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	<title>Chanderi &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Chanderi &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>विश्व शांति के लिए इस तरह के महायज्ञों से वातावरण शुद्ध होता है : मुनि श्री सुधासागरजी के सानिध्य में विश्व शांति महायज्ञ होगा, भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा होगी विराजमान  </title>
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		<pubDate>Wed, 18 Feb 2026 04:22:25 +0000</pubDate>
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<p><strong>जिले की सीमा पर स्थित खनियाधाना में मुनि श्रीसुधासागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य हो रहे श्री मद् जिनेंद्र पंच कल्याणक महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ में नगर के जैन समाज के प्रतिनिधि मंडल ने भाग लिया और मुनि श्री को श्रीफल भेंट किया। <span style="color: #ff0000">अशोकनगर से पढ़िए,राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अशोक नगर।</strong> जिले की सीमा पर स्थित खनियाधाना में मुनि श्रीसुधासागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य हो रहे श्री मद् जिनेन्द्र पंच कल्याणक महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ में नगर के जैन समाज के प्रतिनिधि मंडल ने भाग लिया और मुनि श्री को श्रीफल भेंट किया। इस दौरान विश्व शांति महायज्ञ में सवा करोड़ मंत्रों के साथ सौधर्म इंद्र इंसान सनत कुमार, महेंद्र इंद्र, कुबेर इंद्र महाज्ञय नायकों ने प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया सुयश के मंत्रोच्चार के बीच आहुतियां समर्पित की। जैन समाज के मंत्री विजय धुर्रा ने बताया कि पिछले सात दिनों से चल रहे श्री मद्जिनेंद्र पंच कल्याणक महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ गजरथ महोत्सव में हम सब भाग लेकर अपने पुण्य को बढ़ा रहे हैं। प्रतिष्ठा महोत्सव में हमारे ज़िले के बगला चौराहे पर नव निर्मित मंदिर में विशाल भगवान पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। जिसकी प्रतिष्ठा इस महोत्सव में हो रही है।</p>
<p>मंगलवार को अशोक नगर,मुंगावली, शाढ़ौरा, पिपरई, चंदेरी, ईसागढ़, कदवया सहित पूरे जिले से बड़ी संख्या में भक्त आए हैं और सभी इस विश्व शांति महायज्ञ में अपनी भक्ति समर्पित कर रहे हैं।</p>
<p><strong>यह समाजजन मौजूद रहे</strong></p>
<p>इस दौरान जैन समाज के महामंत्री राकेश अमरोद, विपिन सिंघई, शैलेंद्र दद्दा, हेमंत टडैया, मनोज लल्ला, सौरव बांझल, सुनील मामा जैन, युवा वर्ग से सचिन एनएस, रीनू जैन, राहुल खजूरिया, शालू, भारत, आलोक रानीपुर, गोलू बांझल, मोनू जैन सीमेंट, ओपी धुर्रा, अनिल जैन, विनोद विजयपुरा, सहित अन्य भक्त विशेष रूप से उपस्थित थे।</p>
<p><strong>मुंगावली सेवादल ने किया दिव्य घोष </strong></p>
<p>जिले का सबसे पुराना सेवादल श्री दिगंबर जैन वीर सेवादल का दिव्य घोष सभी के आकर्षण का केंद्र बना था। मुंगावली सेवादल को गजरथ के आगे एवं मुनि श्री सुधासागरजी महाराज के समक्ष भी वादन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस दौरान सेवादल के चंद्रकुमार मोदी, अरविंद जैन मक्कू, अशोक सर्राफ, काली मोदी, मुकेश जैन सहित पूरे दल ने बैंड बजाते हुए तीन परिक्रमा करते हुए जयघोष किया।</p>
<p><strong> श्रोता वक्ता के अनुभव सुन अपने जीवन में उतारना चाहते हैं</strong></p>
<p>इस अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री सुधासागरजी महाराज ने कहा कि विश्वशांति महायज्ञ में जो मंत्रों के साथ आहुतियां समर्पित की जाती है। इससे वातावरण शुद्ध तो होता ही है पर्यावरण को सभी तरह से स्वच्छ बनाना हम सभी का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि प्रथम तो वक्त के समाने बैठकर उसके अनुभव सुनना चाहत हैं। उसके ज्ञान को मापना चाहते हैं। सुनने की शक्ति तो सभी में है। बोलने की शक्ति सभी के पास नहीं होती है। यदि हमसे कुछ थोड़ा अधिक है तो वह जानना चाहते हैं कि इसमें ये विशेषता कहां से आई? समवशरण कि विशेषता है कि यदि किसी को जिज्ञासा हुई तो उसका समाधान तत्काल होता है। भगवान महावीर स्वामी की दिव्य ध्वनि 66 दिनों तक नहीं खिरी। किसी के मन में कोई प्रश्न ही नहीं उठा तो समस्या का समाधान तो अपने आप हो जाता है। भगवान का नाम लेते ही सब समस्याओ का समाधान होते चला जाता है।</p>
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		<title>चंदेरी का जौहर स्त्री चेतना, मातृत्व और स्वाधीनता का इतिहास : एक रचनात्मक साहित्यकार की भाषा में एक अकादमिक अध्ययन </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_jauhar_of_chanderi_is_a_history_of_female_consciousness_motherhood_and_independence/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Jan 2026 11:48:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[29 जनवरी इतिहास के पन्नों में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जा सकता। उन्हें समझने के लिए मनुष्य को अपनी संवेदना, नैतिकता और विवेक तीनों को एक साथ जाग्रत करना पड़ता है। चंदेरी का जौहर ऐसी ही एक घटना है। चंदेरी से पढ़िए, जयेंद्र जैन निप्पू का आलेख&#8230;. चंदेरी। 29 जनवरी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>29 जनवरी इतिहास के पन्नों में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जा सकता। उन्हें समझने के लिए मनुष्य को अपनी संवेदना, नैतिकता और विवेक तीनों को एक साथ जाग्रत करना पड़ता है। चंदेरी का जौहर ऐसी ही एक घटना है। <span style="color: #ff0000">चंदेरी से पढ़िए, जयेंद्र जैन निप्पू का आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चंदेरी।</strong> 29 जनवरी इतिहास के पन्नों में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जा सकता। उन्हें समझने के लिए मनुष्य को अपनी संवेदना, नैतिकता और विवेक तीनों को एक साथ जाग्रत करना पड़ता है। चंदेरी का जौहर ऐसी ही एक घटना है। यह केवल युद्धोत्तर आत्मोत्सर्ग की कथा नहीं, बल्कि स्त्री चेतना, मातृत्व और स्वाधीनता के बीच हुए उस अंतिम निर्णय का दस्तावेज़ है, जहां जीवन से अधिक मूल्य आत्म सम्मान को दिया गया।</p>
<p><strong>चंदेरी: ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि</strong></p>
<p>मालवा अंचल की दुर्गनगरी चंदेरी अपने सामरिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण मध्यकाल में निरंतर आक्रमणों का लक्ष्य रही। जब मुग़ल आक्रमण के समय यह स्पष्ट हो गया कि किले का पतन अवश्यंभावी है तब पराजय केवल सैनिक हार नहीं रह गई। वह सामाजिक, सांस्कृतिक और भावी पीढ़ियों की स्वतंत्रता पर संकट बन गई।</p>
<p><strong>जौहर: अवधारणा और विवेचन</strong></p>
<p>जौहर को केवल आत्महत्या कहना ऐतिहासिक अन्याय होगा। यह एक सामूहिक, सामाजिक और वैचारिक निर्णय था जो पराजय के बाद के जीवन की भयावह संभावनाओं को समझकर लिया गया। जौहर मृत्यु की कामना नहीं, बल्कि दासता के अस्वीकार का नाम था। मातृत्व का सबसे कठोर निर्णय स्वयं के विवेक से उपजा था। वे नहीं चाहती थीं कि उनका बच्चा अधीनता में पलें। उनकी आत्मा पराधीनता को जीवन का स्वभाव माने। मेरी दृष्टि से यह दृश्य केवल वीरता नहीं, बल्कि समाज पर लगाया गया एक मौन अभियोग है। जिस व्यवस्था में माँ को यह मातृत्व का सबसे कठिन निर्णय लेना पड़ा। लोक परंपराओं और क्षेत्रीय स्मृतियों के अनुसार चंदेरी के जौहर का सबसे करुण अध्याय वह है, जहाँ स्त्रियों ने अपने छोटे-छोटे बच्चों को स्वयं तलवार से मारकर मृत्यु दी। यह कृत्य क्रूरता से नहीं, बल्कि अत्यंत कठोर विवेक से उपजा था। वे नहीं चाहती थीं कि उनके पुत्र मुग़ल सत्ता की गुलामी में पलें, उनकी आत्मा पराधीनता को जीवन का स्वभाव माने। प्रेमचंदीय दृष्टि से यह दृश्य केवल वीरता नहीं, बल्कि समाज पर लगाया गया एक मौन अभियोग है। जिस व्यवस्था में माँ को यह चुनना पड़े कि उसका पुत्र जीवित रहकर दास बने या मरकर स्वतंत्र रहे। वह व्यवस्था पहले ही नैतिक रूप से पराजित हो चुकी होती है।</p>
<p><strong>सोलह हजार वीरांगनाएं और सोलह श्रृंगार</strong></p>
<p>लोक स्मृति में वर्णित है कि लगभग सोलह हजार वीरांगनाओं ने जौहर से पूर्व सोलह श्रंगार किया। मेहंदी रचाई गई कि कुमकुम लगाया गया। आभूषण धारण किए गए और सुहाग के गीत गाए गए। यह दृश्य मृत्यु का उत्सव नहीं था, बल्कि जीवन का अंतिम, सचेत उत्सव था। सोलह शृंगार यहाँ सौंदर्य का नहीं, बल्कि यह घोषणा था कि वे स्वयं को पराजित नहीं मानतीं। वे मृत्यु को विधवापन के रूप में नहीं, बल्कि अखंड सुहाग के रूप में स्वीकार कर रही थीं।</p>
<p><strong>सुहाग की चिता और जौहर का विधान</strong></p>
<p>इन विरांगनाओं ने सुहाग की चिता सजाकर मृत्यु का वरण किया। जिन प्रतीकों को समाज जीवन, विवाह और सौभाग्य से जोड़ता है-उन्हीं प्रतीकों के साथ उन्होंने अग्नि में प्रवेश किया। यहाँ अग्नि दंड नहीं थी, वह शरण थी। यहाँ शृंगार प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रतिरोध था। सुहाग की चिता का अर्थ यह था कि उनका सौभाग्य किसी विजेता की कृपा पर निर्भर नहीं है। वे यह घोषित कर रही थीं कि जीवन यदि पराधीन हो तो मृत्यु भी स्वीकार्य है पर आत्मा का दासत्व नहीं।</p>
<p><strong>साका-पुरुषों का अंतिम युद्ध</strong></p>
<p>जौहर के पश्चात पुरुषों ने साका किया। यह युद्ध विजय के लिए नहीं, बल्कि मर्यादा की रक्षा के लिए था। वे जानते थे कि लौटना नहीं है, पर मरना कायर की तरह भी नहीं है।</p>
<p><strong>लोकस्मृति और ऐतिहासिक चेतना</strong></p>
<p>चन्देरी का जौहर आज भी लोकगीतों, कथाओं और स्मृतियों में जीवित है। यह वह इतिहास है, जिसे शिलालेखों से अधिक लोगों की स्मृति ने संजोया है। यहां की स्त्रियां आज भी उन विरांगनाओं को केवल ऐतिहासिक पात्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आदर्श मानती हैं।</p>
<p><strong>मेरी समालोचना</strong></p>
<p>में इस जौहर गाथा को लिखकर इसे केवल महिमा-मंडित नहीं कर रहा और नहीं अपने को श्रेष्ठ लेखक सिद्ध करने की कुचेष्टा बल्कि एक प्रश्न का उत्तर स्वयं से खोज रहा हूं? क्या समाज ने स्त्री को कभी इतना सुरक्षित बनाया कि उसे अग्नि को चुनना न पड़े? इस अर्थ में चन्देरी का जौहर गर्व का विषय भी है और एक गहरी सामाजिक विफलता का प्रमाण भी।</p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p>चंदेरी का जौहर केवल इतिहास नहीं, चेतावनी है। यह बताता है कि जब समाज अपनी स्त्रियों और अपनी संतानों की रक्षा नहीं कर पाता, तब वे स्वयं इतिहास का सबसे कठोर निर्णय लेती हैं। यह घटना हमें विवश करती है कि हम जौहर को केवल वीरगाथा नहीं, बल्कि स्त्री-चेतना, मातृत्व और स्वाधीनता के चरम संघर्ष के रूप में समझेंकृऔर ऐसा समाज रचें, जहाँ किसी को सुहाग की चिता सजाने की आवश्यकता न पड़े।</p>
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		<title>विंध्याचल की गोद में सजेगा महामहोत्सव : भियादांत अतिशय क्षेत्र में 12 मार्च को होगा भव्य महा मस्तकाभिषेक </title>
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		<pubDate>Sun, 21 Dec 2025 15:22:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की गोद में स्थित प्राचीन भियादांत अतिशय क्षेत्र में आगामी 12 मार्च 2026, गुरुवार (चैत्र कृष्ण नवमी) को भव्य भियादांत महामहोत्सव- 2026 का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर श्रद्धा, भक्ति और आस्था से ओतप्रोत वातावरण में 1008 सिद्ध मंत्रों के उच्चारण के साथ महा मस्तकाभिषेक संपन्न होगा। पढ़िए राजीव सिंघई की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की गोद में स्थित प्राचीन भियादांत अतिशय क्षेत्र में आगामी 12 मार्च 2026, गुरुवार (चैत्र कृष्ण नवमी) को भव्य भियादांत महामहोत्सव- 2026 का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर श्रद्धा, भक्ति और आस्था से ओतप्रोत वातावरण में 1008 सिद्ध मंत्रों के उच्चारण के साथ महा मस्तकाभिषेक संपन्न होगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चन्देरी (अशोकनगर)</strong>। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की गोद में स्थित प्राचीन भियादांत अतिशय क्षेत्र में आगामी 12 मार्च 2026, गुरुवार (चैत्र कृष्ण नवमी) को भव्य भियादांत महामहोत्सव- 2026 का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर श्रद्धा, भक्ति और आस्था से ओतप्रोत वातावरण में 1008 सिद्ध मंत्रों के उच्चारण के साथ महा मस्तकाभिषेक संपन्न होगा।</p>
<p><strong>विशिष्ट और दुर्लभ प्रतिमा</strong></p>
<p>अतिशय क्षेत्र में शैलाखंड पर उकेरी गई 108 इंच ऊँची भगवान आदिनाथ जी की दिव्य प्रतिमा अपनी विशिष्ट और दुर्लभ केश-विन्यास शैली के कारण जैन शिल्पकला की अनुपम कृति मानी जाती है। यह प्रतिमा महा-अतिशयकारी के रूप में विख्यात है, जहां दर्शन और वंदन से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएँ पूर्ण होने की लोक-मान्यता है।</p>
<p><strong>प्राकृतिक और आध्यात्मिक वातावरण</strong></p>
<p>प्रकृति की गोद में, हरित विंध्याचल पर्वतमाला के मध्य उर्वशी ऊर नदी के पावन तट पर स्थित यह तीर्थ शांत, सात्त्विक और आध्यात्मिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। आयोजन समिति के अनुसार यह महामहोत्सव आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य एवं आचार्य श्री 108 समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती मुनि श्री 108 अविचल सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में तथा भगवान आदिनाथ के जन्म कल्याणक महोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित किया जा रहा है।</p>
<p><strong>महामहोत्सव का विधान</strong></p>
<p>महामहोत्सव के अंतर्गत स्वर्ण, रजत, पंचरत्न, तीर्थंकर और बड़े बाबा सहित विभिन्न कलशों से अभिषेक का विधान संपन्न होगा। आयोजन समिति ने बताया कि इस आयोजन से प्राप्त समस्त राशि का उपयोग पूर्ण पारदर्शिता के साथ अतिशय क्षेत्र के विकास, निर्माण कार्य, सौंदर्यीकरण और स्थायी तीर्थ सुविधाओं के विस्तार में किया जाएगा।</p>
<p><strong>श्रद्धालुओं और अतिथियों के लिए व्यवस्थाएँ</strong></p>
<p>महामहोत्सव के दौरान पधारने वाले साधु-संतों, विशिष्ट अतिथियों और देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आवास, भोजन, यातायात और अन्य मूलभूत व्यवस्थाएँ सुनिश्चित की जाएंगी। आयोजन को लेकर क्षेत्र में उत्साह का माहौल है और तैयारियाँ प्रारंभ कर दी गई हैं।</p>
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		<title>समाज को तनाव में डालने वाली प्रतिक्रिया से बचें : जैन समाज और जैन धर्म की सुरक्षा ही हमारा कर्तव्य  </title>
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		<pubDate>Fri, 22 Aug 2025 14:07:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[किसी भी चैनल या सोशल मीडिया के माध्यम से कोई प्रतिक्रिया न दें और इस अनिष्टकारी विवाद को यहीं समाप्त कर निकट आ रहे सबसे बडे पर्व यानि पर्वराज पर्यूषण की तैयारियों में जुट जाएं एवं आत्म कल्याण एवं जनकल्याण के निमित्त कार्य करते हुए अपने जीवन को सफल बनाएं। चंदेरी से पढ़िए, अमित जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>किसी भी चैनल या सोशल मीडिया के माध्यम से कोई प्रतिक्रिया न दें और इस अनिष्टकारी विवाद को यहीं समाप्त कर निकट आ रहे सबसे बडे पर्व यानि पर्वराज पर्यूषण की तैयारियों में जुट जाएं एवं आत्म कल्याण एवं जनकल्याण के निमित्त कार्य करते हुए अपने जीवन को सफल बनाएं। <span style="color: #ff0000">चंदेरी से पढ़िए, अमित जैन एडवोकेट की यह समाजोपयोगी अपील&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चंदेरी।</strong> कुछ दिनों से मन बहुत व्यथित है सोचा कि मन की व्यथा समस्त मुनि संघ, समस्त आर्यिका संघ एवं समस्त समाज जनों तक पहुंचाई जाए। जैसा कि आप सभी लोगों को विदित है कि कुछ दिनों पहले एक समाज जन बुजुर्ग ने अशोकनगर में निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के समक्ष एक जिज्ञासा रखी। जिसको लेकर पूरे भारत वर्ष के जैन समाज में तनाव तथा बिखराव की स्थिति उत्पन्न हो गई। समाज जनों से विनम्रता पूर्वक एक आग्रह एक निवेदन करना चाहता हूं कि इस तरह की जिज्ञासाएं या मन के भाव सार्वजनिक मंचों से उद्घोषित न करें और समाज के जिम्मेदार व्यक्तियों से भी आग्रह और निवेदन है कि इस तरह की जिज्ञासाओं को जिनसे समाज में तनाव और बिखराव की स्थिति उत्पन्न होने की संभावना है, प्रचारित या प्रसारित न करें और न ही किसी अन्य को करने दें। अगर किसी वजह से इस तरह की जिज्ञासाएं या किसी के मन के भाव सोशल मीडिया पर प्रचारित या प्रसारित हो भी जाएं तो धर्म को बचाने के लिए और समाज में सामंजस्यता बनाए रखने के लिए समाजजन, मुनिसंघ, एवं समस्त आर्यिका संघ सार्वजनिक मंचों से ऐसी जिज्ञासा और किसी के मन के भावों के प्रति प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ भी गलत या अशिष्ट भाषा का उपयोग न करे क्योंकि, वैसे ही जैन धर्म और जैन समाज इस दुनिया में बहुत कम है।</p>
<p>अगर मुनिसंघ, आर्यिका संघ एवं समस्त जैन-जैनेत्तर समाज इसी तरह से सार्वजनिक मंचों एवं सोशल मीडिया के माध्यम से प्रतिक्रिया स्वरूप अशिष्ट भाषा का उपयोग करते रहेंगे तो समाज में तनाव तथा बिखराव की स्थिति उत्पन्न होती रहेगी। अतः धर्म और समाज से जुडे होने के नाते धर्म को चिरकाल तक इस दुनिया में बचाए रखने के लिए समस्त मुनिसंघों, समस्त आर्यिका संघों एवं समस्त समाज जनों से विनम्रता पूर्वक आग्रह एवं निवेदन करता हूं कि किसी भी चैनल या सोशल मीडिया के माध्यम से कोई प्रतिक्रिया न दें और इस अनिष्टकारी विवाद को यहीं समाप्त कर निकट आ रहे सबसे बडे पर्व यानि पर्वराज पर्यूषण की तैयारियों में जुट जाएं एवं आत्म कल्याण एवं जनकल्याण के निमित्त कार्य करते हुए अपने जीवन को सफल बनाएं। मेरे शब्दों से या मेरी बातों से किसी के दिल को ठेस लगी हो, या किसी का दिल दुखी हुआ हो तो मैं आप सभी करबद्ध होकर क्षमा याचना करता हूं।</p>
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		<title>बुंदेलखंड तीर्थ वंदना के साथ होगा एपीपीएस का राष्ट्रीय अधिवेशन : 16 को तीर्थ वंदना, 17 को होगा गोलाकोट में अधिवेशन </title>
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		<pubDate>Tue, 12 Aug 2025 12:17:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अविवाहित प्रतिभाएं प्रस्तुति समूह (एपीपीएस) का तृतीय राष्ट्रीय अधिवेशन 16-17 अगस्त को बुंदेलखंड तीर्थ वंदना के साथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र गोलाकोट में आयोजित होगा। पढ़िए मनोज जैन की खास रिपोर्ट… अविवाहित प्रतिभाएं प्रस्तुति समूह का तृतीय राष्ट्रीय अधिवेशन इस वर्ष धार्मिक और सामाजिक संगम का अद्भुत उदाहरण बनने जा रहा है। एपीपीएस के राष्ट्रीय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अविवाहित प्रतिभाएं प्रस्तुति समूह (एपीपीएस) का तृतीय राष्ट्रीय अधिवेशन 16-17 अगस्त को बुंदेलखंड तीर्थ वंदना के साथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र गोलाकोट में आयोजित होगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन की खास रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>अविवाहित प्रतिभाएं प्रस्तुति समूह का तृतीय राष्ट्रीय अधिवेशन इस वर्ष धार्मिक और सामाजिक संगम का अद्भुत उदाहरण बनने जा रहा है। एपीपीएस के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी मनोज जैन नायक ने बताया कि 16-17 अगस्त को यह आयोजन बुंदेलखंड तीर्थ वंदना के साथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र गोलाकोट (खनियांधाना) में होगा। इस अधिवेशन में संपूर्ण भारतवर्ष से 250 से अधिक क्षेत्रीय संयोजकों की उपस्थिति संभावित है, जिसमें पुरुषों के साथ महिलाओं की भागीदारी पर विशेष ध्यान दिया गया है। पहले दिन शनिवार 16 अगस्त को सभी प्रतिनिधि ललितपुर स्थित श्री क्षेत्रपाल जैन मंदिर में एकत्र होकर पूजन अर्चना करेंगे। इसके बाद बुंदेलखंड जैन तीर्थ यात्रा प्रारंभ होगी, जिसमें श्रीसैरोंनजी, चंदेरी, खंदारगिरी, थूवोनजी, अशोकनगर और पचराई जैसे ऐतिहासिक व आध्यात्मिक स्थलों के दर्शन होंगे। अशोकनगर में प्रतिनिधिगण चातुर्मासरत मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के दर्शन व आशीर्वाद प्राप्त करेंगे तथा ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में भाग लेकर अपने प्रश्नों का समाधान पाएंगे। रात्रि विश्राम गोलाकोट में होगा।</p>
<p><strong>पूजन और विधान के बाद राष्ट्रीय अधिवेशन का होगा शुभारंभ </strong></p>
<p>दूसरे दिन रविवार 17 अगस्त की सुबह गोलाकोट में जिनेंद्र प्रभु के अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और विधान के बाद राष्ट्रीय अधिवेशन का शुभारंभ होगा। इसमें अविवाहित युवाओं के सगाई संबंधों को प्रोत्साहित करने, अखिल भारतीय परिचय पुस्तिका के नए संस्करण के प्रकाशन और जैन परिचय एप के सुधार पर विस्तृत चर्चा होगी। सभी प्रतिनिधियों के आवास, भोजन, परिवहन आदि की संपूर्ण व्यवस्थाएं पहले से सुनिश्चित की गई हैं। समापन समारोह में उत्कृष्ट कार्य करने वाले प्रतिनिधियों को सम्मानित किया जाएगा। आयोजन समिति ने प्रत्येक कार्य के लिए अलग-अलग टीमों को जिम्मेदारी सौंपी है, ताकि किसी भी प्रतिनिधि को कोई असुविधा न हो।</p>
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		<title>अद्भुत है भियादान्त, जानिए इस तीर्थ की सुंदरता के बारे में: अनजाने जैन तीर्थ स्थलों के विकास के लिए आगे आएं समाजजन </title>
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		<pubDate>Mon, 06 Mar 2023 12:15:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चंदेरी में चौबीसी मंदिर में स्थित एक बोर्ड पर निकटवर्ती जैन तीर्थ के नाम लिखे गए हैं, जिनकी कोई विशेष पहचान नही है। यह क्षेत्र वीरान हैं, घने वन में हैं, जाने के कोई मार्ग नहीं है। वहां कोई नहीं जाता है। आज हम इन्ही में से एक जैन गुफा मंदिर, भियादान्त (भीमसेन केव जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चंदेरी में चौबीसी मंदिर में स्थित एक बोर्ड पर निकटवर्ती जैन तीर्थ के नाम लिखे गए हैं, जिनकी कोई विशेष पहचान नही है। यह क्षेत्र वीरान हैं, घने वन में हैं, जाने के कोई मार्ग नहीं है। वहां कोई नहीं जाता है। आज हम इन्ही में से एक जैन गुफा मंदिर, भियादान्त (भीमसेन केव जैन मंदिर) के बारे में जानेंगे। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>चंदेरी।</strong> मध्यप्रदेश में चंदेरी से केवल 24 किमी दूर उर्वशी नदी के तट पर एक जैन गुफा है, जहां भगवान आदिनाथ जी की विशालकाय प्रतिमा पहाड़ पर ही उकेरी गई है। चंदेरी में चौबीसी मंदिर में स्थित एक बोर्ड पर निकटवर्ती जैन तीर्थ के नाम लिखे गए हैं, जिनकी कोई विशेष पहचान नही है, जैसे की ममोन, भियादान्त, आमनचार, गुरिल्ला पहाड़, बिठला बूढ़ी चंदेरी आदि । इन तीर्थ के बारे में पता करने पर जानकारी मिली कि यह क्षेत्र वीरान हैं, घने वन में हैं, जाने के कोई मार्ग नहीं है। इन स्थानों पर कुछ प्राचीन जैन अवशेष हैं लेकिन उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं है। वहां कोई नहीं जाता है। आज हम इन्ही में से एक जैन गुफा मंदिर, भियादान्त (भीमसेन केव जैन मंदिर) के बारे में जानेंगे ।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39434" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/WhatsApp-Image-2023-03-06-at-4.32.04-PM.jpeg" alt="" width="706" height="935" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/WhatsApp-Image-2023-03-06-at-4.32.04-PM.jpeg 706w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/WhatsApp-Image-2023-03-06-at-4.32.04-PM-227x300.jpeg 227w" sizes="(max-width: 706px) 100vw, 706px" /><br />
इस क्षेत्र के बारे में सरकारी पुरातत्व विभाग के पास पर्याप्त जानकारी है। यहां के आसपास जितनी भी जैन प्रतिमाएं प्राप्त होती हैं, वह चंदेरी संग्रहालय में लाई जाती रही हैं जिनमे लगभग सभी प्रतिमाएं हजारों वर्ष पुरानी हैं। आज से लगभग 163 वर्ष पूर्व कुछ अंग्रेज यहां पहुंचे थे, जिसका जिक्र व फोटो इत्यादि 1860 ईसवी में उनकी लिखी एक पुस्तक में मिलता है, जिनसे एक दो स्थानो के बारे में ये पता चलता था कि वहां सबसे खास क्या है &#8211; जैसे कि भीमकाय जैन तीर्थंकर प्रतिमा इत्यादि । इसके कारण ही इन गुफाओं को भीमसेन गुफा कहा जाने लगा ।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-39435" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/WhatsApp-Image-2023-03-06-at-4.32.05-PM.jpeg" alt="" width="706" height="936" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/WhatsApp-Image-2023-03-06-at-4.32.05-PM.jpeg 706w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/WhatsApp-Image-2023-03-06-at-4.32.05-PM-226x300.jpeg 226w" sizes="(max-width: 706px) 100vw, 706px" /></p>
<p>मध्यप्रदेश की सरकारी वेबसाइट पर इस जगह का नाम भीमसेन से संबोधित किया गया है। तथ्यों से पता चलता है कि भीमसेन गुफा और भियादान्त दोनों एक ही स्थान है । इस लेख के साथ आप यहां की अद्भुत प्रतिमा जी के दर्शन व इस स्थान की सुंदरता और अद्वितीयता को महसूस कर सकते हैं। चूंकि यह स्थान तीर्थ क्षेत्र थूबोन जी, चंदेरी और, खंदारगिरी से बिल्कुल नजदीक है, अतः इन तीर्थ कमेटियों को भियादान्त स्थान के विकास के लिए अवश्य आगे आना चाहिए। यहां पहुंचने के लिए 8 किमी कच्चा मार्ग है, जिसे व्यवस्थित करके जैन समाज व तीर्थ यात्रियों को इस तीर्थ से जोड़ा जा सकता है। अभी इस स्थान पर ठहरने व भोजन आदि, किसी भी प्रकार की कोई व्यवस्था नही है । यहां सिर्फ अपने वाहन से पहुंचा जा सकता है । एक बार इस पावन अतिशय तीर्थक्षेत्र के दर्शन अवश्य करें।</p>
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