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	<title>Acharyashree Nirbhaysagar Ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>Acharyashree Nirbhaysagar Ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्यश्री निर्भयसागर जी की धर्मसभा में उमड़े श्रद्धालुगण : ऊँकार की महिमा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु   </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 May 2026 10:46:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[स्थानीय कमलानगर स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर के डी-ब्लॉक परिसर में विराजमान आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में प्रातःकालीन धर्मसभा में श्रद्धालुओं की विशाल उपस्थिति रही। आगरा से पढ़िए, शुभम जैन की रिपोर्ट&#8230; आगरा। स्थानीय कमलानगर स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर के डी-ब्लॉक परिसर में विराजमान आचार्य श्री निर्भयसागर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>स्थानीय कमलानगर स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर के डी-ब्लॉक परिसर में विराजमान आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में प्रातःकालीन धर्मसभा में श्रद्धालुओं की विशाल उपस्थिति रही। <span style="color: #ff0000">आगरा से पढ़िए, शुभम जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>आगरा।</strong> स्थानीय कमलानगर स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर के डी-ब्लॉक परिसर में विराजमान आचार्य श्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में प्रातःकालीन धर्मसभा में श्रद्धालुओं की विशाल उपस्थिति रही। धर्मसभा में आचार्य श्री ने “ऊँ” अर्थात औंकार की महिमा का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन करते हुए कहा कि ऊँकार की उत्पत्ति जैन तीर्थंकरों की दिव्य वाणी से हुई है। आचार्य श्री ने कहा कि ऊँ को वैदिक, जैन, ईसाई सहित अनेक दर्शन स्वीकार करते हैं किन्तु, इसकी वास्तविक उत्पत्ति तीर्थंकर पर मात्माओं की वाणी से हुई है। उन्होंने बताया कि ऊँ में अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति निहित है। इसके उच्चारण एवं साधना से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं तथा साधक का आत्म संयम निरंतर बढ़ता जाता है। आचार्यश्री ने दैनिक जीवन की आध्यात्मिक दिनचर्या के बारे में कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रातः उठते ही आत्मा से परमात्मा बनने का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। उन्होंने कर दर्शन की महिमा बताते हुए कहा कि दोनों हाथों को जोड़कर उनमें 24 तीर्थंकरों का स्मरण करते हुए नवकार मंत्र का जाप करना चाहिए। तत्पश्चात ऊँकार का नाद करना चाहिए। ऊँ अक्षर की व्याख्या करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि इसमें तीनों लोक समाहित हैं। अधोलोक का “अ”, ऊर्ध्वलोक का “ऊ” और मध्यलोक का “म”, अर्थात अ $ ऊ $ म = ऊँ। इसी प्रकार पंच परमेष्ठी भी ऊँ में समाहित हैं। अरिहंत का “अ”, अशरीरी सिद्ध का “अ”, आचार्य का “आ”,उपाध्याय का “ऊ” एवं मुनि का “म”, अर्थात अ $ अ $ आ $ ऊ $ म = औंम। इस धर्मसभा का शुभारंभ विमलेश जैन द्वारा मंगलाचरण से हुआ।</p>
<p>पाद प्रक्षालन का सौभाग्य अशोक जैन, राजेश जैन सेठी, प्रदीप जैन पीएनसी एवं अनिल जैन को प्राप्त हुआ। जिनवाणी भेंट जे.सी. जैन, यशपाल जैन एवं दीपचंद जैन द्वारा समर्पित की गई। संचालन समाज के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा सुव्यवस्थित रूप से किया गया। इस अवसर पर आगामी धार्मिक गतिविधियों की जानकारी देते हुए बताया गया कि प्रतिदिन सायं 6.30 से 7 बजे तक जिज्ञासा समाधान एवं रात्रि 7 से 7.30 बजे तक पूजन क्रियाओं पर विशेष कक्षा आयोजित की जाएगी। सकल जैन समाज से प्रतिदिन प्रातः 7.30 बजे मंदिर जी के बाहर खुले परिसर में आयोजित होने वाली धर्मसभा में अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होने का आग्रह किया गया।</p>
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		<title>सिर्फ धन का बंटवारा ही नहीं प्रेम का बंटवारा भी करें : आचार्यश्री निर्भयसागर के प्रवचनों में प्रेम और सद्भाव पर जोर  </title>
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		<pubDate>Tue, 01 Jul 2025 13:16:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यश्री निर्भयसागर जी ने अटामंदिर में धर्मसभा में प्रेम और सद्भाव के अलावा वात्सल्य की परिभाषा को सरल शब्दों में व्यक्त की। इस अवसर पर नगर के समाजजन बड़ी संख्या में मौजूद रहे। ललितपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; ललितपुर। प्रेम वासना के कारण बदनाम हुआ है, वात्सल्य के कारण नहीं। प्रेम वात्सल्य आत्मा का स्वभाव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्यश्री निर्भयसागर जी ने अटामंदिर में धर्मसभा में प्रेम और सद्भाव के अलावा वात्सल्य की परिभाषा को सरल शब्दों में व्यक्त की। इस अवसर पर नगर के समाजजन बड़ी संख्या में मौजूद रहे। <span style="color: #ff0000">ललितपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर।</strong> प्रेम वासना के कारण बदनाम हुआ है, वात्सल्य के कारण नहीं। प्रेम वात्सल्य आत्मा का स्वभाव है, गुण है, संपत्ति है। जहां प्रेम होता है वहां श्रद्धा अनुकंपा, करुणा, दया, शांति, संवेग और प्रसम भाव होता है। ढाई अक्षर प्रेम के हैं, ढाई अक्षर आत्मा के हैं और ढाई अक्षर मोक्ष के हैं, प्रेम के ढाई अक्षर से रिश्ता चलता है। आत्मा के ढाई अक्षर से जीवन चलता है और मोक्ष मार्ग मिलता है। मोक्ष के ढाई अक्षर से सच्चा सुख मिलता है। यह उद्गार आचार्य श्री निर्भयसागर महाराज ने अटा जैनमंदिर में धर्मसभा में व्यक्त किए। आचार्यश्री ने कहा कि प्रेम के बिना मुक्ति नहीं मिलती। जब बच्चा जन्म लेता है, तब उसे मां से प्रेम होता है। थोड़ा बडे़ होने पर उसे अपनी मित्र मंडली से प्रेम होता है फिर उसे अपनी पुस्तकों से प्रेम होता है। उसके बाद धन से प्रेम, उसके बाद पत्नी से, उसके बाद परिवार, उसके बाद समाज से, उसके बाद गुरुओं से और उसके बाद अपनी आत्मा से। आत्मा से प्रेम जागने पर व्यक्ति राग-द्वेष मोह से विरक्त होकर मुक्ति के मार्ग पर बढ़ता है और एक दिन मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। उन्होंने कहा कि धन का वंटवारा तो सभी करते है पर प्रेम का बंटवारा भी करना चाहिए।</p>
<p>जिससे घर, परिवार, समाज और देश के झगड़े मिट जाएं। प्रेम का बंधन अदृश्य होता है लेकिन, बड़ा मजबूत होता है। जिसके हृदय में प्रेम होता है। वह परोपकार, दया, करुणा, प्रसंशा की भावना से ओतप्रोत होता है। प्रवचन से पूर्व पूर्वाचार्यों के चित्र का अनावरण एवं द्वीप प्रज्वलन हुआ। प्रवचन के बाद महरौनी समाज के निवेदन पर आचार्यश्री ने अपने दो शिष्यों के महरौनी में चातुर्मास करने की घोषणा की। जिसे सुनकर सभी महरौनी वासी खुशी से झूम उठे। नगर में आचार्य श्री के सत्संग पदार्पण से जैन समाज में धार्मिक माहौल बना हुआ है। जैन पंचायत के महामंत्री आकाश जैन ने बताया कि 6 जुलाई रविवार को अपराह्न 1 बजे आचार्य संघ की मंगल चातुर्मास कलश स्थापना कार्यक्रम अभिनंदनोदय तीर्थ क्षेत्रपाल मंदिर से होगा।</p>
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