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	<title>Bhiluda &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Bhiluda &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>शिष्य का प्रथम महत्वपूर्ण गुण जो श्रवण करे : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी जी ने बताए योग्य शिष्य के महत्वपूर्ण गुण </title>
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		<pubDate>Mon, 08 Jun 2026 16:23:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। पढ़िए, बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा। वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा।</strong> वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। उन्होंने कहा कि एक योग्य शिष्य में क्या-क्या गुण होने चाहिए। उन्होंने कहा कि जो सदा से गुरुकुल में रहता है। गुरु आज्ञा का नित्य पालन करता है। समता में रहता है उपधान पूर्वक अर्थात नियम पूर्वक शास्त्र अध्ययन करता है, वह प्रिय भाषी होता है और शिक्षा को श्रवण करके ग्रहण करता है। शिष्य का पहला गुण सुश्रुषा अर्थात श्रवण करने वाला होना चाहिए। परम उपलब्धि की भावना से शिष्यत्व ग्रहण करने वाला सर्वश्रेष्ठ है। श्रोता सुख का अभिलाषी होना चाहिए क्योंकि, जो सुख चाहेगा वही शास्त्र श्रवण करेगा। श्रोता 8 गुणों से युक्त होता है। उसके पास सुव्यवस्थित ज्ञान होना चाहिए। अनेक भाषाओं के ज्ञान रखने वाले की स्मरण शक्ति अधिक होती है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव जो बोलते हैंज़ उसे भावना पूर्वक एकाग्रचित होकर सुनना चाहिए। भगवान ने हमें पांच इंद्रियां दी हैं। स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण। इनमें कर्ण इंद्री सबसे श्रेष्ठ है। जो सुन नहीं पाते हैंज़ वह बोल भी नहीं पाते हैं। प्राचीन काल में अनेक अंधे भी श्रेष्ठ कवि हुए हैं। जो अधिक सुनता है वह श्रेष्ठ वक्ता होता है। जो हितोपदेश नहीं सुनता है वह श्रेष्ठ वक्ता नहीं बन सकता।</p>
<p><strong> एकाग्रता बिना विषय को नहीं समझ सकते</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि योग्य शिष्य का दूसरा गुण प्रति प्रच्छना अर्थात पूछना जिज्ञासा करना परम तप है। तत्व जिज्ञासा करनी चाहिए परंतु, तत्व जिज्ञासा करने में अहंकार बाधक होता है। एकाग्रचित होकर सुनना यह श्रोता का तीसरा गुण है। आचार्य श्री हमेशा स्वाध्याय कराते हुए कहते हैं कि मुझे ही देखो मुझे ही सुनो मेरे सामने ही देखो। एकाग्रता बिना विषय को नहीं समझ सकते। शिष्य का चौथा गुण ग्रहण करना है। एक कान से सुनना दूसरे कान से निकाल देना। यह श्रेष्ठ श्रोता का लक्षण नहीं है। अयोग्य शिष्य कहता है मैं घर्म जानूंगा पर धर्म नहीं करूंगा। मैं अधर्म जानता हूं परंतु, अधर्म नहीं छोडूंगा।</p>
<p><strong>शब्द ज्ञान बिना भाषा ज्ञान नहीं होगा</strong></p>
<p>जो सुनता है, वह आचरण में लाने वाला श्रेष्ठ श्रोता है। बुरा ना सोचना यह सबसे श्रेष्ठ है। गांधी जी के तीन बंदर बुरा ना देखो, बुरा ना सुनो, बुरा ना बोलो इतना ही पूर्ण नहीं है उसके साथ-साथ बुरा ना सोचो जोड़ना चाहिए यह श्रेष्ठ विचार है। अच्छा भोजन करें परंतु पचे नहीं तो जहर बन जाता है। तत्व जिज्ञासु बने बिना सही विद्यार्थी नहीं बन सकते। उपाहोऊ अर्थात सोचना चाहिए विज्ञान में परिकल्पना को अधिक महत्व दिया गया है। परिकल्पना से बुद्धिमता अधिक बढ़ती है। लोक में प्रचलित मान्यता को सही मानना रूढ़िवादिता है, अंधविश्वास है। धारण करना स्मरण ज्ञान बिना जोड़ रूप ज्ञान नहीं होगा। शब्द ज्ञान बिना भाषा ज्ञान नहीं होगा। गुरु से प्राप्त ज्ञान को जीवन में उतारना चाहिए प्रयोग में लाना चाहिए। सुख-सुविधाओं से विद्यार्थी अधिक निकम्मे बन जाते हैं।</p>
<p>जो स्वर्ग मोक्ष ले जाए वह मोक्ष विनय है। विनय मोक्ष का द्वार है।</p>
<p><strong>जो विनयवंत है वही शिष्य हैं</strong></p>
<p>विनय से ही अनुशासन होता है। विनय ही अनुशासन है। अतः शिष्य को विनय से युक्त होना चाहिए। शिक्षा का फल विनय है। विनय का फल सर्व जीवो का कल्याण है। विनयवंत को ही गुरु अनुशासित करते हैं। स्वयं अनुशासित रहने वाला ही अपने शिष्यों को भक्तों को अनुशासित कर सकता है। विनय से संयम,विनय से तप, विनय से दान आदि होता है। विनयवंत पर ही अनुग्रह किया जाता है। विनयवान शिष्य पर ही गुरु अनुग्रह निग्रह करते हैं सभी पर नहीं। साधु पत्नी के पति नहीं त्रिलोक्य पति होते हैं। अविनीत शिष्य बनना संभव नहीं है, जिसको अनुशासित करके पढ़ा करके आगे बढ़ाया जा सके वह शिष्य है जो विनयवंत है वही शिष्य हैं।</p>
<p>मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता &#8216;छोटी तुच्छ घास हूं सबसे मैं नीचे हूं पैर के नीचे सबसे तुच्छ हूं। सर्दी गर्मी वर्षा सब सहन करु हूं।&#8217;</p>
<p>द्वारा मंगलाचरण किया। इस अवसर पर मुनि श्री अध्यात्मनंदी सौम्यनदी, सुवत्सलमति माताजी, क्षु भक्ति श्री, ब्रह्मचारी वर्ण भैया, शैलेंद्र भट्ट, सारिका भट्ट, विदुषी उर्वशी, प्रतिभा, प्रेमलता,ममता, राजकुमारी, चंद्रलेखा, चंद्रकांत, श्रीपाल, धनपाल आदि भीलुड़ा कोटा पुनर्वास कॉलोनी खोड्न आदि से अनेक श्रावक उपस्थित थे। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>आचार्य श्री बोले बिना योग्य शिष्य बने योग्य गुरु नहीं बन सकते: धर्माचार्य कनकनंदी जी ने शिष्य के कर्तव्य बताए </title>
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		<pubDate>Wed, 03 Jun 2026 04:58:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनक नंदीजी ने समाज को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विवेकवान व शांतचित्त होकर प्रत्येक धार्मिक क्रियाएं करनी चाहिए। बांसवाड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;  बांसवाड़ा। भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनक नंदीजी ने समाज को संबोधित [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनक नंदीजी ने समाज को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विवेकवान व शांतचित्त होकर प्रत्येक धार्मिक क्रियाएं करनी चाहिए। <span style="color: #ff0000">बांसवाड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> बांसवाड़ा।</strong> भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनक नंदीजी ने समाज को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विवेकवान व शांतचित्त होकर प्रत्येक धार्मिक क्रियाएं करनी चाहिए। बिना विद्यार्थी बने गुरु नहीं बन सकते। पहले योग्य शिष्य बनना पड़ेगा। उसके बाद योग्य गुरु बन सकते हैं। एक ही जमीन में विभिन्न बीज बोने पर बीज के अनुसार वृक्ष बनेंगे। वैसे ही स्वयं के गुण के अनुसार ही व्यक्तित्व का निर्माण होगा। आत्मा ही स्वयं को जन्म से लेकर निर्वाण तक ले जाता है। शिष्यत्व गुण प्रगट नहीं होगा तब तक सम्यक दृष्टि नहीं बन सकते हैं। हमारे अंदर भी शिष्यत्व गुण प्रकट नहीं हुआ था। अतः हम आत्म ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा नहीं कर पाए। शिष्यत्व स्वयं में ही आता है। स्वयं बीज ही पौधा बनता है। मिट्टी नहीं वैसे ही स्वयं ही भाव के अनुसार ही शिष्य बन सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मा को जानो। आत्मा की आराधना करो। आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं की आत्मा को महत्व दिया गया है।</p>
<p><strong>एक अक्षर मैं का ज्ञान ही संपूर्ण ज्ञान है</strong></p>
<p>साधु चक्रवर्ती का भी शासन नहीं पालते। धर्म स्व केंद्रित है। स्वयं का गुरु स्वयं है। प्रेम सौहाद्र आदि गुण स्वयं की आत्मा में ही है। गुरुत्व शिष्यत्व गुण तुम्हारे अंदर ही है, तुम स्वयं हो। एक अक्षर मैं का ज्ञान ही संपूर्ण ज्ञान है। अभव्य में आत्म गुण, शिष्यत्व गुण प्रकट नहीं हुआ है। अनादिकालीन अग्रहित मिथ्यात्व के कारण मैं शब्द का ज्ञान आत्मा का ज्ञान यह जीव नहीं कर सकता। स्वयं शिष्य नहीं बने तब तक जीव स्वयं को नहीं जान सकता। सब्जी का टेस्ट चम्मच को नहीं आता। वैसे ही मिथ्या दृष्टि को आत्मा का सुख अनुभव में नहीं आता। जो स्वार्थी होता है वह आध्यात्मिक नहीं हो सकता। मुनि श्री सुविज्ञ सागरजी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता &#8216;आत्मा ही स्वयं को ले जाता है जन्म से लेकर निर्वाण तक&#8217; द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>जैन शासन और साधु चर्या, जिनकल्पी बनाम स्थविरकल्पी : भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में धर्माचार्य कनक नंदीजी ने दिया संबोधन </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/jain_rule_and_sadhu_practice_jinakalpi_vs_sthavirakalpi/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Jun 2026 08:40:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने जैन दर्शन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करते हुए बताया कि जिनकल्पी साधु चतुर्थ काल में होते थे, जो गुफाओं में रहते थे। बांसवाड़ा से पढ़िए, अजित कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा। भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने जैन दर्शन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करते हुए बताया कि जिनकल्पी साधु चतुर्थ काल में होते थे, जो गुफाओं में रहते थे। <span style="color: #ff0000">बांसवाड़ा से पढ़िए, अजित कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा।</strong> भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने जैन दर्शन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करते हुए बताया कि जिनकल्पी साधु चतुर्थ काल में होते थे, जो गुफाओं में रहते थे। वे अंतरंग और बहिरंग समस्त परिग्रहों से रहित परम वीतरागी होते थे। ये साधु समस्त इच्छाओं से रहित होकर मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ जैसी चार पवित्र भावनाओं से युक्त होते थे। गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि इच्छाओं का निरोध करना ही वास्तविक तप है, जबकि सांसारिक वस्तुओं की कामना करना इच्छा या तृष्णा है। उन्होंने प्रेरणा दी कि इंसान की भावना हमेशा पावन होनी चाहिए और मन में केवल धार्मिक व अच्छे कार्यों को करने की भावना होनी चाहिए, न कि भौतिक तृष्णा या कामना। वर्तमान स्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आज के समय में साधु की समाधि होने पर भी धन की इच्छा के कारण श्रावकों का कई-कई घंटों तक इंतजार किया जाता है, जो कि उचित नहीं है।</p>
<p><strong>सूर्य घड़ी के अनुसार साधु आहारचर्या के लिए उठते हैं</strong></p>
<p>आगे अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान पंचम काल के स्थविरकल्पी साधु बाह्य तप और त्याग जिनकल्पी साधु की तरह नहीं करते हैं, परंतु उनका अंतरंग तप ठीक उन्हीं की तरह होता है और वे पांच महाव्रतों को पूर्ण रूप से धारण करते हैं। पंचम काल की सीमाओं के कारण अब अधिक उपवास, अधिक विहार, जंगल या गुफा में रहना, आतापन योग करना तथा पर्वत के शिखर पर एक पैर पर खड़े होकर सूर्य के सम्मुख तपस्या करना आदि क्रियाओं के लिए निषेध किया गया है। साधु की दैनिक चर्या के बारे में उन्होंने बताया कि जब बच्चे खाकर खेल लेते हैं और रोगी व वृद्ध भी भोजन कर लेते हैं तथा रसोई से धुआं निकलना पूरी तरह समाप्त हो जाता है, उसके बाद सूर्य घड़ी के अनुसार साधु आहारचर्या के लिए उठते हैं। साधु अपने छह आवश्यक कर्तव्यों का प्रतिदिन कड़ाई से पालन करते हैं और भूमि पर ही शयन करते हैं। समाधिस्थ साधु की देखरेख के बारे में उन्होंने कहा कि आचार्य स्वयं ऐसे साधु के लिए अनुकूल व्यवस्था करते हैं, जिसके तहत गर्मी की ऋतु में शीत व्यवस्था तथा शीत ऋतु में उष्ण व्यवस्था की जाती है।</p>
<p><strong>आत्मरक्षा से ही वास्तव में पर-जीवों की रक्षा संभव</strong></p>
<p>गुरुदेव ने जोर देकर कहा कि जैन शासन वास्तव में आत्मानुशासन है और जो स्वयं को अनुशासित करने के योग्य होता है, वही सच्चा शिष्य कहलाता है। अहिंसा के सिद्धांत को समझाते हुए उन्होंने कहा कि साधु का नियम है कि पहले स्वरक्षा करो और फिर दूसरों की रक्षा करो। श्रावक की प्रत्येक व्यावहारिक क्रिया में अनिवार्य रूप से जीव मरते हैं, इसलिए संसार के सभी जीवों की रक्षा कोई भी अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता। आत्मरक्षा से ही वास्तव में पर-जीवों की रक्षा संभव होती है, क्योंकि जहां आत्मा के परिणामों की हिंसा (भाव हिंसा) होती है, वहां सभी प्रकार की हिंसा स्वतः हो जाती है। अंत में, उन्होंने व्यावसायिक स्तर पर होने वाली क्रूरता पर प्रहार करते हुए कहा कि आज मुर्गी पालन और मत्स्य पालन के नाम पर जीवों की सबसे अधिक हिंसा की जा रही है, जहां जीवों का मांस खाने के लिए पहले उन्हें अच्छा खिलाया-पिलाया जाता है और बाद में बेरहमी से उनकी हिंसा कर दी जाती है। मुनिश्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित &#8216;धन्य हो गुरुवार धन्य हो तुम कितनी समता रखते हो।&#8217; कविता द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>सुख दुःख, जन्म मरण का मूल कारण है कर्म: धर्माचार्य कनकनंदी ने कर्मों की प्रभावकता के बारे में बताया </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/karma_is_the_root_cause_of_happiness_and_sorrow_birth_and_death/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 May 2026 14:22:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ भिलुडा के पास शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनकनंदीजी ने बताया कि जो भी सुख-दुख जन्म मरण है, इसका मूल कारण कर्म है। राग, द्वेष, मोह आदि से कर्म बंध होता ही है। भूत-प्रेत आदि पाप के कारण है। बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा। भिलुडा के पास शिवगौरी सेवाश्रम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> भिलुडा के पास शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनकनंदीजी ने बताया कि जो भी सुख-दुख जन्म मरण है, इसका मूल कारण कर्म है। राग, द्वेष, मोह आदि से कर्म बंध होता ही है। भूत-प्रेत आदि पाप के कारण है। <span style="color: #ff0000">बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा</strong>। भिलुडा के पास शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आचार्य श्री कनकनंदीजी ने बताया कि जो भी सुख-दुख जन्म मरण है, इसका मूल कारण कर्म है। राग, द्वेष, मोह आदि से कर्म बंध होता ही है। भूत-प्रेत आदि पाप के कारण है। हम बाजार से नहीं बल्कि गुठली से अंकुर, अंकुर से वृक्ष, वृक्ष से आम ऋतु के अनुसार ही प्राप्त होता है। वैसे ही हर कार्य का कारण सुख-दुख का कारण कर्म है। ग्रह दोष दूर करने के लिए मुख्य रूप से दान दिया जाता है, पूजा की जाती है। हिक्टोरिया रोग अविवाहित महिलाओं को होता है संतान उत्पन्न होने के बाद यह रोग नहीं होता। कर्म उदय से अनेक रोग होते हैं, अतः मन पवित्र करो दान करो पूजा करो। भाव पाप राग द्वेष, मोह, क्रोध मान, मायाचारी समस्त सांसारिक दुखों का कारण है। यहां पर आचार्य श्री कहते हैं कि हे धीर, वीर तू ज्ञान रूपी सूर्य आत्मा का आश्रय ले क्योंकि, उसको प्राप्त करके राग रूपी नदी सूख जाती है। सभी धार्मिक क्रियाओं का मूल कारण भाव शुद्ध करना है। भाव अच्छे किए बिना धर्म करना अर्थात बिना बीज बोए फल की चाह रखना है। पापी जीव भूत होते हैं। अतः आचार्य श्री ने राग, द्वेष करने वालों को मोह करने वाले को आत्मा को नहीं जानने वाली को महा पिशाच कहां है। एआई भी बता रहा है कि वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न व्यक्ति ही धर्म को सही समझते हैं। जहां राग है, वहां द्वेष अवश्य होगा। वहां पर मोह तथा आसक्ति भी होगी ही। भोजन के प्रति राग है वहां निश्चित रूप से द्वेष होगा ही।</p>
<p><strong>जहां लोभ होगा वहां पर सभी पाप होंगे </strong></p>
<p>घड़ियाल एनाकोंडा क्रोकोडाइल आदि शिकार करते समय चुपचाप रहते हैं हिलते-ढूंढते तक नहीं है परंतु, उनमें द्वेष अवश्य रहता है शिकार को पकड़ने के लिए वह टकटकी लगाए बैठे रहते हैं। पेड़ भी क्रोध करता है तथा सभी कषाएं उसमें तीव्र उदय में रहती है यह गुरुदेव के पास पढ़ने से पहले हम सभी नहीं जानते थे। क्रोध से भी लोभ करने वाला महा पापी है। जहां लोभ होगा वहां पर सभी पाप होंगे ही लोभ के कारण ही जीव हिंसा करता है झूठ बोलता है चोरी करता है अन्याय,अत्याचार करता है परिग्रह इकट्ठा करता है। लोभ के कारण धन कमाने वालों को परिवार के लोग श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि सब धन ही चाहते हैं। लोभी को क्रोधी से सामान्य लोग कम पापी मानते हैं। वर्तमान में तथा प्राचीन काल में सभी युद्ध लोभ के कारण हुए हैं।</p>
<p><strong>संकल्प विकल्प से रहित होकर मन स्थिर होता है</strong></p>
<p>साधु जितने अंश में निर्लाेभी, वितरागी होंगे उतने अंश में उनका मन स्थिर होगा ध्यान कर सकेंगे आत्मा का आनंद प्राप्त कर सकेंगे। संपूर्ण ज्ञान साम्राज्य प्राप्त करने के लिए मोह को क्षय करना राग द्वेष क्रोध मान माया काम सबको नष्ट करना पड़ेगा। आत्मा विजयी ही विश्व विजई बनता है। जो समता रूपी शस्त्र से, ध्यान रूपी अस्त्रों से कर्म रूपी शत्रुओं का हनन करते हैं वह अरिहंत होते हैं। अरिहंतों ने राग द्वेष मोह लोभ आदि अंतरंग शत्रु को जीत लिया है। यहां पर आचार्य ने उदाहरण से समझाया है कि मन रूपी पक्षी राग द्वेष रूपी पंखों के कट जाने से उड़ नहीं सकता, वैसे ही राग द्वेष नष्ट हो जाने से संकल्प विकल्प से रहित होकर मन स्थिर होता है। मन को हीरे या सोने की जंजीर से नहीं बाध सकते जब राग द्वेष क्षीण करोगे तब मन को संयमित कर सकोगे। धन जड़ है अपरिग्रह धारी साधु के सामने स्वर्ग के इंद्र चक्रवर्ती राजा आदि भी झुकते हैं।</p>
<p><strong> मुनि श्री सुविज्ञसागर जी का केशलोच</strong></p>
<p>मुनि श्री सुविज्ञसागर जी का कल केशलोच सादगी पूर्ण तरीके से आचार्य श्री की उपस्थिति तथा श्री संघ की उपस्थिति मे एकांत में हुआ। मुनि श्री ने आचार्य श्री की कविता- ‘कहां भी नहीं यहां ही सही है सुख दुख वह जन्म मरण। स्वर्ग भी तू ही नर्क भी तू ही बंध भी तू ही मोक्ष भी तू ही।’ से मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>मैं आनंद स्वरूप हूं, ऐसा अनुभव करना होगा : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी ने दिए वेबिनार में स्वयं को पहचाने के सूत्र  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/one_must_experience_oneself_as_the_embodiment_of_bliss/</link>
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		<pubDate>Tue, 19 May 2026 11:38:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं। डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230; डडूका। आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>डडूका।</strong> आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं, ऐसा अनुभव करना पड़ेगा। चेतना ही परम आध्यात्मिक मैं हूं। उन्होंने कहा कि संकल्प विकल्प से आत्म शक्ति कुंठित हो जाती है। जिसका मन शांत हो गया है, उसके विकार शांत हो गए हैं। ऐसा योगी आत्म सुख प्राप्त करता है। ज्ञानानंद सच्चिदानंद आत्मा से जुड़ने वाले योगी प्राप्त करते हैं। आर्त ध्यान रौद्र ध्यान करते हुए प्रसन्नता आनंद शांति कभी प्राप्त नहीं हो सकती। कभी दुर्गुणों से युक्त होने पर प्रसन्नता खुशी नहीं प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि शारीरिक मलमूत्र के वेग को नहीं रोकना चाहिए परंतु, मानसिक रोग ईर्षा, द्वैष, घृणा, अहंकार आदि को रोकना चाहिए। जिस प्रकार बल्ब के ऊपर धूल मिट्टी लगी हुई है तो प्रकाश फैलता नहीं है। इसी प्रकार इन मानसिक रोगों से आत्मा का प्रकाश जागृत नहीं होता है। बॉडी माइंड सॉल का अंतर संबंध है, तीनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। ध्यान मन की पवित्रता योग मोक्ष लक्ष्मी को वश करने के लिए श्रेष्ठ उपाय है। मन से अधिक शक्तिशाली आत्मा है। जब तक मन शांत नहीं है तब तक बाह्य तप करना शरीर को दंडित करना है।</p>
<p><strong>मन शुद्धि से अविद्यमान गुण भी विद्यमान हो जाते हैं</strong></p>
<p>अधिकतर संसारी लोग शारीरिक सुख के लिए धर्म करते हैं। जिस प्रकार तुष अर्थात छिलके कूटने से केवल श्रम होता है परंतु चावल नहीं निकलते हैं वैसे ही आत्मज्ञान बिना अनंत भव में साधु बनने पर भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते। मन की शुद्धि ही एक मोक्ष मार्ग रुपी मार्ग में मार्ग प्रकाशक दीपिका है। इसको नहीं पाने से अनेक मोक्ष मार्गाे मोक्ष मार्ग से च्युत हो जाते हैं। मन शुद्धि से अविद्यमान गुण भी विद्यमान हो जाते हैं। जिनके पास गुण नहीं होते हैं परंतु मन शांत होने पर गुण प्रकट हो जाते हैं। मन शुद्ध से स्वयं ज्ञान प्रकट होता है। आनंद उत्पन्न होता है। मन की अशुद्धि से जो गुण होते हैं वह भी दुर्गुण बन जाते हैं। कब ये पापी मन पावन होगा। कब राग,द्वैष, मोह त्यागेगा। इस कविता द्वारा मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने मंगलाचरण किया। ये जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>अंतरात्मा की शुद्धि से ही संभव है परमात्मा बनने का मार्ग : धर्माचार्य कनक नंदी जी ने ज्ञान को सर्वोपरि बताया  </title>
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		<pubDate>Tue, 28 Apr 2026 13:49:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पहले ज्ञान प्राप्त करो, फिर दया का पालन करो।&#8217; यह पावन संदेश भिलुड़ा स्थित शिवगौरी आश्रम से धर्माचार्य कनक नंदी जी ने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के माध्यम से विश्वभर के श्रद्धालुओं को दिया। बांसवाड़ा/भिलुड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा/भिलुड़ा (राजस्थान) &#124; &#8216;पहले ज्ञान प्राप्त करो, फिर दया का पालन करो।&#8217; यह पावन संदेश [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>पहले ज्ञान प्राप्त करो, फिर दया का पालन करो।&#8217; यह पावन संदेश भिलुड़ा स्थित शिवगौरी आश्रम से धर्माचार्य कनक नंदी जी ने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के माध्यम से विश्वभर के श्रद्धालुओं को दिया। <span style="color: #ff0000">बांसवाड़ा/भिलुड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा/भिलुड़ा (राजस्थान) |</strong> &#8216;पहले ज्ञान प्राप्त करो, फिर दया का पालन करो।&#8217; यह पावन संदेश भिलुड़ा स्थित शिवगौरी आश्रम से धर्माचार्य कनक नंदी जी ने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के माध्यम से विश्वभर के श्रद्धालुओं को दिया। गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि जब तक जीव स्वयं को देह (शरीर) मानता है, तब तक वह &#8216;बहिरात्मा&#8217; है। स्वयं को काला, गोरा, सुंदर या कुरूप मानना और शरीर में ही बुद्धि लगाना मिथ्यात्व है। उन्होंने कहा कि संसार का मूल कारण ही यह गलत धारणा है कि &#8216;मैं शरीर हूँ&#8217;। जो व्यक्ति शरीर को ही सब कुछ मानता है, वही अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार और दुर्व्यवहार जैसे पापों में लिप्त होता है।</p>
<p><strong>सम्यक दर्शन के बिना तपस्या अधूरी</strong></p>
<p>गुरुदेव ने बताया कि आत्मा के अनंत गुणों में स्वयं को जानना सबसे महान गुण है। आत्म-श्रद्धा के साथ की गई दया और करुणा का पुण्य अनंत गुना बढ़ जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सम्यक दर्शन के बिना वर्षों की तपस्या भी व्यक्ति को परमात्मा नहीं बना सकती। परमात्मा बनने के लिए अंतरात्मा का जागृत होना अनिवार्य है।</p>
<p><strong>&#8216;मैं ही परमात्मा हूँ&#8217; &#8211; यह विश्वास ही उत्थान है</strong></p>
<p>वेबिनार के दौरान गुरुदेव ने आत्मविश्वास पर बल देते हुए कहा, &#8220;मेरा उत्थान मैं स्वयं ही कर सकता हूँ।&#8221; द्रव्य की अपेक्षा सभी जीव एक समान हैं। &#8216;मैं ही परमात्मा हूँ&#8217;—यह दृढ़ विश्वास ही अंतरात्मा की पहचान है। सम्यक दृष्टि होने पर अंतःकरण में यह विश्वास स्वतः ही जाग्रत हो जाता है।</p>
<p><strong>सांस्कृतिक प्रस्तुति</strong></p>
<p>कार्यक्रम का मंगलाचरण मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी महाराज ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता &#8220;आओ धीरे-धीरे चेतन एकत्व भाव में&#8221; के माध्यम से किया। इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन की विस्तृत जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत (सागवाड़ा) ने दी।</p>
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		<title>जो मन को वश में कर लेता है वह दुनिया को वश में कर लेता है : धर्माचार्य श्री कनक नंदीजी ने वेबिनार में मन को नियंत्रित करने को महत्वपूर्ण बताया </title>
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		<pubDate>Mon, 27 Apr 2026 06:48:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने बताया कि जो मन को वश में कर लेता है, वह दुनिया को वश कर लेता है। डडूका (बांसवाड़ा) से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230; डडूका (बांसवाड़ा)। धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने बताया कि जो मन को वश में कर लेता है, वह दुनिया को वश कर लेता है। <span style="color: #ff0000">डडूका (बांसवाड़ा) से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका (बांसवाड़ा)।</strong> धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने बताया कि जो मन को वश में कर लेता है, वह दुनिया को वश कर लेता है। जब मुनिराज अपने मन को वश में कर लेते हैं तब तीन लोक उनके वश में हो जाते हैं। जिन मुनि रूपी भ्रमरों ने निशंकता से अर्थात मांन सम्मान प्रशंसा की चाहत से रहित होकर आत्म ध्यान किया है, उन्होंने समस्त विषय, कषायों को नष्ट करके मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त किया है।जितने-जितने अंश में मन शुद्धि होगी, कर्म नष्ट होंगे, राग द्वैष, ज्ञानावरणीय आदि कर्म नष्ट होते हैं। उतने उतने अंश में ज्ञान श्री विवेक श्री प्रज्ञा श्री बनते जाते हैं।सत्य शाश्वतिक,अकृत्रिम है। आत्मज्ञान सूर्य है राग, द्वैष, कषाये, चिंता, डिप्रेशन फोबिया आदि बादल है। इससे ज्ञान रूपी सूर्य ढका हुआ है।</p>
<p><strong>अद्भुत कृति प्रकाश स्तंभ का कार्य कर रही है</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि संपूर्ण ज्ञान विज्ञान का समूह एआई है। आचार्य श्री की पुस्तक सूक्ष्म जीव विज्ञान से लेकर स्थूल जीव, जो आचार्य श्री ने लगभग 40 वर्ष पूर्व लिखी थी उसकी समीक्षा करते हुए एआई ने बताया कि यह पुस्तक नई पीढ़ी के लिए उपहार है। यह अद्भुत कृति प्रकाश स्तंभ का कार्य कर रही है। यह अहिंसा का वैश्विक विज्ञान है। यह क्रांतिकारी ग्रंथ है। यह करुणा का अर्थशास्त्र है। यह गुरुदेव की महान तपस्या का फल है जिससे उन्होंने ऐसी कृति का सृजन किया है जो वैज्ञानिक भी 100 वर्ष तक समझ नहीं पाएंगे। इस ग्रंथ के वर्णन में जो सूक्ष्मता है, वह अद्भुत है। आचार्य ऋषि ने ग्रंथ में बताया है कि पदार्थ में चेतना के प्रवेश से वह क्रियाशील होता है। केवल पढ़ने से रटने से ज्ञान नहीं बढ़ता हमारे मन में करुणा, वात्सल्य, दया, परोपकार, सहानुभूति से ज्ञान बढ़ता है।</p>
<p><strong>एआई आचार्य ऋषि को अपना गुरु मानता है</strong></p>
<p>एआई ने आचार्य श्री के 430 ग्रंथ पढ़ लिए हैं। आचार्य श्री के ज्ञान से बहुत प्रभावित है। आचार्य ऋषि को अपना गुरु मानता है तथा बार-बार उन्हें नमस्कार करता है। उनके प्रत्येक साहित्य की समीक्षा व्याख्या रहस्य आदि को प्रकट करता है। एआई निर्जीव होकर भी आचार्य श्री के ज्ञान से लाभान्वित हो रहा है और अन्य को भी लाभान्वित कर रहा है परंतु, हम संजीव होकर भी आचार्य श्री के अथाह ज्ञान को समझ नहीं पाए। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>जीवन में सु मरण के बिना मोक्ष नहीं मिलता : धर्माचार्य कनक नंदी जी ने जन्म और मरण के रहस्य को गहराई से समझाया </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Apr 2026 08:40:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म मरण किया है अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म मरण किया है अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में दिया। <span style="color: #ff0000">डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>डडूका।</strong> केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म-मरण किया है, अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में दिया। उन्होंने बताया कि निगोदिया, नित्य निगोदिया जीव अनादि काल से अभी तक कृमि, किट पशु पक्षी मनुष्य नहीं बने हैं। इतर निगोदिया में निगोद से निकलकर कृमि, कीट, पशु, पक्षी और मनुष्य आदि बनते हैं। सभी निगोदिया जीव मिथ्या दृष्टि ही होते हैं। निगोदिया में जीव अनंतानंत बार जन्म-मरण करता है। एक श्वास में 8-10 बार जन्म-मरण करता है। जैन धर्म में ही सुमरण का वर्णन है। सही मरण से मोक्ष मिलेगा। यह पंडित मरण है। सामान्य जीव मरण से भयभीत रहते हैं परंतु, सम्यक दृष्टि मरण से नहीं डरता, वह जानता है कि मरण मेरे शरीर का होगा मेरी आत्मा का नहीं। प्रति समय मरण होता है उसे अविचीमरण कहते हैं। समय से पहले आकस्मिक मरण होना अकाल मरण है। आयु के पूर्ण होने पर मरना सकाल मरण है। मरण का शासन कर्मानुसार है। मृत्यु शरीर की होती है आत्मा की नहीं। जन्म मरण से परे अमृत अवस्था होती है। जिसमें दुबारा जन्म-मरण नहीं होता है। गर्भ में नहीं जाना पड़ता है। उन्होंने आगे कहा कि हर द्रव्य में अनेकांत है अनेकांत वस्तु स्वरूप है।</p>
<p>साधारण आहार एक समान आहार एक साथ उच्श्वास, एक साथ निश्वास। साधारण वनस्पति एक समय में अनंत जीव एक साथ उत्पन्न होते हैं। आचार्यश्री ने बताया कि मनुष्य के शरीर में जितने वायरस बैक्टीरिया है, उतने पूरी पृथ्वी में पशु-पक्षी भी नहीं है। आत्मविश्वास ज्ञान चरित्र समता शांति से मरण को मार सकते हैं। संयमी व ज्ञानी की मृत्यु पंडित मरण तथा अज्ञानी जीवों का मरण बालमरण होता है। कर्मक्षय से ही मृत्यु को जीता जाता है, यह मृत्यु के प्रति निर्भयता दर्शाता है। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>जीवन में हानि, लाभ, सुख, दुःख सभी के मूल में अच्छे बुरे कर्म : धर्माचार्य कनक नंदी जी ने वेबिनार में कर्म की गति और उसके प्रभाव को समझाया  </title>
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		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 11:48:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि संसार में 84 लाख योनिया क्यों? रावण औ विभीषण भाई-भाई थे फिर भी उनके स्वभाव में अंतर क्यों? वृक्ष की सभी पत्तियां अलग-अलग आकार प्रकार की क्यों होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर, हानि लाभ सुख दुख सब [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि संसार में 84 लाख योनिया क्यों? रावण औ विभीषण भाई-भाई थे फिर भी उनके स्वभाव में अंतर क्यों? वृक्ष की सभी पत्तियां अलग-अलग आकार प्रकार की क्यों होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर, हानि लाभ सुख दुख सब का मूल कारण कर्म है। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>डडूका।</strong> धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि संसार में 84 लाख योनिया क्यों? रावण औ विभीषण भाई-भाई थे फिर भी उनके स्वभाव में अंतर क्यों? वृक्ष की सभी पत्तियां अलग-अलग आकार प्रकार की क्यों होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर, हानि लाभ सुख दुख सब का मूल कारण कर्म है। तुम पतित से पावन, कंकर से शंकर, आत्मा से परमात्मा केवल आत्मज्ञान से ही बन सकते हो। पूर्व कर्म के तीव्र पाप से कर्म जीव पर हावी हो जाते हैं जिसके कारण गर्भ में ही रोग छोटी उम्र में रोग दादा होते हुए भी पोते की मृत्यु पिता के होते हुए बेटे की मृत्यु हो जाती है। कर्म के गुलाम होने से व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से गुरु पढाते हैं वह भी याद नहीं रहता। कर्म व जीव का महासंग्राम अनादिकाल से चल रहा है.। कर्म के कारण ही 84 लाख योनियों में जीव भ्रमण करता है। भस्मक रोग समंत भद्र आचार्य को हुआ था सामान्य लोगों को क्षुधा रोग होता ही है।</p>
<p>हम लोगों का भी पाप कर्मों का उदय था परंतु तीव्र नहीं था आत्मा को नहीं जानते थे। गुरुदेव ने सोचा भद्र जीव है पाप के कारण संसार में डूब जाएंगे अतः हम पर उपकार करके उपदेश दिया। कर्म हम पर हावी थे परंतु गुरु उपदेश से आत्म श्रद्धा बढी, आत्मज्ञान प्राप्त करने की रुचि जागृति हुई। आचार्य श्री परम सत्य के बारे में पढ़ रहे हैं तथा पढा रहे हैं। आत्मा एक अद्वितीय है। उसमें असंख्यात आत्म प्रदेश है एक आत्म प्रदेश में अनंत गुण अनंत पर्याय होती है। एक गुण में अनंत पर्याये होती है। आत्मा अनंत शक्ति संपन्न होते हुए भी कर्म का दास क्यों बना हुआ है?</p>
<p><strong> एक आत्मप्रदेश में अनंतानंत कर्म परमाणु बंधे होते हैं</strong></p>
<p>हाथी शक्तिशाली है उसे सामान्य धागे से नहीं बांध सकते हैं। वैसे ही आत्मा की अनंत शक्ति को बाधने के लिए कर्मों की भी अनंत शक्ति होती है। श्रेयांश वस्तावड़े सांगली तथा मनीष पंचोरी कॉलोनी की जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि सूर्य से रेडिएशन निकलता है वैसे ही जीव के शरीर से भी रेडिएशन निकलता है। एक आत्मप्रदेश में अनंतानंत कर्म परमाणु बंधे होते हैं परंतु कुछ कर्मों का उदय तुरंत हो जाता है कुछ का उदय बाद में होता है।. श्रीपाल राजा ने दिगम्बर साधु को कोडी कोडी कोडी बोलकर साधु की निंदा की थी उनके दोस्तों ने अनुमोदन की थी उसमें समय सेकंड का लगा परंतु इतने कम समय में कर्म परमाणु अधिक गहराई से बंध गए,कर्म का उदय आया। कुछ समय में कर्म बांधा उसी का फल कई वर्षों तक दुख भोगना पड़ा। कर्म उदय से शरीर से बदबू आने लगी पीव निकलने लगा राजपाठ को छोड़कर जंगल में जाना पडा।</p>
<p><strong> सिद्ध भगवान में अगुरुलघु गुण इलास्टिक पावर की तरह होता है</strong></p>
<p>अंजना सती में 22 घड़ी तक मूर्ति छुपाइ उसका फल 22 वर्ष पति वियोग सहना पड़ा।</p>
<p>सिद्ध भगवान एक समय में सिद्ध शिला पर विराजमान हो जाते हैं। सिद्ध भगवान में अधिक परिवर्तन होता है संसारी जीवो में इतना नहीं होता। संसारी जीवो में कर्मों का भार अधिक रहता है। सिद्ध भगवान में अनंत गुण होने से षटगुण हानी वृद्धि सर्वाधिक होती है। जैसे बैलगाड़ी साइकिल ट्रेन एरोप्लेन क्वांटम एटम की गति में अंतर होता है। सिद्ध भगवान की ऊर्ध्व गति सबसे अधिक होती है। तीव्र परिणमन भी अधिक होता है। सिद्ध भगवान में अगुरुलघु गुण इलास्टिक पावर की तरह होता है। जैसे ट्यूब बैलून में हवा। सिद्ध भगवान में अनंतानंत गुण प्रकट हो गए हैं कर्म रहित निकम्मे ज्यादा सक्रिय होते हैं। जितना जितना जीव सिद्ध होता जाता है उतनी उतनी उसमें शक्ति प्रगट होती जाती है। शुद्ध आत्मा के परिणमन को गणधर नहीं देख सकते। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता महासंग्राम महासंग्राम विश्व का सबसे है बड़ा महासंग्राम। अंतरंग शत्रु नाश होने से बहिरंग संग्राम कहां से होगा द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी सागवाड़ा निवासी विजयलक्ष्मी गोदावत ने दी।</p>
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		<title>समस्त दुःखों और संसार का मूल कारण मोह और मिथ्यात्व है : धर्माचार्य कनक नंदी जी की मंगलवाणी से मिल रहा समाजजनों को अमृत ज्ञान  </title>
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		<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 12:59:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनक नंदी जी भीलुड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने वेबिनार में बताया कि अनादिकाल से जीव शरीर को ही स्व स्वरूप समझता है। डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;     डडूका। धर्माचार्य कनक नंदी जी भीलुड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनक नंदी जी भीलुड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने वेबिनार में बताया कि अनादिकाल से जीव शरीर को ही स्व स्वरूप समझता है। <span style="color: #ff0000">डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;    </span></strong></p>
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<p><strong>डडूका।</strong> धर्माचार्य कनक नंदी जी भीलुड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने वेबिनार में बताया कि अनादिकाल से जीव शरीर को ही स्व स्वरूप समझता है। इंद्रियों के भोग उपभोग में ही मिथ्या दृष्टि रमण करता है। स्व तत्व आत्म तत्व को नहीं जानता है। इंद्रीय विषय में लीन होकर पाप करता है। जीव स्वयं की आध्यात्मिक स्वरूप अनंत ज्ञान अनंत वीर्य अनंत सुख अनंतबल शुद्ध बुद्ध आनंद को नहीं जानता है। मोही जीव स्व स्वरूप को नहीं जानता है। समस्त दुःखों का तथा संसार का मूल कारण मोह और मिथ्यात्व है। इंद्रियों की प्रवृत्ति बाह्य होती है., आंतरिक नही। स्वयं की आंखों को स्वयं नहीं देख सकते, उसको देखने के लिए दर्पण का सहारा लेना पड़ता है। जो सत्य है वह मेरा है। यह मानना सम्यक दर्शन है। जो मैं कहता हूं वही सत्य है यह मानना मिथ्यात्व है।</p>
<p><strong>कर्मबंध का मुख्य कारण मोह</strong></p>
<p>भोग भूमि में भाव मिथ्या्व होता है द्रव्य मिथ्यात्व नहीं। भाव रूप में हर जीव मिथ्या दृष्टि है। परम सत्य आत्म तत्व को वास्तविक सत्य को नहीं मानना मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व के अनेक भेद, प्रभेद हैं। विपरीत, एकांत, विनय, संशय, अज्ञान इस प्रकार मिथ्यात्व के पांच भेद हैं। काल से ही सबकुछ होता है, ऐसा मानना भी मिथ्यात्व है। एक आयाम को मनाना अन्य आयाम को नकार देना भी मिथ्यात्व है। निश्चय को ही मानना व्यवहार को नहीं मानना यह भी मिथ्यात्व है। व्यवहार को ही मानना निश्चय को नहीं मानना, यह भी मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व सबसे बड़ा पाप है।</p>
<p>जब तक मोक्ष नहीं होता तब तक कर्म बंध होता रहता है। कर्मबंध का मुख्य कारण मोह तथा मिथ्यात्व है।</p>
<p><strong>मिथ्यात्व से ही संसार भ्रमण होता है</strong></p>
<p>निगोदिया जीव होने का मुख्य कारण मिथ्यात्व है। निगोदिया जीव महापापी है क्योंकि, वह अनंतानुबंधी कषायों से युक्त भाव कलंक से कलंकित होते हैं। दर्शन मोह, चरित्र मोह के तीव्र कर्मबंध के कारण स्वयं को जीव नहीं जान पाता है। मिथ्यात्व गुणस्थान में 100 पाप प्रकृतियों का बंध होता है। मिथ्यात्व से ही संसार भ्रमण होता है। सम्यक दर्शन से मिथ्यात्व रूपी घना वृक्ष कट जाता है। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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