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	<title>Acharya Vardhaman Sagar ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>Acharya Vardhaman Sagar ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ जी का गर्भ कल्याणक मनाया: गुरु भक्त, श्रावक-श्राविकाओं ने श्रद्धा-भक्ति और आस्था से आराधना की </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2026 11:21:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नगर में मंगलवार से अष्टाह्निका पर्व की शुरूआत हुई। स्थानीय दिगंबर जैन मंदिर में जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ जी का गर्भ कल्याणक मनाया। इस अवसर पर तृतीय पट्टाचार्य धर्मसागर जी महाराज का 58वां आचार्य पदारोहण भी मनाया गया। धामनोद से पढ़िए, यह दीपक प्रधान की यह रिपोर्ट&#8230; धामनोद। नगर में मंगलवार से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नगर में मंगलवार से अष्टाह्निका पर्व की शुरूआत हुई। स्थानीय दिगंबर जैन मंदिर में जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ जी का गर्भ कल्याणक मनाया। इस अवसर पर तृतीय पट्टाचार्य धर्मसागर जी महाराज का 58वां आचार्य पदारोहण भी मनाया गया। <span style="color: #ff0000">धामनोद से पढ़िए, यह दीपक प्रधान की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धामनोद।</strong> नगर में मंगलवार से अष्टाह्निका पर्व की शुरूआत हुई। स्थानीय दिगंबर जैन मंदिर में जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ जी का गर्भ कल्याणक मनाया। इस अवसर पर तृतीय पट्टाचार्य धर्मसागर जी महाराज का 58वां आचार्य पदारोहण भी मनाया गया। साथ ही उनके शिष्य आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज का 58वां दीक्षा दिवस पर नगर में गुरु भक्त, श्रावक-श्राविकाओं ने श्रद्धा-भक्ति और आस्था से आराधना की। इस अवसर पर सभी समाजजनों ने गुरु चरणों में श्रीफल और अर्घ्य समर्पित कर वंदना की। प्राप्त जानकारी के अनुसार जैन मंदिर में अष्टानिका पर्व की शुरुआत और तीसरे तीर्थंकर भगवान श्रावस्ती वाले श्री संभवनाथ जी का गर्भ कल्याणक भक्तिपूर्ण वातावरण में मनाया गया। मंगलवार को तृतीय’पट्टाचार्य श्री धर्मसागरजी का 58 आचार्य पदारोहण पर भी गुरु पूजन किया गया। आचार्य वर्धमान सागरजी के 58दीक्षा दिवस मंदिर में श्रावक-श्राविकाओं ने गुरु चरणों में श्रीफल अर्पित किए और अर्घ्य चढ़ाए।</p>
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		<title>श्रावकों का जीवन मन, वचन और काय के संयम और रत्नत्रय धर्म से सफल : आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण ने निवाई में प्रवेश कर दोपहर को किया विहार  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 27 Jan 2026 11:36:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य वर्धमान सागर जी जैन समाज के निवेदन पर शीतकालीन प्रवास 32 साधुओं के साथ पार्श्वनाथ नसिया जी संत भवन में कर रहे हैं। जबसे आचार्य श्री पधारे है, प्रति सप्ताह धार्मिक अनुष्ठान होकर धर्म की गंगा बह रही है। निवाई से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर... निवाई। आचार्य वर्धमान सागर जी जैन समाज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य वर्धमान सागर जी जैन समाज के निवेदन पर शीतकालीन प्रवास 32 साधुओं के साथ पार्श्वनाथ नसिया जी संत भवन में कर रहे हैं। जबसे आचार्य श्री पधारे है, प्रति सप्ताह धार्मिक अनुष्ठान होकर धर्म की गंगा बह रही है। <span style="color: #ff0000">निवाई से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर..</span>.</strong></p>
<hr />
<p><strong>निवाई।</strong> आचार्य वर्धमान सागर जी जैन समाज के निवेदन पर शीतकालीन प्रवास 32 साधुओं के साथ पार्श्वनाथ नसिया जी संत भवन में कर रहे हैं। जबसे आचार्य श्री पधारे है, प्रति सप्ताह धार्मिक अनुष्ठान होकर धर्म की गंगा बह रही है। सिद्धचक्र मंडल विधान, प्रथमाचार्य शांति सागर स्मारक ओर प्रतिमा चरण स्थापना का राष्ट्रीय कार्यक्रम 71 वर्ष पूर्व निर्मित 41 फीट के मानस्तंभ में विराजित श्री जी का भव्य पंचामृत अभिषेक 28 जनवरी को होगा। मंगलवार को याग़ मंडल विधान का पूजन हुआ। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघस्थ 83 वर्षीय आर्यिका शीतलमति माताजी ने 23 जनवरी को चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना धारण कर ली। अब पूज्य माताजी निर्जल बिना जल के उपवास कर तप साधना, आत्मा का चिंतन कर रही हैं। 27 जनवरी को 5वां उपवास है। आचार्य वर्धमानसागरजी ,मुनिश्री हितेंद्र सागरजी, मुनिश्री प्रभव सागरजी ,मुनिश्री चिंतनसागरजी , मुनिश्री दर्शितसागरजी, प्रबुद्ध सागरजी, मुमुक्षुसागरजी, प्रणीतसागरजी, ध्येयसागरजी, भुवन सागरजी, आर्यिका शुभमति, शीतलमती ,चैत्यमती,</p>
<p>विलोकमति ,दिव्यांशु मति ,पूर्णिमामति , मुदितमति विचक्षणमति ,समर्पितमति,निर्मुक्तमति विनम्रमति, दर्शनामति ,देशनामति ,महायशमति, देवर्धिमति,प्रणतमति ,निर्माेहमति,</p>
<p>पद्मश मति ,दिव्ययशमति, प्रेक्षामति जिनेशमति, ऐलक हर्षसागर, क्षुल्लक प्राप्तिसागर , सभी साधु उपस्थित रहे।</p>
<p><strong>जन्म अनेक लेते हैं किंतु सभी संयम अपनाते नहीं</strong></p>
<p>इस अवसर पर आचार्य श्री ने धर्मसभा में माताजी को संबोधित कर देशना में बताया कि केवलज्ञान लक्ष्मी से जैनधर्म विभूषित है। जैन धर्म के अंतर्गत सर्वाेच्च सिद्ध अवस्था का मार्ग बतलाया गया है। अनंतानंत भव्य आत्माएं इस मार्ग पर चलकर सिद्ध हुए हैं। संयम धारण करने से जीवन सार्थक होता है। जन्म अनेक लेते हैं किंतु सभी संयम अपनाते नहीं है। जन्म के साथ मरण भी लगा हुआ है। जन्म मरण की सार्थकता सम्यक दर्शन, ज्ञान और सम्यक चारित्र की साधना कर संलेखना से मृत्युंजय मृत्यु पर विजय पाने का पुरुषार्थ से होती है। आर्यिका श्री शीतलमति माताजी ने 54 वर्ष पूर्ण कर आर्यिका दीक्षा ली। जन्म वैराग्य संयम के महान कार्यों से सफल होता है। सर्वश्रेष्ठ अवस्था सिद्ध अवस्था होती है।</p>
<p><strong>आत्मा में लगे कर्मों को साधना तप बल से हटाया जाता है</strong></p>
<p>आचार्य वर्धमानसागर ने उपदेश में बताया कि शीतलमति ने अपने मन को दृढ़ करते हुए वसंतपंचमी के दीक्षा दिन पर संपूर्ण चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना धारण की है। संलेखना शरीर और कषाय को क्रश करने से सफल होती है। उपवास से शरीर को ओर आत्मा में लगे कर्मों को साधना तप बल से हटाया जाता है। उत्साह और भक्ति से धर्म पुरुषार्थ करना चाहिए। इससे आत्मा का कल्याण होता है और अन्य को भी संयम धारण करने की प्रेरणा मिलती है। श्रावक का मानव जीवन मन वचन काय के संयम से सफल होता है। साधु की समाधि देखना सेवा करना तीर्थ यात्रा समान होती है। उत्कृष्ट समाधि होने पर क्षपकसाधु अगले दो से आठ भव में निश्चित रूप से सिद्ध अवस्था को प्राप्त करते हैं।</p>
<p><strong>माताजी का चाकसू की ओर मंगल विहार </strong></p>
<p>पवन बोहरा, हेमंत बाबी,सुशील मोहित ने बताया कि आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी का धूमधाम से मंगल प्रवेश हुआ। माताजी ने श्री जी के दर्शन के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ सहित दर्शन किए। धर्म सभा में आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी और आचार्य श्री के प्रवचन हुए दोपहर को आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी का आहार के बाद निवाई से चाकसू की ओर मंगल विहार हुआ।</p>
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		<title>81 वर्षीय आर्यिका श्री ज्योतिमति जी का दिव्य हुआ समाधि मरणः विमान यात्रा डोला निकाल किए अंतिम संस्कार </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/81_year_old_aryika_shree_jyotimati_jis_death_in_samadhi_was_divine/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 17 Dec 2024 12:59:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर से दीक्षित शिष्या 81 वर्षीय आर्यिका श्री ज्योतिमति जी का 16 दिसंबर रात 11.37 बजे पारसोला (राजस्थान) में समस्त संघ सानिध्य में समाधिमरण हो गया। विमान डोल यात्रा निकालकर अंतिम संस्कार किए गए। जैन समाज ने दर्शन कर अपनी भावांजलि प्रस्तुत की। पढ़िए पारसोला से राजेश पंचोलिया इंदौर की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर से दीक्षित शिष्या 81 वर्षीय आर्यिका श्री ज्योतिमति जी का 16 दिसंबर रात 11.37 बजे पारसोला (राजस्थान) में समस्त संघ सानिध्य में समाधिमरण हो गया। विमान डोल यात्रा निकालकर अंतिम संस्कार किए गए। जैन समाज ने दर्शन कर अपनी भावांजलि प्रस्तुत की। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पारसोला से राजेश पंचोलिया इंदौर की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पारसोला।</strong> ‘दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना यह भावुं। देहांत के समय में तुमको न भूल जावुं। मरण समय गुरु पाद मूल हो व्रत संयम पालूं, पंडित-पंडित मरण हो ऐसा अवसर दो।’ इन सारगर्भित भावनाआंे को बिरले ही भव्य जीव अपने जीवन में चरितार्थ करते हैं। पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर से दीक्षित शिष्या 81 वर्षीय आर्यिका श्री ज्योतिमति जी का 16 दिसंबर रात 11.37 बजे पारसोला (राजस्थान) में समस्त संघ सानिध्य में समाधिमरण हो गया। जैन समाज अध्यक्ष जयंतीलाल कोठारी  तथा  वर्षायोग समिति अध्यक्ष ऋषभ पचौरी ने बताया कि सुबह 8 बजे समाधिस्थ 81 वर्षीय आर्यिका श्री ज्योतिमति जी का डोला विमान यात्रा वात्सल्य वारिघि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमानसागर जी संघ सानिध्य और श्रद्धालुओं की उपस्थिति में निकाली गई।  आर्यिका श्री के डोले के आगे कमंडल लेकर भूमि शुद्धि का और आर्यिका श्री के डोले को कंधे लगाने का सौभाग्य परिजनों को प्राप्त हुआ। साबला रोड़ स्थित  वैराग्य योग दर्शन समाधिस्थल परिसर में  पंडित कीर्तिश, पंडित अशोक के निर्देशन में मंत्रोचार से शुद्धि की गई। आर्यिका श्री ज्योतिमति की पूजन शांति धारा और पंचामृत अभिषेक गृहस्थ अवस्था के परिजन पुत्र गोपाल एवं महेंद्र तथा लड़कियां संजू एवं मंजू परिवार द्वारा किया गया। आर्यिका माताजी की समाधि के कारण संघ के सभी साधुओं ने उपवास किया। अग्नि संस्कार के बाद उपस्थित आर्यिका संघ एवं समस्त समाज ने परिक्रमा देकर अपनी विनयाजंलि प्रस्तुत की।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-71167" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0033.jpg" alt="" width="506" height="1035" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0033.jpg 506w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0033-147x300.jpg 147w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/12/IMG-20241217-WA0033-501x1024.jpg 501w" sizes="(max-width: 506px) 100vw, 506px" /></p>
<p><strong>सामान्य परिचयः वर्ष 2007 में आर्यिका दीक्षा ली</strong></p>
<p>गजू भैया एवम् राजेश पंचोलिया इंदौर ने बताया कि मालपुरा राजस्थान की 81 वर्षीय आर्यिका श्री ज्योतिमति ने नाम को सार्थक कर अध्यात्म की ज्योति जाग्रत कर आचार्यश्री वर्धमान सागर जी संघ समक्ष दीक्षा के लिए श्रीफल अर्पित कर 7 प्रतिमा धारी। मनोरमा की सीधे आर्यिका दीक्षा वात्सल्य वारिघि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सिद्ध हस्त करकमलों से श्री क्षेत्र  श्रवणबेलगोला में 17 नवंबर 2007 को  हुई। आपका नूतन नामकरण आर्यिका श्री ज्योतिमति जी किया गया</p>
<p><strong>वर्ष 2017 में 8 वर्षों की नियम संल्लेखना धारण की</strong></p>
<p>वर्ष 2018 में श्री बाहुबली भगवान के मस्तकाभिषेक देखने पहुंची आर्यिका श्री ज्योतिमति जी ने आचार्य श्री भद्रबाहु स्वामी के चरण स्थल श्रवणबेलगोला पर 6 जून 2017 को 8 वर्षों की नियम संलेखना धारण की। विगत दिनों माताजी ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी को बताया कि मैंने सपने में भगवान बाहुबली के दर्शन कर अभिषेक देखा है। अगले दिन माताजी को बाहुबली भगवान का पंचामृत अभिषेक दिखाया गया।</p>
<p><strong>संस्तरारोहण एवं यम संल्लेखना</strong></p>
<p>9 नवंबर को आचार्य श्री के समक्ष संस्तरारोहण का निवेदन किया। 6 दिसंबर 2024 को आचार्य श्री एवमं संघ के सभी साधुओं से क्षमायाचना कर चारों प्रकार के अन्न जल आदि का आजीवन त्यागकर यम संल्लेखना धारण किया। प्रतिदिन तन्मयता, एकाग्रता पूर्वक गुरुजनों का संबोधन सुन रहीं और श्री जी के अभिषेक देखती रहीं। क्षपकोतमा आर्यिका श्री ज्योति मति जी को प्रतिदिन आचार्यश्री वर्धमान सागर जी, मुनिश्री चिन्मयसागर जी, मुनि श्री हितेंद्रसागर जी सहित संघ के साधु संबोधन करते रहे। यम सल्लेखना के 10 उपवास सहित शांत परिणामों से निराकुलता सहित 16 दिसंबर को रात 11.37  बजे उत्कृष्ट समाधिमरण आचार्यश्री  वर्धमान सागर जी संघ सानिध्य में आचार्य श्री के श्री मुख से अरिहंत सिद्ध सुनते हुए हुआ। क्षपकोतमा आर्यिका श्री की विमान  डोल यात्रा श्री सुपार्श्वमति संत निवास से रवाना होकर समाधि स्थल पहुंची।</p>
<p><strong>धार्मिक विधि-विधान से हुएा अंतिम संस्कार</strong></p>
<p>राजस्थान प्रांत के अनेक नगरों मालपुरा, रीछा, टोडा रायसिंह, धरियावद, नरवाली, मुंगाडा के गुरु भक्तों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। समाधिस्थल पर पूर्ण विधि विधान से विमान यात्रा पूर्व नियत स्थल पर ले गए। जहां पर पूर्ण विधि विधान से समाधिस्थ आर्यिका श्री के धार्मिक संस्कार कर पूजन पंचामृत अभिषेक किए गए। अग्नि संस्कार पूर्व गृहस्थ अवस्था के पुत्र  एवं् परिजनों द्वारा किए गए।</p>
<p><strong>कठोर तप साधना, दो माह में 30 से अधिक उपवास किए</strong></p>
<p>माह नवंबर एवं दिसंबर 2024 में आर्यिका श्री ज्योतिमति माताजी ने 10 बेले अर्थात 20 उपवास तथा 10 लगातार उपवास 30 से अधिक उपवास कर संयम, तप, साधना कर कर्मों की निर्जरा की।</p>
<p><strong>आचार्य श्री के सानिध्य में पूर्व में भी हुईं संल्लेखना</strong></p>
<p>पारसोला नगर में इसके पूर्व भी आचार्य श्री वर्धमानसागर जी के सानिध्य में वर्ष 1997 में क्षुल्लक श्री नम्रसागर जी की, वर्ष 2002 में आर्यिका श्री सौम्यमती की, वर्ष 2004 में आर्यिका श्री सुप्रभामति जी सहित अनेक संलेखनाएं हुई हैं। उल्लेखनीय है कि पारसोला नगर के पुण्यशाली भव्य साधुगण हैं।</p>
<p><strong>सल्लेखना धारी साधु के दर्शन तीर्थ यात्रा के बराबर</strong></p>
<p>क्षपक साधु की सम्यक समाधि होने पर आगामी दो भव से आठ भव में निश्चित ही सिद्ध शिला पर पहुंचते हैं। इस कारण अनेक साधु तथा समाज के श्रद्धालु दर्शन करते हैं। परम पूज्य आर्यिका श्री ज्योतिमति जी को संबोधन देने के लिए मुंगाणा से आचार्य श्री सुनील सागर जी के  3 मुनि शिष्य श्री श्रुतेश सागर, श्री सुश्रुत सागर, श्री सक्षम सागर जी एवं आर्यिका श्री संगीतमति माताजी, क्षुल्लिका श्री सद्‌दु‌ष्टिमति माताजी, क्षुल्लिकाश्री पदममति माताजी ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के दर्शन, आशीर्वाद के बाद क्षपकोत्तमा आर्यिका श्री ज्योतिमति जी के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।</p>
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		<title>आचार्य वर्धमान सागर ने दिए थे दीक्षा संस्कार : नूतन दीक्षित क्षुल्लक श्री सर्वार्थ सागर जी का समाधिमरण  </title>
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		<pubDate>Tue, 18 Apr 2023 08:26:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टा धीश आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज के कर कमलों से किशनगढ़ रेनवाल के शशिकांत पाटनी की क्षुल्लकदीक्षा हुई थी और उन्हें क्षुल्लक श्री सर्वार्थ सागर जी नाम दिया गया था। 17 अप्रेल की शाम को ही उनका समाधिमरण हुआ। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230; उदयपुर। वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टा धीश आचार्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टा धीश आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज के कर कमलों से किशनगढ़ रेनवाल के शशिकांत पाटनी की क्षुल्लकदीक्षा हुई थी और उन्हें क्षुल्लक श्री सर्वार्थ सागर जी नाम दिया गया था। 17 अप्रेल की शाम को ही उनका समाधिमरण हुआ। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>उदयपुर।</strong> वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टा धीश आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज के कर कमलों से किशनगढ़ रेनवाल के शशिकांत पाटनी की क्षुल्लकदीक्षा हुई। आचार्य श्री ने पंच मुष्ठी केश लोच किये गए तथा दीक्षा संस्कार मस्तक तथा हाथों पर किये गए। इसके बाद आचार्य श्री ने नामकरण किया। श्री शशिकांत पाटनी किशनगढ़ रेनवाल का दीक्षा पश्चात नूतन नाम क्षुल्लकश्री सर्वार्थ सागर किया गया। पुण्यार्जक परिवारों द्वारा नूतन क्षुल्लक जी को पिच्छी कमंडल शास्त्र एवम कपड़े दान किये गए। इसके बाद शाम को ही समाधि होने से क्षुल्ल्क सर्वार्थ सागर जी समाधि होने से डोला यात्रा निकाल कर अग्नि संस्कार किए गए।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-42428" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230418-WA0018.jpg" alt="" width="576" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230418-WA0018.jpg 576w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230418-WA0018-135x300.jpg 135w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230418-WA0018-461x1024.jpg 461w" sizes="(max-width: 576px) 100vw, 576px" /></p>
<p>दीक्षा प्राप्ति से आत्मसाधना</p>
<p>इससे पहले आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में प्रेरणा प्राप्त कर मनुष्य पर्याय की सार्थकता प्राप्त करनी चाहिए। गुरु के सानिध्य से रत्नत्रय रूपी सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान ,सम्यक चारित्र की प्राप्ति होती है। अध्यात्म का प्रवेश द्वार दीक्षा है। जीवन में आमूलचूल परिवर्तन का मार्ग ही दीक्षा है। आचार्य श्री ने आगे बताया कि भोगों से विरक्ति होने पर दीक्षा प्राप्त कर आत्म साधना की जाती है। दीक्षा से तपस्वी का प्रथम चरण प्रारम्भ होता है, जो सम्यक संल्लेखना समाधि तक चलता है। गुरु चरणों के सानिध्य में समर्पण श्रद्धा के बिना आमूलचूल परिवर्तन नहीं होता है। शक्ति-भक्ति से भगवान बन सकते हैं। भगवान की भक्ति तथा व्रतों को धारण करना चाहिए। आपको भी दीक्षा महोत्सव देखकर दीक्षा लेने व्रत प्रतिमा नियम की भावना करना चाहिए। पाटनी परिवार ने संघ की बहुत सेवा समर्पण भाव से की है। गुरुसेवा का फल दीक्षा रूप में मिला है। भव्य जीव की भावना यही है कि गुरु चरणों मे समाधि लेकर जीवन को सफल बनाएं।</p>
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