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	<title>Bardoli &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 13 भट्टारक श्री अभयचंद्र आध्यात्मिक जादूगर बन गए:  काव्य वैभव और सौष्ठव प्रयुक्त होने की अपेक्षा प्रचार का लक्ष्य अधिक था </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Mar 2025 00:30:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधुता से जन-जन में आध्यात्मिक चेतना से जनजागरण किया। वहीं उनकी साहित्य साधना ने हिन्दी साहित्य को उस समय खूब समृद्ध किया। संतों का साहित्य के प्रति समर्पण के कारण जैन धर्म को आगे बढ़ाने में सफलता मिली। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधुता से जन-जन में आध्यात्मिक चेतना से जनजागरण किया। वहीं उनकी साहित्य साधना ने हिन्दी साहित्य को उस समय खूब समृद्ध किया। संतों का साहित्य के प्रति समर्पण के कारण जैन धर्म को आगे बढ़ाने में सफलता मिली।<span style="color: #ff0000"> जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 13वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री अभयचंद्रजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> अभयचंद्र नाम के दो भट्टारक हुए हैं। ‘प्रथम अभयचंद्र’ भट्टारक श्री लक्ष्मीचंद्र के शिष्य थे, जिन्होंने एक स्वतंत्र भट्टारक संस्था को जन्म दिया। उनका समय विक्रम की 16वीं शताब्दी का द्वितीय चरण था। दूसरे अभयचंद्र इन्हीं की परंपरा में होने वाले भट्टारक कुमुदचंद्र के शिष्य थे। यहां इन्हीं दूसरे अभयचंद्र जी का परिचय दिया जा रहा है। अभयचंद्र भट्टारक थे और कुमुदचंद्र की समाधि के बाद भट्टारक गादी पर बैठे थे। यद्यपि अभयचंद्र का गुजरात से काफी निकट का संबंध था, लेकिन राजस्थान में भी इनका बराबर विहार होता था और ये गांव-गांव एवं नगर-नगर में भ्रमण करके जनता से सीधा संपर्क बनाए रखते थे। अभयचंद्र अपने गुरु के योग्यतम शिष्य थे। उन्होंने भट्टारक श्री रत्नकीर्ति एवं भट्टारक श्री कुमुदचंद्र जी का काल देखा था। उनकी साहित्य साधना भी देखी थी। इसलिए जब ये प्रमुख संत बने तो इन्होंने भी उसी परंपरा को बनाए रखा। संवत 1685 की फाल्गुन सुदी 11 सोमवार के दिन बारडोली नगर में इनका पट्टाभिषेक हुआ। इस पद पर संवत 1721 तक रहे।</p>
<p><strong>संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों का उच्च अध्ययन किया</strong></p>
<p>अभयचंद्र का जन्म संवत 1640 के लगभग हूंबड वंश में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीपाल और माता का नाम कोडमदे था। बचपन से ही बालक अभयचंद्र को साधुओं की मंडली में रहने का अवसर मिला। हेम जी कुंअर जी इनके भाई थे। ये संपन्न घराने के थे। युवावस्था के पहले ही इन्होंने पांचों महाव्रतों का पालन प्रारंभ कर दिया था। इसी के साथ इन्होंने संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों का उच्चाध्ययन किया। न्यायशास्त्र में पारंगतता प्राप्त की। अलंकार शास्त्र एवं नाटकों का गहरा अध्ययन किया। अच्छे वक्ता तो ये प्रारंभ से ही थे। विद्वता होने से सोने पर सुहागा सा समन्वय हो गया। जब उन्होंने युवावस्था में पदार्पण किया तो त्याग एवं तपस्या के प्रभाव से इनकी मुखाकृति स्वयंमेव आकर्षक बन गई। जनता के लिए ये आध्यात्मिक जादूगर बन गए। इनके सैकड़ों शिष्य थे। जो स्थान-स्थान पर ज्ञान दान किया करते थे।</p>
<p><strong>अभयचंद्र जी के प्रमुख शिष्य</strong></p>
<p>इनके प्रमुख शिष्यों में गणेश, दामोदर, धर्मसागर, देवजी व रामदेव के नाम प्रमुख हैं। जितनी अधिक प्रशंसा शिष्यों ने इनकी की है। अन्य भट्टारकों की उतनी प्रशंसा देखने में नहीं आती है। एक बार भट्टारक अभयचंद्र का सूरत नगर में आगमन हुआ। वह संवत 1706 का समय था। सूरत नगर निवासियों ने उस समय इनका भारी स्वागत किया। घर-घर उत्सव किया। कुंकुम छिड़का गया। अंग पूजा का आयोजन किया गया।</p>
<p><strong>भट्टारक श्री अभयचंद प्रचारक के साथ-साथ साहित्य निर्माता भी</strong></p>
<p>भट्टारक श्री अभयचंद प्रचारक के साथ-साथ साहित्य निर्माता भी थे। यद्यपि अभी तक उनकी अधिक रचनाएं उपलब्ध नहीं हो सकी हैं, लेकिन फिर भी उन प्राप्त रचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि उनकी कोई बड़ी रचना भी मिलनी चाहिए। कवि ने लघु गीत अधिक लिखे हैं। इसका प्रमुख कारण तत्कालीन साहित्यिक वातावरण ही था।</p>
<p><strong>इन कृतियों के माध्यम से फैली कीर्ति</strong></p>
<p>अब तक इनकी ये कृतियां उपलब्ध हो चुकी हैं। वासुपूज्यनी धमाल, चंदागीत, सूखड़ी, चतुर्विशति तीर्थंकर लक्षण गीत, पद्मावती गीत, नेमिश्वरस्तु ज्ञान कल्याणक गीत, आदिश्वरनाथनु पंच कल्याणक गीत, बलभद्र गीत आदि हैं। ये सभी रचनाएं लघु कृतियां हैं। यद्यपि काव्यतत्व, शैली एवं भाषा की दृष्टि से ये उच्चस्तरीय रचनाएं नहीं हैं, लेकिन तत्कालीन समय जनता की मांग पर ये रचनाएं लिखी गईं थी। इसलिए इनमें कवि का काव्य वैभव और सौष्ठव प्रयुक्त होने की अपेक्षा प्रचार का लक्ष्य अधिक था। भाषा की दृष्टि से भी इनका अध्ययन आवश्यक है। राजस्थानी भाषा की ये रचनाएं हैं तथा उसका प्रयोग कवि ने अत्यधिक सावधानी से किया है। गुजराती भाषा का प्रयोग तो स्वभावतः ही हो गया है। इस प्रकार कविवर अभयचंद्र ने अपनी लघु रचनाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य की जो महती सेवा की थी। वह सदा स्मरणीय रहेगी ।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 12 बारडोली के संत श्री कुमुदचंद्र जी का साहित्य को अमूल्य योगदान: उनकी गुजरात और राजस्थान में अच्छी प्रतिष्ठा थी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Mar 2025 00:30:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजस्थान के संत]]></category>
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					<description><![CDATA[राजस्थान को जैन संतों की भूमि के रूप में ख्याति अर्जित है। प्राचीन काल में भी यहां कई दिव्य संतों का जन्म और भ्रमण हुआ है। संत श्री कुमुदचंद्र जी ऐसे ही संत थे। वे संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इतने लंबे समय में इन्होंने देश के अनेक स्थानों पर विहार किया। जन साधारण को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान को जैन संतों की भूमि के रूप में ख्याति अर्जित है। प्राचीन काल में भी यहां कई दिव्य संतों का जन्म और भ्रमण हुआ है। संत श्री कुमुदचंद्र जी ऐसे ही संत थे। वे संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इतने लंबे समय में इन्होंने देश के अनेक स्थानों पर विहार किया। जन साधारण को धर्म आध्यात्म का पाठ पढ़ाया। वे अपने समय के असाधारण संत थे। उनकी गुजरात और राजस्थान में अच्छी प्रतिष्ठा थी। जैन साहित्य एवं सिद्धांत का उन्हें अप्रतिम ज्ञान था। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 12वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का संत श्री कुमुदचंद्रजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> बारडोली गुजरात का प्राचीन नगर है। वर्ष 1921में यहां सरदार वल्लभ भाई पटेल ने स्वतंत्रता के लिए सत्याग्रह का बिगुल बजाया था। बाद में वहीं की जनता ने उन्हें सरदार की उपाधि दी थी। 350 वर्ष पूर्व भी यह नगर आध्यात्म का केंद्र था। यहां पर ही संत श्री कुमुदचंद्र को उनके गुरु भट्टारक श्री रत्न कीर्ति जी एवं जनता ने भट्टारक पद पर आरूढ़ किया थ्ज्ञा। इन्होंने यहां के निवासियों में धार्मिक चेतना जाग्रत की। उन्हें सद्चरित्रता, संयम एवं त्यागमय जीवन अपनाने पर बल दिया। इन्होंने गुजरात एवं राजस्थान में साहित्य, आध्यात्म एवं धर्म की त्रिवेणी बहायी। संतश्री कुमुदचंद्रजी वाणी से मधुर, शरीर से सुंदर तथा मन से स्वच्छ थे। जहां भी उनका विहार होता जनता उनके पीछे हो जाती।</p>
<p><strong>संतश्री कुमुदचंद्रजी का जन्म गोपुर गांव में हुआ था</strong></p>
<p>शिष्यों ने अपने गुरु की प्रशंसा में विभिन्न पद लिखे। संयमसागर ने उनके शरीर को 32 लक्षणों से सुशोभित, गंभीर बुद्धि के धारक तथा वादियों के पहाड़ को तोड़ने के लिए व्रज समान कहा है। उनके दर्शन मात्र से ही प्रसन्नता होती थी। वे पांच महाव्रत तेरह प्रकार के चारित्र को धारण करने वाले और 22 परिषह को सहने वाले थे। एक दूसरे शिष्य धर्मसागर ने उनकी पात्र केशरी, जंबुकुमार, भद्रबाहु एवं गौतम गणधर से तुलना की है। उनके विहार के समय कुंकुम छिड़कने तथा मोतियों का चौक पूरने तथा बधावा गाने के लिए भी कहा जाता था। जीवों की दया करने के कारण लोग उन्हें दया का वृक्ष कहते थे। विद्याबल से उन्होंने अनेक विद्वानों को अपने वश में कर लिया था। संतश्री कुमुदचंद्रजी का जन्म गोपुर गांव में हुआ था। पिता का नाम सदाफल एवं माता का नाम पद्माबाई था। इन्होंने मोढ़ वंश में जन्म लिया था। वे जन्म से ही होनहार थे। युवावस्था से पूर्व ही उन्होंने संयम धारण कर लिया था। अध्ययन की ओर विशेष ध्यान था।</p>
<p><strong>कुमुदचंद्र जी बारडोली के संत कहलाने लगे</strong></p>
<p>ये रात-दिन व्याकरण, नाटक, न्याय आगम एवं छंद अलंकार शास्त्र आदि का अध्ययन करते थे। गोम्मट खार आदि ग्रंथों का इन्होंने विशेष अध्ययन किया था। विद्यार्थी अवस्था में ही ये भट्टारक रत्नकीर्तिजी के शिष्य बन गए थे। बारडोली में श्री रत्नकीर्ति जी ने इनको अपना पट्ट स्थापित किया था और संवत 1656 वैशाख मास में इनका जैेनों के प्रमुख संत भट्टारक के पद पर अभिषेक कर दिया। यह सारा कार्य संघपति कान्हजी, संघ बहन जीवादे, सहस्त्रकरण और उनकी धर्मपत्नी तेजलदे, भाई मल्लदास, बहन मोहनदे, गोपाल आदि की उपस्थिति में हुआ। तभी से कुमुदचंद्र जी बारडोली के संत कहलाने लगे थे।</p>
<p><strong>सभी रचनाएं राजस्थानी भाषा में हैं</strong></p>
<p>कुमुदचंद्रजी आध्यात्मिक एवं धार्मिक संत होने के साथ ही साहित्य के परम आराधक थे। अब तक इनकी छोटी-बड़ी 28 रचनाएं और 30 से अधिक पद प्राप्त हो चुके हैं। ये सभी रचनाएं राजस्थानी भाषा में हैं। जिन पर गुजराती का भी प्रभाव है। ऐसा माना जाता है कि ये चिंतन,मनन और धर्मोपदेश के अतिरिक्त अपना सारा समय साहित्य सृजन में लगाते थे। नेमिनाथ के तारणद्वार पर आकर वैराग्य धारण करने की अद्भुत घटन से ये अपने गुरु रत्नकीर्ति जी के सामन बहुत प्रभावित थे। इसलिए इन्होंने नेमिनाथ और राजुल पर कई रचनाएं लिखी हैं। उनमें नेमिनाथ बारहमासा,नेमिश्वर गीत, नेमिजिन गीत आदि उल्लेखनीय है।</p>
<p><strong>संतश्री कुमुदचंद जी का शिष्य परिवार</strong></p>
<p>संत श्री कुमुदचंद्र जी संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इतने लंबे समय में इन्होंने देश के अनेक स्थानों पर विहार किया। जन साधारण को धर्म आध्यात्म का पाठ पढ़ाया। वे अपने समय के असाधारण संत थे। उनकी गुजरात और राजस्थान में अच्छी प्रतिष्ठा थी। जैन साहित्य एवं सिद्धांत का उन्हें अप्रतिम ज्ञान था। वैसे तो भट्टारकों के बहुत से शिष्य हुआ करते थे। इनमें आचार्य, मुनि, ब्रह्मचारी, आर्यिका आदि होते थे। अभी जो रचनाएं उपलब्ध हैं। उनमें अभयचंद, ब्रह्मसागर, धर्मसागर,संयमसागर, जयसागर, गणेशसागर आदि के नाम प्रमुख है। ये सभी शिष्य हिन्दी ओर संस्कृत के अच्छे विद्वान थे।</p>
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