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	<title>dipawali &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>निर्वाणोत्सव है दीपावली  -अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संपादक]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Oct 2020 13:30:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
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					<description><![CDATA[दीपावली…..अर्थात अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव। दीपावली भारतीय हिन्दू परम्परा और संस्कृति का सबसे प्राचीन और सबसे महत्वपूर्ण त्योंहार है। हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, आर्य समाज यानी भारतीय परम्परा से निकले जो भी धर्म और मत है, लगभग उन सभी में दीपोत्सव मनाने के अपने-अपने कारण और शायद इसी वजह से दीपावली पूरे [&#8230;]]]></description>
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<p>दीपावली…..अर्थात अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव। दीपावली भारतीय हिन्दू परम्परा और संस्कृति का सबसे प्राचीन और सबसे महत्वपूर्ण त्योंहार है। हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, आर्य समाज यानी भारतीय परम्परा से निकले जो भी धर्म और मत है, लगभग उन सभी में दीपोत्सव मनाने के अपने-अपने कारण और शायद इसी वजह से दीपावली पूरे भारतवर्ष का त्योंहार है।<br />हर वर्ष कार्तिक मास की अवस्या जो अंग्रेजी कलेण्डर के हिसाब से अक्टूबर या नवम्बर में पड़ती है, उस दिन पूरा भारत अपनी-अपनी और धार्मिक रीति रिवाज के अनुसार दीपावली मनाता है। धार्मिक रीति-रिवाज और परम्पराएं भले ही सबकी अलग-अलग हों, लेकिन इस उत्सव का प्राणतत्व एक ही है और वह “प्रसन्न्ता“। चाहे भगवान राम के अयोध्या नगरी लौटने की खुशी हो, चाहे भगवान के महावीर के निर्वाण की प्रसन्नता, चाहे गुरू हरगोबिंद सिंह को कारागार से रिहा करने का जश्न हो यानी कारण कुछ भी हो लेकिन यह वह दिन है जब हम सब प्रसन्न होते हैं और इस प्रसन्ना को ही दीपमालिका सजा कर व्यक्त करते हैं।</p>



<h2 class="wp-block-heading">निर्वाणोत्सव का दीया</h2>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="800" height="480" class="wp-image-4993" src="https://abhisheksingh.space/news/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0008-1.jpg" alt="" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0008-1.jpg 800w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0008-1-300x180.jpg 300w" sizes="(max-width: 800px) 100vw, 800px" /></figure>



<p><br />तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात अन्धकार से प्रकाश की ओर जाने की यात्रा। भारतीय परम्परा और संस्कृति में प्रकाश का अपना ही महत्व है। यह माना जाता है कि एक दीया मात्र सभी तरह के अंधकार को दूर कर सकता है और व्यक्ति को सही राह दिखा सकता है। चैबीसवें तीर्थंकर भगवान का निर्वाण होना और उनके शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति होना, इसी बात का प्रतीक है ज्ञान का दीया जल गया है और अब इससे जो प्रकाश हुआ है, उसे साथ लेकर सभी मनुष्यों को मोक्षमार्ग पर चलना है। भगवान् ने संसरण से मुक्त होकर मोक्षलक्ष्मी का वरण किया। अतएव दीपावली के अंकन में समवसरण का चित्र बनाकर ज्ञान-लक्ष्मी की पूजन की प्रवृत्ति हुई। हालांकि अब सभी लोग ज्ञानलक्ष्मी को तो भूल गये, उसके स्थान पर धनलक्ष्मी की पूजा होने लगी।<br />दीपावली पर हम अपने घर, प्रतिष्ठान आदि की सफाई करते हैं। यह भी एक प्रतीक है जो यह शिक्षा देता है कि बाह्य स्वच्छता की तरह अन्तरंग मन तथा रागद्वेषादि भाव को हटाकर अपने हृदय को निर्मल तथा आत्मा को पवित्र बनाना चाहिए। धनतेरस को धन की पूजा के चक्कर में न पड़कर हम उस ध्यान का अभ्यास करें, जिसका अवलम्बन कर भगवान् महावीर ने मोक्ष की उपलब्धि की थी।</p>



<h2 class="wp-block-heading">पूजन में खिलौने हैं उपदेश सभा के प्रतीक</h2>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="800" height="480" class="wp-image-4995" src="https://abhisheksingh.space/news/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0009-1.jpg" alt="" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0009-1.jpg 800w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0009-1-300x180.jpg 300w" sizes="(max-width: 800px) 100vw, 800px" /></figure>



<p><br />दीपावली के दिन लक्ष्मी-पूजन के समय मिट्टी का घरौंदा और खेल-खिलौने भी रखे जाते हैं। ये भगवान् महावीर और उनके शिष्य गौतम गणधर की उपदेश सभा के प्रतीक हैं। चूंकि उनका उपदेश सुनने के लिए मनुष्य, पशु सभी जाते हैं, अतः उनकी स्मृति के रूप में उनकी मूर्तियां रखी जाती हैं। इस दिन प्रातः जैन मन्दिरों में भगवान् महावीर की पूजा के समय निर्वाण कल्याणक के अर्घ के समय अष्टद्रव्य के साथ लड़डू चढ़ाया जाता है। उसी दिन से वीर निर्वाण संवत् का प्रचलन हुआ जो वर्तमान प्रचलित संवतों में सर्वाधिक प्राचीन है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">ज्ञान की ज्योति जगाने के लिए दीपमालिका</h2>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="800" height="480" class="wp-image-4996" src="https://abhisheksingh.space/news/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0010-1.jpg" alt="" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0010-1.jpg 800w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0010-1-300x180.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px" /></figure>



<p><br />भगवान् के निर्वाण के अवसर पर अनेक राजा, महाराजा, गणनायक, सामन्त, श्रेष्ठि तथा जन सामान्य पावापुर के उस सुरम्य पद्मसरोवर के तट पर एकत्र हुए जहां भगवान् ने आखिरी सांसें लीं। भगवान् के मुक्त होने पर उन्होंने सोत्साह निर्वाण की पूजा की। उसकी स्मृति को जागृत रखने के लिए पार्थिक दीपमालिका की जाती है। यह दीपमालिका उनकी दैवीय ज्ञानज्योति की प्रतीक है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">दीपोत्सव मनाए जाने के अन्य कारण</h2>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="800" height="480" class="wp-image-4997" src="https://abhisheksingh.space/news/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0007-1.jpg" alt="" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0007-1.jpg 800w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2020/10/IMG-20201019-WA0007-1-300x180.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px" /></figure>



<p>भारतवर्ष में दीपावली मनाए जाने के विभिन्न कारण है। कुछ का तो हिन्दू धर्म में उल्लेख है, लेकिन अधिकतर का स्थानीय संस्कृति और पहले से चली आ रही परंपरा से संबंध है।<br />आइए जानते हैं इस त्योहार को मनाने के कारण-</p>



<p>. दीपावली के बारे में हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि इस दिन त्रेता युग में भगवान राम 14 वर्ष के वनवास और रावण का वध करने के बाद अयोध्या आये थे। इसी खुशी में अयोध्यावासियों ने समूची नगरी को दीपों के प्रकाश से जगमग कर उत्साह मनाया था और इस तरह तभी से दीपावली का पर्व मनाया जाने लगा।<br />. दीपावली के बारे में एक मान्यता यह भी है कि जब राजा बलि ने देवताओं के साथ लक्ष्मी जी को भी बंधक बना लिया तब भगवान विष्णु ने वामन रूप में इसी दिन उन्हें मुक्त कराया था। भगवान विष्णु ने राजा महाबली को पाताल लोक का स्वामी बना दिया था और इन्द्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जानकर प्रसन्नतापूर्वक दीपावली मनाई थी।</p>



<p>. इसी दिन भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर के हिरण्यकश्यप का वध किया था।<br />. मान्यताओं के अनुसार इस दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए थे।<br />. इस दिन के ठीक एक दिन पहले श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था। दूसरे दिन इसी उपलक्ष्य में दीपावली मनाई जाती है।<br />. राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्ररूप काली की पूजा का भी विधान है।<br />. गौतम बुद्ध 17 वर्ष बाद अपने अनुयायियों के साथ अपने गृह नगर कपिलवस्तु लौटे थे। उनके स्वागत में लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई गई थी।<br />. इसी दिन उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राजतिलक हुआ था।<br />. इसी दिन गुप्तवंशीय राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की स्थापना करने के लिए धर्म, गणित तथा ज्योतिष के दिग्गज विद्वानों को आमन्त्रित कर मुहूर्त निकलवाया था।<br />. इसी दिन अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। सिक्खों ने दीप जलाकर उत्सव मनाया था।<br />. दीपावली ही के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को कारागार से रिहा किया गया था।</p>



<p>. इसी दिन आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती का निर्वाण हुआ था।<br />. इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष आरम्भ होता है।</p>



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