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	<title>Bharatotsav &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आदि पुत्र भरत का भारत’ अहिंसक संस्कृति के प्रणेता: आज के दिवस को भारतोत्सव के रूप में मनाए  </title>
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		<pubDate>Thu, 12 Mar 2026 09:35:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेवजी का गुरुवार को चेत्र बदी नवमी को जन्म कल्याणक दिवस है। वही आज ऋषभदेवजी के ही ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरतजी का भी जन्म दिवस है। जिनके नाम पर भारत देश का नाम भारत है। आज पढ़िए, पुष्पा पांड्या का यह आलेख  जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेवजी का गुरुवार को चेत्र बदी नवमी को जन्म कल्याणक दिवस है। वही आज ऋषभदेवजी के ही ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरतजी का भी जन्म दिवस है। जिनके नाम पर भारत देश का नाम भारत है। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, पुष्पा पांड्या का यह आलेख </span></strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेवजी का गुरुवार को चेत्र बदी नवमी को जन्म कल्याणक दिवस है। वही आज ऋषभदेवजी के ही ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरतजी का भी जन्म दिवस है। जिनके नाम पर भारत देश का नाम भारत है। अतः आज के दिन को भरतोत्सव, भारतोत्सव या भारत पर्व के रूप में मनाया जाना चाहिए। अयोध्या जो जैन तीर्थंकरों की शाश्वत जन्मभूमि है। जहां से भूतकाल के 24 तीर्थंकर का जन्म हुआ और वर्तमान काल के आदिनाथजी, अजितनाथजी, सुमति नाथजी, अभिनंदनजी तथा अनंतनाथजी की जन्मभूमि है तथा प्रथम तीर्थंकर आदिनाथजी के भरत आदि 100 पुत्रों और दो पुत्रियों ब्राह्मी सुंदरी की जन्मभूमि भी अयोध्या ही है। रामचंद्रजी का जन्म, काल 20 वें तीर्थंकर के समय की बात है और महाभारत का काल 22 वें तीर्थंकर नेमिनाथजी के समय की बात है। आदिनाथजी के समय दस प्रकार के कल्पवृक्ष मालांग, भोजनांग, भाजनांग तुर्यांग ,सूर्यांग, पानाएंग आदि थे। जिससे इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती थी। धीरे-धीरे कल्पवृक्ष समाप्त होने लगे लोगों का जीवनयापन करना मुश्किल हो गया। तब राजकुमार आदिकुमार ने असि (शस्त्र चलाना), मसि, (लेखनकला), कृषि (खेती करना), वाणिज्य( व्यापार करना) , शिल्पक़ला ओर विद्या के द्वारा लोगों को जीवन जीना सिखाया। 72 कला के प्रणेता ऋषभदेवजी ने अपने पुत्रों को अनेक कलाओं में पारंगत किया। भरतजी को रत्न परिक्षण, आयर्वेद, अर्थशास्त्र धुड़सवारी आदि की शिक्षा दी। अपनी पुत्री ब्राह्मी को लेखन कला सिखायी जो ब्राह्मी लिपि के नाम से प्रसिध हुई। बेटी सुंदरी को अंक कला सिखाई। एक बार ऋषभ देव जी के जन्म दिवस के अवसर पर अप्सरा नर्तकी नीलांजना नृत्य कर रही थीं कि नृत्य करते मृत्यु को देख वेराग्य ले लिया और अपना राजपाट सभी पुत्रों को सोपकर भरत जी को अयोध्या का राजकाज देकर दिक्षा ले वन को चले गए। भरतजी के जन्म से पूर्व उनकी माता नंदा देवी को छः शुभ स्वप्न दिखाई दिए थे। सुमेरु पर्वत, सूर्य, चंद्रमा, सरोवर में हंस, धंसी हुई पृथ्वी, ओर चंचल लहरों वाला समुद्र। जिसका अर्थ भावी तीर्थंकर अवधिज्ञानी राजा ऋषभदेव ने बताया कि हमारा पुत्र महाप्रतापी, चक्रवर्ती वीर संसार समुद्र को पार करने वाला होगा। जन्म लेते ही बालक ने दोनों हाथों से पृथ्वी का आलिंगन किया। जिससे निमित्त ज्ञानियों ने कहा कि वे समस्त पृथ्वी के अधिपति होंगे। उनकी हथेली चक्रादि शुभ चिन्हों से शोभायमान थी उनके पांव में भी चक्र, छत्र, तलवार आदि चौदह रत्नों के चिह्न थे। वे अत्यंत बलशाली सुंदर दिव्य पुरुष थे। पराक्रमी राजा भरत ने अपने राज्य को सुचारु रूप से चालाया। एक दिन वे राज्यसभा में बैठे थे कि उन्हें तीन ख़ुशियाँ एक साथ प्राप्त हुई। आयुध शाला में चक्र रत्न की प्राप्ति, मुनिराज ऋषभदेव को केवल ज्ञान की प्राप्ति और पुत्र रत्न की प्राप्ति। राजा भरत ने धर्म को प्रधानता दे वे सर्वप्रथम मुनिराज ऋषभदेवजी की वंदना को गए। फिर आयुध शाला में चक्ररत्न देखने के बाद पुत्र प्राप्ति का उत्सव मनाया।</p>
<p>12 चक्रवर्ती में प्रथम चक्रवर्ती भरत जी थे। चक्रवर्ती का अपार वेभव होता है। उन्हें 14 रत्न व नौ निधियां दशाँग भोग आदि प्राप्त होते हैं। वे छः खंड के अधिपति होते हैं। निधि 6 योजन चौड़ी 12 योजन लंबी और 8 योजन गहरी गाड़़ी की आकृति की निधिपाल देवों द्वारा सुरक्षित, चक्रवर्ती के मनोरथ को पूर्ण करने वाली ,जन जन की उपकारक ,एक एक हज़ार यक्षदेवों द्वारा सेवित ग्रहपति रत्न के अधीन रहने वाली निधि कही जाती है। नाना प्रकार के पदार्थ देने वाली काल निधि, भोज्य पदार्थ देने वाली महाकाल निधि, आयुध पदार्थ वाली माणककाल निधि, आभरण देनेवाली पिंगलनिधि, मंदिर प्रदाता नैसर्ग़ निधि, वस्त्र प्रदाता पद्मनिधि, पाण्डुक निधि से धान्य, शँख निधि से वादित्र , ओर रत्ननिधि से सब प्रकार के रत्न प्राप्त होते हैं। चक्रवर्ती ,बलदेव व नारायण रत्न का धारण करते है।’’</p>
<p>’’इस प्रकार समस्त लोक सम्मान से भरा उनका वह भारत के प्रथम राजा होने के साथ साथ प्रथम चक्रवर्ती भी थे। उन्होंने अपनी धर्मवीरता, धर्मपालन और अधिकारवादी राजनीति के लिए विख्यात थे। भारत की अद्भुत संस्कृति और उसकी भूमि को भरत पुत्र की आवाज से जोड़ा जाता है।’’</p>
<p>’’समस्त सिहासनो को जीतने वाला सेनापति रत्न, हर्म्यपति (गृहपति भंडारी) रत्न, पुरोहित रत्न धर्मानुष्ठान करवाने वाला, स्थापित रत्न, महल मंदिर स्थापित करने वाला, स्त्री रत्न, गजपती रत्न अश्व रत्न ये सात चेतन रत्न ओर सात अचेतन रत्न होते हैं। चक्र रत्न एक हज़ार आरे वाला, अत्यंत तेजस्वी, राजा के दिग्विजय के लिए चलते समय आगे चलता है। जिसे क़ोई रोक नही सकता। जो सम्पूर्ण षट्खंड का राज्य जीतने पर ही नगर में प्रवेश करता है। आपत्ति केसमय सेना की रक्षा करने वाला सूर्यप्रभ छत्र रत्न सेना में आनंद व जोश भरने वाला भद्रमुख खड्ग रत्न ख़ंदक, चट्टानो को समतल करने वाला प्रबद्ध दंग दंड रत्न।’’</p>
<p>’’अंधकार को दूर करने वाला कांकिनी रत्न, इच्छित पदार्थदेने वाला चूड़ामणि रत्न, ओर नदियों, समुद्र आदि को सुरक्षित पार करने वाला चर्म रत्न। इस प्रकार अनेक रतनो ओर निधियो से विभूषित राजा भरत ने षट्खंड पृथ्वी पर राज्य कर प्रथम चक्रवर्ती कहलाए।’’</p>
<p>’’कहते हैं “भरतजी धर में ही बैरागी” ओर इतनी अपार धन सम्पदा, वैभव को क्षणभंगुर मान क्षणभर में त्याग कर निर्ग्रंथ मुनि बन सिद्धपद को प्राप्त कर भगवान बन गये। जैन मन्दिरों में भरत भगवान की निर्ग्रंथ प्रतिमाये देखने को मिलती है।’’</p>
<p>’’ओर प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेवजी के पिता चोदहवे मनु अंतिम कुलकर राजा नाभिरायजी के नाम से “अजनाभ वर्ष” कहलाने वाला देश ऋषभदेवजी के पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम से“भारत वर्ष” कहलाने लगा।’’</p>
<p>’’दिल्ली के अक्षर धाम के बगीचे में भरतजी की प्रतिमा लगी है, जिसके नीचे लिखा है “जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देवजी के प्रथम चक्रवर्ती पुत्र जिनके नाम से भारत देश का नाम भारत पड़ा”।</p>
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		<title>चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव मनाया जाए: लेखिका पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोेध किया  </title>
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		<pubDate>Wed, 11 Feb 2026 12:28:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती जी के जन्म दिवस चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की जाए। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती जी के जन्म दिवस चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की जाए। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती जी के जन्म दिवस चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की जाए। यह दिवस इस बार 12 मार्च को है। इस दिन को भारत दिवस के रूप में मनाए जाने का की घोषणा से समग्र जैन समाज हर्षित होगा। उन्होंने बताया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव और उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है। इसलिए चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव या भारत दिवस के रूप में मनाया जाना श्रेयस्कर होगा। पत्र में उन्होंने मांग की है कि पाठ्य पुस्तकों में उनके पाठ पढ़ाए जाएं। उनकी विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित भी होनी चाहिए। साथ ही यह भी अनुरोध किया कि इस दिन पशु वध एवं मांस विक्रय केंद्र बंद रखे जाएं तथा मांसाहारी खाद्य सामग्री हवाईजहाज, रेल, होटल्स, दाबों ठेलों आदि में भी बनाने और परोसने पर पाबंदी लगाई जाए। पुष्पा पांड्या ने बताया कि कर्मयुग के प्रारंभ कर्ता छह कर्मों की शिक्षा द्वारा कौशल की शिक्षा देकर जीवन जीने की कला सिखाने वाले 72 कला के प्रणेता जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी और उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत जिनके नाम से देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा। वे छह खंड के अधिपति 9 निधि और चौदह रत्न धारी थे। भरत जी का जन्म भी अयोध्या नगरी में उनके पिता ऋषभ देव जी के जन्म दिन चैत्र वदी नवमी के दिन हुआ था। जो इस वर्ष 12 मार्च को है। इस दिन को भारतोत्सव के रूप में मनाया जाए। भरत जी और ऋषभ देव जी के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा हो। उनके जीवन पर आधारित जानकारी पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाई जाए। भरत चक्रवर्ती जी की विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा अयोध्या में स्थापित होनी चाहिए। इससे पूर्व भारत देश ऋषभ देव जी के पिता और भरत के दादाजी राजा नाभिराय जी के नाम से अजनाभ वर्ष कहलाता था। शकुंतला पुत्र भरत के नाम से देश का नाम भारत हुआ ये सर्वथा गलत है। इस आशय को पाठ पाठ्य पुस्तकों से हटाए जाए। शकुंतला पुत्र भरत की कहानी महाभारत के समय की है। जो जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ जी के समय की बात है जबकि, हजारों साल पूर्व से ही हमारे देश का नाम भारत है।</p>
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		<title>चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव मनाया जाए: लेखिका पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोेध किया  </title>
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		<pubDate>Thu, 05 Feb 2026 12:49:05 +0000</pubDate>
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<p><strong>वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती जी के जन्म दिवस चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की जाए। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती जी के जन्म दिवस चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की जाए। यह दिवस इस बार 12 मार्च को है। इस दिन को भारत दिवस के रूप में मनाए जाने का की घोषणा से समग्र जैन समाज हर्षित होगा। उन्होंने बताया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव और उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है। इसलिए चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव या भारत दिवस के रूप में मनाया जाना श्रेयस्कर होगा। पत्र में उन्होंने मांग की है कि पाठ्य पुस्तकों में उनके पाठ पढ़ाए जाएं। उनकी विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित भी होनी चाहिए। साथ ही यह भी अनुरोध किया कि इस दिन पशु वध एवं मांस विक्रय केंद्र बंद रखे जाएं तथा मांसाहारी खाद्य सामग्री हवाईजहाज, रेल, होटल्स, दाबों ठेलों आदि में भी बनाने और परोसने पर पाबंदी लगाई जाए। पुष्पा पांड्या ने बताया कि कर्मयुग के प्रारंभ कर्ता छह कर्मों की शिक्षा द्वारा कौशल की शिक्षा देकर जीवन जीने की कला सिखाने वाले 72 कला के प्रणेता जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी और उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत जिनके नाम से देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा। वे छह खंड के अधिपति 9 निधि और चौदह रत्न धारी थे। भरत जी का जन्म भी अयोध्या नगरी में उनके पिता ऋषभ देव जी के जन्म दिन चैत्र वदी नवमी के दिन हुआ था। जो इस वर्ष 12 मार्च को है। इस दिन को भारतोत्सव के रूप में मनाया जाए। भरत जी और ऋषभ देव जी के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा हो। उनके जीवन पर आधारित जानकारी पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाई जाए। भरत चक्रवर्ती जी की विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा अयोध्या में स्थापित होनी चाहिए।</p>
<p>इससे पूर्व भारत देश ऋषभ देव जी के पिता और भरत के दादाजी राजा नाभिराय जी के नाम से अजनाभ वर्ष कहलाता था। शकुंतला पुत्र भरत के नाम से देश का नाम भारत हुआ ये सर्वथा गलत है। इस आशय को पाठ पाठ्य पुस्तकों से हटाए जाए। शकुंतला पुत्र भरत की कहानी महाभारत के समय की है। जो जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ जी के समय की बात है जबकि, हजारों साल पूर्व से ही हमारे देश का नाम भारत है।</p>
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