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	<title>Article श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>आध्यात्मिक साधना का अद्वितीय जीवनवृत्त : संयम, तप और वात्सल्य के प्रतीक हैं आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sat, 30 Aug 2025 05:00:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का जीवन संयम, तप, करुणा और धर्मप्रभावना का अद्वितीय उदाहरण है। 75वें जन्मदिवस पर उनका यह जीवनवृत्त समाज के लिए प्रेरणा, भक्ति और आत्मशुद्धि का संदेश है। पढ़िए राजेश पंचोलिया का विशेष आलेख&#8230;. भारत की आध्यात्मिक परंपरा में संयम, तप और करुणा के प्रतीक आचार्य 108 श्री वर्धमान सागर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का जीवन संयम, तप, करुणा और धर्मप्रभावना का अद्वितीय उदाहरण है। 75वें जन्मदिवस पर उनका यह जीवनवृत्त समाज के लिए प्रेरणा, भक्ति और आत्मशुद्धि का संदेश है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश पंचोलिया का विशेष आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>भारत की आध्यात्मिक परंपरा में संयम, तप और करुणा के प्रतीक आचार्य 108 श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने अपने साधु जीवन के 57 वर्षों में जिनधर्म की अखंड ज्योति प्रज्वलित की है। मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री ने राष्ट्रभर में धर्मप्रभावना का अद्वितीय कार्य किया। 18 सितम्बर 1950 को जन्मे यह महामानव भादवा सुदी सप्तमी को 75वें अवतरण दिवस पर प्रवेश कर रहे हैं। उनकी साधना, उपसर्गों पर विजय, तप और वात्सल्य ने उन्हें समाज के लिए प्रेरणा का आधार बना दिया है।</p>
<p><strong>परंपरा और दीक्षा</strong></p>
<p>20वीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा में तृतीय पट्टाधीश आचार्य 108 श्री धर्मसागर जी से दीक्षित होकर, इस परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज बने।</p>
<p>उनकी दीक्षा 24 फरवरी 1969 (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) को श्री महावीर जी में आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज से हुई।</p>
<p><strong>जन्मभूमि और बाल्यकाल</strong></p>
<p>आचार्य श्री का जन्म मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के सनावद नगर में हुआ, जो कई सिद्धक्षेत्रों के निकट स्थित है।</p>
<p>उनकी माता श्रीमती मनोरमा देवी जैन और पिता श्री कमलचंद जी जैन (पोरवाड़ उपजाति) थे। यशवंत नाम से जन्मे यह बालक अपने परिवार की 13वीं संतान थे। माता-पिता ने महावीर जी मंदिर में मन्नत मांगी थी कि यदि संतान जीवित हुई तो उसका मुंडन वहीं कराएंगे। बाद में यही स्थान उनकी मुनि दीक्षा का पावन स्थल बना।</p>
<p><strong>प्रारंभिक जीवन और संत-समागम</strong></p>
<p>मात्र 12 वर्ष की आयु में माता का असामयिक निधन हो गया।</p>
<p>युवावस्था में वे कई आचार्यों और आर्यिकाओं के संपर्क में आए। मई 1968 में संघ से जुड़ गए और आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज से गृहत्याग का नियम लिया।</p>
<p><strong>उपसर्ग और नेत्रज्योति की पुनः प्राप्ति</strong></p>
<p>दीक्षा के बाद मात्र 19 वर्ष की उम्र में उनकी नेत्र ज्योति चली गई। डॉक्टरों ने इंजेक्शन के बिना दृष्टि लौटने की संभावना न के बराबर बताई। लेकिन मुनि श्री ने संकल्प किया कि वे उपचार नहीं कराएंगे।</p>
<p>लगातार 3 घंटे तक श्री शांति भक्ति का पाठ करने और प्रभु भक्ति की प्रभावना से 52 घंटे बाद उनकी नेत्र ज्योति लौट आई। यह घटना आज भी भक्तों के लिए आस्था का आधार है।</p>
<p><strong>आचार्य पद</strong></p>
<p>24 जून 1990 (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) को राजस्थान के पारसोला में, आचार्य श्री अजितसागर जी महाराज के लिखित आदेश से उन्हें आचार्य पद प्रदान किया गया। 57 वर्ष के साधु जीवन में उन्होंने देशभर में धर्मप्रभावना की और अनेक तीर्थ क्षेत्रों में चातुर्मास व विहार किए।</p>
<p><strong>दीक्षाएं और पंचकल्याणक</strong></p>
<p>अब तक आचार्य श्री ने 117 दीक्षाएं दी हैं – जिनमें 41 मुनि, 45 आर्यिका, 15 ऐलक-क्षुल्लक और 13 क्षुल्लिका शामिल हैं। उन्होंने 70 से अधिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं कराई हैं।</p>
<p><strong>विशेष योगदान</strong></p>
<p>57 वर्षों में 70 से अधिक सल्लेखनाएं कराई हैं। उनकी विचारधारा – “हम हमारी छोड़ेंगे नहीं, औरों की बिगाड़ेंगे नहीं” – समाज के लिए प्रेरणादायी रही है।</p>
<p><strong>उपाधियां</strong></p>
<p>समाज ने उन्हें अनेक उपाधियां प्रदान कीं – आचार्य शिरोमणि, वात्सल्य वारिधि, राष्ट्र गौरव, तपोनिधि, संस्कृति संरक्षक, जिनधर्म प्रभावक इत्यादि।</p>
<p><strong>महामस्तकाभिषेक में मार्गदर्शन</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने 1008 श्री गोमटेश्वर बाहुबली भगवान के महामस्तकाभिषेक (1993, 2006, 2018) और 2022 में श्री महावीर स्वामी के महामस्तकाभिषेक में प्रमुख सानिध्य और मार्गदर्शन प्रदान किया।</p>
<p><strong>विलक्षण प्रसंग</strong></p>
<p>-1994 में श्रवण बेलगोला से कनकगिरि विहार के दौरान देवों ने सर्प रूप में आचार्य श्री का मार्ग रोका। बाद में क्षेत्र विकास के संकेत मिले।</p>
<p>-1988 में भिंडर में गुरु-शिष्य मिलन का भावपूर्ण प्रसंग घटित हुआ, जब आचार्य अजितसागर जी के चरणों को वर्धमान सागर जी के अश्रुओं ने अभिषिक्त किया और बदले में आचार्य श्री के अश्रु आशीर्वाद शिष्य के मस्तक पर गिरे।</p>
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		<title>फादर्स डे पर विशेष पिता के स्नेह और समर्पण को समर्पित दिन : “पिता: जीवन की जड़, संत: जीवन की दिशा” </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Rekha Jain]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Jun 2025 10:39:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[फादर्स डे एक विशेष दिन है जो पिता के प्रेम, त्याग और मार्गदर्शन को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। यह दिन हमें अपने पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है। आमतौर पर जून के तीसरे रविवार को मनाया जाने वाला यह दिन परिवार में पिता की भूमिका और उनके योगदान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>फादर्स डे एक विशेष दिन है जो पिता के प्रेम, त्याग और मार्गदर्शन को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। यह दिन हमें अपने पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है। आमतौर पर जून के तीसरे रविवार को मनाया जाने वाला यह दिन परिवार में पिता की भूमिका और उनके योगदान को सराहने का समय होता है। उपहार, भावनात्मक संदेश और साथ बिताए खास पल इस दिन को और भी यादगार बना देते हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा जैन का विशेष आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-82988" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0021.jpg" alt="" width="1251" height="1600" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0021.jpg 1251w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0021-235x300.jpg 235w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0021-801x1024.jpg 801w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0021-768x982.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0021-1201x1536.jpg 1201w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250614-WA0021-990x1266.jpg 990w" sizes="(max-width: 1251px) 100vw, 1251px" /></p>
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		<title>लोकोपकारी परम प्रभावक तीर्थंकर पार्श्वनाथ : व्यापक व्यक्तित्व संपूर्ण देश में अत्यंत लोकप्रिय जननायक </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Dec 2024 14:41:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन परंपरा में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी तक के इन चौबीस तीर्थंकरों की गौरवशाली परंपरा में बनारस नगरी में जन्मे सप्तम तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ, अष्टम तीर्थंकर चंद्रप्रभु, ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ और तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ। प्रो० फूलचंद जैन प्रेमी, वाराणसी का लेख ( राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित) जैन परंपरा में प्रथम तीर्थंकर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन परंपरा में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी तक के इन चौबीस तीर्थंकरों की गौरवशाली परंपरा में बनारस नगरी में जन्मे सप्तम तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ, अष्टम तीर्थंकर चंद्रप्रभु, ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ और तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ। <span style="color: #ff0000">प्रो० फूलचंद जैन प्रेमी, वाराणसी का लेख ( राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित)</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन परंपरा में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी तक के इन चौबीस तीर्थंकरों की गौरवशाली परंपरा में बनारस नगरी में जन्मे सप्तम तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ, अष्टम तीर्थंकर चंद्रप्रभु, ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ और तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ।</p>
<p>इनमें अब से लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व काशी में जन्मे तीर्थंकर पार्श्वनाथ का व्यापक व्यक्तित्व संपूर्ण देश में अत्यंत लोकप्रिय जननायक, कष्ट एवं विघ्न विनाशक, सभी प्राणियों के उद्धारक, समदर्शी आदि रूपों में पूजित और प्रभावक रहा है। नौवीं शती ईसा पूर्व काशी नरेश महाराजा अश्वसेन और महारानी वामादेवी के घर जन्मे तीर्थंकर पार्श्वनाथ, जो कि इस श्रमण परंपरा के एक महान पुरस्कर्ता थे। उस विषयक कोई व्यवस्थित रूप में साहित्य वर्तमान में उपलब्ध नहीं है, किंतु अनेक प्राचीन ऐतिहासिक प्रामाणिक स्रोतों से वे एक ऐतिहासिक महापुरुष के रूप में मान्य हैं।</p>
<p>पार्श्वनाथ का जन्म उग्रवंश में हुआ था। वाराणसी के महाराजा ब्रह्मदत्त के पूर्वज उग्गसेन, धनंजय, महासोलव, संयम, विस्ततेन और उदयभट्ट के नाम बौद्ध जातकों में मिलते हैं। संभवतः इनमें उग्गसेन से उग्रवंश प्रचलित हुआ होगा। वैदिक साहित्य के बृहदारण्यक में भी गार्गी और याज्ञवल्क्य में सम्वाद के समय गार्गी ने &#8216;काश्यो वा वैदेहो वा उग्रपुत्रः&#8217; कहकर काशी और विदेह जनों को उग्रपुत्र कहा है। बौद्ध जातक में पूर्व में उल्लिखित नामों में &#8216;विस्ससेन&#8217; का उल्लेख महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पार्श्वनाथ के पिता का नाम अश्वसेन का दूसरा नाम प्राकृत साहित्य में &#8216;विस्ससेन&#8217; (विश्वसेन) ही विशेष मिलता है। उग्रवंश आदि इक्ष्वाकुवंशी ही थे।</p>
<p>पौराणिक कथानक के अनुसार पार्श्वनाथ के जन्म के पूर्व उनकी माता वामादेवी ने रात्रि के अंतिम प्रहर में सोलह मांगलिक स्वप्न देखे, जिनका फल था-पार्श्वनाथ अपनी मां के गर्भ में आए। अतः वैशाख कृष्ण द्वितीया को विशाखा नक्षत्र में आनत स्वर्ग से समागत पार्श्वनाथ के पूर्वभव के जीव आनतेंद्र को जैसे ही माता ने अपनी पवित्र कोख में धारण किया कि माता प्राची दिशा की भांति कांतियुक्त हो गईं। नौ माह पूर्ण होते ही पौष कृष्णा एकादशी को अनिल योग विशाखा नक्षत्र में जिस पुत्र का जन्म हुआ वहीं आगे चलकर तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ बने। वे तीस वर्ष तक कुमारावस्था में रहे। फिर उन्होंने पौष कृष्ण एकादशी के प्रातः तीन सौ राजाओं के साथ मुनि दीक्षा ग्रहण की। संयम और ध्यान साधना में आपको अनेकानेक भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ा, किंतु आप उनसे किंचित् विचलित हुए बिना तपश्चरण में लीन रहे और लंबी साधना के बाद उन्हें चैत्र कृष्ण चतुर्थी को सर्वोच्च केवलज्ञान की प्राप्ति हो गयी। इस प्रकार केवलज्ञान की प्राप्ति के साथ ही अर्हन्त पद प्राप्त करके वे सर्वज्ञ-सर्वदर्शी बन गए। दीर्घ और कठिन संयम साधना के बाद उन्हें आत्मोपलब्धि की प्राप्ति हुई।</p>
<p>इस प्रकार आत्म-कल्याण के बाद अर्थात् वे जन-जन के कल्याण स्वरूप आत्मोत्थान हेतु सम्पूर्ण देश में, विशेष रूप में काशी, कोशल, पांचाल, मरहटा, मारु, मगध, अवंती, अंग-बंग-कलिंग आदि सभी क्षेत्रों के गाँव- गाँव, नगर-नगर में भ्रमण करते हुए धर्मोपदेश के द्वारा अहिंसा, सत्य, सर्वोदय आदि सिद्धांतों का प्रचार- प्रसार किया एवं धर्मान्धता, पाखंड, कुरीतियों, ऊंच-नीच की भावना-आदि दोषों को दूर करने का उपदेश देते और विहार करते हुए झारखंड प्रदेश के हजारीबाग के निकट शाश्वत और पवित्र सिद्ध क्षेत्र श्री सम्मेद शिखर जी पधारे, जहां प्रतिमायोग धारण करते ही श्रावणशुक्ला सप्तमी की प्रातः बेला में अवशिष्ट अघातियों के कर्मों का क्षय करके उन्होंने मोक्ष (निर्वाण)पद प्राप्त किया। उनके आदर्शपूर्ण जीवन और धर्म-दर्शन की लोकव्यापी छवि आज भी संपूर्ण भारत तथा इसके सीमावर्ती क्षेत्रों और देशों में विविध रूपों में दिखलाई देती है। सम्पूर्ण देश में प्राचीन काल से अब तक सर्वाधिक रूप में प्राप्त इनकी मूर्तियों की पहचान मुख्यतः सप्त फणावली और पादपीठ के मध्य सर्प चिह्न से होती है। यक्ष धरणेन्द्र और यक्षिणी पद्मावती का मूर्तांकन भी इनकी मूर्ति की पहचान में सहयोगी बनते हैं।</p>
<p><strong>लोकव्यापी प्रभाव</strong></p>
<p>अर्धमागधी प्राकृत साहित्य में &#8216;पुरुसादाणीय&#8217; अर्थात् लोकनायक श्रेष्ठपुरुष जैसे अति लोकप्रिय व्यक्तित्व के रूप में प्रयुक्त इनके सम्मानपूर्ण विशेषणों का उल्लेख मिलता है। वैदिक और बौद्ध आदि अनेक धर्मों तथा अहिंसा एवं आध्यात्मिकता से ओत-प्रोत संपूर्ण भारतीय संस्कृति पर इनके चिंतन और प्रभाव की अमिट गहरी छाप आज भी विद्यमान है। वैदिक, जैन और बौद्ध साहित्य में इनका उल्लेख मिलता है तथा व्रात्य, पणि और नाग आदि जातियां स्पष्टतः पार्श्वनाथ की अनुयायी थीं। वर्तमान में भारत में प्रचलित नाग-पूजा भी निश्चियतः इन्हीं से संबंद्ध प्रतीत होती है।</p>
<p>भारत के पूर्वी क्षेत्रों, विशेषकर बंगाल, बिहार, उड़ीसा आदि अनेक प्रान्तों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में लाखों की संख्या में बसने वाली सराक, सद्गोप, रंगिया आदि जातियों का सीधा और गहरा संबंध तीर्थंकर पार्श्वनाथ की परंपरा से है। इन लोगों के दैनिक जीवन व्यवहार की क्रियाओं और संस्कारों पर आज भी तीर्थंकर पार्श्वनाथ और उनके चिंतन की गहरी छाप है।</p>
<p>जैनधर्म का प्राचीन इतिहास (भाग 1, पृ. 359) के अनुसार नाग, द्रविड़ और बंगाल, बिहार, उड़ीसा, झारखंड आदि क्षेत्रों की आदिवासी जातियों विशेष रूप में सराक बहुल इलाकों में तीर्थंकर पार्श्वनाथ का अतिशय प्रभाव और मान्यता आज भी विद्यमान है। श्रमण संस्कृति के अनुयायी व्रात्यों में नागजाति सर्वाधिक शक्तिशाली थी। तक्षशिला, उद्यानपुरी, अहिच्छत्र, मथुरा, पद्मावती, कांतिपुरी, नागपुर आदि इस जाति के प्रसिद्ध केंद्र थे। तीर्थंकर पार्श्वनाथ नाग जाति के इन केंद्रों में कई बार पधारे और यहां इनके चिंतन से प्रभावित हो सभी इनके अनुयायी बन गए। इस दिशा में गहन अध्ययन और अनुसंधान से आश्चर्यकारी नये तथ्य सामने आ सकते हैं, जो तीर्थकर पार्श्वनाथ के लोकव्यापी स्वरूप को और अधिक स्पष्ट रूप से उजागर कर सकते हैं।</p>
<p>इसी संदर्भ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. जगदीश गुप्त का यह कथन महत्त्वपूर्ण है- “तीर्थंकर पार्श्वनाथ की महत्ता नागपूजा, यक्ष पूजा और सूर्य पूजा से समर्थित है। इससे यह सिद्ध होता है कि भारतीय संस्कृति में उनकी कितनी लोकप्रियता रही है और कितने रूपों में उन्हें चित्रित एवं उत्कीर्ण किया गया है। भारतीय कलाकारों ने कितनी तन्मयता से उनके स्वरूप को अपनी कल्पना से समृद्ध किया है। नाग-छत्र के भी कितने रूप मिलते हैं-यह पार्श्वनाथ की असंख्य प्रतिमाओं के अनुशीलन से पहचाना जा सकता है। मेरी दृष्टि में भारतीय संस्कृति के स्वरूप को समझने के लिए तीर्थंकर महावीर और गौतम बुद्ध के बाद यदि कोई जैन तीर्थंकर कलात्मक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, तो वे पार्श्वनाथ ही हैं। ईसा पूर्व की दूसरी-तीसरी सदी के जैनधर्मानुयायी सुप्रसिद्ध कलिंग नरेश महाराजा खारवेल भी इन्हीं के प्रमुख अनुयायी थे। इस प्रकार अंग, बंग, कलिंग, कुरु, कौशल, काशी, अवंती, पुण्ड, मालव, पांचाल, मगध, विदर्भ, भद्र, दशार्ण, सौराष्ट्र, कर्नाटक, कोंकण, मेवाड़, लाट, कश्मीर, कच्छ, वत्स, पल्लव और आभीर आदि तत्कालीन अनेक क्षेत्रों, राष्ट्रों और देशों का उल्लेख आगमों में मिलता है, जिनमें तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने ससंघ विहार करके जन-जन के लिए हितकारी धर्मोपदेश देकर जागृति पैदा की।</p>
<p>इस प्रकार तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा उनके लोकव्यापी चिंतन ने लंबे समय तक धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्र को प्रभावित किया है। व्यवहार की दृष्टि से उनका धर्म सहज था। धार्मिक क्षेत्रों में उस समय पुढेषाण, वित्तैषणा, लोकैषणा आदि के लिए हिंसामूलक यज्ञ तथा अज्ञानमूलक तपों का काफी प्रचलन था, किंतु उन्होंने पूर्वोक्त क्षेत्रों में विहार (भ्रमण) करके अहिंसा और अपने अंदर विराजमान अनंत शक्तियों को जाग्रत करने का जो समर्थ प्रचार किया, उसका समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा और अनेक आर्य तथा अनार्य जातियां उनके धर्म में दीक्षित हो गईं। धर्म के नाम पर हिंसा की जगह आज भी जो अहिंसक प्रभाव और प्रयोग देखे जा रहे हैं, इनमें पार्श्वनाथ के उपदेशों का ही विशेष प्रभाव है ।</p>
<p><strong>आचार्य समन्तभद्र ने आपकी स्तुति करते हुए कहा है &#8211;</strong></p>
<p>स सत्य विद्यातपसां प्रणायकः समग्रधीरुग्रकुलाम्बरांशुमान।</p>
<p>मया सदा पार्श्वजिनः प्रणम्यते विलीन मिथ्यापथदृष्टि विभ्रमः ।।5।।</p>
<p>अर्थात् आप सत्य विद्याओं और तपस्याओं के प्रणेता हैं, पूर्णबुद्धि युक्त सर्वज्ञ हैं तथा उग्रवंश रूप आकाश में चंद्रमा के समान हैं। आपने अपने उपदेशों के द्वारा मिथ्यादर्शन आदि अनेक कुमार्ग दृष्टियों को दूर कर सम्यग्दर्शन-ज्ञान और चारित्र्य रूप रत्नत्रय का मार्ग प्रशस्त किया है। इसलिए हे पार्श्व! इन गुणों के कारण मैं सदा आपको प्रणाम करता हूं।</p>
<p>हमारे देश के हजारों नए और प्राचीन जैन मंदिरों में सर्वाधिक तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूर्तियों की उपलब्धता भी उनके प्रति गहरे आकर्षण, गहन-आस्था और लोकव्यापी प्रभाव का ही परिणाम है। मध्य एवं पूर्वी देशों के व्रात्य क्षत्रिय उनके अनुयायी थे। गंगा का उत्तर एवं दक्षिण भाग तथा अनेक नागवंशी राजतंत्र एवं गणतंत्र उनके अनुयायी थे। श्रावस्ती के श्रमण केशीकुमार भी पार्श्व की ही परंपरा के श्रमण थे। संपूर्ण मगध भी भगवान पार्श्वनाथ का उपासक था। तीर्थंकर महावीर के माता-पिता तथा अन्य संबंधी पार्श्वापत्य परंपरा के श्रमणोपासक थे।</p>
<p>महात्मा बुद्ध के जीवन-प्रसंग से पता चलता है कि वे अपनी साधनावस्था में तीर्थंकर पार्श्वनाथ की परंपरा से संबद्ध रहे हैं। पालि साहित्य के मज्झिमनिकाय,महासिंहनादसुत्त(1.1.2)के उल्लेखानुसार एक बार महात्मा बुद्ध अपने प्रमुख शिष्य सारिपुत्र से कहते हैं- “सारिपुत्र! बोध प्राप्ति से पूर्व मैं दाढ़ी, मूंछों का लुंचन करता था। मैं खड़ा रहकर तपस्या करता था, उकडूं बैठकर तपस्या करता था। मैं नंगा रहता था। लौकिक आचारों का पालन नहीं करता था। हथेली पर भिक्षा लेकर खाता था। .बैठे हुए स्थान पर आकर दिए हुए अन्न को, अपने लिए तैयार किए हुए अन्न को और निमंत्रण को भी स्वीकार नहीं करता था। गर्भिणी व स्तनपान कराने वाली स्त्री से भिक्षा नहीं लेता था।&#8221;</p>
<p>महात्मा बुद्ध द्वारा वर्णित यह समस्त आचार जैन साधुओं से सम्बन्धित हैं। इससे प्रतीत होता है कि महात्मा गौतमबुद्ध सर्वप्रथम तीर्थंकर पार्श्वनाथ की परंपरा के किसी श्रमण संघ में दीक्षित हुए होगें, वहां से उन्होंने बहुत कुछ सद्ज्ञान प्राप्त किया। बाद में बुद्ध ने कठिन तपश्चर्या आदि किसी कारणवश अलग होकर मध्यममार्गी बन अपना स्वतंत्र मत चलाया होगा।</p>
<p>कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि प्रधान वेदों के बाद उपनिषदों में आध्यात्मिक चिंतन की प्रधानता के समावेश में तीर्थंकर पार्श्वनाथ के चिंतन का काफी प्रभाव है। इस तरह वैदिक परंपरा को आध्यात्मिक रूप प्रदान करने में इनका बहुमूल्य योगदान माना जा सकता है।</p>
<p>इस प्रकार तीर्थंकर पार्श्वनाथ का ऐसा लोकव्यापी प्रभाव व्यक्तित्व एवं चिंतन था कि कोई भी एक बार इनके या इनकी परंपरा के परिपार्श्व में आने पर उनका प्रबल अनुयायी बन जाता था। तभी तो हिंदी जगत के शिखर पुरुष भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखाः</p>
<p>तुमहि तौ पार्श्वनाथ हो पियारे, तलफन लागै प्रान बगल तै छिनहु होत न न्यारै।</p>
<p>तुम सौ और पास नहीं कोउ, मानहु करि पतियारे, &#8216;हरीचंद्र&#8217; खोजत तुमही को वेद-पुरान पुकारै ।।</p>
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		<title>2 अक्टूबर महात्मा गांधी की जंयती पर विशेष लेखः अहिंसा के पुजारी थे महात्मा गांधी &#8216;दे दी हमें आजादी, बिना खड्‍ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।&#8217;  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/mahatma_gandhi_was_a_priest_of_non_violence_2_october_anniversary_special/</link>
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		<pubDate>Wed, 02 Oct 2024 10:14:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आज गांधीजी हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनके आदर्श सिद्धांत हमें सदैव याद रहेंगे। उनका नाम अमर रहेगा। मनुष्य पर किसी ना किसी धर्म, व्यक्ति का प्रभाव अवश्य रहता है। गांधी जी पर जैन धर्म के मूल सिद्धांत अहिंसा और अहिंसा का उपदेश देने वाले महावीर भगवान का प्रभाव था। पढ़िए रेखा जैन की एक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आज गांधीजी हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनके आदर्श सिद्धांत हमें सदैव याद रहेंगे। उनका नाम अमर रहेगा। मनुष्य पर किसी ना किसी धर्म, व्यक्ति का प्रभाव अवश्य रहता है। गांधी जी पर जैन धर्म के मूल सिद्धांत अहिंसा और अहिंसा का उपदेश देने वाले महावीर भगवान का प्रभाव था। <span style="color: #ff0000">पढ़िए रेखा जैन की एक रिपोर्ट</span></strong></p>
<hr />
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-67695" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0013.jpg" alt="" width="990" height="1332" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0013.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0013-223x300.jpg 223w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0013-761x1024.jpg 761w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0013-768x1033.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 990px) 100vw, 990px" /><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-67694" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0015.jpg" alt="" width="990" height="1204" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0015.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0015-247x300.jpg 247w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0015-842x1024.jpg 842w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0015-768x934.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 990px) 100vw, 990px" /><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-67693" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0017.jpg" alt="" width="990" height="1183" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0017.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0017-251x300.jpg 251w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0017-857x1024.jpg 857w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241002-WA0017-768x918.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 990px) 100vw, 990px" /></p>
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		<title>पर्यूषण महापर्व 8 सितम्बर से 17 सितंबर 2024 पर विशेष : दसलक्षण महापर्व : विकारों से मुक्ति के दस उपाय </title>
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		<pubDate>Thu, 05 Sep 2024 06:45:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दसलक्षण महापर्व जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे जैन धर्मावलंबियों द्वारा बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व दस दिनों तक चलता है और इसमें दस महत्वपूर्ण धर्मों या गुणों का पालन किया जाता है। इन दस धर्मों का पालन करने से आत्मा को शुद्ध किया जाता है और [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>दसलक्षण महापर्व जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे जैन धर्मावलंबियों द्वारा बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व दस दिनों तक चलता है और इसमें दस महत्वपूर्ण धर्मों या गुणों का पालन किया जाता है। इन दस धर्मों का पालन करने से आत्मा को शुद्ध किया जाता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। जैन धर्म में इस पर्व का अत्यधिक महत्व है, और इसे अहिंसा, तपस्या, और आत्मसंयम के आदर्शों को पुनः स्मरण करने का अवसर माना जाता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. सुनील जैन संचय का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म में अहिंसा एवं आत्&#x200d;मा की शुद्धि को सबसे महत्&#x200d;वपूर्ण स्&#x200d;थान दिया जाता है। प्रत्&#x200d;येक समय हमारे द्वारा किये गये अच्&#x200d;छे या बुरे कार्यों से कर्म बंध होता है, जिनका फल हमें अवश्&#x200d;य भोगना पड़ता है। शुभ कर्म जीवन व आत्&#x200d;मा को उच्&#x200d;च स्&#x200d;थान तक ले जाता है, वही अशुभ कर्मों से हमारी आत्&#x200d;मा मलिन होती जाती है।</p>
<p>पर्युषण पर्व के दौरान विभिन्&#x200d;न धार्मिक क्रियाओं से आत्&#x200d;मशुद्धि की जाती व मोक्षमार्ग को प्रशस्त करने का प्रयास किया जाता है, ताकि जनम-मरण के चक्र से मुक्ति पायी जा सके। जब तक अशुभ कर्मों का बंधन नहीं छुटेगा, तब तक आत्मा के सच्&#x200d;चे स्&#x200d;वरूप को हम नहीं पा सकते हैं।<br />
यह पर्व जीवन में नया परिवर्तन लाता है। दश दिवसीय यह पावन पर्व पापों और कषायों को रग -रग से विसर्जन करने का संदेश देता है।<br />
यह एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है व अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है। पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है।</p>
<p>यह पर्व जीवमात्र को क्रोध, मान,माया,लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, असंयम आदि विकारी भावों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है। हमारे विकार या खोटे भाव ही हमारे दु:ख का कारण हैं और ये भाव वाह्य पदार्थों या व्यक्तियों के संसर्ग के निमित्त से उत्पन्न होते हैं। आसक्ति—रहित आत्मावलोकन करने वाला प्राणी ही इनसे बच पाता है। इस पर्व में इसी आत्म दर्शन की साधना की जाती है। यह एक ऐसा अभिनव पर्व है कि जिससे किसी अवतार, युग पुरुष या व्यक्ति विशेष का गुणगान न करके अपने ही भीतर छिपे सद्गुणों को विकसित करने का पुरुषार्थ किया जाता है। अपने व्यक्तित्व को समुन्नत बनाने का यह पर्व एक सर्वोत्तम माध्यम है।</p>
<p>जैनधर्म में विकारों से मुक्ति के दस उपाय बताते गए हैं। उन्हें धर्म के दस लक्षण भी कहा जाता है। उन्हीं दस लक्षणों की चर्चा—वार्ता की प्रधानता होने से इस पर्व को दशलक्षण पर्व कहा जाता है। इन दस लक्षणों को अपने आचरण में उतारने के लिए जो साधना करता है, वह एक दिन निर्विकार हो जाता है। यह हम सबका कर्तव्य है कि विकारों से बचते हुए हम धर्म—मार्ग पर चलें।</p>
<p>मूलत: आत्मा का स्वभाव ज्ञान और दर्शन है। इन्हीं की उपलब्धि के लिए चारित्र की उपयोगिता है । यही मोक्षमार्ग है। इस मोक्षमार्ग की दश सीढ़ी हैं जिन पर चढ़कर भव्य मानव पूर्व ज्ञान और दर्शन को प्राप्त करता है। ये दश सीढ़ियां धर्म के दशलक्षण हैं—<br />
मोक्षशास्त्र में जैनाचार्य उमास्वामी जी ने लिखा है-‘‘उत्तमक्षमामार्दवार्जव -शौच -सत्य संयम -तप -त्यागाकिंचन्य ब्रह्मचर्याणि धर्म:’’ अर्थात उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव शौच, सत्य, सयंम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य ये दश धर्म हैं।</p>
<p><strong>दस दिन तक इन धर्मों की क्रमशः आराधना की जाती है। आइये संक्षेप में प्रत्येक धर्म के बारे में जानें-</strong><br />
<span style="color: #ff0000">1.क्रोध पर अंकुश लगानें का उपाय &#8216;उत्तम क्षमा धर्म :</span></p>
<p>उत्तम क्षमा धर्म हमारी वैमनस्यता, कलुषता, बैर—दुश्मनी एवं आपस की तमाम प्रकार की टकराहटों को समाप्त कर जीवन में प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, प्यार, आत्मीयता की धारा को बहाने का नाम है। हम अपनी कषायों को छोड़ें, अपने बैरों की गांठों को खोलें, बुराइयों को समाप्त करें, बदलें, प्रतिशोध की भावना को नष्ट करें, नफरत—घृणा, द्वेष बंद करें, आपसी झगड़ों, कलह को छोड़ें।<br />
आज का मनुष्य अपने आवेगों से परेशान है। वह हर समय तनाव में जी रहा है। सास और बहू, ननद और भावज, देवरानी और जेठानी तथा भाई और भाई के बीच की अनबन या कलह आज घर—घर की कहानी बन गई है। पूरे देश के लोग जाति, भाषा और समुदाय के नाम पर झगड़ रहे हैं। यह सब आम आदमी के मन में रचे—बसे क्रोध का ही दुष्परिणाम है। क्रोध की दिनों—दन बढ़ती इस लहर पर अंकुश लगा कर ही हम पारिवारिक और सामाजिक शान्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। जब क्रोध आये तो तुरन्त प्रतिक्रिया व्यक्त करने से बचना चाहिए। समय का अन्तराल क्रोध के आवेग को कम कर देता है। पूरी और गहरी सांस लेने से भी क्रोध पर विजय पाई जा सकती है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">2.विनम्रता सिखाता है &#8216;उत्तम मार्दव &#8216;:</span></p>
<p>सब से विनम्र भाव से पेश आएं, सब प्राणियों के प्रति मैत्री भाव रखें । क्योंकि सभी प्राणियों को जीवन जीने का अधिकार है। मृदु परिणामी व्यक्ति कभी किसी का तिरस्कार नहीं करता और यह सृष्टि का नियम है कि यहाँ दूसरों का आदर देने वाला ही स्वयं आदर का पात्र बन सकता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">3.कथनी और करनी एक हो- उत्तम आर्जव :</span><br />
आर्जव धर्म का अर्थ है— मन, वाणी और कर्म की पवित्रता और यह पवित्रता ही किसी व्यक्ति को महान बनाती है। महापुरुष जो कहते हैं, वही करते हैं, किन्तु कुटिल पुरुषों की कथनी और करनी में अन्तर होता है। यह मायाचार है। शास्त्रों में इसे त्याज्य बताया गया है। आज सर्वत्र मायाचार या छल—कपट का साम्राज्य है। आज धर्म के क्षेत्र में भी मायाचार देखा जा सकता है। इस धर्म का ध्येय है कि हम सब को सरल स्वभाव रखना चाहिए, मायाचारी त्यागना चाहिए।</p>
<p><span style="color: #ff0000">4. लोभ त्यागने का संदेश देता है &#8216;उत्तम शौच धर्म &#8216;:</span></p>
<p>भौतिक संसाधनों और धन दौलत में खुशी खोजना यह महज आत्मा का एक भ्रम है।<br />
उत्तम शौच धर्म हमे यही सिखाता है कि शुद्ध मन से जितना मिला है उसी में खुश रहो।लोभ छोड़ने से ही आत्मा में उत्तम शौच धर्म प्रकट होता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">5.वाणी का करें सदुपयोग —</span></p>
<p>उत्तम सत्य धर्म : व्यवहार में वाणी के सदुपयोग को सत्य कहते हैं।दुर्लभ वाणी का सदुपयोग करने वाला ही धर्मात्मा कहला सकता है। हित—मित और प्रिय वचन बोलना ही वाणी का सदुपयोग है। कटु, कर्वश एंव निन्दापरक वचन बाण की तरह होते हैं, जो सुनने वाले के हृदय में घाव कर देते हैं ।</p>
<p><span style="color: #ff0000">6.जीवन की उन्नति के लिये संयम जरूरी-उत्तम संयम धर्म : </span><br />
मन, वचन और शरीर को काबू में रखना।प्राणी-रक्षण और इन्द्रिय दमन करना संयम है। स्पर्शन, रसना, घ्राण, नेत्र, कर्ण और मन पर नियंत्रण (दमन, कन्ट्रोल) करना इन्द्रिय-संयम है। पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम है। संयम भोजन पान में भक्ष्य के विवेक पर भी जोर देता है। वह जीवन का अनुशासन है। उसका पालन करते हुए ही जीवन को सुखी, निरापद और शानदार बनाया जा सकता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">7. मन की शुद्धि सिखाता है &#8211; उत्तम तप धर्म:</span><br />
मलिन वृत्तियों को दूर करने के लिए जो बल चाहिए, उसके लिए तपस्या करना।तप का मतलब सिर्फ उपवास, भोजन नहीं करना सिर्फ इतना ही नहीं है बल्कि तप का असली मतलब है कि इन सब क्रिया के साथ अपनी इच्छाओं और ख्वाहिशों को वश में रखना।<br />
तप का प्रयोजन है मन की शुद्धि! मन की शुद्धि के बिना काया को तपाना या क्षीण करना व्यर्थ है। तप से ही आध्यात्म की यात्रा का ओंकार होता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">8. उत्तम कार्यों के लिए करें दान, त्यागें बुरी आदत-उत्तम त्याग धर्म:</span></p>
<p>उत्तम पात्र को ज्ञान, अभय, आहार, औषधि आदि दान देना चाहिए। धन की तीन गतियाँ हैं— दान, भोग और नाश। बुद्धिमत्ता इसी में है कि नष्ट होने से पहले उसे परोपकार में लगा दिया जाये। उत्तम कार्यों में दिया या लगाया हुआ धन ही सार्थक है, अन्यथा तो उसे अनर्थों की जड़ कहा गया है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">9. अहंकार और ममकार से निवृत्ति- उत्तम आकिंचन धर्म : </span><br />
किसी भी चीज में ममता न रखना। अपरिग्रह स्वीकार करना।आत्मा के अपने गुणों के सिवाय जगत में अपनी अन्य कोई भी वस्तु नहीं है इस दृष्टि से आत्मा अकिंचन है। अकिंचन रूप आत्मा-परिणति को आकिंचन करते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000">10. ब्रह्मचर्य</span></p>
<p>सद्गुणों का अभ्यास करना और अपने को पवित्र रखना। ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ है अन्तर्यात्रा अर्थात् अपनी ज्ञानरूप आत्मा में लीन होना। व्यवहार में मन की वासना या विकारों को जीतने का नाम ब्रह्मचर्य है।</p>
<p>संक्षेप में सार यही है धर्म के दस लक्षण । धर्म तो एक और अखण्ड है, ये दस तो उस तक पहुँचने के रास्ते हैं। कहीं से भी शुरू कीजिए, आप अपनी मंजिल पा जायेगें । इस दशांग धर्म के आचरण से ही आत्मा निर्मल—निर्विकार होता है । व्यवहारिक जीवन की सफलता भी इन्हींके अनुपालन पर निर्भर है। जिसके आचरण में ये उतर जाते हैं वह सुख और आनन्द के वातावरण में विचरण करने लगता है।<br />
जैन धर्म में सबसे उत्तम पर्व है पर्युषण। यह सभी पर्वों का राजा है। इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है, जिसमें तप कर कर्मों की निर्जरा कर अपनी काया को निर्मल बनाया जा सकता है। इन पर्व के दिनों में साधक अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ-सफाई करते हैं।<br />
यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है। इस दौरान व्यक्ति की संपूर्ण शक्तियां जग जाती हैं। पर्युषण का अर्थ है – ‘ परि ‘ यानी चारों ओर से , ‘ उषण ‘ यानी धर्म की आराधना। वर्ष भर के सांसारिक क्रिया – कलापों के कारण उसमें जो दोष चिपक गया है , उसे दूर करने का प्रयास इस दौरान किया जाता है। शरीर के पोषण में तो हम पूरा वर्ष व्यतीत कर देते हैं। पर पर्व के इन दिनों में आत्म के पोषण के लिए व्रत, नियम, त्याग, संयम को अपनाया जाता है।</p>
<p>सांसारिक मोह-माया से दूर मंदिरों में भगवान की पूजा-आर्चना, अभिषेक, आरती, जाप एवं गुरूओं के समागम में अधिक से अधिक समय को व्&#x200d;यतीत किया जाता है एवं अपनी इंद्रियों को वश में कर विजय प्राप्&#x200d;त करने का प्रयास करते हैं।<br />
सभी के द्वारा मन-वचन-काय से अहिंसक धर्म का पूर्ण रूप से पालन करने का प्रयत्&#x200d;न करते हुए किसी भी प्रकार के अनावश्&#x200d;यक कार्य को करने से परहेज किया जाता है।<br />
शास्&#x200d;त्रों की विवेचना की जाती है व जप के माध्&#x200d;यम से कर्मों को काटने का प्रयत्&#x200d;न करते हैं। व्रत व उपवास करके आत्&#x200d;मकेंद्रित होने का प्रयास व विषय-कसायों से दूर रहा जाता है।<br />
संयम और आत्मशुद्धि के इस पवित्र महापर्व पर श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक व्रत-उपवास रखते हैं। मंदिरों को भव्यतापूर्वक सजाते हैं तथा अभिषेक-शांतिधारा, विशेष पूजन, विधान कर विशाल शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं। इस दौरान जैन व्रती कठिन नियमों का पालन भी करते हैं ,जैसे बाहर का खाना पूर्णत: वर्जित होता है, दिन में केवल एक समय ही भोजन करना आदि। बड़ी संख्या में साधक दस दिन तक निर्जला उपवास भी रखते हैं।<br />
मानवीय एकता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, मैत्री, शोषणविहीन सामाजिकता, अंतरराष्ट्रीय नैतिक मूल्यों की स्थापना, अहिंसक जीवन आत्मा की उपासना शैली का समर्थन आदि तत्त्व पर्युषण महापर्व के मुख्य आधार हैं।<br />
आज की दौड़-भाग भरी जिंदगी में जहां इंसान को चार पल की फुर्सत अपने घर-परिवार के लिए नहीं है, वहां खुद के निकट पहुंचने के लिए तो पल-दो पल भी मिलना मुश्किल है। इस मुश्किल को आसान और मुमकिन बनाने के लिए जब यह पर्व आता है, तब समूचा वातावरण ही तपोमय हो जाता है।<br />
संक्षेप में पर्यूषण महापर्व (दसलक्षण धर्म) का तात्पर्य है पुरानी दिनचर्या का बदलना, खान-पान और विचारों में परिवर्तन आकर मन सद्भावनाओं से भर जाना। विकृति का विनाश और विशुद्धि का विकास करना ही इस पर्व का ध्येय है।<br />
जैन धर्मावलंबी भाद्रपद मास में भाद्रपद शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी तक पर्यूषण पर्व मनाते हैं। श्वेताम्बर जैन संप्रदाय के पर्यूषण 8 दिन चलते हैं। उसके बाद दिगंबर जैन संप्रदाय वाले 10 दिन तक पर्यूषण मनाते हैं। दिगंबर परंपरा में इसकी ‘दशलक्षण पर्व’ के रूप में पहचान है। उनमें इसका प्रारंभिक दिन भाद्र व शुक्ला पंचमी और संपन्नता का दिन चतुर्दशी है। यह सभी पर्वों का राजा है। इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है।</p>
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		<title>जैन साधु चलते- फिरते भगवान : ऐसे होते हैं दिगम्बर जैन साधु-संत-डॉ. अरविंद जैन </title>
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		<pubDate>Fri, 21 Jul 2023 13:00:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन साधु के प्रति सारा विश्व नतमस्तक क्यों होता है? जैन साधु की कुछ विशेषताओं पर महावीर सर्वोदय मासिक पत्रिका के संपादक एवं अखिल भारतीय जैन संपादक संघ के अध्यक्ष श्री अरविंद जी जैन प्रकाश डाल रहे हैं। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230; जयपुर। आज जैन मुनि की निर्मम हत्या से जैन समाज ही नहीं, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन साधु के प्रति सारा विश्व नतमस्तक क्यों होता है? जैन साधु की कुछ विशेषताओं पर महावीर सर्वोदय मासिक पत्रिका के संपादक एवं अखिल भारतीय जैन संपादक संघ के अध्यक्ष श्री अरविंद जी जैन प्रकाश डाल रहे हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> आज जैन मुनि की निर्मम हत्या से जैन समाज ही नहीं, पूरा देश- विदेश स्तब्ध, निशब्द एवं शोक मग्न है। महा अहिंसक की इस प्रकार से महा हिंसक तरीके से हत्या होना असाधारण घटना है। जैन साधु के प्रति सारा विश्व नतमस्तक क्यों होता है? आइये इस प्रसंग में जैन साधु की कुछ विशेषताओं पर महावीर सर्वोदय मासिक पत्रिका के संपादक एवं अखिल भारतीय जैन संपादक संघ के अध्यक्ष श्री अरविंद जी जैन प्रकाश डाल रहे हैं-</p>
<p>नग्नत्व- जैन साधु तन पर एक धागा मात्र भी नहीं रखते, बालकवत् निर्विकार हो सदा नग्न रहते हैं। सर्दी, गर्मी एवं बरसात में भी कपडा धारण नहीं करते हैं, ये त्याग की पराकाष्ठा है।</p>
<p>अहिंसा पिच्छी- अहिंसा की पालना हेतु एक अहिंसा मोर पंख पिच्छी रखते हैं ताकि बैठने, सोने आदि कार्यों में जीव जन्तुओं से बचाने के लिए पिच्छी से जगह को प्रासुक किया जा सके। आशीर्वाद या सर्दी- गर्मी से बचने के प्रयोग नहीं करते हैं।<br />
शुद्धि कमण्डलु -जैन साधु एक कमण्डलु रखते हैं जिसका पानी मल- मूत्र शुद्धि के समय काम में आता है। वे इस पानी को पीने के कार्य में नहीं लेते हैं।</p>
<p>पद विहारी- जैन साधु सदा पैदल चलते हैं वो भी विना जूते चप्पल के, चाहे कितनी ही सर्दी या गर्मी हो।<br />
नितय विहारी &#8211; जैन साधु नियत विहारी होते हैं। एक स्थान पर ज्यादा दिन नहीं रुकते हैं। चौमासा या विशेष अनुष्ठान हो तो उसको छोड़कर।<br />
आहार चर्या &#8211; दिन में एक बार, एक स्थान पर खडे होकर आहार -पानी लेते हैं। 24 घंटे में एक बार दिन में ही आहार, पानी लेते हैं, वो भी नियम मिलने पर। अगर अन्तराय आ जाए तो उस दिन का आहार त्याग होता है।</p>
<p>कर पात्री- जैन साधु खडे़ होकर हाथों में ही आहार, पानी लेते हैं, बैठकर या बर्तन आदि में नहीं लेते हैं। आर्यिका माताजी बैठकर हाथों में एवं उनसे छोटे पद धारी कटोरे में लेते हैं।<br />
हाथ से केशलोच- सभी जैन साधु और माताजी हाथों से ही बाल निकालते हैं। ब्लेड , मशीन या उस्तरे से नहीं कटवाते हैं। अधिकतम तीन माह में एक बार केशलोच करते ही हैं ताकि बालों में जीव आदि पैदा ना हों।</p>
<p>आजीवन अस्नान- जैन साधु का शरीर से निर्ममत्व होता है, ना वे उसका किसी प्रकार से श्रृंगार करते हैं, ना स्नान ही करते हैं।<br />
अल्पनिद्रा &#8211; अल्पभोजी और निस्पृह होने के कारण रात्रि में अल्प समय ही नींद लेते हैं। सदा प्रमाद रहित होते हैं।<br />
आजीवन अदन्त धोवन- जैन साधु आहार लेने के बाद दांतों को उसी समय अच्छी तरह से साफ कर लेते हैं क्योंकि वे कभी भी दन्तमंजन नहीं करते। फिर भी संयम के प्रभाव कभी बदबू नहीं आती है।</p>
<p>भू शयन- भूमि पर या लकड़ी के पाटे पर शयन करते हैं, गद्दे, रजाई, तकिया आदि साधनों का प्रयोग नहीं करते हैं।<br />
उपसर्ग परिषह जय- प्राकृतिक, मानवीय या जानवरों द्वारा किसी प्रकार उपसर्ग आ जावे तो वे समता भाव से सहन करते हैं। ना वे उसका प्रतिरोध करते हैं, ना स्वयं निवारण करते है। मरण प्रंसग बन जाए तो समाधि धारण कर लेते हैं। यह साधु की उत्कृष्ट परीक्षा का समय होता है। इसके अलावा वे स्वयं 22 प्रकार परिषहों की सहन कर आत्मा को मजवूत बनाने के लिए परिषह तप करते हैं।</p>
<p>दैनिक षडावश्यक- जैन मुनि के दैनिक छह आवश्यक कार्य होते हैं जिसे समय पर नियम पूर्वक करते हैं &#8211; सामायिक, स्तुति, देव वंदना, स्वाधाय, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग।<br />
पंचेंन्द्रिय विजय- स्पर्शन आदि पांचों इन्द्रियों के विषयों में आसक्त नहीं होते हैं।</p>
<p>पंच समिति- 1. चार हाथ भूमि देखकर चलना, 2.हित मित प्रिय वचन (केवल मोक्षमार्ग संबंधी), 3. 46 दोषों से रहित विना याचना से अनुद्दिष्ट आहार ग्रहण करना। आहार तप बढ़ाने के लिए होता है, शरीर पोषण हेतु नहीं। 4. किसी वस्तु को उठाने या रखने में पूर्ण सावधानी से पिच्छी से मार्जन करते हैं ताकि सूक्ष्म जीवों की हिंसा ना हो। छाया- धूप में आते जाते समय में शरीर को भी मार्जन करते हैं ताकि शरीराश्रित सर्दी &#8211; गर्मी के जीवों का प्रतिकूल वातावरण में घात ना हो, 5. मल-मूत्र के स्थान को भी देख भालकर जीव दया पालते हैं।</p>
<p>पंच महाव्रत- जैन साधु के पंच महाव्रत मुख्य होते हैं, शेष कार्य इन्हीं की सिद्धि के लिए होते हैं। 1.अहिंसा &#8211; सभी प्रकार के त्रस- स्थावर जीवों की हिंसा का त्याग। 2. सत्य- सभी प्रकार के असत्य वचन बोलने का त्याग। 3. अचौर्य- बिना दिये किसी वस्तु को नहीं ले चाहे पानी, मिट्टी ही क्यों ना हो। 4. ब्रह्मचर्य- द्रव्य एवं भाव सभी प्रकार से कुशील सेवन का त्याग। 5.अपरिग्रह* &#8211; 24 प्रकार के सभी परिग्रहों का त्याग होता है। पिच्छी, कमण्डलु एवं एक शास्त्र ये तीन वस्तु ही अपने पास रख सकते हैं। किसी भी प्रकार के आरंभ एवं परिग्रह रखने, उपार्जन करने, संग्रहण करने का ना आदेश देते हैं, ना उपदेश देते हैं। वे ना तो राजनैतिक पद लेते है, ना सामाजिक पद या जिम्मेदारी। सब प्रकार के आरंभ एवं परिग्रह में अनुमति एवं अनुमोदना के त्यागी होते हैं।</p>
<p>इस प्रकार 28 मूलगुणों एवं अनेक दश धर्म, बारह भावना, परिषह जय, उपसर्ग विजय, विशिष्ट तप आदि उत्तर गुणों को धारण करने वाले दिगम्बर जैन मुनि/ साधु होते हैं। तप के प्रभाव से अनेक ऋद्धि एवं सिद्धियां उन्हें प्रकट हो जाती हैं लेकिन वे उन्हें ना तो स्वीकारते हैं, ना उनका उपयोग करते हैं। जन कल्याण या धर्म रक्षा हेतु कदाचित प्रयोग करना पड़े तो वे उसका योग्य प्रायश्चित लेते हैं। वे सदा अपने ज्ञान, ध्यान एवं तप वृद्धि में लगे रहते हैं। उन्हें परोपकार की मुख्यता नहीं होती, आत्म कल्याण ही उनके लिए मुख्य होता है। वर्तमान में विशेष संहनन ना होने के कारण वे पूर्णत: वनवासी एवं उग्र तपों को नहीं कर पाते हैं लेकिन अपने 28 मूलगुणों को दोषरहित पालन करते हैं। कहीं दोष लगते हैं तो तत्काल आचार्य से योग्य प्रायश्चित मांगते हैं।</p>
<p>ऐसे जैन साधु चलते- फिरते भगवान हैं। जिनको णमोकार मंत्र में नमस्कार किया गया है। साधुओं से ही धर्म चलता है। बिना साधु बने मोक्ष नहीं मिलता है। साधु किसी भी धर्म का हो उसकी रक्षा का दायित्व समाज के साथ सरकार का भी है। सरकार/ प्रशासन को ऐसा सबक एवं संदेश देना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसा जघन्य अपराध करने की कोई भी सोचे ना।`</p>
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		<title>सर सेठ हुकमचंदजी के जन्मदिवस 14 जुलाई पर विशेष : यश-कीर्ति और गौरव के शिखर पुरुष रहे हैं सर सेठ हुकम चंद </title>
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		<pubDate>Fri, 14 Jul 2023 09:19:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[14 जुलाई, 1874 को इंदौर में जन्मे और 26 फरवरी, 1959 को स्वर्गवासी हुए सर सेठ हुकम चंद जी अपने समय में मालवा के वैभव संपन्न धन कुबेर और जैन जैनेत्तर समाज के शिखर पुरुषों में अग्रणी होने के साथ-साथ अनाभिषिक्त सम्राट के रूप में चर्चित थे। सर सेठ हुकम चंद जी समूचे मालवा और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>14 जुलाई, 1874 को इंदौर में जन्मे और 26 फरवरी, 1959 को स्वर्गवासी हुए सर सेठ हुकम चंद जी अपने समय में मालवा के वैभव संपन्न धन कुबेर और जैन जैनेत्तर समाज के शिखर पुरुषों में अग्रणी होने के साथ-साथ अनाभिषिक्त सम्राट के रूप में चर्चित थे। सर सेठ हुकम चंद जी समूचे मालवा और इंदौर के ऐसे नर श्रेष्ठ थे, जिनका संपूर्ण व्यक्तित्व उनके आत्म गौरव से भरा हुआ है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए डॉक्टर जैनेंद्र जैन का विशेष आलेख</span></strong></p>
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<p>अपने जीवन काल में ही किवदंती बने और यश- कीर्ति और गौरव के उच्चतम शिखरों पर सुशोभित हुए सर सेठ हुकम चंद जी समूचे मालवा और इंदौर के ऐसे नर श्रेष्ठ थे, जिनका संपूर्ण व्यक्तित्व उनके आत्म गौरव से भरा हुआ एक ऐसा उज्ज्वल ध्रुवतारा है जिसके आलोक की रश्मियां आज भी हमारी चेतना में जीवंतता और शक्ति भर रही हैं एवं बरसों गुजर जाने के बाद भी इन आलोक रश्मियों की चमक धुंधली नहीं हुई है। 14 जुलाई, 1874 को इंदौर में जन्मे और 26 फरवरी, 1959 को स्वर्गवासी हुए सर सेठ हुकम चंद जी अपने समय में मालवा के वैभव संपन्न धन कुबेर और जैन जैनेत्तर समाज के शिखर पुरुषों में अग्रणी होने के साथ-साथ अनाभिषिक्त सम्राट के रूप में चर्चित थे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-48534" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0013.jpg" alt="" width="1363" height="1020" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0013.jpg 1363w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0013-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0013-1024x766.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0013-768x575.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0013-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0013-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0013-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0013-990x741.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0013-1320x988.jpg 1320w" sizes="auto, (max-width: 1363px) 100vw, 1363px" /></p>
<p><strong>देश-विदेश में पाया सम्मान</strong></p>
<p>उन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से न केवल देश में अपितु विदेशों में भी ख्याति और सम्मान पाया। लंदन के स्टॉक बाजार में आज भी उनकी तस्वीर प्रदर्शित है जो विदेशों में उन्हें प्राप्त सम्मान का प्रमाण और इंदौर सहित भारत के लिए गौरव की बात है। इंदौर के औद्योगिक विकास और उसे वर्तमान स्वरूप प्रदान करने में जिन महापुरुषों का सर्वाधिक योगदान रहा है, उनमें एक सर सेठ हुकमचंदजी भी थे।</p>
<p><strong>चाहते थे स्वदेशी का विकास</strong></p>
<p>सेठ जी स्वभावत: वणिक थे और अत्यंत धनी -मानी परिवार से आते थे। गोरांग शाही के उस युग में वे उन गिने-चुने उद्योगपतियों में से थे, जिन्होंने पराधीन भारत में स्वदेशी उद्योग धंधों का स्वप्न संजोया था। उनका सोच था कि स्वदेशी का विकास हो और देश का धन देश में ही रहे। अपने इसी सोच के चलते उन्होंने मध्य प्रदेश के सबसे बड़े नगर इंदौर में कप‌ड़ा मिलों और अन्य उद्योगों की स्थापना कर नगर का नाम देश के नक्शे में आत्म गौरव के साथ प्रतिष्ठित किया जिससे न केवल श्रम को प्रतिष्ठा मिली बल्कि हजारों हाथों को काम भी मिला और देश के साधनों, श्रम, शक्ति और धन के दोहन पर भी रोक लगी</p>
<p><strong>किया इंदौर का विकास</strong></p>
<p>इंदौर शहर आज यदि राज्य के उद्योग ,व्यापार और वित्तीय तथा आर्थिक ,धार्मिक एवं सामाजिक क्रिया कलापों के केंद्र बिंदु के रूप में स्थापित है तो उसकी पृष्ठभूमि में दानवीर सर सेठ हुकमचंदजी का पुरुषार्थ और उनके अवदान को नकारा नहीं जा सकता। अपने नगर के प्रति जितनी चेतना सर सेठ हुकमचंदजी मे थीं वैसी चेतना उनके समकालीन अन्य किसी भी व्यक्तित्व में विरल ही हो, यह अनुमान उनके व्यक्तित्व की विशेषताओं और कृतित्व की किंवदंतियों (किस्से-कहानी) को सुनकर समझ कर एवं सन 1951 में उनके सम्मान में प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ के अवलोकन, स्वाध्याय से सहज ही लगाया जा सकता</p>
<p>है। अपने व्यक्तित्व के आलोक में उन्होंने अपना उद्योग व्यापार देश- देशांतर तक फैलाया और उसे विपुल गति प्रदान की, उन्होंने चीन, ब्रिटेन और अमेरिका में भी व्यापार किया एवं कोलकाता में भी हुकमचंद आयरन एंड स्टील कंपनी, जूट मिल और दि हुकमचंद इंश्योरेंस कंपनी की भी स्थापना की थी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-48532" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0015.jpg" alt="" width="1204" height="1482" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0015.jpg 1204w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0015-244x300.jpg 244w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0015-832x1024.jpg 832w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0015-768x945.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/07/IMG-20230714-WA0015-990x1219.jpg 990w" sizes="auto, (max-width: 1204px) 100vw, 1204px" /></p>
<p>जनसेवा उनका लक्ष्य था और ईमानदारी जीवन की दीक्षा इन सब के ऊपर उनके व्यक्तित्व की &#8220;बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय&#8221; की छवि ने उन्हें लोक सेवा की प्रतिष्ठा प्रदान की। राजा महाराजों की तरह शान -शौकत से जीवन जीने वाले एवं स्वर्ण सज्जित कार का उपयोग करने वाले गौरव पुरुष सर सेठ हुकमचंदजी को समाज और शासन ने अनंत अलंकरणों से भी विभूषित किया जिनमें सर नाइट, दानवीर, राय बहाद्दुर , राज्य भूषण, रावराजा, जैन सम्राट, मर्चेंट किंग एवं कॉटन किंग ऑफ इंडिया अलंकरण प्रमुख हैं।</p>
<p><strong>दान देने में रहते थे आगे</strong></p>
<p>जरूरतमंदों और नगर एवं समाजहित में दान देने में सर सेठ हुकमचंदजी कभी पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपने उद्योग और व्यापार से जो भी धनार्जन किया उसका बहुत बड़ा हिस्सा (लगभग अस्सी लाख रुपए) उस जमाने में उन्होंने सर्वजन हिताय -सर्वजन सुखाय की पुनीत भावना से जन कल्याण के लिए समर्पित भी किया। प्रथम महायुद्ध के समय उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक करोड़ दस हजार रुपए की सहायता प्रदान की थी। उनके समर्पण और उदारता का ही प्रतिफल है &#8220;सर सेठ सरूपचंद हुकम चंद जैन परमार्थिक ट्रस्ट&#8221;, जिसके माध्यम से नगर में अनेकों लोकोपयोगी गतिविधियां आज भी चल रही हैं।</p>
<p>सेठ साहब ने इंदौर में कई जैन मंदिर, धर्मशाला एवं भवनों का निर्माण कराया जो इंदौर की वास्तु परिदृश्यता को भव्यता प्रदान करते हैं इनमें विश्व विख्यात कांच मंदिर जो विदेशों से आयात किए गए रंग-बिरंगे कांच से निर्मित दुनिया में अपनी तरह का अनोखा जैन मंदिर है। इसके अलावा शीश महल, (जिसका विक्रय हो चुका है)ंग महल, इंद्र भवन (सेठ साहब का निवास), जंवरी बाग नसिया( जहां धर्मशाला, मंदिर एवं होस्टल) आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा आपने देश में स्थित कई जैन तीर्थों पर भी जैन मंदिर एवं धर्मशालाओं का निर्माण भी कराया। सेठ हुकमचंदजी ने अपने जीवन में राष्ट्र, धर्म, समाज, संस्कृति और इंदौर नगर की विभिन्न रूपों में सेवा के साथ नगर के विकास में जो योगदान दिया है उसे यह राष्ट्र समाज एवं इंदौर नगर कभी विस्मृत नहीं कर पाएगा ‌। वे लोक धर्म के पुरोधा के रूप में इतिहास में सदैव अविस्मरणीय रहेंगे।</p>
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		<title>बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ सही संस्कार देना जरूरी : अपने बच्चों को संवेदनशील बनाइए </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 03 Jun 2023 08:49:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Article श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[आपके हर छोटे-बड़े काम के लिए दौड़े आने वाले बच्चे, उन करियर सजग बच्चों से कहीं अधिक तवज्जो और सम्मान के हकदार हैं। अपने बच्चों को &#8220;संवेदनशील&#8221; बनाइए। वे &#8220;धन कमाने की मशीन&#8221; नहीं हैं। सही सोच ही सही जीवन है। पढ़िए इसी पर राजेश जैन दद्दू का यह विशेष आलेख&#8230; इंदौर। कुछ माता-पिता अपने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आपके हर छोटे-बड़े काम के लिए दौड़े आने वाले बच्चे, उन करियर सजग बच्चों से कहीं अधिक तवज्जो और सम्मान के हकदार हैं। अपने बच्चों को &#8220;संवेदनशील&#8221; बनाइए। वे &#8220;धन कमाने की मशीन&#8221; नहीं हैं। सही सोच ही सही जीवन है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए इसी पर राजेश जैन दद्दू का यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> कुछ माता-पिता अपने बच्चों को किसी की भी मंगनी, विवाह, लगन, शवयात्रा, उठावना, तेरहवीं (पगड़ी) जैसे अवसरों पर नहीं भेजते, इसलिए कि उनकी पढ़ाई में बाधा न हो। उनके बच्चे किसी रिश्तेदार के यहां आते-जाते नहीं, न ही किसी का घर आना-जाना पसंद करते हैं। वे हर उस काम से उन्हें से बचाते हैं, जहां उनका समय नष्ट होता हो। उनके माता-पिता उनके करियर और व्यक्तित्व निर्माण को लेकर बहुत सजग रहते हैं। वे बच्चे सख्त पाबंदी मे जीते हैं। दिन भर पढ़ाई करते हैं। महंगी कोचिंग जाते हैं, अनहेल्दी फूड नहीं खाते, नींद तोड़कर सुबह जल्दी साइकिलिंग या स्विमिंग को जाते हैं, महंगी कारें, गैजेट्स और क्लोदिंग सीख जाते हैं, क्योंकि देर-सवेर उन्हें अमीरों की लाइफ स्टाइल जीना है।</p>
<p><strong>करियर के पीछे न भागें</strong></p>
<p>फिर वे बच्चे औसत प्रतिभा के हों कि होशियार, उनका अच्छा करियर बन ही जाता है, क्योंकि स्कूल से निकलते ही उन्हें बड़े शहरों के महंगे कॉलेजों में भेज दिया जाता है, जहां जैसे-तैसे उनकी पढ़ाई भी हो जाती है और प्लेसमेंट भी। अब वह बच्चे बड़े शहरों में रहते हैं और छोटे शहरों को हिकारत से देखते हैं। मजदूरों, रिक्शा वालों, खोमचे वालों की गंध से बचते हैं। ये बच्चे छोटे शहरों के गली-कूचे, धूल, गंध देखकर नाक-भौंह सिकोड़ते हैं। रिश्तेदारों की आवाजाही उन्हें बेकार की दखल लगती है। फिर वे विदेश चले जाते हैं और अपने देश को भी हिकारत से देखते हैं। वे बहुत खुदगर्ज और संकीर्ण जीवन जीने लगते हैं। अब माता-पिता की तीमारदारी और खोज खबर लेना भी उन्हें बोझ लगने लगता है। पुराना मकान, पुराना सामान, पैतृक संपत्ति को बचाए रखना उन्हें मूर्खता लगने लगती है। वे पैतृक संपत्ति को जल्दी ही उसे बेचकर &#8220;राइट इन्वेस्टमेंट&#8221; करना चाहते हैं। माता-पिता से &#8220;वीडियो चैट&#8221; में उनकी बातचीत का मसला अक्सर यही रहता है।</p>
<p><strong>संवेदनशील बच्चे</strong></p>
<p>इधर दूसरी तरफ कुछ ऐसे बच्चे होते हैं जो सबके सुख-दुख में जाते हैं। जो किराने की दुकान पर भी जाते हैं, बुआ, चाचा, दादा-दादी को अस्पताल भी ले जाते हैं। तीज-त्योहार, श्राद्ध, बरसी के सब कार्यक्रमों में हाथ बंटाते हैं, क्योंकि उनके माता-पिता ने उन्हें यह मैनर्स सिखाया है कि सब के सुख-दुख में शामिल होना चाहिए और किसी की तीमारदारी, सेवा और रोजमर्रा के कामों से जी नहीं चुराना चाहिए। इन बच्चों के माता-पिता, उन बच्चों के माता-पिता की तरह समझदार नहीं होते.. क्योंकि वे इन बच्चों का &#8220;कीमती समय&#8221; अनावश्यक कामों में नष्ट करवा देते हैं।</p>
<p><strong>परिवार सबसे बड़ा करियर</strong></p>
<p>फिर ये बच्चे छोटे शहर में ही रहे जाते हैं और जिंदगी भर निभाते हैं, सब रिश्ते, कुटुम्ब के दायित्व, कर्तव्य। ये बच्चे, उन बच्चों की तरह &#8220;बड़ा करियर&#8221; नहीं बना पाते, इसलिए उन्हें असफल और कम होशियार मान लिया जाता है। समय गुजरता जाता है, फिर कभी कभार, वे &#8216;सफल बच्चे&#8217; अपनी बड़ी गाड़ियों या फ्लाइट से छोटे शहर आते हैं, दिन भर एसी में रहते हैं, पुराने घर और गृहस्थी में सौ दोष देखते हैं। फिर रात को, इन बाइक, स्कूटर से शहर की धूल-धूप में घूमने वाले &#8216;असफल बच्चों&#8217; को ज्ञान देते हैं कि&#8230;. तुमने अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली।</p>
<p><strong>मां-बाप का रखते हैं ध्यान</strong></p>
<p>असफल बच्चे लज्जित और हीनभाव से सब सुन लेते हैं। फिर वे &#8216;सफल बच्चे&#8217; वापस जाते समय इन असफल बच्चों को, पुराने मकान में रह रहे उनके मां-बाप, नानी, दादा-दादी का ध्यान रखने की हिदायतें देकर, वापस बड़े शहरों या विदेशों को लौट जाते हैं। फिर उन बड़े शहरों में रहने वाले बच्चों की, इन छोटे शहर में रह रहे मां, पिता, नानी के घर कोई सीपेज या रिपेयरिंग का काम होता है तो यही &#8216;असफल बच्चे&#8217; बुलाए जाते हैं। सफल बच्चों के उन वृद्ध मां-बाप के हर छोटे बड़े काम के लिए यह &#8216;असफल बच्चे&#8217; दौड़े चले आते हैं। कभी पेंशन, कभी किराना, कभी घर की मरम्मत, कभी पूजा..।</p>
<p><strong>सामाजिक मेल-मिलाप जरूरी</strong></p>
<p>जब वे &#8216;सफल बच्चे&#8217; मेट्रोज के किसी एयरकंडीशंड जिम में ट्रेडमिल कर रहे होते हैं, तब छोटे शहर के यह &#8216;असफल बच्चे&#8217; उनके बूढ़े पिता का चश्मे का फ्रेम बनवाने, किसी दुकान के काउंटर पर खड़े होते हैं और तो और इनके माता-पिता के मरने पर अग्नि देकर तेरहवीं तक सारे क्रियाकर्म भी करते हैं। सफल यह भी हो सकते थे&#8230;.! इनकी प्रतिभा और परिश्रम में कोई कमी न थी&#8230;.! मगर&#8230; इन बच्चों और उनके माता-पिता में शायद &#8216;जीवन दृष्टि अधिक&#8217; थी&#8221;!</p>
<p>कि उन्होंने धन-दौलत से अधिक, &#8220;मानवीय संबंधों और सामाजिक मेल-मिलाप को आवश्यक&#8221; माना। सफल बच्चों से किसी को कोई अड़चन नहीं है</p>
<p>मगर बड़े शहरों में रहने वाले, वे &#8216;सफल बच्चे&#8217; अगर &#8216;सोना&#8217; हैं, तो छोटे शहरों-गांवों में रहने वाले यह &#8216;असफल बच्चे&#8217; किसी &#8216;हीरे&#8217; से कम नहीं। आपके हर छोटे-बड़े काम के लिए दौड़े आने वाले , उन करियर सजग बच्चों से कहीं अधिक तवज्जो और सम्मान के हकदार हैं। अपने बच्चों को &#8220;संवेदनशील&#8221; बनाइए। वे &#8220;धन कमाने की मशीन&#8221; नहीं हैं। सही सोच ही सही जीवन है।</p>
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		<title>महावीर जन्मकल्याणक पर विशेष : विश्व को आवश्यकता भगवान् महावीर स्वामी की </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 03 Apr 2023 07:08:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
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		<category><![CDATA[jain dharm]]></category>
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		<category><![CDATA[मुनि विशुद्धसागर महाराज]]></category>
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					<description><![CDATA[सम्प्रति काल में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्चर्य की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भगवान् महावीर स्वामी के काल में थी। पूर्व में धर्म के नाम से हिंसा होती थी। वर्तमान में धर्म के साथ राज्यों, राष्ट्रों के नाम पर मानव जाति अपनी कषाय पोषण में हिंसा कर्म में लीन है। पढ़िए मुनि श्री विशुद्धसागर महाराज [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>सम्प्रति काल में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्चर्य की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भगवान् महावीर स्वामी के काल में थी। पूर्व में धर्म के नाम से हिंसा होती थी। वर्तमान में धर्म के साथ राज्यों, राष्ट्रों के नाम पर मानव जाति अपनी कषाय पोषण में हिंसा कर्म में लीन है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मुनि श्री विशुद्धसागर महाराज का यह विशेष आलेख</span></strong></p>
<hr />
<p>विश्व विकास पर विचार करना चाहिए है। विश्व में विकास होगा तो सम्पूर्ण राष्ट्रों का विकास होगा। सभी राष्ट्रों का विकास, सभी राज्यों का विकास, सभी राज्यों के विकास में सभी संभाग, जनपद, नगरों, ग्रामों का विकास उसी विकास में निहित है। सम्पूर्ण नगर, ग्रामवासियों का विकास न कि मात्र नेता, अधिकारी व धनपतियों का मात्र / सर्व विकासों से तात्पर्य धन-धरती, भोजन-पानी मकान ही ग्रहण नहीं करना, इन सब बिन्दुओं के साथ-साथ सदाचार न्याय नीति एवं परस्पर वात्सल्य का भी विकास / एकांगी विकास विश्व का विनाश है। सर्वमुखी विकास होना चाहिए है, मानव जाति मात्र का ही नहीं, सभी जीवों का विकास हो। अन्याय, अनीति, छल, कपट, व्यभिचार, अभक्ष्य भक्षण, सुरापान, वैश्यावृत्ति, जुआ, चोरी, परस्त्री सेवन, मांस, मद्य, मधु, शिकार, व्यर्थ भाषण व संक्लेश परिणामों का त्याग होना चाहिए। इन सबका सभी के मन में विनाश होना अनिवार्य है।</p>
<p><strong>धर्म पुरुषार्थ जरूरी</strong></p>
<p>एक श्रेष्ठ जीवन जीने के लिए, महामानव बनने के लिए धर्म पुरुषार्थ का आलम्बन लेना अनिवार्य है। बिना धर्म पुरुषार्थ के मात्र अर्थ, काम में लिप्त है, उसे मोक्ष पुरुषार्थ की सदा अनुपलब्धि ही रहेगी। अर्थ, काम कामना की पूर्ति के लिए सामग्री संग्रह के हेतु बन सकते हैं, यदि लाभान्तराय का क्षयोपशम रहा तो। लाभान्तराय कर्म का क्षयोपशम प्रशस्त नहीं है और साता का उदय नहीं है तो व्यक्ति इच्छाएं ही कर पाएगा, इच्छित सामग्री तथा इच्छित भोग नहीं भोग पाएगा, यह सिद्धांत अटल है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सत्यार्थ बोधपूर्वक वस्तु के वस्तुत्व को समझना चाहिए।</p>
<p><strong>करो मैत्री का व्यवहार</strong></p>
<p>प्रतिदिन विश्व के प्रत्येक नागरिक को विश्व विकास, मैत्री भाव, प्रमुदित परिणाम व मध्यस्थता का व्यवहार करना चाहिए। राग द्वेष की ज्वाला में न स्वयं जले, न विश्व को जलाएँ । अस्त्र-शस्त्र की दुनिया में परिणामों पर नियंत्रण करें। राष्ट्र के राष्ट्रपतियों के मन मचलने पर धर्म-संस्कृतियां, धर्म स्थान, मानव जाति ही नही सम्पूर्ण जातियाँ नष्ट हो जाएंगी। धैर्य का आलम्बन लेकर कषाय भाव को शान्त करें। स्वजातियों को ही क्यों नाश करने का विचार कर रहें ? भगवान् महावीर स्वामी के सिद्धांतों की आवश्यकता है, श्रीराम के विवेक की आवश्यकता है, न की रावण की कामुकता की, कौरवों के लोभ की। सम्प्रति काल में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्चर्य की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भगवान् महावीर स्वामी के काल में थी। पूर्व में धर्म के नाम से हिंसा होती थी। वर्तमान में धर्म के साथ राज्यों, राष्ट्रों के नाम पर मानव जाति अपनी कषाय पोषण में हिंसा कर्म में लीन है। परस्पर वात्सलय भाव को वही मान करना चाहिए, प्राणी मात्र के उपकारों पर विचार करना चाहिए।</p>
<p><strong>प्रत्येक वस्तु कर रही उपकार</strong></p>
<p>मानव के लिए धरती पर प्रत्येक वस्तु उपकार कर रही है। पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक तथा त्रस जीव- गाय, बैल, भैंस, हाथी, घोड़े, बन्दर, भालू, पक्षीगण, मयूर आदि सभी प्राणीगण मनुष्यों का उपकार कर रहे हैं। मानव को भी अपना धर्म कर्तव्य का त्याग न कर, कर्तव्य का ध्यान रखना चाहिए। मानव, मानव रहे, दानव न बने। रूस-यूक्रेन के साथ विश्व में शान्ति स्थापित हो, अणुबमों का प्रयोग न कर, सृष्टी पर सभी जियो और जीने दो का पाठ पढे़ं। चारित्र के साथ अणुव्रतों का पालन करें। यही सम्यक् विचार विश्व में भगवान् महावीर स्वामी की जन्म जयन्ती पर उद्घोषित हो।</p>
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