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	<title>Acharya Shri Vinishchay Sagar &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Acharya Shri Vinishchay Sagar &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>सुखी जीवन के लिए आत्मचिंतन आवश्यक : आचार्य श्री विनिश्चय सागर के सानिध्य में हुआ एक दिवसीय सिद्धचक्र विधान </title>
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		<pubDate>Sun, 31 May 2026 12:22:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कई लोग मानते हैं कि विशेष स्थानों पर जाने, तीर्थ यात्रा करने या भौतिक साधनों को प्राप्त करने से जीवन में शांति मिल जाएगी। यह विचार आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने दिगम्बर जैन धर्मशाला शामली में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना/शामली। आज के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कई लोग मानते हैं कि विशेष स्थानों पर जाने, तीर्थ यात्रा करने या भौतिक साधनों को प्राप्त करने से जीवन में शांति मिल जाएगी। यह विचार आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने दिगम्बर जैन धर्मशाला शामली में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना/शामली।</strong> आज के समय में अधिकांश लोग सुख, शांति और सुकून की खोज में लगे हुए हैं। कई लोग मानते हैं कि विशेष स्थानों पर जाने, तीर्थ यात्रा करने या भौतिक साधनों को प्राप्त करने से जीवन में शांति मिल जाएगी। यह विचार आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने दिगम्बर जैन धर्मशाला शामली में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए । उन्होंने कहा कि निस्संदेह धार्मिक गतिविधियाँ और भक्ति मन को प्रसन्नता प्रदान करती हैं लेकिन, वास्तविक और स्थायी सुकून आत्मचिंतन, आत्मज्ञान और सही समझ से प्राप्त होता है। जब मनुष्य स्वयं को पहचानने का प्रयास करता है और अपने भीतर झाँकता है, तभी उसे जीवन का वास्तविक आनंद प्राप्त होता है। परिवार भी मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। परिवार की खुशहाली केवल धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सम्मान और सहयोग से बनी रहती है। यदि धन बढ़ता जाए लेकिन आपसी प्रेम और संस्कार कम हो जाएँ, तो परिवार बिखरने लगता है। इसलिए जीवन में केवल पाने की इच्छा नहीं, बल्कि त्याग, समझदारी और अच्छे संस्कारों को भी स्थान देना आवश्यक है।</p>
<p><strong>अक्सर लोग दूसरों की कमियाँ देखते हैं</strong></p>
<p>मनुष्य को समय-समय पर अपने व्यवहार और संबंधों का मूल्यांकन करना चाहिए। उसकी वाणी कैसी है, उसका स्वभाव कैसा है और वह अपने परिवार तथा समाज के लोगों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करता है, यह उसके जीवन की दिशा तय करता है। मधुर वाणी और विनम्र व्यवहार लोगों के हृदय जीत लेते हैं, जबकि कटु शब्द संबंधों में दूरियाँ पैदा कर देते हैं। परिवार में प्रेम और सम्मान बनाए रखने का एक सरल उपाय है—एक-दूसरे की अच्छाइयों की प्रशंसा करना। अक्सर लोग दूसरों की कमियाँ देखने में अधिक समय लगाते हैं, जबकि उनके गुणों को स्वीकार नहीं करते। यदि परिवार के सदस्य एक-दूसरे के प्रयासों, सेवाओं और अच्छे कार्यों की सराहना करें, तो रिश्तों में और अधिक मजबूती आती है। एक छोटा-सा धन्यवाद, एक मधुर शब्द और सच्ची प्रशंसा परिवार में नई ऊर्जा का संचार कर सकती है।</p>
<p><strong>सच्चे सुख, शांति और सफल जीवन का मार्ग</strong></p>
<p>जैसे भोजन में उचित मात्रा में नमक उसका स्वाद बढ़ाता है, उसी प्रकार प्रेम, सहनशीलता और विनम्रता परिवार के जीवन को मधुर बनाते हैं। जब घर के सदस्य एक-दूसरे के प्रति स्नेह, सम्मान और सहयोग का भाव रखते हैं, तब वही घर स्वर्ग के समान बन जाता है।आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक व्यक्ति आत्मचिंतन करे, अपने व्यवहार को सुधारे, प्रेम और भाईचारे को बढ़ाए तथा परिवार और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण करे। यही सच्चे सुख, शांति और सफल जीवन का मार्ग है। गुरुदेव के पावन सान्निध्य में सकल जैन समाज के सहयोग से आज एक दिवसीय सिद्धचक्र विधान का आयोजन किया गया । विधान के दौरान उपस्थित सभी लोगों ने भक्ति भाव से सिद्ध परमेष्ठियों को आराधना करते हुए अर्घ्य समर्पित किए । जिसमें श्रावक श्रेष्ठियों, माता बहनों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। उपस्थित साधर्मी बंधुओं ने भक्तिपूर्ण नृत्य करते हुए अपनी भक्ति का परिचय दिया।</p>
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		<title>नवागढ़ गुरुकुलम् के गौरवशाली तीन छात्रों को शिक्षा के लिए भेजा : अकलंक शरणालय रेवाड़ी में अध्ययन करेंगे छात्र </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Apr 2026 08:43:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निकटवर्ती जैन तीर्थ प्रागैतिहासिक अतिशय क्षेत्र नवागढ़ में पंडित गुलाब चंद्र पुष्प की स्मृति में संचालित श्री नवागढ़ गुरुकुलम ने अपने 5 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। गुरुकुलम से शिक्षा प्राप्त करने वाले तीन छात्रों को श्री अकलंक शरणालय रेवाड़ी जो मुनि श्री प्रणम्य सागरजी महाराज के मंगल आशीर्वाद से संचालित है। बकस्वाहा से पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निकटवर्ती जैन तीर्थ प्रागैतिहासिक अतिशय क्षेत्र नवागढ़ में पंडित गुलाब चंद्र पुष्प की स्मृति में संचालित श्री नवागढ़ गुरुकुलम ने अपने 5 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। गुरुकुलम से शिक्षा प्राप्त करने वाले तीन छात्रों को श्री अकलंक शरणालय रेवाड़ी जो मुनि श्री प्रणम्य सागरजी महाराज के मंगल आशीर्वाद से संचालित है। <span style="color: #ff0000">बकस्वाहा से पढ़िए, रत्नेश जैन/राजेश रागी की रिपोर्ट&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बकस्वाहा।</strong> निकटवर्ती जैन तीर्थ प्रागैतिहासिक अतिशय क्षेत्र नवागढ़ में पंडित गुलाब चंद्र पुष्प की स्मृति में संचालित श्री नवागढ़ गुरुकुलम ने अपने 5 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। गुरुकुलम से शिक्षा प्राप्त करने वाले तीन छात्रों को श्री अकलंक शरणालय रेवाड़ी जो मुनि श्री प्रणम्य सागरजी महाराज के मंगल आशीर्वाद से संचालित है। वहां अध्ययन करने के लिए भेजा गया। वहां इन छात्रों ने अनुशासन, सांस्कृतिक गतिविधि एवं शिक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। आयुष जैन भगवां, ऋतिक जैन गुलगंज एवं संभव जैन खरगापुर में प्रथम पांच छात्रों में प्रथम द्वितीय एवं चतुर्थ स्थान प्राप्त कर श्री नवागढ़ गुरुकुलम का गौरव एवं मान बढ़ाया है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-105634" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260426-WA0007.jpg" alt="" width="148" height="204" /></p>
<p><strong>बधाई एवं शुभकामना</strong></p>
<p>श्री नवागढ़ गुरुकुलम अतिशय क्षेत्र नवागढ़ एवं पंडित गुलाबचंद पुष्प स्मृति ट्रस्ट की ओर से इन छात्रों को बधाई दी गई। इन्होंने गुरुकुलम का ही नहीं जैन संस्कृति एवं जैन संस्कारों का बहुमान करते हुए समाज का गौरव बढ़ाया है। श्री नवागढ़ गुरुकुलम संस्थापक ब्रह्मचारी जयकुमार निशांत भैया के निर्देशानुसार प्रतिवर्ष योग्य छात्रों को विभिन्न स्थान पर शिक्षा हेतु भेजा जाता है। खुरई गुरुकुलम में अध्ययनरत छात्रों में से दो छात्रों ने विशेष स्थान प्राप्त किया है एवं बढ़िया जिला टीकमगढ़ में संचालित सर्वोदय जो आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के आशीर्वाद से संचालित है में अध्ययनरत 12 छात्रों में से 8 छात्रों ने प्रवीण्य सूची में में स्थान प्राप्त कर श्री नवागढ़ गुरुकुलम का गौरव बढ़ाया है। छात्रों के परिजनों एवं शिक्षकों के लिए सभीकी ओर से बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं आपके सहयोग से ही इन छात्रों को गौरव में स्थान प्राप्त हुआ है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-105635" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260426-WA0008-195x300.jpg" alt="" width="195" height="300" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260426-WA0008-195x300.jpg 195w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260426-WA0008.jpg 320w" sizes="(max-width: 195px) 100vw, 195px" /></p>
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		<title>सिद्ध चक्र महामंडल विधान का हवन पूर्णाहुति के साथ समापन : आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने हवन के महत्व, भाव-क्रिया समन्वय और धर्म के प्रति एकाग्रता पर दिया मार्गदर्शन </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Sep 2025 05:44:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रामगंजमंडी में सिद्ध चक्र महामंडल विधान का समापन रविवार को श्री जी के अभिषेक, शांति धारा और हवन पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न हुआ। आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने हवन का अर्थ और उद्देश्य समझाया, साथ ही पूजा और भाव के समन्वय, धर्म के लिए एकाग्रता, तथा कर्म सिद्धांत पर महत्वपूर्ण संदेश दिए। पढ़िए [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी में सिद्ध चक्र महामंडल विधान का समापन रविवार को श्री जी के अभिषेक, शांति धारा और हवन पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न हुआ। आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने हवन का अर्थ और उद्देश्य समझाया, साथ ही पूजा और भाव के समन्वय, धर्म के लिए एकाग्रता, तथा कर्म सिद्धांत पर महत्वपूर्ण संदेश दिए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>रामगंजमंडी में गत दिनों से चल रहे सिद्ध चक्र महामंडल विधान का भव्य समापन रविवार की बेला में हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत श्री जी के अभिषेक और शांति धारा से हुई, इसके उपरांत नित्य नियम पूजन और हवन पूर्णाहुति संपन्न हुई। इस अवसर पर आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने उपस्थित भक्तों को आशीर्वचन दिए और हवन का सटीक अर्थ बताया। गुरुदेव ने हवन का उद्देश्य स्पष्ट किया और कहा कि हवन का मतलब केवल अग्नि में अरघ अर्पित करना नहीं है, बल्कि यह अपने कर्मों और साधना की समीक्षा करने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि हवन का उद्देश्य शांति, व्यक्तिगत और विश्व शांति दोनों के लिए होना चाहिए।</p>
<p><strong>भाव के साथ क्रिया करने से साधना पूर्ण होती है</strong></p>
<p>उन्होंने अरघ अर्पण के महत्व पर ध्यान देते हुए कहा कि केवल क्रिया करना पर्याप्त नहीं है, इसमें भाव होना अत्यंत आवश्यक है। पूजा और धर्मध्यान में भाव और क्रिया का समन्वय होना चाहिए। भाव के बिना क्रिया औपचारिक मात्र बन जाती है, जबकि भाव के साथ क्रिया करने से साधना पूर्ण होती है। आचार्य श्री ने कहा कि धर्म करने के लिए एकाग्रता अत्यंत आवश्यक है। यदि क्रिया निराकुल भाव से की जाती है, तो उसका वास्तविक फल नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि दुनिया में सबसे बड़ी समस्या है समय और काम का संतुलन; यदि हम एक घंटे ध्यान और पूजा में सही भाव और पुरुषार्थ के साथ लगाएं, तो लाखों ऊर्जा का फल प्राप्त कर सकते हैं।</p>
<p><strong>पूजा में द्रव्य और भाव के समन्वय पर भी जोर</strong></p>
<p>गुरुदेव ने पूजा में द्रव्य और भाव के समन्वय पर भी जोर दिया और कहा कि जो लोग वर्षों से पूजा कर रहे हैं, उनसे मार्गदर्शन लेना चाहिए। कोई भी कार्य सरल या कठिन नहीं होता, यह हमारी समझ और अभ्यास पर निर्भर करता है। यदि हम भगवान का नाम बड़े भाव से लेते हैं, तो हमारे कर्मों की निर्जरा होती है।</p>
<p>कर्म सिद्धांत पर चर्चा करते हुए आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि कोई किसी का कर्ता नहीं है। हमारे कर्मों का फल हमें स्वयं भुगतना पड़ता है, और जो बिगड़ा है उसे ही सुधारना होगा।</p>
<p>आचार्य श्री ने हवन को दैनिक करने की आवश्यकता बताई और कहा कि मंदिर में हवन कुंड में बुराइयों को डालकर धर्म अनुराग और शांति का अनुभव होना चाहिए। उन्होंने मोबाइल के बढ़ते उपयोग पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे आकुलता बढ़ी है और साधना प्रभावित हुई है।</p>
<p>इस अवसर पर उपस्थित भक्तों ने गुरुदेव के उपदेशों को ध्यानपूर्वक सुना और हवन एवं साधना में भाव, एकाग्रता और पुरुषार्थ का संदेश ग्रहण किया।</p>
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		<title>भोगों में इतनी आसक्ति बढ़ गई है कि हम समझ नहीं पा रहे हम हिंसक पदार्थों को खा रहे हैं या अहिंसक : आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने धर्मसभा में भोगों से दूरी बनाने की दी सीख </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/our_attachment_to_pleasures_has_increased_so_much_that_we_are_unable_to_understand_whether_we_are_consuming_violent_substances_or_non_violent_ones/</link>
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		<pubDate>Mon, 04 Aug 2025 13:38:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी यहां चातुर्मासरत हैं। नित्य पूजन अभिषेक, शांतिधारा के साथ ही आचार्य श्री के प्रवचन हो रहे हैं। इसमें अपूर्व धर्म प्रभावना हो रही है। आचार्य श्री ने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति का भोगों पर इतना ध्यान हो गया है कि उसके भोगों के प्रति आसक्ति बढ़ गई है।रामगंजमंडी से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी यहां चातुर्मासरत हैं। नित्य पूजन अभिषेक, शांतिधारा के साथ ही आचार्य श्री के प्रवचन हो रहे हैं। इसमें अपूर्व धर्म प्रभावना हो रही है। आचार्य श्री ने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति का भोगों पर इतना ध्यान हो गया है कि उसके भोगों के प्रति आसक्ति बढ़ गई है।<span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रामगंजमंडी</strong>। आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी यहां चातुर्मासरत हैं। नित्य पूजन अभिषेक, शांतिधारा के साथ ही आचार्य श्री के प्रवचन हो रहे हैं। इसमें अपूर्व धर्म प्रभावना हो रही है। आचार्य श्री ने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति का भोगों पर इतना ध्यान हो गया है कि उसके भोगों के प्रति आसक्ति बढ़ गई है एवं व्यक्ति यह भी ध्यान नहीं दे पा रहा है कि वह हिंसक पदार्थों को खा रहा है या अहिंसक को, वह यह भी ध्यान नहीं दे पा रहा है कि मांसाहारी का सेवन कर रहा है या शाकाहारी का। बस केवल यह देख रहा है कि दिमाग को और जीभ को पसंद आना चाहिए। वर्तमान परिप्रेक्ष्य पर गुरुदेव ने कहा कि आज माल आदि आप ही की भोग आसक्ति का परिणाम है जो चीज बाजार में 5 रुपए में मिलती है वही चीज माल आदि में 20 रुपए की मिलती है, लेकिन ट्रॉली लेकर चलने के स्टैंडर्ड में हम मरे जा रहे हैं। अंबानी को करोड़पति अरबपति बनाने वाले हम हैं। पैसे की ताकत में यह नहीं सोचा जा रहा धर्म दयालु हैं, करुणाशील हैं। हम उस घर पर आरोप लगा रहे हैं कि यह धर्म जीवों का ध्यान नहीं रखता। हम चुपचाप बैठे हैं। यह हमारे लिए सबसे ज्यादा हानिकारक बात है। भोगों से भी विरक्त होना भी जरूरी है लेकिन, खाना भी जरूरी है, वस्त्र भी जरूरी है, स्नान करना भी जरूरी है लेकिन, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह करते हुए धर्म ध्यान भी जरूरी है। संवेग विषय को समझाते हुए कहा कि इसका अर्थ है कि विषय भोगों से आसक्ति घटना सम्यक दर्शन को समझाया। उन्होंने कहा कि हमारी आस्था सत्य पर होनी चाहिए यह भी ज्ञात होना चाहिए कि जो सत्य है वह असत्य है उसकी पहचान हमें होनी चाहिए।</p>
<p><strong>तैरना है तो पानी में जाना पड़ेगा</strong></p>
<p>मंदिर हम आते हैं और शांतिनाथ भगवान के दर्शन करते हैं लेकिन, उससे कुछ नहीं होगा हमारी लगन भगवान में लगनी चाहिए तभी सम्यकदर्शन की प्राप्ति होगी। लगन यह लगनी चाहिए कि यह मूर्तिमान कैसे होगे। जहां वह बैठे होंगे कैसे लगते होंगे। उन्होंने कहा क्रिया व्यर्थ नहीं है धर्म ध्यान पूजन क्रिया बचपन से कर रहे हैं हम उपदेश सुन रहे हैं। वह भी सम्यक दर्शन में लाभ देती है। हम क्रिया तो कर रहे हैं लेकिन हम क्रिया में लगन नहीं लगा पा रहे हैं। तैरना है तो पानी में जाना पड़ेगा जिस विधि से जिस चीज की उपलब्धि होनी है उसी के अनुरूप कार्य करना होगा जो हम नहीं करते।</p>
<p><strong>राग को धर्मानुराग बदलना होगा </strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि हम राग को कम नहीं कर सकते लेकिन उसे धर्म अनुराग में बदलना होगा एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि जब हम भोजन बनाते हैं नमक ज्यादा होने पर यहां तो हम उसे वस्तु में पानी डालते हैं या फिर कोई पदार्थ डालते हैं। घर कार्य हैं हम उसे बदलना जानते हैं। उन्होंने कहा प्रशम राग आने पर राग धर्म अनुराग में बदल जाता है भरत चक्रवर्ती का उदाहरण देते हुए कहा कि भरत चक्रवर्ती को भी घर में लोग बैरागी कहते थे उनके अंदर प्रशम भाव था। प्रशम भाव आपके भीतर आ जाए तो आपको भी प्रशम भाव होगा। मन में भाव आ जाए और यह वस्तु मेरी भी नहीं है यह भाव प्रशम भाव है। यह भाव आ जाएं यह वस्तु संयोग से मेरी है यही प्रशम भाव है। वस्तु पर्याय के संबंध से मेरी है द्रव्य के संबंध से मेरी नहीं है जैन दर्शन कहता है कि मंदिर में नहीं घर में धर्म होता है।</p>
<p><strong>दुनिया का उतना ध्यान रखो जितनी बाहर है</strong></p>
<p>राग द्वेष के विषय मे कहा कि हम राग द्वेष करते रहते करते करते नरक तक पहुंच जाते हैं यदि हम करते रहेंगे तो दुर्गति को प्राप्त होंगे यदि राग करना है तो धर्म अनुराग करो तो सत्य प्राप्त होगा। और यह हो जाएगा तो वस्तु वास्तविक स्वरूप समझ आएगा। उन्होंने कहा दुनिया ने राम, महावीर, सीता किसी को नहीं छोड़ा यहां तक उनके पुत्र तक ने नहीं छोड़ा दुनिया का उतना ध्यान रखो जितनी बाहर है। दुनिया को भूल जाओ किसी को देकर भूल जाओ और धर्म अनुराग का परिचय दो वह याद दिलाए तो धर्म अनुराग है। हमें तो देकर भूलना चाहिए यही धर्म अनुराग है। यदि धर्म ध्यान से फुर्सत नहीं है तो तुम सम्यक दृष्टि हो। प्रवचन सभा के शुभारंभ में मंगलाचरण पदम सुरलाया ने किया धर्मसभा में तत्वार्थ सूत्र के द्वितीय अध्याय की परीक्षा के परिणाम घोषित किए गए। इसमें प्रथम पुरस्कार विवेका जैन, द्वितीय अनिता जैन, तृतीय रेखा शाह रही।</p>
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		<title>आचार्य श्री विनिश्चय सागर के सानिध्य में बच्चों का सेमिनार: बच्चों ने सुनाए णमोकार मंत्र </title>
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		<pubDate>Sun, 06 Jul 2025 14:17:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में दोपहर बेला में छोटे-छोटे बच्चों एवम युवाओं को संबोधित किया। जिसका निर्देशन मुनि श्री प्रांजल सागर महाराज ने किया। जिसके अंतर्गत बच्चों को शिक्षाप्रद खेल भी खिलाए गए। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में दोपहर बेला में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में दोपहर बेला में छोटे-छोटे बच्चों एवम युवाओं को संबोधित किया। जिसका निर्देशन मुनि श्री प्रांजल सागर महाराज ने किया। जिसके अंतर्गत बच्चों को शिक्षाप्रद खेल भी खिलाए गए। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में दोपहर बेला में छोटे-छोटे बच्चों एवम युवाओं को संबोधित किया। जिसका निर्देशन मुनि श्री प्रांजल सागर महाराज ने किया। जिसके अंतर्गत बच्चों को शिक्षाप्रद खेल भी खिलाए गए। छोटे बच्चे मुनि श्री प्रांजल सागर महाराज के समक्ष आकर महामंत्र नमोकार मंत्र सुनाया और महाराज जी न जब उनसे वार्तालाप कर रहे थे वे दृश्य भाव विभोर कर देने वाले थे। इस बेला में नयांश जैन बाबरिया ने मंगला चरण की प्रस्तुति दी।</p>
<p>सर्वप्रथम मुनि श्री प्रत्यक्ष सागर महाराज ने कहा कि आज आप सभी को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है, क्योंकि चंद्रगुप्त मौर्य ने सपना देखा था, जिसमें देखा था की रथ को दो युवा खींच रहे हैं। इस स्वप्न का फल मुनिराज ने चंद्रगुप्त मौर्य को बताया कि पंचम काल में धर्म का रथ यदि कोई खींचेगा तो युवा ही खींचेंगे इसलिए आज आप सभी बच्चों को मंदिर में देखकर मुझे और आचार्य श्री को बड़ी खुशी हो रही है और यह खुशी हमेशा बनी रहे।</p>
<p><strong>जीवन में कुछ करके दिखाने की लिए तैयार रहना चाहिए</strong></p>
<p>इस अवसर पर आचार्य श्री श्री विनिश्चय सागर महाराज ने कहा की जीवन में हमे हर स्थिति में दूसरे की सहयोग के लिए तैयार रहना चाहिए। हम किसी की भी हेल्प करे तो अहसान मत करना बल्कि मन में आत्म गौरव होना चाहिए। उपलब्धि कुछ ही समय के लिए होती है लेकिन अनुभव बहुत ज्यादा काम आते हैं। उन्होंने उपलब्धि और अनुभव प्राप्त करने के लिए तीन बातों का विशेष रूप से उल्लेख किया उन्होंने कहा कि लगातार बैठकर पढ़ने का अभ्यास होना चाहिए।</p>
<p>हमें लगन होना चाहिए हम जो भी कार्य करें उसमें लगन होना चाहिए और उसे पूरी लगन के साथ करना चाहिए और कहा कि कुछ करके दिखाए जीवन में कुछ करके दिखाने की लिए तैयार रहना चाहिए। यदि हम ऐसा करते हैं तो हमें अनुभव और उपलब्धि हासिल होगी। इसी हमें परीक्षा में नंबर भी अच्छे प्राप्त हो सकते हैं और अनुभव भी प्राप्त होगा। इस बेला में बच्चों को पुरस्कृत भी किया पुरस्कार मुकेश जैन ओसारा वाले की और से प्रदान किए इस बेला में बच्चों में युवाओ में काफी उत्साह था।</p>
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