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	<title>acharyashree brahma jindas &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>राजस्थान जैन संत 2 15वीं शताब्दी के समर्थ विद्वान थे आचार्य श्री ब्रह्म जिनदास : राजस्थानी और गुजराती रचनाओं से किया जनजागरण </title>
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		<pubDate>Thu, 27 Feb 2025 00:30:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजस्थान के संत]]></category>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन संत जीवन के हर पहलू में अत्यधिक संयम, तप और साधना को महत्व देते हैं। वे जैन धर्म के उच्चतम आदर्शों का पालन करते हैं और समाज को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका उद्देश्य आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानकर मोक्ष की प्राप्ति करना होता है, जो कि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन संत जीवन के हर पहलू में अत्यधिक संयम, तप और साधना को महत्व देते हैं। वे जैन धर्म के उच्चतम आदर्शों का पालन करते हैं और समाज को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका उद्देश्य आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानकर मोक्ष की प्राप्ति करना होता है, जो कि जैन धर्म का सर्वोच्च लक्ष्य है। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में दूसरी कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का आचार्य श्री ब्रह्म जिनदास जी के बारे में विशेष लेख पढ़िए..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> इंदौर।</strong> राजस्थान की उर्वर भूमि पर जैन संतों का जन्म जन कल्याणार्थ हुआ। उनके लिखे साहित्य और उपदेशों से जैन समाज के लोगों को गहरी प्रेरणा मिली। वे भक्ति के साथ परमार्थ के मार्ग पर आगे बढ़े। आचार्य ब्रह्म जिनदास 15वीं शताब्दी के ऐसे महान और समर्थ विद्वान थे जिनकी वाणी में सरस्वती की विशेष कृपा थी। उनका प्रत्येक वाक्य काव्य रूप में निकलता था। वे आचार्य श्री सकल कीर्ति के शिष्य और छोटे भाई थे, और अपने योग्य गुरु के मार्ग पर चलकर साहित्य सेवा को ही अपने जीवन का उद्देश्य मानते थे। आचार्य ब्रह्म जिनदास का राजस्थानी और संस्कृत दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था, लेकिन उन्हें राजस्थानी भाषा से विशेष लगाव था। उन्होंने 50 से भी अधिक रचनाएँ राजस्थानी भाषा में लिखीं और इस भाषा को साहित्यिक प्रचार का माध्यम बनाया। उन्होंने जनता को इसे पढ़ने, समझने और उसका प्रचार करने के लिए प्रेरित किया। अपनी रचनाओं की प्रतिलिपियाँ करवाकर इन्होंने राजस्थान और गुजरात के संग्रहालयों में सैकड़ों ग्रंथों को विराजमान किया।</p>
<p><strong>जन्म को लेकर असमंजस</strong>:</p>
<p>आचार्य ब्रह्म जिनदास की निश्चित जन्म तिथि के बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनकी रचनाओं के आधार पर यह अभी तक एक शोध का विषय बना हुआ है। वे कब गृहस्थ रहे और कब साधु जीवन को अपनाया, इस बारे में भी अब तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई है। पंडित परमानंद शास्त्री ने इन्हें आचार्य श्री सकल कीर्ति का छोटा भाई माना है। उनके अनुसार, आचार्य ब्रह्म जिनदास का जन्म संवत 1443 के बाद हुआ होगा।</p>
<p>भोग-विलास और धन-संपत्ति उन्हें साधु जीवन को अपनाने से रोक नहीं सकी। उन्होंने भी अपने भाई के मार्ग का अनुसरण किया। आचार्य श्री सकल कीर्ति ने इन्हीं के आग्रह पर संवत 1481 में बड़ली नगर में मूलाचार प्रदीप की रचना की थी।</p>
<p><strong>जनजागरण करने का इनका समय:</strong></p>
<p>आचार्य ब्रह्म जिनदास ने अपनी दो रचनाओं को छोड़कर शेष सभी रचनाओं में समय नहीं दिया है। उनकी दो प्रमुख रचनाएं हैं रामराज्य रास और हरिवंश पुराण*, जिनमें संवत 1508 और 1520 का उल्लेख मिलता है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि आचार्य ब्रह्म जिनदास का समय संवत 1445 से संवत 1525 के बीच रहा होगा।</p>
<p><strong>इनका शिष्य परिवार:</strong></p>
<p>आचार्य ब्रह्म जिनदास की विद्वत्ता से सभी प्रभावित थे। वे स्वयं विद्यार्थियों को पढ़ाते थे और उन्हें संस्कृत एवं हिंदी भाषाओं में पारंगत करते थे। उनकी रचनाओं में, विशेषकर हरिवंश पुराण की प्रशस्ति में, उन्होंने तीन शिष्यों के नामों का उल्लेख किया है—मनोहर, मल्लिदास और गुणदास। ये शिष्य इनसे पढ़ते भी थे और दूसरों को भी पढ़ाते थे। परमहंस रास में एक और शिष्य, नेमिदास का भी उल्लेख मिलता है।</p>
<p><strong>आचार्य श्री की साहित्य सेवा:</strong></p>
<p>आचार्य ब्रह्म जिनदास का अधिकांश समय आत्म-साधना के साथ-साथ साहित्य सृजन में बीतता था। सरस्वती की कृपा से उनका अध्ययन गहरा था और उनके जीवन काल के 80 वर्षों में उन्होंने 60 से अधिक कृतियां मां भारती को भेंट कीं।</p>
<p><strong>इनकी प्रमुख रचनाएं:</strong></p>
<p>आचार्य ब्रह्म जिनदास की काव्य रचनाओं में प्रमुख रूप से जंबू स्वामी चरित्र, हरिवंश पुराण, राम चरित्र, आदिनाथ पुराण, राम-सीता रास, हनुमत रास, नागकुमार रास, परमहंस रास, अजितनाथ रास, आरती छंद, होली रास, धर्म परीक्षा रास, ज्येष्ठ जिनवर रास, श्रेणिक रास, समकित-मिथ्यात रास, सुदर्शन रास आदि शामिल हैं। इन कृतियों में आचार्य ब्रह्म जिनदास ने जैन धर्म के सिद्धांतों और संस्कृति को सरल, सहज और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया। उनकी रचनाएँ न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी अत्यधिक सराहनीय मानी जाती हैं।</p>
<p>आचार्य ब्रह्म जिनदास का प्रमुख कार्यक्षेत्र डूंगरपुर, सागवाड़ा, गलियाकोट, ईडर, सूरत आदि रहा, जहां जनसाधारण की गुजराती और राजस्थानी बोलियाँ प्रचलित थीं। उनकी रचनाओं ने न केवल जैन समाज, बल्कि पूरी जनता को धर्म और संस्कृतियों के प्रति जागरूक किया।</p>
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