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	<title>Anekantvad &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Anekantvad &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मुनिश्री विबोधसागर ने कहा जैन दर्शन में त्रिरत्न ही सर्वाेपरि : बड़े जैन मंदिर में मधुर प्रवचन से हो रही धर्म प्रभावना  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 19 Aug 2025 15:20:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में जैन संतों के आध्यात्मिक मंगल वर्षायोग में प्रतिदिन चल रही मधुर प्रवचनों की श्रृंखला में आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने मंगलवार को अपने भक्तों से कहा कि कहा कि जैन धर्म त्रिरत्नों पर आधारित है। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में जैन संतों के आध्यात्मिक मंगल वर्षायोग में प्रतिदिन चल रही मधुर प्रवचनों की श्रृंखला में आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने मंगलवार को अपने भक्तों से कहा कि कहा कि जैन धर्म त्रिरत्नों पर आधारित है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में जैन संतों के आध्यात्मिक मंगल वर्षायोग में प्रतिदिन चल रही मधुर प्रवचनों की श्रृंखला में आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने मंगलवार को अपने भक्तों से कहा कि कहा कि जैन धर्म त्रिरत्नों पर आधारित है। इन तीन रत्नों के बिना जैन धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र, यानि कि सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचरण। जैन धर्म में ये तीनों मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग में आवश्यक माने जाते हैं। सम्यक दर्शन का अर्थ है, सच्चे सिद्धांतों में विश्वास रखना, सच्चे देव, शास्त्र और गुरुओं में श्रद्धा रखना। यह जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों में विश्वास है। सम्यक ज्ञान का अर्थ है, सही ज्ञान प्राप्त करना, जो वस्तुओं और परिस्थितियों को उनके यथार्थ रूप में समझता है। यह ज्ञान जैन धर्म के सिद्धांतों और दर्शन को समझने से प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>जैन दर्शन अनेकांतवाद और कर्म फल के सिद्धांतों पर केंद्रित </strong></p>
<p>सम्यक चारित्र का अर्थ है, सही आचरण करना, जो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य जैसे व्रतों का पालन करके प्राप्त होता है। यह जैन धर्म के नैतिक नियमों का पालन है। इन तीनों रत्नों का पालन करके, हम अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं और मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं। जैन दर्शन एक प्राचीन भारतीय दर्शन है, जो अहिंसा, अनेकांतवाद और कर्म-फल के सिद्धांतों पर केंद्रित है। इसका मुख्य लक्ष्य आत्मा को जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति दिलाना है। जैन धर्म में, ‘आत्मा’ (जीव) को शाश्वत माना जाता है और उसका पुनर्जन्म होता है। कर्म (क्रिया) का आत्मा पर प्रभाव पड़ता है और अच्छे कर्मों से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। जैन धर्म कर्म सिद्धांत पर आधारित है। आप जैसे कर्म करोगे, उसी के अनुसार सुख-दुःख का अनुभव करोगे। जैन धर्म में ईश्वर को ब्रह्मांड का निर्माता या शासक नहीं माना जाता, बल्कि एक ऐसी आत्मा माना जाता है जिसने अपने सभी कर्मों को नष्ट कर दिया है और पूर्ण ज्ञान और आनंद प्राप्त कर लिया है।</p>
<p><strong>आस्थावान सदा ही अपनी गति में रहता है</strong></p>
<p>आस्था का मतलब है किसी व्यक्ति, वस्तु, या विचार में दृढ़ विश्वास रखना, चाहे उसके लिए कोई ठोस प्रमाण हो या न हो। यह एक गहरा विश्वास है जो किसी के जीवन, व्यवहार और दृष्टिकोण को प्रभावित करता है। आस्था मे गति है, जीवन में जितनी भी हमारी क्रिया-प्रक्रिया है वे सब हमारी आस्था पर टिकी हुई हैं। जहां हमारी आस्था होती है वहां कितनी भी परेशानियां हों, कितने भी संकट हो, परंतु आस्थावान व्यक्ति उन संकटों से डरता नहीं है। आस्थावान सदा ही अपनी गति में रहता है और आस्था जिस पर है, उसको देखकर संपूर्ण मार्ग के संकट को वह भूल जाता है। आस्था में सुख मिलता है, अनास्था में दुःख की प्राप्ति होती है आस्था में ही अपनापन मिलता है। प्राणी मात्र के प्रति अपने आपको आस्थावान बना लो तो आपका कल्याण मार्ग प्रशस्त हो सकता है।</p>
<p><strong>किसी भी कथन को निश्चित दृष्टिकोण से ही सत्य माना जा सकता है  </strong></p>
<p>जैन दर्शन में आस्था अथवा श्रद्धा का अर्थ ‘सम्यक दर्शन’ यानि कि सही दृष्टिकोण से है। सम्यक दर्शन में दृढ़ विश्वास रखना। यह विश्वास, ‘सम्यक ज्ञान’ (सही ज्ञान) और ‘सम्यक चरित्र’ (सही आचरण) के साथ मिलकर, मोक्ष (जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति) की ओर ले जाता है। जैन धर्म में आस्था के कुछ मुख्य पहलू हैं। अहिंसा-किसी भी प्राणी मात्र को नुकसान या कष्ट न पहुंचाना, यह जैन धर्म का मूल आधार है। सत्य-झूठ न बोलना और सत्य के मार्ग पर चलना। अस्तेय- चोरी न करना। अपरिग्रह-भौतिक संपत्ति और इच्छाओं के प्रति आसक्ति न रखना। ब्रह्मचर्य-इंद्रिय सुखों से दूर रहना। अनेकांतवाद-यह मानना कि सत्य एक ही नहीं है, बल्कि कई दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है। स्यादवाद-यह मानना कि हमारा ज्ञान सीमित है और किसी भी कथन को एक निश्चित दृष्टिकोण से ही सत्य माना जा सकता है।</p>
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		<title>डॉ. प्रगति जैन करेंगी लंदन में जैन दर्शन का प्रतिनिधित्व: अनेकांतवाद और स्याद्वाद से संवरेगा कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य </title>
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		<pubDate>Wed, 14 May 2025 07:22:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[डॉ. प्रगति जैन इंदौर, आगामी 6-7 जून को लंदन मेट्रोपोलिटन यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी। वे भगवान महावीर के अनेकांतमयी दर्शन का भी प्रतिनिधित्व करेंगी। इंदौर से पढ़िए, राजेंद्र जैन महावीर की यह खबर&#8230; इंदौर। ख्याति प्राप्त शिक्षाविद्, गणितज्ञ, प्रेरणादायिनी वक्ता और लेखिका डॉ. प्रगति जैन इंदौर, आगामी 6-7 जून को लंदन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>डॉ. प्रगति जैन इंदौर, आगामी 6-7 जून को लंदन मेट्रोपोलिटन यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी। वे भगवान महावीर के अनेकांतमयी दर्शन का भी प्रतिनिधित्व करेंगी। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, राजेंद्र जैन महावीर की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> ख्याति प्राप्त शिक्षाविद्, गणितज्ञ, प्रेरणादायिनी वक्ता और लेखिका डॉ. प्रगति जैन इंदौर, आगामी 6-7 जून को लंदन मेट्रोपोलिटन यूनिवर्सिटी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन &#8220;Frontiers of Intelligent Computing: Theory and Applications&#8221; में भारत का ही नहीं, बल्कि भगवान महावीर के अनेकांतमयी दर्शन का भी प्रतिनिधित्व करेंगी।</p>
<p>वे &#8220;Explainable Artificial Intelligence through Syadvada Logic&#8221; विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत करेंगी, जिसमें स्याद्वाद जैसे जैन तर्कशास्त्र के सिद्धांतों के माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) को अधिक मानवीय, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक अभिनव दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। यह शोध Springer Publication जैसे विश्वविख्यात प्रकाशन में प्रकाशित किया जाएगा। डॉ. जैन का यह शोध भारतीय ज्ञान परंपरा, विशेषकर जैन दर्शन की वैज्ञानिकता और तर्कसंगत सोच को वैश्विक मंच पर सामने लाने का एक सशक्त प्रयास है। उनका प्रस्तावित मॉडल यह दर्शाता है कि भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित अनेकांतवाद और स्याद्वाद आज के जटिल तकनीकी प्रश्नों का भी संतुलित और विवेकपूर्ण समाधान दे सकते हैं। डॉ. प्रगति जैन की उपलब्धियाँ समाज के लिए गर्व का विषय हैं। वे मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित प्राध्यापक हैं, और अब तक 50 से अधिक शोधपत्र, 9 पुस्तकें, तथा 3 पेटेंट उनके नाम दर्ज हैं। उनकी पुस्तक &#8216;The Power of Pause: From Reaction to Response&#8217; अमेज़न की बेस्टसेलर रही है। उनके निर्देशन में अब तक तीन शोधार्थी पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कुआलालंपुर, मलेशिया में भारत का प्रतिनिधित्व किया और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों से अनेक सम्मान प्राप्त किए। उनकी ओजस्वी वाणी, लेखनी और चिंतन ने शिक्षा, समाज और साधना—तीनों क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य किया है। वह जैन पत्रकार महासंघ की राष्ट्रीय मंत्री भी हैं । अपने शोध के उद्देश्य पर डॉ. जैन कहती हैं:-</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&#8220;जैन दर्शन केवल मोक्षमार्ग नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण जीवन और विज्ञान के लिए भी मार्गदर्शक है। स्याद्वाद हमें सिखाता है कि हर पक्ष में कुछ सत्य होता है, और यही दृष्टिकोण जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता में आएगा, तो तकनीक अधिक करुणामयी और संतुलित बन सकेगी।” डा.प्रगति जैन ,दिगंबर जैन समाज की पहली महिला है जिन्होंने कंप्यूटर तकनीक व ए आई को जैन दर्शन व स्यादवाद से जोड़ा है। जैन समाज के लिए हर्ष और प्रसन्नता का विषय है कि डा.प्रगति जैन ने वैश्विक स्तर पर यह प्रतिष्ठा प्राप्त की हैं। अनेक संस्थाओं व प्रबुद्धजनों ने उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई दी। डा.प्रगति जैन वर्तमान में श्री कनकेश्वरी देवी शासकीय महाविद्यालय इंदौर में प्राध्यापक गणित के पद पर अपनी उल्लेखनीय सेवाएं प्रदान कर रही हैं।</p>
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		<title>लोकनायक 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक: तिथि के अनुसार चैत्र शुक्ल तेरस के दिन आता है जन्म कल्याण, इस बार यह 10 अप्रैल को  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Apr 2025 13:47:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याण इस बार 10 अप्रैल को देश ही नहीं समूचे विश्व में धूमधाम से मनाया जाएगा। 2623 वर्ष पूर्व क्रांति की मशाल थामे भगवान महावीर का जन्म वैशाली गणराज्य के कुंड गांव में पिता सिद्धार्थ के यहां चैत्र शुक्ल तेरस के दिन माता त्रिशला के गर्भ से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन धर्म के24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याण इस बार 10 अप्रैल को देश ही नहीं समूचे विश्व में धूमधाम से मनाया जाएगा। 2623 वर्ष पूर्व क्रांति की मशाल थामे भगवान महावीर का जन्म वैशाली गणराज्य के कुंड गांव में पिता सिद्धार्थ के यहां चैत्र शुक्ल तेरस के दिन माता त्रिशला के गर्भ से हुआ था। भगवान महावीर जी के जन्म कल्याणक को लेकर देशभर में धार्मिक उल्लास का माहौल है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज उपसंपादक प्रीतम लखवाल के संकलन और संयोजन में पढ़िए यह खास पेशकश&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय और ब्रह्मचर्य का शंखनाद करने वाले लोकनायक जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याण इस बार 10 अप्रैल को देश ही नहीं समूचे विश्व में धूमधाम से मनाया जाएगा। 2623 वर्ष पूर्व क्रांति की मशाल थामे भगवान महावीर का जन्म वैशाली गणराज्य के कुंड गांव में पिता सिद्धार्थ के यहां चैत्र शुक्ल तेरस के दिन माता त्रिशला के गर्भ से हुआ था। भगवान महावीर जी के जन्म कल्याणक को लेकर देशभर में धार्मिक उल्लास का माहौल है। दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष रूप से तैयारियां की जा रही हैं। तीर्थंकर महावीर नामक महाकाव्य में वर्णित है कि लोक नायक या युग पुरुष की प्राप्ति के लिए युग को, समाज को सदियों तक साधना करनी होती है। तब जाकर सूर्य के समान तेजस्वी युग पुरुष क्रांति दूत के रूप में जन्म लेते हैं। अपने समकालीन सामंतशाही, रूढ़िवादिता, धर्मांधता, सामाजिक कुरीतियां, समाजद्रोही तत्वों का डटकर सामना करते हैं। तब देश में दिग्दिगंत में धर्म और शांति का विजय नाद अनुगूंजित हो उठता है। यही तथ्य भगवान महावीर के साथ भी चरितार्थ हुए। भगवान महावीर का समस्त जगत 2624वां जन्म कल्याणक मना रहा है। भगवान महावीर के रूप में ऐसा नक्षत्र उदित हुआ कि युग बीत गए। शताब्दियां व्यतीत हो गईं किन्तु वह नक्षत्र आज भी जाज्वल्य मान है। यहां यह कहना आवश्यक है कि जाति-पाति, भेदभाव के चलते मध्ययुगीन राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था एवं धार्मिक आडंबरों का बहुत योगदान रहा। इस युग में राजागण सांसारिक सुखों को पाने के लिए शरीर को अमर बना रहे थे और देव मंदिर सुरति क्रियारत स्त्री-पुरुषों के चित्रों से सज्जित हो रहे थे। इन्हीं परिस्थितियों में भगवान महावीर ने प्राणि मात्र के कल्याण के लिए अपने प्रयत्नों से उच्चतम विकास कर सकने का आस्थापूर्ण मार्ग प्रशस्त कर अनेकांतवादी जीवन दृष्टि पर आधारित स्याद्वादवादी कथन प्रणाली से बहु धर्मों को प्रत्येक कोण, दृष्टि एवं संभावना से उसके वास्तविक रूप में जान पाने का मार्ग बदलकर सामाजिक जीवन की शांति के लिए अपरिग्रह और अहिंसा का संदेश दिया था। इतिहास प्रसिद्ध तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर का जीवन दर्शन आज भी समूचे विश्व में वंदनीय है और पूजनीय है।</p>
<p><strong>भगवान महावीर ने दुनिया को सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाया </strong></p>
<p>भगवान महावीर जैन धर्म के चौंबीसवें तीर्थंकर थे। भगवान महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व वैशाली गणराज्य के क्षत्रिय कुंड में क्षत्रिय परिवार हुआ था। 30 वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्म कल्याण के पथ पर निकल गए। 12 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने समवशरण में ज्ञान प्रसारित किया। 72 वर्ष की आयु में उन्हें पावापुरी से मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस दौरान महावीर स्वामी के कई अनुयायी बने। जिसमें उस समय के प्रमुख राजा बिम्बिसार, कुणिक और चेटक भी शामिल थे। जैन समाज द्वारा महावीर स्वामी के जन्म दिवस को महावीर-जयंती तथा उनके मोक्ष दिवस को दीपावली के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। कार्तिक शुक्ल एकम को निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता हैं। जैन ग्रंथों के अनुसार समय-समय पर धर्म तीर्थ के प्रवर्तन के लिए तीर्थंकरों का जन्म होता है। जो सभी जीवों को आत्मिक सुख प्राप्ति का उपाय बताते हैं। तीर्थंकरों की संख्या चौबीस ही कही गई है। भगवान महावीर वर्तमान अवसर्पिणी काल की चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर थे और हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेदभाव जिस युग में बढ़ गया। उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया।</p>
<p><strong>भगवान महावीर के पंचशील सिद्धांत </strong></p>
<p>तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया। उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए। जो हैं अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) ,ब्रह्मचर्य। उन्होंने अनेकांतवाद, स्याद्वादवाद और अपरिग्रह जैसे अद्भुत महाव्रती सिद्धांत दिए। महावीर के सर्वाेदयी तीर्थों में क्षेत्र, काल, समय या जाति की सीमाएं नहीं थीं। भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। दुनिया की सभी आत्मा एक-सी हैं। इसलिए हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें, जो हमें स्वयं को पसंद हो। यही महावीर का ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत है।</p>
<p><strong>भगवान महावीर का जन्म</strong></p>
<p>भगवन महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली गणतंत्र के कुंडग्राम में इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहां चैत्र शुक्ल तेरस को हुआ था। ग्रंथों के अनुसार उनके जन्म के बाद राज्य में उन्नति होने से उनका नाम वर्द्धमान रखा गया था। जैन ग्रंथों के अनुसार 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी के निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के 250 वर्ष बाद भगवान महावीर का जन्म हुआ था।</p>
<p><strong>भगवान महावीर का विवाह</strong></p>
<p>भगवान महावीर का विवाह यशोदा नामक सुकन्या के साथ हुआ था और कालांतर में प्रियदर्शिनी नाम की कन्या उत्पन्न हुई। जिसके युवा होने पर राजकुमार जमाली के साथ विवाह हुआ।</p>
<p><strong>भगवान महावीर का साधना काल</strong></p>
<p>भगवान महावीर का साधना काल 12 वर्ष का था। दीक्षा लेने के बाद भगवान महावीर ने जिनकल्पी श्रमण की कठिन चर्या को अंगीकार किया। श्वेतांबर संप्रदाय जिसमें साधु श्वेत वस्त्र धारण करते हैं के अनुसार भी महावीर दीक्षा के बाद कुछ समय छोड़कर निर्वस्त्र रहे और उन्होंने केवल ज्ञान की प्राप्ति भी। जिन कल्पी अवस्था में ही की। अपने पूरे साधना काल के दौरान महावीर ने कठिन तपस्या की और मौन रहे। इन वर्षों में उन पर कई उपसर्ग भी हुए। जिनका उल्लेख कई प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है।</p>
<p><strong>केवल ज्ञान और उपदेश</strong></p>
<p>जैन ग्रन्थों के अनुसार केवल ज्ञान प्राप्ति के बाद, भगवान महावीर ने उपदेश दिया। उनके 11 गणधर (मुख्य शिष्य) थे। जिनमें प्रथम इंद्रभूति थे।</p>
<p><strong>भगवान महावीर ने बताए पांच व्रत</strong></p>
<p>सत्य:- सत्य के बारे में भगवान महावीर स्वामी कहते हैं, हे पुरुष! तू सत्य को ही सच्चा तत्व समझ। जो बुद्धिमान सत्य की ही आज्ञा में रहता है वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।</p>
<p>अहिंसा:- इस लोक में जितने भी त्रस जीव (एक, दो, तीन, चार और पांच इंद्रियों वाले जीव) हैं। उनकी हिंसा मत कर। उनको उनके पथ पर जाने से न रोको। उनके प्रति अपने मन में दया का भाव रखो। उनकी रक्षा करो। यही अहिंसा का संदेश भगवान महावीर अपने उपदेशों से हमें देते हैं।</p>
<p>अचौर्य &#8211; दूसरे की वस्तु बिना उसके दिए हुए ग्रहण करना जैन ग्रंथों में चोरी कहा गया है।</p>
<p>अपरिग्रह:- आवश्यक चीजों का उपयोग ही किया जाए।</p>
<p>ब्रह्मचर्य:- महावीर स्वामी ब्रह्मचर्य के बारे में अपने बहुत ही अमूल्य उपदेश देते हैं कि ब्रह्मचर्य उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, संयम और विनय की जड़ है। तपस्या में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है। जैन मुनि, जैन साध्वी इन्हें पूर्ण रूप से पालन करते हैं, इसलिए उनके महाव्रत होते हैं और श्रावक, श्राविका इनका एक देश पालन करते हैं। इसलिए उनके अणुव्रत कहे जाते हैं।</p>
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		<title>तीर्थंकर महावीर के विचार आज भी हैं प्रासंगिक: श्रमण डॉ. पुष्पेंद्र ने बताया महावीर ने भारत के विचारों को उदारता दी </title>
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		<pubDate>Wed, 09 Apr 2025 09:34:36 +0000</pubDate>
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<p><strong>24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक पर उनके आदर्शों को याद किया जा रहा है। वास्तव में भगवान महावीर के संदेश, उपदेश और उनकी देशनाएं आज भी मानव मात्र का मार्ग प्रशस्त कर रही है। <span style="color: #ff0000">इन्हीं के बारे में पढ़िए इस खबर में&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> श्रमण डॉ. पुष्पेंद्र ने जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक (जयंती) के अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाए दी। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने जो शिक्षाएं और संदेश दिया वह आज भी प्रासंगिक हैं। अहिंसा, अपरिग्रह, करुणा और क्षमा के विचार जनमानस की जीवन पद्धति बन गए हैं। महावीर स्वामी ने मानवता को शांति, प्रेम, सौहार्द और बंधुत्व की भावना के साथ जीवन जीने का मार्ग बताया। संपूर्ण विश्व एक है और सभी प्राणी एक ही परिवार के सदस्य हैं। एक का सुख सबका सुख है। एक की पीड़ा सभी की पीड़ा है, उनका यह संदेश आज भी पूरी दुनिया के लिए आदर्श है। उन्होंने आगे कहा कि आज पूरे विश्व में अशांति फैली हुई है। अनिश्चितता का दौर है। भय का माहौल है। एक दूसरे के प्रति अविश्वास की भावना है। अहिंसा, अपरिग्रह, जियो और जीने दो आदि सभी महत्वपूर्ण तीर्थंकर महावीर के सिद्धांत अनेकांतवाद की नींव पर ही टिके हैं। अनेकांतवाद का अर्थ है कि किसी भी एक पक्ष को सही मानकर नहीं चलना वरन सभी के मतों को, सभी के पक्षों को समाहित करते हुए तथ्यों तक पहुंचना। आज सभी समस्याओं की यही जड़ है कि सभी केवल अपनी बात को ही सही मानते हैं, दूसरों के सापेक्ष से उसे नहीं समझते यही दुःख का कारण है, अशांति का कारण है।</p>
<p><strong>प्रयोग वीरों की आवश्यकता </strong></p>
<p>महावीर ने भारत के विचारों को उदारता दी, आचार को पवित्रता दी जिसने इंसान का गौरव बढ़ाया। उसके आदर्श को परमात्मा पद की बुलंदी तक पहुंचाया, जिसने सभी को धर्म और स्वतंत्रता का अधिकारी बनाया और जिसने भारत के आध्यात्मिक संदेश को अन्य देशों तक पहुंचाने की शक्ति दी। यही कारण है कि आज विश्व में तीर्थंकर महावीर के सिद्धांतों की ओर लोगों का ध्यान गया है। जहां अनेकांतवाद के सिद्धांतों का पालन नहीं हो रहा है वहां आतंकवाद की जड़ें मजबूत हो रही हैं। भगवान महावीर ने कहा था कि मूल बात दृष्टि की होती है। हम किस दृष्टि से अपने आसपास समाज में हो रही व्यवस्थाओं व घटनाओं को देखते हैं। उन्होंने बताया कि हम भीतर से अपने को देखें एवं उसकी सापेक्षता में इस जगत को समझें। आज महावीर के सिद्धांतों को आगे बढ़ाने के लिए महावीरों की आवश्यकता है, प्रयोग वीरों की आवश्यकता है।</p>
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