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	<title>jain culture &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जैन धर्म एवं संस्कृति की रक्षा में कासलीवाल परिवार का प्रेरणादायी योगदान : ज्ञान, संस्कृति और सामाजिक समरसता का बना सशक्त आधार </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Jul 2026 12:29:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म की प्राचीन विरासत, पांडुलिपियों और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में कासलीवाल परिवार का योगदान प्रेरणादायी रहा है। कुंदकुंद ज्ञानपीठ और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से परिवार नई पीढ़ी को धर्म एवं संस्कृति से जोड़ने का सतत कार्य कर रहा है। पढ़िए श्रीफल साथी आनंद जैन कासलीवाल का पत्र । इंदौर। किसी भी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन धर्म की प्राचीन विरासत, पांडुलिपियों और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में कासलीवाल परिवार का योगदान प्रेरणादायी रहा है। कुंदकुंद ज्ञानपीठ और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से परिवार नई पीढ़ी को धर्म एवं संस्कृति से जोड़ने का सतत कार्य कर रहा है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी आनंद जैन कासलीवाल का पत्र ।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> किसी भी समाज की वास्तविक पहचान उसकी संस्कृति, परंपराओं और ज्ञान-संपदा से होती है। जैन धर्म की प्राचीन विरासत, दुर्लभ पांडुलिपियों तथा सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के क्षेत्र में कासलीवाल परिवार का योगदान समाज के लिए प्रेरणास्रोत माना जाता है।</p>
<p><strong>ज्ञान संरक्षण का ऐतिहासिक संकल्प</strong></p>
<p>परम आदरणीय स्वर्गीय श्री हुकुमचंद जी कासलीवाल, श्री देव कुमार सिंह जी कासलीवाल, श्री अजीत कुमार सिंह जी कासलीवाल एवं श्री प्रदीप जी कासलीवाल ने जैन धर्म एवं संस्कृति के संरक्षण के उद्देश्य से अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। विशेष रूप से कुंदकुंद ज्ञानपीठ की स्थापना कर प्राचीन जैन ग्रंथों, दुर्लभ पांडुलिपियों और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का महत्वपूर्ण अभियान प्रारंभ किया, जो आज भी निरंतर प्रगति पर है।</p>
<p><strong>समाज को जोड़ने का सफल प्रयास</strong></p>
<p>श्री प्रदीप जी कासलीवाल ने सोशल ग्रुप फेडरेशन के माध्यम से देशभर के जैन समाज को एक मंच पर जोड़ने, नई पीढ़ी को नेतृत्व प्रदान करने तथा युवाओं को धर्म एवं संस्कृति से जोड़ने का उल्लेखनीय कार्य किया। यह पहल सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक जागरूकता का उत्कृष्ट उदाहरण बन चुकी है।</p>
<p><strong>नई पीढ़ी निभा रही विरासत की जिम्मेदारी</strong></p>
<p>वर्तमान में पूजनीय श्रीमती पुष्पा जी कासलीवाल के मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद में श्री आदित्य जी कासलीवाल और श्री अमित जी कासलीवाल कुंदकुंद ज्ञानपीठ के कार्यों का सफल संचालन कर रहे हैं। हाल ही में परम पूज्य आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज एवं मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित तीन दिवसीय विद्वत् संगोष्ठी ने यह संदेश दिया कि नई पीढ़ी भी जैन धर्म और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए पूर्णतः समर्पित है।</p>
<p><strong>सेवा और समर्पण की अनूठी परंपरा</strong></p>
<p>कासलीवाल परिवार की विशेषता यह है कि धर्म, शिक्षा और समाजहित के अधिकांश कार्यक्रम परिवार के अपने संसाधनों से संचालित किए जाते हैं। महावीर ट्रस्ट, उदासीन आश्रम और कुंदकुंद ज्ञानपीठ जैसी संस्थाओं के माध्यम से सेवा, संस्कार और समर्पण की परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाया जा रहा है।</p>
<p><strong>समाज के लिए प्रेरणास्रोत</strong></p>
<p>आज जब सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, ऐसे समय में कासलीवाल परिवार का समर्पण पूरे समाज के लिए प्रेरणादायी है। यह केवल एक परिवार की उपलब्धियों का परिचय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति, आध्यात्मिक विरासत और मूल्यों के संरक्षण का संकल्प लेने का संदेश भी है।</p>
<p><strong>समापन</strong></p>
<p>जैन समाज की ज्ञान-परंपरा को सशक्त बनाने, सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने तथा सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने में कासलीवाल परिवार का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय रहेगा।</p>
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		<title>मुनि श्री सुधासागर महाराज का चातुर्मास: इंदौर के लिए आत्मसाधना, संगठन और समाज निर्माण का स्वर्णिम अवसर </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Jul 2026 18:24:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रेखा संजय जैन, ग्रुप संपादक श्रीफल की कलम से  इंदौर की पुण्यभूमि को परम पूज्य मुनि श्री 108 सुधासागर महाराज का चातुर्मास प्राप्त होना केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्मसाधना, संस्कार और संगठन का महापर्व है। यह अवसर समाज को नई दिशा देने, नई चेतना जगाने और एकजुट होकर भविष्य-निर्माण [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong><span style="color: #ff0000">रेखा संजय जैन, ग्रुप संपादक श्रीफल की कलम से </span></strong></p></blockquote>
<p>इंदौर की पुण्यभूमि को परम पूज्य मुनि श्री 108 सुधासागर महाराज का चातुर्मास प्राप्त होना केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्मसाधना, संस्कार और संगठन का महापर्व है। यह अवसर समाज को नई दिशा देने, नई चेतना जगाने और एकजुट होकर भविष्य-निर्माण का संकल्प लेने का है।</p>
<p>इस पुण्य अवसर के लिए सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, कार्यकारी अध्यक्ष नवीन गोधा एवं महामंत्री हर्ष जैन विशेष बधाई और धन्यवाद के पात्र हैं। उनके पुरुषार्थ, समर्पण और सतत प्रयासों ने इंदौर समाज को यह दुर्लभ सौभाग्य दिलाया। पहला कदम उन्होंने बढ़ाया, अब इस यात्रा को पूरे समाज को मिलकर आगे बढ़ाना है।</p>
<p>अब समय किसी एक ,दो,तीन व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे इंदौर समाज का है। प्रत्येक श्रावक-श्राविका यह भाव रखे कि “यह चातुर्मास मेरा है, मेरी साधना का है, मेरे परिवार के संस्कारों का है और मेरे समाज के उज्ज्वल भविष्य का है।” यही भावना मुनि श्री सुधासागर महाराज के संदेश का वास्तविक स्वरूप है।</p>
<p>यह चातुर्मास केवल प्रवचनों तक सीमित न रहे, बल्कि प्रत्येक परिवार में आत्मसाधना की डुबकी, बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण, युवाओं में सेवा की प्रेरणा और समाज में संगठन की नई चेतना प्रवाहित करे। जब समाज एक सूत्र में बंधता है, तब धार्मिक विकास की गंगा स्वयं प्रवाहित होती है।</p>
<p>कहा गया है कि सच्ची भक्ति के आगे भगवान भी प्रसन्न हो जाते हैं। इंदौर समाज को यह पुण्य अवसर मिला है, इसलिए इसे केवल उत्सव बनाकर नहीं, बल्कि जीवन-परिवर्तन का माध्यम बनाकर सार्थक करना होगा। आज आवश्यकता है कि बैठकर ऐसी योजनाएँ बनाई जाएँ जिनसे समाज का प्रत्येक व्यक्ति — बच्चे, युवा, महिलाएँ और वरिष्ठजन — किसी न किसी रूप में इस चातुर्मास से जुड़े।</p>
<p>आनंद गोधा, नवीन गोधा और हर्ष जैन जिस प्रकार सभी को साथ लेकर चलने का प्रयास करते हैं, वही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। यही समन्वय और सहभागिता इस चातुर्मास की भी सफलता का आधार बने।</p>
<p>मुनि श्री सुधासागर महाराज का एक प्रेरक संदेश सदैव स्मरणीय है — “समाज का कार्य करोगे तो लड्डू नहीं, पत्थर भी खाने पड़ सकते हैं; फिर भी समाज का मार्गदर्शन और सेवा नहीं छोड़नी चाहिए।” यह वाक्य प्रत्येक समाजसेवी के लिए प्रेरणा है कि सेवा का मार्ग त्याग, धैर्य और समर्पण से ही प्रशस्त होता है।</p>
<p>इसी भावना के साथ यह भी आवश्यक है कि इंदौर में ही नहीं, जहाँ-जहाँ चातुर्मास हो रहे हैं, वहाँ भी सहयोग और सेवा का भाव लेकर पहुँचा जाए। यदि किसी मंदिर या समिति को आवश्यकता हो तो सबसे पहले पूछा जाए — “हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं?” यही जैन संस्कृति का वास्तविक स्वरूप है।</p>
<p>अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर महाराज ने भी प्रेरणा दी कि परम पूज्य मुनि श्री सुधासागर महाराज का स्वागत, अभिनंदन और चरणवंदन ऐसा हो कि पूरे देश में इंदौर समाज की संगठन-शक्ति और श्रद्धा की मिसाल दी जाए। साथ ही, चातुर्मास से पूर्व आचार्य श्री 108 सुनीलसागर महाराज के नगर-प्रवेश और स्वागत को भी हम सभी मिलकर ऐतिहासिक बनाएँ।</p>
<p>आइए, हम पूरी  इंदौर समाज का चातुर्मास बनाएँ। यही समय है जब मतभेदों से ऊपर उठकर मन, वचन और कर्म से एक होकर आत्मकल्याण, समाज-निर्माण और धर्म-प्रभावना का नया इतिहास लिखा जाए।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>श्रमण संस्कृति संस्थान बना जैन शिक्षा का सशक्त केंद्र : सुधासागर महाराज के आशीर्वाद से हजारों विद्वानों ने रचा स्वर्णिम इतिहास </title>
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		<pubDate>Sun, 05 Jul 2026 12:30:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सांगानेर स्थित श्रमण संस्कृति संस्थान ने तीन दशकों में जैन शिक्षा, संस्कार और धर्मप्रभावना के क्षेत्र में उल्लेखनीय पहचान बनाई है। हजारों विद्वानों, साधकों और विद्यार्थियों का निर्माण कर यह संस्थान जैन संस्कृति के पुनर्जागरण का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट। मुरैना/द्रोणगिरी। श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>सांगानेर स्थित श्रमण संस्कृति संस्थान ने तीन दशकों में जैन शिक्षा, संस्कार और धर्मप्रभावना के क्षेत्र में उल्लेखनीय पहचान बनाई है। हजारों विद्वानों, साधकों और विद्यार्थियों का निर्माण कर यह संस्थान जैन संस्कृति के पुनर्जागरण का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना/द्रोणगिरी।</strong> श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर आज जैन शिक्षा, संस्कार और धर्मप्रभावना का एक प्रतिष्ठित केंद्र बन चुका है। परम पूज्य निर्यापक मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज के पावन आशीर्वाद तथा डॉ. शीतलचंद्र जैन के दूरदर्शी निर्देशन में 1 सितंबर 1996 को स्थापित यह संस्थान एक छोटे से संकल्प से प्रारंभ होकर आज राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है।</p>
<p><strong>शिक्षा और संस्कार का अनूठा संगम</strong></p>
<p>संस्थान में वर्तमान में लगभग 200 विद्यार्थी रहकर शास्त्री की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जबकि 1,000 से अधिक विद्यार्थी यहां से शास्त्री बन चुके हैं। इनमें से 600 से अधिक विद्वान विभिन्न सरकारी सेवाओं में रहकर समाज और राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। संस्थान का उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि संस्कारयुक्त व्यक्तित्व का निर्माण करना है।</p>
<p><strong>साधना और वैराग्य की तपोभूमि</strong></p>
<p>संस्थान ने अनेक विद्यार्थियों को संयम और वैराग्य के मार्ग पर अग्रसर किया है। यहां से शिक्षित अनेक साधक आज दिगंबर मुनि, ऐलक एवं ब्रह्मचारी के रूप में धर्मप्रभावना में संलग्न हैं। संस्थान शिक्षा के साथ आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को भी समान महत्व देता है।</p>
<p><strong>आधुनिक तकनीक से जुड़ी धर्म शिक्षा</strong></p>
<p>द्वादशवर्षीय अध्ययन योजना के माध्यम से देशभर के 30 हजार से अधिक विद्यार्थी घर बैठे अध्ययन कर रहे हैं। इसके साथ ही हजारों पाठशालाओं का संचालन, 2,000 से अधिक मंदिरों में शिविर तथा 1,200 से अधिक मंदिरों में दशलक्षण महापर्व के दौरान विद्वानों की व्यवस्था कर संस्थान निरंतर धर्मसेवा कर रहा है।</p>
<p><strong>बालिका शिक्षा का प्रेरक केंद्र</strong></p>
<p>संस्थान द्वारा संचालित संत सुधासागर बालिका छात्रावास में लगभग 200 बालिकाएं अध्ययनरत हैं। यहां शिक्षा के साथ धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्कार भी प्रदान किए जाते हैं। छात्रावास से निकली अनेक छात्राएं आज विदुषी, प्रभावशाली वक्ता एवं समाज की प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं।</p>
<p><strong>संघर्ष से सफलता तक की यात्रा</strong></p>
<p>संस्थान ने अपने प्रारंभिक वर्षों में अनेक चुनौतियों का सामना किया, लेकिन गुरु कृपा, समर्पण और दूरदर्शी नेतृत्व के बल पर यह निरंतर प्रगति करता रहा। आज श्रमण संस्कृति संस्थान जैन समाज में अनुशासन, शिक्षा, संस्कार और धर्मसेवा का सशक्त प्रतीक बन चुका है।</p>
<p><strong>प्रेरणा का संदेश</strong></p>
<p>संस्थान की यात्रा यह सिद्ध करती है कि यदि उद्देश्य समाजहित, धर्मसेवा और संस्कार निर्माण का हो तथा गुरु का आशीर्वाद प्राप्त हो, तो एक छोटा प्रयास भी समय के साथ विशाल आंदोलन का रूप ले सकता है।</p>
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		<title>चातुर्मास केवल 4 माह का प्रवास नहीं, वह उस नगर के भाग्य का उदय होता है : प्रिंस देवांश </title>
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		<pubDate>Fri, 03 Jul 2026 13:15:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन संस्कृत विद्यालय के विद्वान प्रिंस जैन शास्त्री &#8216;देवांश&#8217; ने चातुर्मास के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संतों का चातुर्मास किसी नगर के लिए सौभाग्य और आत्मकल्याण का महाअवसर होता है। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट। मुरैना। जैन संस्कृत विद्यालय के विद्वान प्रिंस जैन शास्त्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन संस्कृत विद्यालय के विद्वान प्रिंस जैन शास्त्री &#8216;देवांश&#8217; ने चातुर्मास के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संतों का चातुर्मास किसी नगर के लिए सौभाग्य और आत्मकल्याण का महाअवसर होता है। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।</strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैन संस्कृत विद्यालय के विद्वान प्रिंस जैन शास्त्री &#8216;देवांश&#8217; ने कहा कि दिगंबर जैन परंपरा में चातुर्मास केवल चार माह का धार्मिक प्रवास नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, तप, साधना और धर्मप्रभावना का महापर्व है। संतों का सान्निध्य किसी भी नगर के लिए पुण्योदय का प्रतीक होता है और उनके प्रवचनों से समाज में संस्कार, सदाचार एवं आध्यात्मिक चेतना का संचार होता है।</p>
<p><strong>चातुर्मास का आध्यात्मिक महत्व</strong></p>
<p>प्रिंस देवांश ने कहा कि चातुर्मास के दौरान मुनिराज एवं आर्यिका माताजी एक स्थान पर विराजमान होकर धर्मोपदेश, स्वाध्याय और साधना के माध्यम से समाज को आत्मकल्याण एवं मोक्षमार्ग की प्रेरणा देते हैं। उनके सान्निध्य से असंख्य लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है।</p>
<p><strong>संस्कार निर्माण का सशक्त माध्यम</strong></p>
<p>उन्होंने बताया कि चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के चरित्र निर्माण का भी आधार है। इस अवधि में जप, तप, व्रत, दान, सामायिक, प्रतिक्रमण, उपवास एवं धर्मचर्चा जैसे आध्यात्मिक कार्यों का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।</p>
<p><strong>युवाओं को मिलती है नई दिशा</strong></p>
<p>प्रिंस देवांश ने कहा कि वर्तमान समय में नई पीढ़ी भौतिकता और आधुनिक जीवनशैली के कारण धर्म एवं संस्कारों से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में संतों का चातुर्मास युवाओं को संयम, सदाचार, अहिंसा, आत्मानुशासन और जैन संस्कृति से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बनता है।</p>
<p><strong>संतों का आगमन नगर का सौभाग्य</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि किसी समाज के लिए संतों का चातुर्मास उसकी सबसे बड़ी आध्यात्मिक उपलब्धि है। जहां संतों का प्रवास होता है, वहां धर्म की गंगा प्रवाहित होती है, संस्कारों का विकास होता है और समाज में संगठन, सेवा, सद्भाव तथा धार्मिक चेतना का वातावरण निर्मित होता है।</p>
<p><strong>समाज से किया आह्वान</strong></p>
<p>प्रिंस देवांश ने समाज के पदाधिकारियों एवं धर्मानुरागियों से आग्रह किया कि वे संतों के चातुर्मास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करें। उन्होंने कहा कि यह केवल चार माह का आयोजन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के धार्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक निर्माण का सशक्त आधार है।</p>
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		<title>युवा पीढ़ी और जैन धर्म: चुनौतियाँ एवं समाधान : समयानुकूल प्रस्तुति से धर्म के प्रति जागृत होगी नई पीढ़ी की आस्था </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Jun 2026 15:55:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[युवा पीढ़ी को जैन धर्म से जोड़ने के लिए आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रेमपूर्ण व्यवहार की आवश्यकता है। धर्म के शाश्वत सिद्धांतों को समयानुकूल शैली में प्रस्तुत करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट। मुरैना/द्रोणगिरी। धर्म केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>युवा पीढ़ी को जैन धर्म से जोड़ने के लिए आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रेमपूर्ण व्यवहार की आवश्यकता है। धर्म के शाश्वत सिद्धांतों को समयानुकूल शैली में प्रस्तुत करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना/द्रोणगिरी</strong>। धर्म केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली चेतना है। वर्तमान समय में युवा पीढ़ी को जैन धर्म से जोड़ने के लिए आवश्यक है कि धर्म के शाश्वत सिद्धांतों को आधुनिक और सरल शैली में प्रस्तुत किया जाए। यह विचार अंशुल जैन शास्त्री ने अपने लेख &#8220;युवा पीढ़ी और जैन धर्म: चुनौतियाँ एवं समाधान&#8221; में व्यक्त किए।</p>
<p><strong>समयानुकूल हो धर्म की प्रस्तुति</strong></p>
<p>अंशुल शास्त्री ने कहा कि आज का युग विज्ञान, तकनीक और तर्क का युग है। युवा हर बात को समझना चाहता है, इसलिए धर्म की मूल शिक्षाओं को सरल भाषा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जीवनोपयोगी उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत करना समय की आवश्यकता है।</p>
<p><strong>तकनीक बने धर्म प्रचार का माध्यम</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन कक्षाएँ, प्रेरणादायी वीडियो, संवादात्मक चर्चाएँ और आधुनिक संचार माध्यम युवाओं में धर्म के प्रति जिज्ञासा और आस्था विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।</p>
<p><strong>धर्म के पीछे का जीवन-दर्शन समझाना जरूरी</strong></p>
<p>लेख में बताया गया है कि केवल मंदिर जाने की प्रेरणा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि युवाओं को यह भी समझाना चाहिए कि पूजा, अभिषेक, स्वाध्याय और मंदिर दर्शन का आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक महत्व क्या है। जब वे धर्म के जीवन-दर्शन को समझेंगे, तभी उससे स्थायी रूप से जुड़ेंगे।</p>
<p><strong>प्रेमपूर्ण व्यवहार से बढ़ेगी श्रद्धा</strong></p>
<p>अंशुल शास्त्री ने कहा कि मंदिर आने वाले बच्चों और युवाओं की छोटी-छोटी भूलों पर उन्हें डाँटने के बजाय प्रेमपूर्वक मार्गदर्शन करना चाहिए। अपनत्व और स्नेह का वातावरण ही उनके मन में धर्म के प्रति श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न करेगा।</p>
<p><strong>संस्कारवान भविष्य का आधार</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि आज का बालक और युवा ही भविष्य में समाज, जिनालय और जैन संस्कृति का संवाहक बनेगा। यदि वर्तमान पीढ़ी को धर्म से जोड़ दिया गया, तो भविष्य संस्कारवान, संयमित और उज्ज्वल होगा।</p>
<p><strong>यही है समय की पुकार</strong></p>
<p>लेख में निष्कर्ष स्वरूप कहा गया है कि जैन धर्म का स्वरूप शाश्वत है, लेकिन उसकी प्रस्तुति युगानुकूल होनी चाहिए। आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्कसंगत व्याख्या, सतत स्वाध्याय और प्रेमपूर्ण व्यवहार के माध्यम से ही नई पीढ़ी के हृदय में जिनवाणी के प्रति अटूट श्रद्धा का दीप प्रज्वलित किया जा सकता है।</p>
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		<title>श्रुत पंचमी पर डडूका में जिनवाणी सजाओ प्रतियोगिता आयोजित : बच्चों ने भक्ति और रचनात्मकता से सजाई जिनवाणी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 Jun 2026 15:33:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रुत पंचमी के पावन अवसर पर दिगंबर जैन पाठशाला डडूका द्वारा बच्चों के लिए जिनवाणी सजाओ प्रतियोगिता आयोजित की गई। प्रतिभागियों ने जिनवाणी ग्रंथों को आकर्षक रूप से सजाकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। पढ़िए अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट। डडूका। श्रुत पंचमी महापर्व के अवसर पर दिगंबर जैन पाठशाला डडूका द्वारा बच्चों के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्रुत पंचमी के पावन अवसर पर दिगंबर जैन पाठशाला डडूका द्वारा बच्चों के लिए जिनवाणी सजाओ प्रतियोगिता आयोजित की गई। प्रतिभागियों ने जिनवाणी ग्रंथों को आकर्षक रूप से सजाकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> श्रुत पंचमी महापर्व के अवसर पर दिगंबर जैन पाठशाला डडूका द्वारा बच्चों के लिए जिनवाणी सजाओ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता का उद्देश्य बच्चों में जिनवाणी के प्रति श्रद्धा, संस्कार और धार्मिक जागरूकता विकसित करना रहा।</p>
<p><strong>बच्चों ने दिखाई रचनात्मक प्रतिभा</strong></p>
<p>पाठशाला प्रेरक अजीत कोठिया के निर्देशन में आयोजित प्रतियोगिता में बच्चों ने जिनवाणी ग्रंथों को विभिन्न आकर्षक स्वरूपों में सजाकर अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। प्रतियोगिता के दौरान बच्चों में विशेष उत्साह देखने को मिला।</p>
<p><strong>इन प्रतिभागियों ने प्राप्त किए पुरस्कार</strong></p>
<p>प्रतियोगिता में रियल जैन ने प्रथम, जियाना जैन ने द्वितीय तथा सिद्धम, हर्षल एवं कथनी ने संयुक्त रूप से तृतीय स्थान प्राप्त किया। वहीं हियानी एवं दीक्षिता को सांत्वना पुरस्कार प्रदान कर प्रोत्साहित किया गया।</p>
<p><strong>निर्णायकों ने किया मूल्यांकन</strong></p>
<p>प्रतियोगिता का मूल्यांकन जैन समाज अध्यक्ष राजेश के शाह तथा मुकेश शाह द्वारा किया गया। उन्होंने बच्चों के प्रयासों की सराहना करते हुए धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में निरंतर भागीदारी के लिए प्रेरित किया।</p>
<p><strong>अतिथियों की रही गरिमामयी उपस्थिति</strong></p>
<p>कार्यक्रम में श्रीमती कुसुम कोठिया एवं श्रीमती विमला आर. शाह विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। उन्होंने बच्चों की प्रस्तुति की प्रशंसा करते हुए ऐसे आयोजनों को संस्कार निर्माण की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया।</p>
<p><strong>आभार के साथ हुआ समापन</strong></p>
<p>कार्यक्रम का संचालन अजीत कोठिया ने किया। अंत में सिद्धम जैन ने सभी प्रतिभागियों, अभिभावकों एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। प्रतियोगिता ने बच्चों में जिनवाणी के प्रति श्रद्धा और अध्ययन की भावना को और अधिक मजबूत किया।</p>
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		<title>भारतीय ज्ञान परंपरा के उत्कर्ष में जैन दर्शन, साहित्य और संस्कृति की अमिट भूमिका : अहिंसा, अनेकांत और ज्ञान की धारा ने समृद्ध किया भारतीय चिंतन </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 Jun 2026 07:55:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में जैन दर्शन, साहित्य और संस्कृति का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्राकृत भाषा, आगम साहित्य और जैनाचार्यों के वाङ्मय ने भारतीय सभ्यता को नई दिशा प्रदान की है। पढ़िए डॉ. सुनील जैन ‘संचय’ का आलेख । ललितपुर । भारत की सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा अनेक आध्यात्मिक एवं दार्शनिक धाराओं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में जैन दर्शन, साहित्य और संस्कृति का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्राकृत भाषा, आगम साहित्य और जैनाचार्यों के वाङ्मय ने भारतीय सभ्यता को नई दिशा प्रदान की है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. सुनील जैन ‘संचय’ का आलेख ।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर</strong> । भारत की सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा अनेक आध्यात्मिक एवं दार्शनिक धाराओं के समन्वय से विकसित हुई है। इनमें जैन संस्कृति का योगदान अत्यंत प्राचीन, विशिष्ट और गौरवपूर्ण माना जाता है। जैनाचार्यों ने धर्म और अध्यात्म के साथ-साथ साहित्य, भाषा, विज्ञान, कला, स्थापत्य और सामाजिक चिंतन के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया है।</p>
<p><strong>ज्ञान को लोककल्याण का माध्यम</strong></p>
<p>जैन परंपरा ने सदैव ज्ञान को समाज और मानवता के कल्याण का साधन माना है। आत्मानुशासन, अहिंसा, करुणा और अनेकांत के सिद्धांतों पर आधारित जैन चिंतन ने जीवन के विविध क्षेत्रों को दिशा प्रदान की। जैन विद्वानों ने दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष, गणित, चिकित्सा, वास्तु, इतिहास, काव्य और नाटक सहित अनेक विषयों पर विशाल साहित्य का सृजन किया।</p>
<p><strong>भारतीय भाषाओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान</strong></p>
<p>संस्कृत, प्राकृत, पालि और अपभ्रंश जैसी भाषाओं के संरक्षण और विकास में जैन साहित्य की भूमिका उल्लेखनीय रही है। इन भाषाओं के माध्यम से न केवल ज्ञान का संवर्धन हुआ, बल्कि भारतीय संस्कृति की विविधता और एकता भी सुदृढ़ हुई। विशेष रूप से प्राकृत भाषा जनसामान्य की भाषा रही, जिसे जैन तीर्थंकरों और आचार्यों ने अपने उपदेशों का माध्यम बनाया।</p>
<p><strong>प्राकृत भाषा को मिला शास्त्रीय सम्मान</strong></p>
<p>प्राकृत साहित्य की सरलता और जनसुलभता ने भारतीय साहित्य को नई दिशा प्रदान की। वर्ष 2024 में भारत सरकार द्वारा प्राकृत भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने से इसके संरक्षण, अनुसंधान और अध्ययन के नए अवसर खुले हैं। इससे नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान की इस महत्वपूर्ण धरोहर से अधिक परिचित हो सकेगी।</p>
<p><strong>जैन आगम साहित्य ज्ञान का विशाल भंडार</strong></p>
<p>जैन आगम केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीति और इतिहास के भी महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। आगमों के साथ उनकी निर्युक्ति, चूर्णी, भाष्य और अन्य व्याख्यात्मक साहित्य भारतीय चिंतन की गहराई और व्यापकता को उजागर करते हैं।</p>
<p><strong>इतिहास के पुनर्निर्माण में सहायक</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों, प्रशस्तियों और शिलालेखों में अनेक ऐतिहासिक जानकारियां सुरक्षित हैं। इन स्रोतों के आधार पर कई राजवंशों, शासकों और सामाजिक परिस्थितियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। इतिहासकारों के लिए जैन साहित्य एक महत्वपूर्ण संदर्भ स्रोत के रूप में स्थापित है।</p>
<p><strong>विविध विषयों पर समृद्ध वाङ्मय</strong></p>
<p>जैनाचार्यों द्वारा रचित वाङ्मय में दर्शन, तर्कशास्त्र, भाषा विज्ञान, साहित्य, संगीत, कला, समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थव्यवस्था, खगोल, भूगोल और नैतिक मूल्यों सहित जीवन के लगभग सभी पक्षों पर गंभीर चिंतन मिलता है। यह साहित्य भारतीय बौद्धिक परंपरा की समृद्धि का प्रमाण है।</p>
<p><strong>संरक्षण की प्रतीक्षा में हजारों पांडुलिपियां</strong></p>
<p>देश के अनेक शास्त्र भंडारों, पुस्तकालयों, संग्रहालयों और मंदिरों में हजारों दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां सुरक्षित हैं, लेकिन उनमें से अनेक संरक्षण और डिजिटलीकरण की प्रतीक्षा कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते इनके संरक्षण और शोध पर ध्यान देना आवश्यक है।</p>
<p><strong>शोध संस्थानों की ऐतिहासिक भूमिका</strong></p>
<p>गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार सहित देश के विभिन्न राज्यों में स्थित जैन शास्त्र भंडारों और शोध संस्थानों ने इस विरासत को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यहां संरक्षित सामग्री भारतीय इतिहास और संस्कृति के पुनर्मूल्यांकन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।</p>
<p><strong>विश्व को दिशा देने वाली ज्ञान परंपरा</strong></p>
<p>जैन संस्कृति भारतीय ज्ञान परंपरा की एक प्रभावशाली धारा है, जिसने अहिंसा, सह-अस्तित्व, अनेकांत और ज्ञान की प्रतिष्ठा के माध्यम से भारतीय चिंतन को नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। आज आवश्यकता है कि जैन साहित्य और संस्कृति को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की व्यापक विरासत के रूप में देखा जाए।</p>
<p><strong>ज्ञान का उज्ज्वल नक्षत्र</strong></p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि जैन साहित्य और संस्कृति के गहन अध्ययन से भारतीय सभ्यता के अनेक अनछुए पक्ष सामने आ सकते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा के आकाश में जैन दर्शन और साहित्य का प्रकाश सदैव एक उज्ज्वल नक्षत्र की भांति मार्गदर्शन करता रहेगा।</p>
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		<title>रवीन्द्र भवन सागर में प्राकृत विद्या शिक्षण शिविरों का भव्य सामूहिक समापन, प्रतिभाओं का हुआ सम्मान: प्राकृत प्रज्ञा प्रतियोगिता के विजेताओं को मिले आकर्षक पुरस्कार, प्राकृत भाषा संरक्षण के संकल्प के साथ संपन्न हुआ समारोह </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 09 Jun 2026 17:50:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ सागर के रवीन्द्र भवन में प्राकृत विद्या शिक्षण शिविरों का भव्य सामूहिक समापन एवं सम्मान समारोह आयोजित हुआ। उत्कृष्ट विद्यार्थियों, संयोजकों और कार्यकर्ताओं का सम्मान किया गया तथा प्रतियोगिता विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए गए। सागर से पढ़िए,रत्नेश जैन एवं राजेश जैन रागी की खबर सागर। सागर के रवीन्द्र भवन में प्राकृत भाषा विकास फाउंडेशन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> सागर के रवीन्द्र भवन में प्राकृत विद्या शिक्षण शिविरों का भव्य सामूहिक समापन एवं सम्मान समारोह आयोजित हुआ। उत्कृष्ट विद्यार्थियों, संयोजकों और कार्यकर्ताओं का सम्मान किया गया तथा प्रतियोगिता विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए गए। <span style="color: #ff0000">सागर से पढ़िए,रत्नेश जैन एवं राजेश जैन रागी की खबर</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> सागर के रवीन्द्र भवन में प्राकृत भाषा विकास फाउंडेशन द्वारा आयोजित प्राकृत विद्या शिक्षण शिविरों का भव्य सामूहिक समापन एवं सम्मान समारोह गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, अभिभावक, समाजजन एवं प्राकृत भाषा के प्रेमी शामिल हुए। पूरे सभागार में प्राकृत भाषा और जैन संस्कृति के प्रति उत्साह का वातावरण देखने को मिला।</p>
<p><strong>अनेक क्षेत्रों में लगाए गए थे शिक्षण शिविर</strong></p>
<p>फाउंडेशन द्वारा सागर नगर सहित गौराबाई कटरा, रामपुरा वार्ड, बालक कॉम्प्लेक्स, वर्धमान कॉलोनी, नेहानगर, तिलकगंज, शाहगढ़ और गढ़ाकोटा सहित कई क्षेत्रों में प्राकृत विद्या शिक्षण शिविर आयोजित किए गए थे। इन शिविरों में विद्यार्थियों को प्राकृत भाषा, जैन संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन कराया गया।</p>
<p><strong>अतिथियों ने की फाउंडेशन की सराहना</strong></p>
<p>समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संतोष जैन ‘घड़ी’ एवं जिला शिक्षा अधिकारी अरविंद जैन उपस्थित रहे। अतिथियों ने अपने संबोधन में प्राकृत भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए इसे भारतीय सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की महत्वपूर्ण पहल बताया।</p>
<p><strong>शिविरों की उपलब्धियों का प्रस्तुत किया प्रतिवेदन</strong></p>
<p>क्षेत्रीय संयोजक अनिल जैन शास्त्री एवं विजय जैन शास्त्री (शाहगढ़) ने विभिन्न शिविरों की गतिविधियों और उपलब्धियों का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। वहीं फाउंडेशन के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. आशीष जैन आचार्य ने प्राकृत भाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए अधिक से अधिक लोगों को इसके अध्ययन से जुड़ने का आह्वान किया।</p>
<p><strong>विद्वानों का मिला मार्गदर्शन</strong></p>
<p>कार्यक्रम को सफल बनाने में राजकुमार जैन शास्त्री, डॉ. हरिश्चंद्र जैन शास्त्री, नन्हेभाई शास्त्री एवं पवन दीवान का विशेष मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उनके प्रेरक विचारों ने उपस्थित जनसमूह को प्राकृत भाषा के प्रति और अधिक जागरूक किया।</p>
<p><strong>प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का हुआ सम्मान</strong></p>
<p>समारोह में विभिन्न शिविरों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान के पुरस्कार प्रदान किए गए। साथ ही सभी शिविरों के स्थानीय संयोजकों, अध्यक्षों, मंत्रियों एवं सहयोगी कार्यकर्ताओं का भी सम्मान किया गया।</p>
<p><strong>लकी ड्रा रहा आकर्षण का केंद्र</strong></p>
<p>कार्यक्रम के प्रमुख आकर्षणों में प्राकृत प्रज्ञा प्रतियोगिता के प्रतिभागियों के लिए आयोजित लकी ड्रा रहा। विजेताओं को आकर्षक पुरस्कार प्रदान किए गए, जिससे प्रतिभागियों में विशेष उत्साह देखने को मिला।</p>
<p><strong>प्रभावी संचालन और आभार प्रदर्शन</strong></p>
<p>समारोह का संचालन डॉ. राजेश जैन शास्त्री (ललितपुर) ने अपनी प्रभावी एवं सरस शैली में किया। अंत में अरुण जैन शास्त्री (जबलपुर) ने सभी अतिथियों, सहयोगियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।</p>
<p><strong>नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का संदेश</strong></p>
<p>यह समारोह केवल एक समापन कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि प्राकृत भाषा के प्रचार-प्रसार और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का एक प्रेरणादायी अभियान बनकर उभरा। कार्यक्रम ने समाज में भाषा, संस्कृति और संस्कारों के संरक्षण का सशक्त संदेश दिया।</p>
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		<title>धर्म संस्कार शिविर में बच्चों ने सीखी जल अभिषेक और द्रव्य पूजा की विधि: श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन बड़े मंदिर में तीसरे रविवार आयोजित हुआ विशेष प्रशिक्षण, बच्चों ने उत्साह से लिया भाग </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Jun 2026 06:04:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ अंबाह के श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन बड़े मंदिर में आयोजित धर्म संस्कार शिविर में बच्चों को जल अभिषेक एवं द्रव्य पूजा की विधि सिखाई गई। विद्वानों ने पूजा के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बच्चों को धार्मिक संस्कारों से जोड़ने का संदेश दिया। अंबाह से पढ़िए, अजय जैन की यह खबर  &#160; अंबाह। विनम्र [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> अंबाह के श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन बड़े मंदिर में आयोजित धर्म संस्कार शिविर में बच्चों को जल अभिषेक एवं द्रव्य पूजा की विधि सिखाई गई। विद्वानों ने पूजा के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बच्चों को धार्मिक संस्कारों से जोड़ने का संदेश दिया। <span style="color: #ff0000">अंबाह से पढ़िए, अजय जैन की यह खबर </span></strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<hr />
<p><strong>अंबाह।</strong> विनम्र एकेडमी द्वारा संचालित धर्म संस्कार शिविर के अंतर्गत रविवार सुबह श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन बड़े मंदिर में विशेष पूजन प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। लगातार तीसरे रविवार आयोजित इस शिविर में बच्चों ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ भाग लिया तथा जैन धर्म की मूल पूजन विधियों को सीखा।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>बच्चों को सिखाई गई पूजन की विधि</strong></p>
<p>शिविर में बाहर से पधारे विद्वान नमन जैन एवं स्थानीय प्रशिक्षक राजुल जैन ने बच्चों को भगवान श्री शांतिनाथ के समक्ष जल अभिषेक और द्रव्य पूजा की संपूर्ण विधि सिखाई। बच्चों को केवल प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे आध्यात्मिक महत्व की भी जानकारी दी गई।</p>
<p><strong>जल अभिषेक का बताया महत्व</strong></p>
<p>विद्वान नमन जैन ने बच्चों को बताया कि जल अभिषेक आत्मशुद्धि, मन की निर्मलता और पापकर्मों के क्षय का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने कहा कि विधिपूर्वक अभिषेक करने से मन में शांति आती है, सकारात्मक सोच विकसित होती है और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।</p>
<p><strong>द्रव्य पूजा से बढ़ती है भक्ति भावना</strong></p>
<p>राजुल जैन ने द्रव्य पूजा का महत्व बताते हुए कहा कि भगवान के प्रति श्रद्धा और समर्पण भाव से की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में अनुशासन, सदाचार और नैतिक मूल्यों को मजबूत करती है। साथ ही यह व्यक्ति को अहंकार से दूर रखकर आत्मविकास की दिशा में आगे बढ़ाती है।</p>
<p><strong>बच्चों ने बड़े उत्साह से किया अभ्यास</strong></p>
<p>जैसे ही बच्चों ने कतारबद्ध होकर भगवान के समक्ष जल अभिषेक प्रारंभ किया, पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से भर गया। बच्चों ने पूरे अनुशासन और श्रद्धा के साथ अभिषेक किया तथा द्रव्य पूजा की विधि का अभ्यास भी किया। इससे उन्हें पूजा की संपूर्ण प्रक्रिया का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong>धर्म के साथ संस्कारों की भी शिक्षा</strong></p>
<p>शिविर में बच्चों और युवाओं को जैन धर्म के मूल सिद्धांतों जैसे अहिंसा, सत्य, संयम और आत्मशुद्धि के महत्व से भी परिचित कराया गया। विद्वानों ने कहा कि यदि बचपन से ही अच्छे धार्मिक संस्कार दिए जाएं तो आने वाली पीढ़ी सुसंस्कारित और आदर्श बन सकती है।</p>
<p><strong>विश्व शांति और जनकल्याण की कामना</strong></p>
<p>इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने भगवान श्री शांतिनाथ की आराधना कर विश्व शांति, समाज के कल्याण और सुख-समृद्धि की मंगलकामना की। विद्वानों ने बताया कि नियमित पूजन और आराधना से आत्मा की शुद्धि होती है तथा जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं</p>
<p><strong>बच्चों के लिए स्वल्पाहार की व्यवस्था</strong></p>
<p>कार्यक्रम के बाद मंदिर परिसर के बाहर चंदनबाला महिला मंडल द्वारा बच्चों को स्वल्पाहार वितरित किया गया। इससे बच्चों में विशेष उत्साह देखने को मिला और सभी ने आनंदपूर्वक प्रसाद ग्रहण किया।</p>
<p><strong>शांतिपाठ के साथ हुआ समापन</strong></p>
<p>कार्यक्रम का समापन शांतिपाठ के साथ हुआ। आयोजकों ने बताया कि धर्म संस्कार शिविर का उद्देश्य नई पीढ़ी को धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ना है, ताकि वे संस्कारवान और आदर्श जीवन की ओर आगे बढ़ सकें।</p>
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		<title>तीर्थ यात्रा 53 ज्ञान, साधना और आस्था का संगम है श्री दिगंबर जैन ज्ञानतीर्थ मुरैना : 50 फीट ऊंची कृत्रिम पहाड़ी पर विराजमान भगवान आदिनाथ की 13 फुट भव्य प्रतिमा </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Rekha Jain]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 May 2026 00:30:44 +0000</pubDate>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>जैन अतिशय क्षेत्र जैन धर्म के अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं। इन क्षेत्रों में जैन धर्म के भगवान महावीर और उनके पूर्वकल्याणकारक जिनेन्द्र देव के आध्यात्मिक लीलाओं के अतिशय (अद्भुत) घटनाएं मान्यता प्राप्त हैं। इन स्थलों पर जैन समुदाय के श्रद्धालु भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करते हैं और ध्यान धरते हैं। भारत के कुछ अतिशय क्षेत्रों की जानकारी दे रही हैं <strong><span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा जैन।</span></strong> इसकी 53वीं कड़ी में आज पढ़िए धार जिले में स्थित श्री दिगंबर जैन ज्ञान तीर्थ क्षेत्र, ए. बी. रोड, घोलपुर &#8211; आगरा हाइवे, जिला मुरैना (मध्यप्रदेश) के बारे में&#8230;</p>
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