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	<title>Alekh &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>गुरु पूर्णिमा पर जानें गुरु की महिमा के बारे में : मानव जगत के लिए उपकारी हैं सच्चे गुरु </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 03 Jul 2023 07:30:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बिना गुरु के आत्मोन्‍नति भी सम्भव नहीं है। गुरु का स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है। यदि हमारे जीवन में गुरु नहीं हैं तो हमारा जीवन भी शुरू नहीं हो सकता। गुरु पूर्णिया के अवसर पर पढ़िए उदयभान जैन का विशेष आलेख जैन धर्म अनादिनिधन धर्म है। जैन धर्म का मुख्य उद्देश्य सच्चे [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बिना गुरु के आत्मोन्&#x200d;नति भी सम्भव नहीं है। गुरु का स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है। यदि हमारे जीवन में गुरु नहीं हैं तो हमारा जीवन भी शुरू नहीं हो सकता।<span style="color: #ff0000;"> गुरु पूर्णिया के अवसर पर पढ़िए उदयभान जैन का विशेष आलेख</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म अनादिनिधन धर्म है। जैन धर्म का मुख्य उद्देश्य सच्चे देव-शास्त्र-गुरु के प्रति अकाट्य श्रद्वा। हम दिन प्रतिदिन देखते हैं कि मानव जीवन में जैन कुल सच्चे देव-शास्त्र व गुरु के प्रति निष्ठा। जैन सिद्वान्त गुणवादी है व्यक्&#x200d;तिवादी नहीं। सच्चे देव को हम जानते हैं कि हमारे आराध्य देव भगवन्त वीतरागी, हमारे तीर्थंकर सिद्धपरमेष्ठी, अरिहन्त परमेष्ठी आदि। सच्चे शास्त्र यानि आगम वाणी, तीर्थंकरों केवलियों व अरिहन्तों की वाणी जो आज हमें शास्त्रों, जिनवाणी के रूप मेें प्राप्त हैं, ऐसे शास्त्र हमारे सच्चे शास्त्र है, दिन प्रतिदिन उनका स्मरण करते हैं, पूजते हैं। अब सच्चे गुरु यानि वीतरागी सच्चे निर्ग्रंथ गुरु के बारे में हम जानना चाहते हैं। मानव जीवन के लिए कैसे उपकारी हैं सच्चे गुरु।<br />
हम यहां यह भी स्पष्ट करना उचित समझते हैं कि बिना गुरु के आत्मोन्&#x200d;नति भी सम्भव नहीं है। वन्दे गुरूणां, गुण लब्धये। जिस गुरु में सच्चे गुण हैं, वैसा ही बनने के लिए मैं नमस्कार करता हूं।</p>
<p><strong>मोक्ष मार्ग पर करते हैं अग्रसर</strong></p>
<p>गुरु हमारे पूज्य है। गुरुओं ने ही आज मानव जगत के लिए इतने उपकार किये हैं जिनका ॠण हम चुका नहीं सकते हैं। गुरुओं ने ही हमको हमारे देव व शास्त्रों के बारे में बताया, गुरुओं ने ही हमको संस्कारों के साथ मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर किया। यदि हमारे जीवन में गुरु नहीं हैं तो हमारा जीवन भी शुरू नहीं हो सकता। सच्चे गुरु के बारे में जानना अति आवश्यक है। गुरु सभी बन्धनों से मुक्&#x200d;त होता है। गुरु वह है जो जीवन से विकार की अज्ञानता को दूर करता है और आनन्दमय जीवन कैसे जिया जाता है यह सिखाता है। गुरु वे होते हैं जो वीतरागी व शान्ता हों। जिन्हें गर्मी, सर्दीए, डांस, मच्छर, कुत्ते, सिंह आदि क्रूर से क्रूर जन्तुओं का, भूख-प्यास आदि का अन्य किसी भी प्रकार का भय नहींं हो, जिन्हें किसी भी प्रकार का शोक, खेद, चिन्ता न हो, जिन्हें लज्जा व ग्लानि का भाव नहीं आते हों, जिन्हें अपने तप का और ज्ञान का अथवा प्रतिष्ठा का अभिमान नहीं हो। मैं इतना बडा ज्ञानी हूं, तपस्वी हूं, लोगों को मेरी विनय करना चाहिए। ऐसे भाव जिन्हें न आते हों, अपनी प्रतिष्ठा, प्रसिद्वि, शिष्य मंडली की वृृद्धि के लिए मायाचारी के भाव नहीं आते हों। इस प्रकार चारों कषायों का परास्त कर दिया हो वीतरागी सच्चे गुरुहैं।</p>
<p><strong>कषायों और इंद्रियों के विजेता</strong></p>
<p>कुल मिलाकर यह है कि वीतरागी, सच्चे गुरु वे हैं जो शान्ति के प्रतीक हैं, कषायों व पांचों इन्द्रियों के विजेता हों, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह इन पांंचों महाव्रतों से सुशोभित हों। ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण व प्रतिष्ठापन (उत्सर्ग) इन पांंच समिति रूपी कवच को धारण करने वाले हों। कायोत्सर्ग ये छह आवश्यक जिनके रक्षक हों, अन्तरंग जीवन हों, केशलोंचन, अदन्तधोवन, स्नान रहित हों, एक बार 24 घन्टे में भोजन खडे-खडे कर (हाथ में) भोजन तथा भू शयन इन सात बाह्य गुणों के धारक हों। 28 मूल गुणों सहित जो उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य-संयम, तप, त्याग, आंकिन्च्य व बह्मचर्य आदि 10 धर्मों का धारण करने वाले हों।</p>
<p><strong>पतित-पावती गंगा हैं गुरु</strong></p>
<p>ऐसे वीर- विजेता तथा स्वतन्त्र वैभवशाली ही सच्चे गुरु हैं। इन्हीं गुणों से युक्त गुरु सच्चे गुरु हैं, जिनमें शान्त-प्रशान्त आत्मा ही सद्गुरु है, गुरु पतित-पावती गंगा हैं। जैसे गंगा एक-दूसरे प्रदेश में बहती है, सब कुछ देती है, कोई भी लेखा-जोखा नहीं रखती है उसी प्रकार संत भी अपने जीवन यात्रा में बह रहा है। किसी को अहिंसा, किसी को दया, किसी को प्रेम-स्नेह एवं परोपकारी अमृृत पिला रहे हैंं। गुरु के उपकारों व महिमा का कोई छोर नहीं है। यह सही है कि मानव जीवन के लिए गुरु परम उपकारी हैं। आज भी इस देश में सच्चे गुरुओं की कमी नहीं है। उनमें से मैं उनका नाम लेना और नमन करना चाहूंगा- परम पूज्य शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, देश की सर्वोच्च साध्वी आर्यिका शिरोमणि गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी, आचार्य श्री वर्धमान सागरजी महाराज, आचार्य श्री वसुनन्दी जी महाराज, गणाचार्य श्री कुन्थु सागरजी महाराज, आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज, आचार्य श्री विशद सागरजी महाराज, आचार्य श्री पुष्पदन्त सागर जी महाराज, आचार्य श्री प्रसन्&#x200d;नसागर जी महाराज, आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज, आचार्य श्री पुलकसागर जी महाराज, आचार्य श्री सौरभ सागर जी महाराज, आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी महाराज, आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी महाराज, आचार्य श्री देवनन्दी जी महाराज, मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज, मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज, मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज, मुनि श्री अमित सागर जी महाराज, मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज, आर्यिका श्री सृष्टि भूषण जी माताजी, आर्यिका श्री स्वाति भूषण माताजी, आर्यिका श्री पूर्णमती माताजी, आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी आदि देश के सभी गुरुओं और आर्यिकाओं को शत-शत नमन करता हूं।</p>
<p><strong>गुरु का स्थान देवताओं से ऊपर</strong></p>
<p>गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मैं कहना चाहता हूं कि भारतीय संस्कृति में गुरुओं का स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है। संत कबीर जी का दोहे जग प्रसिद्ध है-.<br />
गुरु गोविन्द दोनों खडे़, काके लागू पाय।<br />
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताये।<br />
ईश्&#x200d;वर की महिमा भी गुरु के माध्यम से जानी जाती है। गुरु भक्&#x200d;ति तीव्र और निश्छल भावों से करनी चाहिए। गुरु भक्&#x200d;ति के रूप में गुरुओं की वाणी, वचनों को घर-घर पहुंचाकर उनके बताये निर्देश व शिक्षा की पालना, जितने लोग करेंगे हमारी गुरु के प्रति सच्ची भक्&#x200d;ति होगी।<br />
बन्धुओं हम सबको, यानि सभी संस्थाओं को भी गुरुओं के आहार-विहार में जितना बन सके, उससे अधिक करना चाहिये। गुरु की वैयावृत्&#x200d;ति सच्चे मन से करनी चाहिए।<br />
सच्चे गुरू की सच्ची भक्&#x200d;ती करेंगे तो हमारे कर्मों का क्षय होगाए हम गलत रास्ते पर नहीं जाकरए सहीए सच्चे रास्ते पर व मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होंगे।<br />
अब गुरूओं का चातुर्मास प्रारम्भ हो रहा है आप और हम सभी गुरू शरण में जाकर अच्छे संस्कार ग्रहण करें और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हों। बुराइयों को त्यागें। पुनः एक बार परमपूज्य चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री शान्तिसागरजी महाराजए परमपूज्य आचार्य श्री आदि सागर महाराज अंकलीकरए परम पूज्य आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज छाणी परम्परा के सभी आचार्योंए उपाध्यायोंए मुनियों व आर्यिकाओं को विनयमान सेए सच्चे मन से नमन करता हूँ।</p>
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		<title>भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक : मैत्री भाव बनाकर सहयोग की भावना जागृत करें </title>
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		<pubDate>Wed, 29 Mar 2023 10:22:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मैत्री भाव के साथ आपस में मिल जुलकर महावीर भगवान द्वारा दी गई वाणी को साकार कर विश्वबंधुत्व की कड़ी को मजबूत बनायें। पढ़िए महावीर जयंती पर सुमति प्रकाश जैन (प्राचार्य) का यह विशेष आलेख&#8230; नैनागिरि। चौबीसवें तीर्थकर एवं वर्तमान शासन नायक की जयंती वर्तमान नायक श्री 1008 महावीर स्वामी की जन्म जयंती हर्षोल्लास के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मैत्री भाव के साथ आपस में मिल जुलकर महावीर भगवान द्वारा दी गई वाणी को साकार कर विश्वबंधुत्व की कड़ी को मजबूत बनायें। पढ़िए महावीर जयंती पर सुमति प्रकाश जैन (प्राचार्य) का यह विशेष आलेख&#8230;</strong></p>
<hr />
<p><strong>नैनागिरि।</strong> चौबीसवें तीर्थकर एवं वर्तमान शासन नायक की जयंती वर्तमान नायक श्री 1008 महावीर स्वामी की जन्म जयंती हर्षोल्लास के साथ मनायेंगे। महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के कुंडलपुर में माता त्रिशला एवं पिता राजा सिद्धार्थ के यहां हुआ था। भगवान का जन्म होते ही सर्प-नेवला-गाय- सिंह जैसे वन्य प्राणी आपस में क्रीड़ा करने लगे थे तथा नारकीय जीव भी कुछ क्षण के लिए सुख की अनुभूति करने लगे थे। भगवान महावीर स्वामी की अलग-अलग विशेषताओं के कारण उन्हें वीर, अतिवीर, सन्मति, वर्धमान नामों से जाना जाता है। बाल्यावस्था में मित्रों के साथ खेल रहे थे, उसी समय एक देव ने उन्हें डराने के लिए सर्प का रूप धारण किया, लेकिन बालक महावीर ने निडरता के साथ सर्प को उठाकर फेंक दिया। यह देख सभी आश्चर्यचकित होकर रह गए और इन्हें उसी समय से महावीर नाम से संबोधित किया। तीस वर्ष की अल्प आयु में ही भगवान महावीर को वैराग्य उत्पन्न हुआ और वन की ओर विहार कर गये। इस दौरान जगह-जगह जाकर जीव दया का पाठ पढ़ाकर विश्व में अहिंसा का बिगुल बजाकर सुख और शांति का मार्ग प्रशस्त किया। 70 वर्ष की आयु में महान तप के फलस्वरूप उन्हें केवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा अनन्त सुखी रूपी रत्न प्राप्त किया। ऐसे महापुरुष की जन्म जयंती मनाना तभी सार्थक है, जब हम हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह को छोड़कर पंच महाव्रत तथा जीव दया जैसे मानवता रूपी गुणों को धारण कर मैत्री भाव के साथ देश को हिंसा मुक्त बनायें। महावीर स्वामी विश्व के सभी जीवों के रक्षार्थ अहिंसा का डंका बजाया था, उसका प्रभाव वैज्ञानिक जगत में दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने अपने सिद्धांत में कहा था कि नभ, थल, जल, अग्नि, वनस्पति सभी में जीवों का वास होता है। वे सभी सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। जिस बात को महावीर स्वामी ने कई वर्षों पूर्व सिद्ध कर दिया था, उसी तथ्य को भारत के महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने पुनः सिद्ध किया कि पेड़-पौधों में भी हमारी तरह प्राणी है, क्योंकि चैतन्य जीव में ही सुख-दुःख का अनुभव होता है, जड़ पदार्थ में नहीं। सभी से निवेदन है कि आज इस महान पर्व पर बैर भाव को त्याग करें। मैत्री भाव के साथ आपस में मिल जुलकर महावीर भगवान द्वारा दी गई वाणी को साकार कर विश्वबंधुत्व की कड़ी को मजबूत बनायें। दो और दो मिलकर चार होते हैं। 4 अप्रैल को यह दिवस हमें जोड़ने की संक्रिया पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। अतः 2622वीं जयंती पर मेरी भावना की एक पंक्ति ध्यान में रखकर मैत्री भाव बनाकर सहयोग की भावना जागृत करें&#8230;</p>
<p>&#8216;मैत्री भाव जगत में मेरा,</p>
<p>सब जीवों से नित्य रहे &#8216;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>प्रस्तुति -राजेश रागी</p>
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