<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Jain Agam &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
	<atom:link href="https://www.shreephaljainnews.com/tag/jain-agam/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://www.shreephaljainnews.com</link>
	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
	<lastBuildDate>Sat, 20 Jun 2026 08:03:25 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=7.0.2</generator>

<image>
	<url>https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/09/cropped-shri-32x32.png</url>
	<title>Jain Agam &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
	<link>https://www.shreephaljainnews.com</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>ज्ञान, साहित्य और श्रमण संस्कृति के महान संरक्षक थे डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक : 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धापूर्वक किया गया स्मरण </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/dr_lakshmisenji_bhattarak_7th_samadhi_diwas_kolhapur/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/dr_lakshmisenji_bhattarak_7th_samadhi_diwas_kolhapur/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 Jun 2026 08:03:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Dr Lakshmisenji Bhattarak]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Agam]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[jain history]]></category>
		<category><![CDATA[Jain literature]]></category>
		<category><![CDATA[Kolhapur Jain Math]]></category>
		<category><![CDATA[Maharashtra Jain Sahitya Parishad]]></category>
		<category><![CDATA[Samadhi Diwas]]></category>
		<category><![CDATA[Shraman Culture]]></category>
		<category><![CDATA[कोल्हापुर जैन मठ]]></category>
		<category><![CDATA[जिन आगम]]></category>
		<category><![CDATA[जैन इतिहास]]></category>
		<category><![CDATA[जैन धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[डॉ लक्ष्मीसेनजी भट्टारक]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[महाराष्ट्र जैन साहित्य परिषद]]></category>
		<category><![CDATA[श्रमण संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[समाधि दिवस]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=108379</guid>

					<description><![CDATA[कोल्हापुर स्थित श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठ के मठाधीश एवं जैन दर्शन, साहित्य तथा श्रमण संस्कृति के महान संरक्षक परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक के 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धालुओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। पढ़िए विशेष रिपोर्ट। कोल्हापुर। श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठ के मठाधीश, धर्म दिवाकर सहितासूरी, जिन आगम एवं श्रमण संस्कृति के परम [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>कोल्हापुर स्थित श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठ के मठाधीश एवं जैन दर्शन, साहित्य तथा श्रमण संस्कृति के महान संरक्षक परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक के 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धालुओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। <span style="color: #ff0000">पढ़िए विशेष रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोल्हापुर</strong>। श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठ के मठाधीश, धर्म दिवाकर सहितासूरी, जिन आगम एवं श्रमण संस्कृति के परम संरक्षक परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक के 7वें समाधि दिवस पर देशभर के श्रद्धालुओं एवं समाजजनों ने उनकी पुण्य स्मृति को श्रद्धापूर्वक नमन किया।</p>
<p><strong>अल्पायु में ग्रहण किया भट्टारक पद</strong></p>
<p>डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक ने मात्र 23 वर्ष की आयु में भट्टारक पद की दीक्षा ग्रहण की थी। दीक्षा के पश्चात भी उन्होंने शिक्षा का क्रम जारी रखा और हिंदी में प्रवीणता, संस्कृत में काव्यतीर्थ तथा अर्धमागधी एवं प्राकृत में एम.ए. की उपाधियां प्राप्त कीं।</p>
<p><strong>शिक्षा और ज्ञान के प्रति अद्भुत समर्पण</strong></p>
<p>ज्ञानार्जन के प्रति उनकी निष्ठा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 75 वर्ष की आयु में उन्होंने शिवाजी विश्वविद्यालय से जैनोलॉजी विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाले वे प्रथम भट्टारक के रूप में विख्यात हुए।</p>
<p><strong>जैन साहित्य आंदोलन को दी नई दिशा</strong></p>
<p>सन 1984 से महाराष्ट्र जैन साहित्य परिषद के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने महाराष्ट्र एवं कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में 23 जैन साहित्य सम्मेलनों का सफल आयोजन कराया। उनके नेतृत्व में जैन साहित्य एवं इतिहास के संरक्षण और प्रचार-प्रसार को नई गति मिली।</p>
<p><strong>शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान</strong></p>
<p>श्री लक्ष्मीसेन विद्यापीठ के माध्यम से कोल्हापुर, रामबाण और बेलगांव में अनेक शैक्षणिक संस्थाओं का संचालन किया गया। उन्होंने शिक्षा को समाज निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम माना और जीवनभर इसके लिए कार्य किया।</p>
<p><strong>ग्रंथ लेखन और प्रकाशन में उल्लेखनीय भूमिका</strong></p>
<p>डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक ने श्री लक्ष्मीसेन दिगंबर जैन ग्रंथमाला प्रकाशन संस्था के माध्यम से 12 महत्वपूर्ण ग्रंथों का लेखन एवं प्रकाशन कराया। साथ ही उन्होंने &#8220;रत्नत्रय&#8221; मासिक पत्रिका का प्रकाशन कर जैन साहित्य को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।</p>
<p><strong>धर्मप्रभावना के लिए देश-विदेश में किया प्रवास</strong></p>
<p>उन्होंने पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सवों, जिनालयों के जीर्णोद्धार, मौंजीबंधन, प्रायश्चित्त संस्कार सहित अनेक धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाई। अहिंसा, पर्यावरण संरक्षण और व्यसनमुक्ति के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने भारत के साथ अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा और नेपाल सहित कई देशों की यात्राएं कीं।</p>
<p><strong>श्रद्धा और प्रेरणा का अमिट स्रोत</strong></p>
<p>तेजस्वी, ओजस्वी और शांत व्यक्तित्व के धनी डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक ने अपना संपूर्ण जीवन धर्म, शिक्षा, समाज सेवा और संस्कृति संरक्षण को समर्पित किया। वे जैन इतिहास, साहित्य और श्रमण संस्कृति के सशक्त प्रेरणास्रोत रहे।</p>
<p><strong>20 जून 2019 को हुए समाधिस्थ</strong></p>
<p>परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक महास्वामी 20 जून 2019 को प्रातःकाल लगभग 78 वर्ष की आयु में समाधिस्थ हुए थे। उनके द्वारा स्थापित आदर्श, साहित्यिक योगदान और धर्मप्रभावना का कार्य आज भी समाज का मार्गदर्शन कर रहा है।</p>
<p><strong>कोटिशः इच्छामि अर्पित</strong></p>
<p>उनके 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धालुओं ने उनकी पुण्य स्मृति को विनम्र नमन करते हुए कोटिशः इच्छामि अर्पित की तथा उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प व्यक्त किया।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/dr_lakshmisenji_bhattarak_7th_samadhi_diwas_kolhapur/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भारतीय ज्ञान परंपरा के उत्कर्ष में जैन दर्शन, साहित्य और संस्कृति की अमिट भूमिका : अहिंसा, अनेकांत और ज्ञान की धारा ने समृद्ध किया भारतीय चिंतन </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/bharatiya_gyan_parampara_mein_jain_darshan_sahitya_aur_sanskriti_ki_bhumik/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/bharatiya_gyan_parampara_mein_jain_darshan_sahitya_aur_sanskriti_ki_bhumik/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 20 Jun 2026 07:55:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Ahimsa]]></category>
		<category><![CDATA[Anekant]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Heritage]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Knowledge Tradition]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Agam]]></category>
		<category><![CDATA[jain culture]]></category>
		<category><![CDATA[Jain literature]]></category>
		<category><![CDATA[jain philosophy]]></category>
		<category><![CDATA[Manuscript Preservation]]></category>
		<category><![CDATA[Prakrit language]]></category>
		<category><![CDATA[अनेकांत]]></category>
		<category><![CDATA[अहिंसा]]></category>
		<category><![CDATA[जैन आगम]]></category>
		<category><![CDATA[जैन दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[जैन संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[पांडुलिपि संरक्षण]]></category>
		<category><![CDATA[प्राकृत भाषा]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय ज्ञान परंपरा]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय संस्कृति]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=108371</guid>

					<description><![CDATA[भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में जैन दर्शन, साहित्य और संस्कृति का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्राकृत भाषा, आगम साहित्य और जैनाचार्यों के वाङ्मय ने भारतीय सभ्यता को नई दिशा प्रदान की है। पढ़िए डॉ. सुनील जैन ‘संचय’ का आलेख । ललितपुर । भारत की सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा अनेक आध्यात्मिक एवं दार्शनिक धाराओं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास में जैन दर्शन, साहित्य और संस्कृति का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्राकृत भाषा, आगम साहित्य और जैनाचार्यों के वाङ्मय ने भारतीय सभ्यता को नई दिशा प्रदान की है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. सुनील जैन ‘संचय’ का आलेख ।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर</strong> । भारत की सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा अनेक आध्यात्मिक एवं दार्शनिक धाराओं के समन्वय से विकसित हुई है। इनमें जैन संस्कृति का योगदान अत्यंत प्राचीन, विशिष्ट और गौरवपूर्ण माना जाता है। जैनाचार्यों ने धर्म और अध्यात्म के साथ-साथ साहित्य, भाषा, विज्ञान, कला, स्थापत्य और सामाजिक चिंतन के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया है।</p>
<p><strong>ज्ञान को लोककल्याण का माध्यम</strong></p>
<p>जैन परंपरा ने सदैव ज्ञान को समाज और मानवता के कल्याण का साधन माना है। आत्मानुशासन, अहिंसा, करुणा और अनेकांत के सिद्धांतों पर आधारित जैन चिंतन ने जीवन के विविध क्षेत्रों को दिशा प्रदान की। जैन विद्वानों ने दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष, गणित, चिकित्सा, वास्तु, इतिहास, काव्य और नाटक सहित अनेक विषयों पर विशाल साहित्य का सृजन किया।</p>
<p><strong>भारतीय भाषाओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान</strong></p>
<p>संस्कृत, प्राकृत, पालि और अपभ्रंश जैसी भाषाओं के संरक्षण और विकास में जैन साहित्य की भूमिका उल्लेखनीय रही है। इन भाषाओं के माध्यम से न केवल ज्ञान का संवर्धन हुआ, बल्कि भारतीय संस्कृति की विविधता और एकता भी सुदृढ़ हुई। विशेष रूप से प्राकृत भाषा जनसामान्य की भाषा रही, जिसे जैन तीर्थंकरों और आचार्यों ने अपने उपदेशों का माध्यम बनाया।</p>
<p><strong>प्राकृत भाषा को मिला शास्त्रीय सम्मान</strong></p>
<p>प्राकृत साहित्य की सरलता और जनसुलभता ने भारतीय साहित्य को नई दिशा प्रदान की। वर्ष 2024 में भारत सरकार द्वारा प्राकृत भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने से इसके संरक्षण, अनुसंधान और अध्ययन के नए अवसर खुले हैं। इससे नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान की इस महत्वपूर्ण धरोहर से अधिक परिचित हो सकेगी।</p>
<p><strong>जैन आगम साहित्य ज्ञान का विशाल भंडार</strong></p>
<p>जैन आगम केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीति और इतिहास के भी महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। आगमों के साथ उनकी निर्युक्ति, चूर्णी, भाष्य और अन्य व्याख्यात्मक साहित्य भारतीय चिंतन की गहराई और व्यापकता को उजागर करते हैं।</p>
<p><strong>इतिहास के पुनर्निर्माण में सहायक</strong></p>
<p>जैन ग्रंथों, प्रशस्तियों और शिलालेखों में अनेक ऐतिहासिक जानकारियां सुरक्षित हैं। इन स्रोतों के आधार पर कई राजवंशों, शासकों और सामाजिक परिस्थितियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। इतिहासकारों के लिए जैन साहित्य एक महत्वपूर्ण संदर्भ स्रोत के रूप में स्थापित है।</p>
<p><strong>विविध विषयों पर समृद्ध वाङ्मय</strong></p>
<p>जैनाचार्यों द्वारा रचित वाङ्मय में दर्शन, तर्कशास्त्र, भाषा विज्ञान, साहित्य, संगीत, कला, समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थव्यवस्था, खगोल, भूगोल और नैतिक मूल्यों सहित जीवन के लगभग सभी पक्षों पर गंभीर चिंतन मिलता है। यह साहित्य भारतीय बौद्धिक परंपरा की समृद्धि का प्रमाण है।</p>
<p><strong>संरक्षण की प्रतीक्षा में हजारों पांडुलिपियां</strong></p>
<p>देश के अनेक शास्त्र भंडारों, पुस्तकालयों, संग्रहालयों और मंदिरों में हजारों दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां सुरक्षित हैं, लेकिन उनमें से अनेक संरक्षण और डिजिटलीकरण की प्रतीक्षा कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते इनके संरक्षण और शोध पर ध्यान देना आवश्यक है।</p>
<p><strong>शोध संस्थानों की ऐतिहासिक भूमिका</strong></p>
<p>गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार सहित देश के विभिन्न राज्यों में स्थित जैन शास्त्र भंडारों और शोध संस्थानों ने इस विरासत को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यहां संरक्षित सामग्री भारतीय इतिहास और संस्कृति के पुनर्मूल्यांकन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।</p>
<p><strong>विश्व को दिशा देने वाली ज्ञान परंपरा</strong></p>
<p>जैन संस्कृति भारतीय ज्ञान परंपरा की एक प्रभावशाली धारा है, जिसने अहिंसा, सह-अस्तित्व, अनेकांत और ज्ञान की प्रतिष्ठा के माध्यम से भारतीय चिंतन को नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। आज आवश्यकता है कि जैन साहित्य और संस्कृति को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की व्यापक विरासत के रूप में देखा जाए।</p>
<p><strong>ज्ञान का उज्ज्वल नक्षत्र</strong></p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि जैन साहित्य और संस्कृति के गहन अध्ययन से भारतीय सभ्यता के अनेक अनछुए पक्ष सामने आ सकते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा के आकाश में जैन दर्शन और साहित्य का प्रकाश सदैव एक उज्ज्वल नक्षत्र की भांति मार्गदर्शन करता रहेगा।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/bharatiya_gyan_parampara_mein_jain_darshan_sahitya_aur_sanskriti_ki_bhumik/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>श्रुत पंचमी जिनवाणी के प्रति श्रद्धा, संरक्षण एवं कृतज्ञता का महापर्व : महावीर मंदिर से निकली भव्य शोभायात्रा, श्रद्धालुओं ने लिया नियमित स्वाध्याय का संकल्प </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/shrut_panchami_mahotsav_kuchaman_city_mahavir_mandir/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/shrut_panchami_mahotsav_kuchaman_city_mahavir_mandir/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Jun 2026 09:42:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Agam]]></category>
		<category><![CDATA[jain religion]]></category>
		<category><![CDATA[Jinwani Mata]]></category>
		<category><![CDATA[Kuchaman City]]></category>
		<category><![CDATA[Mahavir Mandir]]></category>
		<category><![CDATA[Rekha Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Religious Procession]]></category>
		<category><![CDATA[Shrut Panchami]]></category>
		<category><![CDATA[Swadhyay]]></category>
		<category><![CDATA[अमित पाटोदी]]></category>
		<category><![CDATA[कुचामन सिटी]]></category>
		<category><![CDATA[जिनवाणी पूजन]]></category>
		<category><![CDATA[जिनवाणी माता]]></category>
		<category><![CDATA[जैन आगम]]></category>
		<category><![CDATA[जैन धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[डीडवाना रोड़]]></category>
		<category><![CDATA[धार्मिक आयोजन]]></category>
		<category><![CDATA[महावीर मंदिर]]></category>
		<category><![CDATA[लालचंद पहाड़िया]]></category>
		<category><![CDATA[शोभायात्रा]]></category>
		<category><![CDATA[श्रुत ज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[श्रुत पंचमी]]></category>
		<category><![CDATA[सुभाष पहाड़िया]]></category>
		<category><![CDATA[स्वाध्याय]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=108275</guid>

					<description><![CDATA[कुचामन सिटी के महावीर मंदिर में श्रुत पंचमी महापर्व श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया गया। जिनवाणी माता की भव्य शोभायात्रा, विशेष पूजा-अर्चना और स्वाध्याय संकल्प के साथ श्रद्धालुओं ने ज्ञान आराधना का संदेश दिया। पढ़िए सुभाष पहाड़िया की यह रिपोर्ट कुचामन सिटी। श्रुत पंचमी जैन धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो जैन आगमों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>कुचामन सिटी के महावीर मंदिर में श्रुत पंचमी महापर्व श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया गया। जिनवाणी माता की भव्य शोभायात्रा, विशेष पूजा-अर्चना और स्वाध्याय संकल्प के साथ श्रद्धालुओं ने ज्ञान आराधना का संदेश दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सुभाष पहाड़िया की यह रिपोर्ट</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुचामन सिटी।</strong> श्रुत पंचमी जैन धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो जैन आगमों एवं पवित्र शास्त्रों के प्रति श्रद्धा, सम्मान, संरक्षण तथा कृतज्ञता का संदेश देता है। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के अवसर पर कुचामन सिटी स्थित महावीर मंदिर, डीडवाना रोड में यह महापर्व श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया।</p>
<p><strong>श्रुत ज्ञान है मोक्ष मार्ग का प्रकाश</strong></p>
<p>श्रुत ज्ञान को अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाला दिव्य दीपक माना गया है। यह ज्ञान ही मोक्ष मार्ग को प्रकाशित करता है। श्रुत पंचमी का पर्व समाज को ज्ञान, श्रद्धा और संयम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा धार्मिक जागरूकता, प्रेम और एकता का संदेश प्रदान करता है।</p>
<p><strong>कलशाभिषेक एवं शांतिधारा से हुआ शुभारंभ</strong></p>
<p>लालचंद पहाड़िया ने बताया कि महापर्व के अवसर पर प्रातःकाल भगवान का कलशाभिषेक एवं शांतिधारा सम्पन्न हुई। इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव के साथ धार्मिक कार्यक्रमों में सहभागिता निभाई।</p>
<p><strong>जिनवाणी माता की निकली भव्य शोभायात्रा</strong></p>
<p>कलशाभिषेक के बाद जिनवाणी माता को श्रद्धापूर्वक सिर पर धारण कर जैन पंचरंगा ध्वज के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। धार्मिक जयघोषों और भक्तिमय वातावरण ने पूरे क्षेत्र को धर्ममय बना दिया।</p>
<p><strong>विशेष पूजा-अर्चना एवं स्वाध्याय का संकल्प</strong></p>
<p>शोभायात्रा के पश्चात जिनवाणी माता की विशेष पूजा-अर्चना की गई। उपस्थित श्रद्धालुओं ने जिनवाणी के नियमित अध्ययन एवं स्वाध्याय का संकल्प लेते हुए अर्घ्य समर्पित किए। तत्पश्चात जिनवाणी माता को यथास्थान विराजमान किया गया।</p>
<p><strong>अनेक श्रद्धालु रहे उपस्थित</strong></p>
<p>अमित पाटोदी के अनुसार कार्यक्रम में चिरंजी लाल, अशोक, भव्य, विमलकुमार पाटोदी, कमलकुमार, महेंद्र, पंकज पहाड़िया, भंवरलाल झांझरी, भागचंद अजमेरा, मनीष गंगवाल, महावीर प्रसाद, माणकचंद काला, सुरेश कुमार, पवन, प्रतीक तथा ननू पांड्या सहित अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने भावभक्ति के साथ श्रुत पंचमी महापर्व में सहभागिता निभाई और आयोजन को सफल बनाने में सहयोग प्रदान किया।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/shrut_panchami_mahotsav_kuchaman_city_mahavir_mandir/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आचार्य विनिश्चय सागर जी के सानिध्य में राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ : जैन दर्शन के अनमोल रत्नों ने आगमोदय ग्रंथ पर किया विमर्श </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/acharya_vinischay_sagar_ji_two_day_seminar_begins/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/acharya_vinischay_sagar_ji_two_day_seminar_begins/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 01 Oct 2025 14:15:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Vinischay Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Agamoday Granth]]></category>
		<category><![CDATA[Dharmic Seminar]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Agam]]></category>
		<category><![CDATA[jain culture]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Darshan]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Federation]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Inspiration]]></category>
		<category><![CDATA[Jain monks]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Parampara]]></category>
		<category><![CDATA[jain philosophy]]></category>
		<category><![CDATA[jain religion]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Saints]]></category>
		<category><![CDATA[jain samaj]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Shastra]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Shiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society Events]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Spirituality]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Studies]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Tatva]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Vidwan]]></category>
		<category><![CDATA[Ramganjmandi]]></category>
		<category><![CDATA[Ramganjmandi Jain Samaj आचार्य विनिश्चय सागर महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[Samyak Darshan]]></category>
		<category><![CDATA[Samyak Gyan]]></category>
		<category><![CDATA[Shastrarth]]></category>
		<category><![CDATA[Shravyak Dharma]]></category>
		<category><![CDATA[shrifal news]]></category>
		<category><![CDATA[Shrut Gyan]]></category>
		<category><![CDATA[Spiritual Camp]]></category>
		<category><![CDATA[Vidwat Sangoshthi]]></category>
		<category><![CDATA[Vinay]]></category>
		<category><![CDATA[Virag Sagar Ji]]></category>
		<category><![CDATA[Vrat and Niyam]]></category>
		<category><![CDATA[आगमोदय ग्रंथ]]></category>
		<category><![CDATA[जिनवाणी प्रचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन अनुशासन]]></category>
		<category><![CDATA[जैन आगम]]></category>
		<category><![CDATA[जैन आचार्य]]></category>
		<category><![CDATA[जैन आयोजन]]></category>
		<category><![CDATA[जैन जीवन शैली]]></category>
		<category><![CDATA[जैन दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[जैन धर्म प्रेरणा]]></category>
		<category><![CDATA[जैन धर्म रहस्य]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन परंपरा]]></category>
		<category><![CDATA[जैन भक्ति]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन विद्वान]]></category>
		<category><![CDATA[जैन व्रत नियम]]></category>
		<category><![CDATA[जैन शास्त्र]]></category>
		<category><![CDATA[जैन श्रद्धा]]></category>
		<category><![CDATA[जैन संगोष्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन संघ]]></category>
		<category><![CDATA[जैन सत्य]]></category>
		<category><![CDATA[जैन संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साधु-संत]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[तत्व ज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[तीर्थंकर वाणी]]></category>
		<category><![CDATA[दिगम्बर जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[धवला ग्रंथ]]></category>
		<category><![CDATA[रामगंजमंडी जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय संगोष्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[विनिश्चय संगोष्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[षट्खंडागम ग्रंथ]]></category>
		<category><![CDATA[सम्यक दर्शन]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=91500</guid>

					<description><![CDATA[रामगंजमंडी स्थित सिद्ध क्षेत्र में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में दो दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। देशभर से आए विद्वानों ने आचार्य श्री द्वारा रचित आगमोदय ग्रंथ पर अपने विचार प्रस्तुत किए और जैन दर्शन की गहराइयों पर चर्चा की। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट… रामगंजमंडी। परम पूज्य [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी स्थित सिद्ध क्षेत्र में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में दो दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। देशभर से आए विद्वानों ने आचार्य श्री द्वारा रचित आगमोदय ग्रंथ पर अपने विचार प्रस्तुत किए और जैन दर्शन की गहराइयों पर चर्चा की। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में राष्ट्रीय स्तर की दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर आचार्य श्री 108 विराग सागर महाराज का चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन कर मंगलाचरण किया गया। विद्वत जनों ने श्रीफल समर्पित कर आचार्य श्री के चरणों में वंदन किया और मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।</p>
<p>समारोह में धवला षट्खंडागम ग्रंथ (रजत पत्र पर निर्मित) की स्थापना समाज अध्यक्ष दिलीप विनायका, उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया, कमल लुहाड़िया, मंत्री राजीव बाकलीवाल, भूपेंद्र सांवला, मनोज बड़जात्या, जम्बू मितल आदि द्वारा की गई। आचार्य श्री द्वारा रचित आगमोदय ग्रंथ पर विभिन्न विद्वानों ने आलेख प्रस्तुत किए। इसमें चारों अनुयोगों का विवरण, चक्रवर्ती का वैभव, त्याग और जीवन के वास्तविक स्वरूप का सूक्ष्म विवेचन है। विद्वानों ने कहा कि आचार्य श्री ने 100 ग्रंथों का सार एक ही ग्रंथ में समाहित किया है, जो उनकी अद्भुत प्रज्ञा का प्रमाण है।</p>
<p>आचार्य श्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि जैन दर्शन संपूर्ण सत्य पर आधारित है। सम्यक दर्शन का अर्थ है सत्य को जानना और उसे श्रद्धा से स्वीकार करना। उन्होंने कहा कि व्रत के बिना जीवन अधूरा है और व्रत पालन से अशुभ कर्म रुक जाते हैं। स्वाध्याय से आगम के रहस्य खुलते हैं, और विद्वानों का साथ संगोष्ठी को सार्थक बनाता है।</p>
<p><strong>आहार, संलेखना समाधि और जैन साधना पर भी आलेख प्रस्तुत</strong></p>
<p>गुरुदेव ने अति सुख और अति दुख को खतरनाक बताते हुए कहा कि जब यह बढ़ जाते हैं तो मर्यादा भंग होती है। धर्म करने में भाव पूजा का महत्व है, द्रव्य पूजा का नहीं। उन्होंने आगम को सर्वोच्च मानते हुए कहा कि किसी भी विषय को आगम के अनुसार ही स्वीकार करना चाहिए। विद्वत संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में मुनियों के आहार, संलेखना समाधि और जैन साधना पर भी आलेख प्रस्तुत किए गए। दोपहर के सत्र में वक्ताओं ने आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज की निर्मोहिता और उनके महान व्यक्तित्व की चर्चा की। रामगंजमंडी की इस विद्वत संगोष्ठी में जैन दर्शन के अनमोल रत्नों की उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक और अविस्मरणीय बना दिया।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/acharya_vinischay_sagar_ji_two_day_seminar_begins/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>क्षमावाणी पर्व पर जिनवाणी माता से क्षमा मांगने का आह्वान : जिनालयों में देव, शास्त्र और गुरु की आराधना से होता है पाप कर्मों का क्षय – आचार्य वर्धमान सागर </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/dev_shashtra_guru_worship_destroys_sins_acharya_vardhman_sagar/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/dev_shashtra_guru_worship_destroys_sins_acharya_vardhman_sagar/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Sep 2025 12:58:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[acharya vardhman sagar ji]]></category>
		<category><![CDATA[Aryika Divya Yashmati]]></category>
		<category><![CDATA[Das Lakshan Mahaparva]]></category>
		<category><![CDATA[Dev Shastra Guru]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Agam]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Atishay Kshetra]]></category>
		<category><![CDATA[jain bhakti]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[jain culture]]></category>
		<category><![CDATA[jain dharma]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain religion]]></category>
		<category><![CDATA[jain samaj news]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society News]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Spirituality]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Updesh]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Values]]></category>
		<category><![CDATA[Jinwani]]></category>
		<category><![CDATA[Jinwani Mata]]></category>
		<category><![CDATA[kshamavani]]></category>
		<category><![CDATA[Religious News]]></category>
		<category><![CDATA[Sanyam]]></category>
		<category><![CDATA[shanti sagar ji maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Shree Adinath Nasiyan]]></category>
		<category><![CDATA[shrifal news]]></category>
		<category><![CDATA[Spiritual News]]></category>
		<category><![CDATA[Tapasya मोक्ष मार्ग]]></category>
		<category><![CDATA[Tapsvi]]></category>
		<category><![CDATA[Tonk Jain Samaj]]></category>
		<category><![CDATA[Tyag]]></category>
		<category><![CDATA[क्षमावाणी पर्व]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[तप आराधना]]></category>
		<category><![CDATA[दस धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[संयम साधना]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=90495</guid>

					<description><![CDATA[टोंक में आयोजित धर्मसभा में आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज ने उपदेश दिया कि देव, शास्त्र और गुरु की आराधना से पुण्य अर्जित होता है और पाप कर्मों का क्षय होता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जिनवाणी के स्थान पर जनवाणी प्रचलित हो गई है, जिसके कारण जीवन में दुख बढ़ा है। पढ़िए [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>टोंक में आयोजित धर्मसभा में आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज ने उपदेश दिया कि देव, शास्त्र और गुरु की आराधना से पुण्य अर्जित होता है और पाप कर्मों का क्षय होता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जिनवाणी के स्थान पर जनवाणी प्रचलित हो गई है, जिसके कारण जीवन में दुख बढ़ा है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया की पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>टोंक में धर्मसभा को संबोधित करते हुए पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कहा कि जिनालयों में देव, शास्त्र और गुरु की आराधना करने से पुण्य अर्जित होता है और पाप कर्मों का क्षय होता है। उन्होंने बताया कि भगवान ने हमें मोक्ष की राह दिखाई है, किंतु लोग भोग-विलास और कषायों की ओर बढ़ रहे हैं। यदि जीवन की दिशा बदली जाए तो दशा भी बदल सकती है और वास्तविक सुख प्राप्त हो सकता है।</p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि आजकल लोग पूजा-पाठ तो करते हैं, किंतु जिनवाणी का पालन नहीं करते। वर्तमान में जनवाणी प्रचलित हो गई है, जिसके कारण धर्म का सार खो रहा है। क्षमावाणी पर्व पर हमें जिनवाणी माता से क्षमा मांगकर पुनः जिनवाणी को जीवन में उतारना चाहिए। उन्होंने दस लक्षण धर्म पर चिंतन करने और इसे वर्षभर हर क्षण अपनाने का आह्वान किया।</p>
<p><strong>प्रतिमा और ध्यान मंदिर निर्माण का संकल्प भी घोषित </strong></p>
<p>धर्मसभा में उन्होंने प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की आचार्य पद प्रतिष्ठा शताब्दी महोत्सव में उनकी प्रतिमा और ध्यान मंदिर निर्माण का संकल्प भी घोषित किया और इसे जैन समाज का गौरव बताया। कार्यक्रम के पूर्व आर्यिका श्री दिव्य यशमति माताजी ने कथा के माध्यम से त्याग और दान का महत्व समझाया। श्री प्रमेय सागर भट्टारक ने आचार्य श्री सहित मुनियों और आर्यिकाओं से आशीर्वाद प्राप्त किया।</p>
<p>श्री आदिनाथ नसिया मंदिर में भगवान का अभिषेक भी संपन्न हुआ। इस अवसर पर चातुर्मास समिति और जैन समाज ने तीन, पाँच, दस, ग्यारह, सोलह और बत्तीस उपवास करने वाले तपस्वियों का भव्य स्वागत किया और अनुमोदना की। समाज ने इस धार्मिक आयोजन को टोंक की आध्यात्मिक गरिमा में वृद्धि करने वाला बताया।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/dev_shashtra_guru_worship_destroys_sins_acharya_vardhman_sagar/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>शिक्षक सम्मेलन में आचार्य श्री ने दिया स्वाध्याय और संस्कारों पर विशेष संदेश : चारित्र, संस्कार, संयम और आगम ज्ञान से ही होता है जीवन का निर्माण : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/charitra_sanskar_sanyam_agam_gyaan_se_hi_hota_hai_jeevan_ka_nirmaan_acharya_vardhman_sagar_ji/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/charitra_sanskar_sanyam_agam_gyaan_se_hi_hota_hai_jeevan_ka_nirmaan_acharya_vardhman_sagar_ji/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 Aug 2025 07:08:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shree Pravachan]]></category>
		<category><![CDATA[acharya vardhman sagar ji]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Acharya]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Agam]]></category>
		<category><![CDATA[jain bhakti]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Dharma Sabha]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Education]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Event]]></category>
		<category><![CDATA[jain guru]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Heritage]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Inspiration]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain pathshala]]></category>
		<category><![CDATA[jain pravachan]]></category>
		<category><![CDATA[jain religion]]></category>
		<category><![CDATA[jain samaj]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Sangh]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Sanskar]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Shravak]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Shravika]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Spirituality]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Teachers Conference]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Tradition]]></category>
		<category><![CDATA[Pratikraman]]></category>
		<category><![CDATA[Samayik]]></category>
		<category><![CDATA[Shantisagar Ji Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Shatabdi Mahotsav]]></category>
		<category><![CDATA[Shrifal Jain news]]></category>
		<category><![CDATA[shrifal news]]></category>
		<category><![CDATA[Swadhyay]]></category>
		<category><![CDATA[आगम ज्ञान]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य वर्धमान सागर]]></category>
		<category><![CDATA[चरित्र]]></category>
		<category><![CDATA[जैन प्रेरणा]]></category>
		<category><![CDATA[जैन संत]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साधना]]></category>
		<category><![CDATA[जैनधर्म]]></category>
		<category><![CDATA[दिगम्बर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्मसभा]]></category>
		<category><![CDATA[शताब्दी महोत्सव]]></category>
		<category><![CDATA[शांतिसागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[शिक्षक सम्मेलन]]></category>
		<category><![CDATA[श्रावक]]></category>
		<category><![CDATA[श्राविका]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[संयम]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कार]]></category>
		<category><![CDATA[स्वाध्याय]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=87865</guid>

					<description><![CDATA[टोक नगर में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शिक्षक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन का निर्माण चारित्र, संस्कार, संयम और आगम ज्ञान से ही संभव है। माता-पिता और शिक्षकों को स्वयं संस्कारित होकर बच्चों को सही दिशा देनी चाहिए। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… टोक नगर में प्रथमाचार्य चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>टोक नगर में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शिक्षक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन का निर्माण चारित्र, संस्कार, संयम और आगम ज्ञान से ही संभव है। माता-पिता और शिक्षकों को स्वयं संस्कारित होकर बच्चों को सही दिशा देनी चाहिए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>टोक नगर में प्रथमाचार्य चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की आचार्य पद शताब्दी प्रतिष्ठापना महोत्सव के अंतर्गत विगत माह से विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। पत्रकार गोष्ठी, एडवोकेट एवं चार्टर्ड अकाउंटेंट सम्मेलन के पश्चात हाल ही में शिक्षक सम्मेलन का आयोजन हुआ।</p>
<p>इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कहा कि चारित्र, संस्कार, संयम और आगम ज्ञान के बिना जीवन का निर्माण और निर्वाण संभव नहीं है। स्वाध्याय से ही सच्चे संस्कार प्राप्त होते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों को संस्कारित करने का दायित्व केवल शिक्षकों का ही नहीं बल्कि माता-पिता का भी है। यदि माता-पिता और शिक्षक स्वयं संस्कारित होंगे तभी वे अगली पीढ़ी को सही मार्गदर्शन दे पाएंगे।</p>
<p>आचार्य श्री ने आगे कहा कि श्रावकों के समूह से ही समाज का निर्माण होता है और यह संस्कार देव, शास्त्र, गुरु एवं स्वाध्याय से ही प्राप्त होते हैं। उन्होंने शिक्षक वर्ग से आग्रह किया कि शिक्षा केवल रोजगार का साधन न बने बल्कि जीवन मूल्य और आत्मिक शांति का भी मार्ग प्रशस्त करे।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/charitra_sanskar_sanyam_agam_gyaan_se_hi_hota_hai_jeevan_ka_nirmaan_acharya_vardhman_sagar_ji/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
