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	<title>Ekadashi &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>एकादशी पौष की बहुत है खास पूरे साल में सबसे अनोखा दिन : आज का दिन कितना महत्वपूर्ण एवं महान है जानिए </title>
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		<pubDate>Mon, 15 Dec 2025 10:38:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सोमवार 15 दिसम्बर को पौष कृष्ण की एकादशी, जब 8वें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ और 23वें तीर्थंकर श्री पारसनाथ जी का जन्म तप कल्याणक है। साल में यही एक दिन होता है, जब चार कल्याणक आते हैं। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;  इंदौर। सोमवार 15 दिसम्बर को पौष कृष्ण की एकादशी, जब 8वें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सोमवार 15 दिसम्बर को पौष कृष्ण की एकादशी, जब 8वें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ और 23वें तीर्थंकर श्री पारसनाथ जी का जन्म तप कल्याणक है। साल में यही एक दिन होता है, <span style="color: #ff0000">जब चार कल्याणक आते हैं। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> इंदौर।</strong> सोमवार 15 दिसम्बर को पौष कृष्ण की एकादशी, जब 8वें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ और 23वें तीर्थंकर श्री पारसनाथ जी का जन्म तप कल्याणक है। साल में यही एक दिन होता है, जब चार कल्याणक आते हैं। वैसे तो सभी तीर्थंकरों के गुण एक समान होते हैं पर व्यवहारिक रूप में कुछ अंतर भी दिखाई देते हैं। चन्द्रप्रभ श्वेत रंग के तो पार्श्वनाथ श्याम रंग के। जहां चन्द्रप्रभ की आयु 10 लाख वर्ष पूर्व और एक पूर्व होता है 84 लाख पूर्वांग और एक पूर्वांग 84 लाख वर्ष का यानि आयु इतनी कि आपका केलकुलेटर भी जवाब दे दे। वहीं पारस प्रभु की आयु सिर्फ 100 वर्ष। तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का कद 150 धनुष या कहें 900 फुट का था, वहीं पारस प्रभु की ऊंचाई 9 हाथ यानि साढ़े तेरह फीट की। जहां चंद्रप्रभ ने साढ़े 6 लाख वर्ष पूर्व 24 पूर्वांग तक राजपाट किया, वहीं पारसप्रभु ने नहीं संभाला अपने पिता विश्वसेन का राज। तीर्थंकर चन्द्रप्रभ ने विवाह किया, वहीं पारस प्रभु बाल ब्रह्मचारी रहे। चन्द्रप्रभ को अध्रुवादि भावनाओं का चिंतवन करने से वैराग्य हुआ, वहीं पारस प्रभु को जाति स्मरण से। जहां चन्द्रप्रभ के साथ एक हजार राजाओं ने भी दीक्षा ली, वहीं पारस प्रभु के साथ 300 ने। चन्द्रप्रभ के तीन माह के तप के बाद केवलज्ञान की प्राप्ति हुई, वहीं पारस प्रभु को चार माह के तप के बाद।</p>
<p>चन्द्रप्रभ का समोशरण साढ़े 8 योजन विस्तृत था, वहीं पारस प्रभु का सवा योजन का। एक योजन 12 किमी विस्तृत होता है। जहां चन्द्रप्रभ के समोशरण में 93 गणधर थे, वहीं पारस प्रभु के 10 गणधर थे। दोनों ही तीर्थंकर श्री सम्मेदशिखरजी से मोक्ष गये, पर चन्द्रप्रभ बिल्कुल पूर्व की ललित कूट से, वहीं पारस प्रभु पश्चिम में स्वर्ण भद्रकूट से। वैसे इन दोनों कूट के लिए अब सबसे चौढ़ी सीढ़ियां हैं। केवल पारस प्रभु की स्वर्णभद्र कूट पर दो जगह चरण है। तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का तीर्थ काल 90 करोड़ सागर चार पूर्वांग का रहा, इतना लम्बा, वहीं पारस प्रभु का तीर्थकाल सबसे कम 278 वर्ष का रहा। ऐसा पावन दिन है पौष कृष्ण एकादशी, 23वें तीर्थंकर का 2703 वां जन्म कल्याणक है। ऐसे पावन दिवस की सभी को हार्दिक मंगल शुभकामनाएं।</p>
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		<title>भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 15 दिसंबर को: पौष मास के कृष्ण एकादशी का पुण्य दिवस को मनाया जाता है  </title>
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		<pubDate>Sun, 14 Dec 2025 13:56:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं कल्याणक 15 दिसंबर को पौष कृष्ण एकादशी को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230; इंदौर। जैन धर्म के 23वें [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं कल्याणक 15 दिसंबर को पौष कृष्ण एकादशी को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं कल्याणक 15 दिसंबर को पौष कृष्ण एकादशी को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणासी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय राजा और उनकी रानी वामा के यहां पौष कृष्&#x200d;ण एकादशी के दिन महा तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। इनके शरीर पर सर्पचिह्म था। वामा देवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में एक सर्प देखा था, इसलिए पुत्र का नाम पार्श्व रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ। एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिए एक ओर जा रहे हैं। वहां जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी जहां पंचाग्नि जला रहा है और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है, तब पार्श्व ने कहा कि ‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं’। तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने 30 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया था और जैन दीक्षा ली। काशी में 83 दिन की कठोर तपस्या करने के बाद 84वें दिन उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। ताम्रलिप्त में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की।</p>
<p>इसमें श्रमण, श्रमणी, श्रावक, श्राविका होते हैं और आज भी जैन समाज इसी स्वरुप में है। प्रत्येक गण एक गणधर के तहत कार्य करता था। सभी अनुयायियों, स्त्री हो या पुरुष सभी को समान माना जाता था। सारनाथ जैन-आगम ग्रंथों में सिंहपुर के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं पर जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी ने जन्म लिया था और अपने अहिंसा धर्म का प्रचार-प्रसार किया था। केवल ज्ञान के बाद तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।</p>
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		<title>भगवान चंद्रप्रभ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 15 दिसंबर को : पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर होते हैं धार्मिक कार्यक्रम  </title>
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		<pubDate>Sun, 14 Dec 2025 13:54:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के प्रवर्तक और 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 15 दिसंबर को मनाया जाएगा। यह दोनों कल्याणक पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को आते हैं। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भक्तिपूर्ण आराधना का दौर रहता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के प्रवर्तक और 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 15 दिसंबर को मनाया जाएगा। यह दोनों कल्याणक पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को आते हैं। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भक्तिपूर्ण आराधना का दौर रहता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के प्रवर्तक और 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 15 दिसंबर को मनाया जाएगा। यह दोनों कल्याणक पौष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को आते हैं। जैन धर्म ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभजी का जन्म चंद्रपुरी (बनारस) में राजा महासेन और रानी लक्ष्मणा के यहां पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को हुआ और इसी दिन उन्होंने दीक्षा (तप) भी धारण की, जिससे यह दिन दिगंबर जैन धर्मावलंबी जन्म एवं तप कल्याणक के रूप में मनाते आ रहे हैं। भगवान चंद्रप्रभ जी के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार उनकी गौर वर्ण काया है और चंद्र चिह्न प्रमुख हैं और उन्होंने सम्मेद शिखर से मोक्ष प्राप्त किया। आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभ का जन्म भी पौष कृष्ण एकादशी को ही राजघराने में हुआ था। इनके माता-पिता बनने का सौभाग्य चंद्रावती के महाराजा महासेन और लक्ष्मणा देवी को मिला। भगवान चंद्रप्रभु के जन्म, तप एवं ज्ञान कल्याणक स्थली क्षेत्र सुरम्य गंगातट पर चंद्रावती गढ़ के भग्नावशेषों के बीच स्थित है। क्षेत्र पर चैत्र कृष्ण पंचमी को वार्षिक मेला लगता है। यहां चंद्राप्रभु का भव्य मंदिर आस्था का केंद्र है लेकिन गंगा की कटान की वजह से यह तीर्थ बदहाल पड़ा है। वर्तमान मंदिर की वेदी में मूलनायक तीर्थंकर चंद्रप्रभ की श्वेत पाषाण की पद्मासन प्रतिमा है।</p>
<p>मंदिर का शिखर बहुत ही सुंदर बना हुआ है। यहां से गंगा का मनोहारी दृश्य बहुत ही आकर्षक लगता है, जो अवलोकनीय है। गंगा नदी के तट पर बना हुआ जिनालय स्थापत्य कला को सुशोभित कर रहा है। मंदिर का निर्माण प्रभुदास जैन ने किया था। इनके परिवारजन अजय जैन, प्रशांत जैन आरा आदि आज भी इस क्षेत्र की देख-रेख में लगे हुए हैं। उल्लेखनीय है कि भगवान चंद्रप्रभ को इतिहास का स्वरूप धारण कराने में आचार्य समन्तभद्र स्वामी का बड़ा हाथ है। जब उन्हें भस्मक व्याधि हो गयी थी। उस समय काशी में उनके साथ जो घटनाक्रम हुआ, वह ऐतिहासिक था। इस ऐतिहासिक घटना ने जनमानस पर गहरा प्रभाव छोड़ा और कलाकार चंद्रप्रभु की कलाकृतियां गढ़ने में तत्पर हो गए और श्रावक जन भगवान चंद्रप्रभु के चमत्कार के प्रति अधिक आस्थावान और विश्वस्त हो गए। चंद्रावती के अलावा देवगढ़ , खजुराहो, सोनागिर, तिजारा, ग्वालियर, श्रवणबेलगोला , बरनावा, मांगीतुंगी आदि में चंद्रप्रभु भगवान की प्राचीन और चमत्कारी प्रतिमाएं विराजमान हैं।</p>
<p>तीर्थंकर चंद्रप्रभु अपनी अद्वितीय धवल रूप गरिमा में वीतरागता का वैभव बिखेरने के साथ अपने अद्वितीय अतिशय और चमत्कारों के कारण भी लोकप्रिय संकट मोचन रहे हैं। तीर्थंकर चन्द्रप्रभु का आदर्श मानव को सावधान करता है, उसे जगाता है और कहता है कि हमारी तरफ देख, हमने राजा का वैभव को ठुकराया और आकिंचन व्रत अंगीकार किया और तू इस नाशवान माया की ममता में पागल हुए जा रहा है।</p>
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