखी, गोरांग जैन आदि हैं। शिविर और पूजन के समय मिष्ठान वितरण विकास सभा सागर एवं भारतीय जैन मिलन क्षेत्र 10 के सहयोग से हुआ। पं. बंगाल, झारखंड, उड़ीसा प्रांत में आयोजित कार्यक्रमों के मुख्य संयोजक शाहगढ सागर म. प्र. के पं. मनीष शास्त्री विद्यार्थी जिन्होंने मई माह में तीन प्रदेशों में धर्म प्रभावना का कार्य किया।</p>
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		<title>जरूरतमंद जैन विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति रविवार को : फॉर्म वितरण और जमा एक ही दिन होगा </title>
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		<pubDate>Sat, 16 May 2026 06:11:30 +0000</pubDate>
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<p><strong>नगर के दिगंबर जैन आम समाज संगठन की ओर से शैक्षणिक वर्ष 2026-27 के लिए शिक्षा सहायता योजना की शुरुआत की जा रही है। इसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान की जाएगी। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> नगर के दिगंबर जैन आम समाज संगठन की ओर से शैक्षणिक वर्ष 2026-27 के लिए शिक्षा सहायता योजना की शुरुआत की जा रही है। इसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान की जाएगी। प्रमुख संयोजक इंद्रकुमार वीणा सेठी और योजना संयोजक चिराग जैन ने बताया कि योजना से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार से हैं। 17 मई रविवार को दोपहर 1बजे फार्म का वितरण किया जाएगा। यह कार्यक्रम श्री चंदाप्रभु मांगलिक भवन, अंजनी नगर, एरोड्रम रोड पर किया जा रहा है। आवेदन फॉर्म केवल रविवार को ही बांटे जाएंगे और उसी दिन ही भरकर जमा करने होंगे। रविवार के बाद न तो फॉर्म मिलेंगे और न ही स्वीकार किए जाएंगे। यह योजना केवल इंदौर के जैन समाज के आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए है। इसके लिए जरूरी दस्तावेज (छायाप्रति/फोटोकॉपी), पासपोर्ट साइज फोटो (एक), गत वर्ष या अंतिम परीक्षा की अंकसूची, स्कूल या कॉलेज की फीस का विवरण, आधार कार्ड, आर्थिक स्थिति (आय) की सही जानकारी देने वाले दस्तावेज देना अनिवार्य है। इस अभियान में कक्षा 5वीं, 8वीं, 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षा में 90 प्रतिशत या अधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों का कार्यक्रम के दौरान सम्मान किया जाएगा। दिगंबर जैन आम समाज संगठन और श्रुति फाउंडेशन ने समाजजनों से कार्यक्रम में पधारकर इसका लाभ अर्जित करने का आग्रह किया है।</p>
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		<title>भगवान अनंतनाथ जन्म एवं तप कल्याणक: इंदौर के जिनालयों में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब </title>
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		<pubDate>Thu, 14 May 2026 12:58:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनंतनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव आज, 14 मई (ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी) को इंदौर के सभी दिगंबर जैन मंदिरों में पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और हर्षाेल्लास के साथ मनाया जा रहा है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनंतनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव आज, 14 मई (ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी) को इंदौर के सभी दिगंबर जैन मंदिरों में पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और हर्षाेल्लास के साथ मनाया जा रहा है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनंतनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव आज, 14 मई (ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी) को इंदौर के सभी दिगंबर जैन मंदिरों में पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और हर्षाेल्लास के साथ मनाया जा रहा है। सुबह से ही जिनालयों में अभिषेक, शांतिधारा और विशेष पूजन-अर्चन का क्रम जारी है। भक्तगण भगवान के वैराग्य और आत्म-कल्याण के मार्ग को याद कर जीवन को सार्थक बनाने का संकल्प ले रहे हैं।</p>
<p><strong>अयोध्या की पावन धरा पर जन्म और राजसी वैभव का त्याग</strong></p>
<p>जैन पुराणों के अनुसार, भगवान अनंतनाथ जी का जन्म इक्ष्वाकु वंश के महाराज सिंहसेन और माता सुयशा के यहाँ पवित्र नगरी अयोध्या में ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के महान दिन हुआ था। प्रभु के शरीर का वर्ण सुवर्ण के समान कांतिमय था। उनका चिह्न ‘भालू’ (ऋक्ष) है, जो शक्ति और दृढ़ता का प्रतीक है। उन्होंने लंबे समय तक न्यायप्रिय राजा के रूप में प्रजा का संचालन किया। संसार की नश्वरता को देखकर उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने राजसी ठाट-बाट को तिनके के समान छोड़ दिया। ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के ही दिन उन्होंने दीक्षा (तप) अंगीकार की।</p>
<p><strong>तीन वर्ष की कठोर साधना और केवलज्ञान की प्राप्ति</strong></p>
<p>दीक्षा लेने के बाद भगवान अनंतनाथ ने तीन वर्षों तक मौन रहकर कठिन आत्म-साधना की। उन्होंने भूख, प्यास, सर्दी और गर्मी के परीषहों को समभाव से सहा। ध्यान की गहराई में उतरकर उन्होंने चारों घातिया कर्मों का क्षय किया। चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन उन्हें श्केवलज्ञानश् (परम ज्ञान) की प्राप्ति हुई। केवलज्ञान के बाद समवशरण में उनकी दिव्यध्वनि खिरी। उन्होंने संसार के प्राणियों को मुक्ति का शाश्वत मार्ग दिखाया।</p>
<p><strong>जैन धर्म की पुनर्स्थापना और धर्म चक्र का प्रवर्तन</strong></p>
<p>जैन धर्म अनादि-निधन है, लेकिन समय-समय पर तीर्थंकर आकर धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं। भगवान अनंतनाथ ने अपने युग में शिथिल होते जा रहे धर्म मार्ग को पुनर्जीवित किया। उन्होंने ‘अहिंसा परमो धर्मः’ के सिद्धांत को दृढ़ता से स्थापित किया। उनके समवशरण में 50 गणधर थे, जिनमें यश धीर जी मुख्य थे। उन्होंने चतुर्थ काल में मत-मतांतरों के अंधकार को दूर किया। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की महत्ता बताई। उनके काल में लाखों जीवों ने आत्म-कल्याण का मार्ग चुना।</p>
<p><strong>श्रावक-श्राविकाओं के लिए भगवान अनंतनाथ का दिव्य संदेश</strong></p>
<p>भगवान अनंतनाथ जी का संपूर्ण जीवन और उनकी देशना श्रावक-श्राविकाओं के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शिका है। उनका मुख्य संदेश श्अनंतश् आत्म-शक्तियों को जगाने का है। सीमित इच्छाएं, असीम शांतिरू भौतिक वस्तुएं कभी अनंत तृप्ति नहीं दे सकतीं। इच्छाओं को सीमित करके ही शाश्वत सुख पाया जा सकता है। अहिंसा और करुणारू संसार के सभी छोटे-बड़े जीवों के प्रति मन, वचन और काय से दया का भाव रखें। तप और स्वाध्याय प्रतिदिन आत्म-निरीक्षण करें। वासनाओं और कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) को तप की अग्नि में भस्म करें। सत्य और अपरिग्रहरू संचय की प्रवृत्ति का त्याग कर परोपकार में जीवन लगाएं। आज इस पावन कल्याणक महोत्सव पर इंदौर का जैन समाज भगवान अनंतनाथ जी के चरणों में शत-शत नमन करते हुए उनके बताए आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने का संकल्प दोहरा रहा है।</p>
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