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	<title>Friendship &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मित्रता: जीवन-नौका की सबसे विश्वसनीय पतवार : जो टोकता है, रोकता है, वही सच्चा मित्र कहलाता है </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Jul 2026 12:57:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मित्रता केवल सामाजिक संबंध नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। सच्चा मित्र वही है जो विपरीत परिस्थितियों में साथ खड़ा रहे, गलत राह पर जाने से रोके और आत्मविकास की प्रेरणा दे। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह विशेष प्रस्तुति। मुरैना। मनुष्य का जीवन अनेक उतार-चढ़ावों से भरी एक लंबी यात्रा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मित्रता केवल सामाजिक संबंध नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। सच्चा मित्र वही है जो विपरीत परिस्थितियों में साथ खड़ा रहे, गलत राह पर जाने से रोके और आत्मविकास की प्रेरणा दे। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह विशेष प्रस्तुति।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> मनुष्य का जीवन अनेक उतार-चढ़ावों से भरी एक लंबी यात्रा है। इस यात्रा में यदि कोई सबसे विश्वसनीय सहयात्री है, तो वह सच्चा मित्र है। मित्र केवल साथ चलने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन के कठिन क्षणों में मार्गदर्शक, प्रेरक और शुभचिंतक होता है। उसकी उपस्थिति संघर्षों को सरल और सफलता को सार्थक बना देती है।</p>
<p><strong>मित्रता का वास्तविक अर्थ</strong></p>
<p>सच्ची मित्रता न तो स्वार्थ पर आधारित होती है और न ही किसी लाभ-हानि के गणित पर। यह विश्वास, समर्पण और आत्मीयता का ऐसा संबंध है, जिसमें एक-दूसरे की खुशियों के साथ-साथ कमियों की भी चिंता की जाती है। जो मित्र गलत दिशा में जाने से रोकता है, वही वास्तविक हितैषी होता है।</p>
<p><strong>संगति से बनता है व्यक्तित्व</strong></p>
<p>मनुष्य का चरित्र, व्यवहार और भविष्य उसकी संगति से प्रभावित होता है। श्रेष्ठ मित्र अच्छे विचार, संयम और संस्कारों की ओर प्रेरित करते हैं, जबकि कुसंगति जीवन को पतन की ओर ले जाती है। इसलिए मित्रों का चयन सदैव विवेक और मूल्यों के आधार पर होना चाहिए।</p>
<p><strong>साहित्य और संतों ने भी बताया मित्रता का महत्व</strong></p>
<p>भारतीय साहित्य में मित्रता को सर्वोच्च मानवीय संबंधों में स्थान दिया गया है। महाकवि भर्तृहरि, गोस्वामी तुलसीदास, संत कबीर, रहीम और महाकवि कालिदास ने सच्चे मित्र को संकट में साथ निभाने वाला, हितकारी परामर्श देने वाला और विश्वास का प्रतीक बताया है।</p>
<p>आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने भी स्पष्ट किया कि सच्चा मित्र वही है, जो हमारी कमियों का साहसपूर्वक बोध कराए, बुराइयों से बचाए और संयम तथा आत्मकल्याण की दिशा में प्रेरित करे।</p>
<p><strong>मित्रता का संदेश</strong></p>
<p>मित्रता जीवन का ऐसा अमूल्य उपहार है, जो निराशा में आशा, अंधकार में प्रकाश और संघर्ष में संबल प्रदान करता है। सच्चे मित्र का साथ मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारता है और उसे जीवन की ऊँचाइयों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।</p>
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		<title>आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी संसघ का चातुर्मास दिल्ली में संभव: 2026 के पावन वर्षायोग के लिए दिल्ली के दिगंबर समाज के श्रेष्ठीजन कर रहे थे प्रयास  </title>
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		<pubDate>Tue, 05 May 2026 11:58:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी ससंघ’ का 2026 का पावन वर्षायोग इस वर्ष राजधानी दिल्ली’ में होने जा रहा है। इस ऐतिहासिक समाचार से पूरे भारतवर्ष के जैन समाज में हर्ष है। विगत कई वर्षों से दिल्ली नगर समाज शहर में वर्षायोग के लिए प्रयासरत थे। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। आचार्य श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी ससंघ’ का 2026 का पावन वर्षायोग इस वर्ष राजधानी दिल्ली’ में होने जा रहा है। इस ऐतिहासिक समाचार से पूरे भारतवर्ष के जैन समाज में हर्ष है। विगत कई वर्षों से दिल्ली नगर समाज शहर में वर्षायोग के लिए प्रयासरत थे। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी ससंघ’ का 2026 का पावन वर्षायोग इस वर्ष राजधानी दिल्ली’ में होने जा रहा है। इस ऐतिहासिक समाचार से पूरे भारतवर्ष के जैन समाज में हर्ष है। विगत कई वर्षों से दिल्ली नगर समाज शहर में वर्षायोग के लिए प्रयासरत थे। जैसे ही संकेत प्राप्त हुए कि इस वर्ष का चातुर्मास का परम सौभाग्य दिल्ली नगर की जैन समाज को प्राप्त होने जा रहा है। समाज में उल्लास का वातावरण है। राजेश जैन दद्दू ने कहा कि जैन श्रमण परंपरा में चातुर्मास’ का विशेष महत्व है। वर्षाकाल के चार महीनों में आचार्यश्री एक स्थान पर विराजकर धर्म-ध्यान, स्वाध्याय, तप एवं प्रवचनों के माध्यम से समाज को सत्य, अहिंसा, मैत्री एवं ‘जियो और जीने दो’ का संदेश देते हैं। आचार्यश्री के सान्निध्य में पर्यूषण महापर्व में हजारों श्रावक-श्राविकाएं शिविर के माध्यम से आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। गुरु भक्त डॉ. जैनेंद्र जैन ने कहा कि दिल्ली समाज में भारी उत्साह है। राजधानी दिल्ली में 21वीं सदी के श्रमण संस्कृति के पट्टाचार्य श्री का चातुर्मास होना गौरव का विषय है। समाजजनों ने चातुर्मास की भव्य तैयारियां प्रारंभ कर दी हैं। विभिन्न समितियों का गठन कर व्यवस्था, आवास, आहार, विहार प्रवचन एवं धार्मिक आयोजनों की रूपरेखा बनाई जा रही है।</p>
<p><strong>आचार्यश्री का परिचय</strong></p>
<p>आचार्य श्री विरागसागर महाराज के सुशिष्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज युवाओं के प्रेरणास्रोत’ एवं आगमानुसार आचरण करने वाले श्रमण संस्कृति आध्यात्मिक गुरु के रूप में पद प्रतिष्ठित हैं। उनका प्रमुख संदेश ’नमोस्तु शासन जयवंत हो’ जन-जन तक पहुंच रहा है। 31 मार्च 2007 को औरंगाबाद में महावीर जयंती के पावन अवसर पर उन्हें आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया था। अभी तक लगभग दो लाख किमी तक का पदविहार कर चुके हैं। वर्तमान समय में आचार्य श्री द्वारा प्रणीत ग्रंथों को सबसे ज्यादा पढ़ा जा रहा है। आचार्यश्री द्वारा की जा रही धर्म प्रभावना से समाज में नैतिक मूल्यों, संस्कारों एवं अध्यात्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हो रहा है। दिल्ली चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन प्रातः जिनेंद्र अभिषेक, नित्य नियम पुजन शांतिधारा, आचार्यश्री के मंगल प्रवचन एवं तत्वचर्चा के कार्यक्रम होंगे। दिल्ली की सकल दिगंबर जैन समाज ने आचार्यश्री के चातुर्मास के संकेत को सहर्ष स्वीकार करते हुए पुण्यार्जन का लाभ लेने का संकल्प लिया है। इस वर्ष के वर्षायोग में देशभर से श्रद्धालुओं के दिल्ली पहुंचने की संभावना है।</p>
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		<title>मित्रता में समता भाव आता हैः चिंतामणि रत्न समान मानव पर्याय का प्रतिक्षण अनमोल है-मुनि संयत सागरजी  </title>
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		<pubDate>Thu, 06 Mar 2025 06:55:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मानव जीवन दुर्लभ चिंता मणि रत्न के समान है। बड़े भाग्य से नर तन पाया मनुष्य कुल पर्याय मिली। श्री जिनवर के दर्शन करने जिनवाणी की राह मिली। मानव जीवन का प्रत्येक क्षण अनमोल है। सदैव सकारात्मक रहते हुए निर्मल परिणामों को बनाए रखे। संसार के प्राणी मात्र से मैत्री भाव बनाए रखे। उक्त उदगार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मानव जीवन दुर्लभ चिंता मणि रत्न के समान है। बड़े भाग्य से नर तन पाया मनुष्य कुल पर्याय मिली। श्री जिनवर के दर्शन करने जिनवाणी की राह मिली। मानव जीवन का प्रत्येक क्षण अनमोल है। सदैव सकारात्मक रहते हुए निर्मल परिणामों को बनाए रखे। संसार के प्राणी मात्र से मैत्री भाव बनाए रखे। उक्त उदगार मुनिश्री संयत सागरजी ने आर के पुरम, त्रिकाल चौबीसी, जैन मंदिर में विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुवे व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कोटा़ से पारस जैन, पार्श्वमणि की पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोटा (राज)</strong> मुनिश्री संयत सागरजी ने आर के पुरम, त्रिकाल चौबीसी, जैन मंदिर में विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुवे कहा-‘मानव जीवन का प्रत्येक क्षण अनमोल है। सदैव सकारात्मक रहते हुए निर्मल परिणामों को बनाए रखे। संसार के प्राणी मात्र से मैत्री भाव बनाए रखे।‘ मंदिर समिति के अध्यक्ष अंकित जैन महामंत्री अनुज गोधा कोषाध्यक्ष ज्ञानचंद जैन ने बताया कि धर्मसभा में मंगल दीप प्रज्वलन जे के जैन, मनोज जयसवाल, लोकेश जैन, प्रकाश जैन, पदम जैन, सागरचंद जैन ने किया।</p>
<p><strong>भजन सुनाकर भाव-विभोर किया</strong></p>
<p>धर्म सभा में मंगलाचरण पाठ पारस जैन ने मुनि आए नगरी हमारे पावन हो गई ये धरा रे स्वरचित भजन अपनी सुमधुर आवाज में सुनाकर कर श्रद्धालुओं को भाव विभोर हो झूमने को मजबूर कर दिया। कार्याध्यक्ष प्रकाश जैन ने बताया कि धर्म सभा का संचालन पंडित रविन्द्र शास्त्री ने कर चार चांद लगा दिए।</p>
<p><strong>संसार में सदैव समीचिन मित्रता रखें </strong></p>
<p>मुनिश्री ने आगे कहा कि जीवन में बंधु बहुत बनाएं परंतु ऐसा बंधु बनाओ जिससे संसार बंधन से मुक्ति मिल जाए। संसार परिभ्रमण का मुख्य कारण राग, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, माया के बंधन ही है। संसार में सदैव समीचिन मित्रता रखें। मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे दिन दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्तोत्र बहे। ये भावना सदैव अंतर्मन में रखनी चाहिए। आगे मुनिश्री ने अपने विचार व्यक्त करते हुवे कहा कि वर्तमान समय में जितने भी आपके मित्र बंधु है एक दिन सभी शत्रु हो जाएंगे क्योंकि मानव जीवन में इच्छाएं व आकांक्षाएं अनंत है वो कभी पूरी नहीं हो सकती।</p>
<p><strong>मित्रता में समता भाव आता है</strong></p>
<p>जीवन में समीचिन मित्रता में समता भाव आ जाता है। जीवन में संत के सानिध्य से मानव भले हो संत न बने परन्तु संतोषी तो बन ही जाता है। कहा भी गया है जब आए संतोष धन सब धन धुरी समान। संसार का जितना भी वैभव, संपति, धन, दौलत, सोना, चांदी सब धूल के समान दिखाई देने लग जाते है। जब संतोष रूपी धन अंतर्मन में समाता है।</p>
<p><strong>मुनिश्री आर के पुरम आए</strong></p>
<p>मंदिर समिति के अध्यक्ष अंकित जैन ने बताया कि आचार्य 108 विशुद्ध सागरजी महाराज के शिष्य मुनिवर 108 संयत सागरजी ससंघ का दोपहर 2.30 बजे रिद्धि-सिद्धि नगर के लिए मंगल विहार हो गया। मुनिश्री ससंघ रावतभाटा से मंगल पद विहार करते हुवे आर के पुरम जैन मंदिर आए।</p>
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