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	<title>Jain Literature  श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>राष्ट्रीय गणित दिवस पर परिचर्चा : जैन साहित्य में मापन पद्धतियों का महत्व पर डाला प्रकाश </title>
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		<pubDate>Wed, 24 Dec 2025 10:19:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ राष्ट्रीय गणित दिवस के अवसर पर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के प्राचीन भारतीय गणित केंद्र द्वारा जैन साहित्य में मापन पद्धतियों के महत्व विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु प्रोफेसर राकेश सिंघई ने की। उन्होंने कहा कि जैन साहित्य में मापन की विभिन्न पद्धतियों का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> राष्ट्रीय गणित दिवस के अवसर पर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के प्राचीन भारतीय गणित केंद्र द्वारा जैन साहित्य में मापन पद्धतियों के महत्व विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु प्रोफेसर राकेश सिंघई ने की। उन्होंने कहा कि जैन साहित्य में मापन की विभिन्न पद्धतियों का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> राष्ट्रीय गणित दिवस के अवसर पर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के प्राचीन भारतीय गणित केंद्र द्वारा जैन साहित्य में मापन पद्धतियों के महत्व विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु प्रोफेसर राकेश सिंघई ने की। उन्होंने कहा कि जैन साहित्य में मापन की विभिन्न पद्धतियों का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। जैन साहित्य में नौ प्रकार के अनंत का उल्लेख है, जो वर्तमान में प्रचलित अनंत की अवधारणा से भिन्न हैं। उन्होंने कहा कि आत्मा को न तो देखा जा सकता है और न ही मापा जा सकता है, लेकिन जैन साहित्य में उपलब्ध मापन के विविध रूपों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैन साहित्य में लौकिक और अलौकिक दोनों प्रकार के गणित में मापन पद्धतियों का विशेष स्थान है।</p>
<p>पूर्व कुलगुरु प्रोफेसर रेनु जैन ने कहा कि जैन साहित्य में जीव और अजीव द्रव्यों का विस्तृत विवेचन मिलता है। गोम्मटसार जीवकाण्ड में जीव का वर्णन है, जबकि अजीव के अंतर्गत पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल को सम्मिलित किया गया है।</p>
<p>माइक्रोसॉफ्ट के इंजीनियर प्रकाश छाबड़ा ने कर्म के जीव के साथ बंधन की प्रक्रिया और उसके साथ रहने की समयावधि पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शलाकात्रयनिष्ठापन की रीति के माध्यम से विशाल संख्याओं और उनसे भी बड़ी संख्याओं को उपमाओं द्वारा समझाया गया है।</p>
<p>एसजीआईटीएस के प्रोफेसर नीरज कुमार जैन ने कर्म सिद्धांत में द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव तथा उनके अनुमाप की अवधारणा पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि जैन साहित्य में सूक्ष्म से लेकर विशाल असंख्यात और अनंत इकाइयों का वर्णन मिलता है।</p>
<p>जैन दर्शन और संस्कृत के विद्वान डॉ. पंकज जैन शास्त्री ने कहा कि जैनाचार्यों द्वारा वर्णित अलौकिक गणित अत्यंत असाधारण और अकल्पनीय है। उन्होंने इसके आध्यात्मिक और न्यायिक पक्षों को रेखांकित किया।</p>
<p>कार्यक्रम में निदेशक प्रोफेसर अनुपम जैन ने कहा कि जैन गणित का विकास मुख्य रूप से लोक रचना को समझने और कर्म सिद्धांत की व्याख्या के लिए हुआ है। लोक रचना से जुड़े गणित पर पर्याप्त अध्ययन हुआ है, लेकिन कर्म सिद्धांत के गणित की जटिलता और दार्शनिक शब्दावली के कारण इस पर अपेक्षित शोध नहीं हो सका है। प्रोफेसर अशोक जेतावत ने विदेशी विश्वविद्यालयों में अलौकिक गणित पर हो रहे कार्यों की जानकारी दी।</p>
<p>विभागाध्यक्ष प्रोफेसर टोकेकर ने सभी वक्ताओं का स्वागत किया। कुलगुरु प्रोफेसर राकेश सिंघई ने विद्वानों को डॉ. अनुपम जैन द्वारा संपादित एवं केंद्र द्वारा प्रकाशित भारतीय ज्ञान परंपरा एवं गणित पुस्तक की प्रति भेंट की।</p>
<p>परिचर्चा से पूर्व महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का परिचय प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में प्रोफेसर अशोक शर्मा, प्रोफेसर तनवानी, प्रोफेसर प्रीति सिंह, डॉक्टर वंदित हेड़ाऊ, डॉक्टर शिशिर शांडिल्य, प्रोफेसर यामिनी, डॉक्टर प्रतिभा शर्मा, प्रोफेसर चंदन गुप्ता, डॉक्टर पांचाल, डॉक्टर अंगद ओझा सहित अनेक विद्यार्थी उपस्थित रहे।</p>
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		<title>इस भाषा में हजारों जैन आगम और जैन साहित्य रचित हैं : केंद्र सरकार ने प्राकृत भाषा को शास्त्रीय भाषा घोषित किया </title>
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		<pubDate>Fri, 04 Oct 2024 08:10:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ प्राकृत भाषा, भारत की एक प्राचीन भाषा, से अनेक अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों का उद्भव हुआ है। इस भाषा में हजारों जैन आगम और जैन साहित्य रचित हैं, जो लगभग 2500 वर्ष से भी पुराने हैं। प्राकृत भाषा के विद्वानों की पिछले कई दशकों से यह मांग रही है कि इसे शास्त्रीय भाषा का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> प्राकृत भाषा, भारत की एक प्राचीन भाषा, से अनेक अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों का उद्भव हुआ है। इस भाषा में हजारों जैन आगम और जैन साहित्य रचित हैं, जो लगभग 2500 वर्ष से भी पुराने हैं। प्राकृत भाषा के विद्वानों की पिछले कई दशकों से यह मांग रही है कि इसे शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए, ताकि इसका संरक्षण और संवर्धन किया जा सके। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> प्राकृत भाषा, भारत की एक प्राचीन भाषा, से अनेक अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों का उद्भव हुआ है। इस भाषा में हजारों जैन आगम और जैन साहित्य रचित हैं, जो लगभग 2500 वर्ष से भी पुराने हैं। प्राकृत भाषा के विद्वानों की पिछले कई दशकों से यह मांग रही है कि इसे शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए, ताकि इसका संरक्षण और संवर्धन किया जा सके। कई विद्वानों ने सरकार से इस अनुरोध को स्वीकारते हुए, भारत सरकार ने 3 अक्टूबर 2024 को प्राकृत भाषा को शास्त्रीय दर्जा प्रदान करने की घोषणा की। इसके साथ ही पाली, असमिया, मराठी और बंगला भाषाओं को भी शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया है।</p>
<p>प्राकृत भाषा में प्रकाशित होने वाली पहली पत्रिका &#8220;पागद-भासा&#8221; के संपादक जैन रत्न प्रो. अनेकांत कुमार जैन ने इस अवसर पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आभार और धन्यवाद ज्ञापित किया है। यह उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने भारतीय भाषाओं के संरक्षण की मुहिम शुरू की है। नई शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं को प्रमुखता दी गई है। इंदौर दिगंबर जैन समाज के वरिष्ठ लेखक और पत्रकार डॉ. जैनेन्द्र जैन, महावीर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, हंसमुख गांधी, टीके वेद, डॉ. अनुपम जैन सहित संपूर्ण जैन समाज ने केंद्र सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत करते हुए आभार प्रकट किया है।</p>
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