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	<title>Hastinapur &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>परतापुर बना राजा श्रेयांस की नगरी हस्तिनापुर : अक्षय तृतीया पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब </title>
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		<pubDate>Tue, 21 Apr 2026 08:39:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अक्षय तृतीया पर नगर का वातावरण धार्मिक आयोजनों से धर्ममय हो गया। पर्व का महत्व बताते हुए प्रवक्ता राहुल जैन ने कहा कि यह दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ी उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में मनाया जाता है, जब उन्होंने वर्ष भर के कठोर उपवास के बाद इक्षु रस से पारणा किया था। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अक्षय तृतीया पर नगर का वातावरण धार्मिक आयोजनों से धर्ममय हो गया। पर्व का महत्व बताते हुए प्रवक्ता राहुल जैन ने कहा कि यह दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ी उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में मनाया जाता है, जब उन्होंने वर्ष भर के कठोर उपवास के बाद इक्षु रस से पारणा किया था। <span style="color: #ff0000">परतापुर से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> परतापुर</strong>। अक्षय तृतीया पर नगर का वातावरण धार्मिक आयोजनों से धर्ममय हो गया। पर्व का महत्व बताते हुए प्रवक्ता राहुल जैन ने कहा कि यह दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ी उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में मनाया जाता है, जब उन्होंने वर्ष भर के कठोर उपवास के बाद इक्षु रस से पारणा किया था। जैन परंपरा के अनुसार दीक्षा के पश्चात भगवान ऋषभदेव को लंबे समय तक आहार नहीं मिला, क्योंकि उस समय आहार दान की विधि प्रचलित नहीं थी। अंततः राजा श्रेयांस ने हस्तिनापुर में विधिपूर्वक गन्ने का रस अर्पित कर उन्हें आहार ग्रहण कराया। इसी कारण यह दिन अक्षय पुण्य प्रदान करने वाला माना जाता है और नगर में इस बार यह पर्व मानो हस्तिनापुर की झलक प्रस्तुत करता नजर आया। नगर में विराजित आचार्यश्री प्रसन्न सागरजी महाराज के चतुर्विध संघ की आहारचर्या के लिए सैकड़ों श्रद्धालुओं ने आहारदान का पुण्य कमाया। इस दौरान मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। नेमिनाथ जैन मंदिर में विशेष पूजा, अभिषेक एवं शांतिधारा के आयोजन हुए। बेड़वा बाबा आदिनाथ भगवान एवं मूलनायक नेमिनाथ भगवान का प्रथम अभिषेक एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य कमलकुमार, सुनीलकुमार, जतिन, अनिल दोसी एवं राजीव गादिया परिवार को प्राप्त हुआ। अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर परतापुर में आस्था और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम देखने को मिला, जिससे पूरा क्षेत्र धर्ममय वातावरण में रंगा नजर आया। यह जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा पीयूष कासलीवाल औरंगाबाद ने दी।</p>
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		<title>तीर्थंकर कुंथुनाथ जी शांति और संयम के प्रतीक: जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक की पावन गाथा </title>
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		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 05:54:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की श्रेणी में 17वें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ जी का व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण और प्रेरणादायी है। 18 अप्रैल (वैशाख शुक्ल प्रतिपदा) का दिन जैन समाज के लिए एक महामहोत्सव के समान है, क्योंकि इसी पावन तिथि को प्रभु के जन्म, तप और मोक्ष इन तीन महान कल्याणकों का त्रिवेणी संगम होता [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की श्रेणी में 17वें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ जी का व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण और प्रेरणादायी है। 18 अप्रैल (वैशाख शुक्ल प्रतिपदा) का दिन जैन समाज के लिए एक महामहोत्सव के समान है, क्योंकि इसी पावन तिथि को प्रभु के जन्म, तप और मोक्ष इन तीन महान कल्याणकों का त्रिवेणी संगम होता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल का यह संपादित आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की श्रेणी में 17वें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ जी का व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण और प्रेरणादायी है। 18 अप्रैल (वैशाख शुक्ल प्रतिपदा) का दिन जैन समाज के लिए एक महामहोत्सव के समान है, क्योंकि इसी पावन तिथि को प्रभु के जन्म, तप और मोक्ष इन तीन महान कल्याणकों का त्रिवेणी संगम होता है। यह दिन न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का है, बल्कि स्वयं के भीतर झांकने और संयम के मार्ग पर चलने का संदेश भी देता है।</p>
<p><strong>हस्तिनापुर की पावन धरा पर अवतरण (जन्म कल्याणक)</strong></p>
<p>भगवान कुंथुनाथ जी का जन्म कुरुवंश की ऐतिहासिक नगरी हस्तिनापुर में हुआ था। उनके पिता राजा सूर्यसेन और माता महारानी श्रीकांता थीं। वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन जब प्रभु का जन्म हुआ, तब संपूर्ण देवलोक हर्षित हो उठा। जैन आगमों के अनुसार तीर्थंकर के जन्म के समय इंद्रों ने सुमेरु पर्वत पर ले जाकर उनका जन्माभिषेक किया था। कुंथुनाथ जी का व्यक्तित्व दोहरे उत्तरदायित्वों का संगम था। वे न केवल एक तीर्थंकर थे, बल्कि वे छठे चक्रवर्ती भी थे। इसका अर्थ है कि उन्होंने एक विशाल साम्राज्य पर धर्मपूर्वक शासन किया, किंतु उनका हृदय सदैव कमल के समान संसार रूपी जल से निर्लिप्त रहा।</p>
<p><strong>वैराग्य और कठोर साधना (तप कल्याणक)</strong></p>
<p>संसार का वैभव, छः खंडों का साम्राज्य और अतुलनीय शक्ति होने के बाद भी कुंथुनाथ जी का मन आत्मिक शांति की खोज में था। एक दिन संसार की अनित्यता को जानकर उन्होंने दिगंबर दीक्षा धारण करने का संकल्प लिया। हस्तिनापुर के श्सहेतुकश् वन में उन्होंने वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के ही दिन दीक्षा ग्रहण की। उनके तप कल्याणक की यह विशेषता है कि उन्होंने घोर तपस्या के माध्यम से इंद्रियों पर विजय प्राप्त की। उनका जीवन हमें सिखाता है कि संयम ही वास्तविक शक्ति है। आज के भागदौड़ भरे युग में, जहां मनुष्य भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है, भगवान कुंथुनाथ का तप हमें एकाग्रता और त्याग की महत्ता समझाता है।</p>
<p><strong>अनंत सुख की प्राप्ति (मोक्ष कल्याणक)</strong></p>
<p>कठोर तप और ध्यान के बल पर प्रभु ने पहले ‘केवलज्ञान’ (संपूर्ण ज्ञान) प्राप्त किया और फिर सम्मेद शिखरजी की पावन पहाड़ियों से वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के ही दिन ही निर्वाण प्राप्त कर सिद्ध पद को प्राप्त हुए। एक ही तिथि पर जन्म, दीक्षा और मोक्ष का होना आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ और महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p><strong>जैन मंदिरों में भक्ति का उल्लास-पूजन और विधान</strong></p>
<p>18 अप्रैल को देश-दुनिया के समस्त दिगंबर जैन मंदिरों में भक्ति की बयार बहेगी। इस विशेष अवसर पर भक्तगण निम्नलिखित धार्मिक क्रियाओं के माध्यम से अपनी श्रद्धा अर्पित करेंगे। प्रभु के चरणों में पवित्र जल से अभिषेक कर विश्व शांति की कामना की जाएगी। मोक्ष कल्याणक के प्रतीक स्वरूप मंदिरों में भव्य निर्वाण लाडू चढ़ाया जाएगा, जो आत्मा की पूर्णता का प्रतीक है। भक्ति भाव के साथ निर्वाण कांड का पाठ किया जाएगा, जिसमें सिद्धक्षेत्रों की वंदना होती है। अष्ट द्रव्यों (जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल) से प्रभु की सामूहिक आराधना की जाएगी।</p>
<p><strong>आज के परिप्रेक्ष्य में भगवान कुंथुनाथ की शिक्षाएं</strong></p>
<p>भगवान कुंथुनाथ जी का जीवन जियो और जीने दो के सिद्धांत का जीवंत उदाहरण है। उनके नाम में ‘कुंथु’ शब्द छोटे जीवों की रक्षा की ओर भी संकेत करता है, जो अहिंसा के सूक्ष्म पालन को दर्शाता है। उनके कल्याणक हमें सिखाते हैं कि इच्छाओं पर नियंत्रण ही सुखी जीवन की कुंजी है। जिस प्रकार उन्होंने तप में एकाग्रता दिखाई, वैसे ही हमें अपने लक्ष्यों के प्रति समर्पित होना चाहिए। संचय से अधिक सुख विसर्जन और त्याग में है। भगवान कुंथुनाथ जी का यह त्रिकल्याणक महोत्सव संपूर्ण मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्ग प्रशस्त करे, इसी मंगल भावना के साथ समस्त जैन समाज इस गौरवशाली दिवस को उल्लासपूर्वक मनाता है।</p>
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		<title>16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ का ज्ञान कल्याणक 29 दिसंबर को: पौष शुक्ल दशमी को तिथि को हुआ था केवल ज्ञान </title>
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		<pubDate>Sun, 28 Dec 2025 14:22:56 +0000</pubDate>
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<p><strong>जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ का ज्ञान कल्याणक इस बार 29 दिसंबर को आ रहा है। भगवान शांतिनाथ ने पौष शुक्ल दशमी तिथि को केवल ज्ञान प्राप्त किया था। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान शांतिनाथ जी का ज्ञान कल्याणक (केवलज्ञान) पौष मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि को हुआ था। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ का ज्ञान कल्याणक इस बार 29 दिसंबर को आ रहा है। भगवान शांतिनाथ ने पौष शुक्ल दशमी तिथि को केवल ज्ञान प्राप्त किया था। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान शांतिनाथ जी का ज्ञान कल्याणक (केवलज्ञान) पौष मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि को हुआ था। जब उन्होंने हस्तिनापुर के पास सहस्राम्रवन में अशोक वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या के बाद केवल ज्ञान प्राप्त किया और लोकालोक के सभी पदार्थों को जाना, जिससे उन्हें दिव्य वाणी (देशना) के माध्यम से उपदेश देने और समवशरण की रचना का अवसर मिला। जिससे कई जीव मोक्ष मार्ग की ओर बढ़े। यहां यह भी उल्लेखित है कि दीक्षा के एक वर्ष बाद कठोर तपस्या के बाद नंदिवृक्ष (अशोक वृक्ष) के नीचे उन्हें लोकालोक का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ और वे सभी 18 दोषों से रहित हो गए। देवताओं ने आकर समवशरण (दिव्य सभा मंडप) की रचना की, और जहां प्रभु ने अपनी दिव्य वाणी (देशना) से उपदेश दिया। भगवान शांतिनाथ जी के 36 गणधर (प्रमुख शिष्य) हुए। जिनमें चक्रायुध प्रमुख थे। जिन्होंने प्रभु की वाणी को जन-जन तक पहुंचाया। इस ज्ञान कल्याणक से मोक्षमार्ग पुर्नस्थापित हुआ और अनेक जीवों ने दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त किया। भगवान शांतिनाथ, जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर हैं और उनका ज्ञान कल्याणक जैन धर्म में शांति, अहिंसा और आत्म-कल्याण के प्रतीक के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस तिथि को भगवान शांतिनाथ जी का ज्ञान कल्याणक शहर के दिगंबर जैन मंदिरों के अतिरिक्त देश भर में भी पांरपरिक धार्मिक उल्लास और पूर्ण भक्ति भावना के साथ मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष अर्चना के साथ अभिषेक, शांतिधारा पाठ का आयोजन किया जाता है। भगवान शांतिनाथ जी के संदेशों को स्मरण कर धर्म आराधना की जाती है।</p>
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		<title>बच्चों ने अष्टान्हिका पर्व पर पंचमेरु पूजा, नंदीश्वर द्वीप पूजा की : 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ के कैवल्य ज्ञान कल्याणक पर अर्घ्य अर्पित किए </title>
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		<pubDate>Sun, 02 Nov 2025 15:46:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन पाठशाला के बच्चों द्वारा रविवारीय पूजा में अष्टान्हिका पर्व के दौरान पंच मेरु पूजा, नंदीश्वर द्वीप पूजाएं पढ़कर शांतिपाठ किया गया। आयोजन में 14 बच्चों ने हिस्सा लिया। इससे पूर्व गर्भ गृह में बच्चों ने पार्श्वनाथ भगवान का अभिषेक किया। डडूका से पढ़िए, यह खबर&#8230; डडूका। दिगंबर जैन पाठशाला के बच्चों द्वारा रविवारीय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन पाठशाला के बच्चों द्वारा रविवारीय पूजा में अष्टान्हिका पर्व के दौरान पंच मेरु पूजा, नंदीश्वर द्वीप पूजाएं पढ़कर शांतिपाठ किया गया। आयोजन में 14 बच्चों ने हिस्सा लिया। इससे पूर्व गर्भ गृह में बच्चों ने पार्श्वनाथ भगवान का अभिषेक किया। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> दिगंबर जैन पाठशाला के बच्चों द्वारा रविवारीय पूजा में अष्टान्हिका पर्व के दौरान पंच मेरु पूजा, नंदीश्वर द्वीप पूजाएं पढ़कर शांतिपाठ किया गया। आयोजन में 14 बच्चों ने हिस्सा लिया। इससे पूर्व गर्भ गृह में बच्चों ने पार्श्वनाथ भगवान का अभिषेक किया। पाठशाला प्रेरक अजीत कोठिया के निर्देशन में बच्चों ने अष्टान्हिका पर्व के महत्व पर जानकारी ली। अष्टान्हिका पर्व साल में तीन बार क्रमशः कार्तिक, फाल्गुन ओर आषाढ़ मास में मनाए जाते हैं। बच्चों ने आज 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ के कैवल्य ज्ञान कल्याणक के अवसर पर उन्हें अर्घ्य समर्पित कर उनका पावन णमोकारमयी स्मरण किया।</p>
<p>तीर्थंकर भगवान अरहनाथ का कैवल्य ज्ञान कल्याणक हस्तिनापुर नगरी में हुआ था। बच्चों ने सामूहिक महाअर्घ्य समर्पण से पूर्व आचार्य विद्यासागर जी, आचार्य समय सागर जी एवं गुरु मां विज्ञानमति माताजी को अर्घ्य समर्पित किए। संचालन अजीत कोठिया ने किया। आभार रियल जैन एवं मानवी सेठ ने किया। इससे पूर्व पाठशाला के छात्र कल्प सुधीर सेठ के जन्म दिन पर पाठशाला डडूका परिवार द्वारा बधाई एवं शुभकामनाएं दी गई।</p>
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		<title>त्याग और तपस्या का महापर्व है दीपावली : भीतर ज्ञान, भक्ति और ईश्वर के प्रति प्रेम की अखंड ज्योति जलाने का दिवस है दिवाली </title>
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		<pubDate>Sun, 19 Oct 2025 14:43:50 +0000</pubDate>
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<p><strong>आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज के मुनि श्री गुरुदत्त सागर एवं मुनि श्री मेघ दत्त सागर ने रविवार को अजितनाथ जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि दीपावली जैन धर्म में त्याग और तपस्या का महापर्व है। <span style="color: #ff0000">महरौनी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>महरौनी।</strong> आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज के मुनि श्री गुरुदत्त सागर एवं मुनि श्री मेघ दत्त सागर ने रविवार को अजितनाथ जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि दीपावली जैन धर्म में त्याग और तपस्या का महापर्व है। इसी दिन भगवान महावीर स्वामी, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं, को निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। साथ ही अमावस्या की सांझ के समय उनके प्रथम गणधर गौतम स्वामी को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसलिए यह पर्व आत्म ज्योति प्रज्ज्वलित करने का प्रतीक है। मुनि श्री ने बताया कि दीपावली के अवसर पर जैन समाज के श्रद्धालु मंदिरों में भगवान महावीर की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं, लाडू चढ़ाते हैं और सायंकाल घर-घर दीप प्रज्ज्वलित कर खुशी मनाते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में भी दीपावली का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त कर 14 वर्ष का वनवास पूर्ण करने के बाद अयोध्या लौटकर प्रजाजनों के साथ हर्षोल्लास से दीप जलाए थे।</p>
<p>इसके अतिरिक्त, इसी दिन राजा विक्रमादित्य का राजाभिषेक हुआ था, भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था और महाभारत काल में पांडवों ने 12 वर्ष के वनवास के बाद हस्तिनापुर लौटकर दीपोत्सव मनाया था। मुनि श्री ने कहा कि दीपावली केवल बाहरी दीपक जलाने का त्योहार नहीं, बल्कि अपने भीतर ज्ञान, भक्ति और ईश्वर के प्रति प्रेम की अखंड ज्योति जलाने का दिवस है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएँ उपस्थित रहीं। जानकारी के अनुसार, 20 अक्टूबर को अजितनाथ जैन मंदिर में चातुर्मास समापन एवं क्षमावाणी महोत्सव का आयोजन किया जाएगा।</p>
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		<title>तीर्थंकर भगवंतों की जन्म भूमि के विकास में आर्यिका ज्ञानमतीजी की प्रेरणा: माताजी की विशेष रुचि से विश्वव्यापी ख्याति मिली इन धर्मस्थलों को- आर्यिका श्री चंदनामतीजी  </title>
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		<pubDate>Wed, 13 Aug 2025 08:46:01 +0000</pubDate>
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<p><strong>गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या में विराजमान हैं। यहां पर नित्य होने वाले प्रवचनों के माध्यम से माताजी के मुखारबिंद से देशना सुनकर भक्तजन धर्मलाभ उठा रहे हैं। <span style="color: #ff0000">अयोध्या से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या।</strong> गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या में विराजमान हैं। यहां पर नित्य होने वाले प्रवचनों के माध्यम से माताजी के मुखारबिंद से देशना सुनकर भक्तजन धर्मलाभ उठा रहे हैं। बुधवार को आर्यिका चंदनामती माताजी ने कहा कि तीर्थंकर भगवंतों की कल्याणक भूमि एवं विशेष रूप से जन्मभूमि के विकास की ओर आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी की विशेष आंतरिक रुचि सदा से रही है। आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी का कहना है कि हमारी संस्कृति का परिचय प्रदान करने वाली ये कल्याणक भूमि हमारी संस्कृति की महान धरोहर हैं। अतः इनका संरक्षण, संवर्धन और विकास अत्यंत आवश्यक है। सर्वप्रथम भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ की जन्मभूमि हस्तिनापुर में आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से निर्मित जैन भूगोल की अद्वितीय रचना ‘जम्बूद्वीप’ आज विश्व के मानस पटल पर अंकित है।</p>
<p><strong>मानव निर्मित स्वर्ग’ की संज्ञा मिली </strong></p>
<p>उत्तरप्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग ने जम्बूद्वीप से हस्तिनापुर की पहचान बताते हुए उसे एक अतुलनीय ‘मानव निर्मित स्वर्ग’ की संज्ञा दी है। वर्ष 1993 से 1995 तक शाश्वत जन्मभूमि अयोध्या में ‘समवशरण मंदिर’ और ‘त्रिकाल चौबीसी मंदिर’ एवं बाद के वर्षों में अयोध्या में जन्मे पांचों तीर्थंकर भगवंतों की जन्मस्थली के प्रतीक पांचों टोकों पर विशाल जिनमंदिरों का निर्माण करवाकर उसका विश्वव्यापी प्रचार किया।</p>
<p><strong>यहां भी माताजी की प्रेरणा से बने भव्य मंदिर</strong></p>
<p>अकलूज (महाराष्ट्र) में नवदेवता मंदिर निर्माण की प्रेरणा, सनावद (मप्र) में णमोकार धाम, प्रीत विहार-दिल्ली में कमलमंदिर, मांगीतुंगी (महाराष्ट्र) में सहस्रकूट कमल मंदिर, अहिच्छत्र में ग्यारह शिखर वाला तीस चौबीसी मंदिर और भगवान ऋषभदेव की दीक्षा एवं केवल ज्ञान कल्याणक भूमि प्रयाग (इलाहाबाद) में ‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली तीर्थ’ का भव्य निर्माण माताजी की ही प्रेरणा के प्रतिफल हैं।</p>
<p><strong>कुंडलपुर तीर्थ विश्व भर के लिए आकर्षण का केंद्र </strong></p>
<p>भगवान महावीर स्वामी की जन्मभूमि कुंडलपुर (नालंदा-बिहार) के विकास के लिए भगवान महावीर स्वामी कीर्तिस्तंभ, भगवान महावीर की विशाल खड्गासन प्रतिमा सहित विश्वशांति महावीर मंदिर, नवग्रह शांति जिनमंदिर, त्रिकाल चौबीसी मंदिर एवं नंद्यावर्त महल आदि अनेक निर्माण आपकी प्रेरणा से इस क्षेत्र पर निर्मित हुए हैं तथा कुंडलपुर तीर्थ विश्व भर के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।</p>
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		<title>रक्षा बंधन पर्व संकल्प के साथ शनिवार को मनाया जाएगा: जयकारों के बीच निर्वाण लाडू चढ़ाया जाएगा </title>
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		<pubDate>Sat, 09 Aug 2025 05:25:09 +0000</pubDate>
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<p><strong>जैन धर्मावलंबियों द्वारा रक्षाबंधन के पर्व शनिवार, 9 अगस्त को साधु-संतों की रक्षा धर्म, तीर्थ संस्कृति की रक्षा के संकल्प दिवस के रूप में पूरे विश्व में मनाएंगे। रक्षाबंधन दिवस पर हस्तिनापुर में 700 जैन मुनियों के उपसर्ग को दूर कर मुनियों की रक्षा की थी। इसलिए रक्षा बंधन पर्व पर महामुनि विष्णु कुमार की पूजा की जाएगी। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। जैन धर्मावलंबियों द्वारा रक्षाबंधन के पर्व शनिवार, 9 अगस्त को साधु-संतों की रक्षा धर्म, तीर्थ संस्कृति की रक्षा के संकल्प दिवस के रूप में पूरे विश्व में मनाएंगे। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस मौके पर जैन धर्म के ग्यारहवें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का मोक्ष कल्याणक दिवस भी सभी जिनालयों में मनाया जाएगा। साथ ही दिगंबर जैन धर्म के प्रसिद्ध संत श्री विष्णु कुमार महामुनि द्वारा रक्षाबंधन दिवस पर हस्तिनापुर में 700 जैन मुनियों के उपसर्ग को दूर कर मुनियों की रक्षा की थी। इसलिए रक्षा बंधन पर्व पर महामुनि विष्णु कुमार की पूजा की जाएगी। विश्व जैन संगठन एवं जिन शासन एकता संघ के अध्यक्ष मयंक जैन एवं राजेश जैन के अनुसार श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन राजा बलि द्वारा हस्तिनापुर में 700 साधु-संतों पर घोर अत्याचार किए गए थे।</p>
<p>इस अत्याचार एवं उपसर्ग को महामुनि विष्णु कुमार ने ब्राह्मण का रूप धारणकर दूर किया था। उन्होंने साधु-संतों को आहार करवाकर स्वयं आहार किया था। इसलिए इस दिन को भारत वर्षीय जैन धर्मावलंबी रक्षाबंधन के पर्व को प्रति वर्ष साधु-संतों, संस्कृति एवं तीर्थ, जिन आयतन की रक्षा के संकल्प दिवस के रूप में मनाते हैं। इस अवसर पर नगर में दिगंबर जैन संतों के चातुर्मास स्थलों पर एवं शहर के सभी दिगंबर जैन मंदिरों में महामुनि विष्णु कुमार की अष्ट द्रव्य से पूजा अर्चना की जाएगी। इस अवसर पर जैन श्रावकों द्वारा आचार्यों, मुनिराजों, आर्यिका माताजी की पिच्छिका पर रक्षा सूत्र बांधा जाकर साधु संतों व जिनवाणी संस्कृति ,एव जिनालयों तथा जैन धर्म की रक्षा का संकल्प लिया जाएगा। इस मौके पर साधु संतों के विशेष प्रवचन होंगेें।</p>
<p>दद्दू के मुताबिक इसी दिन जैन धर्म के ग्यारहवें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का मोक्ष कल्याणक दिवस सभी जिनालयों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाएगा। मंदिरों में प्रातः भगवान के जिन अभिषेक, शांतिधारा के बाद पूजा अर्चना की जाएगी। पूजा के दौरान निर्वाण दिवस मनाया जाकर मंत्रोच्चार के साथ जयकारों के बीच निर्वाण लाडू चढ़ाया जाएगा। तीर्थ स्वरूप आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में रक्षाबंधन पर्व पर विशेष आयोजन किए जाएंगे।</p>
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		<title>गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में हुआ आयोजन : भारतीय ज्ञान परंपरा एवं जैन साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न  </title>
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		<pubDate>Wed, 11 Jun 2025 05:43:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[तीर्थंकर ऋषभदेव जैन विद्वत् महासंघ एवं भारतीय ज्ञान परंपरा-जैन गणित केन्द्र, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर के संयुक्त तत्त्वावधान में &#8216;भारतीय ज्ञान परंपरा एवं जैन साहित्य&#8217; विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी श्रुत पंचमी के पवन पर्व पर दिगम्बर जैन तीर्थ अयोध्या में आयोजित की गई। इस संगोष्ठी में 35 से अधिक विद्वान सम्मिलित हुए। पढ़िए यह विशेष [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>तीर्थंकर ऋषभदेव जैन विद्वत् महासंघ एवं भारतीय ज्ञान परंपरा-जैन गणित केन्द्र, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर के संयुक्त तत्त्वावधान में &#8216;भारतीय ज्ञान परंपरा एवं जैन साहित्य&#8217; विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी श्रुत पंचमी के पवन पर्व पर दिगम्बर जैन तीर्थ अयोध्या में आयोजित की गई। इस संगोष्ठी में 35 से अधिक विद्वान सम्मिलित हुए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>अयोध्या।</strong> तीर्थंकर ऋषभदेव जैन विद्वत् महासंघ एवं भारतीय ज्ञान परंपरा-जैन गणित केन्द्र, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर के संयुक्त तत्त्वावधान में &#8216;भारतीय ज्ञान परंपरा एवं जैन साहित्य&#8217; विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी श्रुत पंचमी के पवन पर्व पर दिगम्बर जैन तीर्थ अयोध्या में आयोजित की गई। इस संगोष्ठी में 35 से अधिक विद्वान सम्मिलित हुए।</p>
<p>संगोष्ठी की अध्यक्षता IKS Division शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार के राष्ट्रीय समन्वयक प्रो. जी.एस.मूर्ति ने की। मुख्य अतिथि थे शोभित विश्वविद्यालय, मेरठ के पूर्व कुलपति एव चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ गणित के आचार्य प्रो. एस. सी. अग्रवाल । विशेष अतिथि के रूप में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर के कुलपति प्रो. राकेश सिंघई एवं मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भोपाल की आचार्य प्रो. ज्योति सिंघई उपस्थित रहीं ।</p>
<p>अ. भा. दि. जैन महिला संगठन &#8211; मध्य प्रदेश की अध्यक्ष आशुकवियत्री श्रीमती उषा पाटनी जी ने स्वरचित मंगलाचरण में संगोष्ठी की विषयवस्तु एवं पुरस्कार समर्पण समारोह का पूरा चित्र प्रस्तुत किया।</p>
<p>संगोष्ठी में डॉ. सुशील जैन ( कुरावली) ने प्रथम वक्ता के रूप में विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में जैन साहित्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जैन साहित्य ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया है, आचार्य धरसेन का बहुत उपकार है कि उन्होंने षटखंडागम जैन ग्रंथ आज हमें उपलब्ध कराया।</p>
<p>डॉ. अल्पना जैन मोदी ( ग्वालियर), ने कहा कि भगवान ऋषभदेव द्वारा प्रदत्त उपदेश के कुछ अंशों को परिवर्ती आचार्यों ने सुरक्षित रखकर उसे चारों अनुयोगों में निबद्ध किया जिसमें कथा, काव्य, स्तोत्र, गणित, ज्योतिष, वास्तु आदि सब कुछ सम्मिलित है।</p>
<p>युवा मनीषी डॉ. भरत जैन (इन्दौर) ने कहा कि जैन धर्म में पर्यावरण को विशेष अर्थ में न सीमित करते हुए जीवन के समस्त कार्यकलापों में सृष्टि का कम से कम दोहन कर अधिकतम लाभ प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। जैन जीवन शैली ही पर्यावरण हितैषी है।</p>
<p>डॉ. रश्मि जैन (फिरोजाबाद), ने मध्यकालीन हिन्दी जैन काव्य को भारतीय ज्ञान परंपरा की निधि निरूपित करते हुए बताया कि इन काव्यों में अध्यात्म, दर्शन ही नहीं इतिहास की भी महत्वपूर्ण जानकारी है। डॉ. रश्मि जी ने अनेक कवियों के उदाहरण प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया ।</p>
<p>शीतल तीर्थ &#8211; रतलाम की अधिष्ठात्री डॉ. सविता जैन ने कहा कि इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ ) ने अपनी दोनों पुत्रियों ब्राह्मी एवं सुन्दरी को लिपि</p>
<p>एवं अंक ज्ञान की शिक्षा प्रदान की। प्रथम गुरू एवं नारी सशक्तिकरण का उच्च मानदण्ड स्थपित किया आपने असि, मसि, कृषि आदि षविधाओं की शिक्षा दी ।</p>
<p>तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के जैन अध्ययन केन्द्र के निर्देशक प्रो. विपिन जैन ने TMU में भारतीय ज्ञान परम्परा केंन्द्र की प्रो. अनुपम जैन के निर्देशन में चल रही गतिविधियों एवं जैन अध्ययन केन्द्र में चल रहे शोधकार्यों की जानकारी दी।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-82755" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/01.jpg" alt="" width="516" height="395" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/01.jpg 516w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/01-300x230.jpg 300w" sizes="(max-width: 516px) 100vw, 516px" />महासंघ के अध्यक्ष डॉ. अनुपम जैन (इन्दौर), ने विस्तार से भारतीय ज्ञान परम्परा के भेदोपभेदों की जाकारी दी एवं बताया कि यह परम्परा लिखित एवं अलिखित दोनों है। लिखित में वैदिक एवं श्रमण दोनों परम्पराओं का साहित्य महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः जैन साहित्य का सम्यक् अनुशीलन किये बगैर भारतीय ज्ञान परम्परा को समझना संभव ही नहीं है। इस ज्ञान परम्परा में गणित का महत्त्वपूर्ण स्थान है जिस पर लिखा संदर्भ ग्रंथ जैन गणित आज विवेचित होगा ।</p>
<p>मौलाना आजाद प्रौद्योगिकी संस्थान, भोपाल से पधारी प्रो. ज्योति सिंघई ने कहा कि संस्कारों का बीजारोपण परिवार से ही प्रारम्भ हो जाता है। हम अपने बड़े बुजुगों के माध्यम से अनेक संस्कारों को सहज ही स्वीकार कर उच्च स्तरीय जीवन शैली को अंगीकार कर सुखद समाज बनाते है जो समाज निर्माण में सहायक होते है। हमारे केन्द्र पर गायत्री मंत्र का मानव शरीर पर प्रभाव का अध्ययन किया जा रहा है मैं चाहती हूँ कि णमोकार मंत्र पर भी अध्ययन हो जिससे मष्तिष्क तरंगों पर उसके प्रभाव का आकलन हो सके।</p>
<p>मुख्य अतिथि प्रो. अग्रवाल (मेरठ) ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का अन्य सभ्यताओं में विकसित ज्ञान के साथ तुलनत्मक अध्ययन किया जाना चाहिए। बेबोलियन, मेसोपोटामियान, ग्रीक आदि सभ्यताओं में जो ज्ञान परम्परा रही है उससे तुलना करने पर हम भारतीय ज्ञान परम्परा को ग्लोबल स्तर पर प्रतिष्ठित कर सकेंगे।</p>
<p>अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. मूर्ति ने विद्वानों का आह्वान किया किया कि वे ज्ञान कि विभिन्न क्षेत्रों में जैनाचार्यों एवं जैन साहित्य के योगदान का अध्ययन करें। IKS Division से हम उन्हें पूरा सहयोग देंगे।</p>
<p>कार्यक्रम का सशक्त एवं प्रभावी संचालन डॉ. संजीव सराफ (वाराणसी) ने किया। आभार माना महासंघ के महामंत्री प विजय कुमार जैन ने ।</p>
<p>सभी सहभागियों को सम्पुट (Kit) प्रदान किये गये।</p>
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		<title>गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी कर करकमलों हुआ विमोचन : डॉ. अनुपम जैन द्वारा रचित &#8220;जैन गणित&#8221; ग्रंथ का समर्पण </title>
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		<pubDate>Wed, 11 Jun 2025 05:41:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारत सरकार &#8211; शिक्षा मंत्रालय द्वारा देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर में भारतीय ज्ञान परम्परा जैन गणित केन्द्र (IKS Centre in Jaina Mathematics) की स्थापना कर प्रसिद्ध जैन गणितज्ञ प्रो. अनुपम जैन को केन्द्र के मुख्य अन्वेषक के रूप में जैन गणित पर एक सन्दर्भ ग्रंथ के सृजन का दायित्व दिया गया था। प्रो. जैन ने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारत सरकार &#8211; शिक्षा मंत्रालय द्वारा देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर में भारतीय ज्ञान परम्परा जैन गणित केन्द्र (IKS Centre in Jaina Mathematics) की स्थापना कर प्रसिद्ध जैन गणितज्ञ प्रो. अनुपम जैन को केन्द्र के मुख्य अन्वेषक के रूप में जैन गणित पर एक सन्दर्भ ग्रंथ के सृजन का दायित्व दिया गया था। प्रो. जैन ने अपने सुदीर्घ अनुभव के आधार पर निर्धारित समयावधि में इस कृति का सृजन कर इसकी डिजिटल प्रति तैयार कर दी। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>अयोध्या।</strong> भारत सरकार &#8211; शिक्षा मंत्रालय द्वारा देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर में भारतीय ज्ञान परम्परा जैन गणित केन्द्र (IKS Centre in Jaina Mathematics) की स्थापना कर प्रसिद्ध जैन गणितज्ञ प्रो. अनुपम जैन को केन्द्र के मुख्य अन्वेषक के रूप में जैन गणित पर एक सन्दर्भ ग्रंथ के सृजन का दायित्व दिया गया था। प्रो. जैन ने अपने सुदीर्घ अनुभव के आधार पर निर्धारित समयावधि में इस कृति का सृजन कर इसकी डिजिटल प्रति तैयार कर दी । श्रुत पंचमी के पावन पर्व पर 31.05.25 को जैन गणित की उद्भव भूमि अयोध्या में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी ससंघ के पावन सान्निध्य में जिनवाणी – सरस्वती के पुनीत चरणों में इसकी प्रति समर्पित की। पश्चात् इसकी एक प्रति गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी के कर कमलों में भी समर्पित की। इस अवसर पर विशेष रूप से उपस्थित देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर के कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई ने ग्रंथ की प्रति औपचारिक रूप से भारत सरकार के भारतीय ज्ञान परम्परा प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय समन्वयक प्रो. जी. एस. मूर्ति को समर्पित की।</p>
<p>प्रो. मूर्ति ने ग्रंथ स्वीकार करते हुए कहा कि 2-3 वर्ष पूर्व हमने पूरे देश में 22 केन्द्रों की स्थापना की थी उसमें से गणित का मात्र एक केन्द्र था एवं मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता है कि देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर में स्थापित इस जैन गणित केन्द्र ने सर्वश्रेष्ठ कार्य किया है। फलतः हमने भी यह केन्द्र आगामी 2 वर्ष (2027) तक बढ़ा दिया है। जैन गणित भारतीय गणित की एक प्रमुख शाखा है एवं हम आश्वस्त है कि प्रो. जैन के नेतृत्व में यह केन्द्र अच्छी उपलब्धियाँ अर्जित करता रहेगा।</p>
<p>आज समर्पित किया गया यह ग्रंथ अत्यंत विशाल एवं महत्त्वपूर्ण है। हम कतिपय विधिक औपचारिकताओं की पूर्ति के उपरान्त इसे IKS Div. की ओर से E-Book के रूप में प्रकाशित करेंगे तथा प्रयास करेंगे कि इसका लोकार्पण माननीय शिक्षा मंत्री- भारत सरकार के कर कमलों से निकट भविष्य में भव्य शिक्षा समागम में नई दिल्ली में किया जाये।</p>
<p>विश्वविद्यालय के माननीय कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई जी ने कहा कि अनुपम जी ने इस ग्रंथ का सृजन कर जैन साहित्य ही नहीं भारतीय गणित की भी अनुपम सेवा की है। इस कार्य हेतु उनका भी सम्मान किया जाना चाहिए क्योंकि यह अनुपम कार्य उन्होंने किया है।</p>
<p>विश्वविद्यालय इस केन्द्र के सतत् निर्बाध संचालन में पूर्ववत् पूर्ण सहयोग प्रदान करता रहेगा ।</p>
<p>डॉ. अनुपम जैन ने अपने उद्बोधन में कहा कि गुरुजनों के आशीर्वाद एवं मित्रों की शुभकामनाओं से 45 वर्ष पूर्व मन में लिए एक संकल्प की पूर्ति हो रही है ।</p>
<p>पूज्य ज्ञानमती माताजी ने अपने आशीर्वाद में कहा कि यह जैन गणित की उद्भव भूमि है क्योंकि यहीं पर भगवान ऋषभदेव ने अपनी पुत्री सुन्दरी को अंक विद्या की शिक्षा दी थी । अतः यह गणित की</p>
<p>उद्भव भूमि है। मेरे शिष्य अनुपम ने जैन गणित पर यह विशाल 712 पृष्ठीय ग्रंथ लिखकर जैन साहित्य की महती सेवा की है उसे मेरा बहुत &#8211; बहुत आशीर्वाद है।</p>
<p>वह तो मेरे पास बाल्यकाल से है। उसने ग्रंथ लिख दिया अब पढ़ना आप सबको है । हम भी पढ़ेगे । मैंने चन्दनामती माता जी को कह दिया है कि इसका सारांश पढ़ पढ़ कर बताती रहे । कथंचित हम तो चिन्तन करेंगे।</p>
<p>प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चन्दनामती जी ने कहा कि विद्वत् महासंघ के यशस्वी अध्यक्ष डॉ. अनुपम जैन के जैन गणित ग्रंथ को देखकर अच्छा लगा। 712 पृष्ठों के इस ग्रंथ को 2 वर्ष में प्रस्तुत किया गया है किन्तु इसकी साम्रगी के संकलन में 40-45 वर्ष लगे । अनुपम जी अपने विद्यार्थी जीवन 1981 से ही इस काम में लगे हुए है वे पूज्य माताजी को अपना धर्मगुरु मानते है । अतः आज इस कृति को जैन गणित की उद्गम भूमि में सरस्वती स्वरूपा में ज्ञानमती को समर्पित करने आये है, उनको एवं निशा जी को मेरा आशीर्वाद ।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-82750" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/04.jpg" alt="" width="1145" height="754" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/04.jpg 1145w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/04-300x198.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/04-1024x674.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/04-768x506.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/04-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/04-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/04-990x652.jpg 990w" sizes="(max-width: 1145px) 100vw, 1145px" />डॉ. अनुपम जैन के परिवार की ओर से श्री अनुज जैन ने माननीय कुलपति जी, प्रो. मूर्ति एवं समागत समस्त विद्वानों का आभार माना। कार्यक्रम में Emory University, Atlanta (U. S.A.) की जैनोलोजी की प्रोफेसर Ellen Gough विशेष रूप से उपस्थित थी। पूज्य माताजी एवं संघ की वन्दना के साथ सभा विसर्जित की गई।</p>
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		<title>गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ पावन सान्निध्य में आयोजन : महावीराचार्य पुरस्कार – 2025 प्रो. आर. एस. शाह (पुणे) को     </title>
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		<pubDate>Wed, 11 Jun 2025 05:37:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर द्वारा प्रो. अनुपम जैन, इन्दौर की पहल पर 2021 में स्थापित महावीराचार्य पुरस्कार – 2025 पूना के प्रो. आर. एस. शाह को जैन गणित के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट अनुसंधान कार्य हेतु श्रुतपंचमी के पावन अवसर पर, पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ पावन सान्निध्य में, 31 मई [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर द्वारा प्रो. अनुपम जैन, इन्दौर की पहल पर 2021 में स्थापित महावीराचार्य पुरस्कार – 2025 पूना के प्रो. आर. एस. शाह को जैन गणित के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट अनुसंधान कार्य हेतु श्रुतपंचमी के पावन अवसर पर, पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ पावन सान्निध्य में, 31 मई 2025 को अयोध्याजी में समर्पित किया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या।</strong> दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर द्वारा प्रो. अनुपम जैन, इन्दौर की पहल पर 2021 में स्थापित महावीराचार्य पुरस्कार – 2025 पूना के प्रो. आर. एस. शाह को जैन गणित के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट अनुसंधान कार्य हेतु श्रुतपंचमी के पावन अवसर पर, पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ पावन सान्निध्य में, 31 मई 2025 को अयोध्याजी में समर्पित किया गया।</p>
<p>इस पुरस्कार के अंतर्गत ₹51,000 की सम्मान राशि, शाल, श्रीफल एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया। ज्ञातव्य है कि पूर्व में यह पुरस्कार निम्नलिखित विद्वानों को प्रदान किया जा चुका है:</p>
<p>2021: प्रो. आर. सी. गुप्त, झांसी – जैन गणित के क्षेत्र में मौलिक अनुसंधान हेतु</p>
<p>2022: प्रो. एस. सी. अग्रवाल, मेरठ – जैन गणित शोध के प्रोत्साहन हेतु</p>
<p>2023: प्रो. एस. के. बंडी, इंदौर – जैन ज्योतिर्विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक अनुसंधान हेतु</p>
<p>2024: प्रो. पद्मावथम्मा, मैसूर – गणितसार संग्रह के कन्नड़ अनुवाद हेतु</p>
<p>कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. सविता जैन, शीतल तीर्थ–रतलाम द्वारा मंगलाचरण से हुई। स्वागत भाषण संस्थान के मंत्री श्री मनोज जैन (मेरठ) ने दिया। निर्णायक मंडल के विद्वान सदस्य प्रो. एस. सी. अग्रवाल (मेरठ) ने 2025 का पुरस्कार प्रो. आर. एस. शाह को प्रदान किए जाने की घोषणा की। इसके पश्चात डॉ. अनुपम जैन ने पूर्व वर्षों के पुरस्कार विजेताओं के कार्यों पर प्रकाश डाला।</p>
<p>घोषणा के पश्चात माननीय कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई (इंदौर), प्रो. जी. एस. मूर्ति (दिल्ली), प्रो. अभय कुमार जैन (लखनऊ), प्रो. विपिन जैन (मुरादाबाद), प्रो. अनुपम जैन तथा प्रायोजक परिवार द्वारा, पीठाधीश्वर श्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी के नेतृत्व में, प्रो. शाह को शाल, श्रीफल, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान राशि भेंट कर सम्मानित किया गया।</p>
<p>प्रो. आर. एस. शाह का उद्बोधन:</p>
<p>अपने कृतज्ञता-भरे वक्तव्य में प्रो. शाह ने कहा:</p>
<p>&#8220;मेरी पहली मुलाकात डॉ. अनुपम जैन से 2009 में हुई थी। उन्होंने मुझे षट्खंडागम एवं कर्मसिद्धांत के गणितीय अध्ययन की प्रेरणा दी तथा ₹2 लाख की फैलोशिप भी दिलाई। मेरा अध्ययन आज भी प्रारंभिक स्तर पर है – मैंने अब तक केवल 1% कार्य ही किया है। जब मैंने इन 39 ग्रंथों के गणितीय अंशों का अध्ययन पूर्ण किया और पंचांग देखा, तो आश्चर्यजनक रूप से उस दिन भी श्रुतपंचमी ही थी – और आज भी वही दिन है।</p>
<p>मेरे पास षट्खंडागम के 5 खंडों पर धवला टीका (16), कषायप्रभृत पर जयधवला टीका (16), एवं महाबंध पर (07) टीकाएं – कुल 39 ग्रंथों के विस्तृत नोट्स सुरक्षित हैं, जिनका उपयोग शोध हेतु किया जा सकता है।</p>
<p>षट्खंडागम में &#8216;भंग समुत्कीर्तन&#8217; नाम से संयोजन गणित (Combinatorics) का गहन विवेचन है। अक्षरों की संख्या 264 -1 की गणना भी आगमिक सूत्रों से की गई है।</p>
<p>मैं डॉ. अनुपम जैन एवं संस्थान का आभार प्रकट करता हूँ और विश्वास दिलाता हूँ कि जब तक जीवन है, जैन गणित का अध्ययन करता रहूँगा। मेरा अनुरोध है कि डॉ. अनुपम जी युवाओं को प्रोत्साहित करते रहें और उन्हें स्कॉलरशिप प्रदान करें, जिससे यह परंपरा आगे बढ़ सके।&#8221;</p>
<p><strong>गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का संदेश:</strong></p>
<p>&#8220;प्रो. शाह का वक्तव्य सुनकर अत्यंत प्रसन्नता हुई। वे 88 वर्ष की आयु में भी युवा ऊर्जा से भरपूर हैं। उन्होंने कर्मसिद्धांत का विशेष अध्ययन किया है। श्रावकों द्वारा षट्खंडागम का अध्ययन निषिद्ध नहीं है, बशर्ते वह विनयपूर्वक किया जाए।</p>
<p>अयोध्या की यह भूमि गणित सहित समस्त विद्याओं की जननी है। यहीं भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ, और यही भगवान भरत जी की भी जन्मभूमि है।&#8221;</p>
<p><strong>अन्य वक्तव्य एवं बधाइयाँ:</strong></p>
<p>आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी: &#8220;गणित का स्थान जीवन में सर्वोपरि है। डॉ. अनुपम जैन ने स्वयं अथक परिश्रम किया है एवं अन्य शोधार्थियों को भी प्रेरित किया है। उन्होंने 15–20 शोधार्थियों को जैन गणित पर पीएच.डी. कराई है।&#8221;</p>
<p>मुख्य अतिथि प्रो. जी. एस. मूर्ति: &#8220;भारतीय ज्ञान परंपरा में वैदिक एवं श्रमण दोनों परंपराओं का समन्वय है। महावीराचार्य जैसे विद्वानों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।&#8221;</p>
<p>कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई: &#8220;डॉ. अनुपम जैन द्वारा स्थापित यह पुरस्कार प्रेरणादायक है, परंतु उन्हें सम्मानित करने की भी आवश्यकता है।&#8221;</p>
<p>विशेष अतिथि प्रो. अभय कुमार जैन: &#8220;हमें केवल विचारक नहीं, प्रचारक चाहिए। डॉ. जैन का कार्य अत्यंत सराहनीय है।&#8221; कार्यक्रम का समापन अनुज जैन के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।</p>
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