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	<title>First Tirthankar श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>First Tirthankar श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<item>
		<title>प्रजा के कार्यानुसार दी वर्ण व्यवस्था : भगवान आदिनाथ ने ही दिए थे जीविकोपार्जन के सिद्धांत </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Apr 2024 01:30:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरुषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओं के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया। भगवान आदिनाथ की जयंती पर पढ़िए अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज का यह विशेष आलेख&#8230; जैन धर्म की परम्परा में वर्तमान काल में भगवान आदिनाथ प्रथम तीर्थंकर हैं। भगवान आदिनाथ [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरुषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओं के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया। <span style="color: #ff0000">भगवान आदिनाथ की जयंती पर पढ़िए अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज का यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म की परम्परा में वर्तमान काल में भगवान आदिनाथ प्रथम तीर्थंकर हैं। भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरुषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओं के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया। अब तक अनंत तीर्थंकर हो चुके हैं। एक काल में 24 तीर्थंकर ही होते हैं। इस काल के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान हैं। काल दो प्रकार के होते हैं। एक उत्सर्पिणी और दूसरा अवसर्पिणी। जो काल उत्थान से पतन की और जाता है वह अवसर्पिणी काल है। जो पतन से उत्थान की और जाए वह उत्सर्पिणी काल है, तो मौजूदा काल अवसर्पिणी काल है और इस काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ हुए हैं।</p>
<p><strong>भोगभूमि से कर्मभूमि तक</strong></p>
<p>भगवान आदिनाथ के जन्म से पहले तक भोगभूमि की व्यवस्था थी। जब उन्होंने जगत को पुरुषार्थ का ज्ञान दिया तब से कर्मभूमि की व्यवस्था शुरू हुई। भोगभूमि में पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं होती। उनमें सब कुछ कल्पवृक्ष से मिलता है। लेकिन कर्मभूमि में मनुष्य को पुरुषार्थ कर जीविकोपार्जन के साधन स्वयं जुटाने पड़ते हैं। यह कैसे करना है, जीवन जीने के तरीके क्या होने चाहिए और समाज में रहने हुनर क्या है, यह सब भगवान आदिनाथ ने बताया। उन्होंने परिवार को बढ़ाने के लिए विवाह पद्धति का वर्णन किया।</p>
<p><strong>दी थी वर्ण व्यवस्था</strong></p>
<p>भगवान आदिनाथ ने सामाजिक व्यवस्था के संचालन के लिए नगर, गांव, मकान आदि बनाने और उन्हें बसाने का उपदेश दिया था। इसी के साथ उन्होंने वर्ण व्यवस्था का उपदेश भी दिया। उन्होंने वर्ण व्यवस्था की स्थापना प्रजा के कार्य के अनुसार की थी। जो लोग विपत्ति के समय मनुष्यों की रक्षा करने के नियुक्त किए गए थे, वे क्षत्रिय कहलाए। वाणिज्य, खेती, गोरक्षा आदि के व्यापार में जो लगे थे वे वैश्य कहलाए। जो निम्नस्तर का कार्य करते थे तथा धार्मिक शास्त्रों से दूर भागते थे, वे शूद्र कहलाए। इसके बाद भरत चक्रवर्ती ने पूजा, पाठ करने वाले और यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने वाले ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की। इस प्रकार से जैन धर्म में चार वर्ण की स्थापना उल्लेख मिलता है। संस्कारों के बीजरूप का शंखनाद करते हुए आदिनाथ भगवान ने अपने पुत्र को अपने हाथों से जनेऊ संस्कार किया। जनेऊ संस्कार का मतलब होता था कि अब यह मद्य, मांस, मधु, बड़, पीपल, कटुम्बर, अंजीर, गूलर आदि का सेव नहीं करेगा। जनेऊ पहनने वाला ही जिनेन्द्र की पूजा, अभिषेक कर सकता है क्यों कि वह अष्टमूलगुणों का पालन करने वाला है।</p>
<p><strong>बताया आजीविका का साधन</strong></p>
<p>भगवान आदिनाथ ने असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प, विद्या जैसे छह कर्मों को आजीविका का साधन बताया। इस व्यवस्था का उद्देश्य था कि इससे दूसरों के जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन हो। मनुष्य एक-दूसरे के जीवनयापन में सहयोगी बन कर सामाजिक व्यवस्थाओं में सहयोगी बनें। अजीविका का अर्जन करते समय भी धर्म के प्रति श्रद्धा बनी रहे, इसके लिए छह आवश्यक कर्म देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, त्याग(दान) बताए, ताकि इनके माध्यम से मनुष्य धर्म ध्यान कर पुण्य का संचय कर सकें और जीवन में जो अशुभ कर्म का बन्ध किया है, उनका नाश कर सके।</p>
<p>समाज में स्त्रीशिक्षा के महत्व को स्थापित करने के लिए भगवान आदिनाथ ने अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि लिखने का एवं सुन्दरी को इकाई, दहाई आदि अंक विद्या सिखाई। इसी प्रकार भगवान ने अपने भरत, बाहुबली आदि सभी पुत्रों को सभी विद्याओं का अध्ययन कराया था। इसी तरह जीवन में कलाओं के महत्व को स्थापित करने के लिए भगवान आदिनाथ ने 72 कलाओं का उपदेश भी दिया है। तो इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य को भोगभूमि से कर्मभूमि में लाकर भगवान आदिनाथ ने पुरुषार्थ का उपदेश दिया और उस व्यवस्था का निर्माण किया जो आज तक चली आ रही है तथा जीविकोपार्जन के मूल सिद्धांतों में शामिल है।</p>
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		<item>
		<title>परखिए खुद को, कितना जानते हैं भगवान को :  इन सवालों के जवाब से जानिए भगवान आदिनाथ को </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/get_to_know_lord_adinath_by_answering_these_questions/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Apr 2024 00:30:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[भगवान आदिनाथ के जन्मकल्याणक पर पाठकों के लिए यह प्रस्तुति तुष्टि कीर्तेश जैन,घाटोल की ओर से 1. भगवान आदिनाथ के कुछ प्रचलित नाम बताइये। (1) श्री आदिनाथ जी, (2) श्री ऋषभनाथ जी, (3) श्री वृषभनाथ जी, (4) श्री पुरूदेव जी, (5) श्री आदि ब्रह्मा, (6) प्रजापति 2. भगवान आदिनाथ के नाम की सार्थकता क्या है? [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p>भगवान आदिनाथ के जन्मकल्याणक पर पाठकों के लिए यह प्रस्तुति तुष्टि कीर्तेश जैन,घाटोल की ओर से</p>
<hr />
<p><strong>1. भगवान आदिनाथ के कुछ प्रचलित नाम बताइये।</strong><br />
(1) श्री आदिनाथ जी, (2) श्री ऋषभनाथ जी, (3) श्री वृषभनाथ जी, (4) श्री पुरूदेव जी, (5) श्री आदि ब्रह्मा, (6) प्रजापति</p>
<p><strong>2. भगवान आदिनाथ के नाम की सार्थकता क्या है?</strong><br />
तीर्थंकरों में प्रथम होने से उन्हें आदिनाथ कहा जाता है</p>
<p><strong>3. भगवान श्री आदिनाथ का जन्म कब हुआ था?</strong><br />
भगवान श्री आदिनाथ का जन्म तृतीय काल में हुआ था।</p>
<p><strong>4. भगवान श्री आदिनाथ के पंच कल्याणकों की तिथियां क्या है?</strong><br />
गर्भ कल्याणक- आषाढ़ कृष्णा द्वितीया<br />
जन्म कल्याणक- चैत्र कृष्णा नवमी को<br />
तप कल्याणक- चैत्र कृष्णा नवमी।<br />
ज्ञान कल्याण- फाल्गुनी कृष्णा एकादशी को।<br />
मोक्ष कल्याणक- माघ कृष्णा-चैदस।</p>
<p><strong>5. भगवान श्री आदिनाथ की आयु कितनी थी?</strong><br />
चैरासी लाख वर्ष पूर्व।</p>
<p><strong>6. भगवान आदिनाथ जन्म से कितने ज्ञान के धारक थे?</strong><br />
मति, श्रुत, अवधि तीन ज्ञान के धारक थे।</p>
<p><strong>7. भगवान श्री आदिनाथ के शरीर की ऊंचाई कितनी थी?</strong><br />
भगवान श्री आदिनाथ के शरीर की ऊंचाई पांच सौ धनुष (दो हजार हाथ थी)।</p>
<p><strong>8. भगवान श्री आदिनाथ के शरीर का रंग बताइये?</strong><br />
तपाये हुए स्वर्ण के समान।</p>
<p><strong>9. भगवान श्री आदिनाथ की प्रतिमा का चिह्न क्या है?</strong><br />
वृषभ (बैल)।</p>
<p><strong>10. भगवान श्री आदिनाथ ने अपने पुत्रियों का क्या शिक्षा दी?</strong><br />
बा्रह्मी को स्वर ओर व्यंजन तथा सुंदरी को अंकों की शिक्षा दी।</p>
<p><strong>11. भगवान श्री आदिनाथ ने अपने पुत्रों को कौन-सी शिक्षा दी?</strong><br />
अर्थशास्त्र, नृत्यशास्त्र, चित्रकला,वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, आयुर्वेद, तन्त्र परीक्षा, रत्नपरीक्षा आदि अनेक शास्त्रों को पढ़ाया।</p>
<p><strong>12. भगवान श्री आदिनाथ ने अपनी प्रजा को कौन-सी शिक्षा दी?</strong><br />
भगवान श्री आदिनाथ ने प्रजा को षट्कर्म का उपदेश दिया-<br />
1. असि- तलवार शास्त्र आदि धारण करना समाज की रक्षा करना असि कर्म कहलाता है।<br />
2. मसि- लिखकर आजीविका करना मसि कर्म कहलाता है।<br />
3. कृषि- खेती कर अन्न उपजाना कृषि कार्य है<br />
4. वाणिज्य- वस्तुओं का व्यापार करना वाणिज्य है।<br />
5. शिल्प- कलात्मक वस्तुओं का निर्माण करना शिल्प है।<br />
6. विद्या- किसी भी विषय का ज्ञनार्जन करना विद्या है।</p>
<p><strong>13. भगवान श्री आदिनाथ ने दीक्षा किस प्रकार ली?</strong><br />
भगवान पूर्व दिशा की ओर मुख करके पद्मासन से विराजमान हुए और ऊँ नामः सिद्धेभयः कहकर पंच परमेष्ठियों को नमस्कार करके पंच मुष्ठी केश लोच किया तथा दिगम्बरी दीक्षा धारण की।</p>
<p><strong>14. दीक्षा के उपरांत कौन-सा ज्ञान प्रकट हुआ?</strong><br />
दीक्षा अन्र्तमहूर्त बाद ही भगवान को मन पर्याय नाम का चैथा ज्ञान प्रकट हुआ।</p>
<p><strong>15. भगवान श्री आदिनाथ का आहार कितने समय बाद और कहां हुआ था?</strong><br />
1 वर्ष 39 दिन बाद हस्तिनापुर नगर में।</p>
<p><strong>16. भगवान श्री आदिनाथ को आहार किसने दिया था?</strong><br />
हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस व भाई सोम-प्रभ ने।</p>
<p><strong>17. भगवान श्री आदिनाथ को आहार पहले क्यों नहीं मिला?</strong><br />
क्योंकि भगवान श्री आदिनाथ के पहले मुनि नहीं होते थे एवं आहार दान के लिए आवश्यक नवधा भक्ति करना कोई नहीं जानता था।</p>
<p><strong>18. भगवान श्री आदिनाथ के समवशरण में ऋषि-मनियों की संख्या बताइए?</strong><br />
चैरासी हजार।</p>
<p><strong>19. भगवान श्री आदिनाथ के समवसरण की प्रमुख आर्यिका कौन थीं?</strong><br />
उत्तर- आर्यिका श्री ब्राह्मी, आर्यिका श्री सुन्दरी।</p>
<p><strong>20. भगवान श्री आदिनाथ की शासन देवी और शासन देव का नाम बताइए?</strong><br />
श्री चक्रेश्वरी देवी और श्री गोमुख यक्ष</p>
<p><strong>21. भगवान श्री आदिनाथ के चैरासी गणधरों के नाम बताइए?</strong><br />
(1) श्री वृषभसेन, (2) श्री कुंभ, (3) श्री हणरथ, (4) श्री शतधनु, (5) श्री देवशर्मा, (6) श्री देवभाव (7) श्री नंदन (8) श्री सोमदत्त, (9) श्री सुरदत्त (10) श्री वायु शर्मा (11) श्री यशोबाहु, (12) श्री देवाग्नि, (13) श्री अग्निदेव, (14) श्री अग्नि गुप्त, (15) श्री मित्रग्नि, (16) श्री हलभृत, (17) श्री महीधर (18) श्री महेन्द्र (19) श्री बसुदेव (20) श्री बसुंधरू (21) श्री अचल (22) श्री मेरू (23) श्री मेरूधन (24) श्री मेरूभूति (24) श्री सर्वयश, (26) श्री सर्वयज्ञ (27) श्री सर्वगुप्त (28) श्री सर्वप्रिय (29) श्री सर्वदेव (30) श्री सर्व विजय (31) श्री विजयगुप्त (32) श्री विजय मित्र (33) श्री विजयिल (34) श्री अपराजित, (35) श्री वसुमित्र (36) श्री विश्वसेन (37) श्री साधु सेन (38) श्री सत्यदेव (39) श्री देवसत्य (40) श्री सत्यगुप्त (41) श्री सत्यमित्र (42) श्री निर्मल (43) श्री विनीत (44) श्री संवर (45) श्री मुनिगुप्त (46) श्री मुनिदत्त (47) श्री मुनियज्ञ (48) श्री मुनिदेव (49) श्री मुनिमित्र (50) श्री मित्रयज्ञ (51) श्री स्वयंभू (52) श्री भगदेव (53) श्री भगदत्त (54) श्री भगफल्गू (55) श्री गुप्तफल्गू (57) श्री मित्र फल्गू (58) श्री प्रजापति (58) श्री सर्वसंघ (59) श्री वरूण (60) श्री धनपालक (61) श्री मद्यवान (62) श्री तेजा राशि (63) श्री महावरी (64) श्री महारथ (65) श्री विशालाक्ष (66) श्री महाबल (67) श्री शचिशाल (68) श्री वज्र (69) श्री वज्रसार (70) श्री चन्द्रचूल (71) श्री जयकुमार (72) श्री महारस (73) श्री कच्छ (74) श्री महाकच्छ (75) श्री नमि (76) श्री विनामि (77) श्री बल (78) श्री अतिबल (79) श्री भद्र बल (80) श्री नंदी (81) श्री महाभागी (82) श्री नंदमित्र (83) श्री कामदेव (84) श्री अनुपम।</p>
<p><strong>22. भगवान श्री आदिनाथ के समवशरण में प्रमुख श्रावक और श्राविका कौन थे?</strong><br />
द्रणव्रत नाम के श्रावक और सुव्रता नाम की श्राविका।</p>
<p><strong>23. ऋग्वेद में भगवान श्री आदिनाथ का नाम कहां आया है?</strong><br />
सूक्त नं. 94 मंत्र नम्बर 10।</p>
<p><strong>24. अथर्वेद में भगवान श्री आदिनाथ का नाम कहां आया है?</strong><br />
अर्थवेद में का0 16 में, भाग 5 स्कंध 6 अध्याय में।</p>
<p><strong>25. वायुपुराण में भगवान श्री आदिनाथ का नाम कहां आया है?</strong><br />
वायुपुराण, 31 5052।</p>
<p><strong>26. वैदिक ग्रन्थों में भगवान श्री आदिनाथ को विष्णु का कौन सा अवतार माना गया है?</strong><br />
आठवां अवतार।</p>
<p><strong><span style="color: #ff00ff">ये भी पढ़िए:-</span></strong></p>
<ol>
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</ol>
<p><strong><span style="color: #ff00ff"> </span></strong></p>
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			</item>
		<item>
		<title>क्या आप जानते हैं आदि पुरुष भगवान आदिनाथ के बारे में ये सब कुछ : प्रथम तीर्थंकर हैं भगवान आदिनाथ </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/lord_adinath_is_the_first_tirthankara/</link>
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		<pubDate>Tue, 02 Apr 2024 22:30:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन पुराणों के जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव यानी भगवान आदिनाथ हैं। वह सुसीमा नगरी के राजा नाभिराय के पुत्र थे। ऋषभदेव ने ही आमजन को छह क्रियाएं असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प का ज्ञान दिया। यही नहीं ऋषभदेव ने ही सर्वप्रथम अपनी दो पुत्रियों को लिपिविद्या और अंकविद्या का ज्ञान दिया। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>जैन पुराणों के जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव यानी भगवान आदिनाथ हैं। वह सुसीमा नगरी के राजा नाभिराय के पुत्र थे। ऋषभदेव ने ही आमजन को छह क्रियाएं असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प का ज्ञान दिया। यही नहीं ऋषभदेव ने ही सर्वप्रथम अपनी दो पुत्रियों को लिपिविद्या और अंकविद्या का ज्ञान दिया। इस प्रकार भगवान ऋषभदेव जीचन में कर्म की प्रधानता और समाज में स्त्री शिक्षा के जनक के रूप में जाने जाते हैं। ऋषभदेव जयंती पर आइए जानते हैं, उनके जीवन के बारे में&#8230; । <strong><span style="color: #ff0000">रेखा संजय जैन की विशेष रिपोर्ट </span></strong></p>
<p><strong>ऋषभदेव का गर्भावतार</strong></p>
<p>एक दिन रात्रि के पिछले प्रहर में रानी मरुदेवी ने ऐरावत हाथी, शुभ्र बैल, हाथियों द्वारा स्वर्ण घटों से अभिषिक्त लक्ष्मी, पुष्पमाला आदि सोलह स्वप्न देखे। उनके पति राजा नाभिराय ने जब स्वप्नों का अर्थ बताया तो मरुदेवी बहुत हर्षित हुईं। आषाढ़ कृष्ण द्वितीया के दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र में भगवान ऋषभदेव, मरुदेवी के गर्भ में अवतीर्ण हुए।</p>
<p><strong>ऋषभदेव का जन्म महोत्सव</strong></p>
<p>माता मरुदेवी ने चैत्र कृष्ण नवमी के दिन सूर्योदय के समय भगवान को जन्म दिया। सारे विश्व में हर्ष की लहर दौड़ गई। सौधर्म इन्द्र ने इन्द्राणी सहित ऐरावत हाथी पर चढ़कर नगर की प्रदक्षिणा की और भगवान को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर 1008 कलशों में भरे क्षीरसमुद्र के जल से जन्माभिषेक किया। उनका नाम अनन्तर वस्त्राभरणों से अलंकृत करके ‘ऋषभदेव’ नाम रखा गया।</p>
<p><strong>ऋषभदेव का विवाहोत्सव</strong></p>
<p>भगवान् के युवावस्था में प्रवेश करने पर महाराजा नाभिराज ने कच्छ, सुकच्छ राजाओं की बहन ‘यशस्वती’ और ‘सुनन्दा’ के साथ श्री ऋषभदेव का विवाह सम्पन्न कर दिया।</p>
<p><strong>भरत चक्रवर्ती आदि का जन्म</strong></p>
<p>यशस्वती देवी ने चैत्र कृष्ण नवमी के दिन भरत चक्रवर्ती को जन्म दिया। इसके बाद निन्यानवे पुत्र एवं ब्राह्मी कन्या को जन्म दिया। उनकी दूसरी रानी सुनन्दा महादेवी ने भगवान बाहुबली और सुन्दरी नाम की कन्या को जन्म दिया।</p>
<p><strong>असि-मषि आदि षट्क्रियाओं का उपदेश</strong></p>
<p>यह वह समय था जब प्रजाजन अपनी आवश्यकताएं कल्पवृक्षों से पूरी करते थे, लेकिन काल के प्रभाव से जब कल्पवृक्ष शक्तिहीन हो गए। इस समय ऋषभदेव ने प्रजा को असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह कर्मों का उपदेश दिया। उन्होंने ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन वर्णों की स्थापना की और आजीविका के अनेकों पापरहित उपाय बताए।</p>
<p><strong>भगवान का वैराग्य और दीक्षा महोत्सव</strong></p>
<p>एक दिन सभा में नर्तकी नीलांजना की नृत्य के दौरान ही मृत्यु हो गई। यह देख कर भगवान को वैराग्य हो गया। भगवान ने भरत का राज्याभिषेक करते हुए इस पृथ्वी को ‘भारत’ नाम दिया और बाहुबली को युवराज पद पर स्थापित किया। इसके बाद वे ‘सिद्धार्थक’ वन में पहुंचे और वटवृक्ष के नीचे बैठकर ‘ओम नमः सिद्धेभ्यः मन्त्र का उच्चारण कर पंचमुष्टि केशलोंच करके सर्व परिग्रह रहित मुनि हो गये।</p>
<p><strong>भगवान का आहार ग्रहण</strong></p>
<p>भगवान छह महीने बाद आहार को निकले परन्तु चर्याविधि किसी को मालूम न होने के कारण आहार नहीं हो पाया। एक वर्ष उनतालीस दिन बाद भगवान हस्तिनापुर नगर में पहुंचे। यहां राजा श्रेयांस ने भगवान को इक्षुरस का आहार दिया। वह दिन वैशाख शुक्ला तृतीया का था जो आज भी ‘अक्षय तृतीया’ के नाम से प्रसिद्ध है।</p>
<p><strong>भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति</strong></p>
<p>हजार वर्ष तक तपस्या करने के बाद भगवान को पूर्वतालपुर के उद्यान में-प्रयाग में वटवृक्ष के नीचे ही फाल्गुन कृष्णा एकादशी के दिन केवलज्ञान हो गया। इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने बारह योजन प्रमाण समवसरण की रचना की। पुरिमताल नगर के राजा श्री ऋषभदेव भगवान के पुत्र वृषाभसेन प्रथम गणधर हुए। ब्राह्मी भी आर्यिका दीक्षा लेकर आर्यिकाओं में प्रधान गणिनी हो गयीं।</p>
<p><strong>भगवान ऋषभदेव का निर्वाण</strong></p>
<p>जब भगवान की आयु चैदह दिन शेष रह गई तब कैलाश पर्वत पर जाकर माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन सूर्योदय के समय भगवान पूर्व दिशा की ओर मुंह करके मुनियों के साथ सिद्धलोक में जाकर विराजमान हो गये।</p>
<p>नाम : आदिनाथ</p>
<p>पिता का नाम : नाभिराय</p>
<p>माता का नाम : मरूदेवी</p>
<p>कुल : इक्ष्वाकु वंश</p>
<p>गर्भ कल्याण स्थान : अयोध्या</p>
<p>तिथि : आषाढ़ बदी द्वितीय</p>
<p>नक्षत्र : रोहिणी</p>
<p>जन्म कल्याण स्थान : अयोध्या</p>
<p>तिथि : चेत्र बदी छठ</p>
<p>नक्षत्र : उत्तराषाढ़</p>
<p>राशि : धनु</p>
<p>चिह्न(लक्षण) : बैल</p>
<p>वर्ण : स्वर्ण</p>
<p>शरीर की ऊंचाई : 500 धनुष</p>
<p>दीक्षा कल्याण :</p>
<p>वैराग्य का कारण : नीलांजना की मृत्यु होना</p>
<p>वन : सिद्धार्थ</p>
<p>वृक्ष : वटवृक्ष</p>
<p>कितने राजाओ ने संग दीक्षा ली : 4000</p>
<p>उपवास का नियम : 6 मास</p>
<p>प्रथम आहार दीक्षा के कितने दिन बाद : 404</p>
<p>स्थान : हस्तिनापुरी</p>
<p>आहार देने वाले राजा का नाम : श्रेयांस</p>
<p>आहार की वस्तु : गन्ने का रस</p>
<p>केवलज्ञान से पूर्व उपवास : 8</p>
<p>केवलज्ञान कल्याण तिथी : फाल्गुन बदी एकादशी</p>
<p>समय : प्रातः काल</p>
<p>नक्षत्र : उत्तराषाढ़</p>
<p>स्थान : पुरियाताल पूरी</p>
<p>समवशरण विस्तार (योजन में) : 12</p>
<p>विस्तार (कोस में) : 48</p>
<p>कुल गणधर : 84</p>
<p>मुख्य गणधर : वृषभसेन</p>
<p>मुख्य आर्यिका : ब्राम्हीजी</p>
<p>मुख्य श्रोता : भरत चक्रवर्ती</p>
<p>मुख्य यक्ष : गोमुख (गोवदन)</p>
<p>मुख्य यक्षिणी : चक्रेश्वरी</p>
<p>मोक्ष कल्याण तिथि : माघ बदी चतुर्दशी</p>
<p>समय : सूर्योदय</p>
<p>स्थान : कैलाश गिरी</p>
<p>विशिष्ठ स्थान नक्षत्र : उत्तराषाढ़</p>
<p>आसन : पद्मासन</p>
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		<title>ज्ञानतीर्थ में अक्षय तृतीया पर होगा महामस्तकाभिषेक : बालाचार्य निपूर्णनन्दी महाराज का होगा मंगल प्रवेश  </title>
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		<pubDate>Thu, 20 Apr 2023 11:54:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ज्ञानतीर्थ जैन मन्दिर में अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर 22 अप्रैल को भगवान आदिनाथ का महमस्तकाभिषेक महोत्सव मनाया जाएगा। इसी दिन सुबह ज्ञानतीर्थ पर बालाचार्य श्री निपूर्णनन्दी जी महाराज ससंघ का मंगल प्रवेश भी हो रहा है। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230; मुरैना। ज्ञानतीर्थ जैन मन्दिर में अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर 22 [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>ज्ञानतीर्थ जैन मन्दिर में अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर 22 अप्रैल को भगवान आदिनाथ का महमस्तकाभिषेक महोत्सव मनाया जाएगा। इसी दिन सुबह ज्ञानतीर्थ पर बालाचार्य श्री निपूर्णनन्दी जी महाराज ससंघ का मंगल प्रवेश भी हो रहा है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> ज्ञानतीर्थ जैन मन्दिर में अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर 22 अप्रैल को भगवान आदिनाथ का महमस्तकाभिषेक महोत्सव मनाया जाएगा। सौभाग्य से इसी दिन सुबह ज्ञानतीर्थ पर बालाचार्य श्री निपूर्णनन्दी जी महाराज ससंघ का मंगल प्रवेश भी हो रहा है। ज्ञानतीर्थ जैन मंदिर में विराजमान बाल ब्रह्मचारिणी बहिन अनीता दीदी ने बताया कि जैन धर्म में अक्षय तृतीया का बहुत ही महत्त्व है। इस पावन अवसर पर 22 अप्रैल को प्रातः 08 बजे से विभिन्न धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ ज्ञानतीर्थ पर विराजमान बड़े वावा श्री आदिनाथ भगवान का महामस्तकाभिषेक किया जाएगा। परम् पूज्य बालाचार्य श्री निपूर्णनन्दी जी महाराज एवं मुनिश्री निर्भयनन्दी जी महाराज का श्री सम्मेदशिखर जी से पदमपुरा के लिए मंगल विहार चल रहा है। शनिवार 22 अप्रैल अक्षय तृतीया को प्रातः 07 बजे पूज्य बालाचार्य जी महाराज का ससंघ मंगल प्रवेश ज्ञानतीर्थ पर होने जा रहा है।</p>
<p><strong>इक्षु रस से किया था भगवान ने पारायण</strong></p>
<p>बहिन अनीता दीदी ने अक्षय तृतीया के संदर्भ में बताया कि अक्षय तृतीया जैन धर्मावलम्बियों का महान धार्मिक पर्व है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी-गन्ने) रस से पारायण किया था। जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बंधनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार कर लिया। सत्य और अहिंसा के प्रचार करते-करते आदिनाथ प्रभु हस्तिनापुर गजपुर पधारे, जहां इनके पौत्र सोमयश का शासन था। प्रभु का आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा। सोमप्रभु के पुत्र राजकुमार श्रेयांस कुमार ने प्रभु को देखकर उसने आदिनाथ को पहचान लिया और तत्काल शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्ने का रस दिया, जिससे आदिनाथ ने व्रत का पारायण किया। जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि गन्ने के रस को इक्षुरस भी कहते हैं। इस कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया।</p>
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