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	<title>Deeksha Day श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>विद्याभूषण सन्मतिसागर जी महाराज के दीक्षा दिवस 31 मार्च पर विशेष : बचपन से ही रहते थे दिगंबर साधुओं की चर्या में तत्पर </title>
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		<pubDate>Thu, 30 Mar 2023 14:09:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मध्यप्रदेश प्रांत के जिला मुरैना की तहसील अम्बाह के ग्राम बरबाई में दिगम्बर जैसवाल जैन समाज के श्रावक श्रेष्ठि श्रीमंत सेठ बाबूलाल जैन के घर श्रीमती सरोजदेवी की कुक्षी से अगहन बदी चतुर्थी 10 नवम्बर 1949 को एक बालक का जन्म हुआ था। यही बालक आगे विद्याभूषण सन्मतिसागर जी महाराज बना। उनके दीक्षा दिवस पर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मध्यप्रदेश प्रांत के जिला मुरैना की तहसील अम्बाह के ग्राम बरबाई में दिगम्बर जैसवाल जैन समाज के श्रावक श्रेष्ठि श्रीमंत सेठ बाबूलाल जैन के घर श्रीमती सरोजदेवी की कुक्षी से अगहन बदी चतुर्थी 10 नवम्बर 1949 को एक बालक का जन्म हुआ था। यही बालक आगे विद्याभूषण सन्मतिसागर जी महाराज बना। <span style="color: #ff0000;">उनके दीक्षा दिवस पर पढ़िए मनोज जैन नायक का यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> मध्यप्रदेश प्रांत के जिला मुरैना की तहसील अम्बाह के ग्राम बरबाई में दिगम्बर जैसवाल जैन समाज के श्रावक श्रेष्ठि श्रीमंत सेठ बाबूलाल जैन के घर श्रीमती सरोजदेवी की कुक्षी से अगहन बदी चतुर्थी 10 नवम्बर 1949 को एक बालक का जन्म हुआ था। बालक के जन्म के पश्चात पंडित जी ने जन्म कुंडली बनाकर बताया कि यह बालक कोई साधारण बालक नहीं है। आने वाले समय में यह बालक विश्व पटल पर देश, धर्म, समाज और कुल का नाम रोशन करेगा। नवजात बालक का नाम सुरेश रखा गया।</p>
<p>बचपन में बालक सुरेश का मन सांसारिक कार्यों में नहीं लगता था। वे देव शास्त्र गुरु की भक्ति में लीन रहते और दिगम्बर साधुओं की चर्या आहार-विहार में सदैव तत्पर रहते। कहते हैं कि पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं। वही बालक सुरेश के साथ हुआ। सुरेश जैन ने युवा अवस्था में कदम रखते ही संयम के मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प ले लिया।</p>
<p><strong>संघ में बनाया विशिष्ट स्थान</strong></p>
<p>आपने फाल्गुन शुक्ल तृतीया 17 फरवरी 1972 को मासोपवासी आचार्य श्री 108 सुमति सागर जी महाराज से तीर्थराज श्री सम्मेद शिखर जी में क्षुल्लक दीक्षा अंगीकार की और क्षुल्लक श्री 105 सन्मति सागर जी महाराज के नाम से पुकारे जाने लगे। क्षुल्लक अवस्था में ही आपने अपने ज्ञान के बल पर समस्त श्रमण संघों में एक विशिष्ट स्थान बनाया था। तप- त्याग-साधना के मार्ग पर अविरल बढ़ते हुए आपने जैन शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। जगह-जगह शिक्षण-प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से युवाओं में धर्म के प्रति लगाव पैदा किया। आपने जगह-जगह स्याद्वाद परिषद की स्थापना की। आपकी प्रेरणा एवं आशीर्वाद से अनेकों विद्यालयों, मंदिरों, औषधालयों एवं धर्मशालाओं का निर्माण हुआ।</p>
<p><strong>स्याद्वाद शिक्षण परिषद की स्थापना</strong></p>
<p>कहते हैं कि क्षुल्लक श्री सन्मति सागर को लंगोटी और दुपट्टा भी भार लगने लगा। भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक के पावन पर्व पर चैत्र शुक्ल त्रयोदशी 31 मार्च 1988 को सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी में आपने मसोपवासी आचार्य श्री सुमति सागर जी महाराज से जैनेश्वरी मुनि दीक्षा अंगीकार कर आत्म-कल्याण के मार्ग पर आरूढ़ हुए। दिगम्बर रूप में आपने दिगम्बर मुनि की चर्या, उनके मूलगुणों की साधना तथा उनके तपश्चर्या के विविध आयामों से जैन समाज को परिचित करवाया। आपने सोनागिर में स्याद्वाद शिक्षण परिषद की स्थापना की। विश्व के इतिहास में प्रथमवार 1994 में श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर जी में सिंहरथ चलबाकर सभी को आश्चर्यचकित कर एक अद्वितीय कीर्तिमान स्थापित किया।</p>
<p><strong>करते रहे सतत विहार</strong></p>
<p>आचार्य श्री 108 विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज का नाम श्रमण परंपरा के गौरवशाली इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से अंकित है। आपकी मुनिचर्या सदा आगमोक्त रही तथा तप व संयम की निरंतर साधना के फलस्वरूप आप राष्ट्र ऋषि के रूप में प्रख्यात हुए। आपके उपदेशों से अनेक आर्षमार्गानुयायी ग्रंथों का प्रकाशन हुआ। आपने अपने जीवन काल में समस्त भारत में व विशेषतः उत्तर भारत में सतत विहार करते हुए अद्वितीय धर्मप्रभावना संपन्न की। विश्व की प्रथम कृति त्रिलोक तीर्थ धाम (बड़ागांव ) का निर्माण आपकी विलक्षण सोच व प्रतिभा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। आपके संस्कारित प्रवचनों व संघ सञ्चालन कुशलता को परखते हुए गुरुवर आचार्य श्री 108 सुमति सागर जी महाराज ने आपको मुनि दीक्षा के साथ ही आचार्यकल्प के पद पर आसीन किया तथा दीक्षा के तुरन्तवाद 10 अप्रैल 1989 को चतुर्विध संघ की उपस्तिथि में नरवर (म.प्र.) में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के मध्य आचार्य पद से सुशोभित कर आपको प्रशममूर्ति आचार्य श्री 108 शान्तिसागर जी महाराज (छाणी) की परंपरा में पंचम पट्टाधीश के रूप में प्रतिष्ठित किया। आपके धर्मप्रेरक उपदेशों से प्रभावित होकर समाज ने अनेक विद्यालय, धर्मपाठशालायें, वाचनालय, साधना आश्रम तथा साहित्य प्रकाशक संस्थाओं की स्थापना की।</p>
<p><strong>कृतित्व था विशाल</strong></p>
<p>फाल्गुन शुक्ल तृतीया 14 मार्च 2013 को शकरपुर (दिल्ली) में आप समाधिपूर्वक मरण कर इस असार संसार को छोड़कर मोक्षगामी हो गए। पूज्य आचार्य का जितना विशाल एवं अगाध व्यक्तित्व था, उनका कृतित्व उससे भी अधिक विशाल था। आचार्य श्री के कर कमलों द्वारा अनेक भव्य जीवों ने जैनेश्वरी दीक्षा अंगीकार कर अपना जीवन धन्य किया, जिनमें वर्तमान में आचार्य श्री अतिवीर सागर जी, आचार्य गुलाबभूषण जी, एलाचार्य त्रिलोक भूषण जी, एलाचार्य प्रभावना भूषण जी, गणिनी आर्यिका मुक्तिभूषण जी, गणिनी आर्यिका लक्ष्मीभूषण जी, गणिनी आर्यिका सरस्वती भूषण जी, गणिनी आर्यिका सृष्टिभूषण जी, गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण जी, आर्यिका दृष्टि भूषण जी, आर्यिका अनुभूति भूषण जी, क्षुल्लक योग भूषण जी, क्षुल्लिका भक्ति भूषण जी, क्षुल्लिका पूजा भूषण जी आदि त्यागीवृन्द साधनारत हैं। इस गौरवशाली महान परम्परा में वर्तमान में सहस्त्राधिक दिगम्बर साधु समस्त भारतवर्ष में धर्मप्रभावना कर रहे हैं तथा भगवान महावीर के संदेशों को जनमानस तक पहुंचा रहे हैं। आज 31 मार्च को परम पूज्य गुरुदेव पंचम पट्टाचार्य विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज के दीक्षा दिवस पर गुरुदेव के चरणों में कोटि- कोटि नमन।</p>
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