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	<title>Dharm Sabha श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग सत्र में प्रवचन : हम सभी का हित भगवान की भक्ति में ही है &#8211; मुनि श्री निरंजन सागरजी </title>
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		<pubDate>Fri, 05 May 2023 14:01:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कहा कि जिसके जीवन में आगम है, उसके जीवन में दुःख नहीं रह सकता। आ+गम अर्थात् दुःख से आराम ही आगम है। पढ़िए राजेश रागी की रिपोर्ट&#8230; कुम्हारी (दमोह)। साइंस ऑफ लिविंग में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कहा कि आज हम [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कहा कि जिसके जीवन में आगम है, उसके जीवन में दुःख नहीं रह सकता। आ+गम अर्थात् दुःख से आराम ही आगम है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुम्हारी (दमोह)।</strong> साइंस ऑफ लिविंग में मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कहा कि आज हम एक ऐसा सत्र आपके सामने ला रहे हैं, जिससे आपको वस्तु तत्व का समीचिन बोध प्राप्त करने में सहायता प्राप्त होगी। आचार्यों ने वक्ता के प्रमाणिकता के आधार पर ही वचनों की प्रमाणिकता को स्वीकार किया है। निराधार विवक्षा से वक्ता की प्रमाणिकता पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। &#8220;वक्तुं इच्छा विवक्षा&#8221; वक्ता की इच्छा ही विवक्षा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आपके मुख में जो आए, वही कहें। आचार्य कहते हैं &#8220;आगम चक्खू साहू&#8221; अर्थात् गणधर परमेष्ठी द्वारा गुम्फित वाणी, जो कि अरिहंत देव द्वारा कही गई है, ऐसी वाणी ही जिनवाणी है। वही साधु के लिए एवं साधु (सज्जन) पुरुष के लिए चक्षु (नेत्र) के समान है। किसी व्यक्ति विशेष के व्यक्तिगत मत को हम जिनवाणी या आगम नहीं कह सकते हैं।</p>
<p><strong>जिनवाणी और जन वाणी में अंतर</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि जिनवाणी और जन वाणी मे बहुत अन्तर होता है। जिसके जीवन में आगम है, उसके जीवन में दुःख नहीं रह सकता। आ+गम अर्थात् दुःख से आराम ही आगम है। आचार्यों ने आधार आधेय सम्बन्ध पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। जैसे गमला आधार है और पौधा आधेय है। बिना आधार के आधेय की परिकल्पना निरर्थक है। वैसे ही द्रव्य आधार है और भाव आधेय है। जैन दर्शन भाव प्रधान दर्शन है। परंतु निराधार नहीं है। भाव प्रधान है, तो द्रव्य गौण है परन्तु यह अभावात्मक नहीं कहा है। तत्वार्थ सूत्र में आचार्य उमास्वामी जी ने सूत्र दिया है &#8220;अर्पितानर्पित सिद्धे:&#8221; वस्तु अनेकान्तात्मक है प्रयोजन के अनुसार उसके किसी एक धर्म को विवक्षा से जब प्रधानता प्राप्त होती है तो वह अर्पित या मुख्य कहलाता है। प्रयोजन के अभाव में जिसकी प्रधानता नहीं रहती, वह अनर्पित या गौण कहलाता है। सामान्य या विशेष रूप कथन शैली का आधार लेकर पदार्थ का विवेचन किया जाता है। आज स्वाध्याय तो बहुत हो रहा है, परन्तु विवक्षा कि समझ का अभाव होने से भटकन ज्यादा हो रही है।</p>
<p><strong>आत्मा में चरण ही ब्रह्मचर्य</strong></p>
<p>ब्रह्म अर्थात् आत्मा में चरण करना ही ब्रह्मचर्य है और इसका कर्ता ब्रह्मचारी कहलाता है। परन्तु आपका चरण और आचरण एकान्त का है तो ऐसे में आप भ्रमचर्य से युक्त भ्रमचारी कहलायेंगे। आपका भव भ्रमण इसी तरह चलता रहेगा। आचार्यों ने स्पष्ट विवेचन दिया है कार्य-कारण व्यवस्था को लेकर। जिस व्यक्ति को कार्य-कारण व्यवस्था की समझ नहीं है, वह कभी व्यवस्थापक नहीं बन सकता है, बल्कि वह व्यवस्था को अव्यवस्था के रूप में परिवर्तित कर सकता है। आचार्य कहते हैं &#8220;कारण सदर्श कार्यम्&#8221; कारण के अनुरूप ही कार्य होता हैं। अशुद्ध कारण से अशुद्ध कार्य की उत्पत्ति होती है और शुद्ध कारण से शुद्ध कार्य की उत्पत्ति होती है। बिना कारण के कभी कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है। द्रव्य कारण और भाव कार्य है।</p>
<p><strong>अशुद्ध द्रव्य में नहीं हो सकते शुद्ध भाव</strong></p>
<p>बिना द्रव्य के भाव उत्पन्न नहीं हो सकते हैं। अशुद्ध दृव्य में भी शुद्ध भाव उत्पन्न नहीं हो सकते हैं। कभी बबूल का बीज बोकर किसी को आम की प्राप्ति नहीं हुई है। अशुद्ध दृव्य के आधार से शुद्ध भाव नहीं ठहर सकते है। इसलिए द्रव्य की शुद्धि पूर्वक ही भाव की शुद्धि सम्भव है। बिना मुनि बने अगर कोई मुनिवत् चर्या कर अपने आपको मुनि मानकर या मनवाकर बैठा है तो यह उसका उन्मत्तपना है, यह उसका अज्ञान अन्धकार रूपी मिथ्यात्व है और इससे वह स्वयं का एवं दूसरों का भी अहित ही कर रहा है। हम सभी का हित भगवान की भक्ति में ही है। उसे करते हुए हम सभी अपना आत्मकल्याण कर सकते हैं।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में हुए मुनि के प्रवचन : आपको जो बनना है, आप उनके पास जाएं &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Mon, 01 May 2023 15:23:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम आपके भविष्य को लेकर चर्चा करने जा रहे हैं। आपको जो बनना है आप उनके पास जाएं, उन पर विश्वास रखें। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की ये विशेष रिपोर्ट&#8230; कुम्हारी (दमोह)। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम आपके भविष्य को लेकर चर्चा करने जा रहे हैं। आपको जो बनना है आप उनके पास जाएं, उन पर विश्वास रखें। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की ये विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुम्हारी (दमोह)।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम आपके भविष्य को लेकर चर्चा करने जा रहे हैं। आपको जो बनना है आप उनके पास जाएं, उन पर विश्वास रखें। आचार्य पूज्यपाद स्वामी जी इष्टोपदेश ग्रन्थ में लिखते हैं कि &#8220;ददाति यत्तु यस्यास्ति, सुप्रसिद्धमिदं वच:&#8221; अर्थात् जिसके पास जो होता है, वह वही देता है। यह वचन प्रसिद्ध है। यदि आपको वैज्ञानिक बनना है तो वैज्ञानिक पर विश्वास रखना पड़ेगा, राजनीति के क्षेत्र में जाना है तो राजनेता के पास जाना होगा, ठीक इसी प्रकार आपको वीतरागी बनना है तो वीतरागी देव, गुरु के पास जाना ही होगा। &#8220;अन्यथा शरणं नास्ति&#8221; अन्य प्रकार की शरण आपके लिये कल्याण का मार्ग नही है। आज सबसे बड़ी समस्या है मार्गदर्शन का अभाव और इसका सबसे ज्यादा असर नवयुवक वर्ग पर भी पड़ रहा है। मार्गदर्शन के अभाव मे आज समाज भटक रहा है। मार्ग दर्शन किससे लिया जाये ? यह प्रश्न आज ज्वलंत समस्या के समान सामने खड़ा है। क्योंकि हर कोई मार्गदर्शक बना फिरता है।</p>
<p><strong>किसी की बातों में न आएं</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि मार्गदर्शन वही कर सकता है, जो उस मार्ग पर चलना जानता हो या चल रहा हो। बिना मार्ग को जाने और चले, अगर कोई मार्गदर्शन, कर रहा है तो यह उसका अज्ञान ही कहलायेगा। आचार्य कहते हैं &#8221; य: यत्र अनभिज्ञ: स: तत्र बाल:&#8221;जो जिस क्षेत्र मे अनभिज्ञ है, वह उस क्षेत्र मे बालक है। आपने डॉक्टर की उपाधि तक प्राप्त नहीं की और तत् संबधी प्रशिक्षण भी नहीं लिया और आप आपरेशन करना चाहते हैं। यह कहां की समझदारी है? और इस तरह आप स्वयं का और सामने वाले दोनों का अहित ही कर रहे हैं। आचार्यों ने अपने पूर्वाचार्यों के अनुसार अनुकम्पा दृष्टि के साथ आपके लिये कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया है और आप यद्वा &#8211; तद्वा किसी की भी बातों मे आकर अपना स्वयं का और अपने संबंधियों का भविष्य भी बिगाड़ रहे हैं।</p>
<p><strong>जनता हो रही है भ्रमित</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने यह भी कहा कि जैनदर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है दिगम्बरत्व। आज उस दिगम्बरत्व को स्वीकार करने में असमर्थ लोगों के द्वारा जो विष भाषण किया जा रहा है, उसके कारण भोली -भाली जनता भ्रमित हो रही है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह की प्रवृति ज्यादा देखने को मिलती है। जिनेन्द्र देव की, आचार्यों की वाणी को गौण करके अपने मन के अनुरूप आचरण करने वाले अपना नया पन्थ और नया साहित्य निर्माण करने में लगे हैं। ख्याति, पूजा, लाभ के प्यासे यह अभदन्त प्राणी अपनी वाह-वाह में लगे हैं। अपनी ढपली &#8211; अपना राग। स्वयं तो निराधार और जग को दिखा रहे आधार। आपका वर्तमान ही आपका भविष्य निर्धारित करता है। इसलिये वर्तमान को सुधारने का प्रयास करें, जिससे भविष्य अपने आप ही संवर जाएगा।</p>
<p><strong>विवेक का प्रयोग करें</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रायः करके ऐसे लोग अपनी पैठ बनाये हुए हैं। ‌शहरी क्षेत्रों में बुद्धिजीवी वर्ग का प्रभाव होने से इस तरह की गलत धारणाओं का प्रचार-प्रसार नहीं हो पाता। मात्र ग्रामीण अशिक्षित वर्ग ही ऐसी विपरीत मान्यताओं को सही मानकर बैठा हुआ है। ग्रामीण शिक्षित वर्ग भी इन्हें स्वीकार्यता नहीं देता है। अपने विवेक का प्रयोग करना प्रत्येक प्राणी का धर्म है। अपने लिये क्या सही है? क्या गलत है? आप सभी जानते है। इसलिए विष के समान इन गलत धारणाओ को समूल नष्ट कर अपने इष्ट की सिद्धि करें, जिससे हम सभी का जन्म-मरण रूपी कष्ट मिट सके।</p>
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		<title>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में हुए मुनि के प्रवचन : प्रतिमा का प्रतिकार भारतीय सनातन संस्कृति पर कुठाराघात है &#8211; मुनि श्री निरंजन सागर </title>
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		<pubDate>Sun, 30 Apr 2023 09:33:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम प्रतिमा अर्थात् मूर्ति के महत्त्व को समझने का प्रयास करेंगे। आचार्यों ने ग्रन्थों में निक्षेप अर्थात् न्यास की व्यवस्था हम सभी के लिये दी है। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की ये विशेष रिपोर्ट&#8230; कुम्हारी (दमोह)। साइंस ऑफ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम प्रतिमा अर्थात् मूर्ति के महत्त्व को समझने का प्रयास करेंगे। आचार्यों ने ग्रन्थों में निक्षेप अर्थात् न्यास की व्यवस्था हम सभी के लिये दी है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की ये विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुम्हारी (दमोह)।</strong> साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम प्रतिमा अर्थात् मूर्ति के महत्त्व को समझने का प्रयास करेंगे। आचार्यों ने ग्रन्थों में निक्षेप अर्थात् न्यास की व्यवस्था हम सभी के लिये दी है। जिसके चार भेद हैं नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव। नाम निक्षेप जिसके माध्यम से आप और हम सभी का व्यवहार चलता है, जैसे -हमारा नाम मुनि निरंजन सागर है। स्थापना निक्षेप जिसके माध्यम से &#8216;यह वही है। इस रूप ज्ञान होता है। जैसे:-चित्र, प्रतिमा, मूर्ति, प्रतिबिम्ब आदी में &#8220;यह वही है&#8221; &#8220;यह भगवान का चित्र है&#8221; &#8220;यह भगवान की प्रतिमा है&#8221; इस प्रकार स्थापित करना स्थापना निक्षेप है। यह अनादिकालीन व्यवस्था है। इस व्यवस्था को स्वीकार नहीं करना अपने आपमें मूर्खता का प्रतीक है। जिस किसी व्यक्ति ने निक्षेप की व्यवस्था को नहीं जाना, नहीं माना, उस व्यक्ति ने अपनी मन-मानी ही की है।</p>
<p><strong> परिषह-उपसर्ग सहन करने पर ही पूज्यता आती है</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि एक बार किसी विद्वान को एक सभा में आमन्त्रित किया गया और उनसे पूछा कि आप इन पत्थरों को क्यों पूजते हो? क्या होता है? इन पत्थरों के दर्शन से, पत्थरों के अभिषेक से, पत्थरों की पूजा भक्ति और आरती आदि करने से ? उस विद्वान ने उस सभा में चहुंओर देखा और पाया कि सभा में कुछ चित्र लगे थे जो किन्हीं व्यक्ति विशेष के थे। उसने कहा मुझे यह सब चित्र उतरवाकर दे दीजिये। फिर मैं आपको आपके प्रश्न का उत्तर देता हूं। जैसे ही उसको वह चित्र दिये तुरन्त ही उसने उन चित्रों पर थूकना प्रारम्भ कर दिया। यह देख पूरी सभा आक्रोशित हो गई। सभा को आक्रोशित देख उनसे कहा, &#8220;आप लोगों का आक्रोशित होना व्यर्थ है&#8221; जब आप प्रतिमा को पत्थर कहकर उस प्रतिमा अर्थात् भगवान के प्रतिबिंब का अनादर कर सकते हैं तो यह चित्र भी तो कागज है और कागज का अनादर आप सहन नहीं कर पा रहे हैं। यह कैसा न्याय है? जब पाषाण की प्रतिमा बनाते हैं, तब पाषाण की पूजा नहीं, बल्कि उस पाषाण में जो छैनी- हथोड़े की मार से परमात्मा का आकार उभर कर आया फिर उसमें मन्त्रों द्वारा गुणों का अवरोपण किया, उन गुणों की पूजा है, ना कि पाषाण की। उस पाषाण ने छैनी- हथोड़ा, गर्मी- वर्षा आदि उपसर्ग- परिषह को साक्षात् परमात्मा के समान जीता है। जो बताती है कि परिषह-उपसर्ग सहन करने पर ही पूज्यता आती है इसलिए वह पाषाण भी परमात्मा बनकर पूज्य हुआ है। जिस प्रकार बच्चों के लिए छोटे-छोटे कंकर आदि घटा-बढ़ाकर अंकों का और गोला, डण्डा आदि आकृति बनाकर शब्दों का ज्ञान कराया जाता है, उसी प्रकार परमात्मा का ज्ञान, धातु, पाषाण आदि की मूर्ति बनाकर किया जाता है, अत: मूर्ति को भगवान का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। मूर्ति स्थापित करके पूजा करते समय यह धातु की है या पाषाण की है, इस प्रकार ध्यान करके भगवान की पूजा नहीं की जाती है, बल्कि आप वीतरागी हैं, अनन्त गुणों से युक्त हैं और घातिया कर्मों को नष्ट किया है, इत्यादि प्रकार से स्तुति की जाती है।</p>
<p><strong>होता है मोक्ष का मार्ग प्रशस्त</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि निर्जीव प्रतिमा से भी वीतरागता की ओर दृष्टि जाती है, राग-द्वेष की ओर दृष्टि नहीं जाती है। यही तो मूर्ति के माध्यम से, मूर्तिमानों के गुणों को ध्यान करना, मूर्ति पूजा का मुख्य ध्येय हुआ करता है। आचार्य कहते हैं मूर्ति के दर्शन, भक्ति, पूजन आदि के द्वारा अनादिकालीन अज्ञान अन्धकार रूपी मित्थात्व को भी नष्ट किया जा सकता है। जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इसका साक्षात् उदाहरण है कुंडलपुर के बड़े बाबा आदिनाथ भगवान और गोम्मटेश बाहुबली, जिनके दर्शन करने को दूर-दूर से लोग आते हैं।</p>
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		<title>जैन छात्रावास में धर्मसभा को किया सम्बोधित :  ज्ञान से आत्मा संतुष्ट होती है-स्वस्तिभूषण माताजी </title>
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		<pubDate>Sat, 08 Apr 2023 13:35:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[परम पूज्य गुरुमां गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी इस समय ग्वालियर प्रवास पर हैं। आज वह चम्पाबाग जैन धर्मशाला से विहार करते हुए जैन छात्रावास पहुंची। वहां उन्होंने शिलान्यास समारोह में सान्निध्य प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने धर्मसभा को भी संबोधित किया। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230; ग्वालियर। शिक्षा जीवन की अतिआवश्यकता है। जितनी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>परम पूज्य गुरुमां गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी इस समय ग्वालियर प्रवास पर हैं। आज वह चम्पाबाग जैन धर्मशाला से विहार करते हुए जैन छात्रावास पहुंची। वहां उन्होंने शिलान्यास समारोह में सान्निध्य प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने धर्मसभा को भी संबोधित किया। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>ग्वालियर।</strong> शिक्षा जीवन की अतिआवश्यकता है। जितनी आवश्यकता शरीर को भोजन, हवा, पानी की है, उतनी ही आवश्यकता आत्मा को ज्ञान की है। भोजन से शरीर संतुष्ट होता है, तो ज्ञान से आत्मा संतुष्ट होती है। ज्ञान और शिक्षा संस्कृत का शब्द है। सीख प्राकृत का शब्द है। किसके लिए सीखना, जीवन को संस्कारित करने के लिए सीखना। उक्त विचार जैन साध्वी गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने जैन छात्रावास ग्वालियर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किये।</p>
<p><strong>दो तरह के कार्य</strong></p>
<p>स्वस्तिधाम प्रणेत्री गुरुमां ने बताया कि कार्य दो तरह के होते हैं। एक कार्यक्रम हुआ, आनन्द लिया और समाप्त हो गया। दूसरा स्थायी रूप से लोगों को लाभ मिलना। आज समाज में बहुतायत संख्या में छोटी-बड़ी संस्थाएं हैं। जो सदैव कोई न कोई आयोजन करते रहते हैं। अच्छी बात है, करना भी चाहिए पर इसके साथ ही शिक्षा और संस्कारों पर भी ध्यान देना चाहिए। शिक्षा के बिना, ज्ञान के बिना, संस्कारों के बिना मानव जीवन व्यर्थ है। हम सभी को अपनी सुविधानुसार इस हेतु प्रयास करना चाहिए। यदि आप साधन सम्पन्न हैं, पढ़े-लिखे हैं तो फुर्सत के समय में किसी भी स्कूल या आश्रम में जाकर धार्मिक पुस्तकें वितरित कर सकते हैं। मन्दिर जी में जाकर वहां रखी पुस्तकों की सफाई आदि करके व्यवस्थित रख सकते हैं।</p>
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<p><strong>दो दिन का प्रवास</strong></p>
<p>परम पूज्य गुरुमां गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी इस समय ग्वालियर प्रवास पर हैं। आज वह चम्पाबाग जैन धर्मशाला से विहार करते हुए जैन छात्रावास पहुंची। वहां उन्होंने शिलान्यास समारोह में सान्निध्य प्रदान किया। अभी दो दिन पूज्य माताजी का प्रवास जैन छात्रावास में ही रहेगा।</p>
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