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	<title>Acharya Shri Vinishchay Sagarji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Acharya Shri Vinishchay Sagarji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>ज्ञान का कार्य है जानना, श्रद्धान का काम विश्वास करना: आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सान्निध्य में मनाया ज्ञान कल्याणक  </title>
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		<pubDate>Tue, 11 Nov 2025 13:03:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सान्निध्य में हो रहे पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव के चौथे दिन भगवान को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव की बेला में प्रतिदिन की भांति श्री जी का अभिषेक कर शांतिधारा हुई। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के सान्निध्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सान्निध्य में हो रहे पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव के चौथे दिन भगवान को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव की बेला में प्रतिदिन की भांति श्री जी का अभिषेक कर शांतिधारा हुई। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के सान्निध्य में हो रहे पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव के चौथे दिन भगवान को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव की बेला में प्रतिदिन की भांति श्री जी का अभिषेक कर शांतिधारा हुई। इस बेला में आचार्य श्री ने ज्ञान के विषय में प्रकाश डाला। आचार्य श्री ने कहा कि ज्ञान का कार्य जानना और विश्वास करना श्रद्धा का काम है। जानी हुई वस्तु पर श्रद्धा कैसी है, विश्वास कैसा है। इसे ही लाभ प्राप्त होता है। सोने का उदाहरण देते हुए कहा कि सोने को जानना और उस पर श्रद्धा करना होता है। सुनार भी उसे कसौटी पर कसता है, पीतल कीमती वस्तु है, उस पर श्रद्धान नहीं करता। कोई भी निर्णय श्रद्धा के बाद होता है। उन्होंने कहा कि श्रद्धान ज्ञान में बड़ी भूमिका निभाता है। सही जगह श्रद्धान होना चाहिए। मेहनत परिश्रम तप साधना करते हैं। तब जाकर पुण्य प्राप्त होता है। इसका मतलब तब जाकर केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है। झोली फैलाओ और शुभ भावनाओं भाओ कि केवलज्ञान की प्राप्ति हो। यदि यह हो जाएगा तो कल्याण निश्चित है।</p>
<p><strong>राजा सोम राजा श्रेयांश परिवार के यहां हुए आदिनाथ प्रभु के आहार </strong></p>
<p>इसी क्रम में एक वर्ष तक आदिनाथ प्रभु को विधि नहीं मिली और किसी को नवधा भक्ति विधि आहार की विधि भी नहीं पता थी और आहार चर्या का सौभाग्य राजा सोम राजा श्रेयांश परिवार को मिला, जो संजय ममता बाक़लीवाल एवं राजीव मनीषा बाकलीवाल परिवार को प्राप्त हुआ। इसी के साथ प्रभु की दिव्य ध्वनि खिरी प्रभु को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई और प्रभु का पारणा गन्ने ईक्षु रस गन्ने से हुआ। दोपहर की बेला में समवशरण की रचना हुई। समवशरण के प्रथम दर्शन कराने एवं विमोचन करने का सौभाग्य कमल कुमार उमा देवी शामगढ़ निवासी को प्राप्त हुआ एवं इन्हीं के परिवार को ही समवशरण की प्रथम आरती का सौभाग्य मिला। समवशरण में दिव्य उपदेश हुआ। आचार्य श्री ने द्रव्यों के वर्णन को बताया। उन्होंने कहा कि संसार में 6 द्रव्य हैं, जिसमें जीव चेतन है, उसे अनुभूति है उसे सुख-दुख का अनुभव है।</p>
<p><strong>आचार्य के 36 मूलगुण उपाध्याय के 25 मूलगुणों का मार्ग बताया</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने बताया कि भगवान ने दो धर्म का प्रतिपादन किया श्रावक धर्म और मुनि धर्म भगवान ने हमें महाव्रत धारण करके तप साधना का मार्ग बताया श्रावक के छह आवश्यक आठ मुलगुणों का पालन करने के साथ व्यसन त्याग का विस्तृत वर्णन किया।</p>
<p>भगवान ने आचार्य के 36 मूलगुण उपाध्याय के 25 मूलगुणों का मार्ग बताया। जन्म जरा मृत्यु पर्याय तक हमारी है। कर्म बंधन के कारण जीव कभी मनुष्य कभी देव कभी नरक पर्याय में जन्म लेता है।</p>
<p><strong>भगवान की दिव्यध्वनि सर्वांग से खिरती है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने भगवान की दिव्य ध्वनि के विषय में सभी को बताया। उन्होंने कहा कि जब दिव्या ध्वनि खिर रही थी। संपूर्ण संसार में मेघ गर्जन प्रचारित हो रही थी। उन्होंने कहा कि दिव्य ध्वनि जिनेंद्र वाणी है। जो सर्वांग से खिरती है। भगवान ने दिव्य ध्वनि के माध्यम से आगम को समझाया। केवल ज्ञान की महिमा अनंत है। केवलज्ञानी अनंत पर्याय को देखता है। यह केवल ज्ञान की महिमा है। संपूर्ण कार्यक्रम में छायाचित्र में सक्रिय सहयोग आशु जैन कटनी, सन्नी जैन कटनी एवं उनकी टीम ने किया। बुधवार को पिच्छिका परिवर्तन एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव मनाया जाएगा।</p>
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		<title>पंचकल्याणक महोत्सव में मनाया जन्म कल्याणक निकली शोभायात्रा : श्रद्धालु खुशी से झूमे जयकारे लगाकर भक्ति नृत्य में रहे लीन  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Nov 2025 13:11:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में हो रहे पंचकल्याण महोत्सव के दूसरे दिन भगवान का जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। जन्म कल्याणक की पूर्व रात्रि में गर्भ कल्याणक की क्रिया हुई। इंद्र दरबार लगाया गया एवं माता के 16 सपनों का मंचन किया गया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में हो रहे पंचकल्याण महोत्सव के दूसरे दिन भगवान का जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। जन्म कल्याणक की पूर्व रात्रि में गर्भ कल्याणक की क्रिया हुई। इंद्र दरबार लगाया गया एवं माता के 16 सपनों का मंचन किया गया। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में हो रहे पंचकल्याण महोत्सव के दूसरे दिन भगवान का जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। जन्म कल्याणक की पूर्व रात्रि में गर्भ कल्याणक की क्रिया हुई। इंद्र दरबार लगाया गया एवं माता के 16 सपनों का मंचन किया गया। रविवार सुबह श्री जी का अभिषेक और शांतिधारा की गई। इसके बाद जन्म कल्याणक महोत्सव का पूजन हुआ एवं जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। जन्म कल्याणक महोत्सव की बेला में जैसे ही तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ। वैसे ही इंद्र का सिंहासन कंपायमान होने लगा और उसके बाद खुशियां मनाई गइर्। साथ ही कुबेर इंद्र द्वारा रत्न वृष्टि की गई, नृत्य किए गए। इस बेला में सौधर्म इंद्र-इंद्राणी संवाद के साथ कुबेर इंद्र-इंद्राणी का संवाद भी दर्शाया गया। जैसे ही यह घोषणा हुई कि भगवान का जन्म हो गया है, सारा मंच खुशियों से झूम उठा और जय जयकार कर भक्ति नृत्य करने लगा। संपूर्ण महोत्सव विधि-विधान के साथ ब्रह्मचारी नमन भैया करवा रहे हैं। इस अवसर पर पूरा वातावरण भक्ति से ओतप्रोत था।</p>
<p><strong>शोभायात्रा में नगरवासियों का उत्साह रहा चरम पर </strong></p>
<p>सभी इंद्र-इंद्राणी को बग्गी में बिठाकर भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जो बहुत ही भव्य एवं अलौकिक थी। इस शोभायात्रा में सभी भक्त जय-जयकार भक्ति नृत्य करते चल रहे थे एवं नगर के प्रमुख मार्गाें से होते हुए यह शोभायात्रा कृषि उपज मंडी पहुंची। जहां पांडुक शिला पर सौधर्म इंद्र द्वारा तीर्थंकर बालक का जन्माभिषेक किया गया। शोभायात्रा का जगह-जगह स्वागत किया गया। वहीं आदिनाथ जैन श्वेतांबर श्री संघ की ओर से अध्यक्ष राजकुमार पारख के नेतृत्व में स्वागत किया गया। वर्ष 2007 के बाद हुए नगर में हुए पंच कल्याणक महोत्सव में निकली शोभायात्रा में उत्साह भरपूर था। 2007 में जो पंचकल्याणक हुआ था वह 2 से 7 मई तक मनाया गया था और 4 मई को जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया था। उस समय अतिथि के रूप में उस समय राज्य के गृहमंत्री रहे गुलाबचंद कटारिया थे।</p>
<p><strong>पुरुषार्थ बड़ा होना चाहिए-आचार्य श्री </strong></p>
<p>जन्म कल्याणक महोत्सव की बेला में आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि पुण्य आता कैसे है। इसके विषय में बताया कि झोली तो इतनी बड़ी है लेकिन, पुरुषार्थ सुई की नोक के बराबर है। पुरुषार्थ भी बड़ा होना चाहिए तथा आस्था बड़ी होनी चाहिए। आस्था जितनी विशाल होगी, पुण्य उतना अधिक आपके पास आएगा। आचार्य श्री ने कहा कि पुण्य भी रंग बदलता है। अक्सर आप देखना पुण्य जब मुख मोड़ता है, जब आपको उसकी जरूरत है। पुरुषार्थ इतना करो कि उसे मुंह मोड़ने का समय ही ना मिले। भगवान का जन्म कल्याणक होता है तो सौधर्म इंद्र का सिंहासन भी कंपायमान होने लगता है। वह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि मेरा सिंहासन क्यों डोल रहा है? पुण्य के संदर्भ में गुरुदेव ने कहा कि जहां शांत परिणाम होते ह।ैं वहां पुण्य को आना ही होता है। पुण्य का उदय होता है तो तीर्थंकर के माता-पिता एवं इंद्र आदि हो सकते हैं। शांत परिणाम से ही पुण्य कमाया जाता है। शांत परिणाम होंगे तो परिवार में पुण्य आएगा और पाप नहीं आएगा।</p>
<p><strong>जन्म दिन पर केक काटना जैन कल्चर नहीं </strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि आपका जिस दिन जन्मदिन होता है। उसे दिन आप केक काटते हैं, यह दिगंबर और जैनों का कल्चर नहीं है। जिस दिन आपका जन्मदिन हो, उस दिन अभिषेक करो और जिससे आपका बैर हो, उससे क्षमा मांगो। सही मायने में यह जन्मदिन है। इस अवसर पर चातुर्मास हुए कार्यक्रमों की एक स्मारिका का भी विमोचन किया गया।</p>
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		<title>घटयात्रा ध्वजारोहण सकलीकरण से पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव शुरू : मुख्य पंडाल में श्री जी को विराजमान कर अभिषेक शांतिधारा की  </title>
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		<pubDate>Sat, 08 Nov 2025 09:58:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सानिध्य में पांच दिवसीय पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव ब्रह्मचारी नमन भैया के निर्देशन में हो रहा है। प्रातः की बेला से ही भक्तों का मंदिर आना शुरू हो गया था। सर्वप्रथम देव आज्ञा के बाद आचार्य श्री से पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव निर्विघ्न संपन्न हो, इसके लिए देव आज्ञा ली गई। रामगंजमंडी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सानिध्य में पांच दिवसीय पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव ब्रह्मचारी नमन भैया के निर्देशन में हो रहा है। प्रातः की बेला से ही भक्तों का मंदिर आना शुरू हो गया था। सर्वप्रथम देव आज्ञा के बाद आचार्य श्री से पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव निर्विघ्न संपन्न हो, इसके लिए देव आज्ञा ली गई। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सानिध्य में पांच दिवसीय पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव ब्रह्मचारी नमन भया के निर्देशन में हो रहा है। प्रातः की बेला से ही भक्तों का मंदिर आना शुरू हो गया था। सर्वप्रथम देव आज्ञा के बाद आचार्य श्री से पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव निर्विघ्न संपन्न हो, इसके लिए देव आज्ञा ली गई। साथ ही नगर के प्रमुख मार्ग से होते हुए घटयात्रा भी निकली। घटयात्रा में भी अपार उत्साह देखने को मिल रहा था। इसके उपरांत मुख्य पंडाल में श्री जी को विराजमान कर अभिषेक शांतिधारा की गई। वेदी शुद्धि, मंडप शुद्धि आदि की क्रियाएं की गई।</p>
<p>आयोजन की शुरुआत में ध्वजारोहण किया गया। यह भगवान स्वरूप पदमकुमार नीरजकुमार देवरी खानपुर वाले परिवार की ओर से किया गया। मंदिर जी का वातावरण भक्ति से ओतप्रोत रहा। इसी क्रम में इंद्र प्रतिष्ठा सकलीकरण आदि की क्रियाएं की गई। साथ ही याग मंडल विधान किया गया। दोपहर की बेला में भगवान की माता की गोद भराई की गई एवं भगवान के गर्भ कल्याण की खुशियां मनाई गई। इस महोत्सव में भगवान के माता-पिता बनने का सौभाग्य सुधा जयकुमार डूंगरवाल परिवार को प्राप्त हुआ है।</p>
<p><strong>हमें तीनों लोकों को ज्ञात कराना है तो विशेष बनना पड़ता है। </strong></p>
<p>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का महत्व समझाया। उन्होंने कहा हम अपने परमात्मा का गर्भकल्याणक मना रहे हैं। इसकी विशेषता है यह सामान्य नहीं है, इन क्षणों में तीनों लोक क्षण-क्षण के लिए सुकून प्राप्त करते हैं। ऐसे महान जीवों का हम गर्भ कल्याणक मनाते हैं। तीनों लोकों का ज्ञात कराना है तो विशेष बनना पड़ता है। आचार्य श्री ने कहा यदि हमें तीनों लोकों को ज्ञात कराना है तो विशेष बनना पड़ता है। हमे ही नहीं बनना पड़ता जन्मदाता को और गर्भधारण करने वाले को भी विशेष बनना पड़ता है।</p>
<p><strong>गर्भ कल्याणक ही आज मदर्स डे है </strong></p>
<p>उन्होंने गर्भ कल्याणक के विषय में कहा कि आज मदर्स डे है क्योंकि, गर्भ कल्याणक ही मां दिवस है। तीर्थंकर को गर्भ में धारण करने की योग्यता चाहिए। यह सबके बस की बात नहीं होती जो तीर्थंकर भगवान की अनंत भक्ति करते हैं। ऐसे जीव तीर्थंकर भगवान को गर्भ में धारण कर पाते हैं। परमात्मा से गले मिलकर नहीं जोड़ा जाता, परमात्मा को अपनी आस्था को जोड़ा जाता है। इतनी गहराई से जुड़ जाता है कि मनुष्य बने तो तीर्थंकर बन जाए महापुरुष बन जाए और महिलाएं हैं तो तीर्थंकर की माता बन जाए ऐसे जुड़ना चाहिए। आचार्य श्री ने पंचकल्याणक महोत्सव के लिए कहा कि यह पंचकल्याणक के 5 दिन आपके लिए अनमोल हैं। यह क्षण अमूल्य है आपके लिए तीन लोकों की संपत्ति एक तरफ है यदि आपका भाव कल्याणक के प्रति है, तीर्थंकर भगवान के पांचों कल्याणक हमारे भावों में हमारी क्रियाओं में चलने-फिरने में मात्र उनके कल्याणक और कुछ भी नहीं चाहिए, फिर देखो आनंद।</p>
<p><strong>झोली फैला रहे तो छोटी क्यों फैला रहे?</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने एक कथन के माध्यम से कहा कि यदि हम झोली फैला रहे हैं तो छोटी क्यों फैला रहे हैं ? इस विषय पर गुरुजी ने कहा कि इतनी बड़ी फैलाओं की देने वाला थक जाए, ऐसा मांगों की देने वाला सोच में पड़ जाए। लोग भगवान शांतिनाथ के समक्ष आकर कहते हैं कि मेरी दुकान नहीं चल रही, मेरी दुकान चल जाए। भगवान के समक्ष झोली इतनी बड़ी कर दो कि जैसे आप हो वैसा ही होना हमें जो आपके पास है वैसा का वैसा ही हमें चाहिए। उसमें सुई की नोक के बराबर भी नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं भगवान के सामने छोटा भिखारी बनकर नहीं जाता। मैं बड़ा भिखारी बनकर जाता हूं। भावना ही भा रहे हो तो ऐसी भाव की अदभुत हो। वह भावना अपनी आत्मा में ऐसी दस्तक दे दे ऐसा हस्ताक्षर दे दे कि आप भी तीर्थंकर हो, आप भी केवली हो। ऐसी भावना भाओ कमजोर भावना भाने से मतलब क्या है।यदि कमजोर भावना भाएंगे तो धराशाई हो जाएंगे। रामगंजमंडी के लोग कमजोर नहीं है। 5 दिनों में यही काम करना है कि अपनी भावनाओं को इतना ऊपर ले जाना है कि हमें अगर इच्छा हो तो भावना हो तो मोक्ष की हो तीर्थंकर पद की हो, मोक्ष की हो, अनंत चतुष्टय की हो।</p>
<p><strong>आज जो मैं हूं आचार्य श्री विराग सागर जी की वजह से हूं </strong></p>
<p>आचार्य श्री के गुरु आचार्य श्री विराग सागर महाराज के आचार्य</p>
<p>पदारोहण दिवस पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आज में जो कुछ भी हूं आचार्य श्री विराग सागर की वजह से हूं। अगर गुरुदेव नहीं होते तो मैं भी नहीं होता। मैं नहीं होता तो मेरे पास भी कुछ भी नहीं होता। सारी की सारी कृपा उनकी है और यह सारा आशीर्वाद उन्हीं का है। मनुष्य पर्याय को सार्थक करने के लिए आचार्यश्री विराग सागर जी ने मुझे वरदान दिया कि मुझे दिगंबर बनाया। उनके उपकारों को हम सिर्फ स्मरण कर सकते हैं। रविवार की बेला में जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया जाएगा। जन्म की खुशियां मनाई जाएगी। जन्म कल्याण की शोभायात्रा नगर के प्रमुख मार्ग से होते हुए कृषि उपज मंडी पहुंचेगी, जहां बनी पांडुक शिला पर श्रीजी का अभिषेक होगा।</p>
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		<title>जीवन में उपलब्धि के लिए त्याग बहुत आवश्यक : उत्तम त्याग धर्म पर विवेचना में आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने सुनाए त्याग के रहस्य  </title>
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		<pubDate>Fri, 05 Sep 2025 09:48:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में दसलक्षण पर्व के आठवें दिवस को उत्तम त्याग धर्म के रूप में मनाया गया। मंदिर जी में उत्तम त्याग धर्म की आराधना की गई। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में दसलक्षण पर्व के आठवें दिवस को उत्तम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में दसलक्षण पर्व के आठवें दिवस को उत्तम त्याग धर्म के रूप में मनाया गया। मंदिर जी में उत्तम त्याग धर्म की आराधना की गई। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज सानिध्य में दसलक्षण पर्व के आठवें दिवस को उत्तम त्याग धर्म के रूप में मनाया गया। मंदिर जी में उत्तम त्याग धर्म की आराधना की गई। आचार्य श्री ने त्याग के बारे में बताते हुए कहा कि डर सबको लगता है त्याग से लेकिन, जब भी उपलब्धि होगी वो त्याग से ही होगी। बिना त्याग के उपलब्धि नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि फैक्ट्री नहीं जाएं, दुकान पर नहीं जाएं तो धन का अर्जन होगा क्या? नहीं होगा तो घर को छोड़ना ही होगा। हम कहीं भी दृष्टि डालें तो त्याग तो करना ही पड़ता है। उन्होंने अगले विवेचन में कहा कि आत्म हित के प्रयोजन के लिए त्याग करना उत्तम त्याग कहलाता है। लौकिक कार्यों के लिए नहीं आत्म हित के लिए त्याग करना। बहुत से लोग क्या करते है, मेरा यह काम नहीं होगा तब तक मेरा यह त्याग है। ऐसा त्याग आत्म हित के लिए नहीं होता। ऐसा त्याग लौकिक हित के लिए होता है, हमें आत्महित करना चाहिए।</p>
<p><strong>त्याग में आत्मविश्वास चाहिए</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि छोटी से वस्तु छोटी त्याग करेंगे तो आपको बहुत बड़ा आत्मविश्वास चाहिए क्योंकि, धर्म परीक्षा करता है। क्या मालूम आज त्याग कर दो और डॉक्टर वैद्य कह दे, यह खाओगे तो जिंदा रहोगे क्योंकि, त्याग होता तो परीक्षा भी होती है। इसीलिए त्याग में आत्मविश्वास बहुत चाहिए। बिना श्रद्धा बिना आत्मविश्वास के त्याग हो ही नहीं सकता</p>
<p><strong>भूखे रहना उपवास नहीं</strong></p>
<p>उपवास की परिभाषा को बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि भूखे रहना उपवास नहीं है। उप का अर्थ है आत्मा वास का मतलब है, आत्मा में रहना। आत्मा के प्रयोजन से चारों प्रकार के आहार का त्याग करना उपवास है। शरीर कैसा भी हो, यदि भोजन नहीं करेंगे तो शरीर तो मुरझाएगा। शरीर के सामने हम जीत नहीं सकते लेकिन, हम आत्मा के सामने खड़े हो जाएं तो शरीर को जीत सकते हैं। उपवास के अंदर शरीर के संतुलन बनाने को नहीं कहा गया है। आत्मा के संतुलन को बनाने को कहा गया है।</p>
<p><strong>मन मस्तिष्क में आत्महित होना चाहिए</strong></p>
<p>अगर आत्मा में हमारा संतुलन है। आत्मा में हमारा उपयोग है और हमने आत्म हित के लिए चारों प्रकार के आहार का त्याग किया है तो इसका मतलब यह है कि आपका उपवास सही है। छोड़ने और नहीं खाना उपवास नहीं होता। मन मस्तिष्क में आत्महित होना चाहिए। त्याग में दृढ़ता होनी चाहिए जितनी ज्यादा होती है। उतना ज्यादा उपवास का फल बढ़ता जाता है। महाराज श्री ने कहा कि शास्त्रों में लिखा है कि यदि मुनिराज अनासक्त भाव से आहार करते हैं तो वह भी उनका उपवास है। भोजन के प्रति आसक्ति नहीं होना चाहिए।</p>
<p><strong> आयुर्वेद भी उसे हानिकारक मानता है </strong></p>
<p>त्याग दूसरों को संतुष्ट करने के लिए नहीं होता है। त्याग का मतलब आत्म हित होता है। दूसरों को बताने के लिए दूसरों को संतुष्ट करने के लिए त्याग नहीं किया जाता।</p>
<p>जो चीज जैन धर्म खाने निषेध करता है। आयुर्वेद भी उसे हानिकारक मानता है और यह शरीर के लाभप्रद था ही नहीं।</p>
<p><strong>  गृहस्थ संकल्पी हिंसा का त्याग कर सकता है </strong></p>
<p>त्याग की भूमिका में गुरुदेव ने कहा कि गृहस्थ हिंसा का त्याग कर सकता है और हिंसा में भी संकल्प लेकर किसी को नहीं मारूंगा। जैनी कभी भी संकल्प लेकर योजना बनाकर किसी को नहीं मारेगा। वह सोच ही नहीं सकता। झूठ का त्याग भी किया जा सकता, लेकिन ऐसा सत्य भी नहीं बोलना। जिससे दूसरों के प्राण चले जाए। छोटे-छोटे सत्य किसी के प्राणों का एवं स्वयं के प्राणों के घात का कारण न बने। ऐसा सत्य गृहस्थ अवस्था में बोलते रहना।</p>
<p><strong>प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव अभयदान है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने चार प्रकार के दान का वर्णन करते हुए दान का महत्व बताया। उन्होंने अभयदान के विषय में कहा कि प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव अभयदान है। ये फ़िक्र मन मस्तिष्क में बने रहना मेरे द्वारा किसी जीव की विराधना ना हो जाए, यह अभय दान है। सावधान रहना सावधानी से चलना सावधानी से काम करना विवेक पूर्वक कार्य की सिद्धि करना ये फ़िक्र बनी रहना मेरे द्वारा किसी जीव की हिंसा ना हो। अभयदान से अहिंसा का पालन होता है।</p>
<p><strong>आसक्ति बनी रही तो त्याग का कोई मतलब नहीं</strong></p>
<p>महाराज श्री ने कहा कि उत्तम त्याग धर्म यह कहता है कि आज कुछ ना कुछ एक त्याग जरूर करना। वस्तु से नहीं वस्तु की अनासक्ति का त्याग करो। उन्होंने गुरुदेव विराग सागरजी महाराज से जुड़ा संस्मरण सुनाते हुए कहा कि गुरुदेव हमसे कहा करते थे कि आहार में गए। यदि रसगुल्ला सामने आए तो छोड़ना मत। थोड़े से लेना, लेकिन फिर वह जिह्वा पर जाए मीठी स्वादिष्ट लगे अब उसका त्याग करो। मन यह कहने लगे अब खाओ तो तुरंत उसका त्याग करो, तुरंत छोड़ दो। वस्तु छोड़ दी और उससे आसक्ति बनी रही तो उसे त्याग करने का कोई मतलब नहीं। धीरे-धीरे त्याग का भाव करो और अंत में ऐसा भी अवसर मिलेगा कि आप सब कुछ त्याग करके देह परिवर्तन करेंगे।</p>
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		<title>मुनि श्री प्रवीर सागर महाराज ने किया केशलोच : केशलोच उत्कृष्ट साधना होती है </title>
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		<pubDate>Thu, 24 Jul 2025 13:41:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के शिष्य मुनि श्री प्रवीर सागर महाराज ने बुधवार को केशलोच किया, इस दौरान मुनि श्री का उपवास रहा। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के शिष्य मुनि श्री प्रवीर सागर महाराज ने बुधवार को केशलोच किया, इस दौरान मुनि श्री का उपवास [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के शिष्य मुनि श्री प्रवीर सागर महाराज ने बुधवार को केशलोच किया, इस दौरान मुनि श्री का उपवास रहा। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के शिष्य मुनि श्री प्रवीर सागर महाराज ने बुधवार को केशलोच किया, इस दौरान मुनि श्री का उपवास रहा। केश लोच के बारे में विदित है कि स्वयं के हाथों बिना किसी अस्त्र के अपने हाथों से घास फूस की तरह संत केशों को निकालते हैं, जो अपने आप में एक उत्कृष्ट साधना होती है। गुरुदेव बिना कुछ खाए पिए भूख और प्यास को सहन करते हुए आज उपवास पर रहेंगे, जो अपने आप में एक उत्कृष्ट तप साधना के रास्ते कामना के वास्ते चल दे राही चल। यदि इसके बारे में जाने तो यह करना कोई साधारण बात नहीं है, यह जैन संतों का सबसे कठोर तप माना गया है। आम आदमी के जीवन में यदि एक बार गलती से बाल उखड़ जाए तो वह दर्द के मारे कांपने लगता है लेकिन, जैन संत तो बिना किसी औजार के सीधे अपने हाथों से बालों को खींचकर निकाल देते हैं। जैन संत सदा स्वावलंबी होते हैं, वे किसी को भी कष्ट न देते हुए स्वयं की साधना करते हैं।</p>
<p>चाहे कैसा भी कष्ट क्यों ना हो। वे समभाव में उसे सहन करते हुए मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होते हैं। जैन संत अहिंसा व्रत के पालन के साथ ही शरीर से राग भाव को भी हटाते हैं। साधु शरीर की सुंदरता को नष्ट करने के लिए अहिंसा धर्म का पालन करते हुए केशलोच करते है। जब जैन संत स्वयं के हाथों केशलोच करते है तो उनके चेहरे पर मुस्कुराहट देखने को मिलती है। जो अपने आप में पंचम युग में एक उत्कृष्ट साधना है।</p>
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		<title>स्वयं मूल्यांकन करो आपने क्या किया और क्या पाया : आचार्य श्री विनिश्चसागर जी के प्रवचन में जीवन के मूल्यांकन पर जोर  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Jul 2025 13:38:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के प्रवचन से पूर्व मंगलाचरण अभिषेक जैन ने किया। संचालन राजीव बाकलीवाल ने किया। इस अवसर पर महाराज श्री ने कहा कि भूख सबको लगती है लेकिन, भोजन करने का तरीका सबका अलग-अलग होता है। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के प्रवचन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के प्रवचन से पूर्व मंगलाचरण अभिषेक जैन ने किया। संचालन राजीव बाकलीवाल ने किया। इस अवसर पर महाराज श्री ने कहा कि भूख सबको लगती है लेकिन, भोजन करने का तरीका सबका अलग-अलग होता है। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के प्रवचन से पूर्व मंगलाचरण अभिषेक जैन ने किया। संचालन राजीव बाकलीवाल ने किया। इस अवसर पर महाराज श्री ने कहा कि भूख सबको लगती है लेकिन, भोजन करने का तरीका सबका अलग-अलग होता है। कितने ऐसे समय, कितने घंटे, कितने दिन आपके पास आते हैं कि आप लोगों को जड़ से उखाड़ना चाहते हैं। उस समय जन्म लेने वाले परिणाम काले होते हैं। आपने तो कह दिया कि देख लूंगा, बस चलता तो छोड़ता नहीं तुम्हें, ऐसा सोचकर पूरी आत्मा पर कालिख पोत दी। मुनिश्री ने कहा कि सबको याद है जब आप पढ़ते थे तो मूल्यांकन होता था। हर महीने टेस्ट होता था, बच्चों का मूल्यांकन होता था। कॉपी बनती थी जिसमें माह भर बाद कुछ प्रश्न दिए जाते थे और उन प्रश्नों को हल करना पड़ता था। आज भी टेस्ट इसलिए होते है यह पता पड़ता है कि हमने क्या सीखा है। लोगों का पूरा जीवन निकल जाता है लेकिन, वो मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं। 5 वर्ष 10 वर्षों में मैंने क्या पा लिया है और क्या खो दिया है। यह मूल्यांकन होना ही चाहिए कि इन 10 वर्षों में क्या किया। हमने इसका मूल्यांकन नहीं किया, उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पड़ोसी का मूल्यांकन करना बड़ा अच्छे तरीके से आता है। यदि आपको कोई वस्तु मिल जाए, बस तो ऐसी होनी चाहिए वस्तु वैसी होनी चाहिए। उसका मूल्यांकन आप तुरंत करते हैं। खुद का मूल्यांकन करने की हमने कोशिश ही नहीं की। हम पूरे काले हो गए लेकिन, हम तो आईने सामने देखकर चेहरे को संभालते हैं। यह तो गोरा है, गोरे होने से आत्मा के काले होने से कोई फायदा नहीं चेहरा तो काला भी चल जाता है लेकिन, आत्मा गोरी होनी चाहिए।</p>
<p><strong>मंदिर विकल्पों का विराम स्थान होता है</strong></p>
<p>हमने भाव इतने निम्न बना लिए की हम हिंसा के लिए उतारू हो गए हम इसे छोड़ेंगे नहीं जड़ से उखाड़ कर फेक देंगे। उन्होंने कहा कि डांटना मारना हर समय बुरा नही होता। आत्मा किसी भी समय हिंसा को स्वीकार नहीं करती। ऐसे विचार समझदारी धार्मिकता एवं धार्मिक विचारों में ऐसा हो सकता है। हम किसी को जब भी डाटे गुस्सा करे तब यह प्रयोजन होना चाहिए हमारे अंदर कषायो की मंदता होनी चाहिए। उन्होंने कहा मंदिर विशुद्धता का स्थान है आप जब अपने भीतर देखते हैं तो जो है वह होना नहीं चाहिए जो होना चाहिए, वह हो नहीं रहा है। मंदिर विकल्पों का विराम स्थान होता है। मंदिर अशुभ भावना के विसर्जन का स्थान होता है। मंदिर में बैठकर विकल्पों को स्थान दे रहे हैं तो शुभ लेश्या की उम्मीद नहीं की जा सकती। शुभ लेश्या में मंदिर आएगे तो अध्यात्म आनंद की अनुभूति होगी।</p>
<p><strong> जैनों के रक्त का परीक्षण कराया जाए तो रक्त क्षत्रियों जैसा </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि जैन क्षत्रिय हैं। यदि जैनियों के रक्त का परीक्षण कराया जाए तो रक्त क्षत्रियों जैसा है। हाथ में कलम नहीं तलवार है, हिंसा के लिए नहीं रक्षा के लिए। आदिनाथ महाराज ने जब तलवार सौंपी तो कहा था कि रक्षा करना हिंसा नहीं करना। तुम उसी कुल के हो, जिसे आदिनाथ ने तलवार सौंपी थी और रक्षा का भार सौंपा था लेकिन, आप बनियों की संगति में फंस गए, कमजोर हो गए। मेरा बस का नहीं है। अपने आप को क्षत्रिय समझ कर देखो, धर्म ध्यान की वृद्धि हो जाएगी। अशुभ की हानि हो जाएगी। शुभ में चले जाओगे।</p>
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		<title>हमें हमारे विचारों का थर्मामीटर मापना जरूरी: आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी ने धर्म देशना में भक्तों को दिया मार्गदर्शन  </title>
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		<pubDate>Wed, 23 Jul 2025 07:02:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते है तो अशुभ लेश्या है। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते है तो अशुभ लेश्या है। उन्होंने कहा कि हम अंतस चेतना से अपने बारे में सोचते हैं। दूसरे के बारे में नहीं, लौकिक जीवन कहता है कि दूसरे के बारे में भी सोचें यदि नहीं सोचते हैं तो नुकसान हमारा है। इसे स्वार्थ एवं अज्ञानता कह सकते हैं। हम बुद्धि लेकर आए है लेकिन, हम विद्या का प्रयोग करते हैं।</p>
<p>जीवन कंप्यूटर लैपटॉप गूगल नहीं है। जीवन में बुद्धि का प्रयोग जरूरी है। यदि हम बुद्धि का प्रयोग करेंगे तो अज्ञान का काम नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई समय नहीं है। जब हमारे अंतस चेतना में भाव उत्पन्न नहीं होते हैं। हम दुनिया का चक्कर लगा लेते हैं। हमारे पास कंट्रोल पावर नहीं है। हमारे शराब का त्याग है फिर भी हम उसके बारे में सोचते हैं, जो हमें पसंद नहीं, हम वह भी सोच लेते हैं। मन द्वारा हम कहीं भी पहुंच जाते हैं हमारे मन में कंट्रोल नहीं।</p>
<p><strong>आपको अपनी बैलेंस शीट बनाना चाहिए</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि हर चीज का माप होता है दूध आदि कोई भी पदार्थ हो सबका एक माप होता है। जैन दर्शन कहता है कि हमें हमारे विचारों और भावों को मापते रहना चाहिए, समझते रहना चाहिए। सार्थक तब होगा जब हम अपने आप को मापेंगे। हमने कभी अपने आप को मापा नहीं। हमें भी अपना थर्माेमीटर मापना चाहिए की हम कितने पॉजिटिव हैं कितने नेगेटिव है। कितने ज्ञानी है।अच्छा ज्ञानी धर्मात्मा होता है लेकिन हम होते नहीं। अपने आप को मापंे कि हम कितना पॉजिटिव कितना नेगेटिव है और कोशिश करें कि हम कितने सकारात्मक हो सकते हैं। इस विषय पर प्रकाश डालते हुए आचार्यश्री ने कहा कि स्वाध्याय हमारा थर्मामीटर है। उसी से हम समीक्षा कर सकते हैं कि हम कितने सकारात्मक हैं। जैन दर्शन कहता है कि आपको अपनी बैलेंस शीट बनाना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि व्यापार अर्जन की चीज है विसर्जन की नहीं। हम कितना पापों में सुधार कर सकते हैं। हम कितनी अपने को धार्मिकता दे सकते हैं। ऐसी वस्तुओं को क्या ग्रहण करना जो हमें खराब बनाती है।</p>
<p><strong>हम आधुनिक भौतिकवादी स्टैंडर्ड हो गए</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि कंट्रोल पावर सबके पास है इंद्रिय विषयों ग्रहण करें बिना जीवन नहीं चलता व्यक्ति अंतस चेतना में जो भाव करता है तो लेश्या उत्पन्न करता है। सोच लिया यह मेरा घर है यह मेरी चीज है तो यह अशुभ लेश्या है और मान लिया कि यह मेरा संयोग है तो यह शुभ लेश्या है। उन्होंने कहा हम आधुनिक भौतिकवादी स्टैंडर्ड हो गए हैं आधुनिकता दुर्गति कराती है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि ऐसी आधुनिकता किस काम की जो जीवन यापन नहीं कर सके। ऐसी आधुनिकता किस काम की जो सही दिशा देने वाली नहीं है। हम बाहरी दुनिया के ढोल बजा रहे हैं और अच्छा बुरा भाव बना रहे हैं यदि हम माला जप रहे हैं तो माला जैसे भाव होना चाहिए।</p>
<p><strong>आवश्यकता से अधिक धन है तो दान देना जरूरी</strong></p>
<p>उन्होंने दान के विषय में भी प्रकाश डाला यदि आवश्यकता से अधिक धन है तो दान देना जरूरी है। जीवन यापन के अतिरिक्त यदि धन संग्रह है तो दान करना चाहिए। धन की परिभाषा है कि धन जीवन यापन के लिए कमाना चाहिए। दान के लिए नहीं धन कमाओ तो यह नहीं सोचे कि मुझे दान करना है। यह भी नहीं सोचा कि जब कमाऊंगा तो दूंगा ऐसा भाव भी नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि खेल भावों का है क्रिया का नहीं। क्रिया सावधानी से होनी चाहिए की भाव की हानि ना हो इधर-उधर देखकर हम प्रमाद कर रहे हैं इससे शुभ भावों की हानि है। सावधानी रखनी चाहिए कि पानी पीएतो एक बूंद भी जमीन पर नहीं गिरना चाहिए यदि हम दुरुपयोग कर रहे हैं तो क्रिया और भावों में हानि है। उन्होंने कहा कि इतने भी बड़े मत हो की पापों में वृद्धि हो जाए हम हम इतने भी बड़े नहीं हो जाए की पुण्य की हानि हो जाए। धर्म सब कुछ करने के लिए तैयार है सावधानी रखो। भाव क्रिया व्यवस्थित हो भावों में हानि ना हो शुभ काम शुभ भाव शुभ लेश्या है अशुभ भाव है तो अशुभ लेश्या उत्पन्न होगी। उन्होंने कहा दिमाग काम करें लेकिन, समझ काम करनी चाहिए।</p>
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		<title>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के वर्षायोग कलश स्थापना रविवार को: आचार्य श्री विराग सागरजी के जीवन कृतित्व पर विद्वत संगोष्ठी  </title>
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		<pubDate>Sat, 12 Jul 2025 14:26:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रविवार की दोपहर बेला में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज का वर्षा योग कलश स्थापना समारोह कृषि उपज मंडी प्रांगण में होगा। आचार्य श्री कोकृषि उपज मंडी प्रांगण लाया जाएगा, जहां भव्य वर्षा योग कलश स्थापना समारोह होगा। शनिवार को आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में आचार्य श्री विराग सागर महाराज के जीवन कृतित्व [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>रविवार की दोपहर बेला में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज का वर्षा योग कलश स्थापना समारोह कृषि उपज मंडी प्रांगण में होगा। आचार्य श्री कोकृषि उपज मंडी प्रांगण लाया जाएगा, जहां भव्य वर्षा योग कलश स्थापना समारोह होगा। शनिवार को आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में आचार्य श्री विराग सागर महाराज के जीवन कृतित्व पर विद्वत संगोष्ठी हुई। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> रविवार की दोपहर बेला में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज का वर्षा योग कलश स्थापना समारोह कृषि उपज मंडी प्रांगण में होगा। जिसके लिए भक्तों का आना शुरू हो गया है। आचार्य श्री को दोपहर की बेला में बैंडबाजांे एवं जयघोष के साथ कृषि उपज मंडी प्रांगण लाया जाएगा, जहां भव्य वर्षा योग कलश स्थापना समारोह होगा। शनिवार को आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में आचार्य श्री विराग सागर महाराज के जीवन कृतित्व पर विद्वत संगोष्ठी हुई। जिसमें दूर-दराज से आए विद्वत जनों ने भाग लिया।</p>
<p>विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ आचार्य श्री विराग सागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया गया एवं शास्त्र भेंट किया गया। इस विद्वत्त संगोष्ठी में 10 विद्वानों ने भाग लिया एवं आचार्य श्री के जीवन कृतित्व पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर सभी विद्वत जनों ने आचार्य श्री को शास्त्र भेंट किया। आचार्य श्री के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य प्रमोद कुमार सुरेश कुमार बाबरिया दोतडा वाले परिवार को प्राप्त हुआ। इसके साथ ही विशेष थाल सजाकर भक्ति भाव के साथ आचार्य श्री का अष्ट द्रव्य से पूजन किया गया।</p>
<p>विद्वत जन ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज एवं आचार्य श्री विराग़ सागर महाराज के कारण श्रमण परंपरा दिखाई दे रही है। इनके विराट व्यक्तित्व के कारण श्रमण परंपरा जीवित है। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री विराग सागर महाराज के अंदर समता दिखाई देती थी। उन्होंने समता निष्प्रहता के साथ निर्वाहन किया। जीवन कृतित्व प्रकाश डालते हुए विद्वत जन ने कहा कि आचार्य श्री ने देशभक्ति में योगदान देते हुए शाकाहार एवं व्यसन मुक्ति का अभियान चलाया।</p>
<p><strong>जीवन कृतित्व पर एक स्मारिका का प्रकाशन होना चाहिए</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने 1993 में श्रेयांश गिरी में विधायक सुंदरलाल को व्यसन एवम मांसाहार का त्याग कराया। उन्होंने टीकमगढ़, भिंड आदि अनेक स्थानों पर इसके लिए विशेष अभियान चलाया। इस मुहिम से अनेक लोगों ने शाकाहार अपनाने एवम व्यसन मुक्त रहने का संकल्प लिया। उन्होंने इस इसके लिए 2007 में 10 हजार विद्यार्थियों की रैली की। इसमें 88 साधु संतों ने अपना सानिध्य प्रदान किया एवं गुरुदेव ने शाकाहार का प्रचार-प्रसार किया। साथ ही सभी बच्चों ने शाकाहारी रहने का संकल्प लिया। सभी विद्वानों ने आचार्य श्री से इस बात का भी निवेदन किया कि आचार्य श्री के जीवन कृतित्व पर एक स्मारिका का प्रकाशन होना चाहिए। दोपहर के सत्र में विद्वत्त जन ने कहा कि आचार्य श्री विराग सागर महाराज ने जीवंत कृतियों का निर्माण किया। जिससे भारतवर्ष का जैन समाज ही नहीं अपितु विश्व भी गौरवान्वित हुआ। आचार्य श्री ने समाज को जोड़ने का काम किया। आचार्य श्री पद प्रतिष्ठा से निर्लेप थे। आचार्य श्री ने अनेक तीर्थ का निर्माण कराया। आचार्य श्री ने कहा था कि एक हजार तीर्थ का निर्माण करने से एक तीर्थ का जीर्णाेद्धार कराओ उतना ही पुण्य मिलेगा। आचार्य श्री ने अनेक तीर्थ का जीर्णाेद्धार कराया। विद्वत जन ने कहा तीर्थंकरों को नहीं देखा चलते-फिरते तीर्थ के रूप में विराग सागर महाराज को देखा।</p>
<p><strong>गुरुदेव ने सिखाया समान व्यवहार होना चाहिए</strong></p>
<p>इस अवसर पर आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने कहा कि हमने आचार्य श्री को निकट से देखा है। हमारा उनसे हृदय से जुड़ा व्यवहार था। उन्होंने कहा आचार्य श्री ने हमें बच्चों की तरह पढ़ाया। मैं तो कहता हूं उनसे अच्छा और कोई नहीं मिल सकता। आचार्य श्री के भीतर उन्मुक्ति और गंभीरता थी। दिगंबर संत के लिए यह उपदेश दिया जाता है कि प्रेम तो करना पर्याय से नहीं द्रव्य से रखना। गुरुदेव ने हमें सिखाया सभी से समान व्यवहार होना चाहिए। उन्होंने हमें कहा था कि आशीर्वाद देने में कभी पीछे मत हटाना। कोई नमोस्तु ना करें तो भी उसे आशीर्वाद देना। नियति को कोई नहीं बदल सकता। अगर नियति को बदल सकता तो मैं उन्हें जाने नहीं देता।</p>
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		<title>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का 53 वां अवतरण दिवस मनाया: गुरु भक्तों ने भक्तिभाव से आशीर्वाद प्राप्त किया  </title>
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		<pubDate>Fri, 27 Jun 2025 08:43:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यश्री विनिश्चयसागर जी का 53वां अवतरण दिवस भवानीमंडी में मनाया गया। रामगंजमंडी सकल दिगंबर जैन समाज ने पहुंचकर आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के अवतरण दिवस पर अपनी सहभागिता दी। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;   रामगंजमंडी। आचार्य श्री विराग सागरजी के शिष्य आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का 53 वां अवतरण [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्यश्री विनिश्चयसागर जी का 53वां अवतरण दिवस भवानीमंडी में मनाया गया। रामगंजमंडी सकल दिगंबर जैन समाज ने पहुंचकर आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के अवतरण दिवस पर अपनी सहभागिता दी। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>  रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विराग सागरजी के शिष्य आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का 53 वां अवतरण दिवस भवानीमंडी मेडतवाल धर्मशाला में मनाया गया। आयोजन में उल्लास भक्ति भाव भरपूर दिखा। रामगंजमंडी सकल दिगंबर जैन समाज ने भी अपनी सहभागिता दी एवं गुरु चरणों में भक्ति भाव समर्पित किए। समारोह के शुभारंभ पर मंगलाचरण के बाद आचार्य श्री विराग सागरजी के चित्र का अनावरण सकल दिगंबर जैन समाज रामगंजमंडी संरक्षक अजीत सेठी, अध्यक्ष दिलीप विनायका, उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया, मंत्री राजीव बाकलीवाल, पदम सुरलाया आदि ने किया। इस अवसर भवानीमंडी सकल दिगंबर जैन समाज की ओर से इनका स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। रामगंजमंडी के महिला समूह एवं युवाओं में भी उत्साह भरपूर था।</p>
<p><strong>वर्षायोग के लिए श्रीफल भेंटकर निवेदन </strong></p>
<p>सकल दिगंबर जैन समाज रामगंजमंडी की ओर से विशेष श्रीफल सजाकर लाकर गुरुवर के चरणों में वर्षायोग के लिए श्रीफल भेंटकर निवेदन किया। 2 जुलाई को होने वाले प्रवेश पत्रिका का विमोचन भी किया गया। समाज की ओर से महावीर दिगंबर जैन महामंत्री पदम सुरलाया ने सभी से 2 जुलाई को रामगंजमंडी में होने जा रहे गुरुवर के प्रवेश में पधारने के लिए एवं 13 जुलाई को होने जा रही वर्षायोग कलश स्थापना में पधारने के लिए निवेदन किया। आचार्य श्री ने भी सभी को मंगल आशीर्वाद दिया। कार्यक्रम के बाद आचार्यश्री का मंगल विहार भानपुरा की ओर हुआ।</p>
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