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	<title>Ishtopadesh Granth &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>यात्रा कैसी भी हो यदि आधी पार हो जाए तो फिर वापस लौट पाना संभव नहीं: इष्टोपदेश के रचयिता जैनाचार्य पूज्यपाद स्वामी विलक्षण प्रतिभा के थे धनी  </title>
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		<pubDate>Thu, 31 Jul 2025 13:29:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नरक गति और तिर्यंच गति के भयंकर दुःखों को सहन करके हमने मनुष्य गति तक का आधे से ज्यादा रास्ता पार कर लिया है। अब इस जगह से पुनः नीचे की गतियां नहीं प्राप्त करना है तो हमें हर पल सजगता के साथ अपने अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नरक गति और तिर्यंच गति के भयंकर दुःखों को सहन करके हमने मनुष्य गति तक का आधे से ज्यादा रास्ता पार कर लिया है। अब इस जगह से पुनः नीचे की गतियां नहीं प्राप्त करना है तो हमें हर पल सजगता के साथ अपने अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यह विचार समर्थ सिटी में आर्यिका मां सिद्ध श्री माताजी की संघस्थ आर्यिका मां सभा श्री माताजी ने अपने इष्टोपदेश ग्रंथ के स्वाध्याय के दौरान व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> नरक गति और तिर्यंच गति के भयंकर दुःखों को सहन करके हमने मनुष्य गति तक का आधे से ज्यादा रास्ता पार कर लिया है। अब तो बस संयम नियम धर्म करके देवगति ओर मोक्ष की मंजिल पाना शेष रहा है। अब इस जगह से पुनः नीचे की गतियां नहीं प्राप्त करना है तो हमें हर पल सजगता के साथ अपने अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यह विचार समर्थ सिटी में आर्यिका मां सिद्ध श्री माताजी की संघस्थ आर्यिका मां सभा श्री माताजी ने अपने इष्टोपदेश ग्रंथ के स्वाध्याय के दौरान व्यक्त किए। आर्यिका माताजी ने इष्टोपदेश ग्रंथ के बारे में बताया कि इस अध्यात्म ग्रंथ में इष्ट आत्मा के स्वरूप का परिचय प्रस्तुत किया है।</p>
<p>51 श्लोकों में पूज्यपाद स्वामी ने अध्यात्म को गागर में सागर भर देने की कहावत चरितार्थ की है। ईसा की छठवीं शताब्दी में रचित इस ग्रंथ में संसार की यथार्थ स्थिति का परिज्ञान प्राप्त होने से राग-द्वेष, मोह की परिणति घटती है। इस लघुकाय ग्रंथ में समयसार की गाथाओं का सार अंकित किया गया है। शैली सरल और प्रवाहमय है। पूज्यपाद स्वामी के बारे में वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि पूज्यपाद स्वामी का समय 510 ई. से 600 ई. तक का माना जाता है। माता-पिता माधव भट्ट और श्रीदेवी थे। घर का नाम देवनंदी था। वे एक ब्राह्मण परिवार से थे। एक घटना ने उनके जीवन में वैराग्य की उत्पत्ति कर दी और वे एक दिगंबर जैन मुनि के रूप में दीक्षित हो गए। वे एक योगी, रहस्यवादी, कवि, विद्वान, लेखक और कई विधाओं में पारंगत थे।</p>
<p>यही वजह रही होगी कि स्वर्ग से देवता उनके चरण पाद की पूजा करने आते थे इसलिए उन्हें पूज्यपाद की उपाधि दी गई। वे आचार्य कुंदकुंद और आचार्य समंतभद्र जैसे अपने पूर्ववर्तियों के लेखन से काफी प्रभावित थे। उन्हें जैन साहित्य के शुरुआती महान् आचार्य के रूप में जाता जाता है। वे नंदी संघ के आचार्य थे, जो आचार्य कुंदकुंद के वंश पट्टपरंपरा से थे।</p>
<p><strong>सभी ग्रंथों पर विशेष शोध कार्य किया जाए</strong></p>
<p>पाटोदी ने बताया कि यह संभव है कि वे पहले जैन संत थे जिन्होंने न केवल धर्म पर, बल्कि आयुर्वेद और संस्कृत व्याकरण जैसे गैर-धार्मिक विषयों पर भी लिखा। वे एक व्याकरणाचार्य होकर संस्कृत काव्यशास्त्र और आयुर्वेद के भी ज्ञाता थे। उन्होंने न केवल आयुर्वेद साहित्य, बल्कि आध्यात्मिक, भाषा विज्ञान, दार्शनिक, ज्योतिष, पशु चिकित्सा आदि से संबंधित साहित्य भी लिखा। अतीत में उनके साहित्यिक कार्यों की जाँच-पड़ताल या अन्वेषण के लिए बहुत कम प्रयास किए गए हैं। आचार्य पूज्यपाद के सभी विद्यमान आयुर्वेद साहित्य की पहचान करना एक महत्वपूर्ण कार्य है। यदि उनके साहित्य पर शोध किया जाए तो प्राचीन भारत की कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आ सकती है। जरूरत है तो बस प्राचीन जैन आचार्य के साहित्य पर शोध कार्य करने की क्योंकि, जैन आचार्य आध्यात्मिक रूप से तो दृढ़ संकल्प होते ही थे परंतु, उनका असीमित ज्ञान जो उन्हें तप और ध्यान से प्राप्त होता था जो ब्रम्हांड और मानव जीवन के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण होता था।</p>
<p>अतः उस ज्ञान को सिर्फ अपने तक ही सिमीत न रखते हुए वे सभी अद्भुत अकल्पनीय और अविस्मरणीय जानकारियां लोक कल्याण की भावनाओं के साथ अपने लेखन में लेकर ग्रंथों में सूक्तियों, सूत्रांे एवं प्राकृत गाथाओं के माध्यम से लिपिबद्ध करके हम तक पहुंचाई। हमारा प्रयास होना चाहिए उन सभी ग्रंथों पर विशेष शोध कार्य किया जाए।</p>
<p><strong>आचार्य पूज्यपाद की कुल 23 पांडुलिपियां पाई गईं</strong></p>
<p>प्राप्त जानकारी के अनुसार पूरे भारत में आचार्य पूज्यपाद की कुल 23 पांडुलिपियां पाई गईं। इनमें से अधिकांश कन्नड़ में थीं और कर्नाटक के विभिन्न पुस्तकालयों, विशेष रूप से श्री मंजुनाथेश्वर सांस्कृतिक एवं अनुसंधान प्रतिष्ठान, धर्मस्थल में संरक्षित थीं। ये पांडुलिपियां रसशास्त्र, नाड़ी, कायचिकित्सा, शालक्य और कौमारभृत्य की विशिष्टताओं से संबंधित थीं। इस गहन खोज से भारत भर में पांडुलिपियों के रूप में जो 23 चिकित्सा साहित्य कृतियों के अस्तित्व का पता चला। 23 पांडुलिपियों में से, 15 ताड़पत्र, 3 कागज़, 10 कन्नड़, 6 अन्य भाषा, 12 पूर्ण, 4 अपूर्ण, 1 रसशास्त्र, 2 नाड़ी, 19 कायचिकित्सा, 4 शालक्य, 2 कौमार भृत्य पाए गए। सत्रह कर्नाटक में और 8 कर्नाटक के बाहर उपलब्ध थे। उनकी अधिकांश रचनाएं श्री मंजुनाथेश्वर सांस्कृतिक एवं अनुसंधान प्रतिष्ठान, धर्मस्थल, कर्नाटक में संरक्षित हैं।</p>
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		<title>अकाट्य श्रद्धा से परमात्मा बनना संभव: क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी ने धर्मसभा में बताया श्रद्धा का महत्व  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 Jul 2025 08:57:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[क्षुल्लक द्वय श्री महोदय सागर जी, क्षुल्लक श्री पुण्योदय सागर जी महाराज ससंघ सान्निध्य में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का जलाभिषेक पंचामृत अभिषेक, महा शांतिधारा छहढाला कक्षा शिक्षण, इष्टोपदेश ग्रंथ पर प्रवचन, सायंकल श्रीजी देव शास्त्र गुरु की आरती, भक्ति, जिनदर्शन क्यों? कैसे! पर विवेचना, प्रश्नमंच, पुरस्कार वितरण के कार्यक्रम प्रतिदिन हो रहे हैं। धरियावद से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>क्षुल्लक द्वय श्री महोदय सागर जी, क्षुल्लक श्री पुण्योदय सागर जी महाराज ससंघ सान्निध्य में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का जलाभिषेक पंचामृत अभिषेक, महा शांतिधारा छहढाला कक्षा शिक्षण, इष्टोपदेश ग्रंथ पर प्रवचन, सायंकल श्रीजी देव शास्त्र गुरु की आरती, भक्ति, जिनदर्शन क्यों? कैसे! पर विवेचना, प्रश्नमंच, पुरस्कार वितरण के कार्यक्रम प्रतिदिन हो रहे हैं। <span style="color: #ff0000">धरियावद से पढ़िए, श्रीफल साथी अशोककुमार जेतावत की यह खबर&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धरियावद।</strong> श्रद्धा वह है, जो कभी देखा न हो, सुना न हो, फिर भी विश्वास किया जाता है। श्रद्धा की भाषा, परिभाषा, बोल कुछ नहीं होते हैं, वह तो हमारे हृदय से प्रगट होती है। श्रद्धा देखी नहीं है, सुनी होती है पर वर्तमान में हमारी तो श्रद्धा तो कांच के प्याले की तरह होती है। थोड़ा सा धक्का लगे तो टूट जाती है। यह प्रबोधन क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी महाराज ने रविवार को श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया। क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी ने कहा कि आप मंदिर में वेदी पर द्रव्य चढ़ाते हैं, पर अपने मन के श्रद्धा की वेदी पर द्रव्य न चढ़ाने से वह अनमोल नहीं बन पाता है, वह निष्फल ही रहता है। अतः अकाट्य श्रद्धा का होना जरूरी है, तभी वह द्रव्य चढ़ाना सार्थक हो पता है। प्रभु के दरबार में पहले विश्वास करो फिर इस्तेमाल करो वाला फॉर्मूला (सिद्धांत) चलता है, न कि पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो वाला।</p>
<p><strong>दुनिया के सारे काम में दिखावा करें तो चलेगा </strong></p>
<p>क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी ने कहा कि जिसने अपने जीवन में श्रद्धा रूपी स्टैंड डाल दिया तो चाहे उसका जीवन रहे ना रहे, पर धर्म सदा जीवित रहेगा। श्रद्धा और श्रद्धेय के बीच में कोई तत्व नहीं रहता है। श्रद्धा किसी के वास्ते नहीं रहती है, वह अपना रास्ता स्वयं बना लेती है। उसे किसी माइल स्टोन की आवश्यकता नहीं रहती है। आजकल मंदिरों भीड़ बढ़ रही है, पर श्रद्धा घट रही है। मंदिर में प्रतिमाएं बढ़ रही है, पर भक्त कम हो रहे हैं। हमारे अंतरंग में निश्चल, दृढ़ निर्मल होकर अकाट्य श्रद्धा करने से परमात्मा तक बन सकते हैं। हमें भक्तिपूर्वक, भावपूर्वक जिनेंद्र भगवान के जिन मंदिर में आना चाहिए। दिखावे के लिए नहीं आना चाहिए। दुनिया के सारे काम में दिखावा करें तो चलेगा पर जिनेंद्र भगवान के दरबार में आकर दिखावा करने वालों को फूटी कौड़ी भी मिलने वाली नहीं है। अतः हमारे अंतरंग में श्रद्धा का अकाट्य श्रीफल चढ़ाना चाहिए।</p>
<p><strong>धार्मिक प्रश्नोत्तरी क्विज प्रतियोगिता जारी </strong></p>
<p>क्षुल्लक द्वय श्री महोदय सागर जी, क्षुल्लक श्री पुण्योदय सागर जी महाराज ससंघ सान्निध्य में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का जलाभिषेक पंचामृत अभिषेक, महा शांतिधारा छहढाला कक्षा शिक्षण, इष्टोपदेश ग्रंथ पर प्रवचन, सायंकल श्रीजी देव शास्त्र गुरु की आरती, भक्ति, जिनदर्शन क्यों? कैसे! पर विवेचना, प्रश्नमंच, पुरस्कार वितरण के कार्यक्रम प्रतिदिन हो रहे हैं। साथ ही प्रत्येक रविवार को रात्रि 8 बजे से एंड्रॉयड मोबाइल पर कंप्यूटराइज्ड धार्मिक प्रश्नोत्तरी क्विज प्रतियोगिता भी हो रही है।</p>
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