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	<title>Articles श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>Articles श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>इस बार 12 मई को मां का दिन - मदर्स डे : अपनी मां का हमेशा रखें ख्याल </title>
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		<pubDate>Sun, 12 May 2024 09:26:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ मदर्स डे मई महीने के दूसरा रविवार को मनाया जाता है। इस बार 12 मई को मनाया जा रहा है। लेकिन हर साल ये तारीख अलग होती है। जिंदगी‬ की पहली टीचर ‬होती है ‎मां‬। निरंतर देकर भी जो खाली नहीं होती, कुछ ना लेकर भी जो सदैव दाता बनी रहती है उस मां को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> मदर्स डे मई महीने के दूसरा रविवार को मनाया जाता है। इस बार 12 मई को मनाया जा रहा है। लेकिन हर साल ये तारीख अलग होती है। जिंदगी‬ की पहली टीचर ‬होती है ‎मां‬। निरंतर देकर भी जो खाली नहीं होती, कुछ ना लेकर भी जो सदैव दाता बनी रहती है उस मां को इस एक दिवस पर क्या कहें और कितना कहें। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सौरभ जैन का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अंबाह।</strong> मदर्स डे मई महीने के दूसरा रविवार को मनाया जाता है। इस बार 12 मई को मनाया जा रहा है। लेकिन हर साल ये तारीख अलग होती है। जिंदगी‬ की पहली टीचर ‬होती है ‎मां‬। निरंतर देकर भी जो खाली नहीं होती, कुछ ना लेकर भी जो सदैव दाता बनी रहती है उस मां को इस एक दिवस पर क्या कहें और कितना कहें। यह एक दिवस उसकी महत्ता को मंडित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हो भी नहीं सकता। हमारे जीवन के एक-एक पल-अनुपल पर जिसका अधिकार है उसके लिए मात्र 365 दिन भी कम है फिर एक दिवस क्यों?</p>
<p>लेकिन नहीं, यह दिवस मनाना जरूरी है। इसलिए कि यही इस जीवन का कठोर और कड़वा सच है कि मां इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा उपेक्षित और अकेली प्राणी है। कम से कम इस एक दिन तो उसे उतना समय दिया जाए जिसकी वह हकदार है। उसके अनगिनत उपकारों के बदले कुछ तो शब्द फूल झरे जाए&#8230;। नीति प्रीती जैन ने अपनी मां के लिए कुछ इस प्रकार से कहा..</p>
<p><strong>जिंदगी‬ की पहली टीचर ‬होती है ‎मां‬</strong></p>
<p><strong>जिंदगी की पहली दोस्त होती है‬ मां</strong></p>
<p><strong>जिंदगी‬ भी मां ‎क्योंकि‬‎</strong></p>
<p><strong>जिंदगी देने वाली भी होती है मां।</strong></p>
<p>मदर्स डे का शोर फेसबुक या सोशल नेटवर्क पर न होकर बल्कि अपनी मां का हमेशा ख्याल रखें। बात 20वीं सदी की है। फिलाडेल्फिया में रहने वाली एक बेटी एना जार्विस ने अपनी मां की याद में जो किया, उससे इस दिन की नींव पड़ी। एना की मां ने अपना जीवन महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा और गुलामी हटाने की वकालत करते हुए बिताया था। 1905 में उनकी मृत्यु के बाद, एना ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाने और उन्हें श्रद्धांजलि देने का फैसला किया। 12 मई 1907 को, एना जार्विस ने वेस्ट वर्जीनिया के ग्राफ्टन के चर्च में अपनी मां की याद में ग्राफ्टन, वेस्ट वर्जीनिया के एक चर्च में एक सभा आयोजित की। पांच साल के भीतर, अमेरिका के लगभग हर राज्य में ये दिन मनाया जाने लगा। फिर 1914 में यूएस प्रेसिडेंट वूड्रो विल्सन ने इसे नेशनल हॉलिडे घोषित कर दिया। मई के सेकंड सन्डे को मदर्स डे के रूप में मनाने के लिए उन्होंने एक उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए। इसके अलावा मई के दूसरे रविवार को प्राचीन ग्रीक और रोमन परंपरा की वजह से भी चुना गया। वसंत के त्योहारों के दौरान यहां लोग अपनी मां को उनकी ममता और बलिदान के लिए धन्यवाद देते हैं।</p>
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		<title>मदर्स डे 12 मई 2024 पर विशेष : मां है संवेदना, प्रेम और ममत्व की पराकाष्ठा </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 May 2024 12:31:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पूरी जिंदगी भी समर्पित कर दी जाए तो मां का ऋण नहीं चुकाया जा सकता। संतान के लालन-पालन के लिए हर दुख का सामना बिना किसी शिकायत के करने वाली मां के साथ बिताये दिन सभी के मन में आजीवन सुखद व मधुर स्मृति के रूप में सुरक्षित रहते हैं। पढ़िए डॉ सुनील जैन संचय [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>पूरी जिंदगी भी समर्पित कर दी जाए तो मां का ऋण नहीं चुकाया जा सकता। संतान के लालन-पालन के लिए हर दुख का सामना बिना किसी शिकायत के करने वाली मां के साथ बिताये दिन सभी के मन में आजीवन सुखद व मधुर स्मृति के रूप में सुरक्षित रहते हैं।<span style="color: #ff0000"> पढ़िए डॉ सुनील जैन संचय का विशेष आलेख</span></strong></p>
<hr />
<p>अंतरराष्ट्रीय मातृत्व दिवस सम्पूर्ण मातृ-शक्ति को समर्पित एक महत्वपूर्ण दिवस है। पूरी जिंदगी भी समर्पित कर दी जाए तो मां का ऋण नहीं चुकाया जा सकता। संतान के लालन-पालन के लिए हर दुख का सामना बिना किसी शिकायत के करने वाली मां के साथ बिताये दिन सभी के मन में आजीवन सुखद व मधुर स्मृति के रूप में सुरक्षित रहते हैं।</p>
<p>मां के लिए कोई भी शब्द, लेख या उपाधि कम होगी। उनके प्यार और समर्पण को जिंदगी लगाकर भी जताया नहीं जा सकता है। लेकिन फिर भी एक दिन है जो पूरी तरह मां को समर्पित होता है, इस दिन को मदर्स डे कहते हैं। साल 2024 में मातृत्व दिवस यानी मदर्स डे 12 मई रविवार को मनाया जाएगा।</p>
<p>मां के बिना जीवन की उम्मीद नहीं की जा सकती अगर मां न होती तो हमारा अस्तित्व ही न होता|</p>
<p>यह एक सामान्य कहावत है कि भगवान हर जगह मौजूद नहीं हो सकते थे इसलिए उन्होंने माँ को बनाया। कहावत भी सच है क्योंकि मां की स्थिति भगवान से कम नहीं है। वह वो है जिसने हमें जीवन दिया और हमें अपने पैरों पर खड़ा किया। वह थके होने के बावजूद अपने बच्चों के लिए निस्वार्थ प्रेम और कभी तैयार होने की मूर्ति है। वह होती है तो उसकी ईश्वरीय छाया सुख देती है जब &#8216;नहीं&#8217; होती है तब उसके आशीर्वादों का कवच हमें सुरक्षा प्रदान करता है।</p>
<p>वक्त जिस गति से विकृत होता जा रहा है ऐसे में क्या इस दिन पर हर युवक अपनी मां को स्पर्श कर यह कसम खा सकता है कि नारी जाति का अपमान न वह खुद करेगा और न कही होते हुए देखेगा। मातृ दिवस पर बेटियों का सम्मान और सुरक्षा देने का वचन दीजिए ताकि आनेवाले कल में भावी-मां का अभाव ना हो सके। हे मां! तुझे प्रणाम।</p>
<p><strong>सुपुत्रों से आज मेरा नम्र निवेदन।</strong></p>
<p><strong>दुख न दें, भले न दे सुख का आंगन।।</strong></p>
<p>माँ के पास ढ़ेर सारी जिम्मेदारियां होती हैं वो उसको लगातार बिना रुके और थके निभाती है। वो एकमात्र ऐसी इंसान है जिनका काम बिना किसी तय समय और कार्य के तथा असीमित होती है।</p>
<p>एक मां का अपने बच्चे से रिश्ता, दुनिया के किसी भी रिश्ते से नौ माह पुराना होता है और सबसे करीब होता है। हमारे व्यक्त्वि को बनाने और संवारने में सबसे बड़ा रोल मां ही निभाती है। मां का कोई रंग—रूप नहीं होता क्योंकि उसकी पहचान निस्वार्थ प्रेम और ममता से की जाती है। यही कारण है कि मां शब्द सुनते ही हमारा सिर स्वयं नतमस्तक हो जाता है। वास्तव में मां है तो ही हम हैं। हमारा जीवन मां के उन उपकारों से भरा है जिनकी कीमत कभी नहीं चुकाई जा सकती।</p>
<p>आधुनिक कहे जा रहे समाज में बहुत से परिवारों में बडे़ होने पर बेटियां व बेटे शायद ही कभी अपनी मां के पास वक्त निकालकर बैठते हैं और उसे खुशी पहुँचाने वाली बातें करते है। मां और बच्चों के बीच दूरी बढ़ने लगी है। कम पढ़ी-लिखी या अनपढ़ मां के साथ बच्चे किस विषय पर संवाद बनाएं यह उन्हें समझ नहीं आता।</p>
<p>पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने मां की महिमा को उजागर करते हुए कहा है कि जब मैं पैदा हुआ, इस दुनिया में आया, वो एकमात्र ऐसा दिन था मेरे जीवन का जब मैं रो रहा था और मेरी मां के चेहरे पर एक सन्तोषजनक मुस्कान थी। एक मां हमारी भावनाओं के साथ कितनी खूबी से जुड़ी होती है ये समझाने के लिए उपरोक्त पंक्तियां अपने आप में सम्पूर्ण हैं।</p>
<p>एक मां सभी के जीवन में एक ऐसी शख्सियत होती है जिसे हमारे दिलों में कभी नहीं बदला जा सकता है। वह माँ प्रकृति की तरह है जो केवल बदले में कुछ लेने के बिना देना जानती है। हम उसे अपने जीवन के पहले क्षण से देखते हैं जब हम इस दुनिया में अपनी आँखें खोलते हैं लेकिन हम उसे उसके गर्भ में नौ महीने पहले महसूस करते हैं। जब भी हम बोलना शुरू करते हैं तो हमारा पहला शब्द माँ बन जाता है। वह इस दुनिया में हमारा पहला प्यार, पहला शिक्षक और पहला दोस्त है। जब हम पैदा होते हैं तो हम कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं, लेकिन यह वह है जो हमें अपनी बाहों में विकसित और विकसित करता है। वह हमें इस दुनिया को समझने में मदद करती है।</p>
<p>मां और बच्चे का रिश्ता इतना प्रगाढ़ और प्रेम से भरा होता है, कि बच्चे को जरा ही तकलीफ होने पर भी मां बेचैन हो उठती है। वहीं तकलीफ के समय बच्चा भी मां को ही याद करता है। मां का दुलार और प्यार भरी पुचकार ही बच्चे के लिए दवा का कार्य करती है। इसलिए ही ममता और स्नेह के इस रिश्ते को संसार का खूबसूरत रिश्ता कहा जाता है। दुनिया का कोई भी रिश्ता इतना मर्मस्पर्शी नहीं हो सकता।</p>
<p>मां शब्द के लिए दुनियाभर के साहित्य में बहुत कुछ लिखा गया है। मां ही दुनिया में ईश्वर द्वारा बनाई गई एक ऐसी कृति है, जो निस्वार्थ भाव में मरते दम तक अपने बच्चों पर प्यार लुटाती रहती है। मदर्स डे हर वर्ष मई माह के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। इस लिहाज से इस बार मदर्स डे 12 मई को मनाया जाएगा। मां और बच्चों का रिश्ता इस दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता है, जो बगैर किसी शर्त और बगैर किसी उम्मीद के साथ पूरा होता है।</p>
<p>मां शब्द के उच्चारण के साथ ही वैसा लगता है जैसे सारी प्रकृति उसमें समा गई। मां अपने बच्चों को अच्छे से अच्छा लालन-पालन करती है। आज देख रहे हैं नई पीढी को पैसा कमाना तो सिखा रहे हैं लेकिन रिश्तों का मूल्य समझाना शायद भूलते जा रहे है। ऐसे परिवेश में हर मां की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने बच्चों की अच्छी मार्गदर्शिका बने। बच्चों को रिश्तों का मूल्य, नैतिक जिम्मेदारी, धैर्य, संयम और त्याग का मूल्य बताएं। उनका मनोबल बढ़ाएं। आज के बच्चों को एक अच्छे मार्गदर्शक की अधिक जरूरत है।</p>
<p>निरंतर देकर जो खाली नहीं होती , कुछ ना लेकर भी जो सदैव दाता बनी रहती है उस मां को इस एक दिवस पर क्या कहें और कितना कहें। यह एक दिवस उसकी महत्ता को मंडित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हो भी नहीं सकता। हमारे जीवन के एक-एक पल-अनुपल पर जिसका अधिकार है उसके लिए मात्र 365 दिन भी कम हैं।</p>
<p>लेकिन नहीं, यह दिवस मनाना जरूरी है। इसलिए कि यही इस जीवन का कठोर और कड़वा सच है कि मां इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा उपेक्षित और अकेली प्राणी है। कम से कम इस एक दिन तो उसे उतना समय दिया जाए जिसकी वह हकदार है। उसके अनगनित उपकारों के बदले कुछ तो शब्द फूल झरे जाएं&#8230;।</p>
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		<title>विश्व गौरया दिवस आज :  तकनीक का असर पड़ रहा है गौरैया पर </title>
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		<pubDate>Wed, 20 Mar 2024 08:42:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आज दुनिया भर में ‘विश्व गौरैया दिवस’ मनाया जा रहा है. यह हर साल 20 मार्च को होता है। दुनिया भर में गौरैया पक्षी की संख्या तेजी से घट रही है। ऐसे में इस पक्षी के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के मकसद से ‘विश्व गौरैया दिवस’ मनाया जाता है। आज हमें गौरया की चहचहाहट [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आज दुनिया भर में ‘विश्व गौरैया दिवस’ मनाया जा रहा है. यह हर साल 20 मार्च को होता है। दुनिया भर में गौरैया पक्षी की संख्या तेजी से घट रही है। ऐसे में इस पक्षी के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के मकसद से ‘विश्व गौरैया दिवस’ मनाया जाता है। आज हमें गौरया की चहचहाहट सुनाई नहीं दे रही है। कैसे हो इनका संरक्षण इसी पर<span style="color: #ff0000"> पढ़िए पर्यावरण प्रेमी और स्तंभकार डॉ सुनील जैन संचय का यह विशेष आलेख</span></strong></p>
<hr />
<p>गौरेया की घटती संख्या का मुख्य कारण है, भोजन-पानी की कमी और पेड़ों का कटान। बढ़ती मॉडर्न टेक्नोलॉजी ने चिड़ियों का सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। शहरीकरण के नए दौर में घरों में बगीचों के लिए स्थान नहीं है। पेट्रोल के दहन से निकलने वाला मिथाइल नाइट्रेट छोटे कीटों के लिए विनाशकारी होता है, जबकि यही कीट चूजों के खाद्य पदार्थ होते हैं। मोबाइल फोन टावरों से निकलने वाली तरंगों में इतनी क्षमता होती है, जो इनके अंडों को नष्ट कर सकती है।</p>
<p><strong>गौरैया को विलुप्त होने से हम ऐसे बचा सकते हैं</strong></p>
<p>यदि इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले। गौरैया को विलुप्त होने से बचाने के लिए हम कुछ छोटे-छोटे प्रयास कर सकते हैं।</p>
<p><strong>गौरैया संरक्षण के उपाय</strong></p>
<p>ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी ऑफ बर्डस द्वारा विश्व के विभिन्न देशों में किए गए अनुसंधान के आधार पर भारत और कई बड़े देशों में गौरैया को रेड लिस्ट कर दिया गया है जिसका अर्थ है कि यह पक्षी अब पूर्ण रूप से विलुप्ति की कगार पर है। गौरैया संरक्षण के लिए हम यही कर सकते हैं कि अपनी छत पर दाना-पानी रखें, अधिक से अधिक पेड़- पौधे लगाएं, उनके लिए कृत्रिम घोंसलों का निर्माण करें।<br />
गौरैयों को इस तरह बचा सकते हैं :<br />
1. गर्मी के दिनों में अपने घर की छत पर एक बर्तन में पानी भरकर रखें।<br />
2. गौरैया को खाने के लिए कुछ अनाज छतों और पार्कों में रखें।<br />
3. कीटनाशक का प्रयोग कम करें।<br />
4. अपने वाहन को प्रदूषण मुक्त रखें।<br />
5. हरियाली बढ़ाएं, छतों पर घोंसला बनाने के लिए कुछ जगह छोड़ें और उनके घोंसलों को नष्ट न करें।<br />
गौरैया को फिर से बुलाने के लिए लोगों को अपने घरों में कुछ ऐसे स्थान उपलब्ध कराने चाहिए जहां वे आसानी से अपने घोंसले बना सकें और उनके अंडे तथा बच्चे हमलावर पक्षियों से सुरक्षित रह सकें।<br />
गौरैया शहरों से तो लगभग लुप्त हो चुकी है तथा गांवों में भी इनके घरौंदे अपेक्षाकृत कम ही हैं। हमें इस चिड़िया को बचाने हेतु थोड़ा-सा प्रयास करना होगा। यदि हम यह कर सके तो क्या पता यह रूठा मेहमान हमारे घर -आँगन में फिर से फुदकने लगे। फिर से चूँ-चूँ की मधुर आवाज गूँजने लगे।<br />
गौरैया जो कभी गांवों में हैंडपंप पर टपकते पानी से अठखेलियां करती नजर आती थी, कभी दीवार पर लगे आईने में चोंच बजाती थी। चीं चीं करती उस नन्ही गौरैया को देखकर बच्चे किलकारी मारा करते थे। वो गौरैया अब कभी-कभार ही दिखती है। शहर में तो छोड़िए गांवों में भी कम ही नजर आती हैं। हर घर में पाई जाने वाली ये नन्ही चिड़िया तेजी से कम हो रही है। ऐसे में गौरैया को बचाने के लिए पहल नहीं की गई तो वह सिर्फ किस्सा बन रह जाएंगी।<br />
हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि गौरैया का गौरव लौटाएं, ताकि फिर आंगन व छत पर गौरैया फुदकती नजर आए।<br />
प्रयास रंग ला रहे : गौरैया को बचाने के लिए बहुत से स्वयंसेवी संस्थाओं, संगठन अनेक वर्षों से इस दिशा में सार्थक प्रयास कर रहे हैं उनकी जागरूकता का फल दिखने लगा है हालांकि इस दिशा में बहुत कार्य करने की जरूरत है। जागरूकता का परिणाम है कि लोग छतों पर दाना, पानी के साथ ही घरों में एवं अन्य स्थानों पर घोसले आदि रखने लगे हैं।</p>
<p><strong>किसी कवि की यह पंक्तियां प्रासंगिक हैं-</strong><br />
<strong>धीरे-धीरे यादें अब अवशेष रह गईं,</strong><br />
<strong>लुका-छिपी का खेल स्मृति-शेष रह गया।</strong><br />
<strong>ना रहा गांव, न रहा मुंडेर,</strong><br />
<strong>गौरेया कहानी के बीच रह गई।।</strong></p>
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		<title>चिंतन का विषय  बच्चों को शुरू से ही देने होंगे जैन संस्कार : धर्मांतरण पर चिंता नहीं, चिंतन की आवश्यकता </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 14 Jun 2023 06:32:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भी हाल ही में गाजियाबाद व दमोह की घटनाओं में जैन धर्मावलम्बियों को इस्लाम धर्म कबूल करते व मुस्लिम होते देखा गया। जिससे हम सब जैन धर्म के अनुयायी चिंता में आ गए व व्हाटसअप वीरों को चिंता में बड़े-बड़े सुझाव देखने सुनने को मिल रहे हैं। आजकल हमारी चिंता फेसबुक आदि इलेक्ट्रानिक मीडिया पर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भी हाल ही में गाजियाबाद व दमोह की घटनाओं में जैन धर्मावलम्बियों को इस्लाम धर्म कबूल करते व मुस्लिम होते देखा गया। जिससे हम सब जैन धर्म के अनुयायी चिंता में आ गए व व्हाटसअप वीरों को चिंता में बड़े-बड़े सुझाव देखने सुनने को मिल रहे हैं। आजकल हमारी चिंता फेसबुक आदि इलेक्ट्रानिक मीडिया पर होती दिखाई दे रही है, धरातल पर हम इन समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं देते। <span style="color: #ff0000;">इसी पर पढ़िए राजेन्द्र जैन &#8216;महावीर&#8217; का यह विशेष आलेख</span></strong></p>
<hr />
<p>इन दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया पर एक मुद्दा छाया हुआ है, जो धर्मान्तरण से संबंधित है। पहले हिन्दुओं को ईसाई धर्म में, इस्लाम में जाते देखा, उन सबके बीच द केरला स्टोरी में हिन्दू लड़कियों को इस्लाम (मुस्लिम) बनते देखा। अभी हाल ही में गाजियाबाद व दमोह की घटनाओं में जैन धर्मावलम्बियों को इस्लाम धर्म कबूल करते व मुस्लिम होते देखा गया। जिससे हम सब जैन धर्म के अनुयायी चिंता में आ गए व व्हाटसअप वीरों को चिंता में बड़े-बड़े सुझाव देखने सुनने को मिल रहे हैं। आजकल हमारी चिंता फेसबुक आदि इलेक्ट्रानिक मीडिया पर होती दिखाई दे रही है, धरातल पर हम इन समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं देते। एक समस्या आने के बाद अपनी आकोशपूर्ण प्रतिक्रियाएं देने के बाद हम अगली समस्या आते ही पिछली को भूल जाते हैं। यह हमारा नहीं, इस इलेक्ट्रानिक मीडिया का दोष है, जो हमारे दिमाग से सोच जागृत कर देता है, जो वह चाहता है।</p>
<p><strong>गायब नेतृत्वकर्ता</strong></p>
<p>न्यूज चैनल व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि सब जगह हमारा दिमाग इन दिनों गिरवी रखा हुआ दिखाई देता है। पिछले दिनों समता का मुद्दा भी खूब चला, पहले सम्मेदशिखर फिर गोम्मटगिरि अभी धर्मान्तरण का मुद्दा गर्म है लेकिन तात्कालिक प्रतिक्रियाओं के बाद हम कभी एक निर्णय पर नहीं पहुंचे हैं, न ही कोई मामला तय हुआ है कि आखिर हमें करना क्या है? समाज के लिए क्या दिशा-निर्देश हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि हम चिंता तो खुद कर रहे हैं, चिंतन के मामले में हम चेतना शून्य होते जा रहे हैं। हमारा नेतृत्वकर्ता ही गायब है या संस्थाओं की भीड़ में हम सब की निष्ठाएं अलग-अलग, कभी संत में, कभी पंथ में, कभी ग्रंथ में घटती हुई दिखाई देती हैं, जो बहुत से चिंतनीय है।</p>
<p><strong>सनसनीखेज सोशल मीडिया पोस्ट में उलझे</strong></p>
<p>&#8221;चिता&#8217; पिता को जला देती है, चिंतन हमारी चेतना शक्ति को जागृत कर देता है, जो हमें निष्कर्ष तक पहुंचा देता है। यह सब इसलिए लिख रहा हूं कि कुछ लोग तो टीआरपी के चक्कर में अपने बयान अपनी प्रतिक्रिया इतनी जी से सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं। जैसे सारी समस्याओं का हल यही जानते हैं। यूटयूब पर उत्साहीजन इसे इतना सनसनीखेज बना देते हैं कि ऐसा लगता है कि हमारा धर्म खतरे में आ गया और कुछ उत्साहीजन तीव्रता से कैलकुलेट करके बता देते हैं कि अकबर के जमाने में हम 22 करोड़ थे। फिर आज हम अंगुलियों पर गिनने लायक बचे हैं। फिर यह सब चला तो सन् इतने इतने में हम तो बच नहीं फिर हमारे मंदिरों का क्या होगा, हमारा धर्म कैसे बचेगा आदि अनेकों चिंताएं हमें दिखाई देती हैं फिर हमारे साधुवर्ग के प्रतिक्रिया वीडियो आ जाते हैं। फिर अनूठे अनूठे सुझाव आते है कि हम सबको मिलकर जनसंख्या बढ़ाना चाहिये, पार्टी बनाना चाहिये, हथियार चलाना चाहिये। फोड़ डालेंगे, तोड़ डालेंगे, सरकार बदल देगे, कोर्ट चले जाएंगे, न जाने क्या- क्या है।</p>
<p><strong>अपनी अलग पहचान है</strong></p>
<p>जैन धर्म, जैन समाज अल्पसंख्यक भले ही है लेकिन हम सम्पूर्ण विश्व में अपनी पहचान अलग रखते हैं। इन सबमें हमारी अपनी विशेषताएं हैं। आज जब हवाई जहान में बड़े होटल में जैन फूड मिलता है सम्पूर्ण विश्व में जैन जीवन पद्धति पर चर्चा होती है, अहिंसा पर हम सर्वश्रेष्ठ होते हैं, भगवान ऋषभदेव से लेकर तीर्थंकर महावीर तक कर्म सिद्धांत की चर्चा है, जीवन कैसे जीना है। इस पर जितना साहित्य विज्ञान की कसौटी पर खरा हमारा है, उतना किसी का नहीं है, सम्पूर्ण विश्व जैन दर्शन की ओर दृष्टि किए हुए है और हम क्या करना है, इस पर हमारा ध्यान ही नहीं है। चिंतन करना होगा, चिंता नहीं क्योंकि चिंतन हल देता चिंता परेशान करती है। हमारे संत भी कहते है कि चिंता चिता समान है। इसलिए बैठो चिंतन करो। आपस में संवाद करो।</p>
<p><strong>यह है मेरा चिंतन</strong></p>
<p>बहुत दिनों से लग रहा था कि अपने दायित्व को पूरा कर कुछ लिखना चाहिए। जो मेरे मन का चिंतन है ,जो आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं।</p>
<p>1. बच्चे के जन्म के बाद उसके जैनत्व के संस्कार देने के साथ घर पर भी जैनियो जैसा आचरण रखें।</p>
<p>2. आठ वर्ष का होने के बाद हम बच्चे को जैन के संस्कार महोत्सव का आयोजन करें। उसे सामूहिक रूप से मंदिर ले जाने का आयोजन करें।</p>
<p>3. उसे जहां भी पढ़ाएं, नर्सरी कक्षा से ही शाम को बच्चे को समय देकर उसे णमोकार मंत्र, भक्तामर स्त्रोत, तीर्थकरों के नाम, पांच पाप, कषाय, द्रव्य, तत्व आदि धार्मिक बातें उससे बुलवाएं, भले ही उसे समझ न आए। जैन गौरव से अवगत कराएं।</p>
<p>4. उसे धन कमाने की मशीन नहीं बनाएं।</p>
<p>5. घूमने के लिए पर्यटन स्थलों पर नहीं, अपने टोकों और शिखरों पर ले जाएं। प्रातः काल अभिषेक पूजा अवश्य करें।</p>
<p>6. घर पर भोजन पर चर्चा अवश्य करें। कम से कम एक समय साथ में भोजन करें।</p>
<p>7. यदि हमारा घर गांव में है और हम बड़े शहर में रहते हैं तो ग्राम में कुछ दिनों के लिए अवश्य जाएं।</p>
<p>8.समाज से मेरा आग्रह है कि हम अपने ग्राम-नगर में बैठकर अपने धर्म अनुरूप कुछ नियम अवश्य बनाएं।</p>
<p>9. पाठशाला प्रतिदिन हो तो बहुत अच्छा अन्यथा सप्ताह में एक दिन जैन पाठशाला अवश्य चलाएं। इस हेतु पाठशालाओं को अत्याधुनिक बना दें, बैठने की व्यवस्था आदि उत्तम रखें।</p>
<p>10. मंदिरों में जैन गौरव बढ़ाने वाली जानकारियों अवश्य लगाएं।</p>
<p>11.बच्चों को प्रोत्साहित करने का अवसर न छोड़ें। उन्हें सम्मानित करते रहें, उन्हें तीथों का भ्रमण कराएं।</p>
<p>12. सामूहिक भोजन में शुद्धता व समय का ध्यान रखें।</p>
<p>13. रात्रि भोजन निषेध हेतु स्थानीय स्तर पर नियम बनाएं।</p>
<p>14. अर्थ सम्पन्न समाजजन दिन के आयोजन पर दृढ़ रहे।</p>
<p><strong>राष्ट्रीय स्तर पर मेरा संस्थाओं व साधुओं से जाग्रह है</strong></p>
<p>1. जैन धर्म को बचाने की कार्य योजना बनाएं।</p>
<p>2. सबसे पहले हमारे आयोजन विशेषकर भव्य पंच कल्याणकों आदि को पांच वर्ष के लिए विराम लगा दें।</p>
<p>3. नये मंदिर जो बन रहे हैं, उन मंदिरों को पहले पूर्ण कराएं। पांच वर्ष तक कोई नवीन निर्माण न हो इस पर हमारे संतों के साथ मिलकर राष्ट्रीय सहमति बनाएं।</p>
<p>4. हमारे प्राचीन संस्थान गुरुकुत विद्यालय आदि जो बंद हो चुके हैं, उनके बंद होने के कारणों पर विचार करें, उन्हें पुनः प्रारम्भ करने का प्रयास करें।</p>
<p>5. पाठशालाओं के संचालन हेतु राष्ट्रीय कार्ययोजना बनकर उन्हें संचालित करने हेतु अनुदान प्रदान करें, पाठशालाएं होंगी तो ही मंदिर आबाद रहेंगे। वरना संस्कार भी समाप्त होंगे और मंदिर भी वीरान होगे।</p>
<p>6. अलग-अलग संस्थाएं अलग-अलग कार्य आपसी सहमति से अपना से और उनकी त्रैमासिक, वार्षिक समीक्षा कर कमजोरी पर चिंतन करते हुए सुधार के उपायों पर चर्चा करें। प्रोफेशनल तरीके से कार्य हो।</p>
<p>7. जैन धर्म के आर्थिक सम्पन्न व आर्थिक विपन्न वर्ग की सूची हमारे पास हो, राज्य स्तर के आंकडे़ हों। आर्थिक विपन्नों को मुख्य धारा में कैसे लाएं। आर्थिक सम्पन्न वर्ग को उन्हें सहयोग हेतु प्रोत्साहित कर राज्यवार जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाए।</p>
<p>8. चिंतन बैठक से उनमें निर्णय तो पहले योजना बने, उस पर क्रियान्वयन हो। व्हाटसएप के आधार पर आंदोलन प्रतिक्रिया नहीं, ठोस तथ्यों के साथ कार्य हो। 9. धर्मान्तरण क्यों, कैसे, कब किस कारण हुआ, उस पर ध्यान रखकर कार्य करें।</p>
<p>10. हमारे धार्मिक तीर्थों पर हो रहे अतिक्रमण पर हमारे पास पहले कागजी कार्यवाही जैसे जमीन का चिह्नांकन, रजिस्ट्रेशन आदि की कार्यवाही पूर्ण हो। इस हेतु या टीम संविदनशील जगहों का चयन कर उन्हें प्राथमिकता से पूर्ण करे।</p>
<p>11. पांच वर्षों में हम एक जैन विश्वविद्यालय खड़ा करें, जिसमें मेडिकल कॉलेज से लेकर सभी स्तर की शिक्षा हो। तो सबको यह समझाने में हम कामयाब होंगे कि जब जैन विश्वविद्यालय बन जाएगा तभी वास्तविक पंचकल्याणक होगा, हम जैनों का वास्तविक कल्याण कर सकेंगे और धर्मान्तरण को रोकने में कामयाब भी होंगे।</p>
<p>12. हमारे जैन हॉस्टल संचालित हैं। उनमें भारी-भरकम फीस ली जा रही है, समाज के लिए आर्थिक विपन्न वर्ग के लिए आरक्षण व निःशुल्क प्रवेश की व्यवस्था करें।</p>
<p>13. जैनाचार का पालन करने वाले बच्चों और श्रावकों का सम्मान सुनिश्चित करें।</p>
<p>14. विशेषकर हमारे पिछड़े इलाकों को चिह्नित करें, वहां के लिए कार्ययोजना बनायें।</p>
<p>मुझे प्रसन्नता है कि हमारे समाज ने अनेकों वर्षों पहले चिंतन किया था कि हमारे बच्चे प्रशासनिक सेवाओं में जाना चाहिये। आज हमारी अनेकों संस्थाएं इसमें काम कर परिणाम दे रही हैं। जनसंख्या के मुकाबले हमारे आईएएस बड़ी संख्या में निकल रहे हैं। अभी हाल में आए म.प्र. लोकसेवा आयोग के परीक्षा परिणामों में अनेकों विद्यार्थियों ने डिप्टी कलेक्टर जैसे अनेक पदों पर चयनित होकर अपना वर्चस्व स्थापित किया है, यह प्रसन्नता की बात है। हमें गर्व है कि हम समाज के लिए चिंतित हैं, अब यह चिंता केवल चिंतन में बदलनी है और भी बहुत बाते हैं, जिन्हें आगामी समय में लिखेंगे।</p>
<p>हम &#8216;चिंता&#8217; से &#8216;चिंतन&#8217; की यात्रा पर निकलें, हल निकालें, इस लेख में जो अच्छा नहीं लगा हो उसे अपने चिंतन से हटा दें। कुछ लोग समाधान में समस्या ढूंढते हैं, हमें समस्या का समाधान ढूंढना है। आइये सब मिलकर हल ढूंढें।</p>
<p><strong>गुरुमंत्र &#8211;</strong></p>
<p>&#8220;हम जो हैं, वही बने रहकर वह नहीं बन सकते जो कि हम बनना चाहते हैं &#8220;</p>
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