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	<title>Ideal &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र में प्रवचन : आदत होना सही, गलत आदत होना दुर्गति का कारण &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर जी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 01 Mar 2023 06:56:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज जीवन जीने का सबका अपना-अपना तरीका है। व्यक्ति का स्वयं के मापदंडों से जीना ठीक है लेकिन मापदंड के बारे में विचारें कि वे सही हैं या गलत। पढ़िए जय कुमार जलज/राजेश रागी की विस्तृत रिपोर्ट&#8230; कुण्डलपुर। आदत के आदि होना बुरी बात नहीं, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज जीवन जीने का सबका अपना-अपना तरीका है। व्यक्ति का स्वयं के मापदंडों से जीना ठीक है लेकिन मापदंड के बारे में विचारें कि वे सही हैं या गलत। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए जय कुमार जलज/राजेश रागी की विस्तृत रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुण्डलपुर।</strong> आदत के आदि होना बुरी बात नहीं, परंतु गलत आदत के आदी होना सही नहीं है। जीवन जीने का सभी का अपना अपना तरीका होता है, हम किसी के तरीके को गलत नहीं ठहराना चाहते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का अपना मापदंड होता है। वह स्वयं का जीवन अपने मापदंडों के हिसाब से जीता है और उसे वह सही भी मानता है। यह बात साइंस ऑफ लिविंग सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कही। उदाहरण के तौर पर आप उस शराबी आदि को देख लीजिए, सभी के अपने-अपने मापदंड हैं और इसमें भी साहित्य का योगदान और मिल जाए बस फिर वो उनका कथन उनकी क्रियाओं को सही सिद्ध करने में देर नहीं लगाते।</p>
<p>एक प्रसिद्ध कवि ने लिखा है, मंदिर मस्जिद बैर कराते मेल कराती मधुशाला। हो सकता है आपको यह कविता शब्दशः याद भी हो। पर कवि का क्या उद्देश्य था और आपने क्या समझ लिया। कवि महोदय कह रहे हैं जिस प्रकार शराबी व्यक्ति एक साथ बैठकर हिल मिलकर मदिरालय में अपना आनंद मनाते हैं, उसी प्रकार क्या आप लोग देवालय में बैठकर हिल मिलकर प्रभु की भक्ति का आनंद मनाते हैं ? यह प्रश्नवाचक काव्य शैली है। हम इसका सही अर्थ भी आपको बताएंगे।</p>
<p>तो भी आप मानोगे नहीं ,क्योंकि यह कविता आपकी बात का पोषण करती है।आज प्रायः कर यह सिद्धांत बन गया है। हम उसी बात का समर्थन करते हैं जो बात हमारी बात का समर्थन करे।</p>
<p><strong>अनादि काल से है स्थित</strong></p>
<p>बड़े से बड़ा व्यक्तित्व भी आप को समझाने में अपने आप को असमर्थ पाता है। यह स्थिति वर्तमान समय में नहीं बनी बल्कि अनादि कालीन है। जब जब कोई व्यक्ति व्यसनों में लिप्त हुआ, उसने अपना सब कुछ खो दिया पर किसी की नहीं मानी। भीम ने युधिष्ठिर को कितना मना करा, उनसे कितनी अनुनय की, पर युधिष्ठिर दांव पर दांव लगाते गए और परिणाम सभी को ज्ञात है। भरी सभा में इतना बड़ा घोर अपमान हुआ। रावण को किसने नहीं समझाया कि पर स्त्री का सेवन दुर्गति का कारण है। मंदोदरी, विभीषण, कुंभकरण यहां तक कि उसके पुत्रों ने कहा पर रावण ने किसी की नहीं मानी। रावण के साथ क्या-क्या हुआ सभी को ज्ञात है। ज्ञात हो कर भी हम क्या कर रहे हैं।</p>
<p><strong>व्यसन से आती विवेकहीनता</strong></p>
<p>व्यसन की वासना कभी समाप्त हुई है क्या? और इसी व्यसन में व्यक्ति इतना तल्लीन हो जाता है कि वह विवेकहीन हो जाता है। उस वासना का सार्थक अर्थ है (वास +ना) अर्थात यहां वास नहीं करना। इन व्यसनों में जिसने वास नहीं किया, निवास नहीं किया, उसका आवास एक मंदिर की तरह पूज्य बन गया जाता है।फिर इस शरीर रूपी देवालय में बैठा आपका आत्म तत्व रूपी देवता आपको स्पष्ट दिखाई देने लगता है।</p>
<p>आपका तन मन और आत्मा रूपी धन तीनों ही तीर्थ के समान पवित्र हो जाते हैं। इसलिए साक्षी है व्यसन में लिप्त बड़े-बड़े महारथियों की किस प्रकार दुर्दशा हुई। जिसका कदम कदभृ( कीचड़ )में फंस जाता है उसे बड़े यत्न से ही निकाला जा सकता है। वरना तो कदम निकालते-निकालते ही दम निकल जाता है। यह कदम विकार से विकास की ओर बढ़े। हमारी सही लत से ही हम स्वयं का और दूसरों का कल्याण कर सकते हैं।</p>
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		<title>धर्म प्रभावना : आदर्श जीवन से ही बनता है गौरवशाली इतिहास : मुनि श्री निरंजन सागर  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Feb 2023 14:03:20 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[मुनि श्री निरंजन सागर]]></category>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री निरंजन सागर ने प्रवचन के दौरान कहा कि प्रसिद्धि भी दो तरह से होती है। पहली विख्यात और दूसरी कुख्यात ।यह ख्याति की चाह, पूजन( आदर सत्कार) की चाह, लाभ की चाह और सभी जगह बस मेरी वाह वाह। पढ़िए जयकुमार जलज हटा/राजेश रागी बकस्वाहा की विस्तृत रिपोर्ट&#8230; कुण्डलपुर। हर व्यक्ति आज चाहता [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री निरंजन सागर ने प्रवचन के दौरान कहा कि प्रसिद्धि भी दो तरह से होती है। पहली विख्यात और दूसरी कुख्यात ।यह ख्याति की चाह, पूजन( आदर सत्कार) की चाह, लाभ की चाह और सभी जगह बस मेरी वाह वाह। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए जयकुमार जलज हटा/राजेश रागी बकस्वाहा की विस्तृत रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुण्डलपुर।</strong> हर व्यक्ति आज चाहता है कि उसका नाम भी इतिहास में अंकित हो और वह भी सामान्य नहीं बल्कि स्वर्णिम अक्षरों में। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन ही स्वर्णमय बना लिया हो, उस व्यक्ति का जीवन ही स्वर्णिम अक्षरों से इतिहास में स्थान पाता है। जिस व्यक्ति ने अपने आप को स्वर्ण की भांति निखारा न हो, तपाया न हो, ऐसा व्यक्ति तीन काल में आदर्श प्रस्तुत नहीं कर सकता है। यह बात मुनि श्री निरंजन सागर जी ने महाराज में प्रतिदिन होने वाले प्रवचनों की श्रंखला के दौरान कही। प्रसिद्धि भी दो तरह से होती है। पहली विख्यात और दूसरी कुख्यात ।यह ख्याति की चाह, पूजन( आदर सत्कार) की चाह, लाभ की चाह और सभी जगह बस मेरी वाह वाह। यह कुछ ऐसी चाह है कि जब तक मुख से आह न निकले अर्थात प्राणांत होने तक बनी रहती है। इस चाह को स्वाहा किए बिना हम एक आदर्श पूर्ण जीवन नहीं जी सकेंगे। साइंस ऑफ लिविंग का रहस्य समझ में आना बड़ा कठिन है। जिसने ऐसे समझ लिया वही जीवन के सही आनंद को प्राप्त कर सकता है। जीवन का सार है मर्यादा और जिसने मर्यादा का उल्लंघन कर दिया, फिर वह किसी की मर्यादा अर्थात् विनय आदर आदि भी नहीं करता। पिता पुत्र की मर्यादा का आदर्श उदाहरण हैं श्रीराम और दशरथ जी। गुरु शिष्य की मर्यादा का आदर्श उदाहरण हैं एकलव्य और द्रोणाचार्य। देश प्रेम का आदर्श उदाहरण हैं दानवीर भामाशाह। राष्ट्रप्रेम का आदर्श उदाहरण हैं महाराणा प्रताप। अतिथि सत्कार का आदर्श उदाहरण हैं शबरी। भक्ति का आदर्श उदाहरण हैं मीरा। ऐसे कई गौरवशाली व्यक्तित्व से भारतीय सनातन इतिहास भरा पड़ा है। इन महापुरुषों ने अपने जीवन को सफल आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया। इतिहास जब भी लिखा जाता है कुछ करने वालों का ही लिखा जाता है परंतु वह कार्य अगर आदर्श कार्य हो तो वह इतिहास को गौरवान्वित करता है और वही कुछ कुकृत्य ऐसे भी होते हैं जिनसे इतिहास कलंकित भी हो जाता है। रावण, कौरव आदि ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे इतिहास को शर्मसार होना पड़ा।</p>
<p><strong>वर्तमान में आदर्शों की कमी</strong></p>
<p>वर्तमान समय में समाज में आदर्शों की बहुत बड़ी कमी होती जा रही है। यह हम सभी का प्रबल पुण्य का उदय है इस कलिकाल में जहां धर्म नाम मात्र का रह गया था, वहां आचार्य महाराज जैसे सूर्य का उदय हुआ। इस युग में आदर्श पुरुष राष्ट्रहित चिंतक आचार्य गुरुवर 108 श्री विद्यासागर जी महामुनि राज का जन्म हुआ। जिन्होंने इस धर्म की ध्वजा को इतना ऊपर उठाया कि वह धर्म इस युग के अंत तक अनवरत इसी तरह चलता रहेगा।गुरुदेव ने अपने मर्यादित आदर्श पूर्ण जीवन के माध्यम से एक ऐसा गौरवशाली इतिहास रच डाला। ऐसा इतिहास ना भूतो ना भविष्यति। यह इतिहास युगों युगों तक गुरुदेव के गुणगान गा कर उनकी गौरवगाथा सबको सुनाता रहेगा। आचार्यों ने आदर्श पूर्ण जीवन जीने को कहा है। ऐसा जीवन जो बिना प्रदर्शन के मात्र आत्मदर्शन को दर्शाए, वही आदर्श जीवन है। आदर्श अर्थात (आ +दर्श) आत्मदर्शन जहां हो। ऐसा आदर्श हम सभी अपने जीवन में स्थापित करें और जिन्होंने किया है, उनका अनुकरण कर अपना जीवन सफल करें।</p>
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