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	<title>Jain monk Sudhasagar Maharaj श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>णमोकार मंत्र में ताकत नहीं है, मेरे णमोकार मंत्र में ताकत है- मुनि श्री सुधासागर जी महाराज</title>
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		<pubDate>Sun, 20 Oct 2024 07:17:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रतिक्षण और प्रति समय कुछ नया जीने का कला हमारे अंदर होनी चाहिए; बासी खाना हमें पसंद नहीं होना चाहिए। जो लोग किस्मत के भरोसे जिंदगी जीते हैं, उन्हें मोक्षमार्ग नहीं मिलता, जैसे स्वर्गीय देवता और भोगभूमि के जीव। हमें इस तरह चलना चाहिए कि हर कदम पर रास्ता बन जाए; लीक पर चलना हमें [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रतिक्षण और प्रति समय कुछ नया जीने का कला हमारे अंदर होनी चाहिए; बासी खाना हमें पसंद नहीं होना चाहिए। जो लोग किस्मत के भरोसे जिंदगी जीते हैं, उन्हें मोक्षमार्ग नहीं मिलता, जैसे स्वर्गीय देवता और भोगभूमि के जीव। हमें इस तरह चलना चाहिए कि हर कदम पर रास्ता बन जाए; लीक पर चलना हमें पसंद नहीं है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघाई की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> प्रतिक्षण और प्रति समय कुछ नया जीने का कला हमारे अंदर होनी चाहिए; बासी खाना हमें पसंद नहीं होना चाहिए। जो लोग किस्मत के भरोसे जिंदगी जीते हैं, उन्हें मोक्षमार्ग नहीं मिलता, जैसे स्वर्गीय देवता और भोगभूमि के जीव। हमें इस तरह चलना चाहिए कि हर कदम पर रास्ता बन जाए; लीक पर चलना हमें पसंद नहीं है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि किस्मत अक्सर अपराधियों की होती है, जबकि निरपराधियों की कोई किस्मत नहीं होती। जैसे-जैसे व्यक्ति निरपराधी होता है, उसकी किस्मत बनना बंद होती है, और जैसे-जैसे वह अपराधी होता है, उसकी किस्मत बनना चालू रहती है। जब भी किस्मत लिखी जाती है, वह अपराध का प्रतीक होती है-चाहे किस्मत में पुण्य लिखा हो या पाप। किस्मत हमारे अतीत के दुष्परिणाम का फल है। पुण्य का उदय भी हमें सजा के रूप में देखना चाहिए। मिथ्यादृष्टि पाप से नहीं, बल्कि पाप के फल से भागती है, और पुण्य के फल से भी भागना अज्ञानी का लक्षण है। जो कहता है, &#8220;मैं पाप करूंगा लेकिन उसके फल को भोगने को तैयार रहूँगा,&#8221; मैं उसे सजा नहीं, बल्कि प्रायश्चित्त मानता हूँ। मुझे सजा मिलनी चाहिए, क्योंकि मैंने खोटा कर्म किया है।</p>
<p><strong> अनुभव और आगम एक-दूसरे के विपरीत</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि आनंद कैसे आता है अशुभ कर्मों के उदय में? जिनवाणी मां कहती हैं कि तुम अमर हो, लेकिन अनुभव कहता है कि सांप काटेगा तो तुम मर जाओगे। अनुभव और आगम एक-दूसरे के विपरीत हैं। धर्मात्मा कहता है, &#8220;यह मेरी चुनौती है, मैं धर्म से कभी अलग नहीं होऊँगा।&#8221; मैं हमेशा कहता हूँ कि भगवान में ताकत नहीं है, लेकिन मेरे भगवान में बहुत ताकत है। गुरु में भी ताकत नहीं, लेकिन मेरे गुरु में ताकत है। णमोकार मंत्र में ताकत नहीं, लेकिन मेरे णमोकार मंत्र में ताकत है। इसी दम पर महारानी चेलना ने अपने पति को सम्यकदृष्टि और अहिंसक बना दिया। महानुभाव, यदि तुम्हें गृहस्थी में फंसना पड़े, तो शादी को जेल जाने के समान समझो। अगर शादी करनी पड़े, तो कहो, &#8220;मैं जेल जाऊँगा, लौटते समय 500 मुनिराजों को ले आऊँगा,&#8221; जैसे जम्बुकुमार। बेटियों, तुम भली आर्यिका बना पाओ या नहीं, जो तुम्हारी गोदी में आए, उसे जरूर महाराज और आर्यिका बना देना। यही तुम्हारा प्रायश्चित्त होगा। तुम साधु बन पाओ या न पाओ, तुम्हारी गृहस्थी में जो फल लगे, उन्हें दो-दो बना देना। यदि तुम्हें जेल जाना पड़े, तो वहां रहकर तुम जेली मत बन जाना। जेल में रहकर सारे जेलियों को अहिंसक बना देना। इस तरह, तुम्हारा जो अपराध था, वह सब माफ हो जाएगा, क्योंकि तुमने कितने अपराधियों को निरपराधी बना दिया है।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : जब भी घर लौटो, तो प्रसन्नचित्त होकर लौटना- निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Wed, 16 Oct 2024 09:01:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हमारा मन अक्सर हमारे अनुकूल नहीं होता, और हम चाहते हैं कि दुनिया हमारे अनुसार चले। नीति यही कहती है कि पहले अपने मन को इस पर मजबूर करो कि वह वही सोचता रहे, जो तुम चाहते हो। अगर मन को अपने अनुकूल नहीं बना पाते, तो दुनिया को मन के अनुकूल बनाना सिर से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हमारा मन अक्सर हमारे अनुकूल नहीं होता, और हम चाहते हैं कि दुनिया हमारे अनुसार चले। नीति यही कहती है कि पहले अपने मन को इस पर मजबूर करो कि वह वही सोचता रहे, जो तुम चाहते हो। अगर मन को अपने अनुकूल नहीं बना पाते, तो दुनिया को मन के अनुकूल बनाना सिर से पहाड़ फोड़ने जैसा है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> हमारा मन अक्सर हमारे अनुकूल नहीं होता, और हम चाहते हैं कि दुनिया हमारे अनुसार चले। नीति यही कहती है कि पहले अपने मन को इस पर मजबूर करो कि वह वही सोचता रहे, जो तुम चाहते हो। अगर मन को अपने अनुकूल नहीं बना पाते, तो दुनिया को मन के अनुकूल बनाना सिर से पहाड़ फोड़ने जैसा है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि इस स्थिति में हम स्वतंत्र होकर न हंस पाते हैं, न रो पाते हैं। कुंदकुंद भगवान की प्रेरणा यही है कि जब तुम्हारा मन, तुम्हारी इंद्रियां और ज्ञान तुम्हारे अनुसार चलने लगें, तभी तुम समयसार को प्राप्त कर पाओगे।</p>
<p><strong>इच्छी ऊंची रखो</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि इच्छाएं तो हम बहुत रखते हैं, लेकिन कितनी पूरी कर पाते हैं? हर व्यक्ति अधूरा जागता है और अधूरा ही सोता है। ऐसे व्यक्ति का अधूरा उठना और अधूरा मरना भी निश्चित है। 99% लोग अतृप्त होकर मरते हैं, और मरने के समय भी कहते हैं कि &#8220;एक और काम बाकी है।&#8221; सच्चा साधु वही है, जो मरने के पहले कहता है कि &#8220;मैंने जो करना था, वह सब कर लिया।&#8221; हमें हर क्षण यह अनुभूति करनी चाहिए कि हम कृतकृत्य हैं। यमराज जब आएं, तो हम कहें, &#8220;चलो।&#8221; मरने के समय इच्छाएं करना अपराध है। कृतकृत्य होकर मरना ही समयसार है। जब भी मौत आए, चाहे एक्सीडेंट हो या अन्य कोई घटना, हमें प्रतिक्षण यही सोचना चाहिए कि &#8220;मैं कृतकृत्य हूँ।&#8221; रात को कृतकृत्य होकर सोना और शाम को घर लौटते समय भी यही भावना होनी चाहिए—यह शुभ है। घर से निकलते समय उतनी ही इच्छाएं करें, जितनी शाम तक पूरी कर सकें। घर लौटते समय शुभता की प्रतीक होते हैं, और यदि लौटते समय शगुन हो जाए तो पूरे घर को धन्य कर देता है। जब व्यक्ति लौटता है, तो उसे भरकर लौटना चाहिए—सिर्फ थैला या जेब नहीं, मन भी भरकर लौटना चाहिए। आजकल के मोटिवेटर्स कहते हैं कि ऊंची इच्छाएं रखो, क्योंकि ऊंची इच्छाएं ही ऊंचाई तक ले जाती हैं। अगर इच्छाएं छोटी होंगी, तो विकास कैसे होगा? हमें सोच को ऊँचा रखना चाहिए—आकाश में उड़ने का ख्वाब होना चाहिए, करोड़पति या अरबपति बनने की इच्छा होनी चाहिए। लेकिन शर्त यह है कि सुबह जो इच्छा करो, उसे शाम तक पूरा कर लौटना चाहिए। इच्छाएं करना गलत नहीं है, लेकिन इच्छाओं की पूर्ति नहीं हुई तो रोते हुए लौटना यह बहुत अशुभ है।</p>
<p><strong>घर लौटने का महत्व और मानसिकता</strong></p>
<p>आपके पूरे परिवार के लिए यह अत्यंत शुभ होगा कि जब भी घर लौटें, तो प्रसन्नचित्त होकर लौटें। क्योंकि हर परिवार का सदस्य आपसे उम्मीद लगाए बैठा होता है। जब आप घर वापस आते हैं, तो हर कोई आपके चेहरे को देखता है—क्या वह खिला हुआ है या मुरझाया हुआ। अगर आप खिला हुआ चेहरा लेकर लौटते हैं, तो यह पूरे परिवार के लिए एक शुभ संकेत है। वहीं, मुरझाया हुआ चेहरा अपशगुन का कारण बनता है। जिंदगी में, शाम को घर आने से पहले जो आपने सोचा था, वह हो गया। दिन, महीने या वर्ष में जो आपने जीवन में सोचा था, उस पर विराम लगाना चाहिए। मरने से पहले जो विराम आप लगाते हैं, वही समाधि या सल्लेखना कहलाता है। आपके पास जो कुछ भी है, उसे कभी मत कोसें। यह जिंदगी या किस्मत है? अगर आप ऐसा सोचने लगेंगे, तो आपकी दशा बदल जाएगी। आपकी खुद की नकारात्मक सोच आपके पुण्य को भस्म कर देगी। इसलिए, जो भी जीवन में घटित हो रहा है, उसके लिए खुद को ही जिम्मेदार मानें। भगवान, गुरु, या माता-पिता पर आरोप लगाने का कोई अर्थ नहीं है। यदि आप इस सोच को अपनाएंगे, तो आपकी जिंदगी का ग्राफ छह महीने के भीतर बढ़ता हुआ नजर आएगा।</p>
<p>अपने मन में ये सिद्धांत समाहित करें—आपकी सोच और भावनाएं आपकी जिंदगी को सकारात्मक दिशा में ले जा सकती हैं। घर लौटते समय अपनी मानसिकता को सकारात्मक रखें और परिवार में खुशी का संचार करें।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : जो तुम्हारी दृष्टि में अच्छा हो, उसके साथ बुरा व्यवहार मत करना- मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 11 Oct 2024 07:49:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जब हम अपनी इच्छाओं और उपादान के अनुसार दुनिया में परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं, तब हमें यह समझना चाहिए कि यह संभव नहीं है। अग्नि कभी पानी नहीं बन सकती, लेकिन जब सीता अग्नि में कूदती हैं, तो अग्नि की लकड़ियां कमल बन जाती हैं और अग्नि ठंडी हो जाती है। यह हमें सिखाता [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जब हम अपनी इच्छाओं और उपादान के अनुसार दुनिया में परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं, तब हमें यह समझना चाहिए कि यह संभव नहीं है। अग्नि कभी पानी नहीं बन सकती, लेकिन जब सीता अग्नि में कूदती हैं, तो अग्नि की लकड़ियां कमल बन जाती हैं और अग्नि ठंडी हो जाती है। यह हमें सिखाता है कि उपादान की शक्ति कभी-कभी इतनी सशक्त होती है कि वह सामान्य नियमों को भी बदल सकती है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघाई की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> जब हम अपनी इच्छाओं और उपादान के अनुसार दुनिया में परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं, तब हमें यह समझना चाहिए कि यह संभव नहीं है। अग्नि कभी पानी नहीं बन सकती, लेकिन जब सीता अग्नि में कूदती हैं, तो अग्नि की लकड़ियां कमल बन जाती हैं और अग्नि ठंडी हो जाती है। यह हमें सिखाता है कि उपादान की शक्ति कभी-कभी इतनी सशक्त होती है कि वह सामान्य नियमों को भी बदल सकती है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि यदि हम चाहते हैं कि दुनिया हमारे अनुरूप चले, तो हमें अपनी साधना शुरू करनी होगी। जब भी हमें कोई बुरा निमित्त मिले, हमें बुरे परिणाम नहीं करने चाहिए। बुरा देखने पर बुरे भाव उत्पन्न करना हमारी उपादान शक्ति को कमजोर करता है। यही कारण है कि हमें अपनी उपादान शक्ति को नष्ट करने वाले बुरे भावों से बचना चाहिए।</p>
<p><strong>साधना पर ध्यान दें</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि पहली साधना यह है कि जब भी कोई बुरा निमित्त मिले, हम बुरे परिणाम न करें। जैसे ही आप यह साधना शुरू करेंगे, आपकी उपादान शक्ति चमत्कारिक रूप से बढ़ने लगेगी। आपको कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से लिप्त नहीं होना है, यही आपकी साधना है। दूसरी साधना यह है कि बुरा निमित्त मिलने पर अच्छा भाव रखना चाहिए। बुरी संगति में रहकर भी बुरे मत बनो। यदि कोई दुश्मन सामने आए, तो उसके प्रति मित्रता का भाव जागृत करें। ऐसा करने से आपकी उपादान शक्ति जाग जाएगी।</p>
<p><strong>मां-बाप का सम्मान करें</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि तीसरी साधना यह है कि अच्छी वस्तु और अच्छे व्यक्ति को देखकर बुरे भाव न रखें। सज्जनों के प्रति दुर्व्यवहार न करें। सत्यवादी से झूठ बोलने का भाव न रखें। जिस व्यक्ति ने कभी आपको दुख नहीं दिया, उसके साथ ऐसी हरकत न करें कि वह दुखी हो जाए। अंत में, मां-बाप के प्रति सदैव सम्मान और प्रेम रखें। यदि आप उन्हें दुखी करते हैं, तो आप अनंत बार दुख भोगते रहेंगे। इसीलिए, जो आपकी दृष्टि में अच्छा हो, उसके साथ बुरा व्यवहार न करें। यही सही मार्ग है।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : बुरे कार्यो की बुराई करना भी धर्म है- निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sat, 28 Sep 2024 05:57:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महान आत्माएं एक वो होती है जो महान गुणों को धारण करती हैं, दूसरी वे आत्मायें होती है जिन्हें दुनिया के हर जीव में महानता दिखती है। ऐसे ही सज्जन आदमी भी होते हैं जो दुर्जनता से रहित होते हैं लेकिन कुछ सज्जन ऐसे होते है जिनकी दृष्टि में स्वयं तो दुर्जन नजर आता है [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>महान आत्माएं एक वो होती है जो महान गुणों को धारण करती हैं, दूसरी वे आत्मायें होती है जिन्हें दुनिया के हर जीव में महानता दिखती है। ऐसे ही सज्जन आदमी भी होते हैं जो दुर्जनता से रहित होते हैं लेकिन कुछ सज्जन ऐसे होते है जिनकी दृष्टि में स्वयं तो दुर्जन नजर आता है और सारा जगत सज्जन नजर आता है। ऐसी जो दूसरे नम्बर की महान आत्माओं की परिभाषा है वह बड़ी विचित्र है- स्वयं गुणवान होकर गुणहीन की अनुभूति, ऐसी आत्माये तीर्थंकर भगवान बनने का अधिकार रखती है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही।<span style="color: #ff0000"> पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर।</strong> महान आत्माएं एक वो होती है जो महान गुणों को धारण करती हैं, दूसरी वे आत्मायें होती है जिन्हें दुनिया के हर जीव में महानता दिखती है। ऐसे ही सज्जन आदमी भी होते हैं जो दुर्जनता से रहित होते हैं लेकिन कुछ सज्जन ऐसे होते है जिनकी दृष्टि में स्वयं तो दुर्जन नजर आता है और सारा जगत सज्जन नजर आता है। ऐसी जो दूसरे नम्बर की महान आत्माओं की परिभाषा है वह बड़ी विचित्र है- स्वयं गुणवान होकर गुणहीन की अनुभूति, ऐसी आत्माये तीर्थंकर भगवान बनने का अधिकार रखती है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि स्वयं के लिए तो दुनिया कमाती है, कभी दूसरों के लिए कमाए, वो व्यक्ति महान में भी महान है। हम अभाव का उतना ही अनुभव करें जितना हम पा सकते है, ज्यादा अभाव का अनुभव करने से वर्तमान का सुख खत्म हो जाता है।उन्होंने कहा कि जो दूसरों की चिंता करता है वह अधम से भी अधम है इसलिए जैनदर्शन ने बहुत अच्छी कला दी कि तुम जो कुछ भी दूसरों के लिए करो उसमें धारणा बना लो, मैं दूसरे के लिए कुछ कर ही नही रहा हूँ, मैं तो सबकुछ अपने लिए कर रहा हूँ। मैं दूसरे को नमोस्तु भी कर रहा हूँ तो मैं नमोस्तु नही कर रहा हूँ, उच्च गोत्र का बंध कर रहा हूँ। मैं तुम्हे प्रवचन नही दे रहा हूँ, मैं तो अपना स्वाध्याय कर रहा हूँ, उपदेश एक स्वाध्याय में आता है, स्वाध्याय में सबसे ज्यादा अपने चिंतन की पुनरावृत्ति होती है, उसी कारण से असंख्यात गुणी कर्मों की निर्जरा होती है।</p>
<p><strong>कर्मों का क्षय जरूरी</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जैसे दर्पण मैं देखने वाला कहता है कि जरा दर्पण देख लूं, सत्य यह नही है कि वह दर्पण नहीं देख रहा है, दर्पण में अपना चेहरा देख रहा है इसी तरह ज्ञानी व्यक्ति भगवान का दर्शन करता ही नहीं है, कहने में आ रहा है, वो तो भगवान की द्रव्य, गुण, पर्यायों में अपनी आत्मा को देखता है। उसने अपने मिथ्यादर्शन को सम्यक्त्व बनाने के लिए निधत्त निकाचित कर्म जो तपस्या से नही कट रहे थे, तो वह भगवान का दर्शन नही अपने निधत्त निकाचित कर्मो का क्षय करने मन्दिर जाता है। मैंने जो कर्म बान्धे है उन कर्मों का क्षय बिना भगवान के दर्शन के नही होगा इसलिए उसने अपने कर्मो के क्षय के लिए जिनमंदिर बनाया, अब कहा पर का उपकार है। जिस धर्म की क्रिया करने में थकान महसूस हो, विराम का भाव आए बस अब बहुत हो गया, समझ लेना वह धर्म हुआ ही नहीं। किसी भी धर्म की क्रिया चाहे पूजा हो, दान हो, प्रवचन हो, आपका व्रत हो, रात्रिभोजन का त्याग हो, दूसरो के ऊपर उपकार हो, इन सब मे थकान आने लगे, समझना तुमने धर्म किया ही नही है। धर्म कार्य के बाद तुम थके हुए नजर आते हो क्योंकि तुमने सब कुछ धर्म के लिए किया है और धर्म तुमसे भिन्न है, धर्म तो भगवानों का है, धर्म तो गुरु का है। आज इतना धर्म हो रहा है, इतना धर्म मैंने विगत 50 साल पहले नही देखा, कितने मन्दिर बन रहे, कितना दान हो रहा है, कितने कार्यक्रम हो रहे है लेकिन लाभ नही दिख रहा, मात्र तुम्हारे मन मे धर्म के लिए कुछ करने का मन हुआ है, उसमे तुम्हे अपने जीवन मे ऐसा महसूस नही हुआ कि मैं कुछ अपने लिए कर रहा हूँ। सारंग के समय तुम दुकान में थकते नही हो क्यों? वहाँ तुम्हे सीधा लाभ दिख रहा है। यहाँ प्रत्यक्ष लाभ नही दिख रहा है।</p>
<p><strong>धर्म की क्रिया करो</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति जिस चीज को पसंद नहीं करता है, असमर्थ होता है, वह व्यक्ति उस चीज की बुराई करता है, स्वयं नहीं करेगा, दूसरे को भी नही करने देगा और जो करेगा उसकी बुराई करेगा, ये नेचर है सारी दुनिया का, ये चाणक्य नीति है। ऐसा करना गुण भी है और दुर्गुण भी। जब कोई बुरे कार्यो में लगाता है कि मैं नही कर रहा हूँ तो बेटे को भी नही करने दूँगा तो ये लक्षण अच्छा है, औषधि बन गया ये गुण। निंदा का, बुराई का गुण औषधि बन गया। बुरे कार्यों की बुराई करना भी धर्म है। अब अच्छे कार्य है, करना चाहता है लेकिन कर नही पा रहा है इसलिए वो बुराई करने लग जाता है। तुम्हारे पास झोपड़ी है और बाजू में मंजिल की मंजिल उठती जा रही तो तुम्हे क्या भाव आएगा, 99% ईष्या भाव। हम धर्म नहीं कर पा रहे है कोई बात नहीं, इसने किया है, जय जिनेन्द्र कर लो। मैं दान नहीं दे पा रहा, इसने दिया है जय जिनेंद्र कर लो। तुम मंदिर नहीं जाओ तो कोई बात नही, तुम्हारा पड़ोसी मंदिर जाता है, उसी को जय जिनेन्द्र कर लिया करो तो भी तुम्हारा बेड़ा पार हो जाएगा। पहले लोग शिखर जी नही जा पाते थे तो वे जो शिखर जी से लौटते थे उसकी अगवानी करते थे, उसकी वंदना शिखर जी की वंदना के बराबर मानते थे। मैं सबकुछ अपने लिए कर रहा हूं, ये सब मेरा ही कार्य है। भगवान का मंदिर नहीं बन रहा है, मेरा कार्य हो रहा है, मेरे कर्मों की निर्जरा का आलय बन रहा है, मेरी पूजा करने का स्थान बन रहा है, मुझे लाभ होगा, भगवान को कोई लाभ ही नहीं। प्रत्येक वस्तु के प्रत्येक धर्म की क्रिया पर अपनी आत्मा को स्थापित कर दो तो शरीर कितना ही थका हुआ दिखेगा लेकिन तुम्हारा उत्साह थका हुआ नही दिखेगा।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन :  जिस दिन तुमने स्वयं को संसार का सबसे बड़ा पापी मान लिया, उसी दिन से तुम धर्मात्मा बनना शुरू हो जाओगे- निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Tue, 24 Sep 2024 07:16:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सागर। जितना एक व्यक्ति अच्छा बनने का प्रयास कर रहा है, उतना वह अच्छा नहीं बन पा रहा है। जितनी ऊंचाई को छूने का प्रयत्न कर रहा है, उतना ऊंचा उठ नहीं पा रहा। मेहनत करने पर भी अगर वह सफल नहीं हो रहा है, तो समझ लेना चाहिए कि उसकी सोच में कोई कमी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सागर।</strong> जितना एक व्यक्ति अच्छा बनने का प्रयास कर रहा है, उतना वह अच्छा नहीं बन पा रहा है। जितनी ऊंचाई को छूने का प्रयत्न कर रहा है, उतना ऊंचा उठ नहीं पा रहा। मेहनत करने पर भी अगर वह सफल नहीं हो रहा है, तो समझ लेना चाहिए कि उसकी सोच में कोई कमी है। जब तक तुम यह धारणा बनाए रखोगे कि &#8220;मैं बहुत मेहनत कर रहा हूं,&#8221; तब तक तुम्हें सफलता नहीं मिलेगी। वास्तव में, तुम्हारा असफल होना इस बात का प्रमाण है कि तुमने कुछ नहीं किया। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि सर्वाधिक सामायिक करने वाले का लक्षण यह है कि परीक्षा के समय, यानी प्रतिकूल परिस्थितियों में, उसकी अनुभूति कैसी होती है। यदि प्रतिकूल परिस्थिति में तुम अस्थिर हो जाते हो, तो समझ लेना चाहिए कि तुमने सामायिक का केवल नाटक किया है। अगर कोई दिन में तीन बार सामायिक करता है, लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों में उसका मन अस्थिर हो जाता है, तो वह सामायिक नहीं है।</p>
<p><strong>अपनी गलती स्वीकार करो</strong></p>
<p>मुनिवर ने सुझाव दिया कि छह महीने के लिए यह सोचो: &#8220;मैं जितनी मेहनत करनी चाहिए, उतनी नहीं कर रहा हूं। जितना पढ़ना चाहिए, उतना नहीं पढ़ रहा हं।&#8221; इस सोच के साथ आगे बढ़ोगे तो बहुत बड़ा परिणाम मिलेगा। खुद को नेगेटिव कहने से तुम्हारी शक्तियां जागृत होंगी। जितने भी कार्यों में तुम असफल हो, सारे दोष अपने ऊपर लो और यह समझो कि यह सब मेरी गलती है। किस्मत को कभी मत कोसो और न ही उसके भरोसे रहो, क्योंकि किस्मत का कोई भरोसा नहीं। किसी ऊपरी शक्ति को दोष मत दो और भगवान को भी मत कोसो, भले ही बुरे दिन आएं। अगर तुम मंदिर आए हो, तो यह जान लो कि भगवान बहुत अतिशयकारी हैं। कई लोग भगवान के दर्शन के बाद भी दूसरे देवताओं के पास भटकते हैं, क्योंकि वे केवल भगवान की महिमा से आकर्षित हुए हैं। यदि तुमने गुरु को केवल उनकी ख्याति या गुणों के कारण चुना है, तो तुम चूक जाओगे।</p>
<p><strong>अपने गुणों की प्रशंसा मत करो</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि गुणों का अभाव होना और खुद को गुणवान मानना पतन का कारण है। यदि तुम अपने गुणों की प्रशंसा करते हो, तो तुम्हारा विकास रुक जाएगा। लेकिन जब तुम यह स्वीकार करते हो कि &#8220;मेरे पास कुछ भी नहीं है,&#8221; तो तुम्हारा विकास शुरू हो जाएगा। जब तुम अपने दुर्गुणों को स्वीकार करोगे, तभी तुम क्षयोपशम लब्धि के अधिकारी बनोगे। जिस दिन तुमने स्वयं को संसार का सबसे बड़ा पापी मान लिया, उसी दिन से तुम धर्मात्मा बनना शुरू हो जाओगे।</p>
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