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	<title>Dashlakshan Mahaparva &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Dashlakshan Mahaparva &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>तपस्या करने से होती कर्मों की निर्जरा : मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी ने समझाया तप का अर्थ </title>
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		<pubDate>Wed, 03 Sep 2025 14:22:50 +0000</pubDate>
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<p><strong>श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन बुधवार को उत्तम तप धर्म पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी ने कहा कि तप का अर्थ इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर शरीर, वाणी और मन को अनुशासित करते हुए आत्मा को शुद्ध करना है। <span style="color: #ff0000">महरौनी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>महरौनी।</strong> श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन बुधवार को उत्तम तप धर्म पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी ने कहा कि तप का अर्थ इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर शरीर, वाणी और मन को अनुशासित करते हुए आत्मा को शुद्ध करना है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति तपस्या करता है उसका मुख्य उद्देश्य आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की निर्जरा करना होता है। जिस प्रकार सोना आग में तपकर शुद्ध होता है, उसी प्रकार आत्मा तप की अग्नि में तपकर अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है। मुनि श्री ने बताया कि जैन दर्शन में वर्णित 12 प्रकार के तप, जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करने में सहायक हैं। इस अवसर पर मुनि श्री मेघदत्त सागर ने कहा कि इच्छा निरोधः तपः अर्थात इच्छाओं का निरोध ही तप कहलाता है लेकिन, जब तप सम्यक दर्शन और श्रद्धान के साथ किया जाता है, तब वह उत्तम तप बनता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि व्रत, उपवास, आत्म-ध्यान, स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य और अहिंसा का पालन, सत्य बोलना, समता भाव रखना और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शांत बने रहना ही वास्तविक तप है। यह तप भौतिक सुखों के लिए नहीं बल्कि संसार के दुखों से छुटकारा पाने का उपाय है, जो केवल दुर्लभ मनुष्य जन्म में ही संभव है। देव, नारक और तिर्यंच गति में इसकी साधना संभव नहीं है। प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और उत्तम तप धर्म के महत्व को आत्मसात किया।</p>
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		<title>संयम हमारे जीवन के रूपांतरण का आधार है : मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने उत्तम संयम धर्म की परत-दर परत व्याख्या की  </title>
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		<pubDate>Wed, 03 Sep 2025 11:10:20 +0000</pubDate>
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<p><strong>दशलक्षण महापर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने शिविरार्थियों से कहा कि संयम का संबंध केवल प्रवृत्ति और शालीनता से नहीं, बल्कि मनोवृत्ति के परिष्कार से है। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल।</strong> दशलक्षण महापर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने शिविरार्थियों से कहा कि संयम का संबंध केवल प्रवृत्ति और शालीनता से नहीं, बल्कि मनोवृत्ति के परिष्कार से है। उन्होंने कहा कि यदि इन दस दिनों में प्रत्येक साधक अपने भीतर के संयम को जगा लें तो जीवन भर उसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई देगा। संयम जीवन का रूपांतरण ही नहीं करता, बल्कि वह जीवन का सुरक्षा कवच और चेतना के निखार का मूल है। मुनि श्री ने भाव, विचार, वाणी और व्यवहार-इन चारों में संयम की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा-यदि भावों में शुद्धि, विचारों पर नियंत्रण, वाणी में लगाम और व्यवहार में संतुलन होगा तो हम संयम के मार्ग पर आगे बढ़ सकेंगे।</p>
<p><strong>भावनायोग मन तथा विचारों की शुद्धि का प्रमुख साधन</strong></p>
<p>मुनिश्री प्रमाणसागर जी ने बताया कि सामान्य व्यक्ति के मन में प्रतिदिन लगभग साठ हजार विचार आते हैं, जिनमें से उपयोगी विचार बहुत कम होते हैं। विचार मन से उत्पन्न होते हैं और भावनायोग मन तथा विचारों की शुद्धि का प्रमुख साधन है। मुनि श्री ने श्रोताओं को प्रेरित किया कि वे अपने विचारों के प्रहरी बनें और उन पर नियंत्रण रखें, क्योंकि भावों का अनुशासन ही भावों का संयम है।</p>
<p><strong>संयमी व्यक्ति इच्छाओं का गुलाम नहीं होता</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि संयम से आत्मबल का निर्माण होता है। संयमी व्यक्ति इच्छाओं का गुलाम नहीं होता, बल्कि उनका स्वामी बन जाता है। आज जब पूरी दुनिया भोगवाद की अंधी दौड़ में लगी हुई है, तब जैन धर्म का ष्उत्तम संयमष् जीवन को दिशा देने वाला प्रकाश स्तंभ है। इच्छाओं पर नियंत्रण ही सच्चे आत्मबल, शांति और आनंद की प्राप्ति का मार्ग है।</p>
<p><strong>सभी संयमियों का सम्मान किया </strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि उत्तम संयम दिवस पर उन सभी संयमियों का सम्मान किया गया। जिन्होंने पांच उपवास पूर्ण किए हैं। वहीं, सात और दस उपवास का संकल्प लेने वाले श्रद्धालुओं ने गुरुचरणों में श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।</p>
<p><strong>दशलक्षण विधान भक्ति भाव से हुआ</strong></p>
<p>प्रातः 5.30 बजे भावनायोग के पश्चात श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा हुई। इसके उपरांत नित्य नियम पूजन एवं पर्व पूजन के साथ दशलक्षण विधान भक्ति भाव से हुआ। इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर जी महाराज सहित समस्त क्षुल्लक मंचासीन रहे। संचालन बाल ब्र. अशोक भैया लिधौरा ने किया।</p>
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		<title>कलाकुंज जैन मंदिर में पोस्टर बनाओ प्रतियोगिता में बिखरे रंग: जीवन में सद्गुण अपनाने का संदेश भी दिया </title>
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		<pubDate>Wed, 03 Sep 2025 10:59:35 +0000</pubDate>
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<p><strong>कलाकुंज के श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व का छठवां दिन उत्तम संयम धर्म को सुगंध दशमी के रूप में मनाया गया। जहां उपस्थित भक्तों ने पंडित आदि जैन शास्त्री के निर्देशन में श्रीजी का पूजन कर उत्तम संयम धर्म का पालन किया। <span style="color: #ff0000">आगरा से पढ़िए, शुभम जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>आगरा।</strong> कलाकुंज के श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व का छठवां दिन उत्तम संयम धर्म को सुगंध दशमी के रूप में मनाया गया। जहां उपस्थित भक्तों ने पंडित आदि जैन शास्त्री के निर्देशन में श्रीजी का पूजन कर उत्तम संयम धर्म का पालन किया। इस अवसर पर दोपहर में वर्धमान युवा मंडल द्वारा पोस्टर बनाओ प्रतियोगिता का रंगारंग आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में बच्चों और युवाओं ने अपनी प्रतिभा का अद्भुत प्रदर्शन करते हुए धार्मिक मूल्यों, अहिंसा,सदाचार और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों को रचनात्मकता से प्रस्तुत किया। रंग-बिरंगे पोस्टर्स ने न केवल सभी का मन मोह लिया बल्कि दर्शकों को जीवन में सद्गुण अपनाने का संदेश भी दिया। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले प्रत्येक प्रतिभागी ने अपनी कल्पनाशीलता और समर्पण से माहौल को प्रेरणादायी बना दिया। मंदिर प्रांगण में श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने प्रतियोगिता की शोभा को और बढ़ा दिया।</p>
<p>आयोजन समिति ने विजेताओं को सम्मानित किया और बच्चों का उत्साहवर्धन किया।, रागिनी जैन, ज्योति जैन और आदि जैन शास्त्री ने प्रतियोगिताओं का परिणाम घोषित किया। इस अवसर पर राजीव जैन, अजय जैन मास्टर, मुकेश जैन, अजय जैन, आदित्य जैन, संयम जैन, दिव्यांशु जैन, रश्मि जैन, मंजरी जैन, ममता जैन, स्वीटी जैन, सभी कलाकुंज जैन समाज एवं वर्धमान युवा मंडल के सदस्य उपस्थित रहे।</p>
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		<title>मोक्ष प्राप्ति के लिए संयम पहली सीढ़ी: मुनिश्री गुरुदत्त सागरजी ने उत्तम संयम धर्म की महिमा का किया बखान  </title>
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<p><strong>महरौनी।</strong> श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के छठवें दिन मंगलवार को उत्तम संयम धर्म की महिमा पर धर्मसभा हुई। इस अवसर पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री गुरु दत्त सागरजी ने कहा कि संयम का अर्थ है अपने मन, इंद्रियों और इच्छाओं पर स्वैच्छिक रूप से नियंत्रण रखना तथा अनुशासित जीवन जीना। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति संयम का पालन करता है, वह मन, वचन और काय से अपनी गतिविधियों और मानसिक उत्तेजनाओं पर काबू रखता है। इंद्रियों के विषयों से ध्यान हटाकर आत्मा में स्थिरता लाने का पुरुषार्थ करता है। यही कारण है कि जैन दर्शन के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए संयम को पहली सीढ़ी माना गया है।</p>
<p><strong>संयम आत्मा का सहज गुण </strong></p>
<p>मुनि श्री मेघदत्त सागरजी ने कहा कि संयम आत्मा का सहज गुण है, जो आध्यात्मिक साधनाओं के लिए अनिवार्य है। संयम से व्यक्ति न केवल शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार गाड़ी में ब्रेक गति को नियंत्रित करता है, उसी प्रकार संयम भी सांसारिक जीवन को संतुलित और नियंत्रित करने में मदद करता है। शाम को मुनि श्री के सानिध्य एवं रश्मि मलैया के मार्गदर्शन में सीता की अग्नि परीक्षा नाटक का दो दिवसीय मंचन हुआ। जिसे श्रद्धालुओं ने खूब सराहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।</p>
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		<title>मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी ने कहा सत्य आत्मा की अभिव्यक्ति : उत्तम सत्य धर्म पर मुनियों का मिला मार्गदर्शन और ज्ञान   </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 16:08:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन सोमवार को उत्तम सत्य धर्म पर मुनिश्री गुरुदत्त सागर ने कहा कि सत्य का अर्थ है, हमेशा सच बोलना, सत्य के मार्ग पर चलना और ऐसे शब्दों से बचना जो दूसरों को ठेस पहुंचाएं। महरौनी। श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन सोमवार को उत्तम सत्य धर्म पर मुनिश्री गुरुदत्त सागर ने कहा कि सत्य का अर्थ है, हमेशा सच बोलना, सत्य के मार्ग पर चलना और ऐसे शब्दों से बचना जो दूसरों को ठेस पहुंचाएं।</strong></p>
<hr />
<p><strong>महरौनी।</strong> श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन सोमवार को उत्तम सत्य धर्म पर हुई धर्मसभा में मुनिश्री गुरुदत्त सागर ने श्रद्धालुओं से कहा कि सत्य का अर्थ है, हमेशा सच बोलना, सत्य के मार्ग पर चलना और ऐसे शब्दों से बचना जो दूसरों को ठेस पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि जो साधक अपनी वाणी पर संयम रखते हुए सत्य धर्म का पालन करता है, उसे न केवल मानसिक शांति और आनंद मिलता है, बल्कि उसे समाज और परलोक दोनों में ही राजा हरिश्चंद्र के समान सम्मान प्राप्त होता है। सत्यनिष्ठ व्यक्ति कभी दुखी नहीं होता, जबकि झूठ बोलने वाले की सदा निंदा होती है।</p>
<p><strong>सत्य केवल शब्द नहीं</strong></p>
<p>मुनिश्री मेघदत्त सागरजी ने कहा कि सत्य केवल शब्द नहीं है, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति है। सत्य में वह शक्ति है जो मन को शांत करता है, संबंधों को मजबूत करता है और आत्मा को ईश्वर के समीप लाता है। उन्होंने बताया कि हमें कठोर वचनों से बचना चाहिए और प्रिय एवं सत्य वचन बोलना चाहिए। पराई निंदा और असत्य से सदैव वचन बचना आवश्यक है, क्योंकि जब विचार, वाणी और कर्म में एकरूपता आती है, तभी वास्तविक सत्य धर्म का पालन होता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएँ उपस्थित रहे।</p>
<p><strong>उपस्थित प्रमुख जनों में यह थे</strong></p>
<p>इस अवसर पर कोमलचंद सिंघई, अनिल मिठया, प्रमोद सिंघई, प्रकाशचंद्र सिंघई, प्रसन्न कुमार सिंघई, ऋषभ कठरया, पवन मोदी, ऋषभ सिंघई, प्रदीप चौधरी, प्रशांत सिंघई, प्रवीण सिंघई, हेमंत सिंघई, जिनेश्वर बुखारिया, शिखरचंद मिठया, सुनील मोदी, प्रमोद चौधरी, अजित कठरया, पुष्पेंद्र चौधरी, आशीष मोदी, अक्षय खजांची, अभिनंदन सिंघई, पवन जैन (पार्षद), सत्येंद्र सिंघई, ऋषभ मैगुंवा, अभिषेक सिंघई, महेंद्र बाबा, शैलेंद्र गुढ़ा, आमोद चौधरी, राकेश सतभैया, नीलेश सराफ, आकरष बड़कुल, राजू कठरया, रमेश भायजी, अंकुर कठरया, नमन लौंडुआ, अर्पित बड़कुल, वीर मिठया, अनुपम सिंघई, सुनील सतभैया, अनिल लौंडुआ, शानू, अजय बड़कुल आदि शामिल रहे।</p>
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		<title>जो जैसा वैसा ही कहना, वास्तविकता को स्वीकारना सत्य धर्म: कलाकुंज जैन मंदिर में मनाया उत्तम सत्य धर्म </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 13:31:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मारुति स्टेट स्थित श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर कलाकुंज में दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन सोमवार को उत्तम सत्य धर्म बड़े ही हर्षाेल्लास से मनाया गया। मंदिर परिसर में प्रातःकाल श्रीजी के अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ दिन की शुरुआत हुई। आगरा से पढ़िए, शुभम जैन की यह खबर&#8230; आगरा। मारुति स्टेट स्थित श्री महावीर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मारुति स्टेट स्थित श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर कलाकुंज में दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन सोमवार को उत्तम सत्य धर्म बड़े ही हर्षाेल्लास से मनाया गया। मंदिर परिसर में प्रातःकाल श्रीजी के अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ दिन की शुरुआत हुई। <span style="color: #ff0000">आगरा से पढ़िए, शुभम जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>आगरा।</strong> मारुति स्टेट स्थित श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर कलाकुंज में दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन सोमवार को उत्तम सत्य धर्म बड़े ही हर्षाेल्लास से मनाया गया। मंदिर परिसर में प्रातःकाल श्रीजी के अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ दिन की शुरुआत हुई। पंडित आदि जैन शास्त्री के कुशल निर्देशन में उपस्थित भक्तों ने अष्ट द्रव्यों के साथ उत्तम सत्य धर्म का पालन करते हुए पूजन किया। पूजन के दौरान पंडित आदि जैन ने उत्तम सत्य धर्म पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जो जैसा है वैसा ही कहना वास्तविकता को स्वीकार करना, झूठ कपट या मिथ्यात्व से दूर रहकर आत्मा के कल्याण के लिए शुद्ध वाणी का प्रयोग करना ही सत्य धर्म का पालन है। इस अवसर पर स्वीटी जैन द्वारा अंताक्षरी प्रतियोगिता आयोजित की गई।</p>
<p>2 सितंबर को सुगंध दशमी के अवसर पर कलाकुंज जैन मंदिर में दोपहर 2 से वर्धमान युवा मंडल द्वारा पोस्टर बनाओ प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। ’इस मौके पर राजीव जैन, अजय जैन, मुकेश जैन अजय जैन मास्टर, आदित्य जैन भगत, संयम जैन, ऋषभ जैन, अंकित जैन, शुभम-जैन, राजा जैन, देवेंद्र जैन, दिव्यांशु जैन, रश्मि जैन, मंजरी जैन, ममता जैन, स्वीटी जैन, रतिभा जैन, चंचल जैन, समस्त कलाकुंज जैन समाज के लोग मौजूद रहे।</p>
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		<title>दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म मनाया: सनावद के संत निलय में भक्ति और आराधना की बही धारा  </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 10:51:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री दिगंबर जैन पार्श्वनाथ बड़ा जैन मंदिर एवं संत निलय में दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन सोमवार को उत्तम सत्य धर्म मनाया गया। जिसके तहत संत निलय में पंचामृत अभिषेक किया गया। मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज के मुखारविंद से शांतिधारा का उच्चारण किया गया। सनावद से पढ़िए, सन्मति जैन काका की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री दिगंबर जैन पार्श्वनाथ बड़ा जैन मंदिर एवं संत निलय में दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन सोमवार को उत्तम सत्य धर्म मनाया गया। जिसके तहत संत निलय में पंचामृत अभिषेक किया गया। मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज के मुखारविंद से शांतिधारा का उच्चारण किया गया। <span style="color: #ff0000">सनावद से पढ़िए, सन्मति जैन काका की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> श्री दिगंबर जैन पार्श्वनाथ बड़ा जैन मंदिर एवं संत निलय में दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन सोमवार को उत्तम सत्य धर्म मनाया गया। जिसके तहत संत निलय में पंचामृत अभिषेक किया गया। मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज के मुखारविंद से शांतिधारा का उच्चारण किया गया। शांतिधारा करने का सौभाग्य निमिष, नितिन मूलचंद जैन परिवार को मिला। उसके बाद सामूहिक पूजन, दशलक्षण धर्म पूजन ,उत्तम सत्य धर्म पूजन कर मनाया। मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने उत्तम सत्य धर्म के बारे में कहा कि जीवन में असत्य कभी नहीं बोलना चाहिए।</p>
<p>बल्कि जो सत्य है, उसे धारण करना चाहिए। गीता में भी कहा गया है कि जब सत्य की असत्य से लड़ाई होगी तो सत्य अकेला खड़ा होगा और असत्य की फौज लंबी होगी क्योंकि, असत्य के पीछे मूर्खों का झुंड होगा। वक्त के साथ चलना कोई जरूरी नहीं, सच के साथ चलिए। एक दिन वक्त आपके साथ चलेगा। एक असत्य शब्द नर को नारकीय बना सकता है। हमें जीवन में असत्य नहीं बोलना चाहिए क्योंकि, झूठे व्यक्ति का कोई मोल नहीं होता है। उस पर कोई विश्वास नहीं करता है।</p>
<p><strong>अहिंसा सत्य को सौंदर्य प्रदान करती है</strong></p>
<p>मुनि विश्व सूर्य सागर जी महाराज ने कहा कि अहिंसा सत्य को सौंदर्य प्रदान करती है और सत्य अहिंसा की सुरक्षा करता है। अहिंसा रहित सत्य कुरूप है और सत्य रहित अहिंसा क्षणस्थायी है। सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो। क्रोध, लोभ, भय और हँसी-मजाक आदि के कारण ही झूठ बोला जाता है। जहाँ न झूठ बोला जाता है, न ही झूठा व्यवहार किया जाता है वही लोकहित का साधक सत्यधर्म होता है। शाम को आचार्य भक्ति आरती भक्ति सभी समाजजनों के द्वारा की गई।</p>
<p><strong>प्रतिभागियों को पुरस्कार का किया वितरण </strong></p>
<p>एक दिन पूर्व मुनि श्री विश्वसुर्य सागर जी महाराज के द्वारा निरन्तर ज्ञान को अभिवृद्धि के लिए बड़े मंदिर जी में प्रतिदिन ज्ञानमयी क्लास छह ढाला, तत्वार्थ सूत्र की ली जा रही है। जिसके प्रथम भाग की परीक्षाएं ली गई थी। जिसके परिणाम मुनि श्री द्वारा बताए गए। जिसमें प्रतिभागियों को कुटुम्ब आश्रय समिति द्वारा पुरस्कार वितरित किए गए। अश्विनी चौधरी ने आभार माना।</p>
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		<title>लोभ की मुक्ति से मिलती है पवित्रता : मुनि गुरुदत्त सागर ने बताया उत्तम शौच धर्म का महत्व  </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 07:53:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन रविवार को उत्तम शौच धर्म पर धर्मसभा का आयोजन हुआ। आचार्य श्री निर्भयसागर महाराज के शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी एवं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी की ससंघ मंगलमय उपस्थिति में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया। महरौनी से पढ़िए, यह खबर&#8230; महरौनी। श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन रविवार को उत्तम शौच धर्म पर धर्मसभा का आयोजन हुआ। आचार्य श्री निर्भयसागर महाराज के शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी एवं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी की ससंघ मंगलमय उपस्थिति में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया। <span style="color: #ff0000">महरौनी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>महरौनी।</strong> श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन रविवार को उत्तम शौच धर्म पर धर्मसभा का आयोजन हुआ। आचार्य श्री निर्भयसागर महाराज के शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी एवं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी की ससंघ मंगलमय उपस्थिति में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी ने कहा कि “उत्तम शौच का दूसरा नाम शुचिता और पवित्रता है। यह लोभ और अत्यधिक इच्छाओं को नियंत्रित करने से प्राप्त होती है। व्यक्ति को अपने पास जो है, उसी में संतोष करना चाहिए। लोभ के वशीभूत होकर ही मनुष्य सभी प्रकार के पाप कर्म करता है और यही समस्त दुखों का मूल कारण है।</p>
<p>इसी कारण लोभ को ‘पाप का बाप’ कहा गया है। अतः हमें लोभ का त्याग कर आत्मा को शुद्ध एवं पवित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए।” वहीं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी ने प्रवचन में कहा कि उत्तम शौच धर्म का अर्थ है आत्मा में शुचिता, लोभ का अभाव और संतोष का भाव। उन्होंने कहा कि बाहरी वस्तुओं की लालसा छोड़कर, जो कुछ है उसमें संतुष्ट रहने से ही वास्तविक पवित्रता प्राप्त होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “केवल बाहरी स्नान करने से शरीर शुद्ध नहीं होता, बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए लोभ कषाय का अभाव आवश्यक है।” रात्रि में पुरुष एवं महिला वर्ग की ओर से धार्मिक अंताक्षरी प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने बड़ी रुचि ली। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहीं और दशलक्षण महापर्व की बेला को धर्ममय वातावरण में मनाया। पंडित सनिल के भजनों ने इस पर्व में समां बांध दिया।</p>
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		<title>छल-कपट के त्याग से आती है सरलता : मुनि श्री गुरूदत्त सागरजी ने धर्मसभा में आर्जव का अर्थ समझाया  </title>
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		<pubDate>Sat, 30 Aug 2025 18:17:57 +0000</pubDate>
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<p><strong>श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन शनिवार को धर्मसभा में मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी महाराज ने उत्तम आर्जव धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि आर्जव का अर्थ है- सरलता, सच्चाई और ईमानदारी। यह तभी संभव है जब व्यक्ति छल-कपट, मायाचारी और कुटिलता का त्याग करे। <span style="color: #ff0000">महरौनी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>महरौनी।</strong> श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन शनिवार को धर्मसभा में मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी महाराज ने उत्तम आर्जव धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि आर्जव का अर्थ है- सरलता, सच्चाई और ईमानदारी। यह तभी संभव है जब व्यक्ति छल-कपट, मायाचारी और कुटिलता का त्याग करे। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने दोषों या गलतियों को छिपाने के बजाय स्वीकार करना चाहिए। सभी प्राणियों के प्रति सरल और सच्चा व्यवहार करने से मन, वचन और काय की स्वच्छता आती है, जो आत्मशुद्धि और आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त करती है। मुनि श्री मेघ दत्त सागरजी ने कहा कि जीवन में किसी भी प्रकार का छल, धोखाधड़ी या ठगी का भाव नहीं रखना चाहिए।</p>
<p>धर्म हमें सरलता से जीने और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। मन में जो विचार हों, वही वाणी और कर्म में झलकने चाहिए। इससे व्यक्ति के जीवन में शांति और संतोष का अनुभव होता है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। इस मौके पर कोमल चंद सिंघई, अनिल मिठया, हेमंत सिंघई, प्रकाश चंद्र सिंघई, रिषभ सिंघई, प्रसन्न सिंघई, ऋषभ कठरया, पवन मोदी, प्रदीप चौधरी, प्रवीण सिंघई, जिनेश्वर बुखारिया, शिखर चंद मिठया, सुनील मोदी, प्रमोद चौधरी, अजित कठरया, आमोद चौधरी, आकरष बड़कुल, राकेश सतभैया, नीलेश सराफ, राजू कठरया, आकाश चौधरी, शानू बड़कुल, रमेश भायजी, अजय अंकुर सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।</p>
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		<title>मान और अहंकार के त्यागने से आती विनम्रता : मुनिश्री गुरु दत्त सागर ने उत्तम मार्दव पर प्रवचन दिए  </title>
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		<pubDate>Sat, 30 Aug 2025 05:09:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म पर धर्म सभा को मुनिश्री गुरुदत्त सागर जी ने संबोधित किया। सायंकाल मंदिर में पाठशाला के बच्चों द्वारा धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये जा रहे हैं। जिसमें बच्चों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इस मौके पर बड़ी संख्या में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म पर धर्म सभा को मुनिश्री गुरुदत्त सागर जी ने संबोधित किया। सायंकाल मंदिर में पाठशाला के बच्चों द्वारा धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये जा रहे हैं। जिसमें बच्चों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रावक एवं श्राविकाएं मौजूद थी। <span style="color: #ff0000">महरौनी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>महरौनी।</strong> श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री गुरुदत्त सागर ने कहा कि हमें किसी भी चीज पर अहंकार नहीं करना चाहिए क्योंकि, हमारे पास जो भी है जैसे धन-दौलत ,ज्ञान, कुल, शरीर ,रूप और संबंध आदि सभी वस्तुएं नश्वर है स्थाई नहीं है और जब मनुष्य को यह समझ आता है तो उसका अहंकार समाप्त हो जाता है और उस व्यक्ति में विनम्रता आ जाती है। यही भाव उत्तम मारदव धर्म कहलाता है।</p>
<p>मुनि श्री मेघ दत्त सागर जी ने कहा कि मनुष्य में नम्रता ,करुणा और उदारता का भाव ही उत्तम मारदव है जो घमंड को त्यागने और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता रखने से आता है और व्यक्ति को विनम्र एवं दयालु बनाता है। जिससे वह दूसरों के दुख को समझता है और उनकी मदद करता है और जहां विनम्रता नहीं है। वहां तीर्थ यात्रा, व्रत ,उपवास ,ध्यान आदि करना सब व्यर्थ है। सायंकाल मंदिर में पाठशाला के बच्चों द्वारा धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये जा रहे हैं। जिसमें बच्चों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रावक एवं श्राविकाएं मौजूद थी।</p>
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