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	<title>Aryika Shri Gyanmati Mataji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>णमोकार महामंत्र जाप्य लेखकों का सम्मान कर प्रमाण पत्र दिए: अब तक एक अरब 46 करोड़ 18 लाख मंत्र लिखे जा चुके  </title>
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		<pubDate>Fri, 19 Dec 2025 11:54:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ जाप्य लेखकों का सम्मान समारोह रविवार सुबह 9.30 बजे श्री महावीर साधना संस्थान, अहिंसा पथ महावीर नगर में न्यायमूर्ति नरेन्द्र कुमार जैन की अध्यक्षता में हुआ। उपस्थित सभी जाप्य लेखकों ने सस्वर णमोकार महामंत्र का पाठ किया। जयपुर से पढ़िए, उदयभान जैन की यह रिपोर्ट&#8230; जयपुर। आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी द्वारा 8 अक्टूबर (शरद पूर्णिमा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> जाप्य लेखकों का सम्मान समारोह रविवार सुबह 9.30 बजे श्री महावीर साधना संस्थान, अहिंसा पथ महावीर नगर में न्यायमूर्ति नरेन्द्र कुमार जैन की अध्यक्षता में हुआ। उपस्थित सभी जाप्य लेखकों ने सस्वर णमोकार महामंत्र का पाठ किया। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, उदयभान जैन की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी द्वारा 8 अक्टूबर (शरद पूर्णिमा के दिन) 1995 में गठित णमोकार महामंत्र बैंक की जयपुर शाखा माताजी द्वारा प्रवर्तित समवशरण रथ के जयपुर आगमन पर प्रेरणा पाकर विमलकुमार सोगाणी समिति के प्रथम अध्यक्ष ने वर्ष 1999 में श्री चंद्रप्रभ जिनालय दुर्गापुरा‌ में आयोजित विचार गोष्ठी के दौरान विभिन्न कालोनियों से आए श्रेष्ठियों की उपस्थिति में णमोकार महामंत्र बैंक संचालन समिति जयपुर का गठन किया। तब से निरंतर समिति द्वारा णमोकार महामंत्र जाप्य पुस्तिकाएं वितरित कर जाप्य लेखकों द्वारा णमोकार महामंत्र लिखवाया जाकर आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी के जन्म दिवस शरद पूर्णिमा के अवसर पर जाप्य पुस्तिकाओं का संग्रहण कर जम्बूद्वीप हस्तिनापुर भेजकर वहां से प्राप्त प्रमाणपत्रों का वितरण वर्ष 2000 से नियमित किया जा रहा है। समिति के अध्यक्ष हरक चंद बडजात्या हमीरपुर वाले ने बताया कि जाप्य लेखकों का सम्मान समारोह रविवार सुबह 9.30 बजे श्री महावीर साधना संस्थान, अहिंसा पथ महावीर नगर में न्यायमूर्ति नरेन्द्र कुमार जैन की अध्यक्षता में हुआ।</p>
<p>कार्यक्रम के प्रारंभ में श्रेष्ठी महावीर कुमार उषा गोदिका अपने सुपुत्र-सुपुत्री जो अमेरिका से आई हुई थी ने चित्र अनावरण कर भगवान महावीर के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया। श्राविका मंजू जैन सेवा वाले, संतोष चांदवाड ने सुंदर मंगलाचरण कर समारोह की शुरुआत की। उपस्थित सभी जाप्य लेखकों ने सस्वर णमोकार महामंत्र का पाठ किया।</p>
<p>समिति के मंत्री महावीरकुमार चांदवाड ने बताया कि उपस्थित सभी जाप्य लेखकों, दानदाताओं का स्वागत अभिनन्दन किया गया। समारोह न्यायमूर्ति नरेन्द्रकुमार जैन, महावीर साधना संस्थान के मंत्री सुरेशकुमार जैन, चित्र अनावरण दीप प्रज्ज्वलन कर्ता महावीर कुमार उषा गोदिका परिवार, मुख्य अतिथि विद्या प्रमाण रियल्टी के विनोदकुमार विभोर कुमार छाबडा, विशिष्ट अतिथि पवन कुमार गुणमाला लुहाडिया रायथल वाले‌, सहयोगी विजयकुमार, विनोदकुमार वेद, चंद्रकांता इंद्रचंद जैन, जैन पत्रकार महासंघ के‌ राष्ट्रीय महामंत्री और अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन अनिता बड़जात्या, विशिष्ट सहयोगी प्रमोदकुमार रितेश छाबडा, कमलचंद गोदिका, विद्वान राजेश गंगवाल आदि सभी अतिथियों का तिलक माल्यार्पण के साथ प्रतीक चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह में हीरक पदक 39, स्वर्ण 93 और रजत 187 कुल 319।</p>
<p>जिन्होंने एक करोड़ 46 लाख 18 हजार णमोकार महामंत्र का लेखन कर जाप्य पुस्तिकाएं जमा कराई है। सभी लेखकों व अतिथियों को गुलाबचंद्र सुभाषचंद गंगवाल की ओर से प्रतीक चिह्न औरलेखकों को हस्तिनापुर से प्राप्त प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। विद्वान पंडित राजेशकुमार गंगवाल द्वारा 84 लाख मंत्रों के जनक णमोकार महामंत्र के महात्म्य को विस्तृत रूप से समझाया। समिति के उपाध्यक्ष बाबूलाल जैन के अनुसार जाप्य लेखकों द्वारा अब तक एक अरब 46 करोड़ 18 लाख मंत्र लिखे जा चुके हैं। समिति के अध्यक्ष हरक चन्द बडजात्या हमीरपुर वाले ने उपस्थित सभी अतिथियों, दानदाताओं, प्रेरकों व जाप्य लेखकों के प्रति आभार व्यक्त किया ।</p>
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		<title>आज्ञा में चलने से जीवन बनता है धन्य: श्री ज्ञानमति माताजी ने बताई आचार्यश्री शांतिसागर जी के तप-साधना क्रिया </title>
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		<pubDate>Mon, 24 Feb 2025 08:45:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी ने मार्ग प्रभावना भावना के बारे में बताया कि मार्ग यानि मोक्ष मार्ग की प्रभावना। ज्ञान द्वारा तप द्वारा, जिन पूजा आदि द्वारा धर्म की प्रभावना की जाती है। लोक में उसकी प्रसिद्धि होती है। आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज ने अपने जीवन में मार्ग प्रभावना की है। दक्षिण से उत्तर तक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी ने मार्ग प्रभावना भावना के बारे में बताया कि मार्ग यानि मोक्ष मार्ग की प्रभावना। ज्ञान द्वारा तप द्वारा, जिन पूजा आदि द्वारा धर्म की प्रभावना की जाती है। लोक में उसकी प्रसिद्धि होती है। आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज ने अपने जीवन में मार्ग प्रभावना की है। दक्षिण से उत्तर तक विहार करके धर्म प्रभावना की है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कोल्हापुर से अभिषेक अशोक पाटील की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोल्हापुर।</strong> आज से 69 साल पहले कुंथलगिरी पर्वत पर सन 1955 में आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी की अंतिम सल्लेखना शुरु थी। वह अंतर में मग्न थे। सन् 1955 में आचार्यश्री कुंथलगिरि में कुलभूषण-देशभूषण जी की प्रतिमा के समक्ष 12 वर्ष की सल्लेखना ली थी। ज्ञानमती माताजी उस समय क्षुल्लिका अवस्था में वीरमति माताजी थी, वह आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी की सल्लेखना के समय वहां गई थी। भादों शुक्ल दूज को आचार्यश्री ने अपने शरीर का परित्याग करके उपपाद शैय्या पर जाकर वैक्रियिक शरीर धारण किया। आज लगभग 1600 साधु विहार कर रहे हैं। यह सब आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी का ही उपकार है। भगवान आदिनाथ ने युग की आदि में जीवन जीने की कला सिखाया। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज ने 20वीं शताब्दी के अंदर मुनि परंपरा को जीवंत किया। उसी प्रकार गुरु आज्ञा का पालन करते हुए ज्ञानमती माताजी जो कि प्रथम बालब्रह्मचारिणी, इन्होंने आर्यिका परंपरा को जीवंत किया। प्रथमाचार्य शांतिसागर जी महाराज, वे इस युग के लिए वरदान थे। आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी ने मार्ग प्रभावना भावना के बारे में बताया कि मार्ग यानि मोक्ष मार्ग की प्रभावना। ज्ञान द्वारा तप द्वारा, जिन पूजा आदि द्वारा धर्म की प्रभावना की जाती है। लोक में उसकी प्रसिद्धि होती है। आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज ने अपने जीवन में मार्ग प्रभावना की है। दक्षिण से उत्तर तक विहार करके धर्म प्रभावना की है।</p>
<p><strong>जिनागम के प्रति मेरूसम श्रद्धा</strong></p>
<p>आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज कहते थे कि जिनागम के अनुसार विचार बनाना चाहिए। अपनी धारणा के अनुसार आगम को नहीं बदलना चाहिए। उनकी आगम की श्रद्धा मेरु की तरह अविचलित थी। सागर के समान वही अथाह थी। आगम के विरुद्ध वे एक भी बात न कहते थे, न करते थे। उनका कहना था कि शास्त्र जलधि है, जीव मछली है, उसमें जीव जितना घूमे और अवगाहना करे उतना ही थोड़ा है। उनके आदेश के अनुसार जब धवला, जयधवला, महाबंध (महाधवल) सिद्धांत ग्रंथ ताम्रपत्र में उत्कीर्ण हो गए तब महाराज ने शास्त्र भंडार के व्यवस्थापकों से कहा था कि ये शास्त्र हमारे प्राण हैं। हमारे प्राण इस शरीर में नहीं हैं, जिनेंद्र भगवान की वाणी ही हमारा प्राण हैं।</p>
<p><strong>तीन बार सिंह-निष्क्रिडित नाम का तप करने वाले आचार्य श्री शांतिसागर </strong></p>
<p>आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी का मुनि जीवन 35 वर्ष का था। जिसमें से आचार्य श्री ने 9 हजार 338 निर्जल उपवास किए हैं जो की लगभग 27 वर्षाें में होते हैं और लगभग 3 बार सिंह-निष्क्रिडित नाम का तप किया। 1 आहार 1 उपवास, 1 आहार 2 उपवास, 1 आहार 3 उपवास और ये क्रम 9 उपवास तक चलता फिर 1 आहार 9 उपवास, 1 आहार 8 उपवास ऐसे पूरा क्रम होता है। आचार्य विद्यासागर जी जब विद्याधर थे। तब उन्होंने वो आहार देखा था। आचार्य विद्यासागर जी बताते हैं कि लगता नहीं था की शांतिसागर जी इतने उपवास के बाद आहार कर रहे है।</p>
<p><strong>आचार्यश्री शांतिसागर जी के पास अद्भुत स्वाध्याय प्रवृत्ति </strong></p>
<p>आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी प्रतिदिन कम से कम 40 या 50 पृष्ठों का स्वाध्याय करते थे। धवलादि सिद्धांत ग्रंथों का बहुत सुंदर अभ्यास महाराज ने किया था। अपनी असाधारण स्मृति तथा तर्कणा के बल पर वे अनेक शंकाओं को उत्पन्न करके उनका सुंदर समाधान करते थे।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-75244" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016.jpg" alt="" width="1600" height="1009" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-300x189.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-1024x646.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-768x484.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-1536x969.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-990x624.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/02/IMG-20250224-WA0016-1320x832.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />गंभीर उपसर्ग जिन पर आचार्य श्री ने प्राप्त की विजय </strong></p>
<p>आचार्यश्री के अलौकिक आत्मध्यान निमग्नता की अनेकों अनमोल घटनाएं हैं। कोगनोली में महाराज एक निर्जन स्थान में बनी हुई गुफा में रात्रि के समय ध्यान में लीन थे। नगर का एक पागल महाराज के पास गुफा में गया। उसने महाराज के पास रोटी मांगी- बाबा, रोटी दो। भूख लगी है। बाबा के पास क्या था, वे तो मौन ध्यान कर रहे थे। बाबा को शांत देख पागल का दिमाग उत्तेजित हो गया। उसके हाथ में एक लकड़ी थी जिसके अग्रभाग में नोकदार लोहे का कीला लगा था, उससे बैलों को मारने का काम लिया जाता था। पागल इस लकड़ी से महाराज के शरीर को मारने लगा। लोहे की नोक पीठ, छाती आदि में चुभ गयी। सारा शरीर रक्त से सन गया। बहुत देर तक उपद्रव करने के बाद पागल वहां से चला गया। सबेरा होने पर लोगों ने देखा तो बहुत दुःखी हुए। भक्तों ने उनकी वैयावृत्ति की किन्तु महाराज चुपचाप थे। एक समय गुफा में ध्यान में लीन थे तब महाराज की पुरुष इंद्रिय पर एक मकोड़ा चिपट गया। वह मांस खाता था और रक्त की धारा बहती थी किंतु, महाराज का ध्यान स्थिर था। ध्यान हटने पर संघस्थ ब्र. बंडू ने उस मकोड़े को अलग किया।</p>
<p><strong>चीटियां भी ध्यान में नहीं डाल सकीं बाधा</strong></p>
<p>एक अवसर पर गुफा में रखे दीपक का कुछ तेल दैवयोग से बिखर गया और असंख्य चीटियां वहां आ गईं। महाराज के शरीर पर भी चीढ़ियां चढ़ गईं और काटती रहीं। प्रातःकाल लोगों ने आकर यह उपसर्ग दूर किया। महाराज का यह नियम था कि प्रत्येक अष्टमी व चतुर्दशी को उपवास का नियम लेकर मौन रहकर वे आत्मा का ध्यान किया करते थे। वहां गिरि-कंदराओं में अनेक बार व्याघ्र आदि हिंसक जंतु उनके पास आ जाया करते थे और कुछ समय पश्चात् उपद्रव किए बगैर चले जाते थे।</p>
<p><strong>विषधर सर्प शरीर पर दो घंटे लिपटा रहा</strong></p>
<p>एक बार कोगनोली की गुफा में लगभग 8 फीट का विषधर सर्प उनके शरीर में दो घंटे तक लिपटा रहा। वह सर्प भीषण होने के साथ अधिक वजनदार भी था। विहार करते हुए भी उनके मार्ग में अनेक हिंसक पशु आए और फिर महाराज के तप के प्रभाव से चले गए। शिखरजी के रास्ते में 100-150 बैलों का झुंड मिला। चार मस्त बैल भागकर महाराज की तरफ आए और उनके मुख को देखकर शांत होकर प्रणाम करके वहां से चले गए। महाराज कहते थे कि भय किसका किया जाए। जब तक कोई पूर्व का बैरी न हो तब तक वह नहीं सताता है। महाराज ने कहा था-‘‘हम बीच बाजार में भी बैठकर आत्मध्यान कर सकते हैं। एक बार मध्याह्न का समय था कोन्नूर की गुफा में महाराज श्री सामायिक कर रहे थे। एक उड़ने वाला सर्प आया और महाराज की जंघाओं के बीच छिप गया। वह लगभग तीन घंटे तक उपद्रव करता रहा लेकिन, आचार्य श्री ने अपनी स्थिर मुद्रा को भंग नहीं किया। जो उनकी साधना को दर्शाता है।</p>
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		<title>धूमधाम से मनाया अवतरण दिवस :   अष्ट द्रव्यों से पूजन कर चढ़ाया गया श्रीफल </title>
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		<pubDate>Mon, 30 Oct 2023 13:47:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज का 77वं अवतरण दिवस भक्ति भाव के साथ मनाया गया। श्री दिगंबर जैन दोनों मंदिर जी में भगवान का महा अभिषेक के साथ सभी भक्तों के द्वारा किया गया। पढ़िए राज कुमार अजमेरा और नवीन जैन की रिपोर्ट&#8230; झुमरीतिलैया। नौ भाषाओं के ज्ञाता आजीवन मेवे, नमक, घी के त्यागी, [&#8230;]]]></description>
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<p><span style="color: #000000;">आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज का 77वं अवतरण दिवस भक्ति भाव के साथ मनाया गया। श्री दिगंबर जैन दोनों मंदिर जी में भगवान का महा अभिषेक के साथ सभी भक्तों के द्वारा किया गया। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राज कुमार अजमेरा और नवीन जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></span></p>
<hr />
<p>झुमरीतिलैया। नौ भाषाओं के ज्ञाता आजीवन मेवे, नमक, घी के त्यागी, पूरे भारत में 51000 किलोमीटर का पैदल विहार करने वाले जैन जगत के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान परम पूज्य संत शिरोमणि गुरुवर आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज का 77वं अवतरण दिवस भक्ति भाव के साथ मनाया गया। श्री दिगंबर जैन दोनों मंदिर जी में भगवान का महा अभिषेक के साथ सभी भक्तों के द्वारा किया गया। संत शिरोमणि गुरुवार आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज और आर्यिका ज्ञानमति माता जी का शरद पूर्णिमा यानी जैन धर्म के अनुसार अमृत पूर्णिमा के दिन का अवतरण दिवस मुनि श्री 108 मुनि सुयशसागर जी महाराज के सानिध्य में मनाया गया। सभी भक्तों के द्वारा आचार्य श्री के चित्र का अनावरण के साथ अष्ट द्रव्यों से पूजन कर श्रीफल चढ़ाया गया।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-51078" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/10/08913477-ff84-4817-b639-dc8a4bb2ee51-1024x576.jpeg" alt="" width="1024" height="576" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/10/08913477-ff84-4817-b639-dc8a4bb2ee51-1024x576.jpeg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/10/08913477-ff84-4817-b639-dc8a4bb2ee51-300x168.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/10/08913477-ff84-4817-b639-dc8a4bb2ee51-768x432.jpeg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/10/08913477-ff84-4817-b639-dc8a4bb2ee51-990x557.jpeg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/10/08913477-ff84-4817-b639-dc8a4bb2ee51-470x264.jpeg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/10/08913477-ff84-4817-b639-dc8a4bb2ee51-640x360.jpeg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/10/08913477-ff84-4817-b639-dc8a4bb2ee51-215x120.jpeg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/10/08913477-ff84-4817-b639-dc8a4bb2ee51-414x232.jpeg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/10/08913477-ff84-4817-b639-dc8a4bb2ee51.jpeg 1280w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" />इनका साथ हमारा सौभाग्य</p>
<p>इस अवसर पर मुनि श्री 108 सुयश सागर जी ने कहा कि भारत भूमि मुनियों, संतों, महात्माओं, आचार्यों की भूमि रही है और सभी की सत्य, अहिंसा, समता, जीयो और जीने दो, वसुधैव कुटुंबकम का भाव जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हम सबका यह परम सौभाग्य है कि इस युग के विश्व विख्यात महान तपस्वी एवं श्रमण संस्कृति के महामहिम संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज आज हम सबके बीच साधना रत हैं और उनका आशीर्वाद भी हम सबको सुलभ है। आचार्य श्री का जीवन एक सम्पूर्ण दर्शन है, जिनके आचरण में जीवों के लिए करुणा पलती है, जिनके विचारों में प्राणी मात्र का कल्याण आकर लेता है, जिनकी देशना में जगत अपने सदविकास का मार्ग प्रशस्त करता है। आप निरीह, निस्पृह वीतरागी हैं फिर भी आपके विचार भारतीयता के प्रति अगाध निष्ठा, राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यपरायणता से ओतप्रोत हैं। उन्होंने कहा कि आर्यिका ज्ञानमति माताजी का चिंतन प्राचीन भारतीय हितचिंतकों, दार्शनिकों का अनुकरण करते हुए भी मौलिक हैं।</p>
<p>णमोकार चालीसा का पाठ</p>
<p>कार्यक्रम में समाज के मंत्री जैन ललित सेठी, संयोजक जैन नरेंद्र झांझरी मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन जैन लट्टू भैया किया। इसके साथ समाज के सुरेश झांझरी, कैलाश जोशीला, मोहित सोगानी, नीलम सेठी आदि ने भी विचार व्यक्त किए। शाम को मुनि श्री के मुखारविन्द से णमोकार चालीसा का पाठ हुआ। भव्य आरती समाज के सैकड़ों लोगों ने जाप किया।</p>
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		<title>जैनधर्म के 5 तीर्थंकरों की ही जन्मभूमि : इस धरती के प्रथम शाश्वत तीर्थ अयोध्या का हो रहा है महत्वपूर्ण विकास </title>
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		<pubDate>Mon, 10 Jul 2023 17:27:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन संस्कृति की आन-बान-शान और हमारी पहचान, सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ, शाश्वत तीर्थंकर जन्मभूमि अयोध्या का विकास सर्वोच्च जैन साध्वी दिव्यशक्ति भारतगौरव गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से चल रहा है, जिसमें समस्त दिगम्बर जैन समाज को तन-मन-धन से सहयोग देकर पुण्य अर्जित का आह्वान निवेदित है। इसके विशेष आलेख के लेखक है डॉ. जीवन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p>जैन संस्कृति की आन-बान-शान और हमारी पहचान, सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ, शाश्वत तीर्थंकर जन्मभूमि अयोध्या का विकास सर्वोच्च जैन साध्वी दिव्यशक्ति भारतगौरव गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से चल रहा है, जिसमें समस्त दिगम्बर जैन समाज को तन-मन-धन से सहयोग देकर पुण्य अर्जित का आह्वान निवेदित है। इसके विशेष आलेख के लेखक है डॉ. जीवन प्रकाश जैन, मंत्री और <span style="color: #ff0000;">प्रस्तुति है मनोज नायक(मुरैना) की&#8230;</span></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या।</strong> पूरे विश्व भर में जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी परमपूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी को साक्षात् सरस्वती स्वरूपा कहें या पवित्रतम चरणद्वय से सहित सिद्धहस्त साधिका कहें, उनकी इस शक्ति के साक्षात् परिणाम इस देश ने अनेक बार प्रत्यक्ष रूप से देखे, समझे और आभास किए हैं। पूज्य माताजी की शक्ति को चाहे जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर तीर्थ में देखें या ऋषभगिरि-मांगीतुुंगी तीर्थ के विशाल पर्वत पर अखण्ड पाषाण में विश्व की सबसे ऊंची 108 फुट उत्तुंग भगवान ऋषभदेव प्रतिमा में देखें या फिर उनके द्वारा रचित 500 से अधिक ग्रंथों के विशाल साहित्य समूह में देखें, हर व्यक्ति इन कार्यों से अचम्भित होकर स्तब्ध, आश्चर्य और प्रगाढ़ आस्था के आलोक में डूब जाता है।</p>
<p><strong>असंभव कार्य किया</strong></p>
<p>आज 89 वर्षीय अपने योग्य जीवन को 70 वर्षीय साधना से चमत्कार स्वरूप बनाने वाली पूज्य माताजी के ऐसे शक्ति-आभास इस समाज ने समय-समय पर अनेक बार देखे हैं, जब अनूठे, विरले और असंभव जैसे कार्य भी इस धरती पर संभव होते नजर आए हैं। ठीक इसी क्रम में पुन: इस 89 वर्षीय पायदान पर पूरे समाज ने फिर एक बार ऐसा आश्चर्य, चमत्कार और वरदान तब देखा, जब 31 दिसम्बर 2022 को अयोध्या जैन तीर्थ की पावन धरती पर पूज्य माताजी के पवित्र चरणयुगल पड़ते ही यह धरती जाग उठी। परिणामस्वरूप मात्र एक अत्यन्त अल्प अंतराल में ही भगवान ऋषभदेव जन्मभूमि दिगम्बर जैन तीर्थ-बड़ी मूर्ति परिसर में देखते ही देखते ऐसा विकासीय बदलाव आता गया और अप्रैल 30 से मई 7, 2023 की तारीख में यहां ऐतिहासिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं महामस्तकाभिषेक महोत्सव से अयोध्या को देश ही नहीं पूरी दुनिया में विशाल जैन तीर्थ का स्वर्णिम सोपान प्राप्त हुआ। पूरे विश्व जैन समाज की दृष्टि इस चमत्कार पर और इस तीर्थ के महत्त्व पर लगातार बनी रही और अब भी निरंतर ही यह तीर्थ अपने नये विकास को लेकर चरम की ओर बढ़ रहा है।</p>
<p><strong>साबित हुआ मील का पत्थर</strong></p>
<p>इस धरा पर कभी-कभी कोई विरले ही ऐसी घड़ियां पुण्योदय में आ जाती हैं कि जो भविष्य के लिए आज मील का पत्थर बन जाती हैं। एक लम्बा समय इन आशाओं से बंधा हुआ था कि क्या कभी अयोध्या का ऐतिहासिक विकास इस जैन समाज को प्राप्त हो पाएगा? लेकिन कभी इन आशाओं पर निराशा का अंकुश नहीं लग पाया और सतत ही ये आशाएं सबल होते हुए सन् 2023 में इतनी प्रबल हो गईं कि आज इस जैन संस्कृति को भगवान ऋषभदेव, भगवान अजितनाथ, भगवान अभिनंदननाथ, भगवान सुमतिनाथ एवं भगवान अनंतनाथ, वर्तमान के इन पांचों तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या जैसा महातीर्थ पुन: एक ऐसे जागृत स्वरूप में प्राप्त हो गया कि अब हम भी गर्व के साथ इस बात का आगाज कर सकते हैं कि अयोध्या हमारे जैनधर्म के 5 तीर्थंकरों की ही जन्मभूमि नहीं अपितु यह शाश्वत तीर्थंकर जन्मभूमि के रूप में अनादिकाल से पूज्य और मान्य रही है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-48210" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230710-WA0060.jpg" alt="" width="683" height="1600" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230710-WA0060.jpg 683w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230710-WA0060-128x300.jpg 128w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230710-WA0060-437x1024.jpg 437w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230710-WA0060-656x1536.jpg 656w" sizes="(max-width: 683px) 100vw, 683px" /></p>
<p><strong>गौरवशाली स्वरूप लौटा</strong></p>
<p>ऐसा भी नहीं कि अयोध्या में हमारा अस्तित्व नहीं था लेकिन जो अस्तित्व था, वो इतने गौरवशाली स्वरूप में नहीं था, जिसको लेकर हम अपने अनादिनिधन जैनधर्म की गरिमा को जन-जन के सामने प्रस्तुत कर सकें। यह विकास की दृष्टि आज नहीं अपितु सर्वप्रथम सन् 1965 में आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज के उन दिव्य नयनों में प्राप्त हुई, जिनसे उन्होंने इस अयोध्या के लिए नई आशाओं और विकास का स्वप्न देखकर 31 फुट उत्तुंंग भगवान ऋषभदेव की विशाल प्रतिमा विराजमान करवाई और सुंदर जिनमंदिर का भी निर्माण हुआ। इससे पूर्व आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज की ही कृपा प्रसाद से कटरा मोहल्ले के भगवान सुमतिनाथ जिनमंदिर में भगवान आदिनाथ-भरत-बाहुबली की सुन्दर और विशाल जिनप्रतिमाओं का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव भी आचार्य श्री के ही सान्निध्य में सन् 1952 में सम्पन्न हुआ था।</p>
<p><strong>अयोध्या का विकास नए अंदाज में</strong></p>
<p>अत: आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज ने सतत अपनी दृष्टि अयोध्या की तरफ रखी और उसके बाद उन्हीं के करकमलों से क्षुल्लिका दीक्षा प्राप्त उनकी शिष्यारत्न वर्तमान की गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने सन् 1994-1995 से इस अयोध्या की जीर्ण-शीर्ण स्थिति को अपनी दृष्टि में प्रमुख लक्ष्य पर लिया और सतत चरैवेती-चरैवेती के सिद्धान्त पर चलते हुए उन्होंने धीरे-धीरे इस अयोध्या के विकास को एक नया अंदाज प्रदान किया। सर्वप्रथम बड़ी मूर्ति जिनमंदिर परिसर में त्रिकाल चौबीसी जिनमंदिर, समवसरण जिनमंदिर आदि के निर्माण, तीर्थ पर धर्मशाला, भोजनशाला आदि समुचित व्यवस्थाओं का प्रबंध आदि के साथ क्रमश: पांचों भगवन्तों की टोकों पर सुंदर-सुंदर जिनमंदिरों के निर्माण भी सम्पन्न हुए।</p>
<p><strong>वर्तमान में हो रहा विकास कार्य </strong></p>
<p>पुन: अब इस जैन संस्कृति के आद्य केन्द्र को नई ऊंचाईयां प्रदान करने के लिए पूज्य माताजी ने सन् 2019 में अयोध्या तीर्थक्षेत्र कमेटी व समाज को बड़ी मूर्ति परिसर विस्तृत रूप से सजाने-संवारने की प्रेरणा प्रदान की, जिसके फलस्वरूप आज हम सबके मध्य 31 फुट उत्तुंग भगवान भरत प्रतिमा से समन्वित विशाल जिनमंदिर, भगवान ऋषभदेव के मोक्ष प्राप्त 101 पुत्रों का विश्वशांति जिनमंदिर, रत्नमयी प्रतिमाओं वाला तीस चौबीसी जिनमंदिर, तीनलोक रचना एवं सर्वतोभद्र महल जैसी सुन्दर-सुन्दर कृतियां विकासशील नजर आ रही हैं। इतना ही नहीं नवम्बर 2019 में पूज्य माताजी द्वारा साक्षात् सान्निध्य देकर भगवान भरत जिनमंदिर और विश्वशांति जिनमंदिर का शिलापूजन भी सम्पन्न कराया गया और पुन: इस तीर्थ के विकास की ललक लेकर 89 वर्ष की आयु में हस्तिनापुर से 31 दिसम्बर 2022 को पूज्य माताजी का आगमन अयोध्या में हुआ और 30 अप्रैल से 7 मई 2023 तक यहां भव्य तीस चौबीसी तीर्थंकर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं महामस्तकाभिषेक महोत्सव सम्पन्न होकर यह जैन संस्कृति का शाश्वत तीर्थ अयोध्या नये प्रकाश को प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong>सहयोग करें</strong></p>
<p>इसी नये प्रकाश का विस्तृत वर्णन करने के लिए पाठकों के समक्ष यह आलेख प्रस्तुत किया गया है। साथ ही सभी बंधुओं से यह भी निवेदन है कि इस तीर्थ के विकास में तन-मन-धन के साथ अपना सहयोग प्रदान करें। क्योंकि जैनधर्म में दो ही शाश्वत तीर्थ हैं जिनमें प्रथम शाश्वत तीर्थंकर जन्मभूमि अयोध्या है एवं द्वितीय शाश्वत तीर्थंकर निर्वाणभूमि सम्मेदशिखर जी कहलाती है। अत: दिगम्बर जैन समाज के समस्त बंधुजन अब इस शाश्वत तीर्थ अयोध्या के महत्वपूर्ण विकास में अपना योगदान अवश्य प्रदान करें। इसके लिए कार्यालय में 9520554138, 9520554164, 9520554171, 9520554172 पर संपर्क किया जा सकता है।</p>
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		<title>आचार्य श्री की प्रतिमा जी का हुआ अभिषेक : अयोध्या में मनाया गया श्री वीरसागर जी महाराज का अवतरण दिवस </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Jul 2023 01:30:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चारित्रचक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज की परम्परा के प्रथम पट्टाचार्य श्री वीर सागर जी महाराज का 147वां अवतरण दिवस आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा 3 जुलाई को विभिन्न धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों के साथ अयोध्या में परम पूज्य आर्यिका शिरोमणि, गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के पावन सान्निध्य में हर्षोल्लास पूर्वक मनाया गया। पढ़िए मनोज [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>चारित्रचक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज की परम्परा के प्रथम पट्टाचार्य श्री वीर सागर जी महाराज का 147वां अवतरण दिवस आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा 3 जुलाई को विभिन्न धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों के साथ अयोध्या में परम पूज्य आर्यिका शिरोमणि, गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के पावन सान्निध्य में हर्षोल्लास पूर्वक मनाया गया। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या।</strong> चारित्रचक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज की परम्परा के प्रथम पट्टाचार्य श्री वीर सागर जी महाराज का 147वां अवतरण दिवस आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा 3 जुलाई को विभिन्न धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों के साथ अयोध्या में परम पूज्य आर्यिका शिरोमणि, गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के पावन सान्निध्य में हर्षोल्लास पूर्वक मनाया गया। अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद् के राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन ने बताया कि इस अवसर पर आचार्य श्री की प्रतिमा जी के अभिषेक के पश्चात परमपूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने आचार्य श्री की अष्ट द्रव्य से सामूहिक पूजा कराई। पूजन में युवा परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ. जीवन प्रकाश जैन, राष्ट्रीय मुख्य संयोजक विजय कुमार जैन हस्तिनापुर, राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन जयपुर, राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जैन जयपुर, भरत स्थली दिल्ली के कोषाध्यक्ष विनोद जैन दिल्ली, जैन पत्रकार महासंघ के संरक्षक सदस्य हंसमुख गांधी इन्दौर, ऋषभांचल मांगीतुंगी के ट्रस्टी प्रमोद कासलीवाल महाराष्ट्र आदि विभिन्न प्रान्तों से उपस्थित श्रेष्ठी शामिल हुए।</p>
<p><strong>व्यक्तित्व का गुणानुवाद किया</strong></p>
<p>आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से सन् 1956 में माधोराजपुरा जिला जयपुर राजस्थान में पूज्य गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने आर्यिका दीक्षा प्राप्त करके “ज्ञानमती माताजी” नाम प्राप्त किया था। अतः पूज्य माताजी ने आचार्यश्री के जन्मदिवस पर गुरुपूर्णिमा मनाते हुए उनके व्यक्तित्व का गुणानुवाद किया। इस अवसर पर पूज्य पीठाधीश रवीन्द्र कीर्ति स्वामी जी ने जैन संस्कृति से संबंधित अयोध्या में चल रहे विकास कार्यों के बारे में प्रकाश डाला। इस अवसर पर परम पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ा पाद प्रक्षालन अशोक चांदवाड जयपुर परिवार एवं जीतेन्द्र जैन खंडवा परिवार द्वारा किया गया। तत्पश्चात उपस्थित श्रेष्ठियों ने पाद प्रक्षालन किया।</p>
<p>डॉक्टर जीवन प्रकाश जैन जम्बूद्वीप ने उपस्थित श्रेष्ठियों का अभिनन्दन किया ।</p>
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