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	<title>Importance &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>शुभता और शक्ति के आह्वान का प्रतीक कलश: चातुर्मास के आरंभ से पूर्व कलश स्थापना का महत्व </title>
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		<pubDate>Sun, 29 Jun 2025 10:07:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चातुर्मास आरंभ होने में बस कुछ ही दिन शेष हैं। साधु-साध्वियां निर्धारित चातुर्मास स्थलों की ओर अभी भी विहाररत हैं तो कई साधु-साध्वियां नियत स्थल पर पहुंच भी चुके हैं। सभी स्थानों पर चातुर्मास आरंभ से पूर्व कलश स्थापना का विधान है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए कलश स्थापना के महत्व को जानने की कोशिश [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चातुर्मास आरंभ होने में बस कुछ ही दिन शेष हैं। साधु-साध्वियां निर्धारित चातुर्मास स्थलों की ओर अभी भी विहाररत हैं तो कई साधु-साध्वियां नियत स्थल पर पहुंच भी चुके हैं। सभी स्थानों पर चातुर्मास आरंभ से पूर्व कलश स्थापना का विधान है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए कलश स्थापना के महत्व को जानने की कोशिश की गई। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज के उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति खास आपके लिए, पढ़िए इंदौर से यह विशेष जानकारी&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म में चातुर्मास का जितना अधिक महत्व है। उससे कहीं अधिक चातुर्मास के आरंभ से पूर्व विधिवत कलश की स्थापना का महत्व भी है। जैन श्रावक-श्राविकाएं जिस तरह चातुर्मास में संतों के सानिध्य के लिए विशेष तैयारियां करती हैं। उसी तरह चातुर्मास के शुभारंभ के पहले कलश स्थापना को लेकर भी दिगंबर जैन समाज विशेषतौर पर तैयारियों में जुट जाते हैं। जैन धर्म की ग्रंथों में विवरणित मान्यताओं के आधार पर यह कहना बिलकुल सही है कि जैन धर्म में चातुर्मास के दौरान कलश स्थापना का विशेष महत्व है। यह धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति का समय माना जाता है और कलश स्थापना इस अवधि में भगवान का आह्वान करने और चातुर्मास स्थल पर सकारात्मक ऊर्जा लाने का प्रतीक है। इसे शुभता और शक्ति का प्रतीक भी माना गया है।</p>
<p>जब कलश स्थापना विधिविधान से हो तब कलश में जल, आम के पत्ते और नारियल रखकर स्थापित करना श्रेयस्कर माना गया है। कलश स्थापना का अर्थ है दैवीय शक्तियों का आह्वान करना और पवित्र ऊर्जा का प्रवेश कराना है। जिससे शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जैसा कि वर्णित है कि चातुर्मास आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक महत्वपूर्ण समय होता है, और कलश स्थापना इस अवधि में की जाने वाली पूजा-पाठ और साधनाओं को और अधिक फलदायी बनाती है। चातुर्मास त्याग, तप, व्रत और संयम का समय होता है, और कलश स्थापना इन सद्गुणों को अपनाने में मदद करती है। यह समय साधु-संतों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि वे इस दौरान अपनी साधना और उपासना में अधिक समय लगाते हैं।</p>
<p><strong>कलश स्थापना की विधि</strong><br />
कलश को आमतौर पर शुद्ध जल से भरा जाता है, उस पर आम के पत्ते रखे जाते हैं, और उसके ऊपर नारियल रखा जाता है। कलश को घर के मंदिर में या किसी पवित्र स्थान पर स्थापित किया जाता है। कलश स्थापना के बाद धूप-दीप जलाकर, मंत्रों का जाप करके और आरती करके श्रीजी की पूजा की जाती है।</p>
<p><strong>चातुर्मास में कलश स्थापना का महत्व</strong><br />
चातुर्मास के दौरान कलश स्थापना एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है जो न केवल घर में सकारात्मक ऊर्जा लाता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-साक्षात्कार के लिए भी मार्ग प्रशस्त करता है। जैन धर्म में कलश को एक शुभ वस्तु के रूप में देखा जाता है। कलश का उपयोग भारतीय कला और वास्तुकला में एक औपचारिक वस्तु के साथ-साथ एक सजावटी आकृति के रूप में भी किया जाता है। कलश आकृति का उपयोग पहली शताब्दी ईसा पूर्व और पहली शताब्दी ईसवी के दौरान स्तंभों के आधार और शीर्ष को सजाने में किया जाता था। कलश को गर्भ का प्रतीक भी माना जाता है, जो सृजन और जीवन की संभावना का प्रतिनिधित्व करता है। कलश को सुरक्षात्मक भी माना जाता है और यह माना जाता है कि यह नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है।</p>
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		<title>क्या आप जानते हैं : ब्रह्म बेला का महत्त्व और क्या करना चाहिए इस अमृत बेला में </title>
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		<pubDate>Tue, 13 Feb 2024 15:05:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विश्व की प्रायः सभी धर्म संस्कृतियाँ प्रातः काल की ब्रह्मबेला को महत्त्व देती हैं। पर हमें यह नहीं मालूम कि ब्रह्मबेला कहते किसे हैं, इसका क्या महत्त्व है ? सूर्योदय के चौबीस मिनिट पहले से सूर्योदय के चौबीस मिनिट बाद तक का समय ब्रह्मबेला या ब्रह्ममुहूर्त कहलाती है इसे ही आत्म जागरण का समय कहा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>विश्व की प्रायः सभी धर्म संस्कृतियाँ प्रातः काल की ब्रह्मबेला को महत्त्व देती हैं। पर हमें यह नहीं मालूम कि ब्रह्मबेला कहते किसे हैं, इसका क्या महत्त्व है ? सूर्योदय के चौबीस मिनिट पहले से सूर्योदय के चौबीस मिनिट बाद तक का समय ब्रह्मबेला या ब्रह्ममुहूर्त कहलाती है इसे ही आत्म जागरण का समय कहा है। क्योंकि तीर्थकर की वाणी इसी मुहूर्त में खिरती है। जिस प्रकार सरोवर में कमल दल इसी समय खिलते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म मुहूर्त में जागने से हमारा हृदय-कमल भी खिल जाता है, जिससे हमारे जीवन में निरोगता का संचार होता है एवं इस समय मन में जो भी शुभ संकल्प लिये जाते हैं, दुहराये जाते हैं। उससे व्यक्ति के अन्दर आत्म विश्वास एवं कार्य करने की दृढ़ क्षमता उद्भूत होती है। <span style="color: #ff0000">प्रातःकाल उठकर क्या विचार करना चाहिये- इस विषय में पं० आशाधर जी ने सागारधर्मामृत ग्रन्थ में लिखा है कि &#8211;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ब्रम्हे मुहूर्ते उत्थाय पंच नमस्कार कृते सति ।</strong></p>
<p><strong>कोऽहं ! को मम ! किं निज धर्मः इति विचिन्त्येत् ।।</strong></p>
<p>अर्थात् ब्रम्ह मुहूर्त में निद्रा छोड़कर पंच नमस्कार णमोकार मन्त्र कम से कम नव बार पढ़ना चाहिये। यदि आपके पास समय है तो पूरे एक सौ आठ बार जपना चाहिये।</p>
<p>उसके बाद दोनों हस्त कमलों को जोड़कर, दोनों अंगूठों को छोड़कर, शेष बीच की आठ अंगुलियों के चौबीस पोरों में चौबीस तीर्थंकर के नाम स्मरण करते हुए, हाथों को देखें।</p>
<p><strong>हाथ (कर) दर्शन का महत्त्व अन्य शास्त्रों में भी बताया गया है-</strong></p>
<p><strong>कराग्रे वसते लक्ष्मी, कर मध्ये सरस्वती । कर मूले तु गोविन्दः प्रभाते कर दर्शनम् ॥</strong></p>
<p>अर्थात्, हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी का, मध्य में सरस्वती का एवं मूल भाग में हरि ! प्रभो !! ईश्वर !!! का हाथ (कर) का दर्शन करना चाहिये। निवास है। अतः प्रतिदिन प्रातः काल</p>
<p>उपर्युक्त श्लोक बोलते हुऐ अपने हाथों को देखो । यह मनोवैज्ञानिक एवं अर्थपूर्ण प्रक्रिया है इससे व्यक्ति के हृदय में आत्म-निर्भरता, स्वावलम्बनता की भावना का उदय होता है यदि वह ऐसा नहीं करे तो वह अपने जीवन के प्रत्येक कार्य में दूसरों का मुख देखने का अभ्यासी बन जाता है। अतः संसार में जो भी भला या बुरा कार्य करता है, हाथों से ही करता है। ये हाथ ही धर्म- अर्थ काम एवं मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की कुंजी है।</p>
<p><strong>मुनि अमित सागर की कृति ‘मंदिर’ से साभार</strong></p>
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