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	<title>Chaitra Krishna Navami &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जैन युग प्रवर्तक प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 12 मार्च को : तिथि के अनुसार चैत्र कृष्ण नवमी को मनाया जाएगा </title>
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		<pubDate>Wed, 11 Mar 2026 08:11:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म में युग प्रवर्तक के रूप में पूज्य और आराध्य प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 12 मार्च को समूचे विश्व में दिगंबर जैन मंदिरों में असीम भक्ति, पूर्ण श्रद्धा, अनुपम आस्था के साथ मनाया जाएगा। श्रीफल न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म में युग प्रवर्तक के रूप में पूज्य और आराध्य प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 12 मार्च को समूचे विश्व में दिगंबर जैन मंदिरों में असीम भक्ति, पूर्ण श्रद्धा, अनुपम आस्था के साथ मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">श्रीफल न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म में युग प्रवर्तक के रूप में पूज्य और आराध्य प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 12 मार्च को समूचे विश्व में दिगंबर जैन मंदिरों में असीम भक्ति, पूर्ण श्रद्धा, अनुपम आस्था के साथ मनाया जाएगा। इंदौर सहित देश के हर शहर, कस्बे, नगर में विशेष पूजन और अर्चना का दौर रहेगा। जैन धर्म के विशिष्ट ग्रंथों और शाश्वत इतिहास में प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) का व्यक्तित्व एक युग प्रवर्तक का है। वे केवल एक धर्मगुरु नहीं, बल्कि सभ्यता के शिल्पकार थे। जिन्होंने मानव जाति को &#8216;असि, मसि और कृषि&#8217; का पाठ पढ़ाया। यहाँ उनके जन्म (च्यवन-जन्म) और तप कल्याणक पर आधारित एक विस्तृत और भावपूर्ण कथा के अनुसार हजारों वर्ष पूर्व, जब यह युग (अवसर्पिणी काल) अपने शैशव काल में था और कल्पवृक्षों का प्रभाव समाप्त हो रहा था, तब अयोध्या के राजा नाभिराय और माता मरुदेवी के आँगन में एक अलौकिक घटना घटी।</p>
<p><strong>16 स्वप्न और देवों का आगमन</strong></p>
<p>माता मरुदेवी ने रात्रि के अंतिम प्रहर में 16 शुभ स्वप्न देखे—गज, वृषभ, सिंह, लक्ष्मी और अग्निपुंज। ये स्वप्न इस बात का संकेत थे कि एक तीर्थंकर का आगमन होने वाला है। स्वर्ग के इंद्र का आसन डोल उठा और क्षण भर में ही पूरी अयोध्या नगरी देवों द्वारा रचित दिव्य वैभव से जगमगा उठी।</p>
<p><strong>जन्म का वह पावन और अलौकिक क्षण</strong></p>
<p>चैत्र कृष्ण नवमी के दिन भगवान का जन्म हुआ। पुराणों के अनुसार उस समय दिशाएं निर्मल हो गईं और तीनों लोकों में सुखद वातावरण छा गया। सौधर्म इंद्र ने बालक को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर क्षीरसागर के जल से अभिषेक किया और उनका नाम &#8216;ऋषभ&#8217; रखा। उनके चरणों में &#8216;बैल&#8217; (वृषभ) का चिह्न था, जो उनकी शक्ति और शांति का प्रतीक बना। उन्होंने ही समाज को विवाह संस्कार, कला और आजीविका के साधन सिखाए।</p>
<p><strong>वैराग्य की ओर नीलांजना का नृत्य</strong></p>
<p>भगवान ऋषभदेव ने हजारों वर्षों तक न्यायपूर्वक राज्य किया। उन्होंने अपनी पुत्रियों ब्राह्मी और सुंदरी को लिपि और अंक विद्या सिखाई, और पुत्र भरत एवं बाहुबली को राज्य संचालन लेकिन, नियति ने उनके वैराग्य के लिए एक निमित्त चुना। एक दिन राजदरबार में सुप्रसिद्ध नर्तकी नीलांजना नृत्य कर रही थी। नृत्य अपने चरम पर था कि अचानक नीलांजना की आयु समाप्त हो गई और वह मंच पर ही निष्प्राण होकर गिर पड़ी। इंद्र ने तुरंत दूसरी नर्तकी खड़ी कर दी ताकि नृत्य में बाधा न आए, लेकिन ऋषभदेव की पैनी दृष्टि ने सत्य को देख लिया।उन्होंने सोचा कि यह संसार क्षणभंगुर है। जैसे बिजली चमक कर लुप्त हो जाती है, वैसे ही यह जीवन और वैभव भी नश्वर है।</p>
<p><strong>तप कल्याणक साधना का महापथ</strong></p>
<p>चैत्र कृष्ण नवमी के ही दिन, भगवान ने राजसी वस्त्रों का त्याग किया। उन्होंने अपने हाथों से अपने केशों का लुंचन किया और &#8216;ॐ नमः सिद्धेभ्यः&#8217; कहकर दिगंबर दीक्षा धारण कर ली। उनके साथ 4 हजार अन्य राजाओं ने भी दीक्षा ली लेकिन, कठोर तप देख वे विचलित हो गए।</p>
<p><strong>मौन साधना और 6 माह का उपवास</strong></p>
<p>भगवान ऋषभदेव ने पूर्ण मौन धारण कर लिया। वे वन-वन भटकने लगे, जहाँ न कोई परिचय था, न कोई चाह। उन्होंने लगातार 6 महीने तक निराहार रहकर आत्म-चिंतन किया। जब वे आहार हेतु नगरी में निकलते तो लोग उन्हें राजा समझकर स्वर्ण, रत्न और हाथी-घोड़े भेंट करते क्योंकि, उस समय तक किसी को &#8216;मुनि चर्या&#8217; (भोजन देने की विधि) का ज्ञान नहीं था।</p>
<p><strong>इक्षु रस का प्रथम आहार</strong></p>
<p>तपस्या के एक वर्ष (13 महीने) बीत जाने के बाद, वे हस्तिनापुर पहुँचे। वहाँ राजा श्रेयांस को अपने पूर्व जन्म के स्मरण से मुनि को आहार देने की विधि याद आई। उन्होंने भगवान को इक्षु (गन्ने) का रस भेंट किया। यह दिन &#8216;अक्षय तृतीया&#8217; के रूप में अमर हो गया।</p>
<p><strong> आदिनाथ से सिद्ध तक</strong></p>
<p>भगवान आदिनाथ का तप केवल शरीर को कष्ट देना नहीं था, बल्कि आत्मा पर जमी कर्मों की धूल को हटाना था। उनकी साधना ने यह सिद्ध किया कि मोक्ष का मार्ग वैभव में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने में है।</p>
<p>भगवान आदिनाथ के जीवन से सीख:</p>
<p>परिवर्तन को स्वीकार करना (राजा से रंक/मुनि बनना)।</p>
<p>धैर्य और मौन की शक्ति।</p>
<p>समाज को केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीने की कला (असि, मसि, कृषि) देना।</p>
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		<title>प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म और तप कल्याणक: तिथि के अनुसार चैत्र कृष्ण नवमीं के दिन आता है। इस बार यह 23 मार्च को  </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Mar 2025 14:35:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर का 23 मार्च को जन्म और तप कल्याणक 23 मार्च को मनाया जाएगा। पूरे देश के दिगंबर जैन मंदिरों, सिद्ध क्षेत्र और अतिशय क्षेत्र में बड़ी धूमधाम रहेगी। भगवान आदिनाथ के जन्म और तप कल्याणक को लेकर दिगंबर जैन समाज के लोगों में धार्मिक उल्लास बना हुआ है। भगवान श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर का 23 मार्च को जन्म और तप कल्याणक 23 मार्च को मनाया जाएगा। पूरे देश के दिगंबर जैन मंदिरों, सिद्ध क्षेत्र और अतिशय क्षेत्र में बड़ी धूमधाम रहेगी। भगवान आदिनाथ के जन्म और तप कल्याणक को लेकर दिगंबर जैन समाज के लोगों में धार्मिक उल्लास बना हुआ है। भगवान श्री आदिनाथ का अभिषेक, शांतिधारा, अष्टद्रव्य आदि से पूजन विधान आदि किया जाएगा। उनका जन्म और तप कल्याणक चैत्र कृष्ण नवमी के दिन मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर का 23 मार्च को जन्म और तप कल्याणक 23 मार्च को मनाया जाएगा। पूरे देश के दिगंबर जैन मंदिरों, सिद्ध क्षेत्र और अतिशय क्षेत्र में बड़ी धूमधाम रहेगी। इस दिन भगवान श्री आदिनाथ का अभिषेक, शांतिधारा, अष्टद्रव्य आदि से पूजन विधान आदि किया जाएगा। श्रद्धालुओं की ओर से भक्ति भाव से आराधना का दौर रहेगा। भगवान आदिनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक चैत्र कृष्ण नवमी के दिन मनाया जाता है। इस बार यह 23 मार्च को आ रहा है। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म चैत्र कृष्ण नवमी के दिन सूर्याेदय के समय हुआ। उन्हें ऋषभनाथ भी कहा जाता है। उन्हें जन्म से ही संपूर्ण शास्त्रों का ज्ञान था। वे समस्त कलाओं के ज्ञाता और सरस्वती के स्वामी थे। युवा होने पर कच्छ और महा कच्छ की दो बहनों यशस्वती (या नंदा) और सुनंदा से ऋषभनाथ का विवाह हुआ। नंदा ने भरत को जन्म दिया, जो आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट बने। भगवान ऋषभनाथ ने ही विवाह-संस्था की शुरुआत की और प्रजा को पहले-पहले असि (सैनिक कार्य), मसि (लेखन कार्य), कृषि (खेती), विद्या, शिल्प (विविध वस्तुओं का निर्माण) और वाणिज्य-व्यापार के लिए प्रेरित किया। उनका सूत्र वाक्य था- ‘कृषि करो या ऋषि बनो।’</p>
<p><strong>गन्ने का रस पीकर अपना उपवास तोड़ते हैं</strong></p>
<p>आदिनाथ जी ऋषभनाथ ने हजारों वर्षों तक सुखपूर्वक राज किया। फिर राज्य को अपने पुत्रों में विभाजित कर दिगंबर तपस्वी बन गए। उनके साथ सैकड़ों लोगों ने भी उनका अनुसरण किया। जैन मान्यता है कि पूर्णता प्राप्त करने से पूर्व तक तीर्थंकर मौन रहते हैं। अतः आदिनाथ को एक वर्ष तक भूखे रहना पड़ा। इसके बाद वे अपने पौत्र श्रेयांश के राज्य हस्तिनापुर पहुंचे। श्रेयांस ने उन्हें गन्ने का रस भेंट किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। वह दिन आज भी ‘अक्षय तृतीया’ के नाम से प्रसिद्ध है। हस्तिनापुर में आज भी जैन धर्मावलंबी इस दिन गन्ने का रस पीकर अपना उपवास तोड़ते हैं। इस प्रकार एक हजार वर्ष तक कठोर तप करके ऋषभनाथ को कैवल्य ज्ञान (भूत, भविष्य और वर्तमान का संपूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ। वे जिनेंद्र बन गए।</p>
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		<title>भगवान आदिनाथ का जन्म और तप कल्याणक एक स्वर्णिम अध्याय: प्रकृति भी गाएगी भगवान आदिनाथ की महिमा </title>
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		<pubDate>Fri, 21 Mar 2025 07:40:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान आदिनाथ का जन्म एवं तप कल्याणक को लेकर पूरे जगत में अपार उत्साह है। 23 मार्च को देश-विदेश में भगवान आदिनाथ की मंगल आराधना के लिए दिगंबर जैन मंदिरों में असंख्य भक्त, श्रद्धालु और धर्मावलंबी जुटेंगे। जैन धर्म में भगवान आदिनाथ का जन्म तीर्थंकरों की श्रंखला में दिव्यता, शांति, अहिंसा का संदेश देने वाले [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान आदिनाथ का जन्म एवं तप कल्याणक को लेकर पूरे जगत में अपार उत्साह है। 23 मार्च को देश-विदेश में भगवान आदिनाथ की मंगल आराधना के लिए दिगंबर जैन मंदिरों में असंख्य भक्त, श्रद्धालु और धर्मावलंबी जुटेंगे। जैन धर्म में भगवान आदिनाथ का जन्म तीर्थंकरों की श्रंखला में दिव्यता, शांति, अहिंसा का संदेश देने वाले भगवान आदिनाथ के इस महोत्सव पर सभी नतमस्तक हैं। <span style="color: #ff0000">बड़वानी से पढ़िए प्रो. आरके जैन ‘अरिजीत’ की यह विशेष प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बड़वानी।</strong> इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर एक दिव्य आभा बिखेरता चैत्र कृष्ण नवमी के दिन पर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री 1008 भगवान आदिनाथ के जन्म और तप कल्याणक का उत्सव होगा। 23 मार्च को यह पावन अवसर भक्ति, श्रद्धा और अपार धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। संपूर्ण सृष्टि में इस दिन आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह होगा। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस महान आत्मा की गाथा का प्रतीक है। जिसने मानवता को सभ्यता और ज्ञान का पहला प्रकाश प्रदान किया। भगवान आदिनाथ जिन्हें ऋषभनाथ, आदि ब्रह्मा, वृषभदेव और पुरुदेव आदि नामों से भी जाना जाता है। वे सिर्फ तीर्थंकर ही नहीं, बल्कि मानवता के प्रथम गुरु और आध्यात्मिक क्रांति के आधार-स्तंभ थे। जब उस दिन पवित्र धरती पर सूर्य की प्रथम किरणें पड़ेंगी तो यह क्षण उस दिव्य जन्म को जीवंत कर देगा, जिसने संसार को कर्म-बंधनों से मुक्ति का मार्ग दिखाया।</p>
<p><strong>धरती पर एक जीवंत विश्वकोश लेकर आए ऋषभदेव </strong></p>
<p>उनका जन्म एक चमत्कार था। चैत्र मास की कृष्ण नवमी को इक्ष्वाकु वंश के राजा नाभिराय और रानी मरुदेवी के आंगन में यह अवतार प्रकट हुआ। चारों दिशाएं खुशी से थिरक उठीं, स्वर्ग से देवताओं ने पुष्पवर्षा की और धरती ने अपने गर्भ से एक अनमोल रत्न को जन्म दिया। उनका नाम ऋषभ रखा गया। जो उनके बलशाली और तेजस्वी व्यक्तित्व को दर्शाता था। जन्म से ही वे शास्त्रों के सागर में डूबे थे मानो धरती पर एक जीवंत विश्व कोश लेकर आए हों। सूर्य की पहली किरणों ने जब उस शिशु को स्पर्श किया तो यह संकेत था कि यह वह आत्मा है, जो अज्ञान के अंधेरे से मानवता को प्रकाश की ओर ले जाएगी।</p>
<p><strong>समाज को संगठित करने के लिए नियम बनाए</strong></p>
<p>भगवान आदिनाथ ने मानव सभ्यता को आकार दिया। उन्होंने मनुष्यों को खेती की कला सिखाई, बीज बोने का ज्ञान, अन्न उगाने की विधि और प्रकृति के साथ सामंजस्य का मार्ग। शिल्प और कला का विकास उनके आशीर्वाद से हुआ। अराजकता के उस युग में उन्होंने समाज को संगठित करने के लिए नियम बनाए। जिससे व्यवस्था जन्मी। एक राजा के रूप में उन्होंने प्रजा को जीवन जीने की कला सिखाई। उनकी इस महानता के कारण उन्हें ‘आदिब्रह्मा’ सृष्टि का प्रथम सर्जक कहा गया। उनका चिह्न ‘वृषभ’ (बैल) उनकी अडिग शक्ति और स्थिरता का प्रतीक है, जो आज भी जैन मंदिरों में उनकी पहचान है।</p>
<p><strong>यह परिवार ज्ञान, शक्ति और धर्म का आधार-स्तंभ था</strong></p>
<p>उनका पारिवारिक जीवन प्रेरणा का स्रोत था। युवावस्था में उनका विवाह दो ओजस्वी रानियों यशस्वती (जिन्हें कुछ ग्रंथों में नंदा कहा गया) और सुनंदा से हुआ। इनके गर्भ से उन्हें सौ वीर पुत्र और दो अनुपम पुत्रियां ब्राह्मी और सुंदरी प्राप्त हुईं। उनकी पुत्रियां स्वयं में चमत्कार थीं। ब्राह्मी ने ‘ब्राह्मी लिपि’ का आविष्कार कर ज्ञान की अमिट रेखा खींची, जबकि सुंदरी ने गणित और तर्कशास्त्र के क्षेत्र में बुद्धि का परचम लहराया। उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत ने चक्रवर्ती सम्राट के रूप में अखंड साम्राज्य स्थापित किया और इस धरती को ‘भारत’ नाम का गौरव दिया। उनके ही पराक्रमी पुत्र बाहुबली की तपस्या और त्याग की गाथा भी जैन धर्म में स्वर्णाक्षरों से अंकित है। यह परिवार ज्ञान, शक्ति और धर्म का आधार-स्तंभ था। जिसने भारत की सांस्कृतिक मिट्टी को समृद्ध किया। आज हर भारतीय के रक्त में बहती यह गर्वाेन्नत विरासत भगवान आदिनाथ की देन है।</p>
<p><strong>कठोर तप और असीम ध्यान के बल पर उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया</strong></p>
<p>उनका जीवन सांसारिक वैभव में कभी कैद नहीं हुआ। एक दिन, नृत्य की मादक लय के बीच एक नर्तकी नीलांजना का अचानक देहांत उनके लिए संसार की नश्वरता का दर्पण बन गया। उस क्षण ने उनके हृदय में वैराग्य की ऐसी अग्नि जलाई, जो राजसी ठाठ-बाट को भस्म करने को आतुर थी। उन्होंने अपने विशाल साम्राज्य को त्याग दिया और संन्यास के मार्ग पर चल पड़े। एक वर्ष तक वे कायोत्सर्ग की मौन तपस्या में खोए रहे। शरीर को भूल, आत्मा को पुकारते हुए फिर, हस्तिनापुर के गन्ने के खेत में इक्षुरस की मिठास ने उनके प्रथम आहार का संयोग रचा, जिसे ‘आखर पर्व’ का नाम मिला। कठोर तप और असीम ध्यान के बल पर उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया। वह दिव्य प्रकाश, जो संसार के हर रहस्य को उजागर कर देता है।</p>
<p><strong>रंग-बिरंगे ध्वजों से आकाश लहराएगा</strong></p>
<p>23 मार्च को जब सूर्य की पहली किरण धरती को स्पर्श करेगी तो यह केवल एक सवेरा नहीं होगा। बल्कि यह एक नई चेतना का उद्घोष होगा।एक ऐसा महोत्सव, जो हृदय को भक्ति की सरिता में डुबो देगा। देश का हर कोना भक्ति के सागर में डूबा होगा। कल्पना करें कि लाखों भक्तों की शोभायात्रा धरती पर स्वर्ग उतार लाएगी और रंग-बिरंगे ध्वजों से आकाश लहराएगा। मंत्रों की पवित्र ध्वनि से वायु गूंज उठेगी। मंदिरों में घंटियों की झंकार, दीपों की जगमगाहट और भक्तों की आंखों में श्रद्धा का सागर एक ऐसा दृश्य रचेगा। जो आत्मा को झंकृत कर देगा।</p>
<p><strong>दान में उदारता, तप में दृढ़ता और सेवा में समर्पण</strong></p>
<p>यह उत्सव केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक प्रचंड जागृति का प्रतीक है। यह वह दिव्य नाद है, जो कहता है। उठो, अपने भीतर के अंधेरे को भस्म कर दो और उस पथ पर बढ़ो, जिसे भगवान आदिनाथ ने अपने त्याग और तप से प्रकाशित किया। यह दिन हर जैन अनुयायी के हृदय में संकल्प जागृत करेगा। दान में उदारता, तप में दृढ़ता और सेवा में समर्पण। उनके जीवन का हर क्षण एक संदेश है, चाहे वह वैभव को तुच्छ ठहराकर संन्यास चुनना हो, या अहिंसा का वह बीज बोना, जो आज भी मानवता को जीवन का मर्म सिखाता है।</p>
<p><strong>अंतर्मन को संकल्प की अग्नि से प्रज्वलित करें</strong></p>
<p>यह उत्सव केवल जैनियों का नहीं, बल्कि हर उस प्राणी का है, जो सत्य और शांति की खोज में भटकता है। भगवान आदिनाथ की शिक्षाएं जैन धर्म की नींव बनीं और मानवता को दिशा दी। उनकी अहिंसा की गर्जना, संयम की महक और त्याग की प्रदीप्ति आज भी विश्व में प्रतिध्वनित होती है। अपने अंतर्मन को संकल्प की अग्नि से प्रज्वलित करें।</p>
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